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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

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You are here: Home / Archives for हेमराज ठाकुर जी की कविताएं

हेमराज ठाकुर जी की कविताएं

हां मैं शिक्षक हूं।

Kmsraj51 की कलम से…..

Haan Main Shikshak Hoon | हां मैं शिक्षक हूं।

A teacher is a guiding force who inspires curiosity, ignites minds, and shapes the future of their students by facilitating learning and discovery.

बुझ चुके चिरागों को फिर से,
जलाने की मुझमें ही तो क्षमता है।
मैं एक शिक्षक हूं, मुझमें पिता का प्यार,
और ममत्व भरी मां की ममता है।

इन्हें कहने दो मुझे जो कहना है,
शिक्षा का सूरज मुझसे ही चमका है।
वह झुग्गियों का चिराग भी आज,
मेरी निरन्तर सिखों से ही तो दमका है।

मैने ही तो पढ़ाया है दुनियां में,
प्यून से पी एम तक के लोगों को।
वे सब भोगते हैं अपनी क्षमतानुसार,
इस संसार के सभी भौतिक भोगों को।

मुझे मेरे ही पढ़ाए लोग ही न जाने,
कब – कब क्या – क्या कह देते हैं?
कुछ लोग तो मुझसे ही सीख कर,
मुझको ही वापिस सीख देते हैं।

मैने कक्षा, कक्ष में ही तो किया है,
संसार के सारे के सारे निर्माणों को।
विश्वाश नहीं होता है अगर किसी को,
तो पढ़ लो ऐतिहासिक के प्रमाणों को।

तकलीफ नही होती है मुझे तब भी,
जब मुझे कोई चेला ही टोकता है।
मैं इस तरह तर्क पैदा करता हूं चेले में,
जिसे आगे बढ़ने से जमाना रोकता है।

चेला मुझसे शिकायत करता है,
मैं ही तो उसको अच्छे से सुनता हूं।
मेरे ही मार्गदर्शन से ही वह आगे चल कर,
अपने भविष्य का जीवन पथ चुनता है।

मैं उसे कभी स्वाभाविक डांटता हूं,
शायद वह मुझसे तब कुछ रूठता है।
पर यह मेरे व्यक्तित्व की कला है शायद,
कि वह दूसरे दिन फिर से मुझे ही पूछता है।

हां मैं शिक्षक था, हूं और रहूंगा,
मुझे खुद के होने पर गर्व होता है।
जब चेला सफल होता है जीवन पथ पर,
तब मेरे लिए वह एक विशेष पर्व होता है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता में शिक्षक की महिमा और उसकी भूमिका को दर्शाया गया है। एक शिक्षक वह है जो बुझ चुके चिरागों को फिर से जलाने की क्षमता रखता है और अपने छात्रों को सही मार्ग दिखाकर उन्हें जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। शिक्षक के अंदर पिता का स्नेह और मां की ममता का संगम होता है। शिक्षक समाज के हर तबके, चाहे वह झुग्गियों का बच्चा हो या कोई उच्च पद पर आसीन व्यक्ति, को ज्ञान प्रदान करता है। उसका योगदान इतना महान है कि उसने दुनियाभर के बड़े निर्माण और सफल व्यक्तित्वों को गढ़ा है।शिक्षक अपने छात्रों को स्वाभाविक रूप से डांटता भी है और उनके सवालों का समाधान भी करता है। वह उनके भीतर तर्क और आत्मविश्वास पैदा करता है, ताकि वे अपने भविष्य की राह चुन सकें। शिक्षक की सबसे बड़ी खुशी तब होती है, जब उसका छात्र जीवन में सफल होता है। कवि ने गर्वपूर्वक यह कहा है कि शिक्षक होना एक गौरव का विषय है और यह एक विशेष उत्सव की तरह है जब उसके द्वारा सिखाया गया छात्र अपने जीवन में सफल होता है।

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यह कविता (हां मैं शिक्षक हूं।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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करवा चौथ।

Kmsraj51 की कलम से…..

Karwa Chauth | Karva Chauth| करवा चौथ।

Karva Chauth - wife fasts for the long life and happiness of her husband.

