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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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poet vivek kumar poems

सुरों की मल्लिका को नमन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सुरों की मल्लिका को नमन। ♦

सुरों की साज और तेरा काज,
मां शारदे का हाथ और तेरा राज,
समझ न पाएं हम मूढ़ आज,
सहसा दिल पर गिरा गाज,
दिल रो रहा तेरी याद में होकर मगन,
सुरों की मल्लिका को शत-शत नमन॥

स्वर भी जिसका करता गुणगान,
वो कोई और नहीं थी इंसान,
हमारी लता जी थी वो महान,
गायिकी से जिसने बढ़ाया देश का मान,
दिल रो रहा तेरी याद में होकर मगन,
सुरों की मल्लिका को शत-शत नमन॥

कला जगत की तुम थी सिरमौर,
नहीं था तुम्हारा कोई जोर,
लता दीदी तुम थी बेजोड़,
आपके जादू का नहीं था कोई तोड़,
दिल रो रहा तेरी याद में होकर मगन,
सुरों की मल्लिका को शत-शत नमन॥

जिनके गीत से झूमी दुनिया सारी,
तुम लता जी अमिट पहचान हो हमारी,
गाए आपके गीत प्रेरणा देती तुम्हारी,
कोई न कर सकता तुम्हारी बराबरी,
दिल रो रहा तेरी याद में होकर मगन,
सुरों की मल्लिका को शत-शत नमन॥

हमारे दिल की धड़कन हो तुम,
तेरा यूं जाना गम देगा हरदम,
तेरे समर्पण को सजदा करते है हम,
अपूरणीय क्षति से हमारे साथ स्तब्ध है सरगम,
दिल रो रहा तेरी याद में होकर मगन,
सुरों की मल्लिका को शत-शत नमन॥

हमारे दिल की धड़कन हो तुम,
तेरा यूं जाना गम देगा हरदम,
तेरे समर्पण को सजदा करते है हम,
अपूरणीय क्षति से हमारे साथ स्तब्ध है सरगम,
दिल रो रहा तेरी याद में होकर मगन,
सुरों की मल्लिका को शत-शत नमन॥

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

मेरे प्रिय पाठकों आपको सपरिवार बसंत पंचमी की शुभकामनाएं।-KMSRAJ51

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — मां शारदे का उन पर था अनमोल वरदान, वीणापाणी मां के सर्वस्व संरचना में अनमोल संरचना थी हमारी लता जी। स्वर भी जिसका करता गुणगान, वो कोई और नहीं थी इंसान, हमारी लता जी थी वो महान, गायिकी से जिसने बढ़ाया देश का मान। कला जगत की तुम थी सिरमौर, नहीं था तुम्हारा कोई जोर, लता दीदी तुम थी बेजोड़। लता मंगेशकर (28 सितंबर 1929 – 6 फ़रवरी 2022) भारत की सबसे लोकप्रिय और आदरणीय गायिका थीं, जिनका छः दशकों का कार्यकाल उपलब्धियों से भरा पड़ा है। हालाँकि लता जी ने लगभग तीस से ज्यादा भाषाओं में फ़िल्मी और गैर-फ़िल्मी गाने गाये हैं लेकिन उनकी पहचान भारतीय सिनेमा में एक पार्श्वगायिका के रूप में रही है।

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यह कविता (सुरों की मल्लिका को नमन।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बालमन के घुंघरू चाचा नेहरू।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बालमन के घुंघरू चाचा नेहरू। ♦

निश्छल निर्मल स्वर्ण धरा पर,
कोमल संग मुस्कान लिए।
कच्ची मिट्टी सा मन है जिसका,
भविष्य जिसके भाल है।
नव निर्माण का जो आधार,
जिसके मन भांप बजाते थे थमरू।
बालमन के घुंघरू वही थे चाचा नेहरू॥

बहुत सारे दिवस है आते,
बालमन को कोई कोई पहचाने।
मासूमियत भरी जिनकी निगाहें,
नटखट निराली बोली जिनकी।
सत्य की जो ईश्वरत्व आधार,
जिसके मन भांप बजाते थे डमरू।
बालमन के घुंघरू वही थे चाचा नेहरू॥

