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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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sushila devi

बारिश का सबसे अलग और अद्भुत रूप।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बारिश का सबसे अलग और अद्भुत रूप। ♦

सावन के आते ही सबको बारिश का सुहाना रूप याद आता है जो मन में छुपे हुए प्रेम के उदगार, विरह की तपिश, बचपन के लड़कपन को उजागर करता है। प्रकृति भी हर ओर से पुकार करती नजर आती है। सब जीवों के नव संचार के लिए ये धरती पर अवतरित होती है। पर इस सुहाने और जीवनदायी मौसम के पीछे एक शब्द का कड़वा सच छिपा है जो उच्चवर्ग को छोड़ बाकी हम सभी ने बहुत नजदीक से देखा है और इसके दुख भी सहा है।

बारिश के आते ही टप-टप टपकती बूंदों से तड़-तड़ की आवाज़ से तेज होना सबको अच्छा लगता है। क्योंकि प्यासी धरती की प्यास बुझती है और सारी हरी-भरी वनस्पति नहाई हुई अति सुंदर लगती है, पर जब यही बरसना लगातार दो या तीन दिन हो तो आम आदमी के लिए ये बाहर तो क्या घर में ही एक माहौल ले आता है जब दिन-रात इसकी आहट से ही दिल घबराहट से भर जाता है जी।

और जब ये आता है तो अकेले बिल्कुल नही आता साथ में अपने परिवार को ले आता है जैसे कई पीढ़ियों का आगमन हम सब के घर में हो गया।

अब तो आप सभी को उसकी आहट आ ही गयी होगी। जी बिल्कुल सही पहचान गए आप सभी। क्योंकि हम सभी इसके दुख से भली-भांति परिचित है। क्योंकि हमारी चैन की नींद को न जाने कितनी बार इसने खराब किया है। कितनी बार इस टपके ने हमारे बाहर पहनने के कपड़ों पर भी बदनुमा दाग दिया।

कितनी बार इससे बचने के लिए रसोई के सारे छोटे-बड़े बर्तन कमरे में आये।कितनी बार इसने भरी बारिश में हम छत पर चढ़ाए।

एक बार तो ऐसा भी वर्ष आया था जब इतनी बारिश हुई कि कच्ची पक्की छतों ने सबने एक सुर में ही टपकना शुरू कर दिया था। अब तो सभी ने इस टपके का दर्द महसूस किया।

इस टपके का दर्द किसी भी दुख से बड़ा।
इसका आना तो ऐसे लगे जैसे कोई डंडा लेकर पीछे हो पड़ा॥

लगातार बारिश का ये रूप अनोखा और घर के अंदर ही दुख ऐसा देने वाला जो हर वर्ष बारिश के आने से पहले स्वतः ही अपना रूप दिखा जाता है। एक बात तो बारिश का हर रूप अपने आप में ही अलग ही है।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सावन की बारिश जब भी आती सब तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ ले आती। सावन के आते ही सबको बारिश का सुहाना रूप याद आता है जो मन में छुपे हुए प्रेम के उदगार, विरह की तपिश, बचपन के लड़कपन को उजागर करता है। प्रकृति भी हर ओर से पुकार करती नजर आती है। सब जीवों के नव संचार के लिए ये धरती पर अवतरित होती है। पर इस सुहाने और जीवनदायी मौसम के पीछे एक शब्द का कड़वा सच छिपा है जो उच्चवर्ग को छोड़ बाकी हम सभी ने बहुत नजदीक से देखा है और इसके दुख भी सहा है। बारिश के आते ही टप-टप टपकती बूंदों से तड़-तड़ की आवाज़ से तेज होना सबको अच्छा लगता है। पर जब यही बरसना लगातार दो या तीन दिन हो तो आम आदमी के लिए ये बाहर तो क्या घर में ही एक माहौल ले आता है जब दिन-रात इसकी आहट से ही दिल घबराहट से भर जाता है जी।

—————

यह लेख (बारिश का सबसे अलग और अद्भुत रूप।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बारिश का वो हमारा जमाना।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बारिश का वो हमारा जमाना। ♦