करवाचौथ की पावन बेला में, भव्य भारत देश की शोभा है।
सजना की दीर्घायु का, व्रत रखती सजनी का जो योद्धा है।

निर्जल दिनभर रहती नारी, चन्द्र दर्शन पर ही जल पीती है।
सचमुच इस पर्व से लगता है, वह पति के खातिर जीती है।

वह साल भर का लगाई – झगड़ा, बदलता आज की पूजा में।
मेरी जिन्दगी में बस तुम ही हो सजना, और कोई न दूजा है।

वह छलनी से चांद को देखना, पति प्रेम का घूंट भर पानी है।
चेहरे से पत्नी के झलकता कि, वह तो पति की दीवानी है।

अरे जन्मना – मरना लड़ना – झगड़ना, जीवन की कहानी है।
करवाचौथ की रसम से आती, पति-पत्नी में फिर जवानी है।

हार – शृंगार से सजती सजनी, सजना भी भेंट कुछ लाता है।
विदेशी सभ्यताएं क्या जाने, भारत दाम्पत्य कैसे निभाता है?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता करवाचौथ के पर्व की पवित्रता और उसकी सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाती है। यह त्योहार भारत की दाम्पत्य परंपरा का प्रतीक है, जहाँ पत्नी अपने पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए उपवास रखती है। दिनभर बिना जल ग्रहण किए वह चंद्र दर्शन के बाद ही जल और भोजन करती है, जिससे उसकी पति के प्रति प्रेम और समर्पण झलकता है।कविता यह भी बताती है कि पति-पत्नी के बीच छोटे-छोटे झगड़े और खटपट साल भर चलते रहते हैं, लेकिन करवाचौथ के इस विशेष दिन पर दोनों के बीच प्रेम और जुड़ाव का नया एहसास जागता है। छलनी से चाँद को देखने और पति से पहला घूंट पानी पीने की रस्म में नारी का प्रेम झलकता है।इसके अलावा, कविता में यह संदेश भी दिया गया है कि भारतीय दाम्पत्य जीवन की गहराई को पश्चिमी सभ्यताएं नहीं समझ सकतीं। इस पर्व के माध्यम से जीवन में फिर से प्रेम की ताजगी आ जाती है और पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति अपने प्रेम को नये सिरे से अभिव्यक्त करते हैं।

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यह कविता (करवा चौथ।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

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राष्ट्र अखण्ड बनाना है।

Kmsraj51 की कलम से…..

Rashtra Akhand Banana Hai | राष्ट्र अखण्ड बनाना है।

Do not hand over the ladder of power to those whose aim is to usurp power. The nation should be made united.

हमे न बदलना वक्फ बोर्ड को,
न ही सनातन में कुछ करना है।
हमें तो कानून तीस – तीस ए को,
भारत के खातिर एक करना है।

तीन सौ सत्तर हटी और पैंतीस ए भी हटी,
कानून तीस और तीस ए को एक बनाना है।
भारत के संविधान में नया संशोधन कर के,
भारत में यूनिफार्म सिविल कोड को लाना है।

हुई चूक हो किसी भी स्तर पर तब,
अब उलझी सूत को ही सुलझाना है।
जाति – धर्म के धागों से ही मिलाकर,
भारत के भविष्य का स्वेटर बनाना है।

जो भारत का था वह भारत में ही रहेगा,
हमें तो अवैध घुसपैठ को ही भगाना है।
भगाओ उन्हे मिलकर सब भारत वासी,
जिन्होंने रिहोंगियाओं को पहचाना है।

चिटा जैसा विनाशक जहर जो फैलाए,
उसको भला क्यों कर तुम्हे बचाना है?
वह बड़ा है या फिर छोटा है कोई यारो,
उसे हर हाल में बेनकाब ही करवाना है।

इससे पहले कि देश में धर्म युद्ध हो,
हमें राष्ट्र धर्म को ही शुद्ध करवाना है।
युवा पीढ़ी को बहकाने वालों को हमें,
युवा को समझाकर सबक सिखाना है।

हम दे देंगे सब कुछ दान भी अपना,
हर हाल में राष्ट्र अखण्ड बनाना है।
देश विभंजन गद्दारों को तो भाइयों,
शमशीर उठा कर ही बोध कराना है।

