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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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poet hemraj thakur

हिन्दी साहित्य में नाथ परम्परा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हिन्दी साहित्य में नाथ परम्परा। ♦

नाथ परम्परा का नाम सुनते ही हमारे मनो मस्तिष्क में भभूतधारी अवधूत हठ योगियों की कर्णभेदी और कुंडलधारी, जटाजुट युक्त मृगछालधारी तथा गले में रुद्राक्ष मालाधारी व कांख में खप्परधारी छवि का दर्शन हो जाता है। सिंगी, त्रिशूल और आधारी को सदैव अपने साथ धारण करने वाला वह वैरागी समुदाय हमारे अंतःकरण में चलचित्र की भांति प्रकट होता है, जो सांसारिक भय, वितराग, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, वासनाओं और विपरीत लिंगी आकर्षण इत्यादि से सदैव मुक्त रहा तथा समाज को इसी दिशा की और चलने की शिक्षा – दीक्षा देता रहा।

इतिहास के गहन में जाकर जब खंगालने की कोशिश करेंगे तो हमें पता चलता है कि यह समुदाय हिंदी साहित्य के क्षेत्र में तब कूदा था जब सिद्ध परंपरा के साहित्य के उपभोग एवं विलासिता की पराकाष्ठा समाज में विद्यमान हो चुकी थी। ठीक -ठीक तो बताया नहीं जा सकता परंतु अंदाजन यह कहना गलत नहीं होगा कि लगभग नौवीं शताब्दी के बीच में इस परंपरा ने हिंदी साहित्य में अपने पंथ की विचारधारा को कलमबद्ध करके सामाजिक कुरीतियों का खंडन करना शुरू किया था।

अब इसके पीछे चाहे सिद्ध परंपरा के साहित्य का विरोध आधार बना हो या फिर तत्कालीन परिपेक्ष्य में अरब देशों से होने वाले विभिन्न आक्रमणकारियों एवं आतताइयों की आक्रमण शैली से समाज को बचाने के लिए उनका प्रतिकार करना रहा हो। सर्वधर्म समभाव की परिकल्पना भी उनकी एक विशुद्ध भावना इस काल में रही है।

आतताइयों के संक्रमण का खंडन करने वाली पृष्ठभूमि का एक उदाहरण गुरु गोरखनाथ जी के शिष्य की एक रचना के अंश से स्पष्ट देखा जा सकता है, जिसमे धर्मगत विभक्तता से ऊपर उठकर यौगिक विशिष्टता बताई गई है:—

हिंदू मुसलमान खुदाई के बंदे, हम जोगी न कोई किस्से के छन्दे।

यह कतई नहीं नकारा जा सकता कि नाथ परंपरा ने हिंदी साहित्य में जो अपना योगदान हिंदी साहित्य के इतिहास के प्रारंभिक दौर में प्रदान किया है, वह हिंदी साहित्य का आधार बन गया। यदि हम हिन्दी साहित्य के इतिहास को पढ़े तो पता चलता है कि हमारा हिंदी साहित्य का इतिहास विभिन्न काल खंडों में विभाजित किया गया है। हिंदी साहित्य के प्रारंभिक काल को आदिकाल के नाम से नामित किया गया है। उस आदिकाल के साहित्य को भी तीन वर्गों में बांटा गया है:—

  1. धार्मिक साहित्य।
  2. लौकिक साहित्य।
  3. इतर साहित्य।

इनमें से यदि नाथ परंपरा के साहित्य की बात की जाए तो यह साहित्य निश्चित ही धार्मिक साहित्य के अंतर्गत आता है। जिस कालखंड में नाथ परंपरा का साहित्य हिंदी साहित्य जगत में प्रकट हुआ, वह कालखंड निश्चित संक्रांति के दौर से गुजर रहा था। वहां जहां एक ओर से समाज सिद्ध परंपरा की भोग विलास पूर्ण साहित्य पद्धति का शिकार बनता जा रहा था तो वहीं दूसरी ओर विदेशी आक्रांताओं की आतंकपूर्ण जीवनशैली और भाषा वैविध्य के चक्रव्यू में भी निरंतर उलझता जा रहा था। इन सभी प्रकार के प्रपंचो से समाज को बाहर लाने के लिए नाथ परंपरा के साहित्यकारों ने अपनी साहित्यिक चमक को हिंदी साहित्य में प्रविष्ट करके भारतीय जनमानस को एक नई दिशा और गति दी।

अश्लीलता और मानसिक भ्रष्टाचार से बाहर ला कर समाज को आंतरिक शुद्धि एवं पवित्रता की ओर अग्रसर किया। आत्म संयम तथा मानसिक संतोष के सद चरित्र वाले जीवन को जीने के लिए जो मार्ग नाथ परम्परा के साहित्य ने भारतीय समाज को प्रशस्त किये, वे आगे चलकर कबीरपंथी विचारधारा में भी अपना वर्चस्व बनाए रखते हुए नजर आते हैं। यह बात जरूर है कि नारी जीवन से दूर रहने की प्रवृत्ति के कारण तथा उनके साधना तथा ज्ञान मार्ग की नीरसता एवं शुष्कता के कारण कालांतर में यह परंपरा धीरे – धीरे समाज के मानस पटल पर अपना दीर्घकालीन प्रभाव छोड़ने में असमर्थ रही। अपने शिष्यों की कड़ी परीक्षा लेने के कारण भी इस परंपरा में आगे शिष्यों का निरंतर जुडना बाधित हो गया। परंतु इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस परंपरा के नाथों और साहित्य ने तत्कालीन भारतीय जनमानस के अंतःकरण को आंदोलित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

◊ नाथ परम्परा ◊

इससे पहले कि हम इस परंपरा के साहित्य की प्रवृत्तियों के बारे में बात करें; हमें नाथ परम्परा के बारे में संक्षिप्त रूप से जान लेना चाहिए। एक किंवदंती के अनुसार इस परंपरा के आरंभ की घटना उस पौराणिक आख्यान से जोड़ी जाती है जो भगवान शिव तथा माता पार्वती के अमर कथा संवाद के दौरान घटी थी। माना जाता है कि एक बार चलते – चलते भगवान शिव और माता पार्वती को किसी वन प्रदेश में रात हो गई। वे दोनों उस रात्रि को एक पेड़ के नीचे विश्राम करने के लिए रुक गए।

इसी विश्राम के दौरान माता पार्वती ने भगवान शिव से अमर कथा सुनाने का आग्रह किया। माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने माता पार्वती को इस शर्त पर अमर कथा सुनाने की सहमति दी कि जब तक आप इस अमर कथा को सुनते – सुनते हुंकारा भरती रहेगी, तब तक मैं इस कथा को निर्बाध गति से सुनाता रहूंगा।जब हुंकारा बंद हो जाएगा तब मैं इस कथा को सुनाना बंद कर दूंगा। माता पार्वती ने भगवान शिव के इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और भगवान शिव समाधि में विलीन होकर अमर कथा को मां पार्वती को सुनाने लगे। इस बीच माता को अर्ध रात्रि के समीप नींद आ गई।

माता के बदले यह हुँकारा उस पेड की कोटर में एक शुक (तोते) के फटे हुए अण्डे के कुछ हिस्से में बचे हुए तरल पदार्थ से अमर कथा के प्रभाव से उत्पन्न शुक के बच्चे ने भरना शुरू किया। माना जाता है कि उस जीर्ण क्षीर्ण और परित्यक्त अण्डे के एक टुकड़े में जो भी तरल पदार्थ फटने के बाद शेष रह गया था, उसी से शुक के बच्चे का अमर कथा के प्रभाव से जन्म हुआ और उसी बच्चे ने मानवानुकर्ण करके माता के सोने के बाद अमर कथा का आनंद लेने हेतु हुंकारा भरना शुरू किया। जब प्रातः काल भगवान शिव ने अपने नेत्र खोले, तो पाया कि माता पार्वती तो सोई हुई है।

ऐसे में उन्होंने देखा कि उनके द्वारा सुनाई गई अमर कथा को तो एक शुक का बच्चा सुन गया। भगवान शिव ने विचार किया कि यह शुक पुत्र तो अमर हो जाएगा। तब उन्होंने त्रिशूल लेकर उस शुक पुत्र का पीछा किया। आगे-आगे शुक पुत्र और पीछे-पीछे भगवान शिव। आगे किसी झरने में महर्षि वेद व्यास जी की धर्म पत्नी प्रातः काल सनान कर रही थी। उसने कूला करने के नियमित मुंह खोला था कि वह शुक पुत्र शरण लेने हेतु उनके मुंह में घुसकर ऋषि पत्नी के गर्भ में छिप गया।

भगवान शिव को पीछा करते हुए जब महर्षि वेद व्यास जी ने देखा और पीछा करने का कारण पूछा तो मुस्करा दिए। जब भगवान शिव ने क्रोधित स्वर में व्यास जी से मुस्कराने का कारण पूछा तो व्यास जी ने मुस्कराते हुए ही जबाव दिया कि हे प्रभु ! इसीलिए तो आपको भोलेनाथ कहा जाता है। हे प्रभु! जिस जीव ने साक्षात स्वयं आपके श्री मुख से अमर कथा का श्रवण किया हो, उसे भला कौन मृत्यु दे सकता है।इसलिए हे प्रभु! गुस्सा त्याग दो और लौट जाओ। यह जो शुक पुत्र का पीछा आप इसके प्राण हरण के नियमित कर रहे हैं, यह व्यर्थ है।

यह सुनकर भगवान शिव प्रसन्न होकर लौट जाते हैं। वह शुक का बच्चा 12 वर्ष तक बाह्य माया के डर से ऋषि पत्नी के गर्भ में पड़ा रहा। 12 वर्ष बाद वेद व्यास जी ने उससे बाहर आने की प्रार्थना की, हे पुत्र ! यह संसार के नियम के विरुद्ध है। अब आप अपनी मां के गर्भ से बाहर निकलो। आपकी मां को अतिशय कष्ट हो रहा है। तो तब उस गर्भस्थ शुक पुत्र ने अंदर से आवाज दी कि हे पिताश्री मैं एक ही शर्त पर बाहर आऊंगा यदि आप अपने सिद्धि बल से जगतपति प्रभु से यह प्रार्थना करें कि जिस क्षण तक मैं संसार में प्रविष्ट होने की प्रक्रिया से गुजरूं, उस क्षण तक अपनी योग माया को वे संसार में प्रभावहीन कर दें।

◊ 84 सिद्ध 9 नाथ ◊

माना जाता है कि महर्षि वेद व्यास ने प्रभु से प्रार्थना की और प्रभु ने अपनी योग माया का प्रभाव क्षण भर के लिए संसार में रोक लिया। ठीक इसी क्षण शुकदेव के साथ-साथ 93 अन्य जीवात्माओं ने भी जन्म लिया। इस प्रकार उस माया हीन प्रभाव के क्षण में इस संसार में 94 जीवात्माएं पैदा हुई। उनमें 84 सिद्ध 9 नाथ और एक स्वयं शुकदेव जी महाराज उत्पन्न हुए। ये नौ नाथ निम्नलिखित माने जाते हैं:—

  1. आदिनाथ (स्वयं सदा शिव)।
  2. मच्छेंद्र नाथ या मत्स्येंद्र नाथ (गोरखनाथ के गुरु)।
  3. गुरु गोरखनाथ (नाथ साहित्य परंपरा के प्रवर्तक)।
  4. गहिणीनाथ।
  5. चर्पटनाथ।
  6. चौरंगीनाथ।
  7. जालंधर नाथ।
  8. भरथरी नाथ या भर्तृनाथ।
  9. गोपीचंद नाथ।

◊ नाथ संप्रदाय का आविर्भाव ◊

इस घटनाक्रम से भी नाथ पंथ या नाथ संप्रदाय को जोड़ा जाता है, जिसमें तर्क यह भी दिया जाता है कि भगवान सदा शिव उसी मायाहीन घड़ी में संसार में अपने पंथ का प्रादुर्भाव करने की इच्छा से लीला रूप में आए थे। इसके विपरीत यदि हिंदी साहित्य के इतिहास को खंगाले तो नाथ संप्रदाय का उद्भव हिंदी साहित्य में गुरु गोरखनाथ जी से उद्भूत हुआ मिलता है। गुरु गोरखनाथ जी के विषय में अगर इतिहास में देखें तो कुछ लोग उन्हें आठवीं सदी का मानते हैं तो कुछ 10वीं /11वीं या तेरहवीं सदी का मानते हैं। हालांकि गुरु गोरखनाथ जी का साहित्य लगभग 16वीं शताब्दी में सामने आता है। यह भी माना जाता है कि नाथपंथियों ने लगभग 40 ग्रंथों की रचना की। हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने तो नौवीं शताब्दी के मध्य में नाथ पंथ का प्रादुर्भाव माना है। डॉ पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने गोरखनाथ का काल 10 वीं शताब्दी में निर्धारित किया है। यदि डॉ श्रीनिवास शर्मा की माने तो उक्त दोनों विद्वानों की टिप्पणियों के आधार पर उन्होंने नाथ संप्रदाय का आविर्भाव नौवीं शताब्दी के मध्य भाग में माना है।

यदि उक्त टिप्पणियों के साथ – साथ समग्र हिंदी साहित्य के इतिहास का गहन अन्वेषण किया जाए तो कहना न होगा कि नाथ साहित्य परंपरा का प्रभाव लगभग 9वीं सदी से 14वीं सदी तक हिंदी साहित्य में बना रहा। नाथ परंपरा ने इस कालखंड में भारतीय जनमानस पर साहित्य और धर्म का शासन किया।

यदि राहुल सांकृत्यायन जी की बात को माना जाए तो निश्चित रूप से नाथ परंपरा सिद्ध परंपरा की वज्रयान शाखा की सहज मार्गी परंपरा से विकसित हुई एक परम्परा है। इधर एक मत यह भी है कि नाथ संप्रदाय पर बौद्ध धर्म के महायान की तंत्र परंपरा का प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलता है।

इस परम्परा के प्रादुर्भाव को स्पष्ट करते हुए सोशल मीडिया के कुछ आलेखों में पढ़ने को मिलता है की नाथ संप्रदाय का प्रादुर्भाव ना + थ से हुआ है। ‘ना’ का अर्थ ‘अनादि रूप है ‘ अर्थात सदाशिव तथा ‘थ’ का अर्थ वह अनादि धर्म है, जो भूवनत्रय की स्थिति का कारण है। नाथ – वह तत्व है जो मोक्ष प्रदान करता है।

इस परम्परा में नाथ एक उपाधि मानी जाती थी। जब कोई शिष्य गुरु परम्परा में कड़ी परीक्षा के बाद सफल सिद्ध होता था तो उसे यह नाथ की उपाधि प्रदान की जाती थी और वह शिष्य अपने नाम के पीछे नाथ शब्द का उपाधि सूचक शब्द लगाकर समाज में विशिष्ट व्यक्तित्व प्राप्त कर लेता था। ये अपने गुरु को ही भगवान मानते थे।

◊ नाथ परम्परा का हिंदी साहित्य को योगदान ◊

इस परम्परा का आदि गुरु भगवान शिव स्वयं काे माना जाता है। अर्थात आदिनाथ के रूप में भगवान शिव को ही इस परम्परा में स्थान प्राप्त है।
नाथ परम्परा का हिंदी साहित्य को योगदान :—…

हिंदी साहित्य को आदिकाल से आधुनिक काल तक एक दृष्टि से जब देखा जाए तो यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हिंदी साहित्य के क्षेत्र में जो शिष्टता, आंतरिक शुद्धि, इंद्रिय निग्रह, वैचारिक पवित्रता,अष्टांग साधना, कुंडलीनी जागरण तथा उसके साथ – साथ प्राण शोधन तथा हठयोग इत्यादि मानसिक संयमों का प्राकाट्य यदि सर्वप्रथम किसने किया था, तो वह इस नाथ परम्परा ने ही किया था।उसके पीछे पृष्ठभूमि भले ही कुछ भी रही हो। या फिर कारण कोई भी रहा हो। परंतु व्यक्तिक सद-चरित्रता का संदेश प्रथम बार हिंदी साहित्य में यदि किसी परंपरा ने दिया है तो वह निश्चित तौर से नाथ साहित्य परंपरा से प्राप्त होता है। इस साहित्य परंपरा की प्रमुख प्रवृतियां निम्नलिखित रही है:—

1. उलटवासियों का प्रयोग: नाथ संप्रदाय के नाथों एवं कवियों ने साहित्य के क्षेत्र में अपनी अंतरतम गहन साधना के रहस्य को भाषा के माध्यम से जिन छंदों और प्रतीकों के माध्यम से प्रकट किया है, उन्हें उल्टवासियों के नाम से जाना जाता है। यह रहस्य ऐसी शब्दावली के प्रयोग से प्रकट किया गया होता है कि आम जनमानस की समझ से कई बार परे हो जाता है ।उदाहरण के रूप में गुरु गोरखनाथ जी के गुरु मत्स्येंद्र नाथ की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत है : –

जल कुंच है माछली, खण कुंचा है मोर।
सेवक चाहे राम कूं, ज्यौं ध्यंतवत चंद चकोर॥

इसी प्रकार से गुरु गोरखनाथ जी के काव्य संग्रह – “गोरख वाणी“ का एक उदाहरण है:-

यह मन सकती यहु मन सीव।
यहु मन पांच तत का जीव॥

इन उलटवासियों का प्रभाव आगे चलकर संत साहित्य में भी विशेषकर कबीर पंथ में साफ – साफ दिखाई देता है। इसकी पुष्टि करता हुआ एक उदाहरण देखें : –

नाथ बोले अमृत वाणी, बरिषै कंवली भीजेगा पांणी।
कउवा की डाली पीपल बासै, मूसा के सबद बिलइया नासै॥

नाथों का साहित्य अधिकतर साधनापरक है, इसलिए उसमें अधिकतर काव्य तत्वों की सरसता का पर्याप्त अभाव है।

2. हठयोग एवं अष्टांग मार्ग का प्रतिपादन : नाथ परंपरा में हठयोग का विशेष महत्व रहा है, जिसका प्रभाव नाथ साहित्य में भी साफ- साफ नजर आता है। हठयोग से अभिप्राय नाथ परंपरा में – ‘ह’ से सूर्य और ‘ठ’ से चंद्र से है। अर्थात सूर्य और चंद्र स्वर की संयुक्त साधना जो शिव स्वर तन्त्र में त्रिनाड़ी तंत्र के अंतर्गत आती है; उस योग को हठयोग का नाम दिया गया है। कुछ लोग अपवाद स्वरूप इस को जबरदस्ती किया जाने वाला योग मार्ग भी कह देते हैं।जबकि यह नितांत गलत है। ध्यान से अगर हम नाथ साहित्य को पढ़ें तो स्वत: ही स्पष्ट हो जाता है कि महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग में जो साधना पद्धति बताई गई है, नाथ पथियों का हठयोग भी उसी से मेल खाता है। उदाहरण के लिए नाथ साहित्य के कुछ अंश इस प्रकार है : –

 १ . आसण बैसिवा पवन निरोधिवा वान मान सब धंधा।
बदंत गोरखनाथ आतमा विचारत ज्यूँ लज लज दीसै चंदा॥

२ . ईडा मारग चन्द्र मणीजै प्यगुला मारग मानं।
सुषमनां मारग वांणी बोलिए त्रिय मूल अस्थानं॥

