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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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Hindi Story

हाथी और छह अंधे व्यक्ति ~ Elephant and six blind men !!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..

kmsraj51 की कलम से …..
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@@ ** हाथी और छह अंधे व्यक्ति ** @@

6 BLIND MAN
कैसा होता है हाथी ?

बहुत समय पहले की बात है , किसी गावं में 6 अंधे आदमी रहते थे. एक दिन गाँव वालों ने उन्हें बताया , ” अरे , आज गावँ में हाथी आया है.” उन्होंने आज तक बस हाथियों के बारे में सुना था पर कभी छू कर महसूस नहीं किया था. उन्होंने ने निश्चय किया, ” भले ही हम हाथी को देख नहीं सकते , पर आज हम सब चल कर उसे महसूस तो कर सकते हैं ना?” और फिर वो सब उस जगह की तरफ बढ़ चले जहाँ हाथी आया हुआ था.

सभी ने हाथी को छूना शुरू किया.

” मैं समझ गया, हाथी एक खम्भे की तरह होता है”, पहले व्यक्ति ने हाथी का पैर छूते हुए कहा.

“अरे नहीं, हाथी तो रस्सी की तरह होता है.” दूसरे व्यक्ति ने पूँछ पकड़ते हुए कहा.

“मैं बताता हूँ, ये तो पेड़ के तने की तरह है.”, तीसरे व्यक्ति ने सूंढ़ पकड़ते हुए कहा.

” तुम लोग क्या बात कर रहे हो, हाथी एक बड़े हाथ के पंखे की तरह होता है.” , चौथे व्यक्ति ने कान छूते हुए सभी को समझाया.

“नहीं-नहीं , ये तो एक दीवार की तरह है.”, पांचवे व्यक्ति ने पेट पर हाथ रखते हुए कहा.

” ऐसा नहीं है , हाथी तो एक कठोर नली की तरह होता है.”, छठे व्यक्ति ने अपनी बात रखी.

और फिर सभी आपस में बहस करने लगे और खुद को सही साबित करने में लग गए.. ..उनकी बहस तेज होती गयी और ऐसा लगने लगा मानो वो आपस में लड़ ही पड़ेंगे.

तभी वहां से एक बुद्धिमान व्यक्ति गुजर रहा था. वह रुका और उनसे पूछा,” क्या बात है तुम सब आपस में झगड़ क्यों रहे हो?”

” हम यह नहीं तय कर पा रहे हैं कि आखिर हाथी दीखता कैसा है.” , उन्होंने ने उत्तर दिया.

और फिर बारी बारी से उन्होंने अपनी बात उस व्यक्ति को समझाई.

बुद्धिमान व्यक्ति ने सभी की बात शांति से सुनी और बोला ,” तुम सब अपनी-अपनी जगह सही हो. तुम्हारे वर्णन में अंतर इसलिए है क्योंकि तुम सबने हाथी के अलग-अलग भाग छुए

हैं, पर देखा जाए तो तुम लोगो ने जो कुछ भी बताया वो सभी बाते हाथी के वर्णन के लिए सही बैठती हैं.”

” अच्छा !! ऐसा है.” सभी ने एक साथ उत्तर दिया . उसके बाद कोई विवाद नहीं हुआ ,और सभी खुश हो गए कि वो सभी सच कह रहे थे.

दोस्तों, कई बार ऐसा होता है कि हम अपनी बात को लेकर अड़ जाते हैं कि हम ही सही हैं और बाकी सब गलत है. लेकिन यह संभव है कि हमें सिक्के का एक ही पहलु दिख रहा हो और उसके आलावा भी कुछ ऐसे तथ्य हों जो सही हों. इसलिए हमें अपनी बात तो रखनी चाहिए पर दूसरों की बात भी सब्र से सुननी चाहिए , और कभी भी बेकार की बहस में नहीं पड़ना चाहिए. वेदों में भी कहा गया है कि एक सत्य को कई तरीके से बताया जा सकता है. तो , जब अगली बार आप ऐसी किसी बहस में पड़ें तो याद कर लीजियेगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आपके हाथ में सिर्फ पूँछ है और बाकी हिस्से किसी और के पास हैं !!

Note::-
यदि आपके पास Hindi में कोई article, inspirational story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी Id है::- kmsraj51@yahoo.in . पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!