बरसाती को पहले ही अपने बस्ते में सजा के रखना।
अपने भीगने से ज्यादा उन कॉपी-किताबों का ध्यान धरना।
बारिश का वो हमारा जमाना॥

छत के पानी के पतनाल के नीचे सिर भिगोना।
खुले आसमाँ के नीचे बारिश में खोना।
बारिश का वो हमारा जमाना॥

मंद-मंद बारिश आते ही कॉपी के कागजों का फाड़ना।
फिर कागज की नाव का दूसरों की नाव से टकराना।
बारिश का वो हमारा जमाना॥

बाजार में वो नई-नई बरसाती चप्पलों का आना।
उसमें से अपनी मनपसंद चप्पलों का ढूंढ लाना।
बारिश का वो हमारा जमाना॥

बारिश के भरे पानी से कभी नही डरा हमारा बचपन।
तब उसमें कितना आनंदमय होता था वो बालमन।
बारिश का वो हमारा जमाना॥

बारिश आते ही गीले कपड़ों की पंक्तियां लगती।
ऐसे लगता घर में ही जैसे कपड़ों की हॉट सजती।
बारिश का वो हमारा जमाना॥

बारिश की बूंदों में बहते पानी के बीच ऐसे निकलते।
स्थान पर सुरक्षित पहुँचते ही किला फतह जैसे भाव निकलते।
बारिश का वो हमारा जमाना॥

ओले के आने की प्रार्थना भी करते बर्फ देखने की चाह में।
नादान थे भोले थे नही जानते थे कितना दर्द देते ये आह में।
बारिश का वो हमारा जमाना॥

छप-छप करके उस आसमान की फुहारों का आनंद लेते।
बिजली कड़कते ही माँ के आंचल की छाया में खुद को छुपा देते।
बारिश का वो हमारा जमाना॥

डरते नही थे बारिश के कीचड़ से न इसके छम-छम बरसते पानी से।
प्रकृति के उन सुखद पलों को जिया हमने तभी सहेज रखा उनको जिंदगानी में।
बारिश का वो हमारा जमाना॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — बारिश का वो हमारा जमाना उसका क्या कहना? बरसात के आने से पहले ही, अपने भीगने से ज्यादा उन कॉपी-किताबों का ध्यान धरना, बरसाती को पहले ही अपने बस्ते में सजा के रखना। वर्षा का वो पानी जो छत के पानी के पतनाल के नीचे खड़े होकर सिर भिगोना, खुले आसमाँ के नीचे बारिश में खो जाना। मंद-मंद बारिश आते ही कॉपी के कागजों का फाड़ना और फिर उस कागज की नाव का दूसरों की नाव से टकराना, इस आनंद का लुफ्त उठाना मन को तरोताज़ा कर देता था। छप-छप करके उस आसमान की फुहारों का भरपूर आनंद लेते, जब भी बिजली कड़कते तुरंत ही माँ के आंचल की छाया में खुद को छुपा देते, माँ के आंचल में अपने आपको सदैव ही सुरक्षित महसूस (Feel safe) करते। कभी भी डरते नही थे बारिश के उन कीचड़ से न इसके छम-छम बरसते पानी से, प्रकृति के उन सुखद पलों को जिया हमने तभी सहेज रखा उनको जिंदगानी (यादों) में। बारिश का वो हमारा जमाना।

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यह कविता (बारिश का वो हमारा जमाना।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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तुझे वंदन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ तुझे वंदन। ♦

एक शिक्षक तो होता है, पुंज-प्रकाश का।
जो खुद तप कर, जग में रोशनी फैलाता है।

ये आसमाँ का वो बादल, जो गुणों की बारिश बरसाता है।
अपने ज्ञान की रोशनी से, शिष्य-पथ को चमकाता है।

ये गर हाथ पकड़ ले, तो मंजिल पाना आसान हो जाये।
न घबराना तू फिर, जब तुझें तेरा गुरु राह दिखाये।