३ . भोगिया सूते अजहुं न जागे भोग नहींज रे रोग अभागे।

अतः कहा जा सकता है कि नाड़ी शोधन में इडा, पिंगला, सुषुम्ना नाडियों का प्रयोग, षडचक्र में मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनहद, विशुद्ध और आज्ञा चक्र के साथ-साथ सहस्रार कमल या शुन्य समाधि स्थल का वर्णन भी नाथ साहित्य में मिलता है।कुंडली जागरण के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहना और शुन्य समाधि स्थल में पहुंचकर अपनी साधना के चरम को प्राप्त करना नाथ पंथियो का मोक्ष कहलाता है।

3. गुरु की महिमा : इस परंपरा में गुरु को साक्षात भगवान का दर्जा दिया जाता है। इतना ही नहीं इस परंपरा के सभी साधकों का मानना यह था की मुक्ति और निवृत्ति गुरु कृपा से ही संभव है। उदाहरण के लिए नाथ साहित्य का एक अंश देखा जा सकता है : –

गुरु कीजै गहिला, निगुरा न रहिला।
गुरु बिन ग्यांन न पाइलर रे भाइला॥

गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति असंभव है। इस बात की पुष्टि करती हुई ये पंक्तियां अपने आप उस युग के साक्ष्य को देती है कि नाथ पंथ गुरु के प्रति कितना समर्पित था।

4. परंपरागत रूढ़ियों एवं बाह्य आडम्बरों का विरोध : यह बात ऊपर ही पुष्ट कर दी गई है कि जिस काल में नाथ संप्रदाय का साहित्य समाज के सामने उद्घाटित हुआ। वह संक्रांति काल था। उस समय मुस्लिमों के आगमन के कारण तथा सिद्ध पंथियो के विलासितापूर्ण साहित्यिक भावबोध से समाज नवीन नाथ परंपरा के साहित्य की ओर अग्रसर हो रहा था। समाज उस वक्त नाना प्रकार की कर्मकांडी प्रक्रियाओं से गुजर रहा था। वे सभी स्थितियां एवं क्रियाएं अधिकतर बाह्या अडम्बरों से परिपूर्ण थी। ऐसी परिस्थिति में इन सभी परिस्थितियों का विरोध करता हुआ एक नया संप्रदाय समाज के सामने अपने साहित्य को लेकर आता है, जो नाथ परंपरा के नाम से जाना जाता है। गुरु गोरखनाथ जी की गोरख वाणी में तो इन आडम्बरों का विरोध हुआ ही, हुआ है बल्कि उनके आगे भी इस परंपरा में बाह्य आडंबर का निरंतर विरोध होता रहा। इन्होंने सहज, सरल एवं निश्छल जीवन को जीने की शिक्षा के साथ-साथ शोषण मुक्त समाज की परिकल्पना साकार करने की शिक्षा भी तत्कालीन समाज को अपने साहित्य के माध्यम से देने की पूरी- पूरी कोशिश की।

5. चित्त शुद्धि और सदाचार में विश्वास : इस परंपरा के संपूर्ण साहित्य में हमें निरंतर आत्म शुद्धि, आंतरिक पवित्रता, मानसिक संयम एवं तप, पवित्र दृष्टि और पावन व्यवहार इत्यादि का चित्रण देखने को मिलता है। यह बात अलग है कि इन लोगों का बाह्य हुलिया आम जनमानस को देखने में भले ही ठीक नहीं लगता होगा। परंतु इनका अंतः करण और इनका जीवन व्यवहार जिस तरह से पवित्र था, उसी तरह की बातें इनके द्वारा लिखे गए साहित्य में संपूर्ण समाज को सदाचार की शिक्षा देती हुई नजर आती है। इंद्रिय निग्रह, कुंडलीनी जागरण, चित्त शुद्धि आदि-आदि बातें इनकी जीवन शैली में साक्षात नजर आती है और उन्हीं का परिणाम इनके साहित्य में भी फलीभूत हुआ है।

6. गृहस्थ जीवन के प्रति नकारात्मकता : यह बात सही है कि सिद्ध साहित्य की तरह नाथ साहित्य में नारी जीवन और गृहस्थ जीवन के प्रति आस्था नजर नहीं आती, परंतु फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि नाथों का दृष्टिकोण नारी के प्रति और गृहस्थी के प्रति पूर्ण रूप से प्रतिकूल था। हां यह सत्य है कि इस ओर नाथ पंथियों की नकारात्मक दृष्टि जरूर थी। नाथ परंपरा में यह विचारधारा जरूर पुष्ट थी कि चारित्रिक पतन का कारण नारी रहती है और इसलिए वह हमेशा नारी से दूरी बनाए रखने की सलाह अपने शिष्य परंपरा में देते रहते थे। यही वह मुख्य कारण था जिसके चलते कालांतर में यह परंपरा समाज में अपना प्रभाव धीरे – धीरे खोती गई। कुछ विद्वानों का मानना यह भी है कि यह विचारधारा गुरु गोरखनाथ जी में तब घर कर गई थी, जब उन्होंने बौद्ध बिहारों में बौद्ध भिक्षुणियों के व्यवहार को देखा होगा।

हिंदी साहित्य के आगामी कालो पर नाथ साहित्य का प्रभाव : –

हिंदी साहित्य के इतिहास को जब हम पढ़ते हैं तो नाथ साहित्य का सीधा – सीधा प्रभाव भक्ति काल में निर्गुण मार्गी शाखा में दिखाई पड़ता है। निर्गुण मार्गी शाखा में भी ज्ञानाश्रयी कबीर पंथ पर इस साहित्य परंपरा का प्रभाव स्पष्ट नजर आता है। उक्त की सारी प्रवृतियां तथा उलटवासियों की वही नाथपंथी शब्दावली कबीर मार्गी शाखा में साफ – साफ देखी जा सकती है। आचरण की शुद्धता की ओर अग्रसर कबीर पंथ को यदि नाथ साहित्य के साथ जोड़ कर देखा जाए तो बहुत सारी बातें इन दोनों पंथों की आपस में कहीं न कहीं मेल खाती है।

निष्कर्ष (Conclusion) : –

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि नाथ परंपरा हिंदी साहित्य के इतिहास में आदिकाल के प्रारंभिक चरण में नवी शताब्दी के आसपास विकसित हुई और निरंतर चौदहवीं सदी के आसपास तक समाज में अपना धार्मिक और साहित्यिक प्रभाव बनाए रखने में कामयाब हुई। इस पंथ की साहित्य परंपरा ने हिंदी साहित्य में जिस तरह से अपना प्रभाव छोड़ा है, वह अपने आप में अद्वितीय है। अतीत के संस्कृत साहित्य की गहन एवं गुप्त रहस्यमई घटनाओं को आम जनमानस की भाषा में उद्घाटित करने का कार्य हिंदी साहित्य में नाथपंथी परंपरा ने ही किया था। समाज के चारित्रिक उत्थान तथा मानसिक विकास का आधार यही परंपरा हिंदी साहित्य में बनी। अष्टांग योग के रहस्य को जनभाषा में प्रस्तुत करने की परिकल्पना नाथ संप्रदाय ने ही हिंदी साहित्य को प्रदान की। जिसका प्रभाव आगे चलकर कबीर पंथ में भी नजर आता है। गुरु के महत्व को और बाहरी आडंबर के खंडन को नाथ पंथियों की विचारधारा का स्वस्थ एवं पुष्ट पक्ष कहा जा सकता है। अतः कहा जा सकता है कि जब तक साहित्य की दुनिया में हिंदी साहित्य का पठन-पाठन होता रहेगा। तब तक नाथ साहित्य के महत्व को भुलाया नहीं जा सकता।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — इस पंथ की साहित्य परंपरा ने हिंदी साहित्य में जिस तरह से अपना प्रभाव छोड़ा है, वह अपने आप में अद्वितीय है। अतीत के संस्कृत साहित्य की गहन एवं गुप्त रहस्यमई घटनाओं को आम जनमानस की भाषा में उद्घाटित करने का कार्य हिंदी साहित्य में नाथपंथी परंपरा ने ही किया था। समाज के चारित्रिक उत्थान तथा मानसिक विकास का आधार यही परंपरा हिंदी साहित्य में बनी। अष्टांग योग के रहस्य को जनभाषा में प्रस्तुत करने की परिकल्पना नाथ संप्रदाय ने ही हिंदी साहित्य को प्रदान की। आजकल की पीढ़ी आधुनिकता के नाम पर भूलते जा रहे है अपनी ही प्राचीन संस्कृति, संस्कार व सभ्यता को। “याद रखें- हवा में उड़ने वाले हर परिंदे को भी तो आखिर में, थक हार कर किसी न किसी शाख पर टिकना है।”

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यह लेख (हिन्दी साहित्य में नाथ परम्परा।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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बस लिखना है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बस लिखना है। ♦

मैं कवि हूं कविताएं लिखता हूं, सुनाता हूँ,
मेरी लेखनी बेबाक कुछ न कुछ कह जाएगी।
लोगों की सम्पत्ति संजोकर भी ढह जाएगी,
मेरी लेखनी की ज़ुबान थाती बन कर रह जाएगी।

लोग लगे हैं सब धन दौलत ही बटोरने,
मैं भाव, कल्पना और शब्द बटोरता हूं।
लोग लगे हैं औलादों को विरासत छोड़ने,
मैं सदियों दर सदियों भाव छोड़ता हूं।

बिकती है इस दुनियां में राख भी आज,
लकड़ियों के मुकम्मल जल जाने के बाद।
पर विडम्बना देखिए इस दुनियां में जनाब,
बिकती नहीं तो सिर्फ कवियों की किताब।

मैं निराश नहीं हूं खुद की बदहाली के ख्याल से,
मुझे समाज के भटक जाने का डर सता रहा है।
है नहीं मेरा कोई खून का रिश्ता इस दुनियां से,
फिर भी मुझे इसकी चिन्ता का घुन खा रहा है।

है नहीं याद यहां अपनी चौथी पीढ़ी के पुरखे किसी को,
फिर भी आदमी भगवान के होने पर सवाल उठा रहा है।
निकम्मी सोच की दात देनी होगी, है याद नहीं पुरखे ही,
तो क्या फिर तुम्हारा खानदान हवाओं से ही आ रहा है।

यकीन मानिए साहब भूल जाएगी बाप को भी दुनियां,
गर जीने का और आगे बढ़ने का यही… तरीका रहा।
मैं रहूं या न रहूं इस दुनियां में तब ए मेरे अजीज दोस्तो,
मेरी ओर से निशानी हर अल्फाज मेरा तुम्हें लिखा रहा।

सिर्फ बुद्धि – धन के बल पर ही इठलाना इतना,
ए जमाने! खुद ही बता कि जायज कितना है?
हवा में उड़ने वाले हर परिंदे को भी तो आखिर में,
थक हार कर किसी न किसी शाख पर टिकना है।

पड़ता नहीं है कोई फर्क मुझे किसी के सुनने,
या न सुनने से, मुझे कौन सा महान दिखना है?
कवि हूं मैं प्रत्यक्ष द्रष्टा समाज की हर घटना का,
इसी लिहाज से ही तो मुझे सच बस लिखना है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — एक कवि व लेखक सदैव ही सत्य को लिखने की कोशिश करता है वह भी बिना किसी दबाव के। इस संसार के लोग तो धन संपत्ति को इकट्ठा करने में ही सारा जीवन बिता देते है और अंत समय में उनके साथ कुछ भी नहीं जाता है। माना की एक कवि व लेखक के पास धन संपत्ति कम होती है दुनिया की नज़र में, लेकिन एक कवि / लेखक की लेखनी (मेरी लेखनी की ज़ुबान थाती बन कर रह जाएगी।) सदैव के लिए उसे अमर कर जाएगी। विडम्बना तो देखिये की आजकल के लोग लगे हैं सब धन दौलत ही बटोरने में। मैं भाव, कल्पना और शब्द बटोरता हूं। लोग लगे हैं औलादों को विरासत छोड़ने में, आने वाली पीढ़ी के लिए, मैं सदियों दर सदियों भाव छोड़ता हूं। “आजकल की पीढ़ी को नहीं याद यहां अपनी चौथी पीढ़ी के पुरखे किसी को, फिर भी आदमी भगवान के होने पर सवाल उठा रहा है। निकम्मी सोच की दात देनी होगी, है याद नहीं पुरखे ही, तो क्या फिर तुम्हारा खानदान हवाओं से ही आ रहा है।” आजकल की पीढ़ी आधुनिकता के नाम पर भूलते जा रहे है अपनी ही प्राचीन संस्कृति, संस्कार व सभ्यता को। याद रखें- हवा में उड़ने वाले हर परिंदे को भी तो आखिर में, थक हार कर किसी न किसी शाख पर टिकना है।

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यह कविता (बस लिखना है।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बाप बेटी के रिश्ते।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बाप बेटी के रिश्ते। ♦

वह नन्ही सी कली जब, खिल आंगन में आई।
सारे घर की शोभा तब, थी उसीने ही बढ़ाई।
निज पेट काट – काटकर, तब पिता ने पढ़ाई।
ज्यों जवान हुई थी, त्यों ही कर दी थी सगाई।
भावना प्रेम की दोनों ने, अंदर ही अन्दर छुपाई।
‘शादी हुई तो सह न पाया’ बाप बेटी की विदाई।

पत्नी बोली बस करो जी, यह भी कैसी है रुलाई ?
छुपा लो चीखें ज्यूँ , अर्थी पे जवां बेटे की छुपाई।
बाप बेटी के रिश्ते को पगली, तू क्या समझ पाई ?
आज बेटी नहीं जी मैंने, अपनी रूह ही है बेहाई।
न जाने फूल सी पली को, कैसे रखेगा जंवाई ?
चिंता बाप की है पगली, तेरी समझ में न आई।

फूट – फूट कर बिटिया रोए, मां – बाप और भाई।
टाली भी न जाए जी रीत, न ही जाए यह निभाई।
पिता तो यूं रोता है जैसे, लुट गई हो उसकी कमाई।
गम, मौत बेटे की झेल लिया, झेल सका न विदाई।
जब डोली उठी तो पिता को, यादें बहुत सारी आई।
भला बेटी के जाने की, कर पाएगा कौन कहाँ भरपाई ?

ससुराल में गम सब सहे पर, पिता को गाली न सह पाई।
स्वाभिमान जो है पिता उसका, चाहे हो जाए फिर लड़ाई।
दिक हुई तो लाडली, लौट, पुनः बाबुल के घर को आई।
लाड प्यार से समझा बुझा के, बाबुल ने वापिस भिजवाई।
मौत पे पिता की जिसने, दुख में छाती कूट कूट कर बजाई।
मां – बाप तक ही तो था ये मायका, हो गई हूँ अब मैं पराई।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — इस संसार में पिता और पुत्री का रिश्ता बहुत ही पवित्र और स्नेह भरा होता है। जहा माँ उसके स्वास्थ्य और तंदुस्र्स्ती का ध्यान रखती है, वही पिता उसके भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए अनवरत कार्य करता रहता है। एक माँ तो अपने पुत्री से अपना प्यार व स्नेह दिखाती रहती है, लेकिन एक पिता अपनी बेटी के प्रति अपना अति स्नेह व प्यार को कभी बताता या जताता नही है। अपनी बेटी की सुख सुविधाओं के लिए हर संभव कोशिश करता रहता है। जब बिटिया बड़ी होती है, उसका विवाह कर पिता को अपने आप से बिटिया का दूर चले जाना बहुत ही दुखमय होता है। पर क्या करें दुनिया की जो रीत है उसे भी तो निभाना है। ससुराल में वह गम सब सहे पर, पिता को गाली न सह पाई कभी। स्वाभिमान जो है पिता उसका, चाहे हो जाए फिर लड़ाई। दिक हुई तो लाडली, लौट, पुनः बाबुल के घर को आई। लाड प्यार से समझा बुझा के, बाबुल ने वापिस भिजवाई।

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यह कविता (बाप बेटी के रिश्ते।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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26 जनवरी की पावन बेला।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ 26 जनवरी की पावन बेला। ♦

जिन सूरमाओं ने रक्तिम रंग से, खेली क्रांति की होली थी।
भारत की स्वतंत्रता खातिर, खाई वक्ष स्थल में गोली थी।
इंकलाब की जिनके मुंह में, रहती सदा एक ही बोली थी।
वह नर के वेश में नारायण की, अवतरी भारत में टोली थी।
इतिहास छुपाया सच न बताया, इज्ज़त, माटी में रोली थी?

जेल गए वे तख्त चढ़े, कलई अंग्रेजों की उन्होंने खोली थी।
हर वार सहे हर प्रहार सहे पर, उफ तक न उन्होंने बोली थी।
शूर वीर उन महारथियों की, एक नियत, एक ही तो बोली थी।
इंकलाब ज़िंदाबाद, गुलामी की बेड़ी उन्होंने ही खोली थी।
इतिहास छुपाया सच न बताया, इज्जत, माटी में रोली थी?

सरताज तिरंगा भारत का बनाने हेतु, दुश्मनी तब मोली थी।
जुर्म सहे लाख अत्याचार भी, जो कोड़े खा खाल खोली थी।
निज लहू के पावन जन जल से, गुलामी की कीच धो ली थी।
फिरंगी को भगाकर भारत से, भारत मां की जय बोली थी।
इतिहास छुपाया सच न बताया, इज्जत, माटी में रोली थी?

26 जनवरी की पावन बेला, यूं ही तो न भारत में आई थी।
इस दिन को देखने खातिर, पूर्वजों ने लड़ी कड़ी लड़ाई थी।
15 अगस्त को आजादी पाकर, संविधान सभा बनाई थी।
तब जाकर 26 जनवरी की, यह सद पावन बेला आई थी।
किताबी ज्ञान में नेता जी की, असलियत काहे छुपाई थी?

