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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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2025 - KMSRAJ51 की कलम से

हमारा क्या कसूर।

Kmsraj51 की कलम से…..

Hamara Kya Kasoor | हमारा क्या कसूर।

खुशी खुशी घूमने पहुंचे पहलगाम,
क्या पता था कि यहाँ हो जाएगा काम तमाम।
कोई विदेश से आया तो कोई अपने ही देश से,
हसीन वादियों का आनंद ले रहे थे बड़े शौक से।

एकाएक सन्नाटा सा छा है जाता,
किसी को कुछ भी समझ नहीं आ पाता।
गोलियों की आवाज़ जोर से है आती,
किसी से धर्म की तो किसी से कलमा पढ़ने की बात पूछी जाती।

हिन्दू शब्द जैसे ही सुनाई देता,
सीने में गोली दाग जान ले लेता।
कलमा पढ़ने में जो नहीं हुआ पास,
उसे भी जीने की नहीं रही थी आस।

हाथों से अभी मेहंदी का रंग भी नहीं था उतरा,
सुहाग उजाड़ कर जिन्दगी कर दी कतरा – कतरा।
आखिर कसूर क्या था जो गोलियों से उड़ाए,
अपने ही देश के तो थे हम कहाँ थे पराए।

♦ विनोद वर्मा जी / (मझियाठ बलदवाड़ा) जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता पहलगाम जैसी सुंदर और शांत जगह पर हुई एक दर्दनाक घटना को दर्शाती है। कवि बताता है कि लोग खुशी-खुशी वहाँ घूमने आए थे, कोई विदेश से तो कोई देश के अन्य हिस्सों से, पर उन्हें क्या पता था कि यह यात्रा उनकी आखिरी बन जाएगी। अचानक वहाँ अफरा-तफरी मच जाती है, गोलियों की आवाजें गूंजने लगती हैं। कुछ लोग धर्म पूछकर जान लेने लगते हैं — अगर कोई हिन्दू निकले तो उसे गोली मार दी जाती है, और जो कलमा नहीं पढ़ पाते, उनकी भी जान नहीं बख्शी जाती। कविता उस दर्द को भी दर्शाती है जब नवविवाहित दुल्हनों की हाथों से मेहंदी का रंग भी नहीं उतरा था, और उनका सुहाग उजड़ गया। सवाल उठाया गया है कि आखिर उनका कसूर क्या था? वे तो अपने ही देश के नागरिक थे, फिर भी उन्हें पराया समझकर मारा गया। कुल मिलाकर, यह कविता धार्मिक असहिष्णुता और आतंक की भयावहता को उजागर करती है, साथ ही यह सवाल उठाती है कि जब अपने ही देश में लोग सुरक्षित नहीं हैं, तो इंसानियत कहाँ बची है?

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यह कविता (हमारा क्या कसूर।) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विनोद कुमार है, रचनाकार के रुप में विनोद वर्मा। माता का नाम श्री मती सत्या देवी और पिता का नाम श्री माघु राम है। पत्नी श्री मती प्रवीना कुमारी, बेटे सुशांत वर्मा, आयुष वर्मा। शिक्षा – बी. एस. सी., बी.एड., एम.काम., व्यवसाय – प्राध्यापक वाणिज्य, लेखन भाषाएँ – हिंदी, पहाड़ी तथा अंग्रेजी। लिखित रचनाएँ – कविता 20, लेख 08, पदभार – सहायक सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल प्रवक्ता संघ मंडी हिमाचल प्रदेश।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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टूटता विश्वास।

Kmsraj51 की कलम से…..

Tootata Vishwas | टूटता विश्वास।

रिश्ता विश्वास पर ही टिकता
फिर भी कहीं न कहीं जरूर है टूटता।
विश्वास है रिश्ते की जड़
पर वह भी नहीं रहा उतना दृढ़।

कभी दौलत पर टूटा
तो कभी हवस के लिए फूटा।
कभी फ्रिज में टुकड़ो में टूटता नज़र आया
तो कभी ड्रम में रखते हुए टूटता पाया।

कभी नाजायज रिश्तों में टूटा
तो कभी पराए संग भाग कर लूटा।
उम्र का रखा न कोई ख्याल
जब भी तोड़ा किया खूब बेहाल।

चहुँ ओर है अब हाहाकार
अब तो विश्वास से भी हो रहा है अत्याचार।
विश्वास जब भी देखों कहीं न कहीं जरूर है टूटा
जब भी टूटा इसमें कभी भी नव अंकुर नहीं है फूटा।

नए – नए होने पर खूब है बरसता
जब भी है टूटता इंसान बड़ा है तरसता।
असमंजस में है अब किस पर विश्वास करें
कब और कहाँ विश्वास टूटे हैं सब डरे – डरे।

