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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिंदी कहानियाँ।

प्यार का return गिफ्ट।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ प्यार का return गिफ्ट। ϒ

प्यार का रिटर्न गिफ्ट – हम जानते है की शब्दो की अपेक्षा कार्य अधिक जोर से बोलते है। यदि हम किसी से कहे, “मैं तुमसे प्यार करता हूँ,” चाहे इन शब्दों में या किसी दूसरे शब्दों में और फिर कुछ ऐसा कार्य कर दे जो यह प्रदर्शित करे कि हमारा वाकई यह मतलब नहीं था तो हमारी क्रियाएँ हमारा भेद खोल देगी। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि हर स्थिति में हम वैसा ही कार्य करे जैसा हम बोलते हैं।

  • हमे लगता है कि इसका एक उत्तम उदाहरण वह सच्ची घटना हैं जो कई वर्षों पहले घटी थी और जो देश के पहले और सबसे बड़े करोड़पति व्यक्तियों में से एक और दयावान एंड्रयू कारनेगी से संबंधित है।
  • एक दिन गिरते पानी में एक मैली कुचैली सी बूढी महिला न्यूयार्क के एक डिपार्टमेंटल स्टोर में पानी से बचने और मदद मांगने के लिए आई। परन्तु वह पूरी गीली और निर्धन दिखाई पड़ रही थी, इसलिए किसी ने भी उसकी ओर ध्यान नहीं दिया।
  • एक युवा सेल्समैन को छोड़कर जिसने उससे कहा – “जब तक कोई आपको लेने नहीं आता और आप उसका इंतज़ार कर रही है, क्या आप बैठना चाहेंगी?” और उसने उस बूढ़ी महिला के लिए taxi की व्यवस्था की। जाने के पहले उसने पूछा, “young मैन, तुम्हारा नाम और पता एक कागज पर लिखकर मुझे दो।” और उसने वही किया।
  • अगले दिन उस महिला के बेटे, एंड्रयू कारनेगी, ने उस स्टोर को फ़ोन किया और कहा कि वह अपने नए ख़रीदे हुए स्कॉटिश महल की सजावट के लिए पूरा furniture खरीदना चाहता है। उसने आगे कहा कि वह चाहता है कि वही युवा सेल्समैन सारी बिक्री करे और पूरा कमीशन उसे ही दिया जाए। इसके अतिरिक्त वह चाहता है कि वह युवक उसके साथ स्कॉटलैंड जाकर उस furniture को fit करने में मदद करे। 
  • मैनेजर ने अपने को लगे आघात को छुपाया और कहा कि वह युवक अनुभवहीन है और वह स्वयं वहाँ पर कई वर्षो से कार्य कर रहा है और उसे इतना बड़ा कार्य करके बहुत ख़ुशी होगी।
  • इस पर कारनेगी ने जवाब दिया, “मेरी माँ ने कहा कि इस युवक ने उसके प्रति उदारता दिखाई है जबकि वह जानता भी नहीं था कि वह महिला कौन थी। इससे मुझे पता चला कि वह व्यापार और लोगों को समझता है। उसे यह कार्य सौंपा जाता है और मैं चाहता हूँ कि उसे सभी कमीशन दिया जाए। मैं दुबारा जाँच करूँगा कि उसे यह मिले, और यदि उसे नहीं मिला, तो मैं अपना लेन-देन भविष्य में कही और करूँगा।

“दुनिया में प्यार ऐसी अकेली वस्तु है जिसे पाने के लिए उसे देना पड़ता है।”

उदारता से कार्य करते हुए उस युवक ने मानवीय प्यार का प्रदर्शन किया था।

सीख – इस संसार में प्यार से बड़ी कुछ भी नहीं। जिसे भी सच्चा प्यार मिल जाए इससे बढ़कर और कुछ भी नहीं। अगर आप प्यार चाहते है तो पहले सभी को प्यार देना शुरू कर दे – “प्यार देंगे तो प्यार मिलेगा जरूर” प्रेम ईश्वर का दूसरा रूप है। सच्चे प्यार की कोई भी कीमत नहीं लगा सकता है – अर्थात: बेशकीमती। चाहे बड़े हो या छोटे सभी को प्यार आदर और सम्मान दे बदले में आपको भी प्यार – आदर और सम्मान मिलेगा।

