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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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poet hemraj thakur

मेरे वतन की मिट्टी की खुशबू।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मेरे वतन की मिट्टी की खुशबू। ♦

मेरे वतन की माटी की खुशबू, सुबह – शाम जिसे जब आती है।
मन हो उठता है बाग – बाग सा, रूह होती तब मदमाती है।

यह भक्ति – मुक्ति की पावन धरा है, राम -कृष्ण को जनाती है।
गंगा – यमुनी तहजीबों को, यह भूमि खुद पर ही तो बहाती है।

धर्म अनेक यहां नाना भाषाएं, कई कुल कुनबे, कई जाति है।
सीधा सादा मानुष यहां का, विश्व पटल पर जिसकी ख्याति है।

दादुर, म्यूर, पपिहरा के शोर और कोयल काली मीठा जब गाती है।
भारत देश की धरती सचमुच, हर्षित हो फूली न तब समाती है।

शीतल पवन जब हवा के झोंको से, धूल धारा से अम्बर में उड़ाती है।
यूं लगता है मानो भारत की भूमि, मस्ती में होली का पर्व मनाती है।

रिमझिम बारिश की शीतल बूंदें, सिंचित करती यहां की जब माटी है।
उग आती है तब नाना फसलें, भारत की जनता उन्हें तब खाती है।

छा जाए कभी संकट के बादल तो, वीर बिरादरी सर अपना जब चढ़ाती है।
बुंदेले हर बोलों की भांति फिर गौरव गाथा, जनता उनकी तब गाती है।

प्रेम करुणा की प्रवाहक यह भूमि, हमेशा विश्व में शान्ति ही चाहती है।
नाहक इसको छेड़े जो कोई, फिर तो दुश्मन की ईंट से ईंट बजाती है।

जय बोलो भाई जय बोलो सब, मां भारती के पावन आंचल की।
जय बोलो भाई जय बोलो सब, उतर, दक्षिण, पश्चिम और पूर्वांचल की।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — मेरे वतन की मिट्टी की खुशबू का क्या कहना, सुबह – शाम जिसे जब भी आती है, मन हो उठता है बाग – बाग सा, रूह होती तब मदमाती है। यह वही पवित्र भूमि है जहाँ पर भक्ति – मुक्ति की पावन धारा सदैव ही बहती है, राम – कृष्ण को जनाती है यह भूमि। यही पर माँ गंगा, यमुना सरस्वती नदियों को यह भूमि खुद पर ही तो बहाती है। यहां पर धर्म अनेक यहां नाना भाषाएं, कई कुल कुनबे, कई जाति है, सीधा सादा मानुष यहां का, विश्व पटल पर जिसकी ख्याति है। रिमझिम बारिश की शीतल बूंदें जब सिंचित करती यहां की माटी को तब उग आती है तब नाना फसलें, भारत की जनता उन्हें तब खाती है। प्रेम व करुणा की प्रवाहक रही है सदैव से ही यह भूमि, हमेशा विश्व में शान्ति ही चाहती है, नाहक इसको छेड़े जो कोई भी, फिर तो दुश्मन की ईंट से ईंट बजाती है। जय बोलो भाई जय बोलो सब, मां भारती के पावन आंचल की। जय बोलो भाई जय बोलो सब, उतर, दक्षिण, पश्चिम और पूर्वांचल की।

—————

यह कविता (मेरे वतन की मिट्टी की खुशबू।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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पेड़ों का महत्व।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पेड़ों का महत्व। ♦

‘या’  पेड़ो की महता।

दूषित धारा को करने वालो, कुदरत का कहर तो बरपे गा।
दूसरों के दर्द से दर्द न होगा, निज पीड़ा से आंसू ढरके गा।

इन मौन गगन को चूमने वाले, पेड़ों की महता कुछ तो जानो।
जल – प्राण रगों में बहने वाले, इनकी देन है यह तो पहचानो।

माना कि लकड़ी जरूरत है, बेवजह से तो न इनको काटो।
काट काट कर इनको यारो, जीवन के बीच में खाई न पाटो।

इस धरती के सौंदर्य के खातिर, पेड़ – पौधे तुम खूब लगाओ।
मानव -मानव में चेतना भर दो, जल वायु का संकट हटाओ।

अवैध खनन और अंधा विकास भी, कहां खतरे से खाली है?
चुन – चुनकर लेगा बदला हमसे, बैठा अम्बर में वह माली है।