Krishna Mohan Singh(kmsraj51) –
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@@@@@ ::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) ….. @@@@@

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आत्म निरीक्षण ~ Intussusception ~ Motivational Hindi Story !!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..

kmsraj51 की कलम से …..
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आत्म निरीक्षण

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** आत्म निरीक्षण **

एक छोटा सा लड़का जो कि लगभग ११-१२ वर्ष का रहा होगा ,एक दवाई कि दुकान में गया और उसके मालिक से एक फ़ोन मिलाने कि आज्ञा ली.फिर उसने एक बड़ा सा बक्सा खिसकाया और उस पर चढ़ गया जिससे कि वह ऊपर रखे हुए फ़ोन तक पहुँच सके . दुकान का मालिक चुपचाप उस लड़के कि बातचीत सुनने लगा .बालक ने एक महिला को फ़ोन मिलाया और बोला , ” क्या आप मुझे अपना बगीचा और लॉन काटने का काम दे सकती हैं ?”

इस पर वह महिला फ़ोन के दूसरी ओर से बोली ,” मेरे लॉन कि कटाई का काम पहले से कोई कर रहा है . बालक , ” किन्तु ,मैं आपके लॉन कि कटाई का काम उससे आधे दाम पर करने के लिए तैयार हूँ .”

महिला , ” जो लड़का मेरे लॉन की कटाई का काम कर रहा है , मैं उसके काम से पूरी तरह संतुष्ट हूँ . ”

इस पर वह बालक ओर अधिक निश्चय पूर्वक बोला , ” मैं आप के लॉन के चारों ओर का रास्ता भी साफ़ कर दिया करूँगा ओर आप के घर के बाहर के शीशे
भी साफ़ कर दिया करूंगा .”

महिला बोली ,” नहीं , मुझे किसी की आवश्यकता नहीं है ,धन्यवाद ,” यह सुन कर वह बालक मुस्कुराया ओर उसने फोन रख दिया .”

दुकान का मालिक जो कि उस लड़के कि बातचीत सुन रहा था , उसकी ओर आया ओर बोला ,”बेटा ,मुझे तुम्हारा आत्मविश्वास ओर सकारात्मक दृष्टिकोण देख कर बहुत अच्चा लगा .

मुझे तुम्हे नौकरी पर रख कर वास्तव मैं ख़ुशी होगी .क्या तुम मेरे लिए काम करना पसंद करोगे ?”इस पर वह बालक बोला,”धन्यवाद,पर मैं कोई नौकरी नहीं करना चाहता .”

दुकान का मालिक बोला,” लेकिन , बेटा तुम तो अभी-अभी फोन पर नौकरी के लिए गिडगिडा रहे थे .”

इस पर बालक बोला,” नहीं महोदय , मैं तो केवल अपनी कार्यकुशलता का परीक्षण कर रहा था . दरअसल , जिस महिला को मैंने फोन किया था मैं उसी के लिए कार्य करता हूँ .”

वह आगे बोला,” ओर , उससे बात करने के पश्चात यह जान कर मुझे बहुत अधिक आत्मसंतोष मिल रहा है कि वेह महिला मेरे कार्य से पूर्ण रूप से संतुष्ट है .”

क्या हम लोग इस छोटे से बालक से आत्म निरीक्षण करने की प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं ?

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kmsraj51 ~ Photo

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***** ::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) ….. *****

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कथा एक राजकुमार की।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ कथा एक राजकुमार की। ϒ

एक था राजकुमार मितभाषी, सुन्दर, सुकुमार।
महलों में पला बढ़ा लोगों की नज़र में अत्यंत ईमानदार॥

तैंतालीस बसंत देख चुका। यह युवराज, राजगद्दी खाली, पर नहीं पहनता ताज। खुद को अभी नहीं समझता था उपुक्त। राज काज के झंझटों से था वह मुक्त। सारा राज-पाट बूढ़े मंत्री के कन्धों पर था। मंत्री था बड़ा वफ़ादार, था वो मंत्रियों का सरदार। एक दिन आखेट पर चला गया दूर तक साथ में मंत्री, सेवादार रथ, पालकी गाजे, बाजे बहुत-बहुत पहरेदार।  पहुँच गया सुदूर एक गांव मच गया हाहाकार राजकुमार आया, राजकुमार आया मच गया शोर हलचल चहु ओर, आनन् फानन में सभा बुलाई ढोल तमाशा, नाच-गाना, बढ़िया लज़ीज़ खाना।

