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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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great kms

Purity is the foundation of true peace and happiness !!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..


kmsraj51 की कलम से …..
pen-kms


Purity is the foundation of true peace & happiness,
It is your most valuable Property in your life,
Preserve it at any cast. !!

पवित्रता सच शांति और खुशी का आधार है.

यह आपके जीवन में सबसे मूल्यवान संपत्ति है.

यह किसी भी कलाकार की रक्षा करता है!!

http://kmsraj51.wordpress.com/

Note::-


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n-8

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Is a symbol of humanity, the spirit of cooperation !!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..


kmsraj51 की कलम से …..
pen-kms

** मानवता का प्रतीक है, सहयोग की भावना **

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जिसकी उन्नति सहयोग की बुनियाद पर निर्भर है। जिस प्रकार ईंट से ईंट जोङकर विशाल भवन बनता है, पानी की एक-एक बूंद से सागर बनता है। उसी प्रकार अनेक व्यक्तियों के परस्पर सहयोग से ही मनुष्य का विकास संभव है। समाज और राष्ट्र की समृद्धि परस्पर सहयोग पर ही निर्भर है।

पूर्ण विकास सहयोग से ही होता है। कोई भी व्यक्ति सर्वज्ञ नही होता। कलाकार के सामने डॉक्टर अयोग्य है, तो डॉक्टर के सामने इंजीनियर, तो कहीं साहित्यकार के सामने व्यपारी। कहने का आशय ये है कि, सभी अपनी-अपनी विधाओं में पूर्ण हैं किन्तु संतुलित विकास के लिए एक दुसरे का सहयोग अति आवश्यक है। सहयोग की आदतें मनुष्य में मैत्री भावना का विकास करती हैं। गौतम, महावीर, ईसा हों या कृष्ण, कबीर, राम, रहीम सभी महापुरुषों में मैत्री की भावना समान है।

धरती पर जैविक संरचना कुछ इस प्रकार है कि समाज से परे अकेले व्यक्ति का विकास संभव नही है। प्राणी में शरीर के सभी अंग मिलकर कर कार्य करते हैं तभी व्यक्ति अनेक कार्य करने में सक्षम होता है। इतिहास गवाह है कि रावण, कंस, दुर्योधन हो या हिटलर, मुसोलिन, चँगेज खाँ तथा नादिरशाह जैसे शक्तिसंपन्न कुशल नितिज्ञ थे किन्तु सभी ने सामाजिक भावना का निरादर किया जिसका परिणाम है उनका अस्तित्व ही समाप्त हो गया।

सृजन का आइना है परस्पर सहयोग। जिस तरह आम के वृक्ष का विशाल अस्तित्व, मधुर फल, शीतल छाया दूसरें लोगों के सहयोग का ही परिणाम है। उसी प्रकार व्यक्ति का संपूर्ण व्यक्तित्व समाज के प्रयत्नों का ही फल है।
मदर टेरेसा का कहना था कि, “आप सौ लोगों की सहायता नही कर सकते तो सिर्फ एक की ही सहायता कर दें।“

सच ही तो है मित्रों, एक और एक ग्यारह होता है, बूंद-बूंद से ही घङा भरता है। व्यक्ति और समाज का कल्याण इसी पर निर्भर है कि लोग व्यक्तिवाद की मानसिकता को छोङकर सहयोग के महत्व को समझते हुए उसे जीवन का अहम हिस्सा बना ले। सहयोग की भावना की एक शुरुवात से ही “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना सजीव होती है।

Note::-


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Chankya Anmol Voice !!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..