सत्ता सिंहासन उसे ही दिया जाए,
जिसका मकसद देश बचाना है।
मत सौंप सत्ता की सीढ़ी उसको,
जिसका मकसद सत्ता हथियाना है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता का सारांश है कि कवि भारत में एकता, अखंडता और समरसता को बढ़ावा देने की बात करता है। वह यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) लागू करने की वकालत करते हैं, ताकि देश में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून हो। उन्होंने अनुच्छेद 370 और 35A के हटने का उल्लेख किया है और चाहते हैं कि संविधान में एक और संशोधन किया जाए। कवि ने अवैध घुसपैठियों को देश से बाहर करने की बात की है, विशेष रूप से रोहिंग्याओं को, और देश में फैल रहे विनाशकारी तत्वों जैसे नशे (चिटा) का विरोध किया है। वह समाज को चेताने का आह्वान करते हैं कि राष्ट्र के लिए खतरनाक तत्वों को बेनकाब किया जाए।कवि ने देश में धर्म के नाम पर विभाजन या युद्ध की संभावना से बचने के लिए राष्ट्र धर्म को शुद्ध करने की बात की है। युवाओं को सही दिशा में मार्गदर्शन देने का भी आह्वान किया गया है ताकि उन्हें बहकाया न जा सके। अंत में, उन्होंने देश की अखंडता और सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए सत्ता ऐसे व्यक्ति को सौंपने की बात की है, जिसका मकसद सिर्फ सत्ता हथियाना न हो, बल्कि देश को बचाना हो।

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यह कविता (राष्ट्र अखण्ड बनाना है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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विजय दिवस।

Kmsraj51 की कलम से…..

Vijay Diwas | विजय दिवस।

He did not care if his life would be lost, his only dream was to win the nation. His aim was to save the honour of Mother India, then why would anyone get tired?

भरी दोपहरी चढ़ पहाड़ी पर,
दुश्मनों को वहां से खदेड़ा था।
पाकिस्तान के नथुने फूला कर,
रणबांकुरों ने किया बखेड़ा था॥

सरहदों की सुरक्षा खातिर उन्होंने,
अपने सीने में खाई जब गोली थी।
लगा था कारगिल की पहाड़ियों पर,
तब खेली किसी ने खून की होली थी॥

वे और नहीं थे, वीर सैनिक थे हमारे,
जिनके कारण हम घरों में सुरक्षित थे।
जीएं या मरे पर तिरंगा न झुकने पाए,
उनके बुलन्द इरादे कितने लक्षित थे?

जान जाएगी यह परवाह न थी उनको,
बस राष्ट्र विजय ही उनका सपना था।
भारत मां की लाज बचाना था धेय तो,
फिर कहां किसी को भला थकना था?

विजय दिवस की इस अनूठी गाथा को,
हम नई पीढ़ी को जब – जब सुनाएंगे।
रोम हर्षक नव क्रान्ति का संचार कर ,
तब उनमें राष्ट्र भक्ति का भाव जगाएंगे॥

हटा कर विदेशी फोज को पहाड़ी से,
घाटी में था जब वह विजयघोष हुआ।
भारत मां के उन लालों ने था मानो तब,
अपने बलिदानों से उन्नत अम्बर छुआ॥

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता कारगिल युद्ध में भारतीय सैनिकों के बलिदान और वीरता को समर्पित है। कवि ने वर्णन किया है कि कैसे हमारे सैनिकों ने दुश्मनों को पहाड़ियों से खदेड़कर उन्हें पराजित किया और देश की सीमाओं की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए हर प्रकार का बलिदान दिया और दुश्मन को हराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कारगिल की पहाड़ियों पर खून की होली खेली गई थी, जिसमें हमारे वीर सैनिकों ने अपने अदम्य साहस और बुलंद इरादों का परिचय दिया।कविता में इस अद्वितीय विजय गाथा को नई पीढ़ी को सुनाने और उनमें राष्ट्रभक्ति का भाव जगाने की बात कही गई है। कवि ने विजय दिवस की इस गाथा को हर बार सुनाने की प्रतिज्ञा की है ताकि भविष्य की पीढ़ियां भी अपने वीर सैनिकों के बलिदान को याद रखें और उनसे प्रेरणा प्राप्त करें।

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यह कविता (विजय दिवस।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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आओ राम अब।

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Aao Ram Ab | आओ राम अब।

He is the seventh and one of the most popular avatars of Vishnu. In Rama-centric traditions of Hinduism, he is considered the Supreme Being. LORD Rama.

