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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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2021-KMSRAJ51 की कलम से

लेखक का ख्वाब।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

♦ लेखक का ख्वाब। ♦

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लिखता हूँ वही जिससे कलम शर्मसार न हो।
दिल पे कोई बोझ ना रहे मन में उधार न हो।
बेशक कोई नाराज हो जाये अपनी बला से।
लेकिन सच्चाई ईमानदारी का बलात्कार न हो॥

साहित्य की न आत्मा कभी रोये मेरे कुकृत्य पे।
शब्दों की लस्सी, व्याकरण का चीड़फाड़ न हो।
अभावों में भी भावों का सम्मान होना चाहिये।
शुचिता बरकरार रहे, अनावश्यक श्रृंगार न हो॥

थोड़ा कम में भी गुजारा किया जा सकता है।
अना से समझौता, जमीर का व्यापार न हो।
मिलावट के दौर में मुश्किल से रिश्ता बनता है।
ज्यादा के लालच में रिश्तों का बंटाधार न हो॥

आईना भी बनूँ और मनोरंजन भी करता रहूँ।
स्याही की अभिलाषा है, निब से तकरार न हो।
खून के आँसू रूला दूँ, अंगुलियों की चाल से।
कागज से क्रांति लाऊँ, कोई धोखा, वार न हो॥

इंसानियत के वास्ते अन्याय से लड़ता रहूँगा।
लेशमात्र भी मुझपे खौफ का अधिकार न हो।
खुदा मेरी सोच, यकीन, लेखनी को धार देना।
मेरे पास इस से ज्यादा धारदार हथियार न हो॥

♦ शैलेश कुमार मिश्र (शैल) – मधुबनी, बिहार ♦

  • “शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी” ने एक सच्चे लेखक के अनंत सोच व गुणों को बहुत ही बखूबी मनोरम सरल शब्दों में कविता के रूप में प्रस्तुत किया है।

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यह कविता “शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपने सच्चे मन से देश की सेवा के साथ-साथ एक कवि हृदय को भी बनाये रखा। आपने अपने कवि हृदय को दबाया नहीं। यही तो खासियत है हमारे देश के वीर जवानों की। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

About Yourself – आपके ही शब्दों में —

  • नाम: शैलेश कुमार मिश्र (शैल)
  • शिक्षा: स्नातकोत्तर (PG Diploma)
  • व्यवसाय: केन्द्रीय पुलिस बल में 2001 से राजपत्रित अधिकारी के रूप में कार्यरत।
  • रुचि: साहित्य-पठन एवं लेखन, खेलकूद, वाद-विवाद, पर्यटन, मंच संचालन इत्यादि।
  • पूर्व प्रकाशन: कविता संग्रह – 4, विभागीय पुस्तक – 2
  • अनुभव: 5 साल प्रशिक्षण का अनुभव, संयुक्त राष्ट्रसंघ में अफ्रीका में शांति सेना का 1 साल का अनुभव।
  • पता: आप ग्राम-चिकना, मधुबनी, बिहार से है।

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आपकी लेखनी यूँ ही चलती रहे, जनमानस के कल्याण के लिए। उस अनंत शक्ति की कृपा आप पर बनी रहे। इन्ही शुभकामनाओं के साथ इस लेख को विराम देता हूँ। तहे दिल से KMSRAJ51.COM — के ऑथर फैमिली में आपका स्वागत है। आपका अनुज – कृष्ण मोहन सिंह।

  • जरूर पढ़े: स्वाद बदलना होगा।
  • जरूर पढ़े: क्या-क्या देखें।

—————

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ® ———–

Note:-

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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क्या-क्या देखें।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ क्या-क्या देखें। ♦

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आपकी सूरत के बाद और क्या देखें।
नजर हटे तब तो कुछ और नया देखें।
खुदा की ऐसी भी जब खुदाई है यहाँ।
फिर क्यूँ कुछ ऐसा वैसा खामख्वाह देखें॥

तसव्वुर का भी मिजाज़ आज बदला है।
लबों की शर्मो-हया, पलकों की अदा देखें।
जफ़ा, वफ़ा, कसमें, वादे, सब बकवास।
आज तो बस लरजे हुस्न का जलवा देखें॥