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** सभी शब्द के दो अर्थ होते है!! **

Chankya - KMS

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Chankya Niti – मूल चाणक्य नीति!!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..


kmsraj51 की कलम से …..
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** मूल चाणक्य नीति/चाणक्य सूत्र **


आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान विभूति थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में भी विश्वविख्यात हुए।

इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत और नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्ययन, चिंतन और जीवानानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह नि:स्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्देश्य से अभिव्यक्त किया।

वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारू ढंग से बताई गई नीतियाँ और सूत्र अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। चाणक्य नीति के द्वितीय अध्याय से यहाँ प्रस्तुत हैं कुछ अंश –


1. जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं मिलती, सभी हाथियों के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होता, सभी वनों में चंदन का वृक्ष नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन पुरुष सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।

2. झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना, दुस्साहस करना, छल-कपट करना, मूर्खतापूर्ण कार्य करना, लोभ करना, अपवित्रता और निर्दयता – ये सभी स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं। चाणक्य उपर्युक्त दोषों को स्त्रियों का स्वाभाविक गुण मानते हैं। हालाँकि वर्तमान दौर की शिक्षित स्त्रियों में इन दोषों का होना सही नहीं कहा जा सकता है।

3. भोजन के लिए अच्छे पदार्थों का उपलब्ध होना, उन्हें पचाने की शक्ति का होना, सुंदर स्त्री के साथ संसर्ग के लिए कामशक्ति का होना, प्रचुर धन के साथ-साथ धन देने की इच्छा होना। ये सभी सुख मनुष्य को बहुत कठिनता से प्राप्त होते हैं।

4. चाणक्य कहते हैं कि जिस व्यक्ति का पुत्र उसके नियंत्रण में रहता है, जिसकी पत्नी आज्ञा के अनुसार आचरण करती है और जो व्यक्ति अपने कमाए धन से पूरी तरह संतुष्ट रहता है। ऐसे मनुष्य के लिए यह संसार ही स्वर्ग के समान है।

5. चाणक्य का मानना है कि वही गृहस्थी सुखी है, जिसकी संतान उनकी आज्ञा का पालन करती है। पिता का भी कर्तव्य है कि वह पुत्रों का पालन-पोषण अच्छी तरह से करे। इसी प्रकार ऐसे व्यक्ति को मित्र नहीं कहा जा सकता है, जिस पर विश्वास नहीं किया जा सके और ऐसी पत्नी व्यर्थ है जिससे किसी प्रकार का सुख प्राप्त न हो।

6. जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य को बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है। चाणक्य कहते हैं कि वह उस बर्तन के समान है, जिसके ऊपर के हिस्से में दूध लगा है परंतु अंदर विष भरा हुआ होता है।

7. जिस प्रकार पत्नी के वियोग का दुख, अपने भाई-बंधुओं से प्राप्त अपमान का दुख असहनीय होता है, उसी प्रकार कर्ज से दबा व्यक्ति भी हर समय दुखी रहता है। दुष्ट राजा की सेवा में रहने वाला नौकर भी दुखी रहता है। निर्धनता का अभिशाप भी मनुष्य कभी नहीं भुला पाता। इनसे व्यक्ति की आत्मा अंदर ही अंदर जलती रहती है।

8. ब्राह्मणों का बल विद्या है, राजाओं का बल उनकी सेना है, वैश्यों का बल उनका धन है और शूद्रों का बल दूसरों की सेवा करना है। ब्राह्मणों का कर्तव्य है कि वे विद्या ग्रहण करें। राजा का कर्तव्य है कि वे सैनिकों द्वारा अपने बल को बढ़ाते रहें। वैश्यों का कर्तव्य है कि वे व्यापार द्वारा धन बढ़ाएँ, शूद्रों का कर्तव्य श्रेष्ठ लोगों की सेवा करना है।

9. चाणक्य का कहना है कि मूर्खता के समान यौवन भी दुखदायी होता है क्योंकि जवानी में व्यक्ति कामवासना के आवेग में कोई भी मूर्खतापूर्ण कार्य कर सकता है। परंतु इनसे भी अधिक कष्टदायक है दूसरों पर आश्रित रहना।

10. चाणक्य कहते हैं कि बचपन में संतान को जैसी शिक्षा दी जाती है, उनका विकास उसी प्रकार होता है। इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे उन्हें ऐसे मार्ग पर चलाएँ, जिससे उनमें उत्तम चरित्र का विकास हो क्योंकि गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा बढ़ती है।

11. वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु के समान हैं, जिन्होंने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दी। क्योंकि अनपढ़ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है जैसे हंसों के झुंड में बगुले की स्थिति होती है। शिक्षा विहीन मनुष्य बिना पूँछ के जानवर जैसा होता है, इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों को ऐसी शिक्षा दें जिससे वे समाज को सुशोभित करें।

12. चाणक्य कहते हैं कि अधिक लाड़ प्यार करने से बच्चों में अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए यदि वे कोई गलत काम करते हैं तो उसे नजरअंदाज करके लाड़-प्यार करना उचित नहीं है। बच्चे को डाँटना भी आवश्यक है।

13. शिक्षा और अध्ययन की महत्ता बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य का जन्म बहुत सौभाग्य से मिलता है, इसलिए हमें अपने अधिकाधिक समय का वेदादि शास्त्रों के अध्ययन में तथा दान जैसे अच्छे कार्यों में ही सदुपयोग करना चाहिए।

14. चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के संबंद में भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है। अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।

चाणक्य का मानना है कि व्यक्ति को कभी अपने मन का भेद नहीं खोलना चाहिए। उसे जो भी कार्य करना है, उसे अपने मन में रखे और पूरी तन्मयता के साथ समय आने पर उसे पूरा करना चाहिए।

15. चाणक्य के अनुसार नदी के किनारे स्थित वृक्षों का जीवन अनिश्चित होता है, क्योंकि नदियाँ बाढ़ के समय अपने किनारे के पेड़ों को उजाड़ देती हैं। इसी प्रकार दूसरे के घरों में रहने वाली स्त्री भी किसी समय पतन के मार्ग पर जा सकती है। इसी तरह जिस राजा के पास अच्छी सलाह देने वाले मंत्री नहीं होते, वह भी बहुत समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। इसमें जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए।

17. चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह वेश्या धन के समाप्त होने पर पुरुष से मुँह मोड़ लेती है। उसी तरह जब राजा शक्तिहीन हो जाता है तो प्रजा उसका साथ छोड़ देती है। इसी प्रकार वृक्षों पर रहने वाले पक्षी भी तभी तक किसी वृक्ष पर बसेरा रखते हैं, जब तक वहाँ से उन्हें फल प्राप्त होते रहते हैं। अतिथि का जब पूरा स्वागत-सत्कार कर दिया जाता है तो वह भी उस घर को छोड़ देता है।

18. बुरे चरित्र वाले, अकारण दूसरों को हानि पहुँचाने वाले तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता करता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। आचार्य चाणक्य का कहना है मनुष्य को कुसंगति से बचना चाहिए। वे कहते हैं कि मनुष्य की भलाई इसी में है कि वह जितनी जल्दी हो सके, दुष्ट व्यक्ति का साथ छोड़ दे।

19. चाणक्य कहते हैं कि मित्रता, बराबरी वाले व्यक्तियों में ही करना ठीक रहता है। सरकारी नौकरी सर्वोत्तम होती है और अच्छे व्यापार के लिए व्यवहारकुशल होना आवश्यक है। इसी तरह सुंदर व सुशील स्त्री घर में ही शोभा देती है।

Note::-


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Aapka kmsraj51 …..

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Important Thoughts For Happiness !!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51)…..

kmsraj51 की कलम से …..

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खुशी के लिए जरूरी संकल्प …..


हेलो दोस्तो! नए वर्ष का स्वागत आप इतने उत्साह और शोर-शराबे के साथ हर बार इसलिए करते हैं कि आपके दिल में कुछ पाने की उम्मीद रहती है। वे खुशियां जिनकी अपने कामना और कोशिश की पर वे न मिलीं। नया साल शुरू होते ही वे सभी अधूरे ख्वाब पूरा करने की तमन्ना प्रबल हो जाती है। ऐसा लगता है मानो जीवन ने आपको एक और मौका दिया है खुशियों को अपने पक्ष में करने का।