आजाद हुआ फिर भारत धन्य, संविधानी पोथी बनाई थी।
26 जनवरी1950 को तब, नियमावली भी लागू कराई थी।
इस बीच फिरंगी ने अपनी, फूट डालो की चाल चलाई थी।
भारत के टुकड़े करने हेतु, हिन्दू मुस्लिम में डाली लड़ाई थी।
किताबी ज्ञान में नेता जी की, असलियत काहे छुपाई थी।

नई पीढ़ी के लोग क्या जाने, कि ये घड़ियां कैसे आई थी?
पुरखों ने घड़ियां पाने खातिर, खून की नदियां जो बहाई थी।
कई कोखें उजड़ी, मांगे उजड़ी, तब जाकर आजादी आई थी।
छुप छुप कर गोरों से लड़े भिड़े, तब जाकर आजादी पाई थी।
किताबी ज्ञान में नेता जी की, असलियत काहे छुपाई थी।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — कड़वा है मगर सत्य है… जिन सूरमाओं ने अपने रक्तिम रंग से खेली क्रांति की होली थी। भारत की स्वतंत्रता खातिर, खाई वक्ष स्थल में गोली थी। सदैव ही इंकलाब की जिनके मुंह में, रहती सदा एक ही बोली थी। वह नर के वेश में नारायण की, अवतरी भारत में टोली थी। इतिहास छुपाया सच न बताया, इज्ज़त, माटी में रोली थी? यह राष्ट्रीय पर्व हमें देश की एकता और गौरव को बनाये रखने की प्रेरणा देता है। हम सभी को संविधान के सभी नियमों का पालन करना चाहिए। 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान पूर्ण रूप से लागू हो गया था। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। 26 जनवरी के दिन ही भारत को गणराज्य का सर्वोत्तम दर्जा प्राप्त हुआ। 26 जनवरी के दिन दिल्ली में इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक परेड निकाली जाती है। जिस वतन ने हमें प्यार, मां का आंचल, समरसता, रंग रूप भेष भाषा सभी को मिलता मान दिया उस वतन पे हमें नाज है। जिस वतन का सबसे बड़ा संविधान लोकतंत्र जिसकी शान वो भारत देश महान वो भारत देश महान। वतन हमारी आन हमारा सम्मान है उस मां को हमारा सलाम वंदे मातरम् वंदे मातरम् वंदे मातरम्॥

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यह कविता (26 जनवरी की पावन बेला।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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नया आ रहा है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नया आ रहा है। ♦

होने लगी है नए साल की, अब थोड़ी-थोड़ी सुगबुगाहटें।
पुराना जा रहा है, नया आ रहा है, ले करके नई आहटें।

हे प्रभु! रहम करना, मत देना नए साल में कोई कड़वाहटें।
विनय है विश्व बंधुत्व दे, फैलें दशों दिशाओं में नई चाहतें।

पापित – शापित को क्षमा करो, हो नए ज्ञान का विमल उद्भास।
सत्ता – समाज में सौहार्द्र बने और जगे धरा पर नूतन विश्वास।

सीमाएं हो जाए निर्द्वंद्व और रिहाइशें हो महफूज और आवाद।
रोग शोक की गुलामी की जंजीरों से, बच्चा-बच्चा होवे आजाद।

क्षमा, दया, समता और वैभव की उमंग विश्व में अब छा जाए।
हर मानव के भीतर मानवता के हर गुण, आटे में नमक से समा जाए।
आ रहा है…

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — हे प्रभु! रहम करना, मत देना नए साल में कोई कड़वाहटें। विनय है विश्व बंधुत्व दे, फैलें दशों दिशाओं में नई चाहतें। हे प्रभु! यही प्रार्थना है मेरी। बीत रहा वर्ष बहुत दर्द दे गया, बहुत सारे परिवार ने अपनों को खो दिया, लेकिन इस संकट के समय ने इंसान को बहुत कुछ सिखाया भी। अब भी समय है हे मानव तू सुधर जा प्रकृति को निखारने वाला कार्य कर, तूने प्रकृति के साथ बहुत खिलवाड़ किया। अब सुधर जा वरना रोने के सिवा कुछ नहीं बचेगा। हे मानव तूने प्रकृति के पांचो तत्वों को अपवित्र और प्रदूषित किया हद से ज्यादा, अब प्रकृति को निखारने व बचाने वाला कार्य कर तू, समय रहते प्रकृति को उसके ओरिजिनल रूप में सुरक्षित करो। जितना ज्यादा हो सके पेड़ लगाएं, जिससे प्रकृति अपने सभी ऋतुओं का समय पर संचालन करें, और फिर से ये धरा खिलखिला उठे। चारो तरफ खुशिया ही खुशिया बिखर जाये।

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यह लेख (नया आ रहा है।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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क्या सवर्ण आयोग की मांग वाजिब है?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ क्या सवर्ण आयोग की मांग वाजिब है? ♦

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सोशल मीडिया में अगर देखें तो सवर्ण आयोग की मांग तूल पकड़ती जा रही है। इधर हिमाचल के शिमला से सवर्ण समाज ने बाबा भीमराव अंबेडकर जी की प्रतिमा के पास से आरक्षण की अर्थी को कंधा देकर के हरिद्वार तक उसकी पैदल शव यात्रा निकाल कर विरोध जताने की एक नई तकनीक अपनाई है। जिसके चलते यहां भीम आर्मी और दलित वर्ग के कई नेताओं और संगठनों ने इस बात का पुरजोर विरोध जताना शुरू कर दिया है और इन आंदोलनकारियों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दायर करने की मांग की है। बात भले ही हिमाचल के गलियारों से निकल रही हो परंतु यह समस्या मात्र हिमाचल प्रदेश की ही नहीं समूचे हिंदुस्तान की समस्या है। न जाने हमारे पुरखों ने यह व्यवस्था क्यों और कैसे स्थापित की थी कि जिसे भिन्न-भिन्न जातियों और वर्गों का नाम देकर के छुआछूत का भेदभाव तैयार कर दिया। प्रकृति ने जब मनुष्य को जन्म दिया मेरे हिसाब से उसने मात्र दो ही जातियां बनाई। एक जाति का नाम नर है और एक जाति का नाम मादा। यह व्यवस्था प्रकृति ने मात्र मनुष्य योनि के लिए ही नहीं बनाई बल्कि संसार में जितनी भी योनियां जंगम प्राणियों की है, उन सब में एक नर और एक मादा का निर्माण प्रकृति या ईश्वर ने एक समान किया है। तर्क की कसौटी पर सिद्ध होता है कि संसार में मात्र दो ही जातियां हैं जिनमें एक नर है और दूसरी मादा। यूं ही अगर धर्मों की बात करें तो धर्म भी मात्र मानव धर्म है जो सबसे श्रेष्ठ धर्म माना जाता है। पशु पक्षियों के समाज के अपने अपने धर्म हो सकते हैं परंतु मनुष्य प्राणी के लिए यदि कोई धर्म प्रकृति ने निर्धारित किया है तो उस धर्म का नाम मानव धर्म है।

यदि इस बात को मनाने के लिए वर्तमान में समाज के किसी धर्म या जाति संप्रदाय विशेष के मनुष्य समुदाय को समझाने की चेष्टा करें तो कहना न होगा कि समझाने वाले को मुंह की खानी पड़ेगी। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी जैसे नाना प्रकार के धर्म वैश्विक धरातल पर देखने को मिलते हैं। समझ ही नहीं आता कि सभी धर्मों के लोग इस एक छोटी सी बात को क्यों नहीं समझते हैं कि परमेश्वर ने या फिर इस प्रकृति ने हमें यूं धर्मों में बंटने के लिए नहीं बनाया था। उसने सृष्टि के घटना चक्र को निरंतर प्रवाहित रहने के लिए यह पवित्र व्यवस्था बनाई थी। आखिर कब इस बात का संपूर्ण ज्ञान मानव प्राणी के मानव मस्तिष्क में अंगीकार होगा? सदियों दर सदियों यही जाति और धर्म के झगड़े निरंतर मानवता के रास्ते का रोड़ा बनते आए हैं और बनते ही जा रहे हैं।

— मनुस्मृति में कहीं भी जातिवाद की व्यवस्था का समर्थन नहीं —

इधर एक मत इस बात के लिए मनुस्मृति को कसूरवार ठहराता है। उन्हें मैं बता दूं कि मनुस्मृति में कहीं भी जातिवाद की व्यवस्था का समर्थन नहीं किया है। हां यह जरूर है कि वहां वर्ण व्यवस्था की बात की गई है। परंतु वहां मात्र चार वर्णों की व्यवस्था थी। वे वर्ण थे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। मैं हैरान हूं कि जब मनुस्मृति में साफ शब्दों में यह लिखा है कि इन वर्णों की व्यवस्था भी कोई स्थाई नहीं थी। यदि शुद्र के घर में भी कोई ब्राह्मण बुद्धि का व्यक्ति पैदा होता था तो उसे शुद्र नहीं बल्कि ब्राह्मण कहा जाता था। अर्थात यह व्यवस्था मनुष्य के बौद्धिक धरातल के आधार पर और कार्यक्षमता के आधार पर निर्धारित की गई थी। छुआछूत का इस व्यवस्था में लेश मात्र भी नहीं था। ब्राह्मण और क्षत्रिय यदि शिक्षा और सुरक्षा का काम करते थे तो वैश्य वस्तु विनिमय के द्वारा पूरे समाज के लालन-पालन की व्यवस्था का जिम्मा उठाए रहता था। इधर जो शुद्र वर्ण के लोग होते थे, वही इन तीनों वर्णों के लोगों के घरों में सेवादारी का काम करते थे। यहां तक कि यही शूद्र इन तीनों वर्णों के घरों में खाना पीना बनाने का काम करते थे और इन तीनों वर्ण के साथ बैठकर भोजन बनाया और खाया करते थे।

— यह धर्मगत और जातिगत भेदभाव क्यों? —

एकाएक न जाने यह कैसा परिवर्तन भारतीय सामाजिक परंपरा में प्रचलन में आया कि जो जिस वर्ण में पैदा होता गया, वह उसी वर्ण का समझा जाने लगा और निरंतर यह वर्ण व्यवस्था विकृत होती गई। जो बाद में विकृत होकर के नाना प्रकार की जातियों के नाम से विभाजित हो गई। ऊंच नीच और उत्कृष्टता तथा निकृष्ठता की व्यवस्था भारत में कब से प्रारंभ हुई? इस बात का ठीक से प्रमाण नहीं मिलता। यह एक शोध का विषय है। इसे समझने के लिए हमें ऐतिहासिक एवं प्रागैतिहासिक तथ्यों के साथ चिंतन मनन करना होगा। परंतु भारत की इस कुत्सित व्यवस्था को देखकर एक प्रश्न सबके मन मस्तिष्क में जरूर कौंधता है कि जब सभी जातियों और धर्मों के लोगों के शरीरों की बनावट एक जैसी है, उनकी सभी अंग एक समान है, उनके संसार में पैदा होने का तरीका एक जैसा है, तो फिर यह धर्मगत और जातिगत भेदभाव क्यों?

विशेषकर भारतीय समाज में यह जाति व्यवस्था आखिर किस आधार पर अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं? इस संदर्भ में दूसरे मतावलंबियों का कहना यह है कि जातियां और धर्म हमने नहीं बनाए। यह तो भगवान के द्वारा बनाई गई व्यवस्थाएं है। इसलिए निम्न जाति वालों को इस व्यवस्था को भगवान के आदेशानुसार मानना चाहिए। ऐसा विचार प्रकट करने वालों की मानसिकता सचमुच हमें कितनी वीभत्स लगती है? इसके विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता। उनसे मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि आप यह बताएं कि क्या जाति पाती की व्यवस्था भगवान ने मात्र भारत में ही बनाई? विश्व के अन्य देशों में यह व्यवस्था भारत के ही समकक्ष क्यों नहीं बनाई गई है? यह बात भी सच है कि विश्व के हर देश में ऊंच-नीच की एक अपनी व्यवस्था है। कहीं काले गोरे का भेद है तो कहीं किसी अन्य व्यवस्था के द्वारा समाज के उच्च एवं निम्न वर्ग को प्रदर्शित किया जाता है। परंतु यह भी सत्य है कि सब प्रकृति जन्य या परमेश्वर जन्य व्यवस्थाएं नहीं है। ये सभी मानव मस्तिष्क की खुरापात का प्रतिफल है।

— सवर्ण आयोग आंदोलन का कारण और औचित्य क्या है? —

विश्व एक बहुत बड़ा फलक है। आइए हम मात्र भारत के बारे में ही इस विषय के ऊपर जानने की कोशिश करेंगे। आज भारत देश के एक छोटे से प्रांत हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से आरक्षण के विरुद्ध जो आंदोलन सवर्ण आयोग का गठन करने के पक्ष में सरकार पर दबाव बनाने के लिए शुरू हुआ है, आखिर उस आंदोलन का कारण और औचित्य क्या है? इस बात पर एक सटीक, निष्पक्ष और तथ्य पूर्ण चर्चा होना बहुत जरूरी है। पूर्व में क्या घटनाएं और परिस्थितियां रही होगी? उन्हें न ही तो समझा जा सकता है और न ही तो दोहराया जा सकता है। वर्तमान संदर्भ की अगर बात करें तो आज समूचा विश्व एक परिवार की तरह हो गया है। आज के मानव प्राणी ने शिक्षा के क्षेत्र में और विज्ञान के क्षेत्र में जो विकास किया है, वह किसी से छिपा नहीं है। परंतु इतना कुछ होने के बावजूद भी यदि हमारी मानसिकता इन तथाकथित कुत्सित व्यवस्थाओं के चंगुल में ही फंसी रहेगी तो यह देश की उन्नति के पथ पर कोई ठीक संकेत नहीं है। आज यदि जातिगत आरक्षण सवर्ण समाज के भीतर सवर्ण आयोग के गठन का विचार पैदा करता है तो प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि क्या मात्र सवर्ण आयोग का गठन करने से यह लंबे समय से चली आ रही सामाजिक कुरीति समाप्त हो जाएगी?

— निष्पक्ष और तथ्य पूर्ण चर्चा —

अभी यहां संक्षेप में यदि सवर्ण समाज और दलित समाज की दलीलों को सोशल मीडिया के प्लेटफार्म से आंकलित करके लिया जाए तो कहना न होगा कि दोनों पक्ष अपनी अपनी जगह सही है। जहां एक ओर दलित समाज दलील देता है कि हमें सवर्ण समाज ने सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी शोषित किया है और हमें निरंतर घनघोर प्रताड़नाओं का दंश झेलना पड़ा। अब यदि हमें संविधान में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी ने यदि आरक्षण की व्यवस्था देकर के मान सम्मान का जीवन प्राप्त करने की पैरवी की है तो इसमें सवर्ण समाज को दिक्कत ही क्या है?

हम तो अपना सदियों पुराना वंचित अधिकार प्राप्त कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर सवर्ण समाज की दलील यह रहती है कि हमें किसी के सुखचैन से किसी प्रकार की दिक्कत नहीं है। हमारा मानना यह है कि जब आरक्षण नाम की व्यवस्था बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी ने संविधान बनाने के समय मात्र 10 वर्ष के लिए प्रस्तावित की थी तो उसे निरंतर च्विंगम की तरह ये राजनीतिक पार्टियां क्यों खींचती चली आई? यदि यही क्रम बना रहा तो हम भी अपने हक के लिए लड़ रहे हैं। सरकारें सवर्ण समाज के बारे में भी सोचे और सवर्ण आयोग का गठन करें। हम किसी के खिलाफ नहीं है बस अपना हक मांग रहे हैं। वहीं सवर्ण समाज का यह भी कहना है कि क्यों न जातिगत आरक्षण व्यवस्था को खत्म किया जाए और आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था बनाई जाए। इस मामले में अगर सवर्ण समाज के नेताओं से कोई मीडिया कर्मी कारण जांचने की कोशिश करता है तो उनका कहना स्पष्ट होता है कि जातिगत आरक्षण व्यवस्था खुद उन निम्न जाति के लोगों के लिए ही न्याय नहीं कर पाती तो सवर्ण समाज के लिए वह क्या न्याय करेगी?

सवर्ण समाज के नेताओं का कहना है कि संपन्न परिवार के निम्न जाति के लोगों का तो निरंतर इस आरक्षण व्यवस्था से भला हो रहा है। वे इस आरक्षण व्यवस्था के माध्यम से बड़े-बड़े पदों पर स्वयं भी विराजमान है और अपनी संतानों को भी निरंतर उन पदों तक पहुंचाने के लिए लाभ ले रहे हैं। परंतु जो एक गरीब, असहाय एवं दलित निम्न जाति का नुमाइंदा है। उसे न ही तो खुद इस आरक्षण व्यवस्था के माध्यम से लाभ मिल पा रहा है और न ही तो उसकी संतानों को ठीक से मिल पा रहा है। वे लोग मात्र राशन पानी की व्यवस्था तक ही इस व्यवस्था का लाभ उठा पाते हैं। बड़े बड़े पद और सरकारी नौकरियां साधन संपन्न लोगों के हाथ में ही लगती है। यह बात एक कड़वी सच्चाई भी जान पड़ती है। इस बात की पुष्टि मात्र सवर्ण नेता ही नहीं करते बल्कि दलित समाज का निम्न वर्ग भी इस बात की तस्दीक करता है।

निष्कर्ष के तौर पर कहा जाए तो ……

अब यदि दोनों समाजों की बातों को ध्यान में रखकर के निष्कर्ष के तौर पर कहा जाए तो कहना न होगा कि दोनों समाज अपने स्वार्थ की लड़ाई लड़ रहे हैं। समाज के सरोकारों और प्राकृतिक व्यवस्था की किसी को कोई चिंता नहीं है। यह बात सच है कि हमारे भारतीय समाज में कई ऐसी पुरातन रूढ़ियां है जिनका खात्मा होना नितांत आवश्यक है। इस बात को समझने के लिए हमें इस पहलू से थोड़ा हटकर के विचार करना होगा। हमारा भारतीय समाज देवी देवताओं के प्रभाव से पूरी तरह से बंधा हुआ है। विडंबना देखिए कि उन देवताओं की मूर्तियां, उन देवताओं के मंदिर और उन देवताओं के सारे साज बाज सभी कुछ इन्हीं निम्न जाति के लोगों के द्वारा सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी बनाए जाते आ रहे हैं। परंतु सब कुछ कर देने के बाद अंततः एक सवर्ण समाज का व्यक्ति किसी ब्राह्मण के मुख से मंत्रोच्चारण की ध्वनियों के साथ इन सब चीजों को शुद्ध करवा करके इन मूर्तियों और मंदिरों को पूजने का अधिकारी बन जाता है। आखिर ऐसा अब इन उच्च जाति के लोगों ने उनमें क्या डाला कि अब उच्च जातियों के सिवा कोई उन्हे छू ही नहीं सकता?