राजकुमार मुखातिब हुए प्रजा से – बोलो भाई हमारे राज्य में कोई कष्ट हो तो बताओ खुल कर सुनाओ।

समवेत स्वरों में आवाज़ आई सरकार, हमलोगन गरीबी ते बहुतै दिक्क हन कौनो उपाय बतावा जाई।

युवराज को कुछ नहीं सूझा आँखों ही आँखों में सेवादार से पूछा और फुसफुसाहट भरी आवाज़ में बूझा फिर बाँहे समेट कर खड़े हुए और ज्ञान बघारा।

भई गरीबी तो केवल दिमाग की सोच है तुम लोग नाहक ही परेशान हो, मन में सोच लो तो सुखी इंसान हो।

यह सुनते ही पूरी सभा में सन्नाटा छा गया लोग तालियाँ बजाना भूल गए। कंठ रुंध गए चक्षुओ से अश्रुधार बह निकली।

सदिओं से जिस गरीबी को लेकर हमारे बाप-दादा, खून पसीना बहाते रहे, रहे पीढ़ियो तक परेशान। उसका समाधान कितना आसान।

मौक़ा देख सेवादारों ने आवाज़ लगाईं।

राजकुमार की जय हो !! युवराज की जय हो !!

भीड़ से आवाज़ आई युवराज की जय हो !! राजकुमार की जय हो !!

राज्य में सब सुखी थे लोगों के दिमाग से गरीबी ख़त्म हो गयी थी। तो क्या हुआ यदि लोग भूखों मर रहे थे। जवान बूढ़े लग रहे थे बूढ़े केवल ज़िंदा लाश थे। पर वो गरीब कतई नहीं थे।

तभी अचानक एक दिन कुछ सिर फिरों ने कहना शुरू किया। गरीबी के बारे में अनाप-शनाप बकना शुरू किया, कि हम गरीब इसलिए हैं क्योंकि ऊपर से भेजा हुआ पैसा, डाकू हड़प जाते है पूरा वैसे का वैसा।

लोगों ने कहा राजकुमार ने तो कुछ और ही बताया था। क्या राजकुमार को पता नहीं था?

सिरफिरों ने कहा उनको जरूर पता होगा। उनके परमपूज्य पिता श्री महाराजाधिराज ने एक बार गलती से बता दिया था।
कि सोलह आने में केवल दो आने ही जनता तक पहुँचते है बाकी सब डाकू लूट लेते हैं।

ये अलग बात है कि उन्होंने डाकुओं को कुछ नहीं कहा। उनकी इस साफगोई पर ही जनता गद्गद थी।

सिरफिरे ये भी कहने लगे कि काफी डाकू तो, मंत्रियो और दरबारिओं के कपड़े पहन कर अपनी बंदूके छुपा कर दरबारे ख़ास में हैं।

जनता को धीरे-धीरे विश्वास होने लगा। सिरफिरों को भी आभास होने लगा। लोग नंगे पैर, भूखे पेट चिथड़ो में लिपटे हुए।

राजधानी के चौक पर जमा हो गए, लम्बी-लम्बी तकरीरें बहुत सारे सुझाव।

सभी मंत्रियों दरबारियों की कपड़े उतरवाकर जांच हो। डाकुओं को पहचान कर बाहर निकाला जाए कुछ का कहना था। सारे मंत्रियों, दरबारियों को बर्खास्त किया जायें जितने मुह उतनी बातें।

लोगों का गुस्सा सरे आम हो गया, दरबारे ख़ास में कोहराम हो गया। सबने सिर से सिर मिलाकर मंत्रणा की चतुर मंत्रियों का गैंग बना।
सरकारी भोंपू से समझाया गया जनता को भरमाया गया।

ये सिरफिरे झूठ बोल रहे हैं इसमें विदेशी ताकतों का हाथ है। हम तो आपके साथ हैं। लोगों ने बूढ़े मंत्री की बात का भरोसा किया भीड़ छटने लगी। इस दौरान राजमाता विदेशी दौरे पर थीं युवराज कहीं दूर आखेट पर।

उनके लौटने तक सब शांत हो गया था डाकू खुश थे। चतुर मंत्रियों का गैंग मुस्कुरा रहा था, एक दुसरे की पीठ थप-थपा रहा था।

