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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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Gyan

मत करो हतोत्साहित अपने शब्दों से -A Message To All- !!


kmsraj51 की कलम से …..
PEN KMSRAJ51-PEN



“मत करो हतोत्साहित अपने शब्दों से ……आने वाली नयी पीढ़ी को ,
वो भी करेंगे कुछ ऐसा एक दिन…. जिसे देखेगा ज़माना ….पकड़ती हुई नयी सीढ़ी को ॥”


future

Note::-
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The Life and Times of Gautama Buddha in Hindi

Kmsraj51 की कलम से…..

Kmsraj51-CYMT09

हिन्दी में गौतम बुद्ध के जीवन और समय का विस्तार

BUDDHA - KMSRAJ51
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gautam-buddha
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 सामान्य व्यक्ति से महापुरुष तक का सफर – महात्मा बुद्ध 

buddha --
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भारत की पवित्र भूमि पर ऐसे कई महापुरुषों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने कृत्यों और सिद्धांतों के बल पर मानव जीवन के भीतर छिपे गूढ़ रहस्यों को उजागर किया. इन्हीं में से एक हैं महात्मा बुद्ध, जिन्होंने सामान्य मनुष्य के रूप में जन्म लेकर अध्यात्म की उस ऊंचाई को छुआ जहां तक पहुंचना किसी आम व्यक्ति के लिए मुमकिन नहीं है. ऐसे महान पुरुष के दिखलाए गए मार्ग को लोगों ने एक धर्म के रूप में ग्रहण किया जिसके परिणामस्वरूप भारत समेत सभी बड़े देशों में बौद्ध धर्म एक प्रमुख धर्म के रूप में स्वीकृत कर लिया गया.

महात्मा बुद्ध का वास्तविक नाम सिद्धार्थ था किंतु गौतमी द्वारा पाले जाने के कारण उन्हें गौतम भी कहा गया. बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद उनके नाम के आगे बुद्ध उपसर्ग जोड़ दिया गया और धीरे-धीरे वे महात्मा बुद्ध के तौर पर प्रख्यात हो गए. गौतम बुद्ध के आदर्शों और बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले लोगों के लिए आज का दिन बेहद खास है. मान्यताओं के अनुसार बैसाख मास की पूर्णिमा के दिन महात्मा बुद्ध पृथ्वी पर अवतरित हुए थे और इसी दिन उन्हें बुद्धत्व के साथ-साथ महापरिनिर्वाण की भी प्राप्ति हुई थी.

buddha_nature
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महात्मा बुद्ध का जीवन

सिद्धार्थ का जन्म शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन के घर हुआ था. जन्म के सात दिन के भीतर ही सिद्धार्थ की मां का निधन हो गया था. उनका पालन पोषण शुद्धोधन की दूसरी रानी महाप्रजावती ने किया. सिद्धार्थ के जन्म के समय ही एक महान साधु नेब यह घोषणा कर दी थी कि यह बच्चा या तो एक महान राजा बनेगा या फिर एक बेहद पवित्र मनुष्य के रूप में अपनी पहचान स्थापित करेगा.

इस भविष्यवाणी को सुनकर राजा शुद्धोधन ने अपनी सामर्थ्य की हद तक सिद्धार्थ को दुःख से दूर रखने की कोशिश की. लेकिन छोटी सी आयु में ही सिद्धार्थ जीवन और मृत्यु की सच्चाई को समझ गए. उन्होंने यह जान लिया कि जिस प्रकार मनुष्य का जन्म लेना एक सच्चाई है उसी प्रकार बुढ़ापा और निधन भी जीवन की कभी ना टलने वाली हकीकत है. संसार की सबसे बड़ी सच्चाई जानने के बाद महात्मा बुद्ध सांसारिक खुशियों और विलासिता भरे जीवन से पूरी तरह विमुख हो गए. राज पाठ के साथ, पत्नी और पुत्र को छोड़कर उन्होंने एक साधु का जीवन अपना लिया !!

Cosmic_Buddha
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बुद्धत्व की प्राप्ति 

दो अन्य ब्राह्मणों के साथ सिद्धार्थ ने अपने भीतर उपज रहे प्रश्नों के हल ढूंढ़ने शुरू किए. लेकिन समुचित ध्यान लगाने और कड़े परिश्रम के बाद भी उन्हें अपने प्रश्नों के हल नहीं मिले. हर बार असफलता हाथ लगने के बाद उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ कठोर तप करने का निर्णय लिया. छ: वर्षों के कठोर तप के बाद भी वह अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पाए. इसके बाद उन्होंने कठोर तपस्या छोड़कर आर्य अष्टांग मार्ग, जिसे मध्यम मार्ग भी कहां जाता है, ढूंढ़ निकाला. वह एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गए और निश्चय किया कि अपने प्रश्नों के उत्तर जाने बिना वह यहां से उठेंगे नहीं. लगभग 49 दिनों तक ध्यान में रहने के बाद उन्हें सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हुई और मात्र 35 वर्ष की उम्र में ही वह सिद्धार्थ से महात्मा बुद्ध बन गए!!