— एक अभिशाप —

जिन्होंने ये सब कलाकारियाँ अपने हाथों से की, उन्हें उन मंदिरों और देवताओं की मूर्तियों को छूने तक का अधिकार फिर नहीं दिया जाता। यह सचमुच एक निंदनीय एवं अमान्य परंपरा है। इसी पीड़ा के दंश को बाबा साहब ने झेला था। इसीलिए तो उन्होंने संविधान में मात्र 10 वर्ष तक ही आरक्षण की व्यवस्था की बात कही थी। उन्हें मालूम था कि भविष्य में यदि यह व्यवस्था यूं ही बनी रही तो यह जातिवाद खत्म नहीं होगा बल्कि भारत देश के विकास के लिए एक बहुत बड़ा नासूर पैदा हो जाएगा। आज यदि कुछ घटित हो रहा है तो सचमुच ऐसा ही हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की अगर कहीं फजीहत होती है तो वह इसी जातिगत व्यवस्था के कारण होती है। अलग-अलग धर्मों के मिश्रण को फिर भी लोग कहीं न कहीं पचा लेते हैं। पर यह जातिगत व्यवस्था सचमुच हमारे समाज के लिए एक अभिशाप बनती जा रही है। निरंतर ऐसी व्यवस्था अगर बनी रहे तो छुआछूत भारत के समाज में घटेगी नहीं बल्कि दिन दुगनी रात चौगुनी प्रगति करेगी। इससे बड़े और समृद्ध निम्न जाति के लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता।

— पैसे वालों का अधिमान —

क्योंकि इस संसार मैं पैसे वालों का अधिमान पूर्व काल से ही रहा है और रहेगा। निम्न जाति का यदि कोई नेता या बड़ा अधिकारी होगा तो उससे सवर्ण समाज के लोग भी कोई छुआछूत नहीं करते। फर्क अगर पड़ता है तो गरीब और सर्वहारा निम्न जाति के लोगों को। उनके हाथ का दिया हुआ पानी सवर्ण जाति के लोग नहीं पीते। उन्हें अपने घरों में घुसने नहीं देते। उन्हें देव मंदिरों में जाने नहीं देते। उन्हें सार्वजनिक धार्मिक स्थलों और कार्यक्रमों में प्रवेश निषेध है। पल पल तिरस्कार का जीवन जीने वाले वे लोग कब इस भुंडी व्यवस्था से बाहर आएंगे? यह सवाल अपने आप में बहुत बड़ी विडंबना है। हम जैसे लेखकों और समाज चिंतकों को इन दलित एवं शोषित लोगों की इस पीड़ा का बड़ा दुख होता है परंतु सत्य यह भी नहीं झुठलाया जा सकता कि जब तक संवैधानिक रूप से जातियों के प्रमाण पत्र बनते रहेंगे और बंटते रहेंगे, तब तक इस जाती पाती की व्याधि का ठीक से इलाज हो पाना असंभव है।

— आर्थिक आधार पर आरक्षण व्यवस्था —

सवर्ण समाज के लोगों को अगर समझाने की कोशिश करें तो वे दो टूक शब्दों में यही कहते हैं कि जब हम अपनी जातिगत श्रेष्ठा के आधार पर आरक्षण जैसे समाज विरोधी नियम का शिकार हुए हैं तो फिर आरक्षण का लाभ लेने के लिए खुशी खुशी जाति का प्रमाण पत्र बनाने वाले निम्न जाति के लोगों को जाति सूचक शब्द हमारे मुंह से सुनने में क्या दिक्कत होनी चाहिए? फिर उन्हें छुआछूत का उसी पुरानी व्यवस्था के अनुसार पालन करने में क्या दिक्कत है? हम नहीं कहते कि हम छुआछूत को बनाए रखेंगे और निम्न जाति के लोगों को जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करके अपमानित करेंगे। परंतु इसके लिए संविधान से जातिसूचक शब्दों को हमेशा के लिए हटा देना चाहिए और जातिगत आरक्षण व्यवस्था का खात्मा करके आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए। इतना ही नहीं सवर्ण समाज के नेताओं का यह भी मानना है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था भी वंशानुगत नहीं होनी चाहिए। वह भी किसी व्यक्ति के जीवन की व्यवस्था एवं सुविधाओं को ध्यान में रखकर के उसे एक बार प्रदान की जानी चाहिए। जब उसे उस आर्थिक आधार पर आरक्षण व्यवस्था के माध्यम से सरकारी नौकरी इत्यादि में लगने का अवसर मिल जाता है तो उस व्यक्ति को उस आरक्षण व्यवस्था से हटाकर नए पात्र उम्मीदवार को वहां स्थान मिलना चाहिए।

परंतु ऐसा कुछ नहीं है। जो गरीब है वह निरंतर गरीब ही बनता जा रहा है। चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का क्यों ना हो? और जो अमीर है वह निरंतर अमीर ही बनता जा रहा है। सच तो बहुत कड़वा है लेकिन इस कड़वाहट को दूर करने के लिए किसी न किसी को तो अपने स्वार्थ का परित्याग करना ही पड़ेगा। यदि किसी चुनावी सीट से कोई दलित नेता लड़ता है तो वह पीढ़ी दर पीढ़ी लड़ता रहता है। यदि निकाय चुनावों की बात करें तो वहां हर पांच साल बाद रोस्टर बदलता रहता है। फिर क्यों न विधानसभा और लोकसभा के आरक्षित चुनाव हलकों में भी यह रोस्टर बदलना चाहिए? ताकि एक और नए दलित एवं कमजोर बुद्धिमान व्यक्ति को आर्थिक रूप से संपन्न होने का मौका मिल सके। क्यों नहीं कोई समृद्ध दलित नेता अपने आप ही अपने किसी गरीब दलित बुद्धिमान भाई को अपनी सीट छोड़ देता? यह अगर स्वार्थ की लड़ाई नहीं है तो और क्या है? सब समृद्ध लोग सभी गरीब लोगों को अपने-अपने जाति और संप्रदाय के तहत भीड़ में इकट्ठा करके बेवकूफ बनाते हैं और लाभ स्वयं ही खाते हैं। बेचारे गरीब जनता भवावेश में अपनी जाति और संप्रदाय के नेताओं की विरोध रैलियों में मात्र भीड़ के सिवा और कोई महत्व नहीं रखती।

यह बात सच है कि चाहे वह सवर्ण समाज हो या फिर दलित समाज। दोनों ही समाजों में यदि आरक्षण को लेकर के जंग छिड़ी है तो उसका मुख्य कारण उनके व्यक्तिगत स्वार्थ है। अब यहां यदि इस बात निष्कर्ष की ओर ले जाने की कोशिश की जाए तो हमें कहना होगा कि यदि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की बात को हमारे राजनीतिक दलों ने स्वीकार किया होता तो आज यह परिस्थिति पैदा ही न होती। लोगों के लिए संविधान में लिखी गई बात का हवाला देकर के शांत करने की औषधि मिल जाएगी और समाज के सुधार का एक प्रबल आधार मिल जाता। यदि 10 साल से आगे इस व्याधि को न बढ़ाते, वोट बैंक की राजनीति न करते, ध्रुवीकरण का काम न करते तो आज हमारी निम्न और उच्च जाति के सभी लोगों की बहू बेटियां और बेटे आपस में एक दूसरे के साथ शादियां करके इस कुचक्र से बाहर निकल गए होते।

— पुष्ट और दुरुस्त मानव समाज बन गया होता। —

आज भारतीय समाज जातिगत विडंबना से न उलझ रहा होता। आज वह एक पुष्ट और दुरुस्त मानव समाज बन गया होता। यह बात जरूर है कि आज राजनीतिक पार्टियां पुनः इस बात के मायने समझाने की कोशिश कर रही है। परंतु उसके पीछे भी उनकी वहीं राजनीतिक मंशा है न कि सामाजिक उत्थान एवं कल्याण की भावना। यह परम सत्य है कि बड़े लोगों के लिए न ही तो आज तक कोई जाति, धर्म या संप्रदाय आड़े आया है और न ही तो आएगा। इसका शिकार यदि कोई बनते हैं तो निम्न और मध्य वर्ग के लोग। मध्य वर्ग के लोगों में भी निम्न मध्यवर्गीय लोग सबसे ज्यादा इस व्याधि का शिकार होते हैं। उच्च मध्यवर्गीय लोग तो इस जात पात की व्यवस्था से अछूते ही रह जाते हैं।

— संविधान से जातिगत आरक्षण की व्यवस्था को हटा दिया जाए —

हमारे भारत के अधिकतर राजनीतिक लोग इसी उच्च मध्यवर्गीय परिप्रेक्ष्य से आते हैं। अब यदि सचमुच हम लोग जातिवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ना चाहते हैं तो हमें सवर्ण समाज और दलित समाज का नकाब उतार करके फेंकना पड़ेगा तथा मिलकर के इस जंग को लड़ना पड़ेगा। एट्रोसिटी एक्ट तो महज एक बहाना है। असली बात तो यह है कि हमें भारत से जातिवाद की सदियों पुरानी विकृत व्यवस्था को हटाना है। क्यों न उच्च मध्यवर्गीय निम्न जाति के लोग स्वयं ही जातिगत व्यवस्था के विरुद्ध और जातिगत आरक्षण के विरुद्ध आंदोलन शुरू करते? एक सुर में वे मिलकर यह आवाज उठाएं कि हमें न ही तो आरक्षण चाहिए और न ही तो जाति के आधार पर बंटने वाले सर्टिफिकेट। संविधान से जातिगत आरक्षण की व्यवस्था को हटा दिया जाए और जातियों के आधार पर अधिकारियों को जो सर्टिफिकेट बांटने की अथॉरिटी दी गई है, उसे भी तुरंत प्रभाव से निरस्त किया जाए।

प्रश्न पैदा होता है कि…

इतना ही नहीं हमें किसी भी मंदिर और सार्वजनिक स्थान पर जाने से कोई न रोक सके तथा हमारे साथ कोई छुआछूत का व्यवहार अमल में न लाएं। जो आरक्षण व्यवस्था को हटाने के बाद भी हमें जातिसूचक शब्दों से पुकारने की कोशिश करेगा या फिर हमारे साथ छुआछूत का व्यवहार करने की कोशिश करेगा, उसे सीधा फांसी की सजा दी जाए। क्योंकि दकियानूसी विचार सवर्ण जाति के लोगों में भी कम नहीं है। देव समाज के नाम से हमारे सवर्ण जाति के लोग सचमुच एक डर का व्यवसाय सदियों से करते आ रहे हैं। जिसके नाम पर निम्न जाति के लोगों को छुआछूत व्यवस्था को अपनाए रखने के लिए वे डरा डरा कर विवश करते हैं । इतना ही नहीं इस डर के व्यवसाय में भारतीय देव समाज में देवताओं के कार्यकर्ताओं द्वारा पशु बलि प्रथा का चलन भी आज तक विद्यमान है। जरा सोचिए कि देवता किसी की जान को बचाने के लिए किसी दूसरे जीव की जान क्यों लेगा? यह भी प्रश्न पैदा होता है कि जो देवता पशुओं की बलि लेकर प्रसन्न होता है, क्या वह देवता हो सकता ?

प्रश्न वाजिब है…

ऐसी बहुत सारी कुरीतियां है जो समाज ने अपने मनगढ़ंत तरीके से चलाई हुई है। इनका न ही तो कोई भावगत आधार है और न ही तो कोई विज्ञानगत आधार है। इधर हिंदू लोग गाय का मांस नहीं खाते और उधर मुस्लिम लोग सूअर का मांस नहीं खाते। बाकी सब कुछ खा जाते हैं। मुस्लिमों का कहना है कि यदि हिंदू लोग गाय को दूध देने के कारण माता समझ कर के उसका मांस नहीं खाते हैं तो दूध तो भेड़ और बकरियां भी देती है। फिर उनका मांस क्यों खाते हैं? प्रश्न वाजिब है। यही प्रश्न कोई हिंदू मुस्लिम से करता है कि मेरे भाई तुम भी तो सब कुछ खा जाते हो फिर सूअर का मांस क्यों नहीं खाते हो? आखिर वह भी तो एक जानवर है? ऐसे कई अनगिनत सवाल हर धर्म और हर जाति संप्रदाय के भीतर बिना किसी आधार के चलते आ रहे हैं, जिनका निराकरण होना बहुत मुश्किल है। कबीर साहब जैसे लोगों ने चीख चीख कर इन कुरीतियों को दूर करने की वकालत की परंतु इस भुंडे समाज ने किसकी एक न सुनी। एक ऐसा भी वर्ग है जो मांसाहार के पीछे एक बड़ा तर्क देता है।

क्या यह तर्क उचित है?

उसका कहना है कि इससे सृष्टि का संतुलन बना रहता है और इसके साथ – साथ समाज की जो सब्जी की व्यवस्था है वह व्यवस्था भी कहीं न कहीं पूरी होती है। वरना सोचो यदि लोग मांसाहार न करते तो कितनी सब्जी की किल्लत झेलनी पड़ती? ऐसे लोगों के तर्कों पर हंसी भी आती है और तरस भी आता है। अरे भाई अगर तुम्हारी बात को मान भी लिया जाए कि इससे सृष्टि चक्र में संतुलन बना रहता है। तो फिर इस धरती पर इतनी मानव जनसंख्या हो गई है कि वह असंतुलित होती जा रही है। उसकी व्यवस्था करना हमारे शासन एवं प्रशासन को मुश्किल हो रहा है। आए दिन कहीं न कहीं कोई न कोई बलात्कार, दंगा फसाद और धर्म एवं संप्रदाय से संबंधित झड़प हमें अखबारों एवं समाचार चैनलों में सुनने को मिलते हैं। यह समस्या सिर्फ एक देश की नहीं समूचे विश्व की है। तो फिर तो संतुलन बनाने के लिए यहां भी बीच-बीच में से मनुष्य को काट देना चाहिए और उनका मांस पका करके सब्जी की व्यवस्था की समस्या भी दूर हो जाएगी।

खैर छोड़िए यह भी एक अभद्र बात हो गई। शायद यह कुछ ज्यादा ही बड़ा तर्क हो गया। मैं तो यह भी कहता हूं कि जब कोई मनुष्य अपनी सहज मौत मरता है तो उसके बाद उसे तब जलाने दफनाने की कोई जरूरत नहीं। जो लोग मांसाहार करते हैं, उसका शरीर उनके हवाले कर देना चाहिए ताकि वह अपना मांसाहार भी प्राप्त कर ले और उसके मृत शरीर का निपटान भी हो जाए। पाप भी नहीं लगेगा, क्योंकि मुर्दे को तो यूं भी किसी न किसी तरह निपटाना है। इसके साथ-साथ सब्जी की किल्लत का प्रश्न भी खत्म हो जाएगा। नहीं ना। ऐसा कोई नहीं करेगा। पर क्यों? यह भी सत्य है कि एक समय हमारे भारत में नर बलि का भी प्रावधान था। वह भी एक डर का व्यवसाय था। जब लोग जागरूक हुए तो उन्होंने उस व्यवस्था का विरोध किया और नरबलि को खत्म किया।

नरबलि — एक मनोवैज्ञानिक धंधा था।

फिर कहां गए वे देवता या दानव जो नरबलि न देने के कारण समाज में दारुण दंश भरते थे। इस बलि को न देने के कारण ही देवता समाज में खलबली मचा देते थे। आखिर यह सिद्ध हुआ कि यह एक मनोवैज्ञानिक धंधा था। ताकि समाज में एक डर का माहौल बना रहे और जो देवताओं को पूजने वाले कार करिंदे होते थे उनका एक टेरर बना रहे। कोई देवी देवता किसी पशु या पक्षी को नहीं खाता। यह सब व्यवस्था मनुष्य ने अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए मांस भक्षण की लालसा से तैयार की थी और अब निरन्तर चली आ रही है। विडंबना यह है कि मांसाहार को चाहने वाले लोगों की संख्या समाज में हमेशा से अधिक रही है और इसीलिए इस गंदी परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाते आ रहे हैं। जो लोग इस व्यवस्था की कुरीति को समझते हैं, उनकी संख्या कम है और वे कुछ कर नहीं सकते। यह डर अगर एक पीढ़ी तक जबरदस्ती रोक लिया जाए आने वाली पीढ़ी के भीतर से यह डर अपने आप ही चला जाएगा और कोई किसी देवता के मंदिर में बलि नहीं चढ़ाएगा।

निष्कर्ष — Conclusion :

अब आप कहेंगे कि यह विषय यहां क्यों लिया गया? मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि इस तरह की बहुत सारी कुव्यवस्थाएं हमारे भारत में आज भी विद्यमान है। जो हमें भारत के वैभव को गाने से निरंतर रोकती और टोकती रहती है। इतना ही नहीं अंतरराष्ट्रीय धरातल पर भी इन्हीं कुव्यवस्थाओं के चलते हमें अपमानित और शर्मिंदा होना पड़ता है। वरना भारत की गौरवशाली गाथा का वैभव विश्व में किसी से नहीं छुपा है। यह भारत एक समय यूं ही विश्व गुरु के पद पर आसीन नहीं था। इस बीच में ये जाति पाती, धर्म संप्रदाय और बलि प्रथा इत्यादि कुप्रथाओं ने भारत के दामन पर दाग लगा दिया और इसे वैश्विक पटल पर गवार सिद्ध कर दिया। अभी भी वक्त है। यदि आज भी हम लोग अपनी भौतिक लालसाओं को छोड़ कर के और व्यक्तिगत स्वार्थों को छोड़ कर के एकजुट होकर भारत के वैभव को बचाने की कोशिश करते हैं तो वह दिन दूर नहीं जिस दिन भारत पुनः विश्व गुरु के पद पर विराजमान होगा।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — सारी कुव्यवस्थाएं हमारे भारत में आज भी विद्यमान है। जो हमें भारत के वैभव को गाने से निरंतर रोकती और टोकती रहती है। इतना ही नहीं अंतरराष्ट्रीय धरातल पर भी इन्हीं कुव्यवस्थाओं के चलते हमें अपमानित और शर्मिंदा होना पड़ता है। वरना भारत की गौरवशाली गाथा का वैभव विश्व में किसी से नहीं छुपा है। यह भारत एक समय यूं ही विश्व गुरु के पद पर आसीन नहीं था। इस बीच में ये जाति पाती, धर्म संप्रदाय और बलि प्रथा इत्यादि कुप्रथाओं ने भारत के दामन पर दाग लगा दिया और इसे वैश्विक पटल पर गवार सिद्ध कर दिया। अभी भी वक्त है। यदि आज भी हम लोग अपनी भौतिक लालसाओं को छोड़ कर के और व्यक्तिगत स्वार्थों को छोड़ कर के एकजुट होकर भारत के वैभव को बचाने की कोशिश करते हैं तो वह दिन दूर नहीं जिस दिन भारत पुनः विश्व गुरु के पद पर विराजमान होगा।

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यह लेख (क्या सवर्ण आयोग की मांग वाजिब है?) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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चुनावी मौसम।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ चुनावी मौसम। ♦

मौसम आया चुनावों का देखो,
हर दल जनता को लुभाते है।
लोक लुभवन घोषणा पत्र तो कभी,
विचित्र सा स्वप्न – डर दिखलाते हैं।

कुछ का बिगड़ा मिजाज है देखो,
मय – माया से वोट खरीदवाते हैं।
सत्ता हो हासिल जैसे भी कैसे,
साम, दाम, दंड, भेद सभी अपनाते हैं।

धिक्कार है ऐसी जनता को जो,
अपना जमीर बेच के खाती है।
किस्मत फोड़ के खुद ही अपनी,
क्यों कहती है? सत्ताएं हमें सताती हैं।

तब थे देखो हुए तुम मदमाते,
अब सत्ताएं भी हुई मदमाती हैं।
तुम ने लूटा इनसे तब थोड़ा – थोड़ा,
अब सब ये तुमसे पूरा करवाती हैं।

देश की हो गई है देखो हालत पतली,
जनता – सत्ता अदला-बदली ही चुकाती हैं।
कैसे सुधरेगी हालत देश की तब तक?
जब तक जनता खुद ही न जाग जाती है।

है किसी भी दल के नेता के यहां,
नेक न देखो कोई भी इरादे।
सत्ता को हथियाने के चलते सब,
करते हैं देखो हर वादे पे वादे।

यह रोग नहीं है मात्र ऊपर ही ऊपर,
इसकी गिरफ्त में है स्थानीय निकाय।
इलाज एक ही दुरुस्त है इसका बस,
कि कैसे ना कैसे जनता जाग जाए।

सवाल एक ही चूहे – बिल्ली के खेल में,
बिल्ली के गले में घंटी कौन लटकाए?
सबकी हो गई है फितरत एक सी आज,
कैसे न कैसे जान बचे तो लाख उपाए।

देश की किसी को न चिंता है आज,
हसरत है, मेरा तुम्बा पहले भर जाए।
फिर कोई जाति – धर्म मे बांटें हमको,
या फिर खुद ही अपना वोट बिकवाए।

चुनावी मौसम है भाई हाथ मार लो,
फिर क्या मालूम फसल आए न आए?
मतदान है महा पुण्य दान, ये इनको,
कौन समझाए ? कि इसे न बिकवाए।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — चुनाव नजदीक आते ही नेता लोग आने लगते है हमारे घर पर वोट मांगने, जितने के बाद नेता जी 5 वर्ष के लिए लापतागंज में लापता हो जाते है। एक बार भी भूल से भी नज़र नहीं आते नेता जी। और तो और जनता के पैसे पर ऐश करेंगे और हमे ही डराएंगे व धमकाएंगे, कोई कार्य नहीं करेंगे, बस अपना खज़ाना भरेंगे। अपनी 12 पीढ़ियों के लिए खज़ाना भरेंगे। इनके नज़रिये से जनता जाए भाड़ में अपना खज़ाना भरेंगे दबा के। जनता भी कुछ कम नही है, चंद पैसो के लिए अपने वोट को बेच देती है। उसके बाद सरकार को कोसती रहती है।