आओ राम अब लौट चले, फिर से अयोध्या धाम।
बहुतेरा हुआ अब छानी में, धारण करो निज स्थान॥

भविष्य भारत का तुम हो प्रभु , तुम ही हो वर्तमान।
अटकल यदा कदा आती रहेगी, संभालो अपना काम॥

भार धारा का हरो प्रभु तुम, बढ़ाओ भारत का मान।
अन्याय अनीति और अधर्म का, रहे न नामो निशान॥

भूली रीतियां और स्मृतियां, फिर से हो जाए उदयमान।
विश्व धारा पर परचम लहराए, कि हां लौट आए भगवा॥

धर्म ध्वजा धरती पर लहराए, धवल में हो प्रभु गुणगान।
स्वर्ग – पाताल में भेरी बजे, दसों दिशाओं में हो सम्मान॥

साकार हो वाल्मीकि – तुलसी का, राम राज्य भगवान।
संभालो सत्ता अब स्वयं प्रभु तुम, मिटा दो सब त्राहिमाम॥

आसुरी वृतियों के बाणासुर का, शत्रुघन से कराओ निदान।
अब बेवड़े के कहने पर मत लगना, रखना सीता का ध्यान॥

कहने वाले तो कहते हैं कई कुछ, तुम तो हो करुणा निधान।
मां के तप पर है हमे भरोसा, बेवड़ी बातों से न होना परेशान॥

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कवि इस कविता में भगवान राम के प्रति अपनी श्रद्धांजलि व्यक्त करते हैं और उनसे अब फिर से अयोध्या के धाम की ओर लौटने की प्रार्थना करते हैं। उन्हें पुनः से अपने आक्रमणकारियों और अन्य अधर्मी प्रवृत्तियों का सामना करना होगा और वे इस युग में भगवान के रूप में आगे बढ़कर भारत का मान बढ़ाने का कार्य सम्पन्न करें। कवि ने भविष्य में होने वाली चुनौतियों की चेतावनी भी दी है और भगवान राम को सम्भालने, धरती पर धरती का मान बढ़ाने, अन्याय और अनीति का खत्म करने के लिए प्रेरित किया है। कवि कहते हैं कि भूली रीतियों और स्मृतियों को फिर से जीवंत करना है और भगवा ध्वज को फिर से ऊँचा करना है। इसके साथ ही, भारत को उच्चतम मानवीय मूल्यों की प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनर्निर्मित करना है। कवि ने भगवान राम की कृपा और शक्ति की प्रार्थना की है ताकि वे स्वयं ही अपने भक्तों की सभी कठिनाइयों को दूर कर सकें और भारत को सुख, शांति और समृद्धि में ले जाएं।

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यह कविता (आओ राम अब।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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बेकदरी।

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Disrespect | बेकदरी।

You must not leave anything on your plate as leftovers. Leaving food on your plate is not appreciated in Indian culture.

खेलने की आदत है जिनको आंधियों से
भला वे क्यों डरने लगेंगे फिर बांदियों से ?

जाने क्यों भूल गए हैं लोग घटनाएं दौर की?
कितना महत्वपूर्ण होता है बेवक्त में कौर भी?

बेकदरी हो गई है जमाने में आज अनाज की,
रही डर और कद्र नहीं है किसी को राज की।

थालियों में जूठन छोड़ना आज शान समझते हैं,
लोकतन्त्र में खुद को राजा भी तमाम समझते हैं।

न डर है किसी को कानून का न अन्न का है सम्मान,
और तो और मौजूदा दौर में बन बैठे हैं लोग भगवान।

खुदा न करे कि दुनियां में फिर से अकाल पड़ जाए,
जूठन को छोड़ने वाले नालियों में पड़े दाने को खाए।

खुदा न करे कि सब्सिडियों के फेर में देश गुलाम हो जाए,
लोकतन्त्र का दुरुपयोग करने वालों पर चांडाल राज चलाए।

