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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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father poetry

फर्क – Difference !!

Happy Anniversary !!
anniversary-1x

kmsraj51 की कलम से …..
9-3-14 kmsraj51

Differenceफर्क

फर्क

आदर्श होना बेहतर है,
बस शर्त ये रहे,
दोहराए जा रहे आदर्श
बल्ली की तरह हों,
भीतर और बाहर से एक जैसे,
ठोस रुप लिए,
जो आदर्श बांस की तरह
खोखले और लचर हैं,
उनकी नियति में
ठठरी की तरह बंधना ही है ।

पुरुषोत्तम होने में कुछ बुरा नहीं
मर्यादा का ख्याल रखने में कुछ ग़लत नहीं,
बुरा है, ग़लत है,
बिना सोचे समझे बस
आज्ञा में सिर हिला देना
फिर चाहे जंगल में भटकना हो
या एक औरत का पांच पुरूषों में बंटना।

शांत चित्त होने में खराबी कुछ नहीं
बस ये फर्क मालूम रहे,
किस जगह पर गाल बढ़ाना है
किस जगह पर हाथ उठाना है
क्रोध भी जीवन का सृष्टा हो सकता है
औऱ शांत मन
एक कदम के फासले पर कायर ।

Note::-
यदि आपके पास Hindi में कोई article, inspirational story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी Id है::- kmsraj51@yahoo.in . पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

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FATHER – पिता !!

Happy Anniversary!!
anniversary-1x

kmsraj51 की कलम से …..

f s

पिता

पुराने वक्तों के हैं पिता
उन वक्तों के
जब हवा में घुल गयी थी दहशत
खिलखिलाहटें, फुसफुसाहटों में
और शोर सन्नाटे में बदल रहा था
पाक पट्टन के स्कूलों में ।

बंटवारे की चर्चा जो पहले उड़ती थी
चाय की चुस्कियों के साथ
अब हकीकत नजर आने लगी थी
तब किशोर थे पिता,
नफरत की आग घरों तक पहुँच चुकी थी
पलक झपकते ही आपसी सौहार्द का पुल
विघटन की खाई में बदल गया था ।

पुश्तों से साथ रहते आये गाँव तथा परिवार
ढह गए थे ऐसे जैसे कोई दरख्त जड़ों सहित
उखाड़ दिया गया हो,
जलते हुए मकान, संगीनों की नोक पर
टंगे बच्चे, बेपर्दा की जा रहीं औरतें ।

रातोंरात भागना पड़ा था उन्हें
औरतों व बच्चों को मध्य में कर
घेर कर चारों ओर से वृद्ध, जवान पुरुष
बढ़ते गए मीलों की यात्रा कर
कारवां बड़ा होता गया जब जुटते गए गाँव के गाँव..

….और फिर दिखायी पड़ी भारत की सीमा
जो था अपना पराया हो गया देखते-देखते
खून की गंध थी हवा में यहाँ भी
दिलों में खौफ, पर जीवन अपनी कीमत मांग रहा था,
पेट में भूख तब भी लगती थी
…कहते-कहते लौट जाते हैं (अब वृद्ध हो चले पिता)
पुराने वक्तों में… कि सड़कों के किनारे मूंगफली
बेचते रहे, गर्म पुराने कपड़ों की लगाई दुकान
और कम्पाउडरी भी की
फिर पा गए जब तहसील में एक छोटी सी नौकरी,
हाईस्कूल की परीक्षा के लिये
सड़क के लैम्प के नीचे की पढ़ाई
पुरानी मांगी हुई किताबों से
और बताते हुए बढ़ जाती है आँखों की चमक
पास हुए प्रथम श्रेणी में,
भारत सरकार के डाकविभाग में बने बाबू
और सीढ़ियां दर सीढ़ियां चढ़ते
जब सेवानिवृत्त हुए तो सक्षम थे
एक आरामदेह बुढ़ापे की गुजरबसर में,
पर रह रह कर कलेजे में कोई टीस उभर आती है
जब याद आ जाती है कोई बीमार बच्ची
जिसे छोड़ आये थे रास्ते में उसके मातापिता,
एक बूढी औरत जो दम तोड़ गयी थी पानी के बिना ।
दिल में कैद हैं आज भी वह चीखोपुकार
वह बेबसी भरे हालात
आदमी की बेवकूफी की इससे बड़ी मिसाल क्या होगी ।
पिता ऊपर से संतुष्ट नजर आते हैं
पर भीतर सवाल अब भी खड़े हैं !
__________________________

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’पापा याद बहुत आते हो’ कुछ ऐसा भी मुझे कहो !!