गुणों की माला में हरेक मोती, अपने विश्वास के धागे में पिरो जाए।
जब ये खुशबू देने पर आए, हर फूल को महकाये।

सत्य-पथ में गुरु तो, मिलते अनेक है।
शिष्य के व्यक्तित्व में निखार लाना, सबका ध्येय एक है।

तपते इस जीवन में, ठंडक पहुँचाये संस्कारों की।
जो चमके आसमाँ में, ख्वाइश बन जाये उन तारों की।

इनके हुनर को दिल में, समाहित करते है जो।
जिंदगी के हर दुख को, सहजता से हरते है वो।

ये अपने आदर्शों से,गागर में सागर भर जाए।
कोटि-कोटि वंदन गुरु को,बस इससे आगे कलम कुछ लिख न पाए।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — एक शिक्षक ही होते है जो हमे अच्छी और बुरी आदतों का पहचान करवाते है और वो हमारी बुरी आदतों को छोड़वाने का दिल से पूर्ण प्रयास भी करते हैं। हमें अच्छी आदतों को अपनाने के लिए प्रेरित करते है, सदैव ही आगे बढ़ने का सही ज्ञान देते है। वो शिक्षक ही होते है जो हमें ईर्ष्या, हिंसा, अधर्म, चोरी जैसी बुरी आदतों से दूर रखते है। शिक्षक ही, सही आचरण, नैतिकता का पाठ पढ़ाते है, कर्तव्य, संयम और धैर्य से सही पथ पर चलना सिखाते है। भारत में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण के जन्म दिवस अर्थात 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। उन्होंने अपने छात्रों से अपने जन्म दिवस पर शिक्षक दिवस मनाने की इच्छा जताई थी। पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ राधाकृष्‍णन का जन्म 5 सितंबर, 1888 को तमिलनाडु के तिरुमनी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

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यह कविता (तुझे वंदन।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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दोहरी मानसिकता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दोहरी मानसिकता। ♦

आज के युग में एक ऐसी दोहरी मानसिकता ने बहुत इंसानों के दिल में इस प्रकार से घर कर लिया है ऐसा लगता है मानों ये इसी प्रकार से इस धरती पर जन्में हो, और ये प्रवृति इंसान समय मिलते ही दिखाने लगते हैं। इसका जीता जागता उदाहरण हमें अपने बच्चों के मुख से भी सुनने को मिल जाता है जब वो बोलते है कि मेरा भाई प्राइवेट स्कूल में है और हम बहनें सरकारी स्कूल में।

जब अभिभावक-अध्यापक मीटिंग में उनसे इस बारें में कोई चर्चा होती है तो वो हँसते हुए इस बात को कहते है कि जी एक लड़का है इसलिए वहाँ पर पढ़ा रहें हैं और जब हम पूछते है कि आपकी बेटियों की पढ़ाई यहाँ पर कैसी है तब वो कहते हैं कि बहुत अच्छी पढ़ाई होती है यहाँ भी। आजकल तो सरकारी स्कूलों में अच्छी पढ़ाई होती है। कई बार तो वो तुलनात्मक स्थिति में ये भी कह देते है कि बेटियाँ अच्छा काम कर रही है।

फिर समझ में नही आता कि फिर भी माता-पिता का ये भेदभाव क्यूँ।

घर में एक साथ रहने वाले बेटा-बेटी के साथ ये अलगाव की स्थिति घर से ही पैदा हो जाती है। जो लड़कियों के बालमन पर कई बार ऐसी छाप छोड़ देती है जो चाह कर भी जिंदगी भर दूर नही होती। क्योंकि हमें अक्सर इस प्रकार के बच्चों के कोमल दिल से ऐसे भाव देखने सुनने को मिलते है जो हम शिक्षकों को भी दुख देने में पीछे नही रह पाते।