♦ विनोद वर्मा जी / (मझियाठ बलदवाड़ा) जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता “विश्वास” और उससे जुड़े रिश्तों की नाज़ुकता पर आधारित है। कवि कहता है कि हर रिश्ता विश्वास पर ही टिका होता है, लेकिन समय-समय पर यह विश्वास टूटता जरूर है। आज के समय में यह विश्वास कभी धन, कभी लालच, और कभी नाजायज़ संबंधों के कारण टूटता है। रिश्तों में न उम्र की परवाह रह गई है और न ही नैतिकता की। विश्वास का टूटना अब आम हो गया है, और हर जगह इसका प्रभाव दिखता है – चाहे वो रिश्तों में हो या समाज में। जब विश्वास टूटता है तो इंसान बेहद दुखी और असमंजस में पड़ जाता है कि अब किस पर भरोसा किया जाए। कुल मिलाकर, कविता इस बात को उजागर करती है कि आधुनिक समाज में विश्वास लगातार कमजोर होता जा रहा है, और इसका परिणाम है रिश्तों का बिखराव व मनुष्यों का मानसिक कष्ट।

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यह कविता (टूटता विश्वास।) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विनोद कुमार है, रचनाकार के रुप में विनोद वर्मा। माता का नाम श्री मती सत्या देवी और पिता का नाम श्री माघु राम है। पत्नी श्री मती प्रवीना कुमारी, बेटे सुशांत वर्मा, आयुष वर्मा। शिक्षा – बी. एस. सी., बी.एड., एम.काम., व्यवसाय – प्राध्यापक वाणिज्य, लेखन भाषाएँ – हिंदी, पहाड़ी तथा अंग्रेजी। लिखित रचनाएँ – कविता 20, लेख 08, पदभार – सहायक सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल प्रवक्ता संघ मंडी हिमाचल प्रदेश।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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मोबाइल फोन का असर।

Kmsraj51 की कलम से…..

Effect of Mobile Phone | मोबाइल फोन का असर।

There is no shame, no respect, seeing all this the common people are getting upset. While making reels they speak dirty words, it seems as if the values ​​have vanished. Effect of mobile phone.

नई पीढ़ी का है ये हाल,
फेसबुक, इंस्टाग्राम पर मचा रखी है धमाल।
मोबाइल फोन का एक जादू सा है छाया
जिसको देखो, जहाँ देखो हरदम इसमें है खोया।

न शर्म, न इज्जत का है कोई ध्यान,
देख ये सब आमजन हो रहा है परेशान।
रील बनाते समय निकालते हैं गन्दे बोल,
संस्कारों का निकल गया है मानो झोल।

मर्यादा का नहीं रहा है कोई नाम,
सिर्फ फौलोवर्स बढ़ाना बन गया है काम।
लाईक व कमेंट देख खुश हो जाते,
मात्र इसी को ही प्रसिद्धि बतलाते।

संस्कार भूल रही है नई पीढ़ी,
शायद इसी को ही समझते हैं आधुनिकता की सीढ़ी।
जिसको देखो वो मोबाइल पर है व्यस्त,
बच्चा, नौजवान और बूढ़ा सब है इसमें मस्त।

मोबाइल फोन का बड़ा नशा है आज,
खाना खाते, उठते बैठते इसका प्रयोग बन गया सबका काज।
मोबाइल फोन के बच्चे हो गए हैं आदि,
गर न मिले तो जान की बाजी तक लगा दी।

♦ विनोद वर्मा जी / (मझियाठ बलदवाड़ा) जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता में नई पीढ़ी की मोबाइल और सोशल मीडिया पर बढ़ती निर्भरता पर चिंता व्यक्त की गई है। कवि दर्शाते हैं कि युवा फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसी सोशल मीडिया साइट्स पर अत्यधिक सक्रिय हैं और मर्यादा, संस्कार व इज्जत की परवाह किए बिना सिर्फ लाइक्स और फॉलोअर्स बढ़ाने में लगे हुए हैं। मोबाइल फोन का नशा इतना बढ़ गया है कि बच्चे, युवा और बूढ़े सभी इसके आदि हो चुके हैं। यह आदत उनके आचरण, संस्कृति और जीवनशैली को प्रभावित कर रही है, जिससे समाज में एक नई समस्या उत्पन्न हो रही है।

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यह कविता (मोबाइल फोन का असर।) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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चाह नव वर्ष की।

Kmsraj51 की कलम से…..

Chaah Nav Varsh Ki | चाह नव वर्ष की।

In a country where parents are greater than God, there the eyes of parents never cry. This is the only wish of the heart. Wish for the new year.