उसकी लाठी आवाज न करती, पर पीड़ा बहुत ही भरी है।
कई बार झेली ये पीड़ा सबने, हमको भूलने की बीमारी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जैसे हम खाने के बिना नहीं रह सकते। वैसे ही पेड़-पौधे के बिना भी हमारा जीवन अधूरा है। जैसे हमें जीवित रहने के लिए भोजन-पानी की आवश्यकता है वैसे ही प्रकृति को जिंदा रखने के लिए पेड़-पौधे, साफ-सफाई, प्रदूषण रहित धरा बनाने की आवश्यकता है। जलवायु प्रदूषण को रोकना होगा और वृक्षों की कटाई रोकनी होगी। कटाई की जगह वृक्षों को लगाना होगा जिससे कि प्राकृतिक आपदा से हम बच सकें। पर्यावरण को बचाना, प्रकृति को बचाना हमारे हाथ में है। आओ हमसब मिलकर ये संकल्प ले की हमसब खुद प्रत्येक दिन पेड़-पौधे लगाएंगे और सभी को पेड़-पौधे लगाने के लिए जागरूक करेंगे।

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यह कविता (पेड़ों का महत्व।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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दुनियादारी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दुनियादारी। ♦

बेरुख हो चुकी हैं हवाएं, अब मौसम भी शुष्क हुआ है।
महफूज रहे जमाने में सब, बस रब से इतनी सी दुआ है।

लोग लगे हैं स्वार्थ साधने, मतलब की ही दुनियादारी है।
मुंह में राम – राम बगल में छुरी, इस दौर में भी जारी है।

रिश्तों की साख है दाव पे, आज कौन किसका पराया है?
दमड़ी का खेला है, वरना सगे को कहे कहां से आया है?

मरणासनी बाप की है कहां? चिन्ता में पिता की माया है।
सेवा की पड़ी ही है किसको? हाथ तिज़ोरी धन न आया है।

है फुरसत कहां बतियाने की आज? अपनापन ही खोया है।
कांधा देते पुत्र अर्थी को पिता की, पूछो कितना कर रोया है?

बहिर्मुखी जमाने में अब तो, संस्कारों की बात बेईमानी है।
हर रिश्तेे – नाते में रहा भरोसा कहां? मन में भरी शैतानी है।

सनातन से रहा सरोकार कहां? आधुनिकता की खुमारी है।
अपनी सभ्यता से रहा प्यार कहां? पश्चिम की हुई पुजारी है।

नई नसलों को नसीहत दो वरना, खतरे में ये दुनियादारी है।
कैंसर है महज जिस्म लीलता, रूह घाती स्वार्थ की बीमारी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — आजकल स्वार्थ से भरी हुई दुनियादारी हो गई है, इंसानियत के नाते कोई किसी का कार्य नही कर रहा हैं, हर कार्य में उसका स्वार्थ निहित हैं। स्वार्थ पूरा ना होने पर आग बबूला हो जाता, भयानक बावरा रूप धारण कर अपना और दूसरों का भी नुकसान करता है। पश्चिमी संस्कृति का आज की पीढ़ी पर कुछ ऐसा असर हुआ की वह अपने भारत देश के महान प्राचीन सनातन संस्कृति का मजाक बनाता है, और काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार, से भरा हुआ जीवन व्यतीत कर रहा हैं। उसे ना ही अपना फिक्र है और ना ही अपने परिवार का फिक्र है। व्यभिचार में डूबा हुआ, अच्छा व बुरा के भेद को भी नहीं समझ पा रहा हैं। अपने कर्मों से अपना ही विनाश कर रहा हैं आज का मानव। हे मेरे देश के युवा अब भी समय हैं संभल जाओ और अपने प्राचीन महान भारतीय संस्कृति, सभ्यता व संस्कार को धारण कर अपना व अपने परिवार का कल्याण करों। सच्चे मन से देश सेवा का कार्य करों।

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यह कविता (दुनियादारी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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माँ की जय हो।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ की जय हो। ♦

तूने अपना नूर गवाया,
तब जा के हमें सृजाया।
पीड़ा सह कर हमें उत्पाया,
अपना दर्द सब अंदर छुपाया।
तेरी जय हो मां!

मल – मूत्र से हमें बचाया,
अपने मुंह का हमें खिलाया।
उंगली पकड़ कर चलना सिखाया,
तोतली जुबां को बतियाना बताया,
अपना दर्द सब अंदर छुपाया।
तेरी जय हो मां!