मन को कुछ भी समझ नहीं आ रहा।
दफ्तर देखें, घर देखें, कि रास्ता देखें।
चाँद आंगन में ना आज उतर ही आये।
छत, सीढ़ी, आइना देखें कि चेहरा देखें॥

काजल, सुरमा, मेंहदी, महावर को।
कब तक खफ़ा, बिखरा, तन्हा देखें।
कुछ ख्वाहिशें, कुछ गिले भी हैं इनके।
मेरी किस्मत से जुड़ा है ये मामला देखें॥

हर बार दुवा पढ़ते आसमां की तरफ।
क्यूँ बार – बार हाथ की मोटी रेखा देखें।
आके सारी उलझन ही खत्म कर दो ना।
जँचता नहीं है, रेखाओं को जुदा देखें॥

♦ शैलेश कुमार मिश्र (शैल) – मधुबनी, बिहार ♦

  • “शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी” ने इस कविता के माध्यम से नारी के सच्चे सौंदर्य का बहुत ही मनोरम, सौम्य व मृदुल वर्णन किया है।

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यह कविता “शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपने सच्चे मन से देश की सेवा के साथ-साथ एक कवि हृदय को भी बनाये रखा। आपने अपने कवि हृदय को दबाया नहीं। यही तो खासियत है हमारे देश के वीर जवानों की। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

About Yourself – आपके ही शब्दों में —

  • नाम: शैलेश कुमार मिश्र (शैल)
  • शिक्षा: स्नातकोत्तर (PG Diploma)
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  • रुचि: साहित्य-पठन एवं लेखन, खेलकूद, वाद-विवाद, पर्यटन, मंच संचालन इत्यादि।
  • पूर्व प्रकाशन: कविता संग्रह – 4, विभागीय पुस्तक – 2
  • अनुभव: 5 साल प्रशिक्षण का अनुभव, संयुक्त राष्ट्रसंघ में अफ्रीका में शांति सेना का 1 साल का अनुभव।
  • पता: आप ग्राम-चिकना, मधुबनी, बिहार से है।

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आपकी लेखनी यूँ ही चलती रहे, जनमानस के कल्याण के लिए। उस अनंत शक्ति की कृपा आप पर बनी रहे। इन्ही शुभकामनाओं के साथ इस लेख को विराम देता हूँ। तहे दिल से KMSRAJ51.COM — के ऑथर फैमिली में आपका स्वागत है। आपका अनुज – कृष्ण मोहन सिंह।

  • जरूर पढ़े: स्वाद बदलना होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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स्वाद बदलना होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ स्वाद बदलना होगा। ♦

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माहौल बदलने के लिए मिजाज बदलना होगा।
मुकद्दर के लिये नजरिया, अंदाज बदलना होगा।
आसमां की दूरी अगर वाकई कम करनी है।
घायल परिंदों को भी परवाज़ बदलना होगा॥

रोने धोने से रात के घंटे कब कम होते हैं।
कल बदलने के लिए आज बदलना होगा।
मर्ज पता है सबको लेकिन दर्द कौन सहे।
मीठी गोली, वैद्य, दाई, इलाज बदलना होगा॥

सिर्फ बातें और चिंता से समाज नहीं बदलता।
घर की संस्कृति, रीति – रिवाज बदलना होगा।
मंदिर मस्जिद राम रहीम बहुत बदल के देखे।
समरसता के लिए भजन, नमाज़ बदलना होगा॥

एक-एक कदम बढ़ाने से ही फराज़ कम होगा।
बेटे – बेटी का फर्क, जमीं, सिराज बदलना होगा।
अपने खून पसीने का नमक चख के तो देखो।
मुस्तकबिल बदलेगा, स्वाद, अनाज बदलना होगा॥

♦ शैलेश कुमार मिश्र (शैल) – मधुबनी, बिहार ♦

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इक जख्म सा सीने में।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ इक जख्म सा सीने में। ♦

इक जख्म सा सीने में था रात भर रिसता रहा।
जिंदगी की दौड़ में, ‘मैं’ ही सदा पिसता रहा॥