कृषि प्रधान भारत देश में,
कोई भी भूखा न सोए।
केवल चाह है दिल की इतनी सी॥

गंगा, जमुना के इस देश में,
कोई भी प्यासा न होए।
केवल चाह है दिल की इतनी सी॥

अतिथि देवों भव के इस देश में,
किसी का सम्मान न खोए।
केवल चाह है दिल की इतनी सी॥

प्रीत~अमन के इस प्यारे देश में,
कोई बीज बैर का न बोए।
केवल चाह है दिल की इतनी सी॥

प्रभु से बढ़कर मात~पिता जिस देश में,
वहां मां~बाप की आंखें न रोए।
केवल चाह है दिल की इतनी सी॥

अवतारों की पुण्य धरा जिस देश में,
वहां पाप कभी इसके पुण्य को न धोए।
केवल चाह है दिल की इतनी सी॥

“वसुधैव कुटुंबकम्” की रीत चले जिस देश में,
वहां रिश्तों का अपनापन न खोए।
केवल चाह है दिल की इतनी सी॥

नववर्ष की चाह केवल इतनी सी…..

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता भारत की महान सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों को दर्शाती है। इसमें कवयित्री की इच्छाओं को व्यक्त किया गया है, जो एक आदर्श समाज की कल्पना करती हैं। वह चाहती हैं कि भारत में कोई भूखा या प्यासा न रहे, हर किसी को सम्मान मिले, प्रेम और शांति बनी रहे, माता-पिता का सम्मान हो, और पाप पुण्य को नष्ट न करे। अंत में, कवयित्री “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना को बनाए रखने की कामना करती हैं, जिससे रिश्तों में अपनापन बना रहे।

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यह कविता (चाह नव वर्ष की।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी (राष्ट्रीय नवाचारी शिक्षिका व अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार) है। शिक्षा — डी•एड, बी•एड, एम•ए•। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

  • अनेक मंचों से राष्ट्रीय सम्मान।
  • इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज।
  • काव्य श्री सम्मान — 2023
  • “Most Inspiring Women Of The Earth“ – Award 2023
    {International Internship University and Swarn Bharat Parivar}
  • Teacher’s Icon Award — 2023
  • राष्ट्रीय शिक्षा शिल्पी सम्मान — 2021
  • सावित्रीबाई फुले ग्लोबल अचीवर्स अवार्ड — 2022
  • राष्ट्र गौरव सम्मान — 2022
  • गुरु चाणक्य सम्मान 2022 {International Best Global Educator Award 2022, Educator of the Year 2022}
  • राष्ट्रीय गौरव शिक्षक सम्मान 2022 से सम्मानित।
  • अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ लेखिका व सर्वश्रेष्ठ कवयित्री – By — KMSRAJ51.COM
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शिक्षक गौरव सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय स्त्री शक्ति सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शक्ति संचेतना अवार्ड — 2022
  • साउथ एशिया टीचर एक्सीलेंस अवार्ड — 2022
  • 50 सांझा काव्य-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित (राष्ट्रीय स्तर पर)।
  • 70 रचनाएँ व 11+ लेख और 1 लघु कथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित (KMSRAJ51.COM)। इनकी 6 कविताएं अब तक विश्व स्तर पर प्रथम और द्वितीय स्थान पा चुकी है, जिनके आधार पर इनको सर्वश्रेष्ठ कवयित्री व पर्यावरण प्रेमी का खिताब व वरिष्ठ लेखिका का खिताब की प्राप्ति हो चुकी है।
  • इनकी अनेक कविताएं व शिक्षाप्रद लेख विभिन्न प्रकार के पटल व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं।
  • 3 महीने में तीन पुस्तकें प्रकाशित हुए। जिसमें दो काव्य संग्रह “समर्पण भावों का” और “भाव मेरे सतरंगी” और एक लेख संग्रह “एक नजर इन पर भी” प्रकाशित हुए। एक शोध पत्र “आओं, लौट चले पुराने संस्कारों की ओर” प्रकाशित हुआ। इनके लेख और रचनाएं जन-मानस के पटल पर गहरी छाप छोड़ रहे हैं।

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व्यवस्था ही हुई अब लंगड़ी है।

Kmsraj51 की कलम से…..

Vyavastha Hi Huee Ab Langadi Hai | व्यवस्था ही हुई अब लंगड़ी है।

The poet says that the people to whom people complain about thieves, they themselves are also involved with them somewhere or the other, this is the reason why the faces of the criminals look cheerful.

चोरों की करते शिकायत जिनसे,
वे खुद भी चोरों से मिले हुए हैं।
माजरा समझ में आने लगा है कि,
चोरों के चेहरे क्यों खिले हुए हैं?