ज्ञान की प्राप्ति होने के बाद महात्मा बुद्ध दो व्यापारियों, तपुसा और भलिका, से मिले जो उनके पहले अनुयायी भी बने. वाराणसी के समीप स्थित सारनाथ में उन्होंने अपना पहला धर्मोपदेश दिया !!

बुद्ध का महापरिनिर्वाण 

बौद्ध धर्म से जुड़े साहित्य के अनुसार 80 वर्ष की आयु में महात्मा बुद्ध ने यह घोषित कर दिया था कि बहुत ही जल्द वह महापरिनिर्वाण की अवस्था में पहुंच जाएंगे. इस कथन के बाद महात्मा बुद्ध ने एक लुहार के हाथ से आखिरी निवाला खाया. इसके बाद वह बहुत ज्यादा बीमार हो गए. लुहार को लगा कि उसके हाथ से खाने के कारण महात्मा बुद्ध की यह हालत हुई है इसीलिए महात्मा बुद्ध ने अपने एक अनुयायी को कुंडा नामक लुहार को समझाने भेजा. वैद्य ने भी यह प्रमाणित कर दिया था कि उनका निधन वृद्धावस्था के कारण हुआ है ना कि विशाक्त खाद्य के कारण!!

buddha
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बौद्ध धर्म की मुख्य-शिक्षा 

सम्यक दृष्टि – सम्यक दृष्टि का अर्थ है कि जीवन में हमेशा सुख-दुख आता रहता है हमें अपने नजरिये को सही रखना चाहिए. अगर दुख है तो उसे दूर भी किया जा सकता है!!

सम्यक संकल्प – इसका अर्थ है कि जीवन में जो काम करने योग्य है, जिससे दूसरों का भला होता है हमें उसे करने का संकल्प लेना चाहिए और ऐसे काम कभी नहीं करने चाहिए जो अन्य लोगों के लिए हानिकारक साबित हो!!

सम्यक वचन – इसका अर्थ यह है कि मनुष्य को अपनी वाणी का सदैव सदुपयोग ही करना चाहिए. असत्य, निंदा और अनावश्यक बातों से बचना चाहिए!!

सम्यक कर्मांत – मनुष्य को किसी भी प्राणी के प्रति मन, वचन, कर्म से हिंसक व्यवहार नहीं करना चाहिए. उसे दुराचार और भोग विलास से दूर रहना चाहिए!!

सम्यक आजीविका – गलत, अनैतिक या अधार्मिक तरीकों से आजीविका प्राप्त नहीं करना!!

सम्यक व्यायाम – बुरी और अनैतिक आदतों को छोडऩे का सच्चे मन से प्रयास करना चाहिए. मनुष्य को सदगुणों को ग्रहण करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए!!

सम्यक स्मृति – इसका अर्थ यह है कि हमें कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए कि सांसारिक जीवन क्षणिक और नाशवान है!!

सम्यक समाधि – ध्यान की वह अवस्था जिसमें मन की अस्थिरता, चंचलता, शांत होती है तथा विचारों का अनावश्यक भटकाव रुकता है!!

 

Note::-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी Id है: kmsraj51@hotmail.com. पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

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The Life and Times of Gautama Buddha in Hindi ~ हिन्दी में गौतम बुद्ध के जीवन और समय का विस्तार !!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..
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** हिन्दी में गौतम बुद्ध के जीवन और समय का विस्तार **


BUDDHA - KMSRAJ51


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** सामान्य व्यक्ति से महापुरुष तक का सफर – महात्मा बुद्ध **

buddha --

भारत की पवित्र भूमि पर ऐसे कई महापुरुषों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने कृत्यों और सिद्धांतों के बल पर मानव जीवन के भीतर छिपे गूढ़ रहस्यों को उजागर किया. इन्हीं में से एक हैं महात्मा बुद्ध, जिन्होंने सामान्य मनुष्य के रूप में जन्म लेकर अध्यात्म की उस ऊंचाई को छुआ जहां तक पहुंचना किसी आम व्यक्ति के लिए मुमकिन नहीं है. ऐसे महान पुरुष के दिखलाए गए मार्ग को लोगों ने एक धर्म के रूप में ग्रहण किया जिसके परिणामस्वरूप भारत समेत सभी बड़े देशों में बौद्ध धर्म एक प्रमुख धर्म के रूप में स्वीकृत कर लिया गया.