आप इस नए वर्ष के पहले दिन पीछे मुड़कर देखना चाहते हैं कि आखिर आपसे किस-किस क्षेत्र में चूक हुई है जिसके कारण आप मंजिल से दूर रह गए। अपने स्मृति पटल पर जोर देने पर आपको अहसास होता है कि निहायत मामूली सी कमियों व कोताहियों के कारण आप वह हासिल नहीं कर सके जिसकी आपको चाह थी।

जब आप अपनी डायरी उठाकर देखते हैं तो पाते हैं कि ज्यादातर दुखों व कष्टों का जिम्मेदार कोई और नहीं, आप खुद ही थे। शक व संशय से किसी को तकलीफ या मजा चखाने जैसे विचार और प्रवृत्ति के कारण ही आपका मन ज्यादा विचलित व बेचैन हुआ था। अपनों पर भरोसा न कर किसी दुष्ट के बहकावे में आकर अपना सुख-चैन गंवाने का नतीजा हमेशा बुरा ही निकला। इस कारण न तो आपको शांति मिली और न ही स्वास्थ्य लाभ। आपकी मूल चाहत थी खुशी।

इन सारे विश्लेषणों के बाद आपके संकल्प की सूई अब कहां जाकर रुकनी चाहिए? जी हां, खुशी के लिए संकल्प का पहला सबक यही बनता है कि अपनों पर भरोसा किया जाए। अपने बच्चे, माता-पिता, साथी, दोस्त, रिश्ते, नातेदार पर भरोसा करना सीखें, न कि उन गैर चुगलखोरों की सुनें जो आपका सुकून चुराने में माहिर हैं। किसी अपने से कोई भूल हो गई है तो उसे जीवन भर का सच न मान लें। दोस्तनुमा दुश्मन के बहकावे में आकर अपनों पर निरंतर शक करने से आप उन्हें फिर गलत करने के लिए उकसाते हैं।

कुछ कारगर संकल्प इस प्रकार करें:

– बीते समय की चीर-फाड़ कर समय बर्बाद करने के बजाय भविष्य को सुधारने के बारे में आप विचार करेंगे।

– हर किसी को माफ कर देंगे ।

– बदला लेने के लिए कोई कितना भी उकसाए, ऐसा नहीं करेंगे।

– ज्यादा भावुक हुए बिना ही जिनसे प्यार है उनका साथ देंगे।

– यथार्थ व तर्क को अहमियत देते हुए भी दिल की भी सुनेंगे।

– कोशिश करें कि छोटे-मोटे अरमान पूरे करते चलें ताकि जीने का मजा मिलता रहे।

– ज्योतिष विद्या से मिली सूचनाओं पर केवल अच्छे पहलुओं पर यकीन करें और चिंता वाली बातों को झूठा मानें ताकि गंडे-तावीज के चक्कर में आपकी जेब खाली न हो।

– इंटरनेट, फेसबुक व फोन पर पूरी तरह निर्भर नहीं होकर रूबरू होकर संवाद का मजा लें।

– अपने चाहनेवालों के सीधे संपर्क में रहें ताकि हौसला बना रहे।

– नैतिकता का वही पैमाना अपने लिए भी तय करें जो दूसरों के लिए रखें।

– अपने जलनशील स्वभाव के कारण दूसरों का सुख चैन न लूटें।

– अपने को खाने-पीने से वंचित कर त्याग व बलिदान करने जैसी कसम या संकल्प न लें, यह मूलतः अपनों को प्यार नहीं सजा देने के लिए होता है।

– किसी भी प्रकार की अति से बचने की कोशिश करें।

– बार-बार अपना मन न बदलें, एक विचार पर टिककर रहें ताकि स्थिरता रहे।

मजे की बात यह है कि ज्यादातर संकल्प आप हर बार करते हैं और वे पहले ही दिन से टूटने लगते हैं। नहीं पीने या संतुलित खाने के संकल्प, आप यह कहकर तोड़ देते हैं कि अब आज तो नया वर्ष शुरू हुआ है, आज तो जश्न का दिन है, क्या सोचना। कल से देखा जाएगा और वह कल कभी नहीं आता। इसलिए कोई सख्त इरादा करना फायदेमंद नहीं होता है। केवल मोटी-मोटी बातों की गांठ अपने जीवन में बांध लेने भर से ही जीवन की नैय्या पार लग सकती है। खुद को खुश रखना। खुशी के लिए जरूरी है कि अपनी सेहत पर ध्यान दें। दूसरों का बुरा चाहने वालों की सेहत अमूमन थोड़ी नाजुक रहती है।

