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सतीश शेखर श्रीवास्तव - परिमल

मृत्युलोक के नाते।

Kmsraj51 की कलम से…..

Mrityulok Ke Naate | मृत्युलोक के नाते।

सदा प्यार अनुराग लुटाने वाले,
आज हमसे क्यों रूठे हैं।
यह दौर हमसे कहता है,
मृत्युलोक के सारे नाते झूठे हैं।

नेत्र की गहराई में झांका तो,
दृष्टिगत हुआ पानी गहरा।
उतार – चढ़ाव से जीवन चलता,
बतलाता हर इक की गाथा हहरा।
वेदना छुपी है मुस्कानों में,
सबके सपने टूटे हैं,
मृत्युलोक के सारे नाते झूठे हैं।

कदमों-कदमों पर खिंचीं रेखायें,
अश्रु – अश्रु पर बंधन है।
बेजुबान बेबसी के होंठों पर,
विहँसता रहता क्रंदन है।
हास्य-व्यंग्य आस मुक्त मधुर क्षण,
जाने किसने लूटे हैं,
मृत्युलोक के सारे नाते झूठे हैं।

मंजुल मनोरम गीत भ्रमर ने गाये,
मुकुलों ने अपने पराग लुटाये हैं।
देकर इक-दूसरे के प्राणों को,
भावात्मक तृप्ति दे संतुष्ट बनाये हैं।
वो सुधा बरसाने वाले,
ये रिश्ते-नाते अनूठे हैं,
मृत्युलोक के सारे नाते झूठे हैं।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (मृत्युलोक के नाते।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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थाती की बाती।

Kmsraj51 की कलम से…..

Thati Ki Bathi | थाती की बाती।

दु:ख लहरों में चिघाड़ती है,
नित इक नई विपदा सहती है।
चिंताओं में रहती हमेशा है,
ऐसे ही कथा कहती अपने उर की।

सदा छटपटा कर रोती है,
आँसुओं से आँचल धोती है।
सुख की नींद वह कहाँ होती है,
विकल उद्विग्न वह होती है।

दु:ख-दर्द संकट है,
रंज है आँखों में आकर ठहरा है।
हर इक श्वांसों पर मातम है,
क्षोभ अगाध का गहरा है।

दिवा-रात्रि मचलती रहती है,
करवंट वह बदलती रहती है।
रह-रहकर संभलती रहती है,
न जाने किस अग्नि में जलती है।

विश्व ने इसे क्या समझा है,
बस चंद लोगों का खेल समझा है।
जो समझा है अच्छा समझा है,
इस संस्कृति को कचरा समझा है।

जग जलेगा जब आहों में,
बदला लेगी उन नमकहरामों से।
गुजरेगी जब बर्बादी के राहों से,
कर लेना तब ताजपोशी गुनाहों से।

विश्व को हिला देगी उठकर,
विश्व को दिखा देगी जमकर।
विश्व को जता देगी,
विश्व को बता देगी।

बस इक सहारा हम ही हैं,
समस्त सृष्टि की सनातन हम ही हैं।
सनातन का डंका बजेगा,
सुर-धुन पर ही चलेगा।

हम वो पुरातन है समझायेगी,
कण-कण में सनातन बसायेगी।
जग और जग वालों के होंठों पर,
बस इक नाम ये ही आयेगी।

संस्कृति और संस्कारों की भूमि है,
पावन जिसका हर कण-कण है।
हृदय अंत: में इसको बस जाने दो,
हम भी इसके अंश पुराने हैं।

वक्त बावक्त हम कहां गिरे,
अब लौट चलें अपने साये में।
पहचान हमारी भारत भूमि है,
बसे जिसमें राम – कृष्ण है।

देवी दुर्गा के प्रचंडों में,
पूजी जाती जहाँ अबला नारी।
जह सर्वस्त्र के हम भटके पाही हैं,
कंठ-कंठ में बसी वेद वाणी है।

चलो रज चूम ले उस थाती का,
अंग गात मचल रहा।
उसकी छत्रछाया में जाने को,
भूमंडल का बस इक वही सहारा।

भारत भूमि ही है हमको प्यारा,
चलो समा जायें उस पावन में।
पवित्र कर लें अपने जीवन को,
पुण्य जहां बसता है।
पाप त्याग हमें वहीं जाना है,
सनातन ही पुरातन है।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (थाती की बाती।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बदरा को आमंत्रण।

Kmsraj51 की कलम से…..