  • हिंदी कहानी – निरंतर प्रयास जरूर पढ़े।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये।

आप सभी का प्रिय दोस्त

Krishna Mohan Singh(KMS)
Editor in Chief, Founder & CEO
of… https://kmsraj51.com/

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।~Kmsraj51

———– © Best of Luck ® ———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी Id है: kmsraj51@hotmail.com. पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to become themselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

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निरंतर प्रयास।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ निरंतर प्रयास। ϒ

प्यारे दोस्तों, Secret of success…

महात्मा बुद्ध ज्ञान प्राप्ति के लिए घोर तप में लगे थे। उन्होंने शरीर को काफी कष्ट दिया, यात्राएं की घने जंगलों में कड़ी साधना की, पर आत्मज्ञान की प्राप्ति नही हुई। एक दिन बुद्ध निराश होकर सोचने लगे मैंने अभी तक कुछ भी प्राप्त नही किया। अब आगे क्या कर पाउँगा? निराशा, अविश्वास के इन नकारात्मक भावों ने उन्हें क्षुब्ध कर दिया। कुछ ही क्षणों बाद उन्हें प्यास लगी। वे थोड़ी दूर स्थित एक झील तक पहुंचे। वहां उन्होंने एक दृश्य देखा कि एक नन्ही सी गिलहरी के दो बच्चे झील में डूब रहे है। पहले ताे वह गिलहरी जड़वत बैठी रही, फिर कुछ देर बाद उठकर झील के पास गई, अपना सारा शरीर झील के पानी में भिगोया और फिर बाहर आकर पानी झाड़ने लगी। ऐसा वह बार – बार करने लगी। 

बुद्ध सोचने लगे, इस गिलहरी का प्रयास कितना मूर्खतापूर्ण है। क्या कभी यह इस झील को सुखा सकेगी? किन्तु गिलहरी का यह क्रम लगातार जारी था। “बुद्ध को लगा मानो गिलहरी कह रही हो – यह झील कभी खाली होगी या नहीं, यह मैं नहीं जानती, किन्तु मैं अपना प्रयास नहीं छोडूंगी।” अंततः उस छाेटी सी गिलहरी ने महात्मा बुद्ध को अपने लक्ष्य-मार्ग से विचलित होने से बचा लिया। वे सोचने लगे कि जब यह नन्ही गिलहरी अपने लघु सामर्थ्य से झील को सूखा देने के लिए कृत संकल्पित है तो मुझमें क्या कमी है? मैं तो इससे हजार गुना अधिक क्षमता रखता हूँ। यह सोचकर महात्मा बुद्ध पुनः अपनी साधना में लग गए और एक दिन बाेधि-वृक्ष तले उन्हें ज्ञान का आलोक प्राप्त हुआ।

सीख – असफलताओं के बावजूद, असफलताओं से सीख लेकर – लगातार प्रयास जारी रखना चाहिए। यदि हम प्रयास करना न छोड़े तो एक न एक दिन लक्ष्य की प्राप्ति हो ही जाती है। शांत दिमाग से धैर्य के साथ प्रयास जारी रखें। परिवर्तन व risk लेने से घबराये नहीं। Life में Growth करना है तो परिवर्तन जरूरी है। सफलता प्राप्त करने के लिए अपने Comfort Zone से बाहर निकले। प्रयासों के छोटे-छोटे सकारात्मक step के साथ आगे बढ़े। सफलता आपको अवश्य मिलेगी।

Put your heart, mind, and soul into even your smallest acts. This is the secret of success.

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

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सच्ची दोस्ती के गुण।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ सच्ची दोस्ती के गुण। ϒ

प्यारे दोस्तों,

प्रख्यात उद्योगपति हेनरी फोर्ड ने अपने जीवन में वह सब कुछ प्राप्त किया, जिसका सपना हर व्यक्ति की आंखों में पलता है। धन, दौलत, सुख समृद्धि, ऐश्वर्य की विराटता और अपार यश। ये सब हेनरी फोर्ड की कमाई थी। जब वे अपने समृद्धि और कीर्ति के शिखर पर थे, तब एक दिन एक पत्रकार ने उनसे पुछा – महोदय! आपने अपने जीवन में प्रचुर धन संपत्ति के साथ यश और गौरव कमाया है। आपके साैजन्य से अनेक महान कार्यो का संपादन हुआ है। सारी दुनिया आपकी सफलता को सलाम करती है। इतना सब कुछ होने के बाद क्या आपको अब भी जीवन में किसी कमी का अनुभव होता है ? हेनरी फोर्ड तत्काल बोले – हां, मेरे जीवन में सच्चे मित्र की कमी मुझे रह-रह कर सताती है। यदि मुझे फिर से जीवन आरम्भ करना हो तो मैं सच्चे मित्र की तलाश करूँगा। भले ही इसके लिए मुझे अपना सारा धन क्यों न खोना पड़े।

