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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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sushila devi

चलो चलते हैं।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ चलो चलते हैं। ♦

चलो चलते है सब हौसलों की कमान लेकर।
सपनों को उमंग के पंखों की नई उड़ान देकर।

सीधे रास्ते कभी नही मिलते इस जीवन में।
जिस पर चलकर सहज खुशी हो जाए मन में।

राह में आयेंगे अनेकों बार दुखों के रोड़े।
पर धैर्य के दामन को हम कभी न छोड़े।

सहनशीलता है सबसे सुंदर गुण एक ऐसा।
सोने पर हो बिल्कुल सुहागे ही जैसा।

आओं तराश ले कुछ अपने ही हुनर को ऐसे।
सुनार सोने के आभूषण गढ़ सुंदर रूप दे जैसे।

रास्ते की आई किसी भी मुसीबत से न घबराना।
बस नेक कर्म संग प्रभु स्मरण ही करते जाना।

हर अंधेरा छंट जाएगा तेरी उस नायाब राह का।
जवाब हँसी में मिलेगा तुझें तेरी हर आह का।

विवेक को सदैव ही रखना दिल में करके समाहित।
फिर हासिल हो जाये जीवन में हर मंजिल की जीत।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जैसे सोने को जितना तपाया जाता है उससे सारी गंदगी बाहर आ जाती है, तब जाकर अच्छा आभूषण बनता है, अपने इसी सहनशीलता के गुण के कारण सोने का मूल्य बढ़ जाता है। मानव जीवन में भी बहुत उतार चढ़ाव आते है, लेकिन संयम व धैर्य से जीवन के हर मुश्किलों से बाहर निकला जा सकता हैं। एक बात सदैव ही याद रखे अपने कर्म पर व अपने आप पर सदैव ही विश्वास बनाये रखे, अपने सपनों को उमंग के पंखों की नई उड़ान देकर आगे चलते चले।

—————

यह कविता (चलो चलते हैं।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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ये कैसी भिक्षावृत्ति।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ ये कैसी भिक्षावृत्ति। ♦

प्राचीनकाल में केवल वही लोग द्वार-द्वार जाकर भिक्षा मांगते थे जो लोग संन्यास धारण करते थे या समाज की भलाई के लिए तप करते थे। तब उनके शिष्य ही केवल भिक्षा में केवल इतना मांग कर ले जाते थे जितना उनका सुबह या शाम के भोजन का कार्य चलता था।

धीरे-धीरे ये प्रचलन इतना बढ़ता चला गया कि धार्मिक स्थानों पर इनकी इतनी भीड़ एकत्रित होने लगी कि उन स्थानों के दर्शन करने भी दुर्लभ हो गए।

अब ये भिक्षावृति ने एक अलग से नया रूप धारण किया कि विकलांगों, अनाथों और गऊ शालाओं के नाम पर अब घर की घंटी बजाकर कोई दान नही बल्कि रुपयों की पर्ची काटते हैं।

अगर इनसे कोई भी उस पर्ची के बारे में कुछ भी सवाल पूछा जाए तो वो आना कानी करके अगले घर की ओर बढ़ जाते है। सबसे बड़ी हैरानी की बात तो ये होती है कि वो शारारिक रूप से बिल्कुल हट्टे-कट्टे होते है कमाने के लायक।

अब हमें ये समझना होगा कि इस प्रकार के पात्र दान के काबिल है या नही। हम इनको रुपयों का दान न देकर बल्कि किसी भी अनाथालय या किसी भी आश्रम में कोई भी दान देना हो तो हम स्वयं जाकर उनकी जरूरत का सामान और गौशाला में अपने हाथों से हरा चारा देकर दान की सार्थकता को सिद्ध कर सकते है।

इससे एक तो हमारी आत्मसंतुष्टि होती है दूसरा किया गया दान सुपात्र को जाता है। इस प्रकार की भिक्षावृत्ति को रोकने में एक सभ्य नागरिक की एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते है।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जब भी दान दे पात्र को देखकर दे वो भी जरूरत का सामान ना की पैसा। किसी भी अनाथालय या किसी भी आश्रम में कोई भी दान देना हो तो हम स्वयं जाकर उनकी जरूरत का सामान और गौशाला में अपने हाथों से हरा चारा देकर दान की सार्थकता को सिद्ध कर सकते है।

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यह लेख (ये कैसी भिक्षावृत्ति।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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दिवस मनाने की होड़।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दिवस मनाने की होड़। ♦