खासकर वो पूरा वर्ष पढ़ाई संबंधी चीजें कॉपी, पेंसिल, रबड़ व नए बैग, टिफ़िन और बोतल के लिए झूझते दिखाई देते है जैसे भाई की ही पुरानी बोतल में पूरा साल काम चलाना या कॉपी के पिछले पन्नों पर लिखा मिटाकर काम करना। इस प्रकार की बहुत सी बातें हमें अपनी कक्षाओं में देखने को मिलती है जिससे माता-पिता की दोहरी मानसिकता दिखाई दे जाती। इसका सबसे ज्यादा उदाहरण हमारे सरकारी विद्यालयों में मिलता है जो कि एक कड़वा सच है। आखिरी में दसवीं, बारहवीं तक आते-आते लड़कियाँ ही टॉप करती है हर वर्ष।

क्योंकि एक सरकारी अध्यापक के लिए तो कक्षा का हर छात्र-छात्रा एक समान है। इसलिए उनमें किसी प्रकार भेदभाव किए बिना ही उनको एक समान शिक्षा मिलती है।

अंत में वे बेटियाँ ही माता-पिता की शान बनती है जिनको सरकारी विद्यालयों में ये सोच कर दाखिला दिलवाते है कि इन पर पैसा तो खर्च करना नहीं होगा बल्कि कुछ न कुछ इनसे हासिल ही होता है। पर ये अपनी योग्यता से हर बार सिद्ध कर ही देती है कि लड़कियाँ कभी भी पीछे नही रही बल्कि उन्होंने हर जगह ही सफलता का परचम लहराया। सही तो सार्थक कथन इन बेटियों के लिये:—

हम हर हाल में अपने माता-पिता का नाम रोशन कर जाएगी।
देखोगे जिधर भी बेटियाँ ही सफलता का परचम लहराएगी।।
एक शिक्षिका की कलम से…
(श्रीमती सुशीला देवी – जे.बी.टी.अध्यापिका करनाल हरियाणा)

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आखिर कब तक समाज में ये दोहरी मानसिकता चलता रहेगा लड़कियों के लिए। आखिर क्यों लड़कियों को लड़को के बराबर सबकुछ नहीं दिया जा रहा है, क्यों उनको दोयम दर्जे का प्यार और सबकुछ दिया जा रहा है आज भी समाज में, क्या यही मानसिक विकास है? प्राचीन समय में भारत के हर स्थान की नारी स्वतंत्र थी, महिलाओं पर किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं था। महिलाएं यज्ञों और अनुष्ठानों में भी भाग लेती थी। मध्य युग में धीरे-धीरे समय बदलने के साथ पुरुष ने अपने अहम भाव के कारण नारी को निम्न स्थान दिया। आज फिर से नारी समाज में प्रतिष्ठित और सम्मानित हो रही है अपने अद्भुद समझ व अच्छे ज्ञान व प्रतिभा के प्रदर्शन के दम पर। अक्सर यह देखा गया है— अंत में वे बेटियाँ ही माता-पिता की शान बनती है जिनको सरकारी विद्यालयों में ये सोच कर दाखिला दिलवाते है कि इन पर पैसा तो खर्च करना नहीं होगा बल्कि कुछ न कुछ इनसे हासिल ही होता है। पर ये अपनी योग्यता से हर बार सिद्ध कर ही देती है कि लड़कियाँ कभी भी पीछे नही रही बल्कि उन्होंने हर जगह ही सफलता का परचम लहराया।

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यह लेख (दोहरी मानसिकता।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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वीर-गाथा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ वीर-गाथा। ♦

भारत के वीरों की गाथा आज सुनाऊँ।
इस जिव्हा को वीर-रस से पावन बनाऊँ॥

माता-पिता यहाँ लोरियाँ ऐसे सुनाए।
जिसमें बहादुरी के किस्से समाए॥

यहाँ की मिट्टी से वतन की खुशबू आये।
बेटियाँ समय आने पर वीरांगना कहलायें॥

माँ अपने कलेजे के टुकड़े को फौजी बनाये।
पिता उसकी शान पर फिर फूला नही समाये॥

भारत का शौर्य अद्भुत व बहुत ही अनुपम।
दुश्मन का संस्कार भी करें अदब से गर तोड़े दम॥