यह सुनकर पत्रकार ने कहा – यदि आप ऐसा करें तो आपको मित्र ही मित्र मिल जायेंगे, किन्तु सच्चा मित्र तब भी नहीं मिलेगा। फोर्ड द्वारा कारन पूछे जाने पर वह बोले – क्योंकि आप केवल धन के बल पर मित्रों की तलाश करना चाहते हैं। धन से सच्चे मित्र नहीं मिलते, उसके लिए अहंकार को गलाना पड़ता है, समर्पित होना होता है। धन से संसार की हर चीज खरीदी जा सकती है, किन्तु सच्चा मित्र नहीं। फोर्ड को अपनी भूल का अहसास हुआ।

सीख – इस रियल कहानी का सार यह है की – सच्ची मित्रता (True friendship) सात्विक हृदय की शुद्ध भावनाओं पर टिकी होती है। अतः सच्चा मित्र पाने के लिए जेब नहीं, दिल को संपन्न और उदार रखें। इसे कहते है सच्ची मित्रता।

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मेरी अपनी है मंजिले।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ मेरी अपनी है मंजिले। ϒ

प्यारे दोस्तों,

एक घर के पास काफी दिन से एक बड़ी इमारत का काम चल रहा था। वहा रोज मजदूरों के छोटे-छोटे बच्चें एक – दूसरे की शर्ट पकड़कर रेल – रेल का खेल खेलते थे।

रोज कोई बच्चा इंजन बनता और बाकी बच्चे डिब्बे बनते थे। इंजन और डिब्बे वाले बच्चे रोज बदल जाते, पर केवल चड्ढी पहना एक छोटा बच्चा हाथ में रखा कपड़ा घुमाते हुए रोज गार्ड बनता था। एक दिन उन बच्चो को खेलते हुए रोज देखने वाले एक व्यक्ति ने काैतुहल से गार्ड बनने वाले बच्चें को पास बुलाकर पूछा … बच्चें तुम रोज गार्ड बनते हो। तुम्हे कभी इंजन कभी डिब्बा बनने की इच्छा नहीं होती ?

इस पर वो बच्चा बोला… बाबू जी मेरे पास पहनने के लिए कोई शर्ट नहीं है। तो मेरे पीछे वाले बच्चे मुझे कैसे पकड़ेंगे … और मेरे पीछे कौन खड़ा रहेगा …? इसलिए मै रोज गार्ड बनकर ही खेल में हिस्सा लेता हूँ। ये बोलते समय मुझे उसकी आँखों में पानी दिखाई दिया।

वो बच्चा जीवन का एक बड़ा पाठ पढ़ा गया…। अपना जीवन कभी भी परिपूर्ण नहीं होता। उसमे कोई न कोई कमी जरूर रहेगी …। वो बच्चा माँ – बाप से गुस्सा होकर रोते हुए बैठ सकता था। परन्तु ऐसा न करते हुए उसने परिस्थितियों का समाधान ढूंढा।

हम कितना रोते हैं ? कभी अपने सांवले रंग के लिए, कभी छोटे कद के लिए, कभी पैसे के लिए, कभी पड़ोसी की बड़ी कार, कभी पड़ोसन के गले का हार, कभी अपने कम marks, कभी English, कभी Personality, कभी नौकरी की मार तो कभी धंधे में मार …। हमे इससे बाहर आना पड़ता हैं … ये जीवन है… इसे ऐसे ही जीना पड़ता हैं।

चील की ऊँची उड़ान देखकर चिड़िया कभी depression में नहीं आती, वो अपने आस्तित्व में मस्त रहती है। मगर इंसान – इंसान की ऊँची उड़ान देखकर बहुत जल्द चिंता में आ जाता है। तुलना से बचें और खुश रहें। न किसी से ईर्ष्या, ना किसी से कोई होड़, मेरी अपनी है मंजिले, मेरी अपनी दौड़ …।