शिकायत जो करते हैं वे सच कहते हैं,
पर शिकायत सुनने वाले कहां सुनते हैं?
जिनकी की है शिकायत दुखियारे ने,
उनका झूठ भी सच जैसा ही सुनते हैं।

शिकायत करें तो करें पर कहां करें?
शिकायत सुनने वाला ही कोई नहीं।
यहां तो उल्टा चोर कोतवाल को डांटे,
कौन है ऐसा, जिसकी आत्मा सोई नहीं?

क्या सही है? सब जानते हैं सच सारा ,
देख कर भी सब अनदेखा सा करते हैं।
कानों सुन कर भी अनसुना सा करना,
सच्चे लोग तभी तो आत्महत्या से मरते हैं।

अंधा हुआ है हर आदमी आजकल क्या?
क्या बहरा हुआ हर छोटा – बड़ा कान है?
पैसा और पहुंच है जिनके पास माकूल तो,
उनके लिए न कोई कानून न ही विधान है।

न्याय दिलाना है तो जीते जी ही दिलाओ,
मरने के बाद की संवेदनाएं तो मंजूर नहीं।
गुनहगारों को बचाना बेकसूरों को फंसाना,
यह तो न्याय व्यवस्था का कोई दस्तूर नहीं।

प्राधिकरण के पांव में मोच है आई क्या,
या फिर व्यवस्था ही हुई अब लंगड़ी है?
वे सुनते क्यों नहीं सच्चे पक्के लोगों की,
मजबूरी है या फिर सोच ही इनकी संगड़ी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता समाज और न्याय व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और अनदेखी पर तीखा प्रहार करती है। कवि कहता है कि जिससे लोग चोरों की शिकायत करते हैं, वे स्वयं भी कहीं न कहीं उन्हीं से मिले होते हैं, यही कारण है कि अपराधियों के चेहरे खिले हुए नजर आते हैं। शिकायत करने वाले सच्चाई कहते हैं, लेकिन सुनने वाले उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते। जिन लोगों की शिकायत की जाती है, उनका झूठ भी सच मान लिया जाता है। इस व्यवस्था में पीड़ितों को न्याय मिलना कठिन हो गया है, क्योंकि यहां “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे” वाली स्थिति बनी हुई है। कवि यह भी दर्शाता है कि समाज में अन्याय देखकर भी लोग अनदेखा कर देते हैं और सुनकर भी अनसुना कर देते हैं। यही कारण है कि सच्चे और ईमानदार लोग हताश होकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हैं। आजकल हर व्यक्ति स्वार्थ में अंधा और बहरा हो गया है, जिससे पैसे और सत्ता वालों को कानून और नियमों की कोई परवाह नहीं। कवि समाज से अपील करता है कि न्याय जीवित अवस्था में ही दिया जाना चाहिए, मरने के बाद की संवेदनाएँ व्यर्थ हैं। अगर दोषियों को बचाया जाएगा और निर्दोषों को फंसाया जाएगा, तो यह न्याय व्यवस्था का अपमान है। अंत में, कवि सवाल उठाता है कि क्या प्राधिकरण (अधिकार प्राप्त संस्थाएँ) निष्क्रिय हो गई हैं या फिर न्याय व्यवस्था ही पंगु हो चुकी है। यह कविता एक कटु सत्य को उजागर करती है और न्याय प्रणाली की निष्क्रियता पर सवाल खड़े करती है।

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यह कविता (व्यवस्था ही हुई अब लंगड़ी है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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माँ बाप।

Kmsraj51 की कलम से…..

Maa Baap | माँ बाप।

In this poem, the poet has depicted the sacrifice, dedication of parents and their status in changing times. He says that many relationships are formed in life, but no one can take the place of parents. They are like God and shape our personality.

जीवन में हर रिश्ता बन है जाता।
माँ बाप कोई और नहीं बन पाता॥

माँ बाप होते हैं भगवान् का रूप।
उनसे ही बनता हमारा स्वरूप॥

माँ बाप के त्याग व समर्पण को भुलाया नहीं जाता।
कोई इन्हें ठुकराता तो कोई इन्हें गले है लगाता॥

माँ बाप आज सिसकियां है भरते।
अपने ही घर में खुलकर जी नहीं सकते॥

जब होते हैं बच्चे छोटे तो माँ बाप लगते बड़े प्यारे।
जब बच्चे हुए बड़े तो माँ बाप फिरते बेसहारे॥

पोता – पोती से प्यार भी खूब जताते।
पर खुलकर उनसे बात भी नहीं कर पाते॥

यूँ तो पोता पोती होते इन्हें बड़े प्यारे।
क्या करे अब बदल गई दुनियाँ और इसके नजारे॥

आज श्रवण कुमार बड़ी मुश्किल से है मिलता।
जिन माँ बाप को है मिलता उनका बुढ़ापा सुख में है बीतता॥