पाला – पोसा बड़ा बनाया,
सर्दी में गर्मी दी, धूप में छाया।
लकड़ी सी सूखा दी अपनी काया,
अरमान कुचल निज हमें पढ़ाया।
हमारी गलती पर भी हमें न सताया,
अपना दर्द सब अंदर छुपाया।
तेरी जय हो मां!

हांफते – कांपते तुझे वृद्धा -आश्रम पहुंचाया,
हमने जोरू संग गुलछर्रे उड़ाया।
बलिदान तेरा कभी याद न आया,
कितना कर खाती वह बूढ़ी काया?
तुझमें तो है करूणा सिंधु समाया,
सब के बाबजूद भी कुछ न बताया,
अपना दर्द सब अंदर छुपाया।
तेरी जय हो मां!

हम ढीठ है, एहसान फरामोश,
हमें रही न बचपन की होश।
तूने कैसे बड़ा किया था, हमें पाल-पोष,
कोई हमें गड़ाता निगाहें था तो,
दिखाती थी तू कैसा जोश?
जोरू की तिरेरी से ही डर गए हम,
है बड़ा ही यह अफसोस।
तू है कि अपने दर्द को,
रही है अंदर ही अंदर मां मसोस।
तेरी जय हो मां!

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — कड़वा है मगर सत्य यही है इस संसार में माँ की जगह कोई और नहीं ले सकता हैं। माँ जब से गर्भवती होती हैं तभी से अपने बच्चे का ख्याल रखती है। जब जन्म होता है तभी से उसके लिए दिन रात एक कर उसका पूरा ख्याल रखती है, उसे पाल-पोष बड़ा करती हैं। कोई भी दुःख आये वह अपने बच्चे तक उस दुःख को पहुंचने भी नहीं देती हैं। माँ तो माँ होती है, एहसान फरामोश आज की पीढ़ी अपने माँ बाप का ख्याल ही नहीं रखती है। आजकल के युवा अपने जोरू का गुलाम इस कदर हो गए है की उसके कहने पर माँ बाप को वृद्धाआश्रम छोड़ आते है, वो ये भूल जाते है की माँ ने ही हमे जन्म दिया है और पाल-पोष कर बड़ा किया हैं। माँ की स्नेह भरी ममता को भूल जाते है।

—————

यह कविता (माँ की जय हो।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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अन्तर ज्वाला धधक रही है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अन्तर ज्वाला धधक रही है। ♦

शल्थ हो चुकी है बाहर की लपटें,
फिर भी अन्तर ज्वाला धधक रही है।
हर गांव – गांव और शहर – शहर में,
नफरत की आग आज भभक रही है।

बहता विकार आज दरिया की मानिंद,
प्यार बरसाती नालों सा है सिकुड़ गया।
उड़ा रही है सब ईर्ष्या – द्वेष की आंधी,
रहा शेष कहां अब रहमो कर्म और दया?

भीगे चूनर से लालसा है नाचती,
ममता का घूंघट ही फाड़ दिया।
परहित का वर्चस्व है खत्म किया,
आज झण्डा स्वार्थ का गाड़ दिया।

मानव से छीन ली मानवता है सारी,
है शैतानियत का उसने शृंगार किया।
मदहोशी का है यूं आलम कुछ ऐसा,
मानो सबने है मादक मय पान किया।

कलकल बहती नदियों की भांति,
आज वितृप्त वासनाएं बहती है।
तृप्ति के भाव – प्रेम के सोते सूखे,
पतन की गाथा मानवता कहती है।

विकार की आंधी, वासनाओं की ब्यार से,
हर हृदय में अन्तर ज्वालाएं धधक रही है।
निरन्तर बरसते आधुनिक ज्ञान के मेघ पर,
कामनाओं की आग तब भी भभक रही है।