सीख – परिस्थितियां कभी समस्या नहीं बनती, समस्या इसलिए बनती है, क्योंकि हमें उन परिस्थितियों से लड़ना नहीं आता। यह सृष्टि एक रंगमंच है और सभी मनुष्य आत्मा Actor व Actress है सभी को अपना- अपना पार्ट पूरा करना चाहिए। हर इंसान के अंदर असीमित शक्तियां निहित है – बस जरूरत है इन शक्तियों को जागृत कर – उसे सही तरीके से Use करना। जिससे जीवन में सरलता पूर्वक सुख व शांति मिले।

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सच्चे गुरु का सच्चा शिष्य।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ सच्चे गुरु का सच्चा शिष्य। ϒ

ऐसी हो सच्चे गुरु में निष्ठा – तो जीवन सवर जाये।

प्राचीनकाल में गोदावरी नदी के किनारे वेदधर्म मुनि के आश्रम में उनके शिष्य वेद-शास्त्रादि का अध्ययन करते थे।

एक दिन गुरु ने अपने शिष्यों की गुरुभक्ति की परीक्षा लेने का विचार किया। सत्शिष्यों में गुरु के प्रति इतनी अटूट श्रद्धा होती है कि उस श्रद्धा को नापने के लिए गुरुओं को कभी-कभी योगबल का भी उपयोग करना पड़ता है।

वेदधर्म मुनि ने शिष्यों से कहा – “हे शिष्यो ! अब प्रारब्धवश मुझे कोढ़ निकलेगा, मैं अंधा हो जाऊँगा इसलिए काशी में जाकर रहूँगा, है कोई हरि का लाल, जो मेरे साथ रहकर सेवा करने के लिए तैयार हो?

शिष्य पहले तो कहा करते थे – ʹगुरुदेव ! आपके चरणों में हमारा जीवन न्यौछावर हो जाए मेरे प्रभु !ʹ अब सब चुप हो गये।

उनमें संदीपक नाम का शिष्य खूब गुरु सेवापरायण, सच्चा गुरुभक्त था। उसने कहा – “गुरुदेव ! यह दास आपकी सेवा में रहेगा।”

गुरुदेव – “इक्कीस वर्ष तक सेवा के लिए रहना होगा।”

संदीपक – “इक्कीस वर्ष तो क्या मेरा पूरा जीवन ही अर्पित है, गुरुसेवा में ही इस जीवन की सार्थकता है।” वेदधर्म मुनि एवं संदीपक काशी में मणिकर्णिका घाट से कुछ दूर रहने लगे।

कुछ दिन बाद गुरु के पूरे शरीर में कोढ़ निकला और अंधत्व भी आ गया। शरीर कुरूप और स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया। संदीपक के मन में लेशमात्र भी क्षोभ नहीं हुआ। वह दिन रात गुरु जी की सेवा में तत्पर रहने लगा। वह कोढ़ के घावों को धोता, साफ करता, दवाई लगाता, गुरु को नहलाता, कपड़े धोता, आँगन बुहारता, भिक्षा माँगकर लाता और गुरुजी को भोजन कराता।

गुरुजी गाली देते, डाँटते, तमाचा मार देते, डंडे से मारपीट करते और विविध प्रकार से परीक्षा लेते।

किंतु संदीपक की गुरुसेवा में तत्परता व गुरु के प्रति भक्तिभाव अधिकाधिक गहरा और प्रगाढ़ होता गया।

काशी के अधिष्ठाता देव भगवान विश्वनाथ संदीपक के समक्ष प्रकट हो गये और बोले –

“तेरी गुरुभक्ति एवं गुरुसेवा देखकर हम प्रसन्न हैं…

जो गुरु की सेवा करता है वह मानो मेरी ही सेवा करता है। जो गुरु को संतुष्ट करता है वह मुझे ही संतुष्ट करता है।”

बेटा ! कुछ वरदान माँग ले। संदीपक गुरु से आज्ञा लेने गया और बोला…

“शिवजी वरदान देना चाहते हैं आप आज्ञा दें तो वरदान माँग लूँ कि आपका रोग एवं अंधेपन का प्रारब्ध समाप्त हो जाय।”