♦ विनोद वर्मा जी / (मझियाठ बलदवाड़ा) जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कवि ने इस कविता में माता-पिता के त्याग, समर्पण और बदलते समय में उनकी स्थिति को दर्शाया है। वह कहते हैं कि जीवन में कई रिश्ते बनते हैं, लेकिन माता-पिता का स्थान कोई और नहीं ले सकता। वे भगवान के समान होते हैं और हमारे व्यक्तित्व को आकार देते हैं। माता-पिता के बलिदान को भुलाया नहीं जा सकता, लेकिन समाज में कुछ लोग उन्हें ठुकरा देते हैं, तो कुछ उन्हें सम्मान और प्रेम देते हैं। आजकल माता-पिता अपने ही घर में सिसकते हैं और खुलकर जी नहीं पाते। जब बच्चे छोटे होते हैं, तब माता-पिता उन्हें बहुत प्रिय लगते हैं, लेकिन जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, माता-पिता उपेक्षित महसूस करने लगते हैं। वे अपने पोते-पोतियों से प्रेम तो करते हैं, लेकिन उनसे खुलकर बात नहीं कर पाते, क्योंकि समय के साथ समाज और परिस्थितियाँ बदल गई हैं। आज के समय में श्रवण कुमार जैसे आदर्श पुत्र बहुत कम मिलते हैं। जिन माता-पिता को अच्छे और संस्कारी बच्चे मिलते हैं, उनका बुढ़ापा सुखमय बीतता है। इस प्रकार, कविता माता-पिता के महत्व को समझने और उनका सम्मान करने की प्रेरणा देती है।

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यह कविता (माँ बाप।) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विनोद कुमार है, रचनाकार के रुप में विनोद वर्मा। माता का नाम श्री मती सत्या देवी और पिता का नाम श्री माघु राम है। पत्नी श्री मती प्रवीना कुमारी, बेटे सुशांत वर्मा, आयुष वर्मा। शिक्षा – बी. एस. सी., बी.एड., एम.काम., व्यवसाय – प्राध्यापक वाणिज्य, लेखन भाषाएँ – हिंदी, पहाड़ी तथा अंग्रेजी। लिखित रचनाएँ – कविता 20, लेख 08, पदभार – सहायक सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल प्रवक्ता संघ मंडी हिमाचल प्रदेश।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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सास बहू।

Kmsraj51 की कलम से…..

Saas Bahu | सास बहू।

Earlier mothers-in-law forced their daughters-in-law to wear veils and follow traditions, but now times have changed. Today's mother-in-law treats her daughter-in-law like a daughter, and both share each other's joys and sorrows like friends.

सास बहू का रिश्ता है बड़ा पुराना,
इसकी चर्चा करता है सारा जमाना।
नई नवेली बहू जब घर में है आती,
सास रिश्तेदारों से मुलाकात है करवाती।

बहू आने की खुशी भी खूब है जताती,
आपस में हंंसी खुशी से समय बिताती।
समय की गति सदा एक जैसी नहीं रह पाती,
कभी – कभी आपस में तकरार भी हो जाती।

सास बहू को दहेज न लाने के ताने भी लगाती,
बहू माँ बाप की लाज बचाने में चुपचाप सह जाती।
वक्त बदलने में देर नहीं लगती,
अब बहू बिन दहेज खूब है जचती।

जब मैं थी बहू ये कहानी सास सुनाती,
सास के सामने हमेशा घूंघट में ही नजर आती।
अब सास, वो सास कहाँ रही,
जिनकी बहूओं ने लाख परेशानियां है सही।

आज बहू सास को माता है कहती,
सास भी बहू को बेटी की तरह है सहलाती।
सहेलियों की तरह आपस में है रहती,
अपने सुख दुःख एक दूसरे से हैं कहती।

♦ विनोद वर्मा जी / (मझियाठ बलदवाड़ा) जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता सास और बहू के रिश्ते के बदलाव को दर्शाती है। पहले सास-बहू का रिश्ता औपचारिकता और कई बार तकरार से भरा होता था, लेकिन समय के साथ इसमें सकारात्मक परिवर्तन आया है। शुरुआत में, जब नई बहू घर में आती है, तो सास उसे अपनाने का दिखावा करती है और रिश्तेदारों से परिचय करवाती है। हालांकि, समय के साथ कुछ मतभेद भी उभर आते हैं, जैसे दहेज को लेकर कटाक्ष। बहू इन तानों को सहती है, लेकिन धीरे-धीरे समाज में बदलाव आता है, और बिना दहेज वाली बहुएँ भी घर में स्वीकार की जाने लगती हैं। पहले की सासें अपनी बहुओं को घूंघट में रहने और परंपराओं का पालन करने के लिए मजबूर करती थीं, लेकिन अब समय बदल चुका है। आज की सास अपनी बहू को बेटी की तरह मानती है, और दोनों सहेलियों की तरह एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी होती हैं। कविता इस रिश्ते में आई सकारात्मकता को दर्शाती है, जहाँ अब सास-बहू का संबंध प्रेम और आपसी समझदारी पर आधारित हो गया है।