आज जाकर ये लगा कुछ सोच लूँ अपने लिए।
हाथ में था अब तलक जो हाथ से गिरता रहा॥

हर कसौटी पर जमाने की खरा उतरा हूँ मैं।
क्योंकि अब तक सब लकीरें हाथ की घिसता रहा॥

दौर कितने गम ख़ुशी के संग लायी जिन्दगी।
ले हंसी मुस्कान लब पर मैं यूँ ही हँसता रहा॥

उमर सारी ही लगा दी कर ली सबकी बंदगी।
निज ख़ुशी का स्वप्न मेरी आँख में बसता रहा॥

बेरुखी सबसे मिली टूटा सदा विश्वास था।
प्यार सबमें बाँट मन में हौसला भरता रहा॥

मैं हूँ क्या, क्या चाहतें हैं, जान ले कोई जरा।
बस यही एक ख्वाब मेरी आँख में पलता रहा॥

♦– अनामिका लेखिका –♦

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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मकर संक्रांति की शुभकामनाएँ।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ मकर संक्रांति की शुभकामनाएँ। ♦

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मेरे सभी प्रिय पाठकों को तहे दिल से मकर संक्रांति की शुभकामनाएँ। 

मकर संक्रांति के अवसर पर तिल गुड़ खाने-खिलाने की परंपरा है। मकर संक्रान्ति के अवसर पर भारत के विभिन्न भागों में, और विशेषकर गुजरात में, पतंग उड़ाने की प्रथा है।

मकर संक्रान्ति भारत का प्रमुख पर्व है। मकर संक्रांति पूरे भारत और नेपाल में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है तभी इस पर्व को मनाया जाता है। वर्तमान शताब्दी में यह त्योहार जनवरी माह के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है। इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है।

तमिलनाडु में इसे पोंगल नामक उत्सव के रूप में मनाते हैं जबकि कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति ही कहते हैं। मकर संक्रान्ति पर्व को कहीं-कहीं उत्तरायण भी कहते हैं।

भारत में मकर संक्रांति

मकर संक्रान्ति के अवसर पर आन्ध्र प्रदेश और तेलंगण राज्यों में विशेष ‘भोजनम्’ का आस्वादन किया जाता है।

मकर संक्क्रान्ति के अवसर पर मैसुरु में एकगाय को अलंकृत किया गया है।
संपूर्ण भारत में मकर संक्रांति विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। विभिन्न प्रांतों में इस त्योहार को मनाने के जितने अधिक रूप प्रचलित हैं उतने किसी अन्य पर्व में नहीं।

नेपाल में मकर-संक्रान्ति

माघे-संक्रान्ति के अवसर पर नृत्य करती हुईं मागर स्त्रियां नेपाल के सभी प्रांतों में अलग-अलग नाम व भांति-भांति के रीति-रिवाजों द्वारा भक्ति एवं उत्साह के साथ धूमधाम से मनाया जाता है। मकर संक्रांति के दिन किसान अपनी अच्छी फसल के लिये भगवान को धन्यवाद देकर अपनी अनुकम्पा को सदैव लोगों पर बनाये रखने का आशीर्वाद माँगते हैं। इसलिए मकर संक्रांति के त्यौहार को फसलों एवं किसानों के त्यौहार के नाम से भी जाना जाता है।

मकर संक्रान्ति का महत्व

शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। जैसा कि निम्न श्लोक से स्पष्ठ होता है-

माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम।
स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥

मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है। सामान्यत: सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त फलदायक है। यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छ:-छ: माह के अन्तराल पर होती है।

भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात् भारत से अपेक्षाकृत अधिक दूर होता है। इसी कारण यहाँ पर रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। किन्तु मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अन्धकार कम होगा।

अत: मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होगी। ऐसा जानकर सम्पूर्ण भारतवर्ष में लोगों द्वारा विविध रूपों में सूर्यदेव की उपासना, आराधना एवं पूजन कर, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की जाती है।

सामान्यत: भारतीय पंचांग पद्धति की समस्त तिथियाँ चन्द्रमा की गति को आधार मानकर निर्धारित की जाती हैं, किन्तु मकर संक्रान्ति को सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है। इसी कारण यह पर्व प्रतिवर्ष १४ जनवरी को ही पड़ता है।

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कभी खुद से मिलकर तो देखो।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

♦ कभी खुद से मिलकर तो देखो। ♦

कभी खुद से मिलकर तो देखो।
अचरज न हो तो कहना।
खुद से प्रश्न पूछकर तो देखो।
सब राज खुल न जाएं तो कहना॥