पीठ पर कभी न करें वार यहाँ के वीर जवान।
धरती है उन वीरों की जो देश पर होते कुर्बान॥

यहाँ की धरा को पावन कर गए न जाने कितने अवतार।
मूलमंत्र विश्व को दिया जिन्होंने भाईचारा, अमन, प्यार॥

तभी तो इसकी पावन मिट्टी से भी खुशबू आए।
सभ्यता, संस्कृति भारत की विदेशों में डंका बजवाये॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यहां के बच्चों के अंदर जन्म से ही वीर रस भरा होता है, जिसे बस निखारने की जरूरत होती हैं। भारत का शौर्य अद्भुत व बहुत ही अनुपम हैं, दुश्मन का संस्कार भी करें अदब से गर तोड़े दम। पीठ पर कभी भी न करें वार यहाँ के वीर जवान। यह धरती है उन वीरों की जो देश पर होते है सदैव ही कुर्बान। तहे दिल से नमन है माँ भारती के हर उन शूरवीर सपूतों को जिनके बलिदान के बदले हमे आज़ादी मिली। जो आये थे यहां व्यापार करने, व्यापार के बहाने हमे अपना गुलाम बनाकर खूब मनमानी किया। उन्होंने हम पर बहुत ही निर्दयता पूर्वक अत्याचार किया, और हमें खूब लुटा। हमें कभी भी नहीं भूलना चाहिए उन शूरवीर सपूतों के बलिदान को, जिनके बलिदान के बदले हमे आज़ादी मिली। शत-शत नमन है उन वीर सपूतों की जननी को जिन्होंने अपने लाल को माँ भारती की रक्षा के लिए ख़ुशी – ख़ुशी समर्पित किया। जय हिन्द – जय भारत।

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यह कविता (वीर-गाथा।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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आप सभी का प्रिय दोस्त

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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एक नजर इन पर भी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ एक नजर इन पर भी। ♦

प्रकृति प्रेमियों के चेहरे पर खुशी झलकती है मानसून के आते ही। क्योंकि इसके आते ही उनका पौधा रोपण का कार्य शुरू हो जाता है।

अति प्रेरणादायी बात होती है जब सभी पौधा-रोपण पर कार्य शुरू हो जाता है। लेकिन इस मानसून से पहले एक विशेष बात पर ध्यान देना चाहिए वो है सड़क के दोनों ओर लगे हुए पेड़ों का सूखा होना।

अगर हम किसी भी सड़क पर चल रहें हैं तो हम सब अगर ध्यानपूर्वक देखे तो अगर सौ पेड़ लगे हो तो उसमें कम से कम पांच या दस पेड़ लगभग इस प्रकार होते है जो या तो पूरी तरह से दीमक लगने से या अन्य किसी कारण से सूख चुके होते हैं कि हल्की हवा से ही वो गिर कर सड़क के रास्ते अवरोधक बन जाते हैं।

कई बार तो आँधी आने पर इतने बड़े हादसे को अंजाम दे देते है कि इनका गिरना इंसान की जान पर जोखिम बन सकता है। तो मानसून के आने से पहले या समय-समय पर इनकी कटाई को सुनिश्चित करना होगा ताकि इनके गिरने से कोई भी जान-माल की हानि न हो।

अगर इन सूखे और खोखले पेड़ों को समय पर हटा दिया जाए तो एक तो बड़े हादसों से बचा जा सकता है और दूसरा उनके स्थान पर नया पौधा रोपण किया जा सके।

सूखे और खोखले पेड़ न बने हादसे का कारण कोई।
समयानुसार कटाई कर उनकी जगह नई पौध बोई।