किसी भी घटना या बात को बहुत ज्यादा तूल न दें। खुशी हो या गम, संयम रखें और अति उत्तेजित न हों। सामाजिक मामला हो या पारीवारिक बहुत अधिक भावना में बहकर माहौल को खराब न करें। किसी पर हाथ उठाना या अपशब्द बोलना आपको अपरिपक्व साबित करता है। अपनी मस्ती, अपनी खुशी, अपनी सफलता का पैमाना खुद तय करें। जीवन के हर क्षेत्र में आपका लक्ष्य आपका अपना होना चाहिए न कि दूसरे क्या चाहते हैं। लालच से थोड़ा बचकर चलना ही सुकून देता है।

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आपकी ब्यूटी का राज और दही !!

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हमारे खान-पान में ऐसी कई चीजें शामिल हैं, जिनमें खूबसूरती और स्वास्थ्य का खजाना छिपा होता है। दही भी एक ऐसा ही खजाना है, जिसका उपयोग हर तरह से फायदेमंद है। दही का स्वास्थ्य के साथ-साथ सौंदर्य निखारने में भी महत्वपूर्ण स्थान है। यह एक बढ़िया, सस्ता और आसानी से उपलब्ध होने वाला सौंदर्य प्रसाधन है। जो हर घर में आसानी से पाया जाता है। आइए जानें दही के गुण-


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* दही में नींबू का रस मिलाकर चेहरे, गर्दन व हाथ-पांव में लगाएं । 20 मिनट बाद धो लें, हाथ-पैर मुलायम होंगे व चेहरे पर चमक आएगी।

* बाल धोने से 1 घंटा पहले यदि बालों में दही लगाया जाए तो शैंपू के बाद कंडीशनर लगाने की जरूरत नहीं पड़ती।

* चौकर के साथ दही मिलाकर लगाने से ब्लैक हैडस कम होते हैं।

* दही में बेसन मिलाकर उबटन की तरह लगाने से त्वचा के पोर अच्छी तरह से साफ होते हैं।

* दही में शहद मिलाकर बालों पर लगाने से यह कंडीशनर का काम करता है।

* मुल्तानी मिट्टी के साथ दही अच्छे क्लीजिंग एजेंट का काम करता है।

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दही चेहरे, गर्दन व बाजू आदि के सौंदर्य को तो निखारता ही है, साथ ही यह बालों को पोषण देने में भी बहुत सहायक है।

* अलग-अलग शैंपू और रंगों का उपयोग करने से बालों की चमक कम हो गई हैं तो दही में बेसन घोलकर बालों की जड़ों में लगाकर एक घंटे बाद सिर धो लें। इससे बालों की चमक लौट आएगी और बालों की रूसी की समस्या से भी आपको निजात मिलेगी।

* रूसी की शिकायत वाले बालों के लिए दही में कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर सिर धोएँ। यह हफ्ते में दो बार अवश्य करें। इससे जहाँ बालों की रूसी खत्म होगी, वहीं बाल मुलायम, काले, लंबे व घने होंगे जो आपकी सुंदरता में चार चाँद लगाएंगे।

* अगर आप मुंहासे की समस्या से परेशान हैं तो अपने चेहरे पर खट्टी दही का लेप लगाएं और चेहरा सूख जाए तब धो लें। थोड़े ही दिनों में आपको अप्रत्याशित लाभ होगा।

* अगर गर्दन के पिछले भाग में कालापन जमा हो गया है तो घबराए नहीं नहाते समय गर्दन पर खट्टी दही से मालिश करें और धो लें।

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Betal Pachisi – बेताल पच्चिसी – बच्चों के लिये कहानियां हिंदी में !!