बच्चों संग बच्चे बन जाते,
भावनाओं का करते सम्मान।
प्रथम नागरिक के समान,
उनकी महिमा का कैसे करें बखान।
बच्चों के लिए हर पल करते जतन,
जिसके मन भांप बजाते थे डमरू।
बालमन के घुंघरू वही थे चाचा नेहरू॥

बच्चे है ईश्वरत्व की अनमोल देन,
मौलिक अधिकार है उनका हक।
फिर क्यूं मिलता नहीं वाजिब हक,
नेहरू जी ने उसे पहचाना।
उनके अधिकार दिलाने हेतु थे प्रतिबद्ध,
जिसके मन भांप बजाते थे डमरू।
बालमन के घुंघरू वही थे चाचा नेहरू॥

भावी पीढ़ी के कर्णधार,
शिक्षा मिले सभी को समान अधिकार।
बाल शोषण का सब मिलकर करें काम तमाम,
बच्चें करेंगे स्वछंद विहार।
तभी सपने होंगे साकार,
जिसके मन भांप बजाते थे डमरू।
बालमन के घुंघरू वही थे चाचा नेहरू॥

बाल दिवस पर आज करें विचार,
सब मिलकर बनाएं सुदृढ संसार।
ऐसा बनाएं चमन नाचे गाएं होकर मगन,
बच्चे मन के सच्चे, सारी जग की आंखों के तारे।
वो नन्हें फूल खिले भगवान को लगते प्यारे,
जिसके मन भांप बजाते थे डमरू।
बालमन के घुंघरू वही थे चाचा नेहरू॥

आप सभी को प्रेम पूर्वक तहे दिल से बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — बच्चे मन के सच्चे होते है, वे कुम्हार के चाक पर रखे मिट्टी के समान होते है, उन्हें जैसा ढालना चाहे ढाल सकते हैं। बच्चों को संस्कारवान, परोपकारी व दया, प्रेम, धैर्य के गुणों से सिंचित करना चाहिए, क्योंकि किसी भी देश का भविष्य उस देश के बच्चों पर ही निर्भर होता हैं। बच्चे आने वाले कल के सूत्रधार है। बच्चों पर कभी भी क्रोध नहीं करना चाहिए, यदि बच्चे कोई गलती करे तो उन्हें प्यार से समझा दे। कभी भी उनकी पिटाई न करे, पिटाई करने से उनके मन में आपके प्रति घृणा का भाव उत्पन्न होने लगता है, ऐसे बच्चे आगे चलकर बहुत ही गलत कदम उठाने लगते हैं। अतः सदैव ही बच्चों को प्रेम से ही समझाना चाहिए, जिससे वो समझ भी जाए, और उनके बाल मन पर कोई बुरा प्रभाव भी न पड़े।

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यह कविता (बालमन के घुंघरू चाचा नेहरू।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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हे छठी मईया भर द झोलिया हमार।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हे छठी मईया भर द झोलिया हमार। ♦

आस्था और विश्वास का, सबसे अनूठा पर्व,
कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को आता, यह महापर्व।
षष्ठी तिथि के कारण इसे, कहा जाता छठ, होता है गर्व,
मनोवांछित फल पाने की लालसा में, व्रती करती सब्र।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

चार दिनों का यह पावन पर्व, अतुल्य अनमोल,
साक्षात ईश्वर के दर्शन का, बड़ा ही है मोल।
नहाय खाय से इस व्रत का, होता है आगाज,
दिल में लिए समर्पण भाव, व्रती करती काज।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

चार दिनों के पर्व में पहला दिन, होता काफी अहम,
घर की साफ सफाई से हर व्रती, शुरू करती काम।
कद्दू की सब्जी का उस दिन, महत्तम है अपार,
सबसे बड़े इस पर्व की महिमा है अपरम्पार।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

पर्व का दूसरा दिन खरना या लोहंडा काफी खास,
इस दिन व्रती करती पूर्ण उपवास।
बड़े निर्मल मनोभाव से बनाती प्रसाद, लेकर आस,
सूर्यदेव को नैवैद्य दे, करती एकांतवास।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

36 घंटों के व्रत के तीसरे दिन, पूरी होती मुराद,
मिलन की आस, संध्या अर्घ्य देती, संग प्रसाद।
प्रसाद में ठेकुआ, इस पर्व को बनाता खास,
सभी व्रती सूर्यदेव की कर पांच परिक्रमा, नमाती शीश।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