मानसून के बाद तो इनकी जड़ो की मिट्टी स्वतः ही जगह छोड़ देती है, और कहीं सड़क पर अवरोधक के रूप में कहीं पर बिजली की तारों को तोड़ते दिखाई देते हैं। इसलिए समय रहते ही इनके प्रति जागरूकता प्रशासन और आम व्यक्ति को भी दिखानी होगी, ताकि इनसे होने वाली अनहोनी को टाला जा सके।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — वर्षा ऋतू के समय सड़क के किनारे पेड़ लगाए जरूर, लेकिन पेड़ लगाना ही काफी नहीं है। उसका अच्छे से देखरेख व कटाई-छटाई मानसून आने से पहले हो जाये तो कोई भी अनहोनी न हो, किसी तरह का कोई हादसा (दुर्घटना) न हो। इस कार्य के लिए इससे जुड़े सरकारी विभाग व समाज के लोगों को जागरूक रहना होगा, और जिससे जितना हो सके सभी को मदद भी करना चाहिए। हम सभी भलीभांति जानते है की पेड़ भी धरती माता के बेटे हैं और हम इंसानो के सच्चे व अच्छे मित्र भी हैं। वृक्षों से हमें फल, सब्जियां, बीज, लकड़ियां, इत्यादि प्राप्त होते है। लकड़ी से हमे फर्नीचर, कागज़, गोंद, इत्यादि वस्तुएँ प्राप्त हो जाती हैं। इसके अलावा अनेको पेड़ों व पौधों से बहुत सारी औषधियां तैयार की जाती है, जो हमारे शरीर से संबंधित कई प्रकार के हानिकारक रोगों का उपचार करने में हमारी मदद करती है।

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यह लेख (एक नजर इन पर भी।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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धागे का प्रेम।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ धागे का प्रेम। ♦

ऐसे पावन देश में जन्में हम, करते हैं इस पर गर्व।
देवों की भूमि ये, जहाँ हर माह आते हैं हर्ष भरें पर्व॥

बारह मासों में पावन श्रावण मास तो सदैव ही, हर आयु-वर्ग को हर्षाता रहा।
शिव-स्तुति, हरियाली तीज व रक्षाबंधन जैसा पर्व जीवन को आनंदित बनाता रहा॥

रक्षा-सूत्र का ये पावन पर्व, श्रावण माह की पूर्णिमा को अपना संकल्पभाव ले आएँ।
निश्छल प्रेम, रक्षा-कवच, मर्यादा-बंधन दो आत्माओं को दे जाएँ॥

प्राचीनकाल की ओर मुड़कर देखें, तो एक बात समझ में आये।
जीवनदायिनी वृक्ष भी, बहनों के प्रेम के कच्चे धागे में बंध जाएँ॥

जब इंद्राणी ने अपने सुहाग इंद्र की विजय की झोली फैलाई, भगवान विष्णु के आगे।
दिया आशीष उन्होंने विजयी भव का, कहा, जाकर उनकी कलाई पर बांधे धागें॥

तदोपरांत युद्धक्षेत्र के लिए कोई नरेश जाता, महल के द्वार खोल।
उससे पहले ही रानी तिलक कर, विजय-सूत्र का धागा बांधे अनमोल॥

जब से आँचल का कोना, रक्तरंजित श्रीकृष्ण की उँगली पर बांधा था।
तब से ही इस कर्ज को सूद समेत चुकाने, द्रोपदी को बहन माना था॥

इतिहास गवाह है कि श्रीकृष्ण ने कृष्णा को सूद समेत, चुकाया था ये कर्ज।
वसन का अंबार लगा, रोका चीर-हरण को, निभाया एक धर्म भाई का फर्ज॥

ऐसा ही होता है ये मांगलिक पल, जो सबको घने नेह से भर जायें।
अक्षत-रोली से तिलक कर, कच्चे धागे से स्नेह की उम्र दराज कर जायें॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — रक्षाबंधन का त्योहार भाई बहन के पवित्र प्यार का प्रतिक है, जिसे राखी का त्योहार भी कहा जाता है। रक्षा बंधन पर बहन, भाई की कलाई पर राखी बांधती है और उसके दीर्घायु व सुखी जीवन की प्रार्थना करती है। इसके साथ ही बहन अपने भाई से अपनी सुरक्षा का वचन लेती है, की जीवन में जब भी उस पर कोई मुसीबत आएगा उसका भाई उसकी मदद के ली आ जायेगा। रक्षाबंधन हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार है, जिसे पूरे भारत समेत अन्य देशों में भी मनाया जाता है।