सुना है कि इतिहास हमेशा से खुद को ही दोहराता है,
सदियों के अन्तराल में यहां फिर से वही दौर आता है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता व्यक्त कर रही है कि जो इंसान बड़ी से बड़ी समस्या से नहीं घबराता है डटकर उसका सामना करता है तो भला वो छोटे – मोटे बांदियों से क्यों डरे? पूर्व में हुई घटनाओ को लोग कैसे भूल जा रहे है, जब समय ख़राब होता है तो एक कौर (निवाला) भी मिलना मुश्किल हो जाता है। आज के ज़माने में अन्न का बहुत ज्यादा बेकदरी हो गया है, आजकल लोग अन्न का कद्र करना भूल गए है, जिस अन्न को लोग भगवान् का प्रसाद स्वरुप ग्रहण करते आ रहे है सदियों से। आजकल लोग अपनी भूख से ज्यादा भोजन लेकर थालियों में जूठन छोड़ना आज शान समझते हैं, जो की मूर्खता की सबसे बड़ी निशानी है, अपने घमंड में चूर होकर लोग खुद को राजा समझने लगे है आजकल। अब न डर है किसी को कानून का न अन्न का है सम्मान, और तो और मौजूदा दौर में बन बैठे हैं लोग खुद ही भगवान। भगवान्न न करे कि दुनियां में फिर से अकाल पड़ जाए और जूठन को छोड़ने वाले नालियों में पड़े दाने को खाए। कही ऐसा ना हो की सब्सिडियों के फेर में देश गुलाम हो जाए, लोकतन्त्र का दुरुपयोग करने वालों पर चांडाल राज चलाए। हम सब ने तो सुना है कि इतिहास हमेशा से खुद को ही दोहराता है, सदियों के अन्तराल में यहां फिर से वही दौर आता है।

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यह कविता (बेकदरी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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योग।

Kmsraj51 की कलम से…..

Yog | योग।

अण्ड – ब्रह्माण्ड की महा विद्या है, योग जिसका नाम है।
यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान है॥
समाधि जिसकी चर्म अवस्था, जिसमें तत्व का ज्ञान है।
योग सिखाए जीव को भक्ति – मुक्ति और ब्रह्म ज्ञान है॥

मिथ्या जगत और ब्रह्म सत्य है, यही तो योग का सार है।
परम ब्रह्म ही शाश्वत है इस जग में, नश्वर यह संसार है॥
पीढ़ी दर पीढ़ी ले आना, इसे, यह गुरुओं का उपकार है।
निरोगी काया प्रभु की छाया सत है, बाकी सब विकार है॥

स्थूल जगत में रमता है भोगी, सूक्ष्म से योगी को प्यार है।
मैं और मेरा प्रभुत्व लालसा, यह तो नीरा ही अहंकार है॥
योगी को प्यार अंतर्जागत है, भोगी को तो बाह्य संसार है।
योग जगत की परा विद्या, इस पर ज्ञानी का अधिकार है॥

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आओ हम सब मिलकर, योग दिवस मनायें। पद्मासन हो वज्रासन हो, या हो चकरा आसन, ध्यानमग्न हो बैठ जायें, बिना करे प्राशन। आओ हम सब मिलकर योग दिवस मनायें। हर रोज़ सुबह के समय योग करने के फायदे अनमोल है – यह हमारी पहली सांस को पुन: चक्रित करता है। योग का अभ्यास करने से शरीर किक-स्टार्ट होता है। ह्रदय रोग से बचाव करता है योग। दिमाग सदैव ही रहता है एक्टिव। बढ़ती है रोग प्रतिरोधक क्षमता। योग के द्वारा सांसों को साध कर परमानन्द की अनुभूति किया जा सकता है। तन और मन को निरोग रखने के लिए प्रतिदिन योग करे।

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यह कविता (योग।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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प्रेम अधूरा ही है।

Kmsraj51 की कलम से…..

Prem Adhoora Hee Hai | प्रेम अधूरा ही है।

प्रेम अन्त अभिलाषा है जीवन की,
पर मिला वह सबको अधूरा ही है।
राम – कृष्ण की कहानी को सुन लो,
उनमें भी कौन सा वह पूरा ही है?

