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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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You are here: Home / Archives for वेद स्मृति ‘कृति’ जी की कविताएं

वेद स्मृति ‘कृति’ जी की कविताएं

योग।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ योग। ♦

योग दिवस।

चंचल मन के सब रोग हरें,
आओ मिल कर हम योग करें।

राग, कलुषता आने न पाये,
शुचिता मन से जाने न पाये।
श्वास नियन्त्रण करके अभी से,
तन-मन दोनों स्वस्थ बनाएँ।

योगी सम सारे भोग करें,
आओ मिलकर हम योग करें।

वायु प्रदूषित जल भी प्रदूषित,
धरती का कण-कण है प्रदूषित।
दूषित वातायन की वजह से,
मन भी भीतर से है प्रदूषित।

सद्भावों से संयोग करें,
आओ मिलकर हम योग करें।

योग प्रथा अपनाएँ पुनः सब,
जीवन सुखमय अपना बने तब।
योग हमारी प्राचीन थाती,
मन से भी बलशाली बनें अब।

जीवन का सद् उपयोग करें,
आओ मिलकर हम योग करें।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

—————

  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — योग आकाश के नीचे लगभग किसी भी बीमारी को ठीक कर सकता है। वास्तव में यह कहना उचित होगा कि यदि आप प्रतिदिन योग का अभ्यास करते हैं तो आप सभी रोगों से मुक्त रह सकते हैं। योग एक कला है जो हमारे शरीर, मन और आत्मा को एक साथ जोड़ता है और हमें मजबूत और शांतिपूर्ण बनाता है। योग आवश्यक है क्योंकि यह हमें फिट रखता है, तनाव को कम करने में मदद करता है और समग्र स्वास्थ्य को बनाए रखता है और एक स्वस्थ मन ही अच्छी तरह से ध्यान केंद्रित करने में सहायता कर सकता है। योग के अभ्यास की कला व्यक्ति के मन, शरीर और आत्मा को नियंत्रित करने में मदद करती हैं। यह भौतिक और मानसिक संतुलन कर के शान्त शरीर और मन प्राप्त करवाता हैं। तनाव और चिंता का प्रबंधन करके आपको राहत देता हैं। यह शरीर में लचीलापन, मांसपेशियों को मजबूत करने और शारीरिक स्वास्थ्य को बढ़ाने में भी मदद करता हैं।

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यह कविता (योग।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी मुक्तक/कवितायें/गीत/दोहे/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई आई टी . शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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जगमग जगमग दीप जले।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जगमग जगमग दीप जले। ♦

जगमग जगमग दीप जले।
अब न कहीं अंधियार पले।

पुन: अयोध्या आए राम,
बनी अयोध्या तीरथ धाम।
मुदित मगन सब धावत आए,
जिव्हा पे सबकी एक ही नाम।

जगमग जगमग दीप जले,
अब न कहीं अंधियार पले।

आ गए राघव मिली खबरिया,
सज गई सारी अवध नगरिया।
राम दरस पावे की ख़ातिर,
चढ़ गए सारे महल अटरिया।

जगमग जगमग दीप जले,
अब न कहीं अंधियार पले।

गुरु, माता सब नगर के वासी,
केवल दर्शन के अभिलाषी।
सारे दुख सब संताप मिटे,
डालें कृपादृष्टि अविनाशी।

जगमग जगमग दीप जले,
अब न कहीं अंधियार पले।

दिन अमावस प्रकाश सवेरा,
सघन तिमिर दीपों का डेरा।
हर मुँडेर पे दीपमालिका,
हो न पाया तम का बसेरा।

जगमग जगमग दीप जले,
अब न कहीं अंधियार पले।

दिवस आज का बहुत पुनीत,
हुई थी सच की झूँठ पर जीत।
मिला राम को राज अवध का,
नगर सुसज्जित, मंगल गीत।

जगमग जगमग दीप जले,
अब न कहीं अंधियार पले।

दीपोत्सव का पर्व है प्यारा,
पाँच दिवस का उत्सव न्यारा।
हर द्वारे पर नेह प्रेम का,
प्रेषित मंगलदीप हमारा।

जगमग जगमग दीप जले,
अब न कहीं अंधियार पले।

हर घर में आए ख़ुशहाली,
गूँजे बच्चों की किलकारी।
माता लक्ष्मी की मिले कृपा,
सबकी सुन्दर हो दीवाली।

जगमग जगमग दीप जले,
अब न कहीं अंधियार पले।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

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  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — श्री राम जी के अयोध्या लौटकर आने पर पुनः अयोध्या वासियों का खुशी का कोई ठिकाना नहीं। इस मधुर ख़ुशी के उपलक्ष में अयोध्या वासी दीप जलाकर दीपावली प्रकाश पर्व मनाया। पूरी अयोध्या जगमग जगमग दीप से जल उठे, चारो तरफ प्रकाश ही प्रकाश फैल गया। हर घर में आए ख़ुशहाली, गूँजे बच्चों की किलकारी। माता लक्ष्मी जी की मिले कृपा सभी को सबकी सुन्दर हो दीवाली। सभी ख़ुशी में मंगल गीत गाए।