महात्मा बुद्ध का वास्तविक नाम सिद्धार्थ था किंतु गौतमी द्वारा पाले जाने के कारण उन्हें गौतम भी कहा गया. बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद उनके नाम के आगे बुद्ध उपसर्ग जोड़ दिया गया और धीरे-धीरे वे महात्मा बुद्ध के तौर पर प्रख्यात हो गए. गौतम बुद्ध के आदर्शों और बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले लोगों के लिए आज का दिन बेहद खास है. मान्यताओं के अनुसार बैसाख मास की पूर्णिमा के दिन महात्मा बुद्ध पृथ्वी पर अवतरित हुए थे और इसी दिन उन्हें बुद्धत्व के साथ-साथ महापरिनिर्वाण की भी प्राप्ति हुई थी.


buddha_nature

** महात्मा बुद्ध का जीवन **

सिद्धार्थ का जन्म शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन के घर हुआ था. जन्म के सात दिन के भीतर ही सिद्धार्थ की मां का निधन हो गया था. उनका पालन पोषण शुद्धोधन की दूसरी रानी महाप्रजावती ने किया. सिद्धार्थ के जन्म के समय ही एक महान साधु नेब यह घोषणा कर दी थी कि यह बच्चा या तो एक महान राजा बनेगा या फिर एक बेहद पवित्र मनुष्य के रूप में अपनी पहचान स्थापित करेगा.

इस भविष्यवाणी को सुनकर राजा शुद्धोधन ने अपनी सामर्थ्य की हद तक सिद्धार्थ को दुःख से दूर रखने की कोशिश की. लेकिन छोटी सी आयु में ही सिद्धार्थ जीवन और मृत्यु की सच्चाई को समझ गए. उन्होंने यह जान लिया कि जिस प्रकार मनुष्य का जन्म लेना एक सच्चाई है उसी प्रकार बुढ़ापा और निधन भी जीवन की कभी ना टलने वाली हकीकत है. संसार की सबसे बड़ी सच्चाई जानने के बाद महात्मा बुद्ध सांसारिक खुशियों और विलासिता भरे जीवन से पूरी तरह विमुख हो गए. राज पाठ के साथ, पत्नी और पुत्र को छोड़कर उन्होंने एक साधु का जीवन अपना लिया !!


Cosmic_Buddha

** बुद्धत्व की प्राप्ति **

दो अन्य ब्राह्मणों के साथ सिद्धार्थ ने अपने भीतर उपज रहे प्रश्नों के हल ढूंढ़ने शुरू किए. लेकिन समुचित ध्यान लगाने और कड़े परिश्रम के बाद भी उन्हें अपने प्रश्नों के हल नहीं मिले. हर बार असफलता हाथ लगने के बाद उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ कठोर तप करने का निर्णय लिया. छ: वर्षों के कठोर तप के बाद भी वह अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पाए. इसके बाद उन्होंने कठोर तपस्या छोड़कर आर्य अष्टांग मार्ग, जिसे मध्यम मार्ग भी कहां जाता है, ढूंढ़ निकाला. वह एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गए और निश्चय किया कि अपने प्रश्नों के उत्तर जाने बिना वह यहां से उठेंगे नहीं. लगभग 49 दिनों तक ध्यान में रहने के बाद उन्हें सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हुई और मात्र 35 वर्ष की उम्र में ही वह सिद्धार्थ से महात्मा बुद्ध बन गए!!

ज्ञान की प्राप्ति होने के बाद महात्मा बुद्ध दो व्यापारियों, तपुसा और भलिका, से मिले जो उनके पहले अनुयायी भी बने. वाराणसी के समीप स्थित सारनाथ में उन्होंने अपना पहला धर्मोपदेश दिया !!


** बुद्ध का महापरिनिर्वाण **

बौद्ध धर्म से जुड़े साहित्य के अनुसार 80 वर्ष की आयु में महात्मा बुद्ध ने यह घोषित कर दिया था कि बहुत ही जल्द वह महापरिनिर्वाण की अवस्था में पहुंच जाएंगे. इस कथन के बाद महात्मा बुद्ध ने एक लुहार के हाथ से आखिरी निवाला खाया. इसके बाद वह बहुत ज्यादा बीमार हो गए. लुहार को लगा कि उसके हाथ से खाने के कारण महात्मा बुद्ध की यह हालत हुई है इसीलिए महात्मा बुद्ध ने अपने एक अनुयायी को कुंडा नामक लुहार को समझाने भेजा. वैद्य ने भी यह प्रमाणित कर दिया था कि उनका निधन वृद्धावस्था के कारण हुआ है ना कि विशाक्त खाद्य के कारण!!

bbuddha

** बौद्ध धर्म की मुख्य-शिक्षा **

=> सम्यक दृष्टि – सम्यक दृष्टि का अर्थ है कि जीवन में हमेशा सुख-दुख आता रहता है हमें अपने नजरिये को सही रखना चाहिए. अगर दुख है तो उसे दूर भी किया जा सकता है!!