Happy Anniversary!
anniversary-1x

09-March-2013 to 09-March-2014

http://kmsraj51.wordpress.com/

kmsraj51 की कलम से …..

’पापा याद बहुत आते हो’ कुछ ऐसा भी मुझे कहो

अप्रैल माह की सातवीं और अंतिम रचना एक गीत है जिसके रचनाकार निशीथ द्विवेदी की यह हिंद-युग्म पर पहली दस्तक है। अक्टूबर 1979 मे जन्मे निशीथ शाजापुर (म.प्र) से तअल्लुक रखते हैं। निशीथ ने रासायनिक अभियांत्रिकी मे आइ आइ टी रुड़की से बी टेक और आइ आइ टी दिल्ली से एम टेक की उपाधि हासिल की है। कविताकर्म मे रुचि रखने वाले निशीथ सम्प्रति आयुध निर्माणी भंडारा मे कार्यरत हैं।
हम यहाँ माँ विषयक हृदयस्पर्शी कविताएं पहले भी पढ़ते रहे हैं, वही पिता के जिम्मेदारी और अनुशासन के तले दबे व्यक्तित्व का कोमल पक्ष अक्सर कविताओं मे उतनी प्रमुखता से उजागर नही हो पाता है। प्रस्तुत कविता अपने पारंपरिक कलेवर मे एक पिता की ऐसी ही अनुच्चारित भावनाओं मे छिपे प्रेम और विवशता को स्वर देती है।

गीत

माँ को गले लगाते हो, कुछ पल मेरे भी पास रहो !
’पापा याद बहुत आते हो’ कुछ ऐसा भी मुझे कहो !
मैनेँ भी मन मे जज़्बातोँ के तूफान समेटे हैँ,
ज़ाहिर नही किया, न सोचो पापा के दिल मेँ प्यार न हो!

थी मेरी ये ज़िम्मेदारी घर मे कोई मायूस न हो,
मैँ सारी तकलीफेँ झेलूँ और तुम सब महफूज़ रहो,
सारी खुशियाँ तुम्हेँ दे सकूँ, इस कोशिश मे लगा रहा,
मेरे बचपन मेँ थी जो कमियाँ, वो तुमको महसूस न हो!

हैँ समाज का नियम भी ऐसा पिता सदा गम्भीर रहे,
मन मे भाव छुपे हो लाखोँ, आँखो से न नीर बहे!
करे बात भी रुखी-सूखी, बोले बस बोल हिदायत के,
दिल मे प्यार है माँ जैसा ही, किंतु अलग तस्वीर रहे!

भूली नही मुझे हैँ अब तक, तुतलाती मीठी बोली,
पल-पल बढते हर पल मे, जो यादोँ की मिश्री घोली,
कन्धोँ पे वो बैठ के जलता रावण देख के खुश होना,
होली और दीवाली पर तुम बच्चोँ की अल्हड टोली!

माँ से हाथ-खर्च मांगना, मुझको देख सहम जाना,
और जो डाँटू ज़रा कभी, तो भाव नयन मे थम जाना,
बढते कदम लडकपन को कुछ मेरे मन की आशंका,
पर विश्वास तुम्हारा देख मन का दूर वहम जाना!

कॉलेज के अंतिम उत्सव मेँ मेरा शामिल न हो पाना,
ट्रेन हुई आँखो से ओझल, पर हाथ देर तक फहराना,
दूर गये तुम अब, तो इन यादोँ से दिल बहलाता हूँ,
तारीखेँ ही देखता हूँ बस, कब होगा अब घर आना!

अब के जब तुम घर आओगे, प्यार मेरा दिखलाऊंगा,
माँ की तरह ही ममतामयी हूँ, तुमको ये बतलाऊंगा,
आकर फिर तुम चले गये, बस बात वही दो-चार हुई,
पिता का पद कुछ ऐसा ही हैँ फिर खुद को समझाऊंगा!

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