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यह कविता (धागे का प्रेम।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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आप सभी का प्रिय दोस्त

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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बारिश के नए – नए रूप।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बारिश के नए – नए रूप। ♦

बारिश के नए नए रूप … बारिश का नाम लेते ही उन ठंडी फुहारों की अकस्मात याद आ जाती है तो टप-टप करके काले आसमान से गिरना प्रारंभ करती है और कुछ देर में ही सब जगह पानी से वातावरण को इस कदर खुशनुमा बना देती है; जैसे अभी-अभी प्रकृति नहा कर आई हो।

लेकिन आजकल तो कुछ अलग ही नजारा होता है बारिश का।

थोड़ी सी बारिश ने अपना रंग दिखाया नही की सब तरफ पानी ही पानी हो जाता है। स्वच्छता और सफाई में अव्वल आने वाले शहरों का गलियों और सड़कों पर भी पानी इस कदर जमा हो जाता है जैसे ये कोई जगह नही बल्कि गंदे नाले या जोहड़ हैं।

फिर बारिश की उन प्यारी बूंदों को ही हम कोसने लगते है जिनके बगैर इस धरा पर जीवन का कोई भी अस्तित्व नही है।

जब बारिश से प्राकृतिक आपदा आती है तो, वो तो अपने हाथ नही। लेकिन जब नगरों और महानगरों में थोड़ी सी बारिश पर सब लबालब हो जाता है, तो इसमें बारिश का कोई कुसूर नही। बल्कि हम सबका ही कुसूर है कि इस पानी की निकासी का समुचित प्रबंध नही किया जाता और जो वर्षा-जल-संचय के लिए प्रबंध होते है वो सब खानापूर्ति करते ही नजर आते है।

इन सभी छोटी-छोटी बातों की ओर हम सभी नागरिकों का सहयोग प्रशासन के साथ हो और प्रशासन को भी इन सभी बातों के लिए मानसून आने से पहले ही उचित कदम उठाने होंगे; ताकि बारिश के आते ही उसका ये रूप कहीं भी न दिखाई दे और प्रकृति के इस अनमोल उपहार का पूरा आनंद ले सके।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जब बारिश के पानी का निकासी सही तरीके से व सही जगह पर हो तब जाकर जल जमाव की समस्या समाप्त हो। मात्र बोलने भर से ही कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं होता हैं, इसलिए जो इसके लिए जिम्मेवार है वर्षा से पहले ही पानी के निकासी का सही प्रबंध करें। जब बारिश से प्राकृतिक आपदा आती है तो, वो तो अपने हाथ नही। लेकिन जब नगरों और महानगरों में थोड़ी सी बारिश पर सब लबालब हो जाता है, तो इसमें बारिश का कोई कुसूर नही। बल्कि हम सबका ही कुसूर है कि इस पानी की निकासी का समुचित प्रबंध नही किया जाता और जो वर्षा-जल-संचय के लिए प्रबंध होते है वो सब खानापूर्ति करते ही नजर आते है।

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यह लेख (बारिश के नए – नए रूप।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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सावन का महीना।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सावन का महीना। ♦