तभी अचानक राज्य के सबसे बुज़ुर्ग न्यायाधीश ने आदेश पारित कर दिया, कि जो भी डाकू रंगे हाथ डाका डालते हुए पकड़ा जाएगा, वो दरबारे ख़ास में नहीं बैठ पायेगा।

दरबारियों और मंत्रियों में गुस्सा था कुछ दरबारी भी दरबारे ख़ास को डाकुओं से मुक्त कराना चाहते थे और बहुत खुश थे बाकी सब नाखुश थे।

नाराज़ मंत्रियों, दरबारियों की संख्या बहुत ज्यादा थी। बूढ़े मंत्री की बात भी कोई सुन नहीं रहा था। राजकुमार सो रहा था। राजमाता का पता नहीं।

सब ने मिलकर हल निकाला। नया क़ानून बनायेंगे अपने डाकू भाइयों को बचायेंगे।

फिर क्या आनन्-फानन में अध्यादेश बनाया गया खूबसूरत शब्दों से सजाया गया। युवराज का अब भी पता नहीं शायद आखेट से लौट कर गहरी नींद में थे।

तभी राजकुमार ने सपने में देखा भारी भीड़ नंगे आदमी। चीथड़ो में लिपटी हुई औरतें बड़े पेट और पतली टांगों वाले बच्चे, आँखों में अंगारे, हाथो में बरछी, भाले, आरे।

राजकुमार की घिघ्घी बांध गयी बिस्तर छोड़ कर महल से नींद में ही भागे। रथ, सारथी, पहरेदार, सेवादार सब पीछे वो आगे।

बाहर पूरे राज्य में सारे मंत्री, दरबारी। जनता को डाकुओं के बारे में समझा रहे थे। डाकू समाज के लिए कितने जरूरी हैं ये बुझा रहे थे।
चोर उचक्के, छोटे मोटे मवाली आपको तंग नहीं कर सकते। अगर कोई सरकारी डाकू आपके संपर्क में है।

जनता फुसफुसाई लेकिन दरबारे ख़ास में। डाकुओं की नुमाइंदगी तो बहुत ज्यादा है मंत्री गुर्राए। उनका काम भी तो ज्यादा है हमारे लिए वो इतना करते हैं। क्या हम उनको इज्जत से दरबारे ख़ास में बैठा भी नहीं सकते।

जनता में सुगबुगाहट थी वो मंत्रियों की बात नहीं सुन रहे थे। सिरफिरे जनता को भड़का रहे थे डाकू हड़का रहे थे।

ऐसी सी ही एक सभा में युवराज हाँफते हांफते पहुचे। जनता, मंत्री, दरबारी सब खड़े हो गए युवराज अभी नींद में थे।
माथे पर पसीना लडखडाती आवाज़ उनको लग रहा था। चारों तरफ गरीबों की भीड़ है हथियारों से लैस।
युवराज का मुह सूख रहा था, मंत्री के हाथ से छीन कर अध्यादेश फाड़ दिया। जनता, मंत्री, दरबारी सब सन्न काटो तो खून नहीं थोड़ी देर तक छाया रहा सन्नाटा।

तभी चतुर मंत्रियों को कुछ याद आया सभी एक साथ चिल्लाये।

राजकुमार की जय !! युवराज की जय !!

पर इस बार भीड़ से एक भी आवाज़ नहीं आई। जनता चुप थी राजकुमार का सपना टूट चुका था, वो धीरे-धीरे थके हुए कदमों से अपने रथ की तरफ बढ़ रहा था, और भारत एक नया इतिहास गढ़ रहा था।

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We are grateful to my dear friend Mr. Rahul Jaiswal, for sharing this Inspirational Story in Hindi.

 

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Krishna Mohan Singh(KMS)
Editor in Chief, Founder & CEO
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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* अपनी आदतों को कैसे बदलें।

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* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

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 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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हम चिल्लाते क्यों हैं गुस्से में?

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..

kmsraj51 की कलम से …..
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एक बार एक संत अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। अचानक उन्होंने सभी शिष्यों से एक सवाल पूछा। बताओ जब दो लोग एक दूसरे पर गुस्सा करते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते क्यों हैं?