Invitation To Clouds | बदरा को आमंत्रण।

दे दी हमने झुके विकल नैनों से,
आमंत्रण घनेरे जल भरे बदरा को।
बढ़े कदमों को रोकने लगे,
धूमिल अर्दित विगत जीवन दर्पण में।

साँझवाती से अँगना में,
सुहागन बनी रात घनेरी।
प्राण – प्रिये को सम्मुख पाकर,
छलक पड़ी निर्मोही आँखों में।

नम पलकों पर आकर बिखर गई,
न जाने कितनी झूठी कसमें।
सिमट गई शर्वरी के पहरों से,
मीलों लम्बी दूरी जुग सहमों में।

पल भर को भूल गईं साँसें भी,
पैरों में बँधी इस मजबूरी को।
बहका जीवन लगा सिसकने,
सहसा आकर गुम यादों में।

मौन समर्पण की ज्वाला में,
द्रवित हुई कामनाशक्ति हमारे।
उद्बोधित उर के भाव बावरे,
पी लूँ पहले अपने अश्रु हमारे।

भुलाने को आये हैं ये सारे,
धर नये रूप चितवन के उसने।
आते – जाते हर इक मोड़ पर,
निज चित्त विश्वास को खोए हमने।

राहों पे लगते हैं इसलिए,
अपने भी साये पराये से।
और जलता है मेरा तन-मन,
पाकर आमंत्रण नयनों से।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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बरखा बहार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Barkha Bahar | बरखा बहार।

बीत रहे पलछिन के तौर तरीके,
आने वाले आज की पहली फुलबहारें।
घटा छटा घिर-घिर आ रही,
मन की चंचलता को प्रतिपल बढ़ा रही है।
पुरवा पवन की दुहाई है,
पछवा बयार की अब विदाई है।

अंब पावस का गली-गली डंका बज रहा,
शम्पाओं का शोर है सुदामन का जोर है।
पयोजन्मा की वाहिनी आगे-आगे है,
श्वेत – श्याम और काले-काले हैं।
रिझते हैं कहीं-कहीं और कहीं निराले हैं,
कहीं क्षत्रप की तरह छा जाते।

एक टुकड़ी आती गरज-बरस कर जाती,
दूसरी वाहिनी बना छावनी गोले अंब का बरसाती।
आते जाते फिर घूम कर चले आते,
सिंगार सजा चंचला दामिनी का।
निहार-निहार विहार कर देखते सूने आँगन का,
चलती जैसे पवन की परछाँईं।

अक्षित करते पुष्कर ताल तलैईया के,
मेघराज गरज – गरज कर धरणि का।
पल-पल अपने आभा का रूप दिखला कर
बदली में फिर कहीं छुप जाते।
हँसकर मुँह चिढ़ाते तपन की,
इठलाते हर्षाते दूर क्षितिज पर।

कभी कुम्हलाते कभी खिल-खिल जाते,
ये बरखा के बादल पल भर में,
उमस गर्मी को दूर भगाते।
नवयौवना से मचल कर चलते,
अँगड़ाई ले-लेकर मन की अगन बढ़ाते।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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मेरी गुंजन की आवाज हो तुम।

Kmsraj51 की कलम से…..

Meri Gunjan Ki Awaaz Ho Tum | मेरी गुंजन की आवाज हो तुम।

मेरी उन्मत्त प्रीति अकिंचन,
पा लेती है तो पाने को।
मधुर प्रणय की जगी चाह को,
बहला लेती है गुंजन-रागों से।
परन्तु हिय को तृप्त करे जो,
वह अश्रु भरी गागर हो तुम,
श्वांसों की सरगम पुरातन हो तुम।

मेरी प्रीति के संदेशों को,
शांत स्वरों को देती वाणी।
यदि होता संभव तो तुम,
मनोभावों को समझती मेरी।
तेरी अँखियों की नादानी ने,
दे गई पिपासित तप्त मरुभूमि।
हृदय कमल में वासित निर्मल,
नदिया की भावित लहर थी तुम।