आज कल भारत में भी दिवसों को मनाने की होड़ लगी हुई है। एक विशेष दिवस को मनाने की बात समझ में आती थी जैसे शिक्षक दिवस, चिकित्सक दिवस। लेकिन ये क्या अब ये दिवस मनाने में रिश्तें भी पीछे नही रहे। जैसे मातृ-पितृ दिवस।

ये रिश्ता तो इस पृथ्वी पर इतना अहमियत रखता है जिसके आगे देव भी नमन करते हैं। आओं विचार करे कि इन दिवसों को मनाने की जरूरत है या नही। क्योंकि हमारी भारतीय संस्कृति में तो पुराने जमाने में सबसे पहले घर में बने भोजन का भी घर के बड़ों को ही परोसा जाता था। तो ये उनको पूजने जैसा ही तो था, क्योंकि इस कार्य में उनका आदर-मान होता था।

फिर ये दिवस मनाने की जरूरत क्यों आई?
क्या एक ही दिन ही हमें इनको खुश रखना हैं?

पहले हमारे भारत में अनाथ आश्रम तो थे। लेकिन वृद्धाश्रम नही थे। आज वृद्धाश्रम की अधिकता हो गयी। क्योंकि आधुनिकता की दौड़ में घरों के बुजुर्गों का मान सम्मान केवल दिवसों में सिमट कर रह गया है।

मात-पिता का तो हर दिन होता है क्योंकि इनके बिना हम सबका कोई अस्तित्व नही है, तो बस एक ही बात इस दिनों को मनाने को सार्थक कर सकती है जब हम हर अपने मात-पिता का आदर करे।

हमारे माता-पिता हमारे घरों के अंदर हम सब के मध्य ही मुस्कराए। अपने बच्चों को भी हम भारतीय संस्कृति के गुणों को आत्मसात कर बड़ों का दिल से आदर करना सिखाए, क्योंकि बच्चें बड़ों को देखकर ही ज्यादा सीखते है।

तो आओं हम सब अपने माता-पिता का दिलों से सम्मान कर भावी पीढ़ी में भी ये गुण भर दे। ताकि किसी के घर का कोई भी बुज़ुर्ग सड़क पर या वृद्धाश्रम में न हो।

दिवस मनाने की सार्थकता तो तभी है जब…

जब अपनों के मध्य ही इनके चेहरे खिले रहे।
जब तक जीये ये हमारे घरों की ढाल बने रहे॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — स्त्री ईश्वर की वह सुन्दर रचना है जिसमें त्याग, स्नेह, भावनाओं और समर्पण भरपूर होता है। स्त्री अनेक भूमिकाओं को बखूबी निभाती है। वैसे – माता और पिता दिवस ताे हर मनुष्य काे अपने अंतिम श्वास तक मनाना चाहिये। एक सच्चा पिता सदैव ही अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिये दिन-रात अनवरत (continuously) कार्य करता हैं। जहा माता अपने बच्चों के स्वास्थ्य का ध्यान रखती हैं ताे वही पिता उन्हे सही ज्ञान और समझ देते हैं। जहा प्रथम गुरु माँ हैं ताे वही पिता गुरु हाेने के साथ-साथ सच्चा संरक्षक भी हाेता हैं।

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यह लेख (दिवस मनाने की होड़।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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एक दूजे के संग।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ एक दूजे के संग। ♦