गुरु ने डांटा – “वरदान इसलिए माँगता है कि मैं अच्छा हो जाऊँ और सेवा से तेरी जान छूटे। अरे मूर्ख ! मेरा कर्म कभी न कभी तो मुझे भोगना ही पड़ेगा।”

संदीपक ने शिवजी को वरदान के लिए मना कर दिया। शिवजी आश्चर्यचकित हो गये कि कैसा निष्ठावान शिष्य है। शिवजी गये विष्णुलोक में और भगवान विष्णु से सारा वृत्तान्त कहा। विष्णु भी संतुष्ट हो संदीपक के पास वरदान देने प्रकटे।

संदीपक ने कहा – “प्रभु ! मुझे कुछ नहीं चाहिए।”

भगवान ने आग्रह किया तो बोला – “आप मुझे यही वरदान दें कि गुरु में मेरी अटल श्रद्धा बनी रहे। गुरुदेव की सेवा में निरंतर प्रीति रहे, गुरुचरणों में दिन प्रतिदिन भक्ति दृढ़ होती रहे।”

भगवान विष्णु ने संदीपक को गले लगा लिया।

संदीपक ने जाकर देखा तो वेदधर्म मुनि स्वस्थ बैठे थे। न कोढ़, न कोई अँधापन। शिवस्वरूप सदगुरु ने संदीपक को अपनी तात्त्विक दृष्टि एवं उपदेश से पूर्णत्व में प्रतिष्ठित कर दिया।

वे बोले – “वत्स ! धन्य है तेरी निष्ठा और सेवा, पुत्र – तुम धन्य हो ! तुम सच्चिदानंद स्वरूप हो।”

गुरु के संतोष से संदीपक गुरु-तत्त्व में जग गया, गुरुस्वरूप हो गया।

अपनी श्रद्धा को कभी भी, कैसी भी परिस्थिति में सदगुरु पर से तनिक भी कम नहीं करना चाहिए। वे परीक्षा लेने के लिए कैसी भी लीला कर सकते हैं। गुरु आत्मा में अचल होते हैं, स्वरूप में अचल होते हैं। जो हमको संसार-सागर से तारकर परमात्मा में मिला दें, जिनका एक हाथ परमात्मा में हो और दूसरा हाथ जीव की परिस्थितियों में हो, उन महापुरुषों का नाम सदगुरु है।

सीख – 

“सच्चा गुरु कौन ?”

वास्तविक गुरु वह हाेता है जाे अपने अनुयाइयाें काे परमात्म मिलन का सच्चा मार्ग दिखाये, ना की स्वयं की पूजा-अर्चना करवायें। जाे गुरु स्वयं की पूजा-अर्चना करवाता हैं वह गुरु नहीं राक्षस(दैत्य) है, वह आपकाे परमात्मा से विमुख(दुर) कर रहा हैं। जबकी एक सच्चा गुरु ऐसा कभी नहीं करता।

मनुष्य कभी किसी मनुष्य का उद्धार(निर्वाण या मोक्ष) नहीं कर सकता, यहा तक कि साधु-संताे का भी उद्धार करने के लिए स्वयं परमात्मा काे आना पड़ता हैं। अर्थात: मनुष्य कभी किसी मनुष्य का उद्धार नहीं कर सकता।

सभी मनुष्याें का सच्चा गुरु परमात्मा(GOD) ही हैं।

यह बात “श्रीमत भागवत गीता” के चौथे अध्याय के श्लोक संख्या “८” से:

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥

अर्थात: साधु पुरुषोंका उद्धार करने के लिये, पापकर्म करनेवालाेंका विनाश करने के लिये और धर्मकी अच्छी तरह से स्थापना करने के लिये मैं युग-युगमें(संगमयुग में) प्रकट(किसी सतपुरुष शरीर का माध्यम लेकर) हुआ करता हूँ॥८॥

ध्यान दें,

संगमयुग : वह समय जब कलियुग(कलयुग) का आखिरी कुछ वर्ष शेष रह जाये, जिसके बाद सतयुग आने वाला हाे। यहीं समय संगमयुग कहलाता हैं।

♦ KMSRAJ51 ♦

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सबसे बड़ा कर्तव्य क्या है?

