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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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2025 - KMSRAJ51 की कलम से

खुशी नहीं मिलती।

Kmsraj51 की कलम से…..

Khushi Nahin Milati | खुशी नहीं मिलती।

He who has learnt to be happy, spends his time in joy. Some think of making one into hundred, hundred into thousand. While some yearn for every penny.

खुश रहना जिसने है सीखा।
समय उसका आंनद में है बीता॥

एक से सौ, सौ से हज़ार बनाने की है कोई सोचता।
तो कोई पाई-पाई के लिए है तरसता॥

सुंदर व सबसे न्यारा महल है कोई बनाता।
तो किसी को छत भी नसीब नहीं होता॥

नाना प्रकार के व्यंजन है कोई खाता।
कोई भूखे पेट ही सो जाता॥

शौक से कोई अर्धनग्न है घूमता।
तो कोई बदन ढकने को है तरसता॥

रोटी पचाने को किसी को घूमना है पड़ता।
तो कोई रोटी के लिए दर दर है भटकता॥

कोई माँ बाप का श्रवण कुमार है बनता।
तो कोई इन्हें घर से बाहर है निकालता॥

किसी के पास हजारों का पलंग पर नींद कहाँ।
जिसको नींद वो सो जाता है चाहे हो फुटपाथ या हो खुला आसमां॥

♦ विनोद वर्मा जी / (मझियाठ बलदवाड़ा) जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कवि इस कविता के माध्यम से जीवन में खुश रहने के महत्व को बताते हैं। वे कहते हैं कि जिसने खुश रहना सीख लिया, उसका जीवन आनंद से भर जाता है।दुनिया में लोगों की आर्थिक, सामाजिक और व्यक्तिगत परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं—
    • कोई व्यक्ति धन कमाने और संपत्ति बढ़ाने में लगा रहता है, जबकि कोई बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करता है।
    • कोई आलीशान महल बनाता है, जबकि किसी को छत तक नसीब नहीं होती।
    • कोई तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन खाता है, जबकि कोई भूखा सोने को मजबूर होता है।
  • इसी तरह, कोई शौक से आधुनिक वस्त्र पहनता है, जबकि किसी के पास तन ढकने के लिए कपड़े तक नहीं होते। कोई भोजन पचाने के लिए घूमता है, जबकि कोई रोटी के लिए दर-दर भटकता है।परिवार में भी भिन्न परिस्थितियाँ देखने को मिलती हैं—
    • कोई संतान अपने माता-पिता की सेवा करता है, तो कोई उन्हें घर से निकाल देता है।
    • किसी के पास महंगे बिस्तर होते हुए भी नींद नहीं आती, जबकि जिसे सुकून प्राप्त होता है, वह कहीं भी चैन की नींद सो सकता है।

    अंततः, कवि हमें संतोष और खुशी का महत्व समझाने की कोशिश करते हैं, यह दर्शाते हुए कि संपत्ति या संसाधन ही सुख का कारण नहीं होते, बल्कि मन की शांति और संतोष ही सच्चा आनंद देते हैं।

—————

यह कविता (खुशी नहीं मिलती।) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विनोद कुमार है, रचनाकार के रुप में विनोद वर्मा। माता का नाम श्री मती सत्या देवी और पिता का नाम श्री माघु राम है। पत्नी श्री मती प्रवीना कुमारी, बेटे सुशांत वर्मा, आयुष वर्मा। शिक्षा – बी. एस. सी., बी.एड., एम.काम., व्यवसाय – प्राध्यापक वाणिज्य, लेखन भाषाएँ – हिंदी, पहाड़ी तथा अंग्रेजी। लिखित रचनाएँ – कविता 20, लेख 08, पदभार – सहायक सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल प्रवक्ता संघ मंडी हिमाचल प्रदेश।

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©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ® ———–

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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मैं हूँ जीभ।

Kmsraj51 की कलम से…..

Main Hoon Jeebh | मैं हूँ जीभ।

I am very soft, I always stay in the mouth, I come out sometimes. I am expert in tasting the taste, I make it clear in a moment.