महापर्व का अंतिम दिन सूर्योपासना के बाद,
उषा अर्घ्य दे पूर्ण करती व्रत, उठाकर प्रसाद।
कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए,
प्रसिद्ध लोकगीत, हर छठ व्रती गुनगुनाती जाए।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

अंत में इस पर्व का विशेष महत्व, सुने सज्जन जन,
ऐसी मान्यता है अपार, व्रत करे जो सच्चे मन।
छठी मईया पूरी करती, मन में हो जो जतन,
मुरादे होती पूरी, होता जग का कल्याण।
इसलिए व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — छठी मैया का व्रत को कैसे करना है? छठी मैया का व्रत करने से अनादि काल से ही लोगों को सूर्यदेव से मन चाहा फल मिलता आया है। समय समय पर जिस किसी ने भी सच्चे मन से छठी मैया का व्रत रख कर सूर्य देव की आराधना की है उसे जरूर मनोवांछित फल मिलता है। इस व्रत को कुवारी कन्या नहीं रख सकती। जिस जिस ने पूजा सच्चे मन से सूर्य देव को किया उनका कल्याण सूर्य देव ने। आओ मिलकर सूर्य भक्ति में छठ की अलख जगायें। करें वंदना चार दिनों तक, दो दिन नमक न खाएं। अस्ताचलगामी सूर्य देव को अर्घ्य प्रथम चढ़ाएं। होते सवेरे दूसरे दिन फिर जाकर सूरज को मनाए।

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यह कविता (हे छठी मईया भर द झोलिया हमार।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली। ♦

दो शब्दों की दिवाली लाती घर-घर खुशहाली,
दीप से दीपक बना श्रृंखला बनाती आवली।
खुशियों से दामन भर जाती भरकर थाली,
मन की तरंगे संग मिल जाती होती मतवाली।
दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली॥

दिवाली तमस मिटाती घनघोर घटा काली,
मन में फैले अंधियारों को दूर भगाने वाली।
राम का सत्कर्म सत्य की आभा दिखलाती,
जन-जन को संदेश है देती असत्य है नाली।
दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली॥

तमसो मा ज्योतिर्गमय: है बताती दीपावली,
दीपों की चमक से जगमगाती अमावस्या की काली।
दिवाली बुराई पर अच्छाई की जीत बतलाती,
अज्ञानता पर ज्ञान और निराशा पर आश है लाती।
दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली॥

हमारा मन खाली रहता है हम करते काली,
अगर हमें चाहिए हर घर सुख शांति वाली।
मन के काली को इस दिवाली करनी होगी लाली,
सबके घर लक्ष्मी मईया भरकर देंगे झोली।
दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली॥

दीप से दीप मिले बन जाती एकता निराली,
मन से मन आज मिल जाए बजेंगी सद्भावना की ताली।
हर दिल को साफ करती है हमारी दिवाली,
आज मिलकर प्रण करें मिटायेगे दिलों की काली।
दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली॥

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — संस्कारों का, धैर्य का, इंसानियत, ईमानदारी व भाईचारे के लिए भी एक ज्योत जगा लो। हम सब जानते है की सदैव से ही त्याग का प्रतीक है दीप और सत्य की मशाल है दीप। अपने मन मंदिर में एक दीप जला लो, सुकून का एक ज्योत जगा लो। दिवाली तमस मिटाती घनघोर विकारों वाली घटा काली, सदैव से ही मन में फैले अंधियारों को दूर भगाने वाली दिवाली। राम का सत्कर्म सत्य की आभा दिखलाती ये दिवाली, जन-जन को संदेश है देती असत्य है समान नाली के, दिवाली बुराई पर अच्छाई की जीत बतलाती, अज्ञानता पर ज्ञान और निराशा पर आश है लाती। मन के इस काली को इस दिवाली करनी होगी लाली, सबके घर लक्ष्मी मईया भरकर देंगे झोली। हर दिल को साफ करती है हमारी दिवाली, आज मिलकर प्रण करें मिटायेगे दिलों की काली। दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली।

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यह कविता (दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जगमग जगमग दीप जले।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जगमग जगमग दीप जले। ♦

जगमग जगमग दीप जले।
अब न कहीं अंधियार पले।

पुन: अयोध्या आए राम,
बनी अयोध्या तीरथ धाम।
मुदित मगन सब धावत आए,
जिव्हा पे सबकी एक ही नाम।