यह रही दास्तां यूं ही है जीवन की,
हर युग में और हर जिंदगानी में।
राधा – कृष्ण का मेल हुआ कहां?
राम – सिया भी बिछुड़े नादानी में।

हुआ मुक्कमल न स्वपन किसी का,
प्रेम की चाहें ही सबकी अधूरी रही।
भले ही प्रेयसी राधा थी या सीता थी,
अधूरेपन की पीड़ा तो है सबने सही।

मूर्तिमान हुआ प्रेम किसका कहां है?
जिसकी अभिलाषा हम सब करते हैं।
अधूरा सा मिला है जो भी हम सबको,
उसे खोने से भी सब कितना डरते हैं?

जी लेते हैं जिंदगी हम पूरी हर रिश्तों में,
पर हर रिश्ते में देखे तो प्रेम अधूरा ही है।
कई – कई विवाहों से भी कहां प्यास बुझी?
अवतारों के जीवन में भी प्रेम कहां पूरा है?

जिन्दगी जद्दोजहद है प्रेम और वासनाओं की,
लोग सकून कहां किसी को यहां लेने देते हैं?
यह संसार तो है बीहड़ घाटी नित कर्मों की,
यहां अवतारों की भी परीक्षा लोग ले लेते हैं।

यह सच है कि प्रेम जरूरत है हर जीवन की,
भाषा प्रेम की पशु – पक्षी को भी समझ आती है।
जिन्दगी के तमाम उम्र के सिलसिले में हर सम्भव,
प्रेम के अधूरेपन का दर्द हमेशा सबको सताता है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सच्चा प्रेम एक गहरा और निःस्वार्थिक भावना है जो दो व्यक्तियों के बीच संबंध को बांधती है। यह एक आत्मिक और उदार बन्धन है जो अपने आप को समर्पित करता है और एक-दूसरे के हित में संयम बनाए रखता है। सच्चा प्रेम अपने आप को व्यक्त करने और स्वयं को स्वीकार करने की क्षमता वाला होता है। सच्चा प्रेम कठिनाइयों, आपत्तियों और चुनौतियों के बावजूद टिकता है। यह दूसरे व्यक्ति को निर्मल रूप से स्वीकार करता है, उनकी गलतियों और कमियों के बावजूद उन्हें सच्चा प्यार करता है। सच्चा प्रेम समर्पित, आदर्शवादी, और सहानुभूतिपूर्ण होता है। सच्चा प्रेम आपके साथी की सफलता, खुशी और प्रगति के लिए चिंतित रहता है और उनके सपनों और उच्चतम OUTPUT की प्रोत्साहना करता है। यह समर्पण, विश्वास, सम्मान, संयम और सम्पूर्ण समर्पण का एक गहरा बंधन होता है। सच्चा प्रेम आपके और आपके साथी के बीच एक संतुलित और आनंदमय संबंध स्थापित करता है। यह सच है कि प्रेम जरूरत है हर जीवन की, भाषा प्रेम की पशु – पक्षी को भी समझ आती है। जिन्दगी के तमाम उम्र के सिलसिले में हर सम्भव, प्रेम के अधूरेपन का दर्द हमेशा सबको सताता है। जब भी करो प्रेम तो सच्चा प्रेम ही करो, वरना दिखावे के प्रेम करने का कोई फायदा नहीं है।

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यह कविता (प्रेम अधूरा ही है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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पशु बलि।

Kmsraj51 की कलम से…..

Animal sacrifice | पशु बलि।

Pashu Bli

न जाने समाज क्यों, कुछ पिशाचियत पर अड़ता है?
बे ज़ुबान निरीह पशुओं की, बलि चढ़ाने पर लड़ता है।

देवताओं के नाम पर लेता है, जान इन बे जुबानों की।
क्यों भुल जाता है फितरत तब, समाज यहां इंसानों की?