तेरे बिना हम नहीं रह पाएंगे।
तेरे न रहने का दर्द किसे सुनाएंगे॥

तेरे बिना ये जिंदगी है मुहाल।
तेरी जुदाई से होता बुरा हाल॥

साँसों की मध्यम हुई रफ्तार।
तेरे बिन जीवन हुआ बेकार॥

तुम तो जान हो जहान हमारा।
हमारे लिए तू स्वयं से प्यारा॥

अब नींद नहीं आती चैन की।
शांति खो गयी दिन-रैन की॥

जो जीव-जगत को खुशहाल बनाती।
बिन इनके सूनी ये जीवन-बाती॥

ये पेड़ ही तो हमारे जीवन-दाता।
जिनके बिन कुछ नही भाता॥

चाहना है इसको जान से ज्यादा।
नहीं तो जीवन हो जाएगा आधा॥

हमारी जिंदगी की बनती ढाल।
वृक्ष संग प्रकृति की बजती ताल॥

जहाँ जगह मिले वही पेड़ है उगाने।
हरे-भरे पौधों के जीवन भी बचाने॥

वृक्ष ही बनते जीवन का सूत्रधार।
जश्न जीत की होती जीवन में भरमार॥

बिना तुम्हारे ये जीवन जीना दुश्वार।
मानव-जीवन को इनसे करना प्यार॥

हर वर्ष इन वृक्षों की तादाद बढ़ाएंगे।
प्रकृति संग अति सुंदर जीवन पाएंगे॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जैसे हम खाने के बिना नहीं रह सकते। वैसे ही पेड़-पौधे के बिना भी हमारा जीवन अधूरा है। जैसे हमें जीवित रहने के लिए भोजन-पानी की आवश्यकता है वैसे ही प्रकृति को जिंदा रखने के लिए पेड़-पौधे, साफ-सफाई, प्रदूषण रहित धरा बनाने की आवश्यकता है। जलवायु प्रदूषण को रोकना होगा और वृक्षों की कटाई रोकनी होगी। कटाई की जगह वृक्षों को लगाना होगा जिससे कि प्राकृतिक आपदा से हम बच सकें। पर्यावरण को बचाना, प्रकृति को बचाना हमारे हाथ में है। कब तक अपने ऐशो आराम के लिए यूँ ही पेड़ काटते रहोगे इंसान। अगर अब भी न सुधरे तुम तो पृथ्वी का वातावरण बिलकुल ही गर्म हो जाएगा, तुम्हारे जीने के लाले पड़ जायेंगे; फिर रोते रहना। प्रत्येक वर्ष बहुत सारे पेड़ आग लगने से जल जाते है, और इंसान कम थोड़े ही है ये भी अपने ऐशो आराम के लिए यूँ ही पेड़ काटते रहते है। अभी जब गर्मी पड़ रही है तो इन्हें पेड़ की कमी खल रही हैं। जब हरे भरे पेड़ और पौधे होते है तो कितना खूबसूरत मौसम व वातावरण होता है, सभी ऋतुएँ अपने चक्र के अनुसार चलती है, और सभी फसल समय पर होते हैं। अब भी समय हैं सुधर जा तू इंसान। आओ हमसब मिलकर ये संकल्प ले की प्रत्येक वर्ष दो पेड़ जरूर लगाएंगे, और उनका अच्छे से देख रेख करेंगे तब तक; जब तक वो पेड़ अपना खुराक खुद न लेने लगे पृथ्वी से।

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विरह की दुनिया।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ विरह की दुनिया। ♦

ये संसार भी अजब गजब बातों का मेला।
भीड़ में रहकर भी हर इंसान है अकेला॥

जग एक है पर इसमें दुनिया बसी अनेक।
अपना एक अलग ही संसार बसाए है हरेक॥

कहीं खुशी, कहीं सपनों की, कहीं दुनिया गम की।
कहीं हँसी की, कहीं आँसुओं से आँखें नम की॥