=> सम्यक संकल्प – इसका अर्थ है कि जीवन में जो काम करने योग्य है, जिससे दूसरों का भला होता है हमें उसे करने का संकल्प लेना चाहिए और ऐसे काम कभी नहीं करने चाहिए जो अन्य लोगों के लिए हानिकारक साबित हो!!

=> सम्यक वचन – इसका अर्थ यह है कि मनुष्य को अपनी वाणी का सदैव सदुपयोग ही करना चाहिए. असत्य, निंदा और अनावश्यक बातों से बचना चाहिए!!

=> सम्यक कर्मांत – मनुष्य को किसी भी प्राणी के प्रति मन, वचन, कर्म से हिंसक व्यवहार नहीं करना चाहिए. उसे दुराचार और भोग विलास से दूर रहना चाहिए!!

=> सम्यक आजीविका – गलत, अनैतिक या अधार्मिक तरीकों से आजीविका प्राप्त नहीं करना!!

=> सम्यक व्यायाम – बुरी और अनैतिक आदतों को छोडऩे का सच्चे मन से प्रयास करना चाहिए. मनुष्य को सदगुणों को ग्रहण करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए!!

=> सम्यक स्मृति – इसका अर्थ यह है कि हमें कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए कि सांसारिक जीवन क्षणिक और नाशवान है!!

=> सम्यक समाधि – ध्यान की वह अवस्था जिसमें मन की अस्थिरता, चंचलता, शांत होती है तथा विचारों का अनावश्यक भटकाव रुकता है!!

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Complete Chanakya Niti in Hindi !!


::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..
2014-kms


kmsraj51 की कलम से …..
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$$ चाणक्य नीति हिन्दी में $$

Chanakya


शक्तिशाली लोगों के लिए कौनसा कार्य कटीं है ? व्यापारिओं के लिए कौनसा जगह दूर है, विद्वानों के लिए कोई देश विदेश नहीं है, मधुभाषियों का कोई शत्रु नहीं!!

राजा लोग अपने आस पास अच्छे कुल के लोगो को इसलिए रखते है क्योंकि ऐसे लोग ना आरम्भ मे, ना बीच मे और ना ही अंत मे साथ छोड़कर जाते है!!

जिस तरह सारा वन केवल एक ही पुष्प अवं सुगंध भरे वृक्ष से महक जाता है उसी तरह एक ही गुणवान पुत्र पुरे कुल का नाम बढाता है!!

जिस प्रकार केवल एक सुखा हुआ जलता वृक्ष सम्पूर्ण वन को जला देता है उसी प्रकार एक ही कुपुत्र सरे कुल के मान, मर्यादा और प्रतिष्ठा को नष्ट कर देता है!!

कुल की रक्षा के लिए एक सदस्य का बिलदान दें,गाव की रक्षा के लिए एक कुल का बिलदान दें, देश की रक्षा के लिए एक गाव का बिलदान दें, आतमा की रक्षा के लिए देश का बिलदान दें!!

ऐसे अनेक पुत्र किस काम के जो दुःख और निराशा पैदा करे. इससे तो वह एक ही पुत्र अच्छा है जो समपूणर घर को सहारा और शान्ति पर्दान करे!!

===================== ~~~~~~~~~~~ =====================


उस देश मे निवास न करे जहा आपकी कोई इजजत नहीं, जहा आप रोजगार नहीं कमा सकते,
जहा आपके कोई मित्र नहीं और जहा आप कोई ज्ञान आर्जित नहीं कर सकते।।

वहा एक दिन भी ना रके जहा ये पाच ना हो!!
धनवान व्यक्ति ,
विदान व्यक्ति जो शास्त्रों को जानता हो,
राजा,
नदियाँ,
और चिकित्सक !!

बुद्धिमान व्यक्ति ऐसे देश कभी ना जाए जहा …
रोजगार कमाने का कोई माधयम ना हो!
जहा लोग किसी से डरते न हो!
जहा लोगो को किसी बात की लज्जा न हो!!
जहा लोगो के पास बुद्धिमत्ता न हो!
जहा के लोगो की वृत्ति दान धरम करने की ना हो!!

===================== ~~~~~~~~~~~ =====================


इन बातो को बार बार गौर करे…
सही समय
सही मित्र
सही ठिकाना
पैसे कमाने के सही साधन
पैसे खर्चा करने के सही तरीके
आपके उर्जा स्रोत!!

आत्याधिक सुन्दरता के कारन सीताहरण हुआ,
अत्यंत घमंड के कारन रावन का अंत हुआ,
अत्यधिक दान देने के कारन रजा बाली को बंधन में बंधना पड़ा,
अतः सर्वत्र अति को त्यागना चाहिए!!