हूँ बड़ी कोमल मुंह में रहती सदा,
बाहर भी निकलती हूँ यदा कदा।
स्वाद चखने में हूँ माहिर,
पल में कर देती हूँ जाहिर।

शब्दों को हूँ मैं सजाती,
दूसरों तक हूँ पहुंचाती।
कभी जोर से हूँ बोलती,
तो कभी मुंह में ही शब्द हूँ घोलती।

बचपन हो या हो बुढ़ापा,
मुझमें जोर होता है ज्यादा।
शरीर के रोगों को भी हूँ जताती,
दवा भी मुझे छू कर ही जाती।

कष्ट बहुत हूँ देती,
उलजलूल शब्द जब हूँ कहती।
बड़ाई भी होती है तब,
अच्छी बात करती हूँ जब।
नहीं है सम्भालना मुझे आसान,
जिसने सम्भाला बन गया वो महान।

♦ विनोद वर्मा जी / (मझियाठ बलदवाड़ा) जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता “जीभ” के गुणों और प्रभावों को दर्शाती है। जीभ एक कोमल अंग है, जो स्वाद चखने में माहिर होती है और शब्दों को सजाकर दूसरों तक पहुंचाती है। यह कभी जोर से बोलती है, तो कभी चुप भी रह जाती है। जीभ का प्रभाव बचपन से बुढ़ापे तक बना रहता है। यह न केवल भोजन का स्वाद पहचानती है, बल्कि शरीर में किसी रोग के संकेत भी देती है। दवाएं भी जीभ के संपर्क में आने के बाद ही शरीर में असर करती हैं। यहअच्छे और बुरे दोनों तरह के शब्दों का माध्यम बन सकती है। जब यह गलत शब्द कहती है, तो कष्ट देती है, लेकिन जब यह अच्छी बातें बोलती है, तो प्रशंसा भी पाती है। कवि अंत में कहते हैं कि जीभ को नियंत्रित रखना आसान नहीं होता, और जो व्यक्ति इसे संभालना सीख लेता है, वही सच्चे अर्थों में महान बनता है।

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यह कविता (मैं हूँ जीभ।) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विनोद कुमार है, रचनाकार के रुप में विनोद वर्मा। माता का नाम श्री मती सत्या देवी और पिता का नाम श्री माघु राम है। पत्नी श्री मती प्रवीना कुमारी, बेटे सुशांत वर्मा, आयुष वर्मा। शिक्षा – बी. एस. सी., बी.एड., एम.काम., व्यवसाय – प्राध्यापक वाणिज्य, लेखन भाषाएँ – हिंदी, पहाड़ी तथा अंग्रेजी। लिखित रचनाएँ – कविता 20, लेख 08, पदभार – सहायक सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल प्रवक्ता संघ मंडी हिमाचल प्रदेश।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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मुहब्बत के नशे की लत।

Kmsraj51 की कलम से…..

Muhabbat Ke Nashe Kee Lat | मुहब्बत के नशे की लत।

If love and affection prevail everywhere in the world, then perhaps hatred and conflicts would cease to exist.

तमन्ना के तराजू में, रिश्तों का राशन कभी तोला नहीं करते।
गैरों की महफिल में, अपनों के राज कभी खोला नहीं करते।
क्योंकि यहां हर दीवार के पीछे छुपा है कोई कान लगाकर,
“दीवारों के भी कान होते हैं” कहते हैं, सच बोला नहीं करते।

यहां होती हैं बहुत सी बातें, इशारों ही इशारों में बहुत बार,
लोग झेंपते हैं यह सब पर, फिर भी कुछ बोला नहीं करते।
मुहब्बत के बाजार में, हो जाता है नीलाम पर्दे में सब कुछ,
लोग जानते हैं सब कुछ, पर पर्दे को कभी खोला नहीं करते।

बद ज़ुबानी तो बर्दाश्त नहीं है, मुहब्बत के रिश्ते में किसी को,
पर प्रेम की फटकार से तो यहां, कभी रिश्ते टूटा नहीं करते।
ये प्यार के पेड़ हमेशा, विश्वास की जमीन पर उगते हैं साहेब,
शक, नफ़रत, चालाकियों की, माटी पत्थर में उगा नहीं करते।

बड़ी लज़ीज़ फितरत होती है, ये मुलायम मुहब्बत भी साहेब,
होती सबके दिलो दिमाग में है, पर इजहार किया नहीं करते।
दिल ही दिल में लेते हैं मौज सब, इस नायाब रसीले रस का,
पर दुनियां के बाज़ार में, कोई इसका जाम पीया नहीं करते।