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यह कविता (सास बहू।) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विनोद कुमार है, रचनाकार के रुप में विनोद वर्मा। माता का नाम श्री मती सत्या देवी और पिता का नाम श्री माघु राम है। पत्नी श्री मती प्रवीना कुमारी, बेटे सुशांत वर्मा, आयुष वर्मा। शिक्षा – बी. एस. सी., बी.एड., एम.काम., व्यवसाय – प्राध्यापक वाणिज्य, लेखन भाषाएँ – हिंदी, पहाड़ी तथा अंग्रेजी। लिखित रचनाएँ – कविता 20, लेख 08, पदभार – सहायक सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल प्रवक्ता संघ मंडी हिमाचल प्रदेश।

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अखंड।

Kmsraj51 की कलम से…..

Akhand | अखंड।

In this poem, a prayer has been made for the continuity of knowledge, meditation and spiritual consciousness by making the lamp a symbol.

हे दीप मुझे तुम निरंतरता दो
खंड-अखंड का वरदान हो
चक्षु मेरे निहारे अनायास ही
अंतस् की ही तुम पहचान हो॥

पात्र में संगृहित कर आशाओं को
वर्तिका की वर्णिका में आग हो
दीपशिखा की दीपिका में
प्रचंड प्रबल प्रत्युष भाग हो॥

साधक की साधना की अविरति में
स्थिर-चित्त की अनुराग हो
अजना में जलती धधक की तुम
अनहद अनमिट त्रिषा-तश्नग हो॥

पुनरावृत्ति मंत्रों की मालाओं में
करों की मध्यमा अनाहत की रुचा हो
विश्व-बंधत्व की पिपासाओं में
हे जोत तुम मेरी निष्ठा की ऋचा हो॥

पीतशिखे पीताम्बरे रक्त-वाहिनी में
विधु स्तुति बन रची-बसी हो
ब्रह्मास्त्र हो पिंड-गात में योगिनी बन
उर उक्थ में जीवन-शक्ति की त्रिषा हो॥

मैं प्यासा भटक रहा निवड़ तन लिये
बियावान बन में सुर-समरथ बन आओ
कण-कण में मेरे हे बगलामुखी माते
ऋद्धि-सिद्धि स्तुति की श्रीफली हो॥

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता में दीपक को प्रतीक बनाकर ज्ञान, साधना, और आध्यात्मिक चेतना की निरंतरता की प्रार्थना की गई है। कवि दीपक से खंड-अखंड (संपूर्णता और अनंतता) का वरदान मांगते हैं, जिससे उनका अंतर्मन प्रकाशित हो सके। दीपक की लौ को आशाओं और ऊर्जा का स्रोत माना गया है, जो साधना, ध्यान, और आत्मज्ञान में सहायक होती है। यह लौ सिर्फ बाहरी रोशनी नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति और आध्यात्मिकता का प्रतीक भी है। कवि इसे विश्व-बंधुत्व, निष्ठा और शक्ति का प्रतीक मानते हुए इसे जीवन की प्यास बुझाने वाली ज्योति के रूप में देखते हैं। वे इसे ब्रह्मास्त्र, योगिनी और जीवन-शक्ति का रूप मानते हैं, जो व्यक्ति को दिशा और संबल प्रदान करता है। अंत में, कवि स्वयं को एक प्यासे यात्री के रूप में चित्रित करते हैं, जो ज्ञान और आध्यात्मिकता की तलाश में है। वे माँ बगलामुखी से प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें शक्ति और सिद्धि का आशीर्वाद दें, जिससे उनका जीवन सार्थक और आलोकित हो सके।

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यह कविता (अखंड।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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अगर साथ होते तुम हमारे।

Kmsraj51 की कलम से…..

Agar Sath Hote Tum Hamare | अगर साथ होते तुम हमारे।

The gentle feelings of love have been linked to the beauty of nature—moonlight, rays of dawn, Malayan wind, and rainbow colors, which further enhance the sweetness of love.