===================== ~~~~~~~~~~~ =====================

यदि कर्म का फल तुरन्त नहीं मिलता तो इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उसके भले-बुरे परिणाम से हम सदा के लिए बच गयें । कर्म-फल एक ऐसा अमिट तथ्य है जो आज नहीं तो कल भुगतना अवश्य ही पड़ेगा । कभी-कभी इन परिणामों में देर इसलिये होती है कि ईश्वर मानवीय बुद्धि की परीक्षा करना चाहता है कि व्यक्ति अपने कर्तव्य-धर्म समझ सकने और निष्ठापूर्वक पालन करने लायक विवेक बुद्धि संचित कर सका या नहीं । जो दण्ड भय से डरे बिना दुष्कर्मों से बचना मनुष्यता का गौरव समझता है और सदा सत्कर्मों तक ही सीमित रहता है, समझना चाहिए कि उसने सज्जनता की परीक्षा पास कर ली और पशुता से देवत्व की और बढऩे का शुभारम्भ कर दिया ।

लाठी के बल पर जानवरों को इस या उस रास्ते पर चलाया जाता है और अगर ईश्वर भी बलपूर्वक अमुक मार्ग पर चलने के लिए विवश करता तो फिर मनुष्य भी पशुओं की श्रेणी में आता, इससे उसकी स्वतंत्र आत्म-चेतना विकसित हुई या नहीं इसका पता ही नहीं चलता । भगवान ने मनुष्य को भले या बुरे कर्म करने की स्वतंत्रता इसीलिए प्रदान की है कि वह अपने विवेक को विकसित करके भले-बुरे का अन्तर करना सीखे और दुष्परिणामों के शोक-संतापों से बचने एवं सत्परिणामों का आनन्द लेने के लिए स्वत: अपना पथ निर्माण कर सकने में समर्थ हो । अतएव परमेश्वर के लिए यह उचित ही था कि मनुष्य को अपना सबसे बड़ा बुद्धिमान और सबसे जिम्मेदार बेटा समझकर उसे कर्म करने की स्वतंत्रता प्रदान करे और यह देखे कि वह मनुष्यता का उत्तरदायित्व सम्भाल सकने मे समर्थ है या नहीं ? परीक्षा के बिना वास्तविकता का पता भी कैसे चलता और उसे अपनी इस सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य में कितने श्रम की सार्थकता हुई यह कैसे अनुभव होता । आज नहीं तो कल उसकी व्यवस्था के अनुसार कर्मफल मिलकर ही रहेगा । देर हो सकती है अन्धेर नहीं । ईश्वरीय कठोर व्यवस्था, उचित न्याय और उचित कर्म-फल के आधार पर ही बनी हुई है सो तुरन्त न सही कुछ देर बाद अपने कर्मों का फल भोगने के लिए हर किसी को तैयार रहना चाहिए ।

===================== ~~~~~~~~~~~ =====================


हर मित्रता के पीछे कुछ स्वार्थ जरूर छिपा होता है। दुनिया में ऐसी कोई दोस्ती नहीं जिसके पीछे लोगों के अपने हित न छिपे हों, यह कटु सत्य है, लेकिन यही सत्य है। और जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य को बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है। चाणक्य कहते हैं कि वह उस बर्तन के समान है, जिसके ऊपर के हिस्से में दूध लगा है परंतु अंदर विष भरा हुआ होता है।

चाणक्य कहते है कि जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के संबंद में भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है। अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।

===================== ~~~~~~~~~~~ =====================


=> अपने शत्रु को हमेशा भर्म मे रखो! यदि हम कमजोर है तो अपने शत्रु को दिखाओ की हम ताकतवर है , अगर हम ताकतवर है तो अपने शत्रु को दिखाओ की हम कमजोर है।

=> अगर आप उस के पास ( नजदीक ) हँ तो उसे एहसास दिलाओ की आप उस से दूर है! यदि आप उससे दूर हँ तो उसे एहसास दिलाओ की आप उस से पास है हमेसा शत्रु क मन में भर्म की स्थिति पैदा कर के रखे!