शिष्यों ने कुछ देर सोचा और एक ने उत्तर दिया : हम अपनी शांति खो चुके होते हैं इसलिए चिल्लाने लगते हैं।
संत ने मुस्कुराते हुए कहा : दोनों लोग एक दूसरे के काफी करीब होते हैं तो फिर धीरे-धीरे भी तो बात कर सकते हैं। आखिर वह चिल्लाते क्यों हैं?

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कुछ और शिष्यों ने भी जवाब दिया लेकिन संत संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने खुद उत्तर देना शुरू किया। वह बोले : जब दो लोग एक दूसरे से नाराज होते हैं तो उनके दिलों में दूरियां बहुत बढ़ जाती हैं। जब दूरियां बढ़ जाएं तो आवाज को पहुंचाने के लिए उसका तेज होना जरूरी है। दूरियां जितनी ज्यादा होंगी उतनी तेज चिल्लाना पड़ेगा। दिलों की यह दूरियां ही दो गुस्साए लोगों को चिल्लाने पर मजबूर कर देती हैं। वह आगे बोले, जब दो लोगों में प्रेम होता है तो वह एक दूसरे से बड़े आराम से और धीरे-धीरे बात करते हैं। प्रेम दिलों को करीब लाता है और करीब तक आवाज पहुंचाने के लिए चिल्लाने की जरूरत नहीं। जब दो लोगों में प्रेम और भी प्रगाढ़ हो जाता है तो वह खुसफुसा कर भी एक दूसरे तक अपनी बात पहुंचा लेते हैं। इसके बाद प्रेम की एक अवस्था यह भी आती है कि खुसफुसाने की जरूरत भी नहीं पड़ती। एक दूसरे की आंख में देख कर ही समझ आ जाता है कि क्या कहा जा रहा है।

शिष्यों की तरफ देखते हुए संत बोले : अब जब भी कभी बहस करें तो दिलों की दूरियों को न बढ़ने दें। शांत चित्त और धीमी आवाज में बात करें। ध्यान रखें कि कहीं दूरियां इतनी न बढ़े जाएं कि वापस आना ही मुमकिन न हो।

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स्वर्ग – Heaven – Hindi Inspirational Story

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Heaven – स्वर्ग

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एक यात्री अपने घोड़े और कुत्ते के साथ सड़क पर चल रहा था. जब वे एक विशालकाय पेड़ के पास से गुज़र रहे थे तब उनपर आसमान से बिजली गिरी और वे तीनों तत्क्षण मर गए. लेकिन उन तीनों को यह प्रतीत नहीं हुआ कि वे अब जीवित नहीं है और वे चलते ही रहे. कभी-कभी मृत प्राणियों को अपना शरीरभाव छोड़ने में समय लग जाता है.

उनकी यात्रा बहुत लंबी थी. आसमान में सूरज ज़ोरों से चमक रहा था. वे पसीने से तरबतर और बेहद प्यासे थे. वे पानी की तलाश करते रहे. सड़क के मोड़ पर उन्हें एक भव्य द्वार दिखाई दिया जो पूरा संगमरमर का बना हुआ था. द्वार से होते हुए वे स्वर्ण मढ़ित एक अहाते में आ पहुंचे. अहाते के बीचोंबीच एक फव्वारे से आईने की तरह साफ़ पानी निकल रहा था.

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यात्री ने द्वार की पहरेदारी करनेवाले से कहा:

“नमस्ते, यह सुन्दर जगह क्या है?

“यह स्वर्ग है”.

“कितना अच्छा हुआ कि हम चलते-चलते स्वर्ग आ पहुंचे. हमें बहुत प्यास लगी है.”

“तुम चाहे जितना पानी पी सकते हो”.

“मेरा घोड़ा और कुत्ता भी प्यासे हैं”.

“माफ़ करना लेकिन यहाँ जानवरों को पानी पिलाना मना है”

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यात्री को यह सुनकर बहुत निराशा हुई. वह खुद बहुत प्यासा था लेकिन अकेला पानी नहीं पीना चाहता था. उसने पहरेदार को धन्यवाद दिया और अपनी राह चल पड़ा. आगे और बहुत दूर तक चलने के बाद वे एक बगीचे तक पहुंचे जिसका दरवाज़ा जर्जर था और भीतर जाने का रास्ता धूल से पटा हुआ था.

भीतर पहुँचने पर उसने देखा कि एक पेड़ की छाँव में एक आदमी अपने सर को टोपी से ढंककर सो रहा था.