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साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
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भगवान धन्वन्तरि – धनतेरस।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भगवान धन्वन्तरि – धनतेरस। ♦

आयुर्वेद के हैं प्रणेता,
धनतेरस अवतरण दिवस।
समुद्र मन्थन की समाप्ति पर,
हुए प्रकट ले अमृत – कलश।

देवराज ने की जो विनती,
आग्रह उनका मान लिया।
अमृत कलश से सब देवों ने,
अमृत सुधा का पान किया।

दीर्घतथा माता हैं उनकी,
लिखा है विष्णु पुराण में।
श्यामवर्ण चतुर्भुज हैं निपुण,
वनस्पतियों के ज्ञान में।

विनीत भाव से बोले इन्द्र,
आयुदाता भगवान से।
स्वीकार करो पद देव – वैद्य,
हे… तेजपुंज सम्मान से।

कालक्रम में मानव जगत के,
बहु रोगों से पीड़ित हुए।
कल्याण हेतु सकल जगत के,
वे धरा पर अवतरित हुए।

अवतार लिया काशी नगरी,
कहलाए नृप दिवोदास।
लिखा ग्रन्थ ‘धन्वन्तरि संहिता’,
रोग निवृत्ति का इतिहास।

आदि आचार्य सुश्रुत मुनि ने,
उनसे ज्ञान प्राप्त किया।
धन्वन्तरि से हो कर दीक्षित,
लोगों का कल्याण किया।

धनतेरस की तिथि है पावन,
श्रद्धा से सम्मान करें।
प्रसन्न हों भगवान सभी पर,
तन निरोगी, प्रदान करें।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

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  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वन्तरि हैं। यूं तो प्राचीन काल से ही आयुर्वेद में जटिल से जटिल रोगों का इलाज होता आया है। और तो और कोविड काल में हर व्यक्ति आयुर्वेद के महत्व से भी अच्छे परिचित हो गया। आयुर्वेदिक दवा स्वर्णप्राशन को तो स्वयं आयुष मंत्रालय ने रिसर्च के बाद कोविड में बच्चों के इलाज में सर्वाधिक इम्युनिटीवर्धक घोषित भी किया और लोगों को इससे लाभ भी हुआ।

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यह कविता (भगवान धन्वन्तरि – धनतेरस।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी मुक्तक/कवितायें/गीत/दोहे/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई आई टी . शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक. समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
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करवा चौथ।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ करवा चौथ। ♦

भले सारी दुनिया के लिए आम हूँ मैं,
मगर कोई है जिसके लिए ख़ास हूँ मैं।
लगाई है मेंहदी उनके नाम की आज मैंने,
जिनकी धड़कनों में बसा अहसास हूँ मैं।

मेरा दिन भर भूखे रहना उनके लिए सजा है,
किन्तु मेरे लिए इस भूख का अपना मज़ा है।
ये मेरे निश्चल प्रेम की अभिव्यक्ति का है ढंग,
इसलिए मेरी रजा में ही शामिल उनकी रजा है।

मेरा दिन भर कुछ न खाना – पीना भाता नहीं उन्हें,
अपने तर्कों से बार – बार व्रत की समीक्षा वो करते हैं।
शाम ढलते ही टकटकी लगाकर देखते हैं आसमान को,
मुझसे ज़्यादा आतुरता से चाँद की प्रतीक्षा वो करते हैं।

सुहागिनों के गजरे को छूकर बयार महक जाती है,
देख सँवरी सजनी सजना की तबियत बहक जाती है।
चूड़ी खनके, पायल छनके, माथे पर दमके बिंदिया,
पंछी सम कलरव कर सनम की चाहत चहक जाती है।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

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  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस मुक्तक/कविता में समझाने की कोशिश की है — पति-पत्नी के पवित्र रिश्ते को और अधिक मजबूती देने वाले पर्व करवा चौथ के बारे में विस्तार से बताया है। तेरी चंद्र कलाओं से भी सुंदर, सजने का इनका सलीका होगा। चाँद और नारी के गुणों व पति के प्यार संग सोलह श्रृंगार का सुंदर मधुर वर्णन किया है। पति-पत्नी एक दूसरे के पूरक होते है इसलिए संगनी का आधार, पिया का गुरुर, बनाता संबंध मजबूत। एक दूसरे का कर सम्मान, अर्धनारीश्वर यही कराता भान, जीवन संगनी के प्यार से संघर्षमय जीवन, हो जाता आसान। सुहागिनों के गजरे को छूकर बयार महक जाती है, देख सँवरी सजनी सजना की तबियत बहक जाती है।

