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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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poet Satish Shekhar Srivastava - Parimal poems

जीतना ही जीवन है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जीतना ही जीवन है। ♦

हर प्राण का अस्तित्व में आना,
तन के साथ कर्म कर्तव्य का भी जन्म।
संघर्ष दायित्वों का निर्वहन बस,
आधार धरा का धरणी का जन्म।

प्रबल वेग से प्राण का बनना,
प्रचंड प्रकृति के कामों को।
भाव मान प्रतिष्ठा मानक का बनना,
सिद्धी प्रसिद्धि बुद्ध प्रबुद्ध को।

सृष्टि चिर-काल से निर्धारित करती,
मनु के जीवन की लड़ाई।
संघर्ष मन-तन से सदैव करती,
आत्मविश्वास की अडिग लड़ाई।

आक्रान्त हो नहीं जीत सका कोई,
जीवन और व्यक्तित्व के युद्ध को।
शान्त शील दुर्धर समय की कोई,
सीमा परिशिष्ट काल के बुद्ध की।

जीतना है जीवन को तो संघर्ष करो,
आत्मबल सामर्थ्य को कर प्रबल।
बढ़कर सामना करो समय के दुर्दिन का,
विश्वास न घटने दो अंतस्-तल।

एकाग्रचित्त होकर प्रचंड प्रयास करो,
भंग न होने दो अन्तर को।
निभृत तन रखकर केंद्र का विस्तार करो,
दंभ अपने उद्योग के पुर को।

संघर्ष मुझे जीना सिखा दो,
लड़ना और जीतना बता दो।
लड़ूं मैं… अपने वजूद से निरंतर,
संघर्ष तुम मुझे जीतना सिखा दो।

इस मृत्युलोक में आया हूं,
तन मानव का पाकर जीने को।
बुद्धि और विवेक मुझे दे दो,
जीत सकूं इस संघर्ष भरे जीवन को।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — मनुष्य जीवन में उतार – चढ़ाव तो आते रहते है, असफलता सदैव ही कुछ सीखा कर जाती है। आजकल के मनुष्य का मानना है की जीवन के किसी भी क्षेत्र में जीतना ही जीवन है। मनुष्य चाहता है की वह जो भी कार्य करें, उसमे उसकी विजय हो, लेकिन हमेशा ऐसा ही हो ये जरूरी तो नहीं। मेरी एक बात सदैव ही याद रखे – की कोई भी बुरा या अच्छा समय लम्बे समय के नहीं आता। बुरा या अच्छा समय निर्भर करता है हमारे अच्छे कर्म, व्यवहार व नज़रिये पर। इसलिए मन से कभी भी हताश निराश होकर जीवन में बैठ न जाये, सदैव ही अच्छे कर्म करते रहे। जब आपके कर्म अच्छे होंगे तो देर से ही सही आपको जीत जरूर मिलेगी।

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यह कविता (जीतना ही जीवन है।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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शहीदाें काे नमन हमारा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शहीदाें काे नमन हमारा। ♦

शीश झुका कर प्रणाम करते हैं हम उनको,
उन शहीदों को शत – शत नमन हमारा।
जो शीश कटा दिये, अपने देश के लिये,
भुला सकते नहीं हम उन्हें स्वन्तत्रता जो दे गये।

मलय समीर बन बहते रहेंगें उर में हमारे,
देश पर मर मिटने की चाहतें थी उनकी।
हर इक में खून-ए-जिगर से आम हो गये,
देश लहू पुकारेगा हमेशा उन शहीदों को।

जरा सी गफलत-ए-शाम जब भी होगी,
रूह बनकर पुकारेगी शम्पायें वतन की।
जब भी शहीदों की याद आयेगी चमन से,
दहाड़ें मार कर रोयेंगी माटी वतन की।