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ϒ सबसे बड़ा कर्तव्य क्या है? ϒ

प्यारे दोस्तों – बहुत समय पहले की बात है। एक राजा पंडितों, विद्वानों से प्रय: प्रश्न किया करते थे कि संसार में सबसे बड़ा कर्तव्य क्या है? इस प्रश्न के उत्तर में विद्वानों ने उन्हें विभिन्न उत्तर दिए, पर किसी के भी उत्तर से राजा संतुष्ट नहीं हो पाए। एक दिन वह शिकार खेलने जंगल में गए। एक जानवर का पीछा करते-करते वे रास्ता भटक गए। भीषण गर्मी के कारण उन्हें चक्कर आने लगा।वह(राजा) एक आश्रय की खोज करने लगे – खोजते-खोजते उन्हें एक आश्रम दिखाई पड़ा, जहां एक संत ध्यान में बैठे थे। राजा इतना ज्यादा थक गए थे कि – उन्हें(संत) पुकारते हुए बेहोश हो गए।

होश में आने पर उन्होंने देखा कि – संत उनके मुख पर पानी के छींटे मार रहे हैं। राजा ने विनम्रता से कहा, `महात्मन ! आप तो समाधि में लीन थे। आपने मेरे लिए समाधि क्यों भंग की? संत ने राजा से कहा – `राजन ! आपके प्राण संकट में थे। ऐसे समय में मेरे लिए ध्यान की अपेक्षा आपकी सहायता के लिए तत्पर होना ज्यादा महत्वपूर्ण कार्य था। समय और परिस्थिति को देखते हुए ही कर्तव्य का निर्धारण करना चाहिये।

उनके इस कथन से राजा की जिज्ञासा भी शांत हो गई कि इंसान का “सबसे बड़ा कर्तव्य क्या है?” उन्होंने समाज लिया कि सबसे बड़े कर्तव्य का निर्णय परिस्थिति को देख कर ही किया जा सकता हैं।

सीख – जीवन में सदैव ही कर्तव्य का निर्णय परिस्थिति को देख कर ही ले। समय के अनुसार क्या उचित हैं और क्या अनुचित हैं को समझकर सही कदम उठाये। मानव सेवा को सदैव ही प्रथम स्थान पर रखे।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।~Kmsraj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~Kmsraj51

 

 

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स्व का पहचान सर्व ज्ञान का स्रोत।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ स्व का पहचान सर्व ज्ञान का स्रोत। ϒ

प्यारे दोस्तों – आज मैं आप सभी को बहुत समय पहले की एक सत्य से अवगत करवाता हूँ।

महर्षि उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु अत्यंत प्रतिभाशाली थे। गुरुकुल में निरंतर १२ वर्षो तक शास्त्रों का अध्ययन करने के पश्चात् – जब वे महर्षि के पास लौटे तो उन्होंने उनसे प्रश्न किया – “वत्स ! वह क्या है, जिसका ज्ञान होने से सृष्टि के समस्त पहलुओं का ज्ञान हो जाता है।”

इस प्रश्न का उत्तर श्वेतकेतु से न देते बना तो – उसकी जिज्ञासा का समाधान करते हुए महर्षि उद्दालक बोले – “पुत्र जिस प्रकार स्वर्ण का ज्ञान हो जाने से स्वर्ण से बनी सभी वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है, कृषि का ज्ञान हो जाने से सभी अन्य वनस्पतियो को उगाने का ज्ञान हो जाता है।”

“वैसे ही आत्मा का ज्ञान हो जाने से सृष्टि के समस्त पहलुओं का ज्ञान हो जाता है। तुम अब अपना जीवन उसी आत्मज्ञान को प्राप्त करने में लगाओं।”

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जो जैसा दिखता है – वैसा होता नहीं सदैव।

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ϒ जो जैसा दिखता है – वैसा होता नहीं सदैव। ϒ

दो बंदर एक दिन घूमते-घूमते एक गांव के समीप पहुंच गये। उन्होंने वहाँ फलों से लदा पेड़ देखा। एक बंदर ने चिल्लाकर कहा – “इस पेड़ को देखो ! ये फल कितने सूंदर दिख रहे है। ये अवश्य ही स्वादिष्ट होंगे। चलो, हम दोनों पेड़ पर चढ़कर फल खाये।”