“नमस्ते” – यात्री ने उस आदमी से कहा – “मैं, मेरा घोड़ा और कुत्ता बहुत प्यासे हैं. क्या यहाँ पानी मिलेगा?”

उस आदमी ने एक ओर इशारा करके कहा – “वहां चट्टानों के बीच पानी का एक सोता है. जाओ जाकर पानी पी लो.”

यात्री अपने घोड़े और कुत्ते के साथ वहां पहुंचा और तीनों ने जी भर के अपनी प्यास बुझाई. फिर यात्री उस आदमी को धन्यवाद कहने के लिए आ गया.

“यह कौन सी जगह है?”

“यह स्वर्ग है”.

“स्वर्ग? इसी रास्ते में पीछे हमें एक संगमरमरी अहाता मिला, उसे भी वहां का पहरेदार स्वर्ग बता रहा था!”

“नहीं-नहीं, वह स्वर्ग नहीं है. वह नर्क है”.

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यात्री अब अपना आपा खो बैठा. उसने कहा – “भगवान के लिए ये सब कहना बंद करो! मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है कि यह सब क्या है!”

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आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा – “नाराज़ न हो भाई, संगमरमरी स्वर्ग वालों का तो हमपर बड़ा उपकार है. वहां वे सभी लोग रुक जाते हैं जो अपने भले के लिए अपने सबसे अच्छे दोस्तों को भी छोड़ सकते हैं.”

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(यह कहानी पाउलो कोएलो की किताब “The Devil and Miss Prym” से ली गयी है !!

Note ::- Lots of Thank`s पाउलो कोएलो

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आकाश में कितने तारे।

Kmsraj51 की कलम से…..

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◊ आकाश में कितने तारे। ◊

एक दिन ख्वाजा ने बीरबल को मूर्ख साबित करने के लिए बहुत सोच-विचार कर कुछ मुश्किल प्रश्न सोच लिए। उन्हें विश्वास था कि बादशाह के सामने उन प्रश्नों को सुनकर बीरबल के छक्के छूट जाएंगे और वह लाख कोशिश करके भी संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाएगा।

बादशाह अकबर अपने मंत्री बीरबल को बहुत पसंद करता था। बीरबल की बुद्धि के आगे बड़े-बड़ों की भी कुछ नहीं चल पाती थी। इसी कारण कई दरबारी बीरबल से जलते थे।

अकबर के एक खास दरबारी ख्वाजा सरा को अपनी विद्या और बुद्धि पर बहुत अभिमान था। बीरबल को तो वे अपने सामने निरा बालक और मूर्ख समझते थे। लेकिन दरबार में तो बीरबल की ही तूती बोलती थी।

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एक दिन ख्वाजा ने बीरबल को मूर्ख साबित करने के लिए बहुत सोच-विचार कर कुछ मुश्किल प्रश्न सोच लिए। उन्हें विश्वास था कि बादशाह के सामने उन प्रश्नों को सुनकर बीरबल के छक्के छूट जाएंगे और वह लाख कोशिश करके भी उत्तर नहीं दे पाएगा। फिर बादशाह मान लेगा कि ख्वाजा सरा के आगे बीरबल कुछ नहीं है।

ख्वाजा साहब अचकन-पगड़ी पहनकर दाढ़ी सहलाते हुए अकबर के पास पहुंचे और सिर झुकाकर बोले, ‘बीरबल बड़ा बुद्धिमान बनता है। आप भी उसकी लम्बी-चौड़ी बातों के धोखे में आ जाते हैं। मैं चाहता हूं कि आप मेरे तीन सवालों के जवाब पूछकर उसके दिमाग की गहराई नाप लें।’ ख्वाजा के अनुरोध पर अकबर ने बीरबल को बुलाया और उनसे कहा, ‘बीरबल! परम ज्ञानी ख्वाजा साहब तुमसे तीन प्रश्न पूछना चाहते हैं। क्या तुम उत्तर दे सकोगे?’ बीरबल बोले, ‘जहांपनाह! जरूर दूंगा। खुशी से पूछें।’ ख्वाजा साहब ने अपने तीनों सवाल लिखकर बादशाह को दे दिए। अकबर ने बीरबल से ख्वाजा का पहला प्रश्न पूछा, ‘संसार का केन्द्र कहां है?’ बीरबल ने तुरंत जमीन पर अपनी छड़ी गाड़कर उत्तर दिया, ‘यही स्थान चारों ओर से दुनिया के बीचों-बीच पड़ता है। ख्वाजा जी को विश्वास न हो तो वे फीते से सारी दुनिया को नापकर दिखा दें कि मेरी बात गलत है।’ अकबर ने दूसरा प्रश्न पूछा, ‘आकाश में कितने तारे हैं?’