सनातन संस्कृति के भाल पर, बलि प्रथा एक कलंक है।
कर्म दण्ड तो प्रभु सबको देगा, चाहे राजा हो या रंक है।

जिद करता है देव समाज, “न बलि तो सबको देनी होगी।”
विवश करते है देवता को भी, बलि तो तुझको लेनी होगी।

कारिंदों की जिद के चलते, देवता सदियों से बलि लेता है।
दहशत फैलाई जाती है, जो न दे, उसकी जान भी लेता है।

कौन हुआ है अमर अब तक, इन पशुओं की जान चढ़ाने से?
मैं करता हूं ऐसे कई सवाल, कई बार इस बिगड़े जमाने से।

सब जानते हैं कि गलत है यह सब, पशु बलि सच खोटी है।
फिर भी अपनी जान बचाने के भ्रम से, मार काट तो होती है।

इसी से ही कई जगहों पर, हमारे देवों की बदनामी होती है।
सनातन संस्कृति की दया धर्मिता, हमारी नादानी खोती है।

पिशाच नहीं तो क्या है फिर हम, जो दया धर्म है छोड़ दिया।
वैदिक पुरखों के सनातन धर्म को, स्वाद, स्वार्थ में तोड़ दिया?

देव न लेता है जान किसी की, फिर वह काहे का देव हुआ?
बस कारिन्दों की मांसाहार की चाह, बलि लेता है देव हुआ।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सभी धर्मों में जीव-हिंसा को बहुत बड़ा पाप माना गया है। जो धर्म प्राणियों की हिंसा का आदेश देता है, वह कल्याणकारी हो सकता हैं, इसमें किसी प्रकार भी विश्वास नहीं किया जा सकता। धर्म की रचना ही संसार में शांति और सद्भाव बढ़ाने के लिये हुई है। लेकिन आज का मानव अपने स्वाद के लिए बलि के नाम पर बेजुबान निर्दोष प्राणियों की हिंसा कर अपना पेट भरने लगा। हे मानव अब भी समय है छोड़ दो “बेजुबान निर्दोष प्राणियों की हिंसा” कर अपना पेट भरना और बलि के नाम पर उनकी हत्या करना।

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यह कविता (पशु बलि।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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हस्पताल की।

Kmsraj51 की कलम से…..

Hospital | हस्पताल की।

उदासी में उगती हर सुबह यहां की,
उदासी में डूबती हर सांझ और रात।
उदासी में ही बीतता है दिन भी सारा,
बीमार बेटे के देख कर बिगड़े हालात।

कभी दिमाग में इन्फेक्शन तो कभी,
दिल में छेद की डाक्टर कहता बात।
हर रोज बीमारी नई – नई सुन कर,
कैसे खुश रहता जवान बेटे का बाप?

कब तक छुपाऊं बेटे से कितना और कैसे?
परेशान मां, दादी, छुटकू, कुल कुनबा साथ।
एक ही आश विश्वास कि रब राखेगा अब,
उसके आगे भला किसकी क्या औकात?

सिर तो फाड़ा है सीना भी चीरना है,
क्यों कर उदास न होगा एक बाप?
यह जगह है, जहां पैसा तो चाहिए ही,
पर सबसे ज्यादा चाहिए रब का साथ।

गुरुद्वारे का कीर्तन चहुँ ओर है गूंजता,
मस्जिद की गूंजती है ऊंची सी अजान।
मंदिरों का शंख – घंटा नाद भी है गूंजता,
पर तुम कहां छुपे हो हे करुणानिधान?

भूत का प्रारब्ध है भोग रहे यह या कि,
भविष्य का संचित वर्तमान का क्रियमाण?
पूछता हूं बार – बार सवाल कई ऐसे बस,
निरुत्तर है दीवारें हस्पताल की आलिशान।

जानता हूं हर जन्म का अन्त मरण है,
वह आएगा, यह एक कड़वी सच्चाई है।
अस्त व्यस्त हो जाए जवानी में जीवन,
कुदरत की भला इसमें कौन भलाई है?

हँसने खेलने के जो दिन होते हैं जीवन के,
क्या बीत जाएंगे बेटे के रोग शोकों में नाथ?
आक्रोश घना है, उतारूं तो उतारूं किस पर?
मानुष जीवन की विवशताएं कही न जात।

हर दोष दूसरों के ही सर पर मढ़ना,
यही तो फितरत जगत में इंसानी है।
गुनाह जरूर हमारा ही होगा दाता,
यह आक्रोश व तुझ पर मढ़ना दोष,
यह हमारी मनुष्य सोच की नादानी है।

Note : यह रचना मैंने अपने जीवन के वर्तमान हालात पर लिखी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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यह कविता (हस्पताल की।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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