सुखी सुंदर होता जीवन
इक दूसरे के आलिंगन
रहते भुलाये दु:ख अपने
कितना सुंदर होता अपना जीवन।

रहते इक – दूसरे की आँखों में
उर मिलने को पल-पल मचलता
इक-दूसरे में खो जाते श्वांस हमारे
हँसते चेहरे की हमारी चंचलता।

भोर की धूमिल आहट पर
स्वर अकुलाते अधरों पर
चढ़ती किरणों की आभा में
अलसाये पड़े रहते बिस्तर पर।

प्रीति रजनी जगाने लगती
सुर्ख छुअन होती तन-मन में
मचलती बाँहे भरने को
कितना सुंदर होता अपना जीवन।

बल खाती आतुरताऐं
उनींदी-उनींदी-सी चाहों में
बिखेरती रंग इंद्रधनुषी-सा
अधरों से फूटी आहों में।

धवल चाँदनी और अमावस
मुग्धित मदहोश होती जाती
भरी उल्लासित स्वप्नलोक-सी
स्वप्निल प्राणों में फिर खो जाती।

पल भर में खो जाता यौवन
खोया-खोया रहता ये जीवन
उन्मादित हो तपता कानन
कितना सुंदर होता अपना जीवन।

कभी तुम रूठते हम मनाते
जगा-जगाकर तुम्हें सताते
अधरों की मादकता को तेरे
ले अधरों पर हम पी जाते।

प्रीति जागती हम तुम्हें जगाते
मीठी नींद हमें फिर मिल जाती
निढाल-सी बाहुपाशों में
थकी – थकी फिर तुम सो जाती।

दृगंचलों में खिल-खिल जाते मधुवन
होता कितना अपना सुंदर जीवन
पल भर को भी न रह पाते छिन
कितना सुंदर होता अपना जीवन।

बेसुध होती अभिलाषायें
शयनित होती बेलायें बाँहों में
परिमिलित किरणें हँसती
आमोदित तृप्त भावना जीवन में।

शीतल-शीतल मलय पवन के झोंके
तन-मन को और पिपासित कर जाते
लिपटी वल्लरी तरुवर आलिंगन में
तृष्णा दोनों में भर-भर जाते।

पल-पल पिघलता यौवन
होता कितना सुंदर जीवन
क्षुधा समाती अन्तर्मन
कितना सुंदर होता अपना जीवन।

छलके तनुसर लिलार हमारे
भिगोती पोंछ अपना आँचर
रची बसी हथेलियों आँगुर से
छूकर मदहोश करती साँचर।

जलते जीवन की पिपासाओं को
आमंत्रित करती मेरी क्षुधाओं को
तृषित उर को तृप्त करती सावन
होता अगर साथ हमारा ये जीवन।

बड़े लंबे हो जाते ये दिन
घड़ी-घड़ी छोटी होती रातें
अधीर हो लुक-छिपकर
इक दो पल में ही खो जाते दिन।

विकलता उन्मादित होती
पा निशा-निमंत्रण का दीवानापन
आतुरता अभिलाषा बनती
क्षण-प्रतिक्षण हो जाते विकल अंतर्मन।

मोहित करती पावन पवित्र तन
रूप सलोना मन के आँगन
मनभावन जीवन आशा मुग्धित
कितना सुंदर होता अपना जीवन।

तुम मेरी संबल बन जाती
मैं तुम्हारा होता विश्वास
गहन निराशा के धोमिल पल भी
न होते हमारे नजरों के पास।

अभिषंङ्गित शिथिल उमंगों में
फिर; नई ऊर्जा भर देती
अभिनव कोमल अनंद जगाकर
कठोर संकल्प जागृत कर देती।

हँस-हँसकर देती उलाहन पल-पल
ये ज़िन्दगी हर पल हर-क्षण
मुस्कुरा – मुस्कुरा देता अपनापन
कितना सुंदर होता अपना जीवन।

रति-कामदेव की क्रीड़ाओं में
डूबे रहते हम दोनों आगातें
दे देती हमको आजादी गठबंधन
भावी जीवन की सौगातें।

इंद्रधनुषी नवल विहानों के
बैठ तुम नव-नव सपन बुनती
आने वाली पदचापों से
आकुल उत्कंठा चुनती।

दिन बीत रहे उन्मन – उन्मन
प्यासा-प्यासा सा अपना मन
जगी कामना का निर्झर वन
कितना सुंदर होता अपना जीवन।

ज्योत्स्ना-सी तुम जलाती पावन
अस्त अदित घर आँगन में
गोपुर बैठ प्रतीक्षा करती
आस लगाये अरुण नयन में।

ढूँढ़ती नजर व्याकुल हो
हर आने वाले पथ निहारती
रजकण भरे मेरे पैंरों को
तुम धुलती और पखारती।

अँखियों में भर समर्पण
चाहत की बाती भर -भर
फिर खिलते पलकों पर मधुवन
कितना सुंदर होता अपना जीवन।

मस्त मनोहर आलंभन
मुग्धित होती थकन हमारी
चरणों को धोकर हर्षित होती
कल्याणमयी प्रीति हमारी।

फिर बना लाती तुम मेरे लिये
उपली की सोंधी-सोंधी लिटियाँ
जीवन की हर इक गुत्थी
सुलझने लगती बताकर तिथियाँ।