बीरबल ने भेड़ मंगवाकर कहा, ‘इसके शरीर में जितने बाल हैं, उतने ही तारे आसमान में हैं। ख्वाजा साहब को सन्देह हो तो वे बालों को गिनकर तारों की संख्या से तुलना कर लें।’ अब अकबर ने तीसरा प्रश्न किया, ‘संसार की आबादी कितनी है?’ बीरबल ने कहा, ‘जहांपनाह! संसार की आबादी पल-पल घटती-बढ़ती रहती है, क्योंकि हर पल लोगों का मरना-जीना लगा रहता है। इसलिए यदि सभी लोगों को एक जगह इकट्ठा किया जाए तभी उन्हें गिनकर ठीक संख्या बताई जा सकती है।’ बादशाह बीरबल के उत्तरों से संतुष्ट हो गए, लेकिन ख्वाजा बोले, ‘ऐसे गोलमोल जवाबों से काम नहीं चलेगा जनाब!’ बीरबल बोले, ‘ऐसे सवालों के ऐसे ही जवाब होते हैं। ख्वाजा साहब से फिर कुछ बोलते नहीं बना।

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Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

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मेरू की मंजिल।

Kmsraj51 की कलम से…..

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◊ मेरू की मंजिल। ◊

मेरू को बचपन से ही पढ़ने का बहुत शौक था। उधर उसका छोटा भाई चीनू बिल्कुल उससे उलट। बिल्कुल न पढ़ना और खेलकूद में मस्त रहना। मेरू चीनू से उम्र में तीन साल बड़ी थी और नौवीं क्लास में पढ़ती थी। चीनू छठवीं क्लास में था। मेरू अपनी क्लास में हमेशा अव्वल आती थी। उसके मम्मी-पापा को उस पर बहुत गर्व था, लेकिन चीनू की तरफ से वे परेशान रहते थे। जब भी वे पेरेंट्स मीटिंग में जाते तो चीनू के न पढ़ने और शैतानी करने की ज्यादा शिकायतें मिलतीं। लेकिन चीनू में एक खास बात थी कि स्कूल में वह फुटबाल का अच्छा खिलाड़ी था। मेरू से क्लास के सभी टीचर खुश रहते थे, क्योंकि वह मेहनत से पढ़ाई करने के साथ-साथ स्कूल में समय-समय पर होने वाली गतिविधियों में भी खूब हिस्सा लेती थी।

एक बार एक अन्य स्कूल में एक साइंस क्विज का आयोजन हुआ, जिसमें हिस्सा लेने के लिए स्कूल से सिर्फ मेरू का ही नाम चुना गया। उस स्कूल में क्विज में हिस्सा लेने के लिए बहुत सारे स्कूलों से मेधावी बच्चे आये। शुरू में तो मेरू को डर लगा कि पता नहीं कैसे-कैसे प्रश्न पूछे जाएंगे। लेकिन जब क्विज शुरू हुआ तो उसका सब डर दूर हो गया और उसने सभी प्रश्नों के उत्तर बड़ी कुशलता व निर्भीकता के साथ दिये। अंत में उसे क्विज का विजेता घोषित किया गया। जब स्कूल प्रिंसिपल को पता चला कि मेरू ने क्विज प्रतियोगिता जीत ली है तो वह बहुत खुश हुईं। उन्होंने अपने स्कूल का नाम रोशन करने के लिए उसे सम्मानित किया।

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मेरू को साइंस विषय बहुत अच्छा लगता था। जब तक उसे साइंस का कोई टॉपिक समझ में नहीं आ जाता था, तब तक उसका वह पीछा नहीं छोड़ती थी। यही वजह थी कि उसे ही सभी जगह साइंस की होने वाली प्रतियोगिताओं में भेजा जाता। एक बार किसी प्रतियोगिता में उसे पूछा गया कि तुम बड़ा होकर क्या बनोगी, तो उसका जवाब था – साइंटिस्ट। उसने दसवीं क्लास में टॉप किया था। जब 11वीं में आई तो उसने साइंस स्ट्रीम ही चुनी। फिजिक्स व कैमिस्ट्री विषयों के होने वाले प्रयोगों में उसे बड़ा मजा आता था। जब क्लास के बच्चों को कोई बात समझ नहीं आती थी तो वह टीचर की अनुपस्थिति में खुद ही टीचर बन जाती थी।