कतरा भी गया जमीं का गर शत्रु के पास,
धिक्कार लगायेंगी लहू हमें शहीदों की।
उन्हे पिपासा थी वतन की आजादी की,
बेकल हो फिरते थे राहें वे वतन की।
हर-संभव प्रयास करते थे नौ-जवां क्रांति की।

दीवाने जो थे, वे जो चूमते फाँसी को।
नमन करते हैं हम सब, उन सब शहीदों को।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — जान हथेली पर लेकर दुश्मन का चीर सीना दिया। फिर से वीर भारत माँ के शहीद हो गए। याद करेगा तुमको और वंदे मातरम् गायेगा। फिर से वीर भारत माँ के शहीद हो गए। 91 साल पहले यानी 23 मार्च 1931 को आज ही के दिन भगत सिंह और उनके साथी राजगुरु, सुखदेव को फांसी दी गई थी। उनकी शहादत को देश का हर नागरिक सच्चे दिल से सलाम कर रहा है। भारत को आजाद कराने के लिए इन वीर सपूतों ने हंसते-हंसते मौत को गले लगा लिया था।

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यह कविता (शहीदाें काे नमन हमारा।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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सभ्यता और संस्कृति।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सभ्यता और संस्कृति। ♦

हम और हमारी नदी।

• विश्व जल दिवस के अवसर पर…

हम शैवालिनी के अन्तरीप हैं।
नहीं कहते की हम को छोड़ कर,
निर्झरणी बहती जाये हमें यह स्वरूप देती जाये।
शंकु, वीथिका, भूनासिका, उचनि, बलुआही अवारी,
इन सब को वर्तुलाकार उसने सृजन किया है।

पवित्र जल माँ है और इसी से हमारा अस्तित्व है,
मगर हम सब तो जजीरा हैं हममें नहीं प्रवाह हैं।
अटल अभ्यर्पण है हमारा इसके साथ,
चिर-काल से हम माँझा हैं पुलिनवती के,
लेकिन हम प्रवाही नहीं हैं।

चूंकि प्रवाहित होना हममें नहीं,
हम प्राण रणभूमि ही होंगे।
हम श्रवनेगें तो बचेंगें ही नहीं,
अंध्रि उन्मूलित होगी तैरना होगा।
ध्वस्त होगें, झेलना पड़ेगा और बह जायेंगे।

पुन: एक बार हम कल्क होकर भी,
किसी समय उत्पत्ति बन सकते हैं।
विशिका बन कर हम घनरस को थोड़ा
अमृष्ट ही करेंगे निर्रथक ही सब बनाएँगे,
जो हम जजीरा हैं सब।

नहीं यह है अभिशाप हम सबका है प्रारब्ध,
हम सरिता के अंगज हैं।
अध्यासीन हैं अर्णा के उछंग में,
वह दीर्घकाय भूभाग से हमको मिलती है,
इसके अलावा यह धरा अपने पुरखों की है।

हे सरिते, तुम यूं ही बहती चलो।
भू-भाग से जो दातव्य हमको मिला है,
वो हमें मिलता रहे सदा,
मलती, संस्कृति और संस्कार देती चलो।
जब ऐसा कभी हो आपका उल्लासों से या
दूसरों के किसी स्वेच्छाचार से उत्क्रमण से तुम बढ़ते रहो।

जल प्रलय तुम्हारा हिलकोर मारते उठे,
तब हे स्रोतस्विनी तुम कृतघ्नी ख्याति नाशिनी भीषण,
काल-प्रवाहिनी बन जाना।
हमें सब अंगीकार है यह भी,
उसी में रेणुका से होकर फिर बिछुड़ेंगे हम।