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यह लेख (चुनावी मौसम।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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साहित्य का प्रदेय।

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♦ साहित्य का प्रदेय। ♦

“साहित्य समाज का दर्पण होता है” इस पंक्ति से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है। किसी भी काल – खंड की तस्वीर जब हम देखना चाहते हैं तो उस दौर का साहित्य उठाते हैं और शोधों – परिशोधों के शिकंजे पर कस कर साहित्य – आइने में उस काल – खंड का अवलोकन करते हैं। इस शीशे को फ्रेम बद्ध करना एक सजग साहित्यकार का काम होता है। यानी संक्षेप में कहें तो इन तीनों का आपस में एक गहरा नाता है।भविष्य के फलक पर वर्तमान का यथार्थ अपनी कलम छेनी और कल्पना मिश्रित अनुभूति के हथौड़े से चित्रित करना जहां साहित्यकार का काम है, वहीं समाज की पीड़ाओं के आत्मसात भावबोध के उस उद्घाटन का नाम ही साहित्य है। स्पष्ट है कि साहित्य और साहित्यकार के दरम्यान (बीच में) समाज ही केंद्र बन कर रहता है।

• साहित्य मौखिक और लिखित दोनों रूपों में अनादिकाल से विद्यमान •

साहित्य मौखिक और लिखित दोनों रूपों में अनादिकाल से विद्यमान होकर अपनी सेवाएं दे रहा है। इसके अनवरत प्रवाह के चलते, इसने अनेकों पड़ावों को पार कर घाट – घाट का पानी पीया है। जहां साहित्य का प्रारंभिक रूप पौराणिक दंत कथाओं के रूप में लंबे समय तक मौखिक चलता रहा, वहीं श्रुतियों – स्मृतियों ने इस कड़ी को बनाए रखने की अपार भूमिका अदा की। समय बदला, परिस्थितियां बदली। इसी मौखिक रूप ने लिखित रूप धारण किया और अपने समय के साक्ष्य देने का जिम्मा उठाया। वेदों – वेदांतों से गुजरते हुए यह रामायण – महाभारत जैसी महा लोक कथाओं को पार कर जब हिन्दी साहित्य के आदिकाल में प्रवेश हुआ तो इसने अपना मिजाज सिद्धों – नाथों की चमत्कृत अनुभूतियों के साथ बदल दिया।

यह सच है कि उस दौर में भी इसने वीर रस का पान करते हुए श्रृंगारित अनुभूतियों और युद्घिय वातावरण का चित्रण करने में कोई कोर – कसर न छोड़ी। जहां – जहां इसे वात्सल्य, वीभत्स, आदि दृश्यों को उद्घाटित करना था, सो भी कुल मिलाकर बखूबी किया। यानी इस काल में भी साहित्य की मूलभूत योग्यताओं और क्षमताओं का प्रदर्शन साहित्यकारों ने संतुलित किया।

• हिंदी साहित्य का यौवन ही निखर आया •

अब भक्ति काल या मध्यकाल में तो विशेष कर हिंदी साहित्य का यौवन ही निखर आया था। साहित्यिक रसों, गुणों, शब्द शक्तियों और छंद – अलंकारों के साथ – साथ साहित्य लेखन की महा विधाओं का उत्कर्ष ही निखर आया। इस काल – खंड के साहित्यकारों ने समाज की स्थिति को अपनी लेखनी की नोक से जिस क़दर साहित्य में उतारा, वह सच में काबिले तारीफ है। यह तो हिन्दी साहित्य का वह काल है, जिसे कोई चाह कर भी भूला नहीं सकता।

रीति काल में जहां दरबारी साहित्य की झलक के साथ – साथ शृंगारिकता का दर्शन होता है तो वहां आधुनिक काल में छायावादी कवियों का प्रकृति प्रेम दिखता है। आधुनिक काव्य साहित्य साहित्यिक परंपराओं को तोड़ता हुआ छंद मुक्त हो गया और इधर काव्य रचना की परिपाटी को तोड़ता हुआ गद्य साहित्य के क्षेत्र में उद्भूत हुआ।

• वह सब साहित्य का ही प्रदेय है •

यह तो भारतीय साहित्य परंपरा की एक संक्षिप्त गाथा है। परंतु साहित्य मात्र भारत में ही नहीं रचा गया। साहित्य तो विश्व के हर कोने – कोने में और हर जाति – धर्म में अपनी – अपनी भाषाओं में और अपनी – अपनी तहजीब में रचा गया। इधर यहूदी धर्म की पवित्र पुस्तक बाइबल से क्रिश्चियन धर्म का साहित्य शुरू हुआ और आधुनिक ईसाई मिशनरियों और इलियट जैसे प्रसिद्ध कवियों की कृतियों के साथ पल्लवित एवं संवर्धित हुआ।

ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद यदि हिन्दुओं के पवित्र और पुरातन ग्रंथ है तो इंजल, जबूर, तोरात और कुरान मजीद या कुरान शरीफ इस्लाम के पवित्र और पुरातन ग्रंथ है। अब चाहे पारसियों का साहित्य उठाओ या फिर बौद्धों, जैनों या सिखों का साहित्य उठाओ। धम्मपद, त्रिपिटक और गुरु ग्रंथ साहिब जैसी पवित्र ग्रंथों का अध्ययन करने पर या फिर किसी भी धर्म या संप्रदाय के साहित्य का अवलोकन करने पर जो कुछ हमें प्राप्त होता है वह सब साहित्य का ही प्रदेय है।

• भाषा के आधार पर साहित्य •

जाति, धर्म और संप्रदाय को छोड़कर यदि हम भाषा के आधार पर भी साहित्य को देखने की कोशिश करेंगे तो वह भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। अब चाहे संस्कृत का साहित्य हो या फिर हिंदी का। उधर अंग्रेजी, अरबी, फारसी या उर्दू का साहित्य हो चाहे फिर पाली, प्राकृत भाषा में रचित। पंजाबी, चीनी आदि विभिन्न भाषाओं में विपुल साहित्य की रचना हमें पढ़ने के लिए मिलती है। बात यहीं खत्म नहीं होती। बात तो यहां से शुरू होती है की साहित्य का प्रदेय क्या है?

• साहित्य के दो रूप •

यह प्रश्न जितना सरल है उतना ही इसका उत्तर भी सरल है। सीधी सी बात है कि विश्व के मानव मात्र के मन – मस्तिष्क में आज जो कुछ भी ज्ञान भरा पड़ा है, वह सब संसार के विविध साहित्य की ही देन है। इस संसार में साहित्य विद्यमान नहीं होता तो न ही तो संस्कृति और सभ्यता ही विकसित होती और न ही तो मनुष्य के पास मानव कल्याण एवं समाज उत्थान सम्बन्धी ज्ञान – विज्ञान होता। साहित्य ने हमें क्या नहीं दिया? साहित्य की देन को समझने के लिए हमें अनादि काल के उस परिप्रेक्ष्य में जाना होगा जहां से मौखिक साहित्य का उदय हुआ था। हम भलीभांति जानते हैं कि साहित्य के दो रूप हमें देखने को मिलते हैं : —

  1. मौखिक साहित्य। — Oral literature

  2. लिखित साहित्य। — Written literature

संसार की हर भाषा का साहित्य इन दो विभागों में बंटा हुआ है। जब मनुष्य को पढ़ना – लिखना नहीं आता था तो अवश्य ही उस काल खण्ड में हर भाषा का साहित्य मौखिक रूप से लंबे समय तक लोक में प्रचलित रहा। इन दोनों साहित्यिक विभागों के प्रदेय को समझने के लिए हमें इन्हें अलग – अलग तरीके से समझना होगा।

1. मौखिक साहित्य का प्रदेय : —

मौखिक साहित्य हर भाषा में श्रुति – स्मृति परंपरा में ही विद्यमान रहा। इस साहित्य ने जहां मानव मस्तिष्क और हृदय में भावनाओं एवं कल्पनाओं का विकास किया, वहीं दूसरी ओर मानवीय संस्कृति एवं सभ्यता को पाशविक संस्कृति एवं सभ्यता से पृथक करने में भी अपनी अहम भूमिका अदा की।

धर्मों के आधार पर यदि हम मानव परंपराओं को समझने की कोशिश करेंगे तो उसमें कई गतिरोध पैदा हो जाते हैं। इधर हिंदू मतानुसार यदि पुनर्जन्म की परिकल्पना की गई है तो इस्लामिक धर्म इसके विपरीत चलता है। इस कड़ी को ठीक से समझने के लिए यदि हम प्रागैतिहासिक घटनाओं और पुरातत्वविदों की परिकल्पना को ही वैज्ञानिक पृष्ठभूमि से जोड़कर आधार माने तो मौखिक साहित्य की देन का ठीक – ठीक विश्लेषण कर पाएंगे।

इस दृष्टि से माना जाता है कि मनुष्य का विकास पशु योनि से धीरे – धीरे विकसित होकर आदिमानव के रूप में हुआ। वह मौखिक ज्ञान – विज्ञान के आश्रय से बौद्धिक रूप से विकसित होता गया और उसी बौद्धिक ज्ञान – विज्ञान के आधार पर उसने अपने बाह्य वातावरण को और अपने शरीर को निरंतर परिष्कृत करके नवीन ढर्रे में ढालने की कोशिश की। आज का सभ्य मानुष उस आदिमानव का परिवर्धित एवं परिष्कृत रूप है।

यदि इस बात को आधार माना जाए तो यह स्पष्ट हैं कि मौखिक साहित्य ने सचमुच समाज के लिए बहुत कुछ दिया है। यह वह काल था जब मनुष्य ने धीरे-धीरे सोचना शुरू किया था। सोची हुई बातों को वैचारिक ताने-बाने में गूंथना शुरू किया था। इतना ही नहीं उन गुंथी हुई बातों को, कथा और कहानियों का रूप देकर के उन्हें स्मरण रखने की कला सीख ली थी। यह मौखिक साहित्य जितना प्रासंगिक उस काल खण्ड में था, उतना ही प्रासंगिक आज के दौर में भी है। यही साहित्य की वह विधा है जो पुरानी पीढ़ी का ज्ञान एवं अनुभव नई पीढ़ी में संप्रेषित करती है और नई पीढ़ी को उसके आगे आने वाली नई पीढ़ी के लिए ज्ञान – विज्ञान संप्रेषित करने के काबिल बनाती है।

हमें याद है कि हमारे घरों में हमारी दादियां और नानियां हमें ढेरों कहानियां मौखिक रूप से सुनाया करती थी और उन्हें वे कथाएं व कहानियां हमेशा के लिए सैकड़ों की तादात में जुबानी ही याद थी। उन कहानियों में मानवीय मूल्य, सामाजिक प्रेरणा और उदात्त भावनाओं के साथ – साथ मानवीय संबंधों को सुदृढ़ करने की एक विशेष परिकल्पना विद्यमान रहती थी। अतः कहना न होगा कि मौखिक साहित्य ने वैश्विक धरातल पर अपना जो योगदान समूची मानव जाति को दिया है, वह सचमुच अविस्मरणीय है।

दया, करुणा, मानवता, जिजीविषा, प्रेम, सामाजिकता, सहनशीलता, सहानुभूति, विश्वसनीयता, विनम्रता, मेहनत, धार्मिकता, आध्यात्मिकता और खोजबीन जैसे गुण यदि मनुष्य में विद्यमान हुए हैं तो इसका मुख्य साधन मौखिक साहित्य ही रहा है। मानव जाति को यदि सामाजिकता और निरन्तर खोजबीन का गुण मौखिक साहित्य न सिखाता तो आज के पढ़े लिखे एवं तर्क से परिपूर्ण समाज में अव्यवस्था फैल जाती।

कहना न होगा कि हम लोग पढ़े – लिखे आदिमानव कहलाते। यह बात जरूर है कि हर समाज एवं धर्म में अपनी-अपनी सृष्टि रचना का क्रम धार्मिक ग्रंथों में वर्णित किया गया है, परंतु वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मनुष्य प्रकृति का एक अभिन्न अंग है और उसने अवश्य ही मौखिक साहित्य का सहारा लेकर के आज तक के समाज तक पहुंचते-पहचते बहुत प्रगति की है।

सेवा, साधना और समर्पण की भावनाएं यदि मनुष्य के भीतर किसी ने भरी है तो वह मौखिक साहित्य ने ही भरी है। वरना आज की पढ़ी – लिखी पीढ़ी में ये गुण दूर – दूर तक देखने को नजर नहीं आते। कारण यही है कि आज का बालक दादियों और नानियों की उन मौखिक कथा कहानियों को नहीं सुनता है। इसलिए उसके व्यवहार में प्यार कम और विकार ज्यादा प्रभावी हो रहे हैं। यह भी सत्य है कि विकार पाशविक प्रवृत्ति के द्योतक है।

2.लिखित साहित्य की देन : —

जहां मनुष्य के आंतरिक भावबोध और संस्कारों का निर्माण करना मौखिक साहित्य की देन रहा है, वहां मनुष्य के मन और मस्तिष्क के बाह्य सामाजिक और व्यवहारिक पक्ष को अधिक कलात्मक और रोचक बनाना लिखित साहित्य की देन है। यह बात जरूर है कि लिखित साहित्य बहुत लंबे समय के बाद अस्तित्व में आया। परंतु जो भूमिका लिखित साहित्य ने मनुष्य जाति के लिए अदा की है वह अपने आप में अभिन्न है। जब से लिखित साहित्य अस्तित्व में आया तब से मनुष्य ने अपनी छोटी-बड़ी सभी सामाजिक घटनाओं को लिखित रूप से संग्रहित करने की कला सीख ली और उसे अपने पास में संजो करके रखने का उपक्रम मनुष्य जान गया। यह साहित्य का वह पक्ष है जो किसी भी समाज विशेष की और किसी भी काल खण्ड की स्थिति को अपने में समेट कर भविष्य की पीढ़ी को आईने की तरह बीते समय का दिग्दर्शन करवाता है ।

जहां मनुष्य ने अपने व्यवहारिक पक्ष को इस साहित्यिक पक्ष के द्वारा मजबूत किया वहीं उसने अपने सामाजिक पक्ष को भी साहित्य के इस पक्ष से सुदृढ़ किया। यह साहित्य का वह पक्ष है, जिसने विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओं का वैचारिक आदान – प्रदान सुनिश्चित किया। इसी ने अनेकों संस्कृतियों और सभ्यताओं को लिखित रूप देकर मानव समाज के लिए सुरक्षित रखा। यही वह पक्ष है, जिसने मनुष्य को योग्य एवम साक्षर बनाया। यही वह पक्ष है, जिसने मनुष्य में तर्क, विवेक, स्पर्धा और निरंतर संघर्ष करना सिखाया। अध्ययन और अध्यापन भी इसी पक्ष की देन है। आज के युग में अध्ययन एवं अध्यापन का जो महत्त्व बन गया है, वह किसी से नहीं छुपा है। अनुलेखन, प्रतिलेखन अभिलेखन, पत्राचार, शीला लेखन या फिर स्तंभ लेखन आदि सारे उपक्रम इसी कड़ी की देन है।

आज का मनुष्य यदि देश – विदेश में जा कर या फिर इंटरनेट के माध्यम से जो कुछ भी सीख रहा है या फिर अपना अनुभव वैश्विक धरातल पर संप्रेषित कर रहा है तो वह साहित्य की इसी कड़ी का सहारा लेकर सब कर रहा है। लिखित साहित्य के माध्यम से ही आज यह संभव हो पाया है कि प्राचीनतम से भी प्राचीनतम ज्ञान – विज्ञान से लेकर नवीनतम से भी नवीनतम ज्ञान – विज्ञान को हम आज तथ्यात्मक ढंग से खोजबीन करके पुष्ट कर सकते हैं और समझ सकते हैं। यह जब मर्जी तब कर सकते हैं। यही लिखित साहित्य की विशेष उपलब्धि है।

यदि यह आज तक भी मात्र मौखिक ही रहा होता तो निश्चित तौर पर इस के अधिकतम प्रमाणिक अंश का या तो कुछ जानकारों के संसार छोड़ने के साथ अन्त हो जाता या फिर इनमें स्वार्थ वश कई प्रक्षिप्त अंश जुड़ जाते, जो मानव समाज को पथ भ्रष्ट करते। यह सच है कि अभी भी मौखिक साहित्य का एक बहुत बड़ा भाग लोक किंवदंतियों और दंत कथाओं में ही प्रचलित है। उसका लिखित रूप अभी तक सामने नहीं आ पाया है। उसे शोध के साथ खोजबीन करके लिखित रूप में लाने की नितान्त आवश्यकता है। परन्तु फिर भी संसार भर की समस्त भाषाओं का विपुल लिखित साहित्य मानव समाज को बहुत कुछ दे रहा है और निरन्तर देता ही रहेगा।

निष्कर्ष — Conclusion :

सार रूप से यदि कहा जाए तो इन दोनो साहित्यिक पक्षों ने मनुष्य जाति को बहुत कुछ दिया है। आज यदि मनुष्य के पास जो कुछ भी ज्ञान – विज्ञान है तो उसका मूल कारण साहित्य ही है। फिर वह चाहे लिखित हो या मौखिक। मानव ने जो कुछ भी भावात्मक या विचारात्मक सांस्कृतिक और सामाजिक विकास किया है, वह साहित्य के बल पर ही किया है। यह बात अलग है कि साहित्य के भी दो पहलू हैं। एक नकारात्मक साहित्य और एक सकारात्मक। आम तौर पर समाज का अधिकांश वर्ग साहित्य के सकारात्मक पक्ष को ही स्वीकार करता है और उसी के सहारे नई पीढ़ी को दशा और दिशा प्रदान करता है। यही साहित्य की असली प्रदेयता है और महता है।

अतः कहना न होगा कि साहित्य का सकारात्मक सृजन पुष्ट समाज के निर्माण के लिए निरन्तर होते रहना चाहिए और उसके पठन – पाठन का भी कार्य पीढ़ी दर पीढ़ी लगातार चलता रहना चाहिए। साहित्य ही समाज की वह ताकत है जो किसी समुदाय और समाज को वैचारिक और व्यवहारिक रूप से समृद्ध बनाती है। यदि ऐसा न होता तो विदेशी आक्रांता हमारी भारतीय साहित्यिक कृतियों को लूट कर अपने देश नहीं ले जाते। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि साहित्य की प्रदेयता हर युग में विशेष रही है और रहेगी।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — हम सभी को मिलकर भारतीय साहित्य, संस्कृति और संस्कार को पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण करने का कार्य कारण हैं। साहित्य का सकारात्मक सृजन पुष्ट समाज के निर्माण के लिए निरन्तर होते रहना चाहिए और उसके पठन – पाठन का भी कार्य पीढ़ी दर पीढ़ी लगातार चलता रहना चाहिए। साहित्य ही समाज की वह ताकत है जो किसी समुदाय और समाज को वैचारिक और व्यवहारिक रूप से समृद्ध बनाती है। यदि ऐसा न होता तो विदेशी आक्रांता हमारी भारतीय साहित्यिक कृतियों को लूट कर अपने देश नहीं ले जाते। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि साहित्य की प्रदेयता हर युग में विशेष रही है और रहेगी।