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चंद्रशेखर नगर में रत्नदत्त नाम का एक सेठ रहता था। उसके एक लड़की थी। उसका नाम था उन्मादिनी।
जब वह बड़ी हुई तो रत्नदत्त ने राजा के पास जाकर कहा कि आप चाहें तो उससे ब्याह कर लीजिए। राजा ने तीन दासियों को लड़की को देख आने को कहा।

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उन्होंने उन्मादिनी को देखा तो उसके रूप पर मुग्ध हो गईं, लेकिन उन्होंने यह सोचकर कि राजा उसके वश में हो जाएगा, आकर कह दिया कि वह तो कुलक्षिणी है, राजा ने सेठ से इंकार कर दिया।

इसके बाद सेठ ने राजा के सेनापति बलभद्र से उसका विवाह कर दिया। वे दोनों अच्छी तरह से रहने लगे।

एक दिन राजा की सवारी उस रास्ते से निकली। उस समय उन्मादिनी अपने कोठे पर खड़ी थी। राजा की उस पर निगाह पड़ी तो वह उस पर मोहित हो गया। उसने पता लगाया। मालूम हुआ कि वह सेठ की लड़की है।

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राजा ने सोचा कि हो-न-हो, जिन दासियों को मैंने देखने भेजा था, उन्होंने छल किया है। राजा ने उन्हें बुलाया तो उन्होंने आकर सारी बात सच-सच कह दी। इतने में सेनापति वहां आ गया। उसे राजा की बैचेनी मालूम हुई।

उसने कहा, ‘स्वामी उन्मादिनी को आप ले लीजिए।’ राजा ने गुस्सा होकर कहा, ‘क्या मैं अधर्मी हूं, जो पराई स्त्री को ले लूं?’

राजा को इतनी व्याकुलता हुई कि वह कुछ दिन में ही मर गया। सेनापति ने अपने गुरु को सब हाल सुना कर पूछा कि अब मैं क्या करूं? गुरु ने कहा, ‘सेवक का धर्म है कि स्वामी के लिए जान दे दें।’
राजा की चिता तैयार हुई। सेनापति वहां गया और उसमें कूद पड़ा।

जब उन्मादिनी को यह बात मालूम हुई, तो वह पति के साथ जल जाना धर्म समझ कर चिता के पास पहुंची और उसमें जाकर भस्म हो गई।
इतना कहकर वेताल ने पूछा, ‘राजन्, बताओ, सेनापति और राजा में कौन अधिक साहसी था?’

राजा ने कहा, ‘राजा अधिक साहसी था; क्योंकि उसने राजधर्म पर दृढ़ रहने के लिए उन्मादिनी को उसके पति के कहने पर भी स्वीकार नहीं किया और अपने प्राणों को त्याग दिया।

सेनापति कुलीन सेवक था। अपने स्वामी की भलाई में उसका प्राण देना अचरज की बात नहीं।

असली काम तो राजा ने किया कि प्राण छोड़ कर भी राजधर्म नहीं छोड़ा।’
राजा का यह उत्तर सुनकर वेताल फिर पेड़ पर जा लटका।

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जीवन की नाव !!

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एक संत थे। उनके कई शिष्य उनके आश्रम में रहकर अध्ययन करते थे। एक दिन एक महिला उनके पास रोती हुए आई और बोली, ‘बाबा, मैं लाख प्रयासों के बाद भी अपना मकान नहीं बना पा रही हूं। मेरे रहने का कोई निश्चित ठिकाना नहीं है। मैं बहुत अशांत और दु:खी हूं। कृपया मेरे मन को शांत करें।’

उसकी बात पर संत बोले, ‘हर किसी को पुश्तैनी जायदाद नहीं मिलती। अपना मकान बनाने के लिए आपको नेकी से धनोपार्जन करना होगा, तब आपका मकान बन जाएगा और आपको मानसिक शांति भी मिलेगी।’ महिला वहां से चली गई। इसके बाद एक शिष्य संत से बोला, ‘बाबा, सुख तो समझ में आता है लेकिन दु:ख क्यों है? यह समझ में नहीं आता।’