=> अगर कोई सांप जहरीला नहीं है, तब भी उसे फुफकारना नहीं छोड़ना चाहिए। उसी तरह से कमजोर व्यक्ति को भी हर वक्त अपनी कमजोरी का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।

=> सबसे बड़ा गुरुमंत्र : कभी भी अपने रहस्यों को किसी के साथ साझा मत करो, यह प्रवृत्ति तुम्हें बर्बाद कर देगी।

=> किसी भी व्यक्ति को जरूरत से ज्यादा ईमानदार नहीं होना चाहिए। सीधे तने वाले पेड़ ही सबसे काटे जाते हैं और बहुत ज्यादा ईमानदार लोगों को ही सबसे ज्यादा कष्ट उठाने पड़ते हैं।

=> अपने बच्चे को पहले पांच साल दुलार के साथ पालना चाहिए। अगले पांच साल उसे डांट-फटकार के साथ निगरानी में रखना चाहिए। लेकिन जब बच्चा सोलह साल का हो जाए, तो उसके साथ दोस्त की तरह व्यवहार करना चाहिए। बड़े बच्चे आपके सबसे अच्छे दोस्त होते हैं।

=> दिल में प्यार रखने वाले लोगों को दुख ही झेलने पड़ते हैं। दिल में प्यार पनपने पर बहुत सुख महसूस होता है, मगर इस सुख के साथ एक डर भी अंदर ही अंदर पनपने लगता है, खोने का डर, अधिकार कम होने का डर आदि-आदि। मगर दिल में प्यार पनपे नहीं, ऐसा तो हो नहीं सकता। तो प्यार पनपे मगर कुछ समझदारी के साथ। संक्षेप में कहें तो प्रीति में चालाकी रखने वाले ही अंतत: सुखी रहते हैं।

=> हर मित्रता के पीछे कुछ स्वार्थ जरूर छिपा होता है। दुनिया में ऐसी कोई दोस्ती नहीं जिसके पीछे लोगों के अपने हित न छिपे हों, यह कटु सत्य है, लेकिन यही सत्य है।

=> ऐसा पैसा जो बहुत तकलीफ के बाद मिले, अपना धर्म-ईमान छोड़ने पर मिले या दुश्मनों की चापलूसी से, उनकी सत्ता स्वीकारने से मिले, उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।

=> नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुंचाने वाली, उनके विश्वासों को छलनी करने वाली बातें करते हैं, दूसरों की बुराई कर खुश हो जाते हैं। मगर ऐसे लोग अपनी बड़ी-बड़ी और झूठी बातों के बुने जाल में खुद भी फंस जाते हैं। जिस तरह से रेत के टीले को अपनी बांबी समझकर सांप घुस जाता है और दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है, उसी तरह से ऐसे लोग भी अपनी बुराइयों के बोझ तले मर जाते हैं।

=> जो बीत गया, सो बीत गया। अपने हाथ से कोई गलत काम हो गया हो तो उसकी फिक्र छोड़ते हुए वर्तमान को सलीके से जीकर भविष्य को संवारना चाहिए।

=> असंभव शब्द का इस्तेमाल बुजदिल करते हैं। बहादुर और बुद्धिमान व्यक्ति अपना रास्ता खुद बनाते हैं।

=> संकट काल के लिए धन बचाएं। परिवार पर संकट आए तो धन कुर्बान कर दें। लेकिन अपनी आत्मा की हिफाजत हमें अपने परिवार और धन को भी दांव पर लगाकर करनी चाहिए।

=> भाई-बंधुओं की परख संकट के समय और अपनी स्त्री की परख धन के नष्ट हो जाने पर ही होती है।

=> कष्टों से भी बड़ा कष्ट दूसरों के घर पर रहना है।

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chanakya-02

chankya-01


=> चाणक्य कहते है कि जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के संबंद में भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है। अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।

=> चाणक्य का मानना है कि व्यक्ति को कभी अपने मन का भेद नहीं खोलना चाहिए। उसे जो भी कार्य करना है, उसे अपने मन में रखे और पूरी तन्मयता के साथ समय आने पर उसे पूरा करना चाहिए।

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$$ Chanakya story in hindi $$


एक दिन चाणक्य का एक परिचित उनके पास आया और उत्साह से कहने लगा, ‘आप जानते हैं, अभी-अभी मैंने आपके मित्र के बारे में क्या सुना?’

चाणक्य अपनी तर्क-शक्ति, ज्ञान और व्यवहार-कुशलता के लिए विख्यात थे। उन्होंने अपने परिचित से कहा, ‘आपकी बात मैं सुनूं, इसके पहले मैं चाहूंगा कि आप त्रिगुण परीक्षण से गुजरें।’
उस परिचित ने पूछा, ‘ यह त्रिगुण परीक्षण क्या है?’

चाणक्य ने समझाया , ‘ आप मुझे मेरे मित्र के बारे में बताएं, इससे पहले अच्छा यह होगा कि जो कहें, उसे थोड़ा परख लें, थोड़ा छान लें। इसीलिए मैं इस प्रक्रिया को त्रिगुण परीक्षण कहता हूं। इसकी पहली कसौटी है सत्य। इस कसौटी के अनुसार जानना जरूरी है कि जो आप कहने वाले हैं, वह सत्य है। आप खुद उसके बारे में अच्छी तरह जानते हैं?’