बसेंगें हम कहीं न कहीं फिर पैर रखेंगें,
कहीं पुन: फिर से खड़ा होगा नया अस्तित्व और स्वरूप।
हे मातु सरिते तुम उसे फिर से,
संस्कृति रीति नीति और संस्कार तुम ही देना।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — हम बचपन से सुनते आ रहे है की “जल ही जीवन है” जल के बिना जीवन की कल्पना भी मुश्किल है। जल के बिना कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता ये सभी जानते है। अगर ऐसी ही स्थिति बनी रही तो हमारे आने वाली नई पीढ़ी को जल मिलेगा ही नहीं। प्रदूषण, कल कारखानों के कारण बढ़ता ही चला जा रहा है। कल कारखानों से निकलता हुआ कचरा और विषाक्त पदार्थ नदियों और तालाबों में प्रवाहित कर दिए जाते है। जिससे पीने योग्य पानी भी विषाक्त होता जा रहा है। इंसानो ने अंधाधुन पेड़ों को काटा जिस कारण वर्षा का संतुलन बिगड़ गया पूर्ण धरा पर। अभी भी समय है संभल जाओ और सभी संकल्प करों की प्रत्येक वर्ष एक पेड़ जरूर लगाएंगे और उसका देखरेख करेंगे तब तक जब तक वह पेड़ अपना खुराक धरा से खुद न लेने लगे। जब हम सभी पेड़ लगाएंगे तो फिर से सभी नदियों में भरपूर पानी बहने लगेगा, और सभी का जीवन सुखमय होगा।

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यह कविता (सभ्यता और संस्कृति। – हम और हमारी नदी।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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होली।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ होली। ♦

(रंग, विचार, उल्लास)

सृष्टि संसार की अगम होती अति वृष्टि,
सजती संवरती निसर्ग ले पल्लव पुष्प आसंग।
चढ़ते माघ शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि विशिष्ट,
बसंत राज का आगमन नव श्रृंगार का अहंग।

नए गुलाबी रंग पल्लव मन को मुग्ध करे,
प्रकृति सौन्दर्य प्रधान के त्रयी रंग कमाल।
कानन अगिन उजार दे टेसू पुहुप समान,
पीली साड़ी ओढ़े प्रमृत सदृश सजी धमाल।

आम्र मंजरी पुकारती गुलाब मालती प्रसून,
भटकते प्रियतम बन अलिमक भृंग समरेख।
विकल हो कोकिला करे कुहू-कुहू की टेर,
प्राणों को उद्वेलित करे फगुआ को देख।

वन वृक्षों की हरीतिमा मन को खींचे अपनी ओर,
आकर्षित करे पल-पल बालें गेहूँ-जौ की और बौर।
पतंगम गुंजन मधुकर कोकिला करे अति शोर,
देखो आया गली-गली रंग धुलिवंदन का अंदोर।

गीत गोविंद धमार की गायन वाद्य नृत्य विभोर,
कामिनी कानन यौवन फूटे उत्साह मस्ती चहुँओर।
प्रीति प्रेम त्याग की द्वेषरहित रहे ये संसार,
अन्न-घी-गुड़-दाव रंग से पितृतर्पण करते चहुँओर।

रंग अबीर गुलाल संग बजे फाग धमार की मृदंग,
धुलेंडी धुरड्डी, धुरखेल धूलिवंदन इसके नाम प्रतिष्ठ।
गीत गायन कर मिटाये कटुता द्वेष सब ये उद्वेग,
पेड़-पौधे, पशु-पक्षी मनुष्य उल्लास इससे यथेष्ट।

मंच (KMSRAJ51.COM) से जुड़े समस्त कवि/कवित्रियों को होलिका दहन एवं होली की शुभकामनायें।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — इस समय पतझड़ के बाद नए पतों का वृक्षों पर आना वन वृक्षों की हरीतिमा मन को खींचे अपनी ओर आकर्षित करे पल-पल बालें गेहूँ-जौ की और बौर पतंगम गुंजन मधुकर कोकिला करे अति शोर देखो आया गली-गली रंग धुलिवंदन का अंदोर। होली रंगों का ही नहीं सामाजिक भेदभाव मिटाने एवं सामूहिकता का पर्व भी है। होली बुराई पर अच्छाई के प्रतीक का पर्व भी है। इस बार हम होलिका दहन के साथ कोरोना वायरस का भी दहन करें तो फिर पहले की तरह सौहार्द्र पूर्ण वातावरण में एक-दूसरे से गले मिलते हुए होली मना सकेंगे। होली रंगों का त्योहार है और जीवन में रंग तभी तक हैं, जब तक परिवार-समाज सुरक्षित है।