उसकी बात सुनकर संत बोले, ‘मुझे दूसरे किनारे पर जाना है। इस बात का जवाब मैं तुम्हें नाव में बैठकर दूंगा।’ दोनों नाव में बैठ गए। संत ने एक चप्पू से नाव चलानी शुरू की। एक ही चप्पू से चलाने के कारण नाव गोल-गोल घूमने लगी तो शिष्य बोला, ‘बाबा, अगर आप एक ही चप्पू से नाव चलाते रहे तो हम यहीं भटकते रहेंगे, कभी किनारे पर नहीं पहुंच पाएंगे।

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उसकी बात सुनकर संत बोले, ‘अरे तुम तो बहुत समझदार हो। यही तुम्हारे पहले सवाल का जवाब भी है। अगर जीवन में सुख ही सुख होगा तो जीवन नैया यूं ही गोल-गोल घूमती रहेगी और कभी भी किनारे पर नहीं पहुंचेगी। जिस तरह नाव को साधने के लिए दो चप्पू चाहिए, ठीक से चलने के लिए दो पैर चाहिए, काम करने के लिए दो हाथ चाहिए, उसी तरह जीवन में सुख के साथ दुख भी होने चाहिए।

जब रात और दिन दोनों होंगे तभी तो दिन का महत्व पता चलेगा। जीवन और मृत्यु से ही जीवन के आनंद का सच्चा अनुभव होगा, वरना जीवन की नाव भंवर में फंस जाएगी।’ संत की बात शिष्य की समझ में आ गई।

Note::-

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हम चिल्लाते क्यों हैं गुस्से में?

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एक बार एक संत अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। अचानक उन्होंने सभी शिष्यों से एक सवाल पूछा। बताओ जब दो लोग एक दूसरे पर गुस्सा करते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते क्यों हैं?

शिष्यों ने कुछ देर सोचा और एक ने उत्तर दिया : हम अपनी शांति खो चुके होते हैं इसलिए चिल्लाने लगते हैं।
संत ने मुस्कुराते हुए कहा : दोनों लोग एक दूसरे के काफी करीब होते हैं तो फिर धीरे-धीरे भी तो बात कर सकते हैं। आखिर वह चिल्लाते क्यों हैं?

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कुछ और शिष्यों ने भी जवाब दिया लेकिन संत संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने खुद उत्तर देना शुरू किया। वह बोले : जब दो लोग एक दूसरे से नाराज होते हैं तो उनके दिलों में दूरियां बहुत बढ़ जाती हैं। जब दूरियां बढ़ जाएं तो आवाज को पहुंचाने के लिए उसका तेज होना जरूरी है। दूरियां जितनी ज्यादा होंगी उतनी तेज चिल्लाना पड़ेगा। दिलों की यह दूरियां ही दो गुस्साए लोगों को चिल्लाने पर मजबूर कर देती हैं। वह आगे बोले, जब दो लोगों में प्रेम होता है तो वह एक दूसरे से बड़े आराम से और धीरे-धीरे बात करते हैं। प्रेम दिलों को करीब लाता है और करीब तक आवाज पहुंचाने के लिए चिल्लाने की जरूरत नहीं। जब दो लोगों में प्रेम और भी प्रगाढ़ हो जाता है तो वह खुसफुसा कर भी एक दूसरे तक अपनी बात पहुंचा लेते हैं। इसके बाद प्रेम की एक अवस्था यह भी आती है कि खुसफुसाने की जरूरत भी नहीं पड़ती। एक दूसरे की आंख में देख कर ही समझ आ जाता है कि क्या कहा जा रहा है।

शिष्यों की तरफ देखते हुए संत बोले : अब जब भी कभी बहस करें तो दिलों की दूरियों को न बढ़ने दें। शांत चित्त और धीमी आवाज में बात करें। ध्यान रखें कि कहीं दूरियां इतनी न बढ़े जाएं कि वापस आना ही मुमकिन न हो।

Note::-

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स्वर्ग – Heaven – Hindi Inspirational Story

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51)…..