‘नहीं,’ वह आदमी बोला, ‘वास्तव में मैंने इसे कहीं सुना था। खुद देखा या अनुभव नहीं किया था।’

‘ठीक है,’ – चाणक्य ने कहा, ‘आपको पता नहीं है कि यह बात सत्य है या असत्य। दूसरी कसौटी है -‘ अच्छाई। क्या आप मुझे मेरे मित्र की कोई अच्छाई बताने वाले हैं?’
‘नहीं,’ उस व्यक्ति ने कहा। इस पर चाणक्य बोले,’ जो आप कहने वाले हैं, वह न तो सत्य है, न ही अच्छा। चलिए, तीसरा परीक्षण कर ही डालते हैं ।’

‘तीसरी कसौटी है – उपयोगिता। जो आप कहने वाले हैं, वह क्या मेरे लिए उपयोगी है?’

‘नहीं, ऐसा तो नहीं है।’ सुनकर चाणक्य ने आखिरी बात कह दी।’ आप मुझे जो बताने वाले हैं, वह न सत्य है, न अच्छा और न ही उपयोगी, फिर आप मुझे बताना क्यों चाहते हैं?’

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अग्निहोत्र बिनु वेद नहिं, यज्ञ क्रिया बिनु दान ।
भाव बिना नहिं सिध्दि है, सबमें भाव प्रधान ॥

Hindi Meaning –>

बिना अग्निहोत्र के वेदपाठ व्यर्थ है और दान के बिना यज्ञादि कर्म व्यर्थ हैं ।
भाव के बिना सिध्दि नहीं प्राप्त होती इसलिए भाव ही प्रधान है ॥१॥

English Meaning –>
Chanting of the Vedas without making ritualistic sacrifices to the Supreme Lord through the medium of Agni, and sacrifices not followed by bountiful gifts are futile. Perfection can be achieved only through devotion (to the Supreme Lord) for devotion is the basis of all success.

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::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..
kms1006


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गौतम बुद्ध के जीवन और समय का विस्तार।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMY-KMSRAJ51-N

गौतम बुद्ध के जीवन और समय का विस्तार।

BUDDHA - KMSRAJ51


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सामान्य व्यक्ति से महापुरुष तक का सफर – महात्मा बुद्ध।

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भारत की पवित्र भूमि पर ऐसे कई महापुरुषों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने कृत्यों और सिद्धांतों के बल पर मानव जीवन के भीतर छिपे गूढ़ रहस्यों को उजागर किया। इन्हीं में से एक हैं महात्मा बुद्ध।

जिन्होंने सामान्य मनुष्य के रूप में जन्म लेकर अध्यात्म की उस ऊंचाई को छुआ जहां तक पहुंचना किसी आम व्यक्ति के लिए मुमकिन नहीं है। ऐसे महान पुरुष के दिखलाए गए मार्ग को लोगों ने एक धर्म के रूप में ग्रहण किया जिसके परिणामस्वरूप भारत समेत सभी बड़े देशों में बौद्ध धर्म एक प्रमुख धर्म के रूप में स्वीकृत कर लिया गया।

महात्मा बुद्ध का वास्तविक नाम सिद्धार्थ था, किंतु गौतमी द्वारा पाले जाने के कारण उन्हें गौतम भी कहा गया। बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद उनके नाम के आगे बुद्ध उपसर्ग जोड़ दिया गया और धीरे-धीरे वे महात्मा बुद्ध के तौर पर प्रख्यात हो गए।

गौतम बुद्ध के आदर्शों और बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले लोगों के लिए आज का दिन बेहद खास है। मान्यताओं के अनुसार बैसाख मास की पूर्णिमा के दिन महात्मा बुद्ध पृथ्वी पर अवतरित हुए थे, और इसी दिन उन्हें बुद्धत्व के साथ-साथ महापरिनिर्वाण की भी प्राप्ति हुई थी।

buddha_nature

महात्मा बुद्ध का जीवन।

सिद्धार्थ का जन्म शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन के घर हुआ था। जन्म के सात दिन के भीतर ही सिद्धार्थ की मां का निधन हो गया था। उनका पालन पोषण शुद्धोधन की दूसरी रानी महाप्रजावती ने किया।

सिद्धार्थ के जन्म के समय ही एक महान साधु नेब यह घोषणा कर दी थी कि यह बच्चा या तो एक महान राजा बनेगा या फिर एक बेहद पवित्र मनुष्य के रूप में अपनी पहचान स्थापित करेगा।

इस भविष्यवाणी को सुनकर राजा शुद्धोधन ने अपनी सामर्थ्य की हद तक सिद्धार्थ को दुःख से दूर रखने की कोशिश की। लेकिन छोटी सी आयु में ही सिद्धार्थ जीवन और मृत्यु की सच्चाई को समझ गए।