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यह कविता (होली – रंग, विचार, उल्लास।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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उन्मुक्त जिंदगी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ उन्मुक्त जिंदगी। ♦

याद इन्हें भी कर लें आज।

दे दी हमें उन्मुक्त सी जिन्दगी।
आज़ादी में साँस लेने के लिये।
रो रही थी माँ भारती।
बेड़ियों में पड़ी गुलामी में,
हुंकार उठी नव खूनों में।

दासता की बेड़ियां तोड़ने के,
सन् सत्तावन में लगी आग बरसने।
अंग्रेजों के सीनों पर,
नाना तात्या मंगल बहादुर,
रानी लक्ष्मी कुंवर के हाथों से।

ह्यूज कार्नेल और डलहौजी जैसे,
कितने भागे अपने सिवरों में।

मेरठ कानपुर सतारा झांसी,
दिल्ली बिठूर लेते जाते वीरों ने।
फड़नवीश के तलवारों से,
क्रांतिवीर के हुंकारों से।

बेड़ियां लगी टूटने जब,
हाय! कैसी बिडंबना आई।
रानी गई काल-कवलित हो,
दे अगली पीढ़ी को,
हम न सके पूरे तोड़ने बेड़ी को,
माँ रो रही है बेड़ी में।

भुवन के नन्हें कामों से,
फिर जोश-उल्लास भर गया।
नौजवानों में।
हुंकार उठे कूका-बिरसा,
ले आदिवासी वीरों ने।

नीलांबर-पीताम्बर बंधुओं ने,
बरसा तीर-कमानों से।
छुड़ा दिये पसीने अंग्रेजों के,
लेकिन ये भी लड़े भिड़े,
तोड़ न पाये जंजोरों को।

पुनः नई आवाज उठी,
बेटों-बेटियों के हुंकारों से।
किशोर युवा चले मिटाने।
गुलामी की जंजीरों को।

कूद पड़े लाला लाजपत राय,
तिलक चापेकर बंधु पटेल खान।
ये सब बातों से,
कहां सुनने वाले थे।

बहरे थे कानों के,
इन्हें धमाके सुनने थे।
असफाक विस्मित दीनबन्धु,
खुदीराम बोस के गानों के।
पंजाब से उठे शोले फैले।

उत्तर प्रदेश बंगाल गुजरात,
मध्यभारत ओड़ीसा कर्नाटक,
आन्द्रा के हुंकारों से,
डोल गया एलिजाबेथ का,
सिंहासन लंदन के गलियारों में।
थर-थर कांपने लगे कागज के वीर,
जो उन्मुक्त हो करते,
अत्याचार भारत के गलियों में।

सुभाष बोस की सेना जब रंगून गई,
भागे अंग्रेज अपने घरों में।
लक्ष्मी सहगल बनी लेफ्टीनेंट,
मुजिबुर्रहमान बने कमाण्डर।
कर दिये बेड़ागर्क अंग्रेजों के,
उपनिवेश की आँधी ले चलते थे,
उड़ गए फिर तूफानों में।

भगत सिंह राजगुरू सुखदेव,
भाभी दुर्गा के चण्डों से।
फणीश्वर जैसे बच्चे गरजे,
भरी अदालत में बंदूकों से।
रक्त जब गिरने लगा अंग्रेजों के,
नाच उठी मौत की छाया।
जब इनके सीनों में।

भाग पड़े अंग्रेज अपने बिलों में,
दिल कांपा मन बिचलित हो भागा।
फिर लंदन की गलियों में।
मिली स्वतंत्रता जब भारत को,
माउण्टबेटन ने तभी चली चाल।