काश! डूब जाता दुनियां का हर सरोकार, मुहब्बत के जाम में,
तो शायद ये नफ़रत के झगड़े, दुनियां में हुआ ही नहीं करते।
काश ! एक बार लग जाती मुहब्बत के नशे की लत सबको,
फिर तो शायद हम इस नशे की गिरफ्त से छूटा नहीं करते।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कवि हमें सिखाते हैं कि रिश्तों को स्वार्थ और अपेक्षाओं के तराजू में नहीं तोलना चाहिए, और अपनों की बातें गैरों के बीच उजागर नहीं करनी चाहिए, क्योंकि हर जगह छुपे हुए कान होते हैं। दुनिया में बहुत कुछ इशारों में कहा-सुना जाता है, लेकिन लोग दिखावे के डर से खुलकर बोल नहीं पाते। प्रेम और भावनाओं का बाज़ार भी अजीब होता है—सब कुछ बिकता है, फिर भी लोग इसे ज़ाहिर करने से हिचकिचाते हैं। प्यार और विश्वास की बुनियाद पर रिश्ते टिकते हैं, लेकिन शक और चालाकी से ये रिश्ते टूट जाते हैं। सच्चा प्रेम दिलों में होता है, पर बहुत से लोग इसे खुलकर स्वीकार नहीं करते। अगर दुनिया में प्रेम और अपनापन हर जगह व्याप्त हो जाए, तो शायद नफरत और झगड़ों का कोई अस्तित्व ही न रहे। कवि यह कामना करते हैं कि हर कोई प्रेम के नशे में डूब जाए, जिससे यह दुनिया और भी सुंदर बन सके।

—————

यह कविता (मुहब्बत के नशे की लत।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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ज्ञान की ज्योत जगा दे मां।

Kmsraj51 की कलम से…..

Gyan Ki Jyot Jaga De Maa | ज्ञान की ज्योत जगा दे मां।

Mother Hansvahini is requested to fill his empty dictionary and remove the darkness of ignorance.

हे मां शारदे,
वीणावादिनी मां,
ज्ञान की देवी,
ज्ञान की ज्योत जगा दे मां,
मैं हूं तुच्छ अज्ञानी,
मुझे ज्ञान का मार्ग दिखा दे मां।

हे मां हंसवाहिनी,
अंधकार निवारणी,
मेरा शब्दकोश है खाली,
भर दे तू इसे बजाकर ताली,
मुझ तुच्छ अज्ञानी को,
ज्ञान की ज्योत जगा दे मां।

हे मां बागेश्वरी,
तू बजाती सुरों की बांसुरी,
मेरे कलम की लेखनी को दे धार,
लेखनी आपसे, आप सबके द्वार,
मुझ तुच्छ अज्ञानी को,
ज्ञान की ज्योत जगा दे मां।

हे मां भारती,
ज्ञान सबमें तू ही भरती,
तमस दूर हो हृदय हमारे,
आशा और विश्वास तुम्हारे,
मुझ तुच्छ अज्ञानी को,
ज्ञान की ज्योत जगा दे मां।

हे मां ज्ञानदा,
आंखों पर पड़े न मेरे परदा,
मां मेरी कविता में तू,
भर दे वीणा की झंकार,
मुझ तुच्छ अज्ञानी को,
ज्ञान की ज्योत जगा दे मां।

हे मां वाग्देवी,
मुझे दे सद्बुद्धि,
भेंट करूं तुझे कलम पुष्प से,
गूंथे हुए सब हार,
मुझ तुच्छ अज्ञानी को,
मां ज्ञान की ज्योत जगा देना।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता मां सरस्वती की वंदना करते हुए ज्ञान और बुद्धि की प्रार्थना करती है। कवि मां शारदा से निवेदन करता है कि वह अपनी वीणा के मधुर स्वर से उसे ज्ञान का प्रकाश प्रदान करें, क्योंकि वह अज्ञानी और तुच्छ है। मां हंसवाहिनी से आग्रह किया गया है कि वह उसके खाली शब्दकोश को भर दें और अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करें। मां बागेश्वरी से कवि अपनी लेखनी को धार देने की प्रार्थना करता है ताकि वह सभी तक ज्ञान का प्रकाश पहुंचा सके। मां भारती से अनुरोध किया गया है कि वह सभी के हृदय से अज्ञान का तमस (अंधकार) दूर करें और आशा तथा विश्वास का संचार करें। मां ज्ञानदा से कवि यह विनती करता है कि उसकी आंखों पर अज्ञान का कोई पर्दा न पड़े और उसकी कविता में वीणा की झंकार भर जाए। अंत में, मां वाग्देवी से वह सद्बुद्धि की कामना करता है और अपनी कविता को एक पुष्पहार के रूप में अर्पित करने की इच्छा व्यक्त करता है। संपूर्ण कविता ज्ञान प्राप्ति की प्रार्थना और मां सरस्वती की स्तुति में समर्पित है।

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यह कविता (ज्ञान की ज्योत जगा दे मां।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। भोला सिंह हाई स्कूल पुरुषोत्तम, कुरहानी में अभी एक शिक्षक के रूप में कार्यरत हूँ। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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