दूसरा बंदर बुद्धिमान था। उसने कुछ सोचकर कहा – “नहीं, नहीं। ज़रा ठहराे ! यह पेड़ गांव के समीप है और इसके फल इतने सुंदर और पके हुए है, लेकिन यदि ये फल अच्छे होते तो गांव वाले ही इन्हे तोड़ लेते, इन्हें ऐसे ही पेड़ पर नहीं लगे रहने देते। लेकिन इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि किसी ने भी इन फलों को हाथ तक नहीं लगाया है। हो सकता है कि ये फल खाने लायक न हो।”

उसकी ये बातें सुनकर पहले बंदर ने कहा – ” कैसी बेकार कि बातें कर रहे हो। मुझे तो इन फलों में कुछ बुरा नहीं दिख रहा। मैं तो इन्हें खाने जा रहा हूँ, तुम्हे साथ चलना है तो चलो।”

दूसरे बंदर ने फिर से उसे सावधान करते हुए कहा – “तुम्हे इस बारे में फिर से सोचकर निर्णय लेना चाहिए। मैं भोजन के लिए कुछ और ढूंढता हूँ।” पहला बंदर पेड़ पर चढ़कर फल खाने लगा, परन्तु वे फल ही उसका अंतिम भोजन बन गए; क्योकि वे फल ज़हरीले थे।

  • हिंदी कहानी – निरंतर प्रयास जरूर पढ़े।

दूसरा बंदर जब लौटा तो उसने अपने साथी को मरा हुआ पाया। इसलिए कहा जाता है कि हर चमकने वाली चीज सोना नहीं हुआ करती। अर्थात: जो जैसा दिखता है – वैसा होता नहीं सदैव।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought to life by. By doing this you Recognize hidden within the buraiya ensolar radiation and encourage good solar radiation to become themselves.

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

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हिम्मत आपकी मदद उसकी।

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ϒ हिम्मत आपकी मदद उसकी। ϒ

एक बार एक किसान का घोड़ा बीमार हो गया। उसने उसके इलाज के लिए डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने घोड़े का अच्छे से मुआयना किया और बोला….. आपके घोड़े को काफी गंभीर बीमारी है। हम तीन दिन तक इसे दवाई देकर देखते हैं, अगर यह ठीक हो गया तो ठीक, नहीं तो हमे इसे मारना होगा। क्योंकि यह बीमारी दूसरे जानवरों में भी फैल सकती है।

यह सब बातें पास में खड़ा एक बकरा भी सुन रहा था। अगले दिन डॉक्टर आया, उसने घोड़े को दवाई दी और चला गया। उसके जाने के बाद बकरा घोड़े के पास गया और बोला – दोस्त, हिम्मत करो, नहीं तो यह तुम्हें मार देंगे। दूसरे दिन डॉक्टर फिर आया और दवाई देकर चला गया। बकरा फिर घोड़े के पास आया और बोला, दोस्त, तुम्हें उठना ही होगा। हिम्मत करो, करो नहीं तो तुम मारे जाओगे। मै तुम्हारी मदद करता हूँ।

चलो उठाे। तीसरे दिन जब डॉक्टर आया तो किसान से बोला, मुझे अफसोश है की हमे इसे मारना पड़ेगा क्योकि कोई भी सुधार नज़र नही आ रहा। जब वो वहां से गए तो – बकरा घोड़े के पास फिर आया और बोला, देखो दोस्त, “करो या मरो” वाली स्थिति बन गई है। अगर तुम आज भी नहीं उठे ताे कल तुम मर जाओगें। इसलिए हिम्मत करो। हाँ, बहुत अच्छे। थोड़ा और, तुम कर सकते हो। शाबाश , अब भाग कर देखो, तेज और तेज।

इतने में किसान वापस आया तो उसने देखा कि उसका घोड़ा भाग रहा है। वो ख़ुशी से झूम उठा और सब घर वालो को इकट्ठा करके चिल्लाने लगा, चमत्कार हो गया, मेरा घोड़ा ठीक हो गया। हमे जश्न मनाना चाहिए …। हिम्मत रखे जीने की। अगर हम हिम्मत का एक कदम आगे बढ़ाएंगे, तो हमारी जिंदगी बच जाएगी। तभी तो ऊपर वाला कहता है कि तुम हिम्मत का एक कदम आगे बढ़ाओ तो मैं हजार कदम आगे बढ़ाऊंगा। हम सिर्फ आई हुई परिस्थितियों के प्रभाव रुपी चश्मे से ही देखते हैं। देखना तो ये चाहिए कि अपनी क्षमता को पूर्ण रूप से क्रियान्वित कर रहे हैं या नहीं।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* अपनी आदतों को कैसे बदलें।