हर अच्छाई को निखारने और बुराई को,
सुधारने का प्रण न हो जाए तो कहना।
अपने गुणों, अवगुणों का विश्लेषण करके,
तो देखो – जीवन लक्ष्य न मिल जाए तो कहना॥

कभी खुद से मिलकर तो देखो।
अति व्यस्त न हो जाओ तो कहना।
मायावी दुनिया में रहकर।
अंत:करण में झांक कर तो देखो,
हरिदर्शन कर स्वयं से प्रेम न हो जाए तो कहना॥

अपनी प्रतिभा को पहचान कर तो देखो।
खुद से मित्रता न हो जाए तो कहना।
आत्म-विश्लेषण करके तो देखो।
हीरे की तरह तराशे न जाओ तो कहना॥
कभी खुद से मिलकर तो देखो॥
कभी खुद से मिलकर तो देखो॥

♦– डॉ• संगीता पाहुजा – दिल्ली –♦

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यह कविता “डॉ• संगीता पाहुजा” जी की रचना है। आपके द्वारा लिखी कविता ह्रदय को छूने वाली होती है। हर उम्र के लोग आपकी कविताओं को पसंद करते है। आपकी कविताओं से हर उम्र के लोगो को फायदा मिलता है। आपकी लेखनी यु ही चलती रहे। आपके उज्जवल भविष्य और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूँ। “डॉ• संगीता पाहुजा” जी KMSRAJ51.COM के ऑथर टीम पैनल में आपका तहे दिल से स्वागत है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बुझने से पहले।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ बुझने से पहले। ♦

जिस तरह रात सरकते-सरकते।
सीने में जलता कोयला।
धीरे-धीरे से राख़ बनते हुए।
बुझकर ठंडी पड़ रही हूँ।
धुआंकश की नली में इस वक्त।
धुआं की बारीक बेल तक नहीं॥

तुमने गौर नहीं किया था उस दिन।
तुमने आग में जो धकेल दिये।
उस कुंदे में जान अभी बाकी थी।
कच्चे लट्ठे से उठते धुआं के बादल।
जलन से चढ़ती जा रही।
तुम्हारी आँखों की लाली॥

और तुम फ़िर से इंधन छिड़क कर,
आग लगा देते थे।
और मैं भड़क कर धक्-धक् दहकने लगती थी।
वो किस तरह की तेज़ ज्वालाएँ थीं मेरी।
वो किस तरह की जलती अंगारे आंखें थी मेरी।
वो किस तरस की लौ की जीभ थी मेरी॥

उन दिनों तुम्हारी,
अक्खड़ और दुष्टता से भरी।
घमंड के महल को जलाकर।
भस्म करने के हठ से ही।
दहड़-दहड़ दहक रही थी मैं भी॥

तुम तो चूल्हे की सीमा के अंदर ही।
मुझे जलाकर उसकी आंच पर,
अपनी दाल पकाने वाले चालाक हो।
मुझे जला-जलाकर ही,
अपनी भूख मिटाने में माहिर हो॥

सच कहूँ तो एक भूख मुझमें भी थी।
इस घोर अंधकार की रातों में।
तुम्हारी आँखों में चिराग बनकर।
जल जाने की भूख।
और एक प्यास भी मुझमें थी।
इस बर्फीली रातों की कड़ाके की ठंड में॥

तुम्हारे पत्थर दिल को।
अपनी गरम होंठों से चूमकर।
जान डाल देने की प्यास।
मगर अफ़सोस…
आग लगाने वाले हाथ ही।
रोशनी न समझने पर॥

बाज़ार खत्म हो जाने के बाद भी।
तोल मोल खत्म न होने पर,
क्षय होने लगती हूँ।
क्षमा करने लगती हूँ।
लेकिन तुम जैसे थे, वैसे ही हो आज भी।
पिघली नहीं है रत्तीभर भी।
आग लगाने वाली तुम्हारी ताकत॥

उंडेल देते हो इंधन, फ़िर भी।
मिटती नहीं है तुम्हारी वो भूख भी।
तुम्हारे अंगारों के कुंड में जलते-जलते।
खुद को ही जलाते-जलाते।
अंत में राख़ के अंदर ही अंदर बुझते-बुझते।
इस बर्फीली रातों में, ठंडी पड़ती जा रही हूँ॥

उतने में कहीं ओर से,
इस शीतल रात की आखरी प्रहर।
किसी पंछी की मीठी पुकार।
तेल घटे दिल के दीये में।
प्रेम बहाती किसी की नर्म उंगलियां॥

सोच रही हूँ।
बुझने से पहले फ़िर एक बार।
नयापन से, नये सिरे से।
लाख दीपक के तरह।
मैं क्यूं न जल उठूँ?