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यह लेख (साहित्य का प्रदेय।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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मैं तो जनता हूं जनाब।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मैं तो जनता हूं जनाब। ♦

मैं तो जनता हूं जनाब,
पन्ने दर पन्ने की खुली किताब।
मुझे पढ़ने का देते हैं सभी सुझाव,
जो पढ़े न मुझको उसे देती हूं जवाब।
घटना के बाद फिजूल है हिसाब किताब,
मैं तो जनता हूं जनाब।
मेरे भी तो है कुछ ख्वाब॥

समझ नहीं आते सत्ताधीशों के ख़्वाब,
भीगी बिल्ली वोटों को, कुर्सी पे रूआब।
मेरी हाट के सौदे का, मुझे ही बताते भाव,
फिर तो मुझे भी आता है, देना भाई जवाब।
मैने भी तो देखे हैं, पड़ावों पर आते पड़ाव,
मैं तो जनता हूं जनाब।
मेरे भी तो है कुछ ख्वाब॥

भोली हूं मैं, कुछ बहुत ही ज्यादा साहब,
मुझ पर खेले हैं, कई शकुनी मामाओं ने दाव।
सबका बारी – बारी से, मैने पूरा किया है चाव,
मेरी ही धौंकनी से, मिला है सबको सदा से ताव।
फिर भी न जाने क्यों? करते नहीं है मेरा बचाव?
मैं तो जनता हूं जनाब।
मेरे भी तो है कुछ ख्वाब॥

मैं कहां कहती हूं? कि जश्न जीत का न मनाओ,
बल्कि मुझे भी जश्न ए जीत में चाहो तो बुलाओ।
मैं कहां कहती हूं? कि तुम भूखे रहो न खाओ,
मैने कब कहा? तुम अपनी उपलब्धियां न गिनाओं।
पर साहेब, मुझ पे ही सवार हो, मुझे ही तो न भुलाओ,
मैं तो जनता हूं जनाब।
मेरे भी तो है कुछ ख्वाब॥

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — चुनाव नजदीक आते ही नेता लोग आने लगते है हमारे घर पर वोट मांगने, जितने के बाद नेता जी 5 वर्ष के लिए लापतागंज में लापता हो जाते है। एक बार भी भूल से भी नज़र नहीं आते नेता जी। और तो और जनता के पैसे पर ऐश करेंगे और हमे ही डराएंगे व धमकाएंगे, कोई कार्य नहीं करेंगे, बस अपना खज़ाना भरेंगे। अपनी 12 पीढ़ियों के लिए खज़ाना भरेंगे। इनके नज़रिये से जनता जाए भाड़ में अपना खज़ाना भरेंगे दबा के।

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यह लेख (मैं तो जनता हूं जनाब।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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हिमाचली लोक संस्कृति में प्रभु श्री राम और दिवाली।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦हिमाचली लोक संस्कृति में प्रभु श्री राम और दिवाली। ♦

हिमाचल का नाम सुनते ही हर किसी के मन व मस्तिष्क में बर्फ से ढकी हुई चोटियां और प्राकृतिक सौंदर्य से लवरेज वादियां एकदम से अपना परिदृश्य प्रस्तुत कर देती है। जिस तरह से हिमाचल का नाम पर्यटकों को अपनी ओर स्वतः आकर्षित कर लेता है ठीक उसी तरह हिमाचल की लोक संस्कृति भी पर्यटकों को अपनी ओर लुभाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती।

एक सहज, सरल, सुबोध और आतिथ्य धर्मी हिमाचली संस्कृति में जब प्रभु राम का समावेश हो जाता है तो यह संस्कृति और भी भाव ग्राह्य और मनमोहक बन पड़ती है। हिमाचल की इस सुरम्य प्राकृतिक छटा के बीच यहां की लोक संस्कृति में राम कहां – कहां है और उनकी मान्यताओं की क्या – क्या परंपराएं हैं तथा वे कब से हिमाचली संस्कृति में समावेशित हुए? ऐसे अनगिनत सवालों का एक शोध परक अवलोकन कुछ यूं किया जा सकता है:—

1 » लोक मान्यताओं, गाथाओं और गीतों में राम:—

यह किसी से नहीं छुपा है कि हिमाचल की लोक भाषा पहाड़ी है। इसका अपना कोई लिखित प्रारूप न होने के कारण यहां की अधिकतर लोक गाथाएं और स्मृतियां लोकगीतों में ही श्रुति – स्मृति परंपरा से अद्यतन प्रचलित है। इन लोकगीतों में राम संबंधित लोकगीत लोक गाथात्मक प्रचलन में आज भी निम्नलिखित प्रकार से हिमाचली संस्कृति में अपना स्थान ज्यों का त्यों बनाए हुए हैं।

यह जरूर है कि वर्तमान परिपेक्ष्य में प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने हिमाचली संस्कृति के पुरातन ढर्रे को थोड़ी ठेस पहुंचाई है, परंतु अभी भी हिमाचली संस्कृति के संवाहक अपनी इन पारंपरिक धरोहरों को संभालने में लगे हुए हैं।पहाड़ी में गाई जाने वाली पहाड़ी रामायण इन लोकगीतों की शैली में आज भी हिमाचल के विभिन्न जिलों में भिन्न – भिन्न तहजीबों में गेय शैली में विद्यमान है। इन्हीं लोकगीतों में से कुछ लोकगीत इस प्रकार से हैं:—

राम कृपा से संबंधित लोक गीत:—

राज होंदे हुए भी हुआ वनवास,
ओ रामा मेरे जोगणुआ।………… 2

— • —

“सूणे भी ता लया यारो गंगा रे ओ तारूओ,
रामा लया लखणा जो तारे ओ जी……!”

— • —

“पैरा भी ता लया धोणे दैए ओ मेरे मालको,
इन्हा री धुडा़ कै बणदे पात्थरा री नारी ओ जी ….!
एओ आसा काठा री बणी री ओ नावा,
एओ बणी गई ता दुई दूई, आसा केथी पाणी ओ जी..?
एक ता पहले ही थोकड़ा जे टबर नी ओ पाल्दा,
तूसे देख्या बगाड़दे आसा री कहाणी ओ जी……!”

(सन्दर्भ: — “श्री दिला राम मिस्त्री” घाट, जिला मंडी।)
यह पहाड़ी रामायण का पद्य भाग महात्मा तुलसी एवं महर्षि बाल्मीकि रामायण के केवट प्रसंग से मेल खाता है। इसमें राम और लक्ष्मण को नदी से पार पहले ले जाने के लिए आग्रह किया गया है और प्रत्युत्तर में केवट राम के चरणों की धूलि का महत्व बताते हुए अपनी लकड़ी से बनी हुई नौका के नारी बनने के डर से उन्हें अपना पांव नौका में बैठने से पहले केवट के हाथों धुलवाने की प्रार्थना करते हैं।

केवट यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि कहीं प्रभु के अनधुले चरण नाव में पड़ने से केवट की गृहस्थी में किसी प्रकार का खलल न पड़ जाए और केवट के छोटे से परिवार का गुजर – बसर ही कहीं ठप न पड़ जाए। कहीं नाव के नारी बन जाने पर केवट के परिवार की रोजी रोटी सदा के लिए बंद न हो जाए और दो – दो पत्नियां केवट के लिए कलह का कारण न बन जाए। इस प्रकार की बात कह कर केवट राम के चरणामृत को चालाकी से प्राप्त कर लेना चाहता है। यह सब घटना श्रीराम द्वारा अंदर ही अंदर भांप ली जाती है और वे अपने पांव केवट से धुलवाने के लिए तैयार हो जाते हैं।

राम रावण युद्ध संबंधी लोक गीत:—

“भाई जुद्ध लागो रे, रामो – रावण रा,
जुद्ध लागो रे, केसी री ताईए॥”

(संदर्भ: — श्री लाल सिंह सिरमौर से प्राप्त जानकारी।)
यह राम रावण युद्ध की पूरी गाथा गेय शैली में लोग बड़ी श्रद्धा से गाते भी हैं और इसके साथ – साथ छुकड़ा नृत्य भी करते हैं। यह नृत्य जलते हुई विशाल अग्निकुंड में देवताओं के गुरों (पुजारियों) द्वारा एक विशेष प्रकार के ऊनी वस्त्र को धारण करके छलांग लगाते हुए किया जाता है। हैरत अंगेज करने वाली घटना यह होती है कि इतनी भारी आग में प्रवेश करने के बाद भी वे नंगे पांव और ऊनी वस्त्र धारी गूर तनिक भी आग से नहीं झुलसते।

यह प्रक्रिया सिरमौर की गिरी पार की पहाड़ियों में तो होती ही होती है, इधर शिमला और सोलन आदि क्षेत्रों में भी यह छुकड़ा नृत्य एक विशेष अवसर पर कुतप वाद्य यंत्रों की पारंपरिक वैदिक धुनों के साथ किया जाता है। जब ऊनी वस्त्र धारी गुर लोग गले में चांदी की बनी मालाओं और हाथ में चांदी की बनी भाले जैसी छड़ी के साथ यह नृत्य करते हैं तो देखते ही बनता है। एक विहंगम दृश्य उत्पन्न होता है।

सिया लोकगीत: —

“सिया ऊबे बिउजाल, सिया ऊबे बिउजाल..2
लोखणा ढोन्दाणे पाणे,लोखणा ढोन्दाणे पाणे।
सिया किन्दे खे आए , सिया किन्दे खे आणे?…2
सिया रामा रे राणे, सिया रामा रे राणे……2
सिया पाणी खे लाओ रे, सिया पाणी खे लाओ ।
सिया ढोन्दे ने पाणी रे, सिया लान्दे ने पाणी।”

(संदर्भ: — श्री लाल सिंह सिरमौर से प्राप्त जानकारी।)
यहां वनवास के दौरान श्री लक्ष्मण नित्य प्रति सेवा करने के पश्चात उब जाने के कारण प्रभु श्री राम जी से माता सीता के प्रति शिकायत प्रकट करते हुए कहते हैं कि मैं नित्य प्रति पानी लाने जाता हूं और माता सीता तो दिन भर बैठी रहती है। वे तो कुछ भी नहीं करती है। ऐसी शिकायतों के चलते जब माता सीता पानी लाने स्वयं जाती है तो उनको मायावी मृग मिलता है। वे उस मृग को पकड़ने की जिद करती है। इसमें ठीक वही घटना आगे के गीत में दर्शाई गई है, जो प्रतिष्ठित रामायण में घटती है।

बरमा ने जाए “बिरसु” (बिरसु नाटी) :—

“थानों तेरो हनोले देवा, रोवे हनोले आये।
तेरी आए चरणो देवा, लोए महिमा गाए॥”
(देव हनोल की महिमा)

“बरमेना जाए रे देवा मेरा,
बरमेना जाए रे, बरमेना जाए रे।
हाटकोटी गाएने देवी दुर्गा माई रे ,
भूले देली बिसरो रास्ता लाई रे।
भूले देली बिसरो रास्ता लाई रे,
बिरसु पखवाणो बरये खे जाए रे।

—•—

तेरी जाणी हनोले देवा होले पाणी री कोई दाडीए,
त्यूणी सेटो मोड़ों दो रो सिहनी सोई रे,
बरमेना जाए बिरसु बरमे ना जाए रे।”

संदर्भ: — (श्री लाल सिंह सिरमौर से प्राप्त जानकारी।)
असल में यह गीत सिरमौरी लोक भाषा में देव हनोल (महासू राम) के गुर की घटना और महासु राम के शक्तिशाली प्रभाव का प्रचार करने के सम्बन्ध में गया जाता है।

असल में घटना यह है कि पुराने समय में देव का गुर लोगों से पाथा (फसल आने पर लोगों से अनाज के दाने देव सेवा हेतु लेना) इक्कठा करता था। देव हनोल महसूस राम के गुर ने बीच में यह प्रक्रिया इसलिए छोड़ दी क्योंकि उनके इलाके के रास्ते में घना जंगल था जिसमें एक शेरनी की गुफा थी और साथ में तौन्स (तमसा) नदी पर एक जर्जर लकड़ी का पुल खतरे का कारण था। इन के डर से गुर ने यह पाथा इकट्ठा करना बंद कर दिया था। परंतु देव महासू राम के प्रभाव से गुर को एक भयंकर प्रकोप होता है जिसके चलते उसे यह पाथा ग्रहण करने के लिए जना ही पड़ता है। वह शेरनी की गुफा से तो जैसे तैसे बच निकलता है, परंतु तौन्स नदी पर बने जर्जर पुल के टूट जाने से वह नदी में गिर जाता है। देव महासू राम की कृपा से गुर जी तो बच जाते है, पर उनका पाथा, शूप और डाल (अनाज इकट्ठा करने के सामान) नदी में बह कर यमुना नदी में जा मिले। वहां से वे बहते – बहते दिल्ली पहुंचे। वहां पर दिल्ली के राजा के मछुआरों ने उनको नदी में आया हुआ देखकर पकड़ कर बाहर निकाला और अपने बच्चों को खेलने के लिए दे दिया।

इस बीच दिल्ली के राजा के पेट से अजीब – अजीब जानवरों की आवाजें आने लगी। राजा ने इसके बारे में कई जगह छानबीन की। अंत में राजा को पता चला कि उसके राज्य में ऐसा – ऐसा देव महासू राम का सामान पहुंचा था, जिसे मछुआरों ने अपने बच्चों को खेलने के लिए दे दिया। उससे देव महासू राम राजा से नाराज है। तब राजा ने उन सभी सामानों को यथाशीघ्र हनोल में जाकर देव महासू राम के मंदिर में पहुंचाया। उस पर देव महासू ने राजा को प्रतिवर्ष लगने वाले भंडारे में नमक दंड के रूप में देने के लिए कहा। इस दंड को अदा करने के पश्चात राजा की वे अजीब – अजीब आवाजें सदा के लिए समाप्त हो गई। लोक मान्यता यह भी है कि आज भी दिल्ली से राष्ट्रपति भवन से वह नमक का पैकेट हनोल के इस बड़े मंदिर में नियमित रूप से प्रतिवर्ष भंडारे के लिए आता है।

देव महासू का मंदिर असल में भगवान राम का ही मंदिर है।

लोक मान्यता के मुताबिक उत्तराखंड में त्यूणी से लगभग 40 किलोमीटर दूर हनोल में बना देव महासू का मंदिर असल में भगवान राम का ही मंदिर है। यह एक पुरानी घटना है। इस जगह पर एक भयानक राक्षस रहता था। उस राक्षस के प्रकोप से निजात पाने के लिए, इस स्थान पर भगवान राम की प्रतिष्ठा कर के देव महासू के रूप में स्थापना की गई, जिसे बौठा (बड़ा) महासू कहा जाने लगा और इसके साथ – साथ इसी क्षेत्र के आसपास तीन और महासू मंदिर है, जिनका संबंध क्रमशः भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न से है। सिरमौरी लोग हाटकोटी होते हुए इस भव्य मंदिर की यात्रा पर प्रतिवर्ष श्रद्धा पूर्वक जाते हैं।

बरलाज लोक गीत (सोलन और शिमला): —

श्री जियालाल ठाकुर सोलन द्वारा प्रदत जानकारी के मुताबिक बरलाज का शुद्ध रूप बलिराज पूजन है। परंतु प्राकृत भाषा में चलता हुआ इसका अपभ्रंश रूप बरलाज बन गया। श्री जियालाल ठाकुर जी ने सन 2006 मैं ढोल नगाड़ों की थाप पर ‘राष्ट्रीय गान, राष्ट्रीय गीत और सारे जहां से अच्छा’ गीतों को वैदिक धुनों के ताल पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम के सामने गायन कर पेश किया गया था, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

इसके साथ – साथ सन 2015 में हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल आचार्य देवव्रत के समक्ष इन्होंने पहाड़ी रामायण (बरलाज) को कुतप वाद्य यंत्रों की वैदिक धुनों पर गा कर प्रस्तुत किया, जिसके लिए राज्यपाल महोदय ने इन्हें विशेष संस्तुति से नवाजा। हाल ही में इनकी एक शोध पुस्तक “विरासती संस्कृति का डंका” छप कर आने वाली है। अतः इस आधार पर इनके द्वारा प्रदत बरलाज संबंधी जानकारी विशेष महत्वपूर्ण है। इससे पहले कि इस विषय को गहनता से समझे, हमें कुतप वाद्य यंत्रों के बारे में जान लेना चाहिए। इसमें चार प्रकार के वाद्य यंत्र आते हैं, जो वैदिक परंपराओं से संबंध रखते हैं:—

अवनाद वाद्य : —

ढोल, नगाड़े, मृदंग, डमरु आदि चमड़ी द्वारा निर्मित वाद्य यंत्रों की धुने इस श्रेणी में आती हैं।

सुशीर वाद्य : —

शहनाई, शंख, करनाल, रणसिंगा, बांसुरी, तुरी, सिंगी आदि फूंक से बजाए जाने वाले वाद्य यंत्रों की धुने इसमें आती है।

घन वाद्य: —

थाल, घंटी, घड़ियाल, करताल आदि धातु द्वारा बने हुए वाद्य यंत्रों से निकलने वाली धुने इस श्रेणी में आती है।

तार वाद्य: —

एक तारा, तुंबा, वीणा, धनतारू या धनोटू, सारंगी आदि तार से बजने वाले वाद्य यंत्रों की धुने इस श्रेणी में आती है।

नोट: — इन सभी वाद्य यंत्रों के एक साथ सामूहिक वादन को नवगत ताल के नाम से भी जाना जाता है, जिससे नवग्रह प्रसन्नता के साथ – साथ देव पूजन भी किया जाता है। श्री जिया लाल ठाकुर के मुताबिक बरलाज गायन की परम्परा त्रेता काल से ही हिमाचल में प्रचलित थी। यह पहले कार्तिक अमावस्या के दिन विशेष तौर से गाई जाती थी। इसके पीछे वे रामायण से संबंधित एक ऐतिहासिक घटना का जिक्र करते हैं।

उनके अनुसार जब पताल के राजा अहिरावण ने रावण के अनुरोध पर छल से राम और लक्ष्मण को पाताल लोक में नागपाश से फांसकर अचेत करके चुपके से पहुंचाया था तो उनकी जगह – जगह खोज करने के बाद भी कोई जानकारी हासिल नहीं हो पा रही थी। तत्कालीन पाताल के राजा अहिरावण उनकी बलि पाताल की देवी “सकला” को चढ़ाने वाले थे। इस बीच राक्षसी माया से सभी दैवीय शक्तियां अवरुद्ध की जा चुकी थी। ऐसे में जब महाराज बलि अपने भगवान “वामन” के पास यह सूचना लेकर आते हैं कि श्री रामचंद्र जी और लक्ष्मण जी इस तरह से पाताल में अचेत पड़े हैं, उन्हें बचा लो। वरना उन्हे कुछ ही देर में “सकला” देवी को भेंट चढ़ा दिया जाएगा। यह खबर सुनकर भगवान “वामन” पृथ्वी पर हनुमान जी से मिलने आते हैं और उन्हें सारी कहानी सुनाकर सचेत करते हैं। क्योंकि उनकी शक्तियां उन्हें स्मरण कराने पर पुनः जागृत हो जाया करती थी।