मालूम नहीं यह युग का प्रभाव है या,
है मानव की अक्ल पर पत्थर पड़े।
महफूज नहीं है आबरू बहु बेटी की,
पग पग पर है बहरूपिये लूटेरे खड़े।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — आज हर तरफ नफरत की आग आज भभक रही है, गांव – गांव और शहर – शहर में। विकार थो आज के समय में इस तरह से बढ़ गया है जैसे समुद्र हो, और सच्चा प्यार बरसाती के नालों सा है सिकुड़ गया। आज सभी एक दूसरे से ईर्ष्या – द्वेष कर रहे है, शील प्रेम और दया थो अब किसी के अंदर बचा ही नहीं। अब तो वह ममता का घूंघट भी नहीं रहा, आज सभी स्वार्थ के वशीभूत हो गए है। अब इंसान के अंदर मानवता बची कहा उसने तो शैतानियत का शृंगार जो कर लिया है। इस मदहोशी का आलम कुछ ऐसा, मानो सबने है नशीली शराब का पान किया हो। अब तो इस भयानक विकार की आंधी व वासनाओं की ब्यार से हर हृदय में अन्तर ज्वालाएं धधक रही है। आधुनिक ज्ञान के नाम पर ये कैसा बनता जा रहा है आज का इंसान, इनके कामनाओं की आग शांत ही नहीं हो रही है। हे मानव अब भी समय है सम्भल जा वर्ना कुछ भी नहीं बचेगा। हे मानव पुनः अपने प्राचीन संस्कृति, संस्कार व सभ्यता के अनुसार जीवन यापन कर।

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यह कविता (अन्तर ज्वाला धधक रही है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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हां मैं लिखता हूं!

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हां मैं लिखता हूं! ♦

मैं लिखता नहीं हूं इनाम के लिए,
मैं लिखता नहीं हूं पहचान के लिए,
मैं लिखता हूं प्यारे हिंदुस्तान के लिए।
हां मैं लिखता हूं!

मैं लिखता नहीं हूं छपने के लिए,
मैं लिखता नहीं हूं रटने के लिए,
मैं लिखता हूं तो बस सपने के लिए।
हां मैं लिखता हूं!

मैं लिखता नहीं हूं बताने के लिए,
मैं लिखता नहीं हूं जताने के लिए,
मैं लिखता हूं बस जमाने के लिए।
हां मैं लिखता हूं!

मैं लिखता नहीं हूं चाटुकारिता के लिए,
मैं लिखता नहीं हूं औपचारिकता के लिए,
मैं लिखता हूं तो बस साहित्यकारिता के लिए ।
हां मैं लिखता हूं!

मैं लिखता नहीं हूं सियासतदानों के लिए,
मैं लिखता नहीं हूं महज विद्वानों के लिए,
मैं लिखता हूं तो बस सिर्फ आवामों के लिए।
हां मैं लिखता हूं!

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — मैं किसी इनाम के लिए नहीं लिखता हूं, पहचान के लिए भी नहीं लिखता हूं। मैं लिखता हूं अपने प्यारे हिंदुस्तान के लिए व वर्तमान और आने वाली पीढ़ी के लिए। मैं छपने के लिए भी नहीं लिखता हूं और मैं लिखता नहीं हूं रटने के लिए, मैं लिखता हूं तो बस सपने के लिए। मैं बताने के लिए भी नहीं लिखता हूं, मैं लिखता नहीं हूं जताने के लिए, मैं लिखता हूं बस जमाने के लिए। मैं कभी भी लिखता नहीं हूं चाटुकारिता के लिए, मैं लिखता नहीं हूं औपचारिकता के लिए, मैं लिखता हूं तो बस साहित्यकारिता के लिए। मैं लिखता नहीं हूं सियासतदानों के लिए, मैं लिखता नहीं हूं महज विद्वानों के लिए, मैं लिखता हूं तो बस सिर्फ आवामों के लिए।

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यह कविता (हां मैं लिखता हूं!) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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नव संवत्सर आया री।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नव संवत्सर आया री। ♦

नव संवत्सर आया ओ आली! नव संवत्सर है आया री!
बसन्त मनभावन, चित लुभावन, आनंदोत्सव छाया री॥

हरे -भरे हर खेत – खलियान, वन – उपवन में फुलवारी है।
नील शुभ्र नभ सूरज जी उजियाली, मनमोहक मनुहारी है॥

यह भारतवर्ष के नव वर्ष आगमनोत्सव की हरियाली है।
भिनभिनाते भौंवरे, मधुमक्खियां, तितलियां भी मतवाली हैं॥

नव अंकुरित कोमल पात सब, तरुवर के स्वागत करते हैं।
मुक्त हुए सर्दी के कुंठित रक्तकण, बूढ़ों में स्फूर्ति भरते हैं॥

पश्चिम का नहीं भारत का संवत्सर, खुशियां ले के आता है।
देश को ही नहीं पूरी दुनियां को, नव वर्ष का अर्थ बताता है॥