माँ भारती के सीने में,
कर दिये दो टुकड़े।
हिन्दुओं के वृहद को खंडित कर,
यवन को पाकिस्तान दे।
भारत को खंडों में विभक्त कर दिया।

आजाद भगतसिंह खुदीराम सुभाष,
असफाक विस्मिल राजगुरू जैसे,
कितने वीरों के सपनों को तोड़,
कर दिया टुकड़े में अंग्रेजों ने।

जतिन दास के भूखों में भी,
देखे थे सपने उन्मुक्त वृहद भारत के।
आज़ादी के सपने,
सब शहीदों ने मिलकर दें दिया हमको,
आज़ादी से उन्मुक्त जीने को।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — कड़वा है मगर सत्य है — जिन सूरमाओं ने अपने रक्तिम रंग से खेली क्रांति की होली थी। भारत की स्वतंत्रता खातिर, खाई वक्ष स्थल में गोली थी। सदैव ही इंकलाब की जिनके मुंह में, रहती सदा एक ही बोली थी। वह नर के वेश में नारायण की, अवतरी भारत में टोली थी। इतिहास छुपाया सच न बताया, इज्ज़त, माटी में रोली थी? यह राष्ट्रीय पर्व हमें देश की एकता और गौरव को बनाये रखने की प्रेरणा देता है। हम सभी को संविधान के सभी नियमों का पालन करना चाहिए। 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान पूर्ण रूप से लागू हो गया था। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। 26 जनवरी के दिन ही भारत को गणराज्य का सर्वोत्तम दर्जा प्राप्त हुआ। 26 जनवरी के दिन दिल्ली में इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक परेड निकाली जाती है। जिस वतन ने हमें प्यार, मां का आंचल, समरसता, रंग रूप भेष भाषा सभी को मिलता मान दिया उस वतन पे हमें नाज है। जिस वतन का सबसे बड़ा संविधान लोकतंत्र जिसकी शान वो भारत देश महान वो भारत देश महान। वतन हमारी आन हमारा सम्मान है उस मां को हमारा सलाम वंदे मातरम् वंदे मातरम् वंदे मातरम्॥

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यह कविता (उन्मुक्त जिंदगी।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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तनया।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ तनया। ♦

तनया (बेटी)

निकाय का आधार है तनया,
आत्मज की पहचान है तनया।
जगत जननी की जान है तनया,
बेटियों का सर्वनाम है तनया।

धर्म की रूपरेखा है तनया,
संस्कृति की प्रथम जान है तनया।
सृष्टि का आधार है तनया,
माँ की अनुपम कृति है तनया।

समाज की डोर है तनया,
संस्कृति की धरोहर है तनया।
नंदिनी उपनाम है तनया,
ब्रहाण्ड की गति है तनया।

उत्पत्ति की आधार है तनया,
परिवार का जीवन है तनया।
गेह की रीति-रिवाज है तनया,
माता-पिता की दुलार है तनया।

भाई का अभिमान है तनया,
हर हंसी-खुशी के सरगम का,
रूप है तनया।
मातृभूमि की छाप है तनया,
परिवार का दंभ है तनया।

कलम कागज और दवात है तनया,
हर लेखक का आधार है तनया।
लेखन का लेख है तनया,
संसार का प्यार है तनया।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली , मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — बेटियां शक्ति, प्रेम, करुणा, ममता की वह चुलबुली चिड़िया सी चहकती, फूल सी महकती मुस्कुराती, राजकुमारी सबकी प्यारी लाड़ली – दुलारी, सबका सदैव ही ध्यान रखने वाली। ईश्वर द्वारा मानव जाती के लिए प्रदान की गई अनमोल शक्तिपुंज हैं। जो हर रूप में प्रेम और सहयोग के लिए तैयार रहती है।

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यह कविता (तनया।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

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