हनुमान जी – सूक्ष्म रूप बनाकर प्रविष्ट।

बाकी सभी शक्तियां असुरी माया के वश में की जा चुकी थी। तब हनुमान जी क्रोधित होते हैं और पाताल लोक में जाकर पाताल लोक के राजा की मालिनी के हाथ की फूल माला में सूक्ष्म रूप बनाकर प्रविष्ट हो जाते हैं, जो फूल मालाएं देवी सकला को चढ़ाने के लिए वह मालिन राजा के आदेश पर हर रोज की तरह ले जा रही थी। उन फूल मालाओं के माध्यम से हनुमान सकला देवी तक पहुंचते हैं और उस मूर्ति के अंदर प्रविष्ट हो जाते हैं। अब मूर्ति के अंदर से हनुमान स्वयं तरह – तरह की आवाजें निकालते हैं। असुरों द्वारा पेश किया गया सब कुछ चट कर जाते हैं। असुर यह समझते हैं कि आज तो हमारी कुलदेवी बहुत प्रसन्न है जो हमारे द्वारा प्रस्तुत किया गया यह बहुत कुछ खा गई।

ऐसे में हनुमान पूर्ण रूप को धारण करते हुए असुरों के सामने प्रकट होते हैं और भयंकर युद्ध करके उन सब का नाश करके अपने प्रभु श्री राम और लक्ष्मण को पाताल लोक से छुड़वा कर ले आते हैं। इस समय जब हनुमान श्री राम और लक्ष्मण को पाताल से ले आ रहे थे, तो श्री राम जी ने महाराज बलि को इस कृतज्ञता के लिए एकवचन दिया कि आज से हर कार्तिक अमावस्या को धरती पर मेरे नाम के साथ – साथ आपके नाम की भी लोग पूजा किया करेंगे।

अतः बरलाज को तब से हर कार्तिक मास की अमावस्या को गाया जाने लगा। इसमें महाराज बलि का पूजन भी लोग भगवान वामन और भगवान राम के साथ – साथ विधिवत करते थे और बरलाज का गायन कर श्री राम के गुणगान के साथ – साथ बलि की कृतज्ञता और महानता का भी गुणगान करते थे। परंतु इसमें भी बीच में किन्हीं कारणों से कहीं व्यवधान पड़ा।

फिर इस बरलाज को द्वापर काल में पांडवों के द्वारा पुनर्जीवित किया गया। पांडवों ने अपनी पहली बरलाज सोलन में बीड धार की चोटी पर गाई थी। उन्होंने इस धार की चोटी पर अपने अज्ञातवास के दौरान एकादश ज्योतिर्लिंगों की स्थापना की थी और उनकी पूजा अर्चना करके बरलाज गायन का पुनरुत्थान किया था।

सर्यांजी नामक गांव में पांच पांडवों के मंदिर

तब से यह परंपरा आज तक निर्वाहित होती आई है। आज सर्यांजी नामक गांव में पांच पांडवों के मंदिर बने हैं। वहां से प्रतिवर्ष पांच पांडवों की जातर (मेला जलूस) बीड़ धार तक जाती है। फिर रात को गुरु लोग मुद्रो (हाथ मुंह धोकर के अच्छी तरह से ब्रश करके कुला आदि करने के पश्चात निर्जल व्रत रखना) बांधते हैं और फिर कहीं भी नहीं जाते हैं। तब सारी रात वे गुरु लोग अन्य सिर्फ पुरुष लोगों के साथ छुकडा नृत्य रात को करते हैं, जिसमें वे ऊनी वस्त्र धारण कर नंगे पांव से अपनी जटाएं फैला कर भारी अग्निकुंड में भी प्रवेश करते हैं। उससे भी उनका कुछ नहीं बिगड़ता।

यह सारा नृत्य कुतप वाद्य यंत्रों की धुनों से विधिवत देव पूजन करके बरलाज गायन के साथ किया जाता है। सुबह मुद्रो खोल दिया जाता है और महिलाओं के साथ “सिया समृति” गायन गाते हुए सामूहिक नृत्य किया जाता है और उत्सव समाप्त किया जाता है। श्री जिया लाल ठाकुर के अनुसार यह गायन गायत्री छंद और देश तथा कल्याण राग के आधार पर गाया जाता है। अब लोग परंपरा के अनुसार यह बरलाज गायन हर वर्ष सायर पर्व (अश्वनी मास की संक्रान्ति) से शुरू किया जाता है और मकर संक्रान्ति को समाप्त किया जाता है। इस गायन में भगवान राम से संबंधित सोलह संस्कारों को लोग क्रमबद्ध इस लंबे अंतराल में कथा के रूप में गाते हैं और प्रभु श्री राम के सद चरित्रों का बखान करते हैं। प्रभु के जन्म से लेकर निर्वाण तक का पूरा वृतांत गायन शैली में वर्णन किया जाता है। यह परंपरा हिमाचल के विभिन्न पहाड़ी क्षेत्रों में भी कुछ यूं ही लंबे अंतराल तक विद्यमान रही है। हमारे यहां मंडी में एक प्रसिद्ध कहावत है: —

“जौ कणक निसरी, कथा बझुणी बिसरी।”

अर्थात शरद ऋतु शुरू होते ही लोग घरों – घरों में झुंढों में इकट्ठा होते थे और कथाएं गा – गा कर सुनते – सुनाते थे। जैसे ही जौ और गेहूं में वालियां निकलती थी, तब वे सब भूल जाया करते थे। क्योंकि फिर उन पर काम का बोझ पड़ जाता था। उक्त घटना के अनुसार सोलन और शिमला के आस – पास गाई जाने वाली बरलाज के कुछ अंश: यूं देखे जा सकते हैं: —

भगवान वामन और महाराजा बली वृतांत: —

“उटा – उटा बामणा डबारीरे डेवा …..2
वारी पारी बामणा मारी गंगा री छाला….2
मांगी लो बे बामणा रे दाण,
मांगी लो बे बामणा रे ss दाण।
जे त मांगे, ताखे देऊ प्रमाण…2
जेओडी जेई राजेया माखे दाणो री देणी …2
जेओडी बिना बोलणी जिशे बासुकी नागे …2
ढाई कदम राजेया माखे पृथ्वी देणी ……2
एकी बीखे नापेया से आधा संसार ……..2
दूजी बीखे नापेया से सारा संसार ……….3
तीजी बीखो खे जगा न रोए ……..2
राजा बलिए कनगी ढाली …………..2″

हनुमान का श्री राम एवं लक्ष्मण को बचाने हेतु जाना: —

“रामा लखणा रे बले लाए देणी ……2

—•—

हणो बे हुन्दरिया मेरा, हणो बे हुन्दरिया मेरा।”
(हुन्दरिया का अर्थ क्रोधित होना )

“कणदी ढणदी फूल मालण आई ………2
आजकै जे फूलणो बड़े गरकै होए ……..2
मुंह मांगे भोजनो म्हारी देविए खाए,
शौ घड़े दुधा रे म्हारी देविए पीए ………..2

—•—

बोलो हणो बे हुन्दरिया मेरा……………2″

ये सारे प्रमाण सोलन, सिरमौर और शिमला आदि के इलाकों में दीपावली के अवसर पर या फिर किसी संक्रांति, विवाह आदि उत्सवों के अवसर पर विशेष तौर में स्थानीय कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले लोक मंचनो में देखने को मिल जाते हैं। यदि श्री जिया लाल ठाकुर की माने तो हिमाचल वैदिक संस्कृति का गर्भ गृह रहा है। ठाकुर साहब किन्नौर जिले को वैदिक संस्कृति का प्रमुख केंद्र मानते हैं।

कुल्लू घाटी की लोक प्रचलित मान्यता एवं श्रीराम से संबंधित घटनात्मक गाथा: —

इधर कुल्लू घाटी में भगवान राम के हिमाचली संस्कृति में प्रवेश को लेकर एक अलग प्रकार की लोक प्रचलित मान्यता एवं कथा है। यहां के लोगों का मानना है कि वर्तमान में जो जिला कुल्लू के मुख्यालय में स्थित सुल्तानपुर में श्री रघुनाथ जी का मंदिर है, उसकी मूर्तियां श्री त्रेता नाथ मंदिर श्री अयोध्या धाम से लाई गई थी। इसके पीछे यहां के स्थानीय लोग एक बहुत पुरानी रोचक कहानी सुनाते हैं। लोगों का मानना है कि सन 1637 से 1662 तक कुलूत राज्य की राजगद्दी पर एक धर्मात्मा एवं प्रतापी राजा “श्री जगत सिंह” जी विराजमान रहे। उन्होंने 1637 ई में राजगद्दी संभाली। एक दिन उनसे टिप्परी गांव के एक ब्राम्हण “दुर्गा दत्त “की अनजाने में हत्या हो गई। उस ब्राम्हण की आत्मा ने उन्हें ब्रह्महत्या का शाप दे डाला, जिसके चलते उन्हें हर वक्त के भोजन में छोटे – छोटे कीड़े मकोड़े ही दिखाई देने लगे और धरती का सारा पानी खून जैसा लाल नजर आने लगा। ऐसे में राजा को कुछ भी खाना पीना बहुत ही मुश्किल हो गया। इसके साथ – साथ राजा के शरीर में कुष्ठ रोग निकल आया।

सुप्रसिद्ध एवं सिद्ध संत “कृष्णदास पयहारी” जी

उन्हीं दिनों शहर के समीप ही एक वैष्णो संप्रदाय के सुप्रसिद्ध एवं सिद्ध संत “कृष्णदास पयहारी” जी रहते थे। वे सिर्फ पेय पदार्थों का ही सेवन करते थे। किसी प्रकार का अन्य – फल आदि नहीं खाते थे। इसीलिए उनके नाम के साथ पयहारी लगाया जाता था। परंतु स्थानीय लोगों में “फुहारी बाबा” के नाम से ही जानते थे। यह अपभ्रंश रूप ही इलाके में प्रसिद्ध था।

राजा ने अपनी समस्या का समाधान जगह – जगह करवा लिया था। हर देवी – देवता और वैद्यों के पास जा – जा कर के राजा थक चुका था परंतु किसी से भी कोई राहत मिलती हुई नजर नहीं आ रही थी। एक दिन राजा फुहारी बाबा के पास अपनी समस्या लेकर उपस्थित होते हैं। राजा की समस्या को सुनकर के फुहारी बाबा ने अपनी सिद्धि शक्ति से उनका भोजन में कीट पतंगे दिखना और पानी का खून जैसा लाल दिखना तो तुरंत प्रभाव से ठीक कर दिया था परंतु उनका कुष्ठ का रोग फिर भी ठीक नहीं हो सका था। इस बीच राजा इस चमत्कार को देखकर के प्रभावित होकर फुहारी बाबा का शिष्य बन गया। बाबा ने राजा को भगवान नरसिंह की मूर्ति दी। राजा ने वह मूर्ति अपनी राजगद्दी पर विराजमान करवा दी और स्वयं एक छड़ी दार (प्रधान सेवक) की भूमिका में राज्य की सेवा करने लगे।

बाबा की चमत्कृत करने वाली अपार सिद्धि शक्ति से राजा बहुत प्रभावित हुआ और उनकी धार्मिक भावना और भी बलवती हो गई। एक दिन फिर से राजा बाबा के पास अपने कुष्ठ रोग निवारण हेतु प्रार्थना लेकर गए। तब बाबा ने उन्हें सलाह दी कि इस रोग को खत्म करने की क्षमता सिर्फ और सिर्फ त्रेता नाथ श्री रघुनाथ जी के ही पास है। अतः इसके लिए तुम्हें श्री अयोध्या धाम में विराजमान श्री त्रेता नाथ जी की मूर्ति और माता सीता जी की मूर्ति को यहां ले आना होगा। मूर्तियों को अयोध्या से ले आने के लिए बाबा ने अपने शिष्य “पंडित दामोदर दास” को भेजा, जो उन दिनों की सुकेत रियासत में रहते थे। आजकल यह सुकेत रियासत जिला मंडी का सुंदर नगर कस्बा है।

वैदिक रीत में किसी भी मूर्ति का असली माप

पंडित दामोदर दास जी बाबा के आदेशानुसार श्री अयोध्या धाम पहुंचे और वर्षभर वहां श्री रघुनाथ जी के पूजन अर्चन की विधियां और सारे क्रियाकलापों को गौर से देखा। फिर एक दिन सुअवसर आने पर वे भगवान श्री रामचंद्र और माता सीता की त्रेता काल में बनी मूल मूर्तियों को उठाकर कुल्लू की ओर चल दिए। लोक मान्यता है कि ये मूल मूर्तियां त्रेता काल में भगवान श्री रामचंद्र जी ने स्वयं ही अपने अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर बनाई थी। ये अंगुष्ट प्रमाण है। वैदिक रीत में किसी भी मूर्ति का असली माप यही माना जाता है। वैदिक रीति में यह मान्यता है कि मूर्ति का माप अंगुष्ट प्रमाण होना चाहिए। क्योंकि मूर्ति आत्मा का प्रतिरूप होती है। जिस प्रकार आत्मा अति सूक्ष्म होती है, दिखाई ही नहीं देती। उसी प्रकार मूर्ति भी अति लघु होनी चाहिए। अतः वे मूल मूर्तियां है, जिन्हें आज भी कुल्लू में बने श्री रघुनाथ जी के मंदिर में पर्दे के अंदर रखा जाता है। इनके दर्शन किसी को नहीं करवाए जाते। किसी विशेष घड़ी या स्थिति में इनका दर्शन प्राप्य है। परंतु आम दिनों में इनको परदे से बाहर नहीं किया जाता।

लोक मान्यता

लोक मान्यता के अनुसार पंडित दामोदर दास चलता – चलता जब मंडी रियासत में वर्तमान कनैड नामक स्थान पर पहुंचा तो वहां उन्होंने मूर्तियों समेत रात्रि विश्राम किया। अतः लोगों ने वहां भी मंडी के राजा की मदद से एक पुरातन शैली में राम मंदिर का निर्माण कर डाला। वहां से पंडित जी मणिकरण पहुंचे और उन मूल मूर्तियों को मणिकरण में ही स्थापित किया।

वहीं पर अयोध्या की रीत से नित्य प्रति रघुनाथ जी की पूजा अर्चना होने लगी। राजा जगत सिंह भी नित्य प्रति प्रभु श्री राम और माता सीता के चरणामृत को ग्रहण करने सुबह – सुबह मणिकरण पहुंच जाते। कुछ दिनों यह सिलसिला चला। कुछ दिनों बाद राजा का कुष्ठ रोग चरणामृत के पान से नदारद हो गया। इससे राजा की धार्मिक भावना और बलवती हुई। यह खबर जब इलाके में फैली तो मूर्तियों के चमत्कार से प्रभावित होकर कुल्लू घाटी के सभी देवी देवता मूर्तियों का दर्शन करने मणिकरण आ पहुंचे।

कुल्लू का राज्य रघुनाथ जी के नाम

तब राजा श्री राम जी और माता सीता की मूर्तियों को मणिकरण से कुल्लू सुल्तानपुर में स्थित रघुनाथपुर ले गए। वहां उन्होंने श्री रघुनाथ जी के भव्य मंदिर का निर्माण किया और उसी में मूर्तियों को विधिवत प्रतिष्ठित एवं स्थापित किया। तब से लेकर राजा ने अपनी राजगद्दी पर रघुनाथ जी को विराजमान करवाया और स्वयं उनका छड़ी दार (प्रधान सेवक) होकर रहने की घोषणा की। इसके साथ – साथ राजा ने अपने राज्य के अलग – अलग इलाकों को 365 देवी – देवताओं में बतौर जागीर बांट दिया। तब से कुल्लू का राज्य रघुनाथ जी के नाम पर चलने लगा और राज्य के भिन्न-भिन्न क्षेत्र देव जागीरों के नाम से चलने लगे।

लोक मान्यता यह भी है कि तभी से प्रतिवर्ष कुल्लू के ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में दशहरे का मेला आयोजित होने लगा। इस मेले में सुल्तानपुर से एक लकड़ी के बने भव्य रथ पर रघुनाथ जी की सवारी निकलती है और उनके पीछे जिले के विभिन्न क्षेत्रों से आए हुए समस्त देवी देवताओं की एक विशाल जलेड लोक वाद्य यंत्रों की धुनों के साथ- साथ भारी जनसैलाब के साथ निकलती है। इस प्रकार लगभग 40 छोटे – बड़े उत्सव कुल्लू में रघुनाथ जी की अध्यक्षता में आयोजित किए जाते हैं। तब से ले कर आज तक श्री रघुनाथ जी को कुल्लू का प्रधान देवता माना जाने लगा। असल में श्री रघुनाथ जी भगवान श्री राम के ही रूप है।

संदर्भ: —
१. श्री सुदेश कुमार कुल्लू से प्राप्त जानकारी।
२. श्री रघुनाथ जी मंदिर में चस्पा की गई इतिहास पट्टीका।)

हिमाचल में राम मंदिर: —

हिमाचल के कुछ एक राम मंदिरों का विवरण निम्नलिखित प्रकार से हैं: —

श्री रघुनाथ जी मंदिर जिला कुल्लू: —

यह मंदिर जिला कुल्लू के सुल्तानपुर बाजार में रघुनाथपुर में सन 1637 से 1662 ईसवी के बीच राजा जगत सिंह के द्वारा बनाया गया माना जाता है। यह कुल्लू के बस स्टैंड से थोड़ा सा ऊपर को बना हुआ है। पैदल पौडियों वाले रास्ते से यहां तक पहुंचा जाता है। इस मंदिर की बाकी विशेषताएं ऊपर विस्तार से बताई जा चुकी है। वर्तमान में भगवान श्री राम और सीता जी की भव्य मूर्तियां इस मंदिर में स्थापित की गई है। यहां वर्ष भर प्रतिदिन श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। यह मंदिर कुल्लू जिला के प्रधान देव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

मणिकरण में स्थित राम मंदिर: —

यह मंदिर मणिकरण नामक तीर्थ स्थल पर बना हुआ है। हिंदू लोग इस मंदिर परिसर में बने हुए गरम पानी के कुंडों में स्नान कर के अपने पापों का प्रक्षालन करते हैं। यहां स्त्री और पुरुषों के लिए अलग – अलग स्नान ग्रह बनाए गए हैं। जिनका नाम रामकुंड और सीता कुंड के नाम से रखा गया है। राम कुंड में पुरुष स्नान करते हैं और सीता कुंड में स्त्रियां स्नान करती है। वर्ष भर में लाखों श्रद्धालु इस तीर्थ स्थल में स्नान करने आते हैं।

गर्म पानी के चश्मे से संबद्ध राम और सीता कुंड में स्नान करके अपने पापों को धुला हुआ प्रतीत करते हैं। इसी विशेष तीर्थ यात्रा के दौरान सभी श्रद्धालु भगवान श्री रामचंद्र के मणिकरण स्थित इस भव्य मंदिर के भी विधिवत दर्शन करते हैं और प्रभु राम की कृपा प्राप्त करते हैं। इस मंदिर में नित्य प्रति प्रभु कृपा से श्रद्धालुओं के लिए भंडारे का भी आयोजन किया जाता है। इस मंदिर के प्रांगण में लकड़ी का बना हुआ एक भव्य रथ भी हमेशा मौजूद रहता है। मान्यता है कि इस रथ पर प्रभु राम जी की सवारी विशेष अवसरों पर निकाली जाती है।