कहीं अरमानों की, कहीं जज्बातों की।
कहीं पर शबाब में डूबी रातों की॥

इच्छाओं की माया नगरी का कितना सुंदर रूप।
जो पल – पल बदले अपने कितने स्वरूप॥

आओं एक ऐसी दुनिया की बात बताते है।
जिसकी मंजिल नही फिर क्यूँ राह बनाते है॥

यहाँ विरह का संसार बिल्कुल ही निराला।
रोने की पुकार नही लगा जुबाँ पर ताला॥

विरह की वेदना तो इंसान को खाये।
जब दुख सहा भी न जाये, कहा भी न जाये॥

जब दिल में बसी हो विरह की वेदना।
क्यूँ खत्म हो जाये सब अंतर्मन की चेतना॥

जो चांदनी हर वक्त रही शीतलता बरसाये।
अब वही नागिन जैसी डसने को आये॥

आँखों में हो जाता आसुंओ का बसेरा।
न जाने कहाँ खो जाता खुशी का सवेरा॥

विरह से तो फूलों की भी बदले बहार।
खुशी भी दिखाए फिर अपने नखरे हजार॥

जब विरह बिछोड़े का दिल में समाये।
सारी दुनिया ही बेमानी हो जाये॥

सबसे ज्यादा विरह की अग्नि वो तड़पाये।
जब इंसान पास रहकर भी दूर हो जाये॥

सच ही है जो हर पल नजर आए हसीन।
नजरिया ही बदल जाये जब दिल हो गमगीन॥

विरह की अग्नि दिल को पल-पल झुलसाय।
फिर किसी जल से ये बुझने न पाए॥

बस ऐसे विरह को तो रब ही दूर करे।
जब मिलन के किसी अहसास को दिल से भरे॥

कभी ये बिछोड़ा किसी के जीवन में न आये।
जो भूख – प्यास की सुध – बुध दे भुलाये॥

विरह को अपनी जिंदगी में न बसाना इस कदर।
काट डाले जो इंसान की खुशियों के पर॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आजकल के मानव एक ही परिवार में रहते हुए भी सभी परिवार के सदस्य एक दूजे से काफी दूर हो गए हैं। मोबाइल इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया में इस कदर डूब गए हैं की उनके आसपास क्या हो रहा है उन्हें बिलकुल भी नही पता हैं। आधुनिकता के दौड़ में इस कदर अंधे हो गए है की सही व गलत का फर्क भी नही कर पाते, काम वासना के वशीभूत होकर अपना, परिवार का व समाज और अपने देश का सर्वनाश कर रहे हैं। अगर इसी तरह चलता रहा तो एक सदी के अंदर ही – संस्कार, संस्कृति व सभ्यता, सत्य कर्म, धर्म बिलकुल ही ख़त्म हो जायेगा। सब के सब धर्मभ्रष्ट व कर्मभ्रष्ट, विकारी हो जायेंगे। चारों तरफ पूरी पृथ्वी पर त्राहिमाम-त्राहिमाम होगा, सभी मन से पूर्ण अशांत होंगे। अब भी समय हैं हे मानव सुधर जाओ वर्ना, पछताने के अलावा कुछ भी नहीं बचेगा।

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यह कविता (विरह की दुनिया।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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उफ! ये मौसम।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ उफ! ये मौसम। ♦

उत्तरी भारत में सर्दी ने क्या सितम है ढाया।
इस मौसम के जर्रे-जर्रे ने बर्फ है बरसाया॥

लगता है सूर्यदेव भी कुछ खफा हो गया हमसे।
तभी तो दर्शन नही दे रहे हमें एक पखवाड़े से॥

पानी ने भी अपनी ठंडक चरम सीमा पर पहुँचाई।
पानी में हाथ डालते ही आँखों ने नीर की गंगा बहाई॥

हे सूर्यदेव! मकर संक्रांति पर तेरे दर्शनों की हमने आस लगाई।
पर उस दिन भी तेरी किरणों ने गरमाहट नही पहुँचाई॥

ए ख़ुदा! मौसम खुशनुमा नही लगता अब।
बता दे अब तो, तू खुशगवार बनेगा कब॥

ए मौसम! अब तो सितम ढाना कर दे बंद।
ठंड से अब सभी जरूरी कार्य हुए मंद॥

अलाव ने भी अब तो गर्मी पहुँचाने का छोड़ा अहसास।
अब तो सबकी सूर्यदेव की किरणों पर टिकी है आस॥

लगता है ये सितमगर ठंड जम गई अब कण-कण में।
हे सूर्यदेव! अपनी ऊर्जा का संचार कर जन-जन में॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — ये ठंडी का मौसम, जिसमे सूर्यदेव का दर्शन भी हुआ दुर्लभ। ठंडा इस कदर बढ़ गया की जिधर स्पर्श करो ठंड ही ठंड चाहे व्यक्ति हो या वस्तु। इस ठंड के कारण हर कार्य मंद हो गया, चाहे वह कोई भी कार्य क्यों न हो। अलाव ने भी अब तो गर्मी पहुँचाने का छोड़ा अहसास। अब तो सबकी सूर्यदेव की किरणों पर टिकी है आस। इस ठंड के कारण सभी के अंदर आलस्य का विस्तार हो गया। हे सूर्यदेव! अपनी ऊर्जा का संचार कर दो जन-जन में, सभी के मुरझाए हुए चेहरे फिर खिल उठे। पानी ने भी अपनी ठंडक चरम सीमा पर पहुँचाई। पानी में हाथ डालते ही आँखों ने नीर की गंगा बहाई। उत्तरी भारत में सर्दी ने क्या सितम है ढाया। इस मौसम के जर्रे-जर्रे ने बर्फ है बरसाया।

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यह कविता (उफ! ये मौसम।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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कच्चे धागे की प्रीत।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कच्चे धागे की प्रीत। ♦