खिलखिलाते बाल – वृद्धों के चेहरे, पर्यावरण भी हर्षाता है।
भारतवर्ष का यह वर्षोत्सव, सच में खुशहाली को लाता है॥

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — Hindu Calendar Vikram Samvat 2079, 2 अप्रैल, शनिवार से चैत्र नवरात्रि शुरू होने जा रहे हैं और इसी के साथ नया हिंदू वर्ष नवसंवत्सर 2079 भी आरंभ हो जाएगा। हर वर्ष चैत्र प्रतिपदा शुक्ल पक्ष को हिंदू नववर्ष प्रारंभ होता है। चैत्र का महीना हिंदू नववर्ष का पहला महीना होता है। इसका प्रारंभ सम्राट विक्रमादित्य ने किया था, जो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरु होता है। इस बार 02 अप्रैल को हिंदू नववर्ष 2079 या विक्रम संवत 2079 का प्रारंभ होगा। हिंदू नववर्ष को विक्रम संवत, नव संवत्सर, गुड़ी पड़वा, उगाड़ी आदि नामों से भी जाना जाता है। विक्रम संवत के प्रथम दिन से ही बसंत नवरात्रि का प्रारंभ होता है, जो चैत्र नवरात्रि के नाम से लो​कप्रिय है।

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यह कविता (नव संवत्सर आया री।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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दुहागन रोटी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दुहागन रोटी। ♦

औरंगाबाद की पटरियों पर,
बिखरी रोटी आज शर्मिंदा है।
तार -तार है इज्जत उसकी,
खाने वाला ही न जिंदा है।

खून-पसीना बहा कर उसने,
मुश्किल से इसको पाया था।
क्षुधा नाशनी इस महासुंदरी से,
निवाला एक न खाया था।

पटरी पर थी बिखरी रोटी,
पटक रही थी अपने माथे।
जलमग्न नयन थे उस बेचारी के,
कहानी इश्क की बताते-बताते।

अपने बाबा को मेरे बारे,
गांव में सुना था उसने बतियाते।
फिदा हुआ था मुझ पर तब वह,
मेरे कदमों में बाबा थे शीश नमाते।

निकल पड़ा वह गांव छोड़कर,
शहर को मेरी तलाश में।
मैं पा के रहूंगा, उस महा प्रेयसी को,’
क्या, ताकत थी उसके विश्वास में?

वह ललचता रहा, मैं ललचाती रही,
वह भटकता गया, मैं भटकाती गई।
खूब थी खेली ठिठोली उससे,
मैं भी कितनी मदमाती रही?

मुझे पाने को देख सखी,
क्या-क्या पीड़ा न उसने झेली है?
शायद मेरे गुनाहों की सजा है,
आज पटरियों पर अकेली है।

न जाने क्यों सड़कों से डर कर,
पटरी पर वह आया था?
आज सरकार ने नचाया उसको,
जीवन भर मैंने नचाया था।

धूप – धार की होकर मैंने,
पीछा उससे करवाया था।
वह भी मोह में पड़कर मेरे,
गांव से शहर को आया था।

मुझे पाने की जद्दोजहद में,
उसने, खूब मेहनत से कमाया था।
एक से बढ़कर एक करतब,
दिखा कर, उसने मुझे रिझाया था।

मैं बंध चली थी उसके पल्लू में,
मेहनत का लोहा मुझसे मनवाया था।
चल दिए अब बिन भोगे मुझको,
क्यों मेरी जिंदगी में आया था?

बेवफा न कहना प्यारे मुझको,
मैंने कदम-कदम पर सताया था।
तेरे प्यार को हे प्रियतम प्यारे!
जी भर कर मैंने आजमाया था।

क्यों छोड़ दिया इसे हालत पर इसकी?
इसका जीवन क्या इतना सस्ता है?
वह रोटी है सिसक रही आज,
यह भी कैसी व्यवस्था है?

महबूब मेरे क्या मिलन हुआ यह?
देख रहा ये जमाना है।
किस्मत में मिलन था इतना ही शायद,
मौत तो महज एक बहाना है।

हो गई हूं अछूत सी अब मैं,
कोई मानुष न मुझको अब खाएगा।
कौन मिलेगा प्रीतम ऐसा?
जो तुझ सा मुझे कमाए गा।

तू जा प्यारे में जी लूंगी,
भूखा, चील-कौआ मुझे कोई नोचेगा।
है कौन सहारा, बेसहारा का अब?
जो मेरी इज्जत की इतनी सोचेगा।

आज मैं समझी प्रीतम-प्यारे,
सच्चा प्यार क्या होता है?
तू जिया मेरे लिए, मरा मेरे लिए,
मुझे पाने को हल तक जोता है।

बाकी तो खरीददार है सब,
चंद पैसा ही मोल मेरा होता है।
वे क्या जाने कीमत मेरी?
रोटी का मोल क्या होता है?