प्रथम दिन है श्रावण माह का आज।
देवों के देव महादेव पूर्ण करें सब काज।

सावन की ऋतु चहुँ ओर बिखरायेगी हरियाली।
धरा के सब जीवों के मध्य होगी खुशहाली।

आषाढ़ की उमस भरी गर्मी से मिल जाएगी निजात।
नव कोपलें उभर-उभर कर आएगी हर डाल-पात।

मेघराज इंद्र भी खुश हो छम-छम बूँदें बरसाए।
उदासी से भरा जीवन प्रफुल्लित हो जाये।

प्रकृति अब तो धानी चुनर पहन इतरायेगी।
इसकी हर अदा अब हसीन हो जाएगी।

वातावरण में अब होगा संगम सुर-ताल का।
दीवाने होंगे सब प्रकृति की मतवाली चाल का।

त्यौहारों के आगमन की रुत का होगा आगाज।
खुशियों का हर ओर बजेगा सुंदर साज।

माना जाए बहुत ही पाक महीना ये सावन का।
हर पल ही दर्शाए अम्बर-धरा अपनेपन का।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सावन के महीने को भगवान शिव की भक्ति का भी महीना कहते है, शिव भक्त इस माह कांवर लेकर ज्योतिलिंग पर अर्पण करते है। यह ग्रीष्म ऋतु के बाद आता है और लोगों को गर्मी के कहर से राहत भी दे जाता है। सावन के महीने में बहुत ही ज्यादा बरसात होती है जिससे मौसम बहुत सुहावना हो जाता है। इस समय लोग अपने परिवार के साथ बाहर घूमने जाते हैं और सावन के खुशनुमा मौसम का आनंद लेते हैं। चारों तरफ हरियाली और ऊपर से बारिश की मंद-मंद बुँदे अंदर से तन मन को प्रफुल्लित कर जाता हैं। माना जाए बहुत ही पाक महीना ये सावन का। हर पल ही दर्शाए अम्बर-धरा अपनेपन का।

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यह कविता (सावन का महीना।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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अमृतमयी जीवन देता गुरु।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अमृतमयी जीवन देता गुरु ♦

ये तो हम सभी जानते हैं कि गुरु शब्द ही अपने आप में इतना सार्थकता लिए हुए है कि इस शब्द के मानव-जीवन में आगमन से ही उजाला सर्वत्र फैलता दिखाई देता है।

गुरु शब्द स्वयं में ही अज्ञानता से ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करता है। गुरु स्वयं ही शिष्य के मार्ग को अमृतमयी बनाकर उसका नाम इस संसार में रोशन करता है। गुरु के अस्तित्व में ही त्रिदेवों को समाहित माना गया है और इस पूरे ब्रह्मांड में गुरु के नाम का सदैव ही शंखनाद हुआ है जिन्होंने सदैव सत्य के दिये से अपने शिष्यों के पथ को प्रकाशवान किया है।

ये पंक्तियां कुछ अपने शब्दों से गुरु की महिमा व्यक्त करती है:

गुरु के प्रति मनुष्य की आस्था के शून्य हो गए भाव।
तभी से मानव-जीवन में शांति-सुख का हो गया अभाव॥

मनुष्य के जीवन में जीवन-पर्यन्त न जाने कितनी ऐसी बाधायें आई है जब इंसान को कोई रास्ता नही दिखाई देता। तब गुरु ही वो मांझी बनता है जो मानव की नैया को पार लगाता है। उसके जीवन में ज्ञान का उजाला कर देता है।

अब वो समय आ गया है जब गुरु को केवल फल-फूल, दान-दक्षिणा की ही जरूरत नही बल्कि गुरुओं की दी गयी शिक्षाओं और उपदेशों को जीवन में धारण करें और इस अनमोल मानव-जीवन का मिलना इस संसार में सार्थक बनायें।

गुरु-पूर्णिमा की सभी को हार्दिक बधाई! क्योंकि गुरु-पूर्णिमा का विशेष दिन भी इस संसार को ज्ञान के उजाले से प्रकाशवान करता है।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — गुरु शब्द स्वयं में ही अज्ञानता से ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करता है। गुरु स्वयं ही शिष्य के मार्ग को अमृतमयी बनाकर उसका नाम इस संसार में रोशन करता है। 2,500 साल से भी अधिक पहले, बुद्ध ने बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया और बोधगया से सारनाथ, उत्तर प्रदेश गए। वहां उन्होंने पूर्णिमा के दिन उपदेश दिया, जिसे आज गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा वह दिन भी है जो महान भारतीय महाकाव्य महाभारत के लेखक महर्षि वेद व्यास की जयंती का प्रतीक है । इस दिन को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। गुरु पूर्णिमा छात्रों और शिक्षकों के बीच संबंधों का प्रतीक है।

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यह लेख (अमृतमयी जीवन देता गुरु।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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