उन्होंने यह जान लिया कि जिस प्रकार मनुष्य का जन्म लेना एक सच्चाई है उसी प्रकार बुढ़ापा और निधन भी जीवन की कभी ना टलने वाली हकीकत है। संसार की सबसे बड़ी सच्चाई जानने के बाद महात्मा बुद्ध सांसारिक खुशियों और विलासिता भरे जीवन से पूरी तरह विमुख हो गए। राज पाठ के साथ, पत्नी और पुत्र को छोड़कर उन्होंने एक साधु का जीवन अपना लिया।

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बुद्धत्व की प्राप्ति।

दो अन्य ब्राह्मणों के साथ सिद्धार्थ ने अपने भीतर उपज रहे प्रश्नों के हल ढूंढ़ने शुरू किए। लेकिन समुचित ध्यान लगाने और कड़े परिश्रम के बाद भी उन्हें अपने प्रश्नों के हल नहीं मिले। हर बार असफलता हाथ लगने के बाद उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ कठोर तप करने का निर्णय लिया।

छ: वर्षों के कठोर तप के बाद भी वह अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पाए। इसके बाद उन्होंने कठोर तपस्या छोड़कर आर्य अष्टांग मार्ग, जिसे मध्यम मार्ग भी कहां जाता है, ढूंढ़ निकाला।

वह एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गए और निश्चय किया कि अपने प्रश्नों के उत्तर जाने बिना वह यहां से उठेंगे नहीं। लगभग 49 दिनों तक ध्यान में रहने के बाद उन्हें सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हुई और मात्र 35 वर्ष की उम्र में ही वह सिद्धार्थ से महात्मा बुद्ध बन गए।

ज्ञान की प्राप्ति होने के बाद महात्मा बुद्ध दो व्यापारियों, तपुसा और भलिका, से मिले जो उनके पहले अनुयायी भी बने। वाराणसी के समीप स्थित सारनाथ में उन्होंने अपना पहला धर्मोपदेश दिया।

बुद्ध का महापरिनिर्वाण।

बौद्ध धर्म से जुड़े साहित्य के अनुसार 80 वर्ष की आयु में महात्मा बुद्ध ने यह घोषित कर दिया था कि बहुत ही जल्द वह महापरिनिर्वाण की अवस्था में पहुंच जाएंगे। इस कथन के बाद महात्मा बुद्ध ने एक लुहार के हाथ से आखिरी निवाला खाया।

इसके बाद वह बहुत ज्यादा बीमार हो गए। लुहार को लगा कि उसके हाथ से खाने के कारण महात्मा बुद्ध की यह हालत हुई है इसीलिए महात्मा बुद्ध ने अपने एक अनुयायी को कुंडा नामक लुहार को समझाने भेजा। वैद्य ने भी यह प्रमाणित कर दिया था कि उनका निधन वृद्धावस्था के कारण हुआ है ना कि विशाक्त खाद्य के कारण।

bbuddha

बौद्ध धर्म की मुख्य-शिक्षा।

सम्यक दृष्टि – सम्यक दृष्टि का अर्थ है कि जीवन में हमेशा सुख-दुख आता रहता है हमें अपने नजरिये को सही रखना चाहिए। अगर दुख है तो उसे दूर भी किया जा सकता है।

सम्यक संकल्प – इसका अर्थ है कि जीवन में जो काम करने योग्य है, जिससे दूसरों का भला होता है हमें उसे करने का संकल्प लेना चाहिए और ऐसे काम कभी नहीं करने चाहिए जो अन्य लोगों के लिए हानिकारक साबित हो।

सम्यक वचन – इसका अर्थ यह है कि मनुष्य को अपनी वाणी का सदैव सदुपयोग ही करना चाहिए। असत्य, निंदा और अनावश्यक बातों से बचना चाहिए।

सम्यक कर्मांत – मनुष्य को किसी भी प्राणी के प्रति मन, वचन, कर्म से हिंसक व्यवहार नहीं करना चाहिए। उसे दुराचार और भोग विलास से दूर रहना चाहिए।

सम्यक आजीविका – गलत, अनैतिक या अधार्मिक तरीकों से आजीविका प्राप्त नहीं करना।

सम्यक व्यायाम – बुरी और अनैतिक आदतों को छोडऩे का सच्चे मन से प्रयास करना चाहिए. मनुष्य को सदगुणों को ग्रहण करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए।

सम्यक स्मृति – इसका अर्थ यह है कि हमें कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए कि सांसारिक जीवन क्षणिक और नाशवान है।

सम्यक समाधि – ध्यान की वह अवस्था जिसमें मन की अस्थिरता, चंचलता, शांत होती है तथा विचारों का अनावश्यक भटकाव रुकता है।

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आपका सबका प्रिय दोस्त,

Krishna Mohan Singh(KMS)
Head Editor, Founder & CEO
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