श्रावण मास की पूर्णिमा, एक पावन त्यौहार ले आई।
अटूट प्रीत, विश्वास व आस्था का एक और उपहार ले आई॥

रक्षाबंधन की प्रचलित है, ऐसी ऐतिहासिक कहानियाँ।
जो सुनते आए हम, अपने पुराण कथाओं की जुबानियाँ॥

एक कच्चा धागा अपने अंदर समाहित किए, सागर जितना प्यार।
एक भरोसा, निश्छल प्रेम से, दो आत्माओं को बांधे ये त्यौहार॥

भगवान विष्णु बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर, भक्त के घर रहने आए भगवान।
फिर मां लक्ष्मी व्याकुल हो बलि को राखी बांध, हरि को ले आई बैकुंठ धाम॥

चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने भी, अपनी प्रजा की रक्षा के लिए हुमायूं को राखी भेजी।
तब हुमायूं ने भी उनकी राज्य की रक्षा कर, बहन की प्रीत दिल में सहेजी॥

जब इंद्राणी ने भी अपने पति की दानवों से रक्षा की, बांधकर रेशम का धागा।
फिर इंद्र के मस्तक पर, विजय श्री का तिलक लागा॥

महाभारत में शिशुपाल के वध से, जब श्री कृष्ण की उंगली से रक्त बहा था।
तब द्रोपदी ने साड़ी के पल्लू का अंश बांधकर, श्री कृष्ण को धर्म भाई कहा था।

एक बार यमदेव कई बरस तक, अपनी बहन यमुना से नहीं मिलने आए।
तब यमुना ने भी, प्यारी आंखों से नीर बहाए॥

फिर गंगा ने अपने भाई को, मिलने के संदेश पहुँचाये।
आकर बहन को प्यार से मिलकर, यमुना को अमृतत्व दे जाए॥

यह त्यौहार रक्षा – कवच के नाम से भी, अक्सर जाना जाए।
इस कच्चे धागे में तो, दो पावन आत्माओं का बंधन माना जाए॥

जब कच्चे धागे की प्रीत बसती चली जाए, ऐसा ही यह पर्व पावन।
सारी खुशियां देकर अब, रुखसत हो जाएगा सावन॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

मेरे सभी प्रिय पाठकों आप सबको तहे दिल से रक्षाबंधन पर्व पावन की शुभकामनाएं।-KMSRAJ51

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से भाई बहन के पवित्र प्रेम और रक्षा वचन से भरपूर पवित्र पर्व रक्षाबंधन का वर्णन किया है। भाई बहन एक दूजे के सच्चे मित्र भी है जन्म – जन्मांतर तक। रक्षाबंधन – भाई और बहन के प्रेम को दिखाता एक पवित्र पर्व।

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यह कविता (कच्चे धागे की प्रीत।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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हार्दिक शुभकामनाएं – नीरज चोपड़ा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हार्दिक शुभकामनाएं – नीरज चोपड़ा। ♦

खिलते कंवल की तरह, तू राष्ट्रीय पहचान बन गया।
नीरज तू अपने नामानुरूप खिल कर, देश की शान बन गया॥

तूनें तो, एक गौरवमय इतिहास ही रच डाला।
बचपन से शौकीन, पकड़ हाथ में भाला॥

कभी अपने दर्द की भी, तूनें नही की परवाह।
सदैव सपनों को हकीकत में बदलने की, भरी आह॥

बना है तू देश का प्रहरी, अपने स्वप्न को भी शिखर तक पहुचाया।
एक नमन तेरे मात-पिता को, जिनका सीना आज गर्व से भर आया॥

कोटिशः सादर वंदन तेरे गुरु को, जिसने अपने शिष्य के नाम का परचम लहरवाया।
तूनें भी शिष्य-गुरु की परंपरा को रख कायम, गुरु का मान बढ़ाया॥

हार्दिक बधाइयां नीरज चोपड़ा तुम्हें, तू बन गया आज बुलंदी के आसमाँ का सितारा।
इस गौरवमय दिन के लिए, हर भारतीय का दिल ऋणी रहेगा तुम्हारा॥