सोच-सोच कर थकी कामना,
वेदनाऐं पिपासित हैं।
किस तरह जी की पीड़ा दिखलाऊँ,
दर्पण मेरा टूटा है।
खंडित कर दूँ झिझकों को,
निश्शब्दों में भर दूँ मन की ज्वाला,
मेरे अलकों की परिभाषा हो तुम।

अंचल हो आगर हो निर्झर की बूंदों में,
निर्मल-निर्मल कोमल कविता हो।
दूर गई बिछड़ी मन की डाली से,
दे गई अश्रु की हिचकी मुझको।

कंठों में डाली कंपित माला,
तप्त होती माधुर्य रोम-रोम में।
व्याकुल विवश व्यथा दे डाली,
आकुल हो खोजे कस्तूरी वन-वन,
मेरी आशा की मृगनयनी हो तुम।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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आहट।

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Aahat | आहट।

हल्की सी आहट कदमों की,
पाकर बदन थिरकने लगते।
उद्विग्न प्रत्याशा जगे नयनों में,
तन पारिजात महकने लगते।

अनिमेष ही नैनों से नैना मिलते,
चक्षु अरुणित से होने लगते।
मधुर मिलन की मादक चाहत,
प्रणय – स्वप्न में खोने लगते।

उत्कंठित अँखियों की आसक्त सी छुवन,
मृदुल-मृदुल अंग-गात दहकने लगते।
आश्वासों में मकरन्द धीरे से घुल कर,
मुखड़े पर लालिमा खिलने लगते।

प्रभात का पद्मराग गालों पर खिलता,
लालिमा बिखराती आभा मंद – मंद।
लाल मणि रुख़ पर किरण बिखराती,
रक्तिम छटा छलकती छंद – छंद।

हृदय – हृदय में सरगम बजती,
तृष्णा बंधती आलिंगन में।
श्वांसों की थापों में खो जाती,
तनु खो जाता दहकते बदन में।

हठ करती हृदय की धड़कन,
इन्द्रियजय तोड़ बहकने लगते।
तमस तरंगों के आँचल में,
सुलगते तन पिघलने लगते।

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छुअन।

Kmsraj51 की कलम से…..

Touch | छुअन।

पिघलती नज़रों की तपन,
वो कोमल कोमलांगी की छुअन,
बिन परस बेचैन है मन।

आहन के पंख हुये धूमिल,
निशा ने चादर तामस फैलायी।
रजनी लगी करवट बदलने,
तड़पते हृदय में है जलन।

ढूँढते हैं उन्हें प्यासे नयन,
पूँछते रहते हैं पता बहारे चमन।
बहके हिंडोलों के सताये,
रगों में है मीठी-मीठी दुखन।

वह बिछड़ते पहर याद आये,
विवश अनबोले अकुलाते से।
आँखें अलसाई-अलसाई सी,
बाजुओं में मेरी है सूना गगन।

दिये लौ की लगी थरथराने,
निंद्रा में हैं नयन आसमां ताके।
बुझ रहे जगमगाते तारे,
आसक्त है मस्ती में भुवन,
वो कोमल कोमलांगी की छुअन।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता Tagged With: kavi satish shekhar srivastava parimal poems, Poems by Satish Shekhar Srivastava Parimal, Satish Shekhar Srivastava 'Parimal', Touch, खूबसूरत कविताएं, छुअन - सतीश शेखर श्रीवास्तव परिमल, छुअन पर कविता, प्रेम मिलन कविता, प्रेयसी पर कविता, मिलन, रूप पर कविता, रोमांटिक प्रेम कविता, लड़कियों पर कविता, सच्चे प्यार पर कविता, सतीश शेखर श्रीवास्तव - परिमल, संपर्क, संयोग, संश्रय, संसर्ग, स्त्री सौंदर्य पर कविता, स्पर्श, स्पर्श पर कविता

शांत समर्पण।

Kmsraj51 की कलम से…..