महकने लगते पल – पल क्षण
गुदगुदा जाते मन अंतर्मन
घर चौखट बनती गोकुल वृंदावन
कितना सुंदर होता अपना जीवन।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता प्रेम और जीवन के सौंदर्य का चित्रण करती है। इसमें प्रेमी-प्रेमिका के बीच गहरे लगाव, आत्मीयता और मधुर संबंधों का वर्णन किया गया है। प्रेम में खोए हुए दो लोगों का जीवन सुखद और सुंदर प्रतीत होता है, जहाँ वे एक-दूसरे के आलिंगन में अपने दुःख भूल जाते हैं। प्रेम की कोमल भावनाओं को प्रकृति के सौंदर्य से जोड़ा गया है—चाँदनी, भोर की किरणें, मलय पवन, और इंद्रधनुषी रंग, जो प्रेम की मधुरता को और बढ़ाते हैं। उनके हँसते-मुस्कुराते पल, रूठने-मनाने की अदाएँ और साथ बिताए गए अंतरंग क्षण, जीवन को आनंदमय बना देते हैं। कविता में प्रेम की पवित्रता, समर्पण और विश्वास को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। प्रेम न केवल सुखद एहसास देता है, बल्कि जीवन की कठिनाइयों से उबरने का संबल भी प्रदान करता है। यह एक आदर्श प्रेमपूर्ण जीवन की कल्पना को दर्शाती है, जिसमें प्रेम, अपनापन, आत्मीयता, और उत्साह की अनवरत धारा प्रवाहित होती रहती है। अंत में, कवि यही कहता है कि यदि प्रेम और साथ बना रहे, तो जीवन वास्तव में बहुत सुंदर हो सकता है।

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यह कविता (अगर साथ होते तुम हमारे।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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हिमाचल की राजधानी “शिमला”।

Kmsraj51 की कलम से…..

Himachal Ki Rajdhani Shimla | हिमाचल की राजधानी “शिमला“।

There is a dense shade of green deodar trees here. There are towns all around and many villages located far away. The capital of Himachal is "Shimla".

कोठियों पर कोठियां, बनकर हुई यहां सवार है।
हिमाचल की राजधानी, शिमला का यह बाजार है।

पहाड़ी की टेकरी पर बसा, हुआ यह निर्माण है।
इन्हीं में प्रबन्धित शहर की, आबादी तमाम है।

देवदार के हरे पेड़ों की, बड़ी घनी यहां छांव है।
चारों ओर को कस्बे हैं, दूर दूर बसे कई गांव हैं।

कह रहा है यह पहाड़ अब, कमजोर मेरे पांव है।
रोक दो निर्माण अब मुझ पर, नहीं तो व्यवधान है।

पर शहरीकरण की होड़ में, सुनता इसकी कौन है?
लोग किए जा रहे हैं निर्माण, बेचारा रहता मौन है।

बरसात में चेताता है कभी, “भाई दरकते पहाड़ है।”
अभी भी वक्त है “समझो”, वरना, आगे बड़ा बिगाड़ है।

विकास की अंधेरी दौड़ें में, शहरों की होड़ में इंसान है।
उसे कोई लाख समझाए, भले मकान पर बना मकान है।

कुदरत की पीड़ा न समझेगा, फिर तो उठाना तूफान है।
इंसान को भी समझना चाहिए, कि वह नहीं भगवान है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता प्राकृतिक सुंदरता और अंधाधुंध शहरीकरण के बीच के संघर्ष को दर्शाती है। इसमें शिमला शहर के विस्तार और निर्माण कार्यों के कारण प्राकृतिक संतुलन के बिगड़ने की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है। कवि बताते हैं कि शिमला की पहाड़ियों पर लगातार कोठियों और इमारतों का निर्माण हो रहा है, जिससे यह क्षेत्र भौतिक रूप से तो विकसित हो रहा है, लेकिन इसका प्राकृतिक सौंदर्य और संतुलन प्रभावित हो रहा है। देवदार के घने पेड़, कस्बे और दूर-दराज के गांव इस क्षेत्र की सुंदरता बढ़ाते हैं, लेकिन पहाड़ अब खुद को कमजोर महसूस करने लगे हैं। वे संकेत दे रहे हैं कि अगर यह निर्माण कार्य नहीं रुका, तो भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ जाएगा। बारिश के मौसम में पहाड़ दरकने लगते हैं, यह चेतावनी देता है कि यदि समय रहते समझदारी नहीं दिखाई गई, तो भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। कवि यह संदेश देते हैं कि विकास की अंधी दौड़ में लोग प्रकृति की चेतावनियों को अनदेखा कर रहे हैं। अगर इंसान ने कुदरत की शक्ति को नहीं समझा, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। इंसान भगवान नहीं है, इसलिए उसे प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर चलना चाहिए।

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यह कविता (हिमाचल की राजधानी “शिमला”।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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