तेरी शहादत पर आज प्रिये,
मेरा जर्रा-जर्रा रोता है।
तेरा अरमान थी मैं, तेरा भगवान थी मैं,
मुझसे बढ़कर तेरा, और कोई न होता है।

खामोश है बिखरी रोटी बेचारी,
आंखों से अश्रुओं का सोता है।
किया प्रेम न जीवन में जिसने, वह क्या जाने?
मिलकर बिछड़ने का, दर्द क्या होता है?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — मैं रोटी हूं, हर किसी को मुझे देखकर बहुत ही खुशी होती है क्योंकि मैं हर किसी की भूख मिटा देती हूं। चाहे गरीब हो, चाहे अमीर हो, चाहे बच्चे हो, बूढ़े हो, नौजवान हो सभी को सदैव ही मेरी जरूरत होती है। मैं दूसरों के काम आती हूं हर किसी की मैं मदद करती हूं, भूखे बेसहारा लोगों के चेहरे पर पलभर में मुझे देखकर मुस्कान आ जाती है। मेरे लिए ही सब अपना घर बार छोड़कर गांव से शहर को आते है, लेकिन उन्हें कहाँ पता था की कोरोना रुपी राक्षस, असुर, दैत्य आएगा और हमें (मजदूरों) रुलाएगा। हमें क्या पता था की हम एक एक रोटी के लिए मोहताज हो जायेंगे।

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यह कविता (दुहागन रोटी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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तबाही के भरे मद मंजर में।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ तबाही के भरे मद मंजर में। ♦

संजोया सपना तबाह हो गया, इमारतें भी अब ढह रही है।
इस तबाही के भरे मद मंजर में, रूहें चीख के कह रही है।
या खुदा ओ परवरदिगार! ये हम कौन सा जुर्म सह रही हैं?
दशों दिशाओं में गर देखें तो, विध्वंस की नदियां बह रही हैं।

यूक्रेन रूस का ताजा हाल, विश्व पटल को क्या बता रहा है?
यह द्वंद्व युद्ध का महा विनाश क्या, विश्व युद्ध में समा रहा है?
कलियुग का कल जनित कलह, संतोष धरती का खा रहा है।
मदवानों की मदहोशी का आलम, निर्दोषों का लहू बहा रहा है।

आधुनिक अस्त्रों के भयानक बवंडर ने, नव निर्माण सब तोड़े हैं।
चाव से बनाए थे जो महल अटाली, वे भव्य भवन कहां छोड़े हैं।
इस कल कलह के महा विनाश ने, कई मारे, कई सर फोड़े हैं।
ये मदहोश क्या जाने कि ये सुख साधन, पुरखों ने कैसे जोड़े हैं?

कितना आसान है सब नष्ट कर देना, निर्माण तो मुश्किल भारी है।
था जो कल तक कार कोठी का मालिक, आज वह बना भिखारी है।
किसको समझाऊं? सुनता ही कौन है? सबकी मत जो मारी है।
किसी का घर जल रहा, कोई आग सेंकता, यही तो दुनियांदारी है।

इतिहास के कितने ही पन्नो पर, युद्धों का हर परिणाम है लिखा।
ताजुब है मानव मस्तिष्क की सोच का, उसने इससे क्या है सीखा ?
जाने मानव मद होश हुआ क्यों? दूजे को नीचा दिखाने में क्या दिखा?
इतिहास गवाह है तलवार से नहीं पर, प्रेम से अशोक ने सब जग जीता।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — अत्यधिक घमंड चाहे व्यक्तिगत हो या राष्ट्रीय सदैव ही सर्वनाश का कारण बनता है। अभी जो माहौल रूस यूक्रेन संघर्ष युद्ध का चल रहा है, यह युद्ध पूरी दुनिया के लिए हानिकारक है। संस्कृत का बहुत प्रसिद्ध लघु सूत्र है “अति सर्वत्र वर्जयेत्” जिसका हिंदी शब्दार्थ है कि “अति करने से हमेशा बचना चाहिए”, अति का परिणाम हमेशा हानिकारक होता है। वास्तव में अति किसी भी चीज की अच्छी नही होती। “लेकिन प्रश्न यहां पर यह है की – मासूम जनता की क्या गलती है?” कुछ भी बनाने में वर्षों का समय लग जाता है, लेकिन बर्बाद यूँ ही मिनटों में हो जाता है। जो कल तक लाखो – करोड़ों, घर दूकान, मकान, कार के मालिक थे, वो आज भिखारी बन गए। उन्हें तो समझ में ही नही आ रहा की आखिर किस गलती का भुगतान हम कर रहे है, गलती कौन करें – भरे कौन ?