∗ निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

* क्या करें – क्या ना करें।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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सच्ची मानवता – संवेदनशीलता।

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ϒ सच्ची मानवता – संवेदनशीलता। ϒ

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प्यारे दोस्तों – एक Postman ने घर के दरवाजे पर दस्तक देते हुए कहा, “चिट्ठी ले लिजिये”। अंदर से एक बालिका की आवाज़ आई, “आ रही हूँ”। लेकिन तीन से चार मिनट तक काेई न आया ताे Postman ने फिर कहा, “अरे भाई! घर में काेई है क्या, अपनी चिट्ठी ले लाे”। लड़की की फिर आवाज़ आई, “Postman साहब, दरवाजे के नीचे से चिट्ठी अंदर डाल दीजिए, मैं आ रही हूँ”। “नहीं, मैं खड़ा हूँ, रजिस्टर्ड पत्र है, पावती पर तुम्हारे signature चाहिए”।

करीबन छह से सात मिनट के बाद दरवाज़ा खुला। Postman इस देरी के लिए झल्लाया हुआ ताे था ही और उस पर चिल्लाने वाला था लेकिन, दरवाज़ा खुलते ही वह चाैंक गया। एक अपाहिज कन्या जिसके पांव नहीं थे, सामने खड़ी थी।

Postman चुपचाप पत्र देकर और उसके signature लेकर चला गया। सप्ताह – दो सप्ताह में जब कभी उस लड़की के लिए डाक आती, Postman एक आवाज़ देता और जब तक वह कन्या न आती तब तक खड़ा रहता। एक दिन लड़की ने Postman काे नंगे पांव देखा।
दिपावली नज़दीक आ रही थी। उसने सोचा Postman काे क्या उपहार दूँ।

एक दिन जब Postman डाक देकर चला गया, तब उस लड़की ने जहाँ मिट्टी में Postman के पांव के निशान बने थे, उस पर काग़ज रखकर उन पांवाे का चित्र उतार लिया। अगले दिन उसने अपने यहाँ काम करने वाली बाईं से उस नाप के जूते मंगवा लिये।

दिपावली आई और उसके अगले दिन Postman ने गली के सब लाेगाें से ताे उपहार माँगा और साेचा कि अब इस बिटिया से क्या उपहार लेना? पर गली में आया हूँ ताे उससे मिल ही लूँ। उसने दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से आवाज़ आई, “काैन ?” Postman उत्तर मिला। कन्या हाथ में एक Gift पैक लेकर आई और कहा, “अंकल, मेरी तरफ से दिपावली पर आपकाे भेंट है। “Postman ने कहा” तुम मेरे लिए बेटी के समान हाे, तुमसे मैं उपहार कैसे लूँ?” कन्या ने आग्रह किया कि मेरी इस उपहार के लिए मना न करें।

ठिक है कहते हुए Postman ने पैकेट ले लिया। कन्या न कहा, “अंकल इस पैकेट काे घर ले जाकर खाेलना। घर जाकर जब उसने पैकेट खाेला ताे विस्मित रह गया, क्योंकि उसमें एक जाेड़ी जूते थे। उसकी आँखे भर आई। अगले दिन वह Office पहुंचा और Postmaster से फरियाद की कि उसका तबादला फाैरन कर दिया जाए। Postmaster ने कारण पूछा, ताे Postman ने वे जूते टेबल पर रखते हुए सारी कहानी सुनाई और भीगी आँखाें और रूंधे कंठ से कहा, “आज के बाद मैं उस गली में नहीं जा सकूंगा। उस अपाहिज बच्ची ने मेरे नंगे पाँवाें काे ताे जूते दे दिये पर मैं उसे पाँव कैसे दे पाऊंगा ?”

सीख : संवेदनशीलता का यह श्रेष्ठ दृष्टांत है। संवेदनशीलता यानि, दूसराें के दुःख दर्द काे समझना, अनुभव करना और उसके दुःख-दर्द में भागीदारी करना, उसमें शरीक हाेना। एक ऐसा मानवीय गुण है जिसके बिना इंसान अधूरा है।

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