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यह मुक्तक/कविता (करवा चौथ।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी मुक्तक/कवितायें/गीत/दोहे/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

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दुर्गा स्तुति।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दुर्गा स्तुति। ♦

हे ! सिंह वाहिनी माँ दुर्गे,
दरश मुझे भी दे जाना।
शैलपुत्री अवतार ले कर,
वृष वाहन पर आ जाना।

तेरे वृषभारुणा रूप को,
शत – शत वन्दन है।
कृपा करो माँ तपचारिणी,
जग में भीषण क्रन्दन है।

कर में जो सिद्ध कमंडल है,
पावन जल छिड़का जाना।
हे ! सिंह वाहिनी माँ दुर्गे,
दरश मुझे भी दे जाना।

दश भुजाओं में शस्त्र लेकर,
चंद्रघंटा रूप धारा।
इसी रूप में अम्बे तूने,
दानव महिषासुर मारा।

सुधा कलश धात्री कूष्मांडा,
यश, आयुष माँ दे जाना।
हे ! सिंह वाहिनी माँ दुर्गे,
दरश मुझे भी दे जाना।

कमलासना है रूप पंचम,
पुत्र स्कंद की माता हो।
मनभावन माँ दर्शन तेरा,
मंगल, मोक्ष प्रदाता हो।

माँ कात्यायनी, महागौरी,
सिद्धि प्रदाता आ जाना।
हे ! सिंह वाहिनी माँ दुर्गे,
दरश मुझे भी दे जाना।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

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  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — माता रानी के प्रत्येक रूपों का वर्णन करते हुए … माँ दुर्गा का स्तुति की है। माता रानी के प्रत्येक रूप व गुणों, शक्तियों और आसन, वाहन का मनोरम वर्णन किया है। ॥ प्रेम से बोलो जय माता दी ॥

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यह कविता (दुर्गा स्तुति।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/गीत/दोहे/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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माँ दुर्गा और बेटियां।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ दुर्गा और बेटियां। ♦

आया नवरात्री का त्योहार,
फिर सजा अम्बे का दरबार।
देख बिलखती बेटियाँ, एक,
नैन से नीर बहा दूजे से अंगार।

करुण स्वर में करती पुकार,
आयी एक बेटी माँ के द्वार।
बोली मत भेजो मुझे धरा पर,
कर दो मुझ पे ये उपकार।

दंश गिद्ध का सहूँ मैं कैसे ?
दानव जग में रहूँ मैं कैसे ?
बर्बरता की कथा शब्दों में,
बोलो माँ कहूँ मैं कैसे ?

या तुम रहो मम सह,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै
नमो नमः।
सुन कर पुत्री की करूँ कथा,
शेरा वाली ने उस से कहा…

—•—

चूड़ियाँ उतार कर शक्ति का आवाह्न कर ,
अंतस में झाँक अब स्वयं की पहचान कर।

मदद को पुकार नहीं शक्ति रूप धार तू ,
सभी दानवों का अब स्वयं कर संहार तू।

हर शुम्भ निशुम्भ की बन के काल सर्पिणी,
ले त्रिशूल हाथ में तू है शक्ति रूपिणी।

न दिखा स्व वेदना अब सिंह सी हुंकार भर,
जगा शक्ति रूप को फिर प्रचंड प्रहार कर।

धड़ से अब कर अलग वहशियों के भाल को,
दुर्योधनों के रक्त से धरा अब लाल हो।

महिषमर्दिनी सम अब तेरी ललकार हो,
दरिन्दों के रक्त से अब भारती का श्रृंगार हो।

जो तुझे मान दे उसे नेह नीर दे,
जो तुझे पीर दे अंग उसके चीर दे।

असुरों का नाश कर अपने प्रखर ओज से,
वसुधा भी मुक्त हो पापियों के बोझ से।

त्राहि माम त्राहि माम कहें रक्तबीज सब,
देखें तुझे सुसज्जित आयुधों के संग जब।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

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  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — सुन कर पुत्री की करूँ कथा, शेरा वाली ने उस से कहा… अब ना सहो तुम अत्याचार, शक्ति रूप धारण कर सभी दानवों का अब स्वयं कर संहार तू। हर शुम्भ निशुम्भ (दानव प्रवृती के लोग) की बन के काल सर्पिणी, ले त्रिशूल हाथ में तू कर संहार तू है शक्ति रूपिणी तू। ना अपने को अबला समझ, रोने की जगह, अब सिंह सी हुंकार भर, जगा शक्ति रूप को फिर प्रचंड प्रहार कर, सभी दानवों का अब स्वयं कर संहार तू। ॥ प्रेम से बोलो जय माता दी ॥

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यह कविता (माँ दुर्गा और बेटियां।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/गीत/दोहे/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई आई टी . शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक. समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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