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यह कविता (तबाही के भरे मद मंजर में।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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ओ नारी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ ओ नारी। ♦

कभी लाड़ लड़ती कभी प्यार लड़ाती,
तेरे कोमल भावों ने जग को सींचा है।
परिवार की खुशी के खातिर तो तूने,
हर आंसू का कतरा कोरों में भींचा है।
फिर भी न जाने इस नृशंस समाज ने,
तेरा वीभत्स सा चित्र क्यों खींचा है?

तेरे कदम से तो ओ पगली उग आते हैं,
मरू भूमि के बंजर में भी हरित उद्यान।
तेरे स्पर्श से पस्त हुए पुरुरवा सरीखे,
हो जाते हैं द्रवित तब कठोर पाषाण।
जब नम्रता की प्रतिमूर्ति तुझ नारी की,
पड़ती है मंद – मंद वह मधुर मुस्कान।

तेरे रहमों करम की कायल यह दुनियां,
पगली क्या क्या में आज बखान करूं?
तुझ पर हो रहे अत्याचारों का ओ देवी!
हां किस विधि से आज मैं निदान करूं।
खुद मैं गुनहगार सदियों से शायद तेरा,
इस बात का कैसे किससे प्रचार करूं?

आज विश्व नारी दिवस के अवसर पर,
देख रहा हूं, दुनियां तेरी जयकार करें।
यह झूठा है सब मान – सम्मान या फिर,
क्यों तू नित दिन छुप छुप के आहें भरें?
बलिदान की अजीबोगरीब कहानी की,
तेरे यह मतलबी संसार क्यों कदर करें?

जब जन्म लेना था मुझ को पगली तो,
तू नारी से ममता की मूर्ति बन मां बनी।
फिर भगनी, भावज और चाची – ताई,
पत्नी बनकर तू मेरा सकल जहां बनी।
नर के इस नृशंस जीवन में ओ पगली!
तेरी हर पल ही तो खलती यहां कमी।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — कवि इस संसार के लोगो से प्रश्न कर रहे हैं – आखिर क्यों नारी को वह मान सम्मान सदैव नही दिया जाता जिसकी वह सदैव से हकदार हैं? क्या केवल एक दिन का मान सम्मान ही काफी हैं उनके लिए? इस पर गंभीरता से विचार करें। आखिर जो हर शक्ति से सम्पूर्ण हैं चाहे वो किसी भी रूप में हो, माँ, बहन, दादी, पत्नी, काकी हर रूप में सदैव ही हम पर प्यार, ममता बरसाती हैं। आज के समय में नारी हर क्षेत्र में अपना योगदान दे रही हैं, चाहे वह आसमान हो, या समुद्र हर जगह अपना सम्पूर्ण योगदान दे रही हैं। माँ बन कर जीवन में पूर्णता पा लेती है नारी, सर्वस्व अपना सौंप कर, बच्चों को महान बनाती हैं नारी। जैसे प्रकृति धरती सदैव ही देना जानती है, उसी की तरह, बस देना ही जानती है नारी, प्रेम, भाव, इज्जत, बस यही तो मांगती हैं नारी। जीवन के हर पड़ाव में, बस आलंबन चाहती है नारी, वरना तो वो स्वयं शक्ति है, और हर किसी पर भारी है नारी। नारी को सरल समझने की भूल न करो, ईश्वरत्व का मिश्रण है नारी, हम खुद अपना सम्मान करें, और मान करें हम हैं नारी। ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ पर साहस व शौर्य की प्रतिमूर्ति नारी शक्ति को नमन। नारी सशक्तिकरण के बिना मानवता का विकास अधूरा है।

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यह कविता (ओ नारी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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