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Heaven – स्वर्ग

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एक यात्री अपने घोड़े और कुत्ते के साथ सड़क पर चल रहा था. जब वे एक विशालकाय पेड़ के पास से गुज़र रहे थे तब उनपर आसमान से बिजली गिरी और वे तीनों तत्क्षण मर गए. लेकिन उन तीनों को यह प्रतीत नहीं हुआ कि वे अब जीवित नहीं है और वे चलते ही रहे. कभी-कभी मृत प्राणियों को अपना शरीरभाव छोड़ने में समय लग जाता है.

उनकी यात्रा बहुत लंबी थी. आसमान में सूरज ज़ोरों से चमक रहा था. वे पसीने से तरबतर और बेहद प्यासे थे. वे पानी की तलाश करते रहे. सड़क के मोड़ पर उन्हें एक भव्य द्वार दिखाई दिया जो पूरा संगमरमर का बना हुआ था. द्वार से होते हुए वे स्वर्ण मढ़ित एक अहाते में आ पहुंचे. अहाते के बीचोंबीच एक फव्वारे से आईने की तरह साफ़ पानी निकल रहा था.

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यात्री ने द्वार की पहरेदारी करनेवाले से कहा:

“नमस्ते, यह सुन्दर जगह क्या है?

“यह स्वर्ग है”.

“कितना अच्छा हुआ कि हम चलते-चलते स्वर्ग आ पहुंचे. हमें बहुत प्यास लगी है.”

“तुम चाहे जितना पानी पी सकते हो”.

“मेरा घोड़ा और कुत्ता भी प्यासे हैं”.

“माफ़ करना लेकिन यहाँ जानवरों को पानी पिलाना मना है”

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यात्री को यह सुनकर बहुत निराशा हुई. वह खुद बहुत प्यासा था लेकिन अकेला पानी नहीं पीना चाहता था. उसने पहरेदार को धन्यवाद दिया और अपनी राह चल पड़ा. आगे और बहुत दूर तक चलने के बाद वे एक बगीचे तक पहुंचे जिसका दरवाज़ा जर्जर था और भीतर जाने का रास्ता धूल से पटा हुआ था.

भीतर पहुँचने पर उसने देखा कि एक पेड़ की छाँव में एक आदमी अपने सर को टोपी से ढंककर सो रहा था.

“नमस्ते” – यात्री ने उस आदमी से कहा – “मैं, मेरा घोड़ा और कुत्ता बहुत प्यासे हैं. क्या यहाँ पानी मिलेगा?”

उस आदमी ने एक ओर इशारा करके कहा – “वहां चट्टानों के बीच पानी का एक सोता है. जाओ जाकर पानी पी लो.”

यात्री अपने घोड़े और कुत्ते के साथ वहां पहुंचा और तीनों ने जी भर के अपनी प्यास बुझाई. फिर यात्री उस आदमी को धन्यवाद कहने के लिए आ गया.

“यह कौन सी जगह है?”

“यह स्वर्ग है”.

“स्वर्ग? इसी रास्ते में पीछे हमें एक संगमरमरी अहाता मिला, उसे भी वहां का पहरेदार स्वर्ग बता रहा था!”

“नहीं-नहीं, वह स्वर्ग नहीं है. वह नर्क है”.

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यात्री अब अपना आपा खो बैठा. उसने कहा – “भगवान के लिए ये सब कहना बंद करो! मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है कि यह सब क्या है!”

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आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा – “नाराज़ न हो भाई, संगमरमरी स्वर्ग वालों का तो हमपर बड़ा उपकार है. वहां वे सभी लोग रुक जाते हैं जो अपने भले के लिए अपने सबसे अच्छे दोस्तों को भी छोड़ सकते हैं.”

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(यह कहानी पाउलो कोएलो की किताब “The Devil and Miss Prym” से ली गयी है !!

Note ::- Lots of Thank`s पाउलो कोएलो

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