हार्दिक बधाइयां💐हार्दिक बधाइयां॥

भारत के स्टार जैवलीन थ्रोअर नीरज चोपड़ा ने टोक्यो ओलंपिक में 87.58 मीटर दूर भाला फेंककर गोल्ड मेडल पर अपना कब्जा जमाया है। भारत के पिछले सौ साल के इतिहास में यह ट्रैक एंड फील्ड में पहला ओलंपिक मेडल है। ट्रैक एंड फील्ड में गोल्ड मेडल जीतकर नीरज ने अपना नाम ओलंपिक इतिहास में सुनहरे अक्षरों से दर्ज करवा लिया है।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से गोल्ड मेडलिस्ट नीरज चोपड़ा को तहे दिल से हार्दिक शुभकामनाएं दी है, गौरवमयी इतिहास रचने के लिए।

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यह कविता (हार्दिक शुभकामनाएं – नीरज चोपड़ा।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस। ♦

आज बहुत ही, शुभ मंगल घड़ी आई।
सबको आज मित्रता दिवस की हार्दिक बधाई॥

मित्रता श्रीकृष्ण और सुदामा की, दुनिया में हो गए चर्चे।
महान थी उनकी मित्रता, दिए ब्रह्मांड ने भी अव्वल दर्जे॥

आओं मित्रों, अपने दिलों में मंथन करें आज।
जुबां से न बोलें सुदामा, फिर भी श्री कृष्ण ने सँवारे काज॥

एक भरोसा, एक आस्था, विश्वास था, दोस्ती के नाम में।
दुनिया भर की खुशी देखी, बस अपने श्याम में॥

अगाध प्रेम, श्रद्धा रखी थी, सुदामा ने अपने मित्र में।
जब-जब दोस्त का चेहरा देखें,
भगवान का ही अक्स नजर आए, उनके चित्र में॥

स्वार्थ वशीभूत होकर सुदामा ने,
कभी अपनी जिंदगी की व्यथा नही सुनाई।
ना ही कभी, अपने मित्र के समक्ष रखी गरीबी की दुहाई॥

सिर्फ एक लगन में ही, सुदामा रमें जा रहा था।
बस मित्रता के नाम में, भगवान जपे जा रहा था॥

बचपन के छुटे सब संगी साथी, रखी बस दोस्ती दिल मे निभायें।
निश्चल प्यार, दुलार की लगन रखी, श्री कृष्ण से लगाएं॥

था वो बहुत ही शुभ दिन, जब भगवान के घर भक्त चला आया।
भगवान ने भी मित्रता को ही, सर्वोपरि मान, मित्र को गले लगाया॥

वो एक ऐतिहासिक दिन था, जब भगवान भक्त के,
प्यार, आस्था, विश्वास से लबालब हो गया।
सिहांसन पर बैठा, चरण धोकर मित्र भक्त सुदामा के,
और भगवान भक्त के वश में हो गया॥

आओं, हम भी मित्रता के शब्द को सार्थकता में पिरोए।
आस्था, लग्न, प्रेम को सच्चे अर्थों में ही सँजोये॥

अपने जीवन में सदैव ही, सच्ची मित्रता के बोए मोती।
मित्र बने और बनायें ऐसे,
जो तेरे पथ को प्रकाशवान करें, ऐसी जगाए ज्योति॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से इस कविता में कवयित्री ने श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता का उदाहरण देकर, एक सच्चे मित्र के गुणों और व्यवहार का सुंदर मनोरम वर्णन किया है।

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यह कविता (अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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माँ।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ। ♦

माँ, तेरे हर रूप की महिमा ने,
सम्पूर्ण ब्रह्मांड को हर्षाया।
तेरी चाैखट पर,
सब देवगणों ने शीश झुकाया।

जगदम्बे, तू सबकी माँ,
वरदाती कहलायें।
सर्वस्व
सब तुझ में ही समाये।

सिंघवाहिनी तेरे शेर की गर्जना,
जब-जब हो जाये ।
तब-तब सुन,
महाकाल भी थर्राए।

तेरे आलाैकिक, अद्भुत,
रूपों की त्रिलोक महिमा गाये।
तेरे हर रूप की महिमा,
जग का कल्याण कर जाए।

हे विश्व विनोदिनी, वरदाती
तेरी एक मधुर मुस्कान से,
विश्व का कल्याण हो जायें।
हे! माँ स्वीकार करो बारम्बार नमन,
पड़े तेरे चरणों में ये सिर झुकाए।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवयित्री ने माता रानी के गुणों और शक्तियों का महत्व बयां किया है। माता रानी से प्रार्थना: किया है इंसानियत के सुख और खुशियों के लिए, प्रकृति का सुन्दर मनोहर उपहार मिला।

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यह कविता (माँ।) “श्रीमती सुशीला देवी जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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