Quiet Surrender | शांत समर्पण।

रही अधूरी चाह मेरी भटके जो ले तन,
सुधा अम्रत की चाहे उर ले पलझिन।
कभी छुआ था अधरों को मन,
जलते होंठों पर मेरा ज्वलंत चुंबन।
रही चाह अधूरी भूल न पाई अब तक,
बाहुवलय के उन्मुक्त मृदुल आलिंगन।

तेरे – मेरे बदन की,
घुली होगी गंध मौसम में।
मेरे गीत ग़ज़ल चहकते होंगे,
पायल की छम-छम रुनझुन में।
बिखरे-बिखरे से नयन होंगें,
होंगी कजरारी अँखियों में सूनापन।

महकती होगी प्रीति हमारी,
हर इक उन्मादक छुअन में।
जलते सुलगते शब्द श्वांसों के,
छटपटा रहे होंगे बंधन में।
घनघोर सावन बरसे होंगे,
तड़पा होगा रह – रह के मन।

अस्तमनबेला दीप जलाते होंगे,
करते होंगे कंपन हाथ तुम्हारे।
भारी – भारी नत पलकों से,
छलके होंगें नयन नीर हमारे।
घुटता होगा दम पीकर आँसुओं को,
बेबस व्याकुल हो शांत समर्पण।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (शांत समर्पण।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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व्यवहार नैनों का।

Kmsraj51 की कलम से…..

Behavior Of Eyes | व्यवहार नैनों का।

चंचल चितवन का निमंत्रण,
क्यूँ तुमने स्वीकार किया।
भुजपाशों में सौंपकर,
क्यूँ तुमने इतने अधिकार दिये।

भरा – पुरा संसार दान कर दूँ,
अगर साथ तुम्हारा मिल जाए।
स्वीकार करो मुझको आने दो,
सभी ताने सहुँगी गर मिल जाए।
इस राह साथ नहीं आना था,
क्यूँ तुमने मुझसे वचन लिये।

अर्पण कर चुकी तन-मन अपना,
चाहो तो प्राणों को भी ले लेना।
जन्म – जन्मांतर तक बनूँ तुम्हारी,
बस इतना अधिकार मुझे दे देना।
अधीर पिपासा को बहलाने को,
क्यूँ मैनें श्रृंगार किये।

तुम मेरे दिल की धड़कन हो,
और मैं तुम्हारी चौंध नयन की।
हृदय स्थल पर डाली थी तुमने,
मुक्तामणि अँखियों से पावन की।
धवल चंद्रिका के आँचर में,
रम्य – मनोहर विनय लिये।

है तो चोट हृदय के पर वो दुखते,
सुधि – दाह से अश्रु मैं पी लूँगा।
सृजन करूँगा रचना अपनी,
भव में तुम्हें मैं अमर कर दूँगा।
स्वयं ही सारे वचन निभाऊँगा,
जिसे हम बारंबार लिये।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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रिमझिम बरसता सावन।

Kmsraj51 की कलम से…..

Rainy Sawan | रिमझिम बरसता सावन।

घिर – घिर आये काले – काले बदरा,
नयनों में उमड़ – घुमड़ रह-रह बरसाते होगें।

चली गई अँगना किसी की,
मस्ती भर-भरकर इठलाती।
सूने मेरे आँगन में आकर,
लाकर सुधि नीर बरसाती।

जगी उनींदी पलकों पर,
रह-रहकर बदली जाती होगी।
चातकनंदन की बौछारों में,
हम विलग प्रेमी फिर रोयेगें।

झिलमिल – झिलमिल जले जुगनूँ,
मन की दहक फिर भड़कायेगें।
यादों की शम्पाओं से कर गर्जन-तर्जन,
रह – रहकर हृदय को डरायेगें।

निभृत सन्नाटों में आ – आकर,
विकलता उर के बढ़ायेंगे।
बिछुड़न की बेदी पर लाकर,
उर दाह घाव – शूल से धोयेगें।

कालिमा निशिता से पूँछ रही,
मेघ क्यूँ उमड़े कजरारे नयनों में।
किसने कब लूट लिये सपने,
भर दिये अँगारे प्राणों में।

भीष्म प्रश्न सुलगते कानों में,
हृदय व्यथित पड़ा किनारों में।
प्राणों में भर दी बिछुड़न,
दाग हृदय के अब शूल चुभोयेगें।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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