जिला मंडी में राम मंदिर: —

जिला मंडी में भगवान राम के दो मंदिर है: —

  1. सनातन धर्म सभा राम मंदिर भगवाहण मोहल्ला मंडी बाजार। यह मंदिर जिला मंडी के उपायुक्त कार्यालय के ठीक पीछे बना है। इस मंदिर में भगवान श्री राम, लक्ष्मण एवं माता सीता की मूर्तियां विराजमान है। लोग वर्षभर प्रतिदिन यहां दर्शन करने आते हैं। सुबह – शाम की पूजा अर्चना और आरती इत्यादि में बराबर भाग लेते हैं। नवरात्रों के दिनों या फिर किसी राम कथा के आयोजन के दिनों यहां विशेष जन भीड़ उमड़ पड़ती है।
  2. यह एक पुरातन शैली में पत्थरों से बना हुआ राम मंदिर है, जिसमें भगवान श्री राम और सीता जी की मूर्तियां विराजमान है। यह मंदिर कनैड के पास बना हुआ है। इसका जिक्र भी ऊपर किया जा चुका है। परंतु वर्तमान समय में यह जीर्ण अवस्था में है। इसको पुनरुत्थान की आवश्यकता है। यहां लोगों का आना जाना आज बहुत कम है। (ग) यहां करसोग में भी राम मंदिर बना है।इस बाबत कोई खास जानकारी यहां उपलब्ध नहीं हो पाई है।

सूद सभा राम मंदिर शिमला: —

यह मंदिर जिला शिमला में बस स्टैंड के साथ ही रिज मैदान के नीचे को बना हुआ है। यह एक बहुत ही भव्य मंदिर है। इसके ठीक सामने जाखू में भगवान हनुमान का मंदिर है। शिमला के इस मंदिर में भगवान राम लक्ष्मण और माता सीता की मूर्तियां विद्यमान है। यहां भी नित्य प्रति श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है।

महासू राम मंदिर सिरमौर: —

हिमाचल के जिला सिरमौर का इलाका उत्तराखंड की सीमा से सटा हुआ है। यहां देव महासू के जितने भी मंदिर है उन सब मंदिरों में भगवान श्री रामचंद्र जी की ही प्रतिस्थापना मानी जाती है। इन मंदिरों का जिक्र भी ऊपर किया जा चुका है। असल में मूल महासू (बौठा महासू) मंदिर आज उत्तराखंड में त्यूणी से लगभग 40 किलोमीटर आगे मुख्य सड़क पर ही है। इसके साथ साथ तीन और महासू मंदिर यहां पर विद्यमान है, जिनमें क्रमशः भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न की प्रतिस्थापना मानी जाती है। इनके साथ साथ हनुमान, जामवंत, अंगद, सुग्रीव जैसे वानर वीरों की भी इन क्षेत्रों में पूजा अर्चना बौठा महासू के साथ की जाती है। बौठा महासू स्वयं भगवान राम ही है। इन्हीं मंदिरों के प्रारूप सिरमौर जिला की गिरी पार की पहाड़ियों में जगह – जगह बने हैं और लोग इन्हें बड़ी श्रद्धा से पूछते हैं।

जिला चंबा के मुख्य बाजार का राम मंदिर: —

जिला चंबा में मुख्य बाजार के साथ ही एक राम मंदिर बना हुआ है। वहां भी काफी श्रद्धालु आते रहते हैं। सुनने में आता है कि इस मंदिर की मूर्तियां कुछ समय पहले चोरी हुई थी। बाद में वे मुंबई में मिली थी।

हरिपुर राम मंदिर धर्मशाला कांगड़ा: —

यह मंदिर बनेर खड्ड के मुहाने पर हरिपुर नामक स्थान पर बना हुआ है। इसमें भी भगवान श्री रामचंद्र और लक्ष्मण के साथ-साथ माता सीता की मूर्ति स्थापित की गई है। इस मंदिर के निर्माण में अलग-अलग प्रकार की मान्यताएं। कुछ लोग इसे 825 वर्ष पुराना मानते हैं तो कुछ लोग इसे 1398 ईसवी से 1405 ईसवी के बीच राजा हरिचंद के द्वारा बनाया हुआ मानते हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार यह मंदिर पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान बनाया था। डॉ योगेश रैना की टिप्पणी को अगर ध्यान में रखें तो उनके अनुसार यह मंदिर 825 वर्ष पुराना है। उनका मानना है कि मंदिर में 825 साल पुराने एक घंटे में तिथि अंकित है। इसलिए यह मंदिर उसी कालखंड में बना होगा। कांगड़ा जिले में शायद ही ऐसा दूसरा कोई राम मंदिर हो। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां की मिट्टी हाल ही में श्री अयोध्या जी में बनने वाले भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए भी ले गए हैं।

भव्य राम मंदिर निर्माण श्री अयोध्या धाम के विषय में कांगड़ा के पालमपुर स्थित रोटरी भवन का जिक्र आजकल खासा चर्चा में है। कहा जाता है कि लगभग 500 सालों से लटके हुए भव्य राम मंदिर निर्माण मामले की रूपरेखा इसी रोटरी क्लब में हुई 9 जून से लेकर 11 जून 1989 तक की भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक मैं तैयार की गई थी। इस बैठक का आयोजन पूर्व मुख्यमंत्री श्री शांता कुमार जी ने तत्कालीन राष्ट्रीय भाजपा अध्यक्ष श्री लालकृष्ण आडवाणी जी और भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेई जी के निर्देशानुसार किया था। इसमें भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बहुत से नेताओं ने हिस्सा लिया था। इसी बैठक में वर्तमान में अयोध्या में बनने वाले भव्य राम मंदिर का प्रारूप तैयार किया गया था और पूरे का पूरा मसौदा बनाकर राम मंदिर के मुद्दे पर आगामी रणनीति बनाई गई थी। राजनीतिक विशेषज्ञों की टिप्पणियों को यदि ध्यान में रखा जाए तो यही वह बैठक थी जो 1984 में मात्र 2 सीट वाली भाजपा को 1989 में 85 सीटें प्रदान करवाती है। अतः श्री अयोध्या धाम के भव्य राम मंदिर में हिमाचली संस्कृति की ओट में लिए गए इस अहम निर्णय का भी एक विशेष महत्त्व सुनहरे अक्षरों में सदा के लिए चिन्हित रहेगा।

इसके अतिरिक्त भी कई देवताओं के नाम से या फिर स्वयं भगवान श्री रामचंद्र जी के नाम से राज्य के विभिन्न जिलों में और भी मंदिर स्थित है, जिनका जिक्र अधूरी खोज के चलते यहां करना उचित नहीं है।

हिमाचली लोक यात्राओं में राम: —

लोक यात्रियों के रूप में हिमाचल में मात्र सिरमौर जिले के लोग ही उत्तराखंड में स्थित हणोल बौठा महासू मंदिर की यात्रा के लिए प्रतिवर्ष विधिवत जाते हैं। यह यात्रा पहले पैदल की जाती थी परंतु आज के दौर में इस मंदिर तक सड़क बनी हुई है और अब यह यात्रा गाड़ियों पर की जाती है। इस यात्रा के लिए लोग रोहडू से हाटकोटी होते हुए त्यूणी से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर तक यात्रा करते हैं और वहां पर बौठा महासू के रूप में भगवान श्री रामचंद्र जी के दर्शन करके अपने – अपने घरों को पुनः प्रभु का आशीर्वाद लेकर लौट आते हैं।

यहां कुल्लू जिले में स्थित मणिकरण की तीर्थ यात्रा भी श्री राम जिसे आँशिक संबंध रखती है। परंतु मूलतः लोग इस स्थान पर मणिकरण स्नान की दृष्टि से जाते हैं। ऐसे में इसे विशुद्ध राम दर्शन यात्रा नहीं कहा जा सकता।

लोक अभिवादनों और संस्कारों में राम : —

अभिवादन के रूम से हिमाचल के लोग सुबह उठकर ही आपस में एक दूसरे को “राम – राम” कह कर प्रणाम करते हैं, जिसकी जगह वर्तमान में गुड मॉर्निंग धीरे-धीरे ले रहा है। परंतु फिर भी अधिकांश पहाड़ी लोग “राम-राम” कह कर ही अपना अभिवादन प्रस्तुत करते हैं। हां नई पीढ़ी में इस संबंध में कुछ विकार आ चुका है परंतु पुरानी पीढ़ी के लोग आज भी इसी परंपरा को अपनाए हुए हैं। संस्कार के नाम पर मृत्यु संस्कार के समय “राम नाम सत्य है” का जय घोष भी भारत की अखंड संस्कृति के अद्वितीय नियमों के अनुसार ही हिमाचली लोग भी बखूबी करते हैं।

तीज – त्योहारों और उत्सव में राम: —

  1. त्योहारों के रूप में एक तो हिमाचल में कार्तिक मास की अमावस्या को समूचे भारतवर्ष की तर्ज पर प्रभु राम की स्मृति में दिवाली का पर्व मनाया जाता है। परंतु हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्र की मान्यता के अनुसार यह पर्व महाराज बलि की कृतज्ञता हेतु भगवान श्री रामचंद्र जी के वचनानुसार हिमाचल में मनाया जाता है न कि उनके अयोध्या पुनरागमन की खुशी पर। परंतु वर्तमान में यह समूचे भारतवर्ष की तरह भगवान राम के अयोध्या वापस लौटने के पुनरागमन की खुशी का पर्याय ही बन गया है।
  2. दूसरा राम से संबंधित त्यौहार हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में “बूढ़ी दिवाली” का मनाया जाता है। लोक मान्यता के अनुसार हिमाचल के दूरदराज के क्षेत्रों में भगवान रामचंद्र जी के वनवास से लौटने की सूचना एक महीना देर से प्राप्त हुई थी और कहीं कहीं तो दो महीना देर से पहुंची थी। अतः उन लोगों ने जैसे उनको सूचना मिली वैसे ही दिवाली का उत्सव इन पहाड़ी क्षेत्रों में मनाया। तब से यह परंपरा वैसे ही चलती आई। यह दिवाली कुछ लोग मार्गशीर्ष मास की अमावस्या को मनाते हैं तो कुछ लोग पौष मास की अमावस्या को मनाते हैं। इस दिवाली को मनाने का अलग – अलग जगहों पर अलग – अलग तरीका है। सोलन, सिरमौर, शिमला तथा मंडी आदि के ऊपरी क्षेत्रों में यह दिवाली भिन्न – भिन्न मासो में मनाई जाती है। कुछ लोग इस दिन रात को लकड़ियों की छोटी-छोटी अधिक जवलन क्षमता वाली बारीक झिल्लियों (जगनी) को इकट्ठा करके एक लंबे लकड़ी के डंठल पर वन बेलों से बांधते हैं और उसकी विशाल मशाल तैयार करते हैं। फिर रात्रि के अंधेरे में सब ग्रामीण इकट्ठा होकर के इन मशालों से दिवाली खेलते हैं। बहुत सी खाने – पीने की वस्तुएं भी बनाते हैं। यह मशाल जुलूस और खेल देखने लायक होता है। कहीं – कहीं विशाल अग्निकुंड जलाकर यह दिवाली मनाई जाती है। लोक मान्यता के अनुसार उस समय किसी प्रकार का संचार का साधन ना होने के कारण इन इलाकों में सूचना देर से मिली थी। इसलिए यह दिवाली अयोध्या की दिवाली से बाद मनाई गई थी। अर्थात तब तक यह बात पुरानी हो गई थी। परंतु फिर भी लोगों ने राम के आगमन की सूचना सुनकर एक विशाल जश्न मनाया जिसका नाम बूढ़ी दिवाली रखा गया। इस अवसर पर लोग कई जगहों पर ढोल नगाड़ों के साथ दिवाली गाते भी हैं और नृत्य भी करते हैं।
  3. रामनवमी एवं दशहरा पर्व — ये पर्व भी हिमाचली संस्कृति में समूचे भारत की संस्कृति की तरह मनाए जाते हैं। परंतु दशहरा पर्व की दृष्टि से कुल्लू का दशहरा पर्व समूचे भारतवर्ष में प्रसिद्ध है। जिला कुल्लू के ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में इस अवसर पर एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। यह मेला कई दिनों तक चलता रहता है। इसमें देश के भिन्न – भिन्न भागों से व्यापारी सामान लेकर आते हैं और हिमाचल के भिन्न – भिन्न जिलों के सभी लोग भगवान राम की याद में मनाए जाने वाले इस पर्व के अवसर पर लगने वाले मेले का भरपूर आनंद उठाते हैं। इस अवसर पर सभी आगंतुक मेले में खूब खरीद-फरोख्त भी करते हैं।
  4. उत्सवों में राम — अमूमन देखा गया है कि बाल जन्मोत्सव के अवसर पर जो बधाई गीत गाए जाते हैं, उनमें महिलाएं रामलला का जिक्र जरूर किया करती है। एक पंक्ति कुछ यूं देखी जा सकती है: —“बधाई हो बधाई जी आज,राम लल्ला ने दर्श दियो है।”
    इसके साथ – साथ कुछ ऊपरी इलाकों में सिया स्मृति को भी बेटी के विवाह के अवसर पर गाया जाता है। बेटे के विवाह के अवसर पर वधू प्रवेश के दौरान भी कुछ इसी तर्ज के गीत गाए जाते हैं।
  5. लोकनाट्य विधाओं में राम – हिमाचली लोक संस्कृति में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पहले लोकनाट्य की शैली प्रचलित थी। उसमें बांठडा, स्वांग और करियाला नृत्य नाट्य शैली आदि बहुत से नाट्य मंचन स्थानीय कलाकारों के द्वारा
    लोक मनोरंजन हेतु किए जाते थे किए जाते थे। उन नाट्य मंचनों मैं रामकथा के किसी एक अंश विशेष पर स्थानीय कलाकार राम के महान चरित्र को प्रदर्शित करने वाले नाटक को प्रस्तुत किया करते थे और लोग उन नाटकों को देखकर मनोरंजन के साथ – साथ एक विशेष शिक्षा ले कर के भी जाते थे।ये कार्यक्रम साल के एक आध बार आयोजित किए जाते थे। बाद में इनकी जगह रामलीला मंचन ने ले ली। रामलीला भी लोग बड़ी श्रद्धा और भक्ति भाव से देखते थे। ये कार्यक्रम एक स्थान पर 14 वर्षों तक आयोजित किए जाते थे और फिर रामलीला किसी दूसरे स्थान पर स्थानांतरित की जाती थी। इन रामलीलाओं में मंडी में जोगिंदर नगर, किन्नौर में भावानगर की रामलीलाएं विशेष आकर्षक एवं महत्वपूर्ण मानी जाती है। असल में किन्नौर जिला में रामलीलाओं का प्रचलन सन 1979 में भावनगर विद्युत प्रोजेक्ट के कर्मचारियों के द्वारा शुरू किया गया। उससे पहले किन्नौर में इस प्रकार का कोई भी नाट्य मंचन प्रभु श्री राम जी की जीवन घटना पर मौजूद नहीं था। यह जानकारी श्री लाल सिंह ठाकुर विद्युत प्रोजेक्ट भावनगर के कर्मचारी द्वारा प्रदान की गई।वर्तमान में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चलते तथा धारावाहिकों के प्रसारण के चलते और उसके साथ – साथ अब इंटरनेट की दुनियां के चलते ये सब कलाएं धीरे – धीरे लुप्त प्राय होती जा रही है। हां अब हिमाचली संस्कृति में भी रामकथा का पंडालीय चलन समूचे भारतवर्ष की तरह अधिकता से होने लगा है।
  6. हिमाचली संस्कृति में राम वनवास काल से संबंधित साक्ष्य – यह सर्वविदित है कि श्री राम जी का वनवास काल अधिकतर दक्षिण भारत में ही गुजरा। इसलिए यहां उनके इस काल का कोई खास साक्ष्य नहीं मिलता। परंतु हां जिला शिमला में रिज के मैदान के ठीक सामने जाखू में हनुमान मंदिर को उनके वनवास काल से जरूर जोड़ा जाता है। लोक मान्यता है कि जब भगवान श्री रामचंद्र जी के छोटे भाई लक्ष्मण जी मूर्छित होकर के अचेत पड़े थे तो उन्हें संजीवनी लाने के उद्देश्य से हनुमान इस जगह से होते हुए हिमालय की ओर बढ़े थे। इस जगह पर हनुमान जी याकु ऋषि से मिले थे। अतः इस स्मृति में जाखू मैं हनुमान का मंदिर बनाया गया है। अब तो यहां पर हनुमान जी की 108 फुट ऊंची मूर्ति का निर्माण भी किया गया है।

निष्कर्ष (Conclusion) : —

निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि हिमाचली संस्कृति में भगवान राम के प्रति आस्था व विश्वास त्रेता काल से ही प्रगाढ़ रूप में विद्यमान है। यहां की भोली – भाली जनता भारतीय जनमानस के नायक भगवान श्री रामचंद्र जी के जीवन चरित्र से बहुत ही प्रभावित है और भगवान रामचंद्र जी के पद चिन्हों पर चलने के लिए निरंतर प्रयासरत रहती है।

यहां की देव संस्कृति में भले ही प्रभु श्री राम को किसी देव विशेष के नाम से अभिहित किया गया हो, परंतु आस्था और मान्यता फिर भी भगवान राम के ही प्रति बनी हुई है। विषय चाहे लोकगीतों, लोक संस्कारों, मंदिरों, लोक गाथाओं तथा लोक श्रुति – स्मृतियों का हो या फिर तीज त्योहारों का हो, राम कहीं ना कहीं हिमाचली संस्कृति में साक्षात नजर आ ही जाते हैं। हिमाचली संस्कृति के उन्नत वैभव में प्रभु श्री रामचंद्र जी का मिश्रण कुछ इस कदर हो गया है कि मानो आटे में नमक मिल गया हो।

अब इन्हें कोई चाह कर भी अलग नहीं कर सकता। बूढ़ी दिवाली के पर्व को लेकर जो मान्यता है या फिर सोलन, शिमला, सिरमौर के लोक पारंपरिक रामायण गीतों (बरलाज) की जो मान्यताएं हैं, उनको यदि तथ्य माना जाए तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि हिमाचली संस्कृति में राम सचमुच त्रेता काल से ही प्रतिष्ठित रहे है। हिमाचली संस्कृति और राम का आपस में घनिष्ठ संबंध है।

घोषणा : —

उपरोक्त साक्ष्य एवं संदर्भों के अनुसार प्राप्त जानकारी के तहत यह मेरा मौलिक और स्वरचित शोध आलेख है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — हिमाचली संस्कृति में भगवान राम के प्रति आस्था व विश्वास त्रेता काल से ही प्रगाढ़ रूप में विद्यमान है। यहां की भोली – भाली जनता भारतीय जनमानस के नायक भगवान श्री रामचंद्र जी के जीवन चरित्र से बहुत ही प्रभावित है और भगवान रामचंद्र जी के पद चिन्हों पर चलने के लिए निरंतर प्रयासरत रहती है। विषय चाहे लोकगीतों, लोक संस्कारों, मंदिरों, लोक गाथाओं तथा लोक श्रुति – स्मृतियों का हो या फिर तीज त्योहारों का हो, राम कहीं ना कहीं हिमाचली संस्कृति में साक्षात नजर आ ही जाते हैं। हिमाचली संस्कृति के उन्नत वैभव में प्रभु श्री रामचंद्र जी का मिश्रण कुछ इस कदर हो गया है कि मानो आटे में नमक मिल गया हो।

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यह लेख (हिमाचली लोक संस्कृति में प्रभु श्री राम और दिवाली।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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