जगमग जगमग दीप जले,
अब न कहीं अंधियार पले।

आ गए राघव मिली खबरिया,
सज गई सारी अवध नगरिया।
राम दरस पावे की ख़ातिर,
चढ़ गए सारे महल अटरिया।

जगमग जगमग दीप जले,
अब न कहीं अंधियार पले।

गुरु, माता सब नगर के वासी,
केवल दर्शन के अभिलाषी।
सारे दुख सब संताप मिटे,
डालें कृपादृष्टि अविनाशी।

जगमग जगमग दीप जले,
अब न कहीं अंधियार पले।

दिन अमावस प्रकाश सवेरा,
सघन तिमिर दीपों का डेरा।
हर मुँडेर पे दीपमालिका,
हो न पाया तम का बसेरा।

जगमग जगमग दीप जले,
अब न कहीं अंधियार पले।

दिवस आज का बहुत पुनीत,
हुई थी सच की झूँठ पर जीत।
मिला राम को राज अवध का,
नगर सुसज्जित, मंगल गीत।

जगमग जगमग दीप जले,
अब न कहीं अंधियार पले।

दीपोत्सव का पर्व है प्यारा,
पाँच दिवस का उत्सव न्यारा।
हर द्वारे पर नेह प्रेम का,
प्रेषित मंगलदीप हमारा।

जगमग जगमग दीप जले,
अब न कहीं अंधियार पले।

हर घर में आए ख़ुशहाली,
गूँजे बच्चों की किलकारी।
माता लक्ष्मी की मिले कृपा,
सबकी सुन्दर हो दीवाली।

जगमग जगमग दीप जले,
अब न कहीं अंधियार पले।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

—————

  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — श्री राम जी के अयोध्या लौटकर आने पर पुनः अयोध्या वासियों का खुशी का कोई ठिकाना नहीं। इस मधुर ख़ुशी के उपलक्ष में अयोध्या वासी दीप जलाकर दीपावली प्रकाश पर्व मनाया। पूरी अयोध्या जगमग जगमग दीप से जल उठे, चारो तरफ प्रकाश ही प्रकाश फैल गया। हर घर में आए ख़ुशहाली, गूँजे बच्चों की किलकारी। माता लक्ष्मी जी की मिले कृपा सभी को सबकी सुन्दर हो दीवाली। सभी ख़ुशी में मंगल गीत गाए।

—————

यह कविता (जगमग जगमग दीप जले।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी मुक्तक/कवितायें/गीत/दोहे/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई आई टी . शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक. समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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मिट्टी का दिया।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मिट्टी का दिया। ♦

अरमानों की साज सजा लो,
हर घर को तुम सजा धजा लो।
अपने मन मंदिर में एक दीप जला लो,
सुकून का एक ज्योत जगा लो।
धैर्य का तुम आस जगा लो,
मिट्टी के तुम दिए जला लो।
मिट्टी के तुम दिए जला लो॥

त्याग का प्रतीक है दीप,
सत्य की मशाल है दीप।
खुद जलकर औरों को करता रौशन,
खुशहाली का राग है दीप।
दिलवालों का प्यार है दीप,
मन मंदिर में इसे बसा लो।
मिट्टी के तुम दिए जला लो॥

ईमानदारी का झंडा दो गाड़,
इसके लिए एक दीप जला लो।
भाईचारे की कर लो बात,
चुपके से एक दीप जला लो।
इंसानियत का जब हो भान,
इसके लिए भी दीप जला लो।
मिट्टी के तुम दिए जला लो॥

मन का तमस आज भगा लो,
भाग दौड़ भरी जिंदगी में,
सुकून के एक दीप जला लो,
संस्कारों को तुम अपना लो।
सुख शांति जीवन में आएं,
सबके लिए एक दीप जला लो।
मिट्टी के तुम दीए जला लो॥

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — संस्कारों का, धैर्य का, इंसानियत, ईमानदारी व भाईचारे के लिए भी एक ज्योत जगा लो। हम सब जानते है की सदैव से ही त्याग का प्रतीक है दीप और सत्य की मशाल है दीप। अपने मन मंदिर में एक दीप जला लो, सुकून का एक ज्योत जगा लो। मिट्टी के तुम दिए जला लो।

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यह कविता (मिट्टी का दिया।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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