एक बार स्कूल में एक नाटक का आयोजन किया गया। वह नाटक साइंस विषय पर ही आधारित था, जिसमें स्कूल के बच्चों को अभिनय करना था। उसमें एक साइंस टीचर का भी रोल था। उस रोल को निभाने की बात आई तो इसके लिए मेरू को चुना गया। मेरू प्रतिभाशाली तो थी ही और क्लास में अपने टीचर की अनुपस्थिति में टीचर बन जाती थी तो उसे यह रोल करना बड़ा आसान लगा। उसने यह रोल बखूबी निभाया। उस नाटक को देखने के लिए बड़े-बड़े अधिकारी व गण्यमान्य लोग आये थे। उनमें कुछ फिल्म व टेलीविजन के लोग भी शामिल थे। एक टीवी सीरियल के डायरेक्टर को मेरू साइंस की टीचर के रोल में बहुत पसंद आई।

वह दूसरे दिन प्रिंसिपल से मिले और मेरू के बारे में जानना चाहा। प्रिंसिपल ने मेरू को उनसे मिलाया तो वह उससे बहुत प्रभावित हुए। वह बहुत दिन से ऐसी ही एक बाल कलाकार की खोज में थे, जो उन्हें मेरू के रूप में दिखाई दे गयी थी। उन्होंने उसी समय उसे अपने एक नये टीवी सीरियल में अभिनय करने का ऑफर दे दिया। प्रिंसिपल ने भी अपनी सहमति जताई। यह सुनकर मेरू को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि उसे टीवी सीरियल में काम करने का ऑफर मिल सकता है। पर दूसरी तरफ उसका मन तो साइंस पढ़ने और एक बड़ी साइंटिस्ट बनने का था। उसने सोचा कि अगर वह टीवी सीरियल में काम करने लगेगी तो उसकी पढ़ाई का क्या होगा। और उस सपने का क्या होगा, जिसे उसे साकार करना है, क्योंकि सीरियल करने पर वह अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पाएगी।

जब पढ़ेगी ही नहीं तो आगे कैसे बढ़ेगी? यह सोच उसने सीरियल के डायरेक्टर को यह कहकर मना कर दिया कि उसका सबसे पहला उद्देश्य पढ़ाई करके साइंटिस्ट बनना है। यह बात सुनकर प्रिंसिपल बहुत खुश हुईं, पर सीरियल के डायरेक्टर के ज्यादा आग्रह करने पर और कुछ अपनी मम्मी-पापा के कहने पर मेरू ने हां तो कर दी, पर एक शर्त रखी कि अगर उसकी पढ़ाई में कोई बाधा न आए तो वह सीरियल में एक्टिंग के लिए तैयार है। सीरियल डायरेक्टर ने कहा कि वह पढ़ाई के लिए उसे पूरा समय देंगे और उन्होंने प्रिंसिपल से भी आग्रह किया कि वह मेरू को पूरा सहयोग करें। चार महीने में सीरियल की शूटिंग पूरी हुई। लेकिन इस बीच मेरू की पढ़ाई का रुटीन कुछ गड़बड़ा गया। वह पढ़ाई में पिछड़ गई थी, क्योंकि जो समय वह सीरियल करने से पहले पढ़ाई में देती थी वह समय देना सीरियल करने पर मुमकिन नहीं था। उसने अच्छे से शूटिंग पूरी कर ली थी। लेकिन अब उसे अपनी पढ़ाई पूरी करनी थी, जिसके लिए उसके सभी टीचरों ने उसे पूरा सहयोग किया।

मेरू को 11वीं में बहुत मेहनत करनी पड़ी। उसका हौसला बुलंद था। उसके अच्छे मार्क्स आए। जब 12वीं में आई तो स्कूल की ओर से उसे अमेरिका जाने का मौका मिला। वहां उसने एक साइंस प्रोग्राम में हिस्सा लिया। वह अब ऐसी सीढियों पर चढ़ गई थी, जो उसे साइंटिस्ट बनने की मंजिल पर ले जा रही थीं।

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