♦– मीरा मेघमाला –♦

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अकाल की भारी बरसात।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ अकाल की भारी बरसात। ♦

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अकाल से तपते बंजर खेतों में।
संज्ञहीन बैठे किसान के सामने।
कैमरा और माइक के साथ।
अचानक प्रकट हुआ।
टीवी चैनल का एक संवाददाता और
एक ही सांस में बरसाने लगा कईं सवाल॥

‘ये अकाल है, या क्या है?
इसका जिम्मेदार कौन है?
इससे आपको क्या तकलीफ़ है?
नज़दीक ही सिंचाई बांध है और
पास में ही भरी बहती नहर।
फ़िर भी पानी की कमी का आरोप।
बताइए ये कितना सही है॥’

शुन्य में गढ़ी नज़र।
जरा भी न हटाते हुए।
विषण्ण हंसी के साथ।
किसान का एकालाप।
‘पैसे वालों ने खोदा गड्ढा बड़ा है।
और पानी तो हमेशा।
नीचे की ओर ही बहता है॥’

अकाल से दहकते धूप के गाँव में।
एक दिन एक ही घंटे भर।
एकाएक भारी बारिश।
खड़कती बिजलियां।
और तेज़ आंधी की भयावह दौड़।
धराशायी पेड़-पौधों को देखकर।
ढह कर बेहोश गिर पड़ा किसान।
और उसके सामने।
संवाददाता फ़िर से हुआ हाज़िर॥

‘बारिश की कमी को कोसते हो।
जब बारिश हुई तो फूट-फूट कर रोते हो।
गिर पड़े पेड़-पौधों पर ही यूं लेटे हो।
बताओ अब तुम कैसा महसूस कर रहे हो?’
घबराहट से पल भर आंखें खोलते।
हालात को देखकर फ़िर से होश खोते॥

कमज़ोर आवाज़ में बड़बड़ाने लगा।
कंगाल किसान।
“क्या करें भाई।
पैसे वालों के महलों के जितने मज़बूत नहीं है।
अपने खेतों की केले के पौधों की कमर।
कैसे सह पाएँगे आंधी-तूफ़ानों का असर॥”

♦– मीरा मेघमाला –♦

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समय चक्र ने मुझे सिखाया।

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♦ समय चक्र ने मुझे सिखाया। ♦

समय चक्र ने मुझे सिखाया की अधिकांशतः पढ़े लिखे लोग इतने ज्यादा पढ़ लिख जाते हैं, की एक दुसरे को नीचा दिखाने में किसी भी हद तक चले जाते हैं। मध्यमवर्गीय होते हुए भी आधुनिकता की होड़ में ये अपने कपडे, अपनी भाषा इस कदर गिरा लेते हैं की अनपढ़ता और गरीबी भी इनसे शर्माने लग जाती है।

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समय चक्र के रंगों ने मुझे सिखाया की व्यक्तिगत रूप से आज तक बड़े से बड़ा दुश्मन भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाया। अपना बनकर, अपनापन जताकर, अपने होकर लोगों ने मुझे अर्श से फर्श पर ला दिया। मेरे आत्मसम्मान, मेरे वजूद को मेरी ही नजरों में इस कदर गिरा दिया, की मैं एक जिन्दा चलती फिरती लाश बन कर रह गया। लड़ूँ भी तो किन से, वार करने वाले, जख्म देने वाले, जख्म को गरम चाकू से कुरेद कर नासूर बनाने वाले सब अपने …?

समय चक्र ने मुझे सिखाया की आप केवल अपना फर्ज निभाओ। खामोश हो जाओ, शांत हो जाओ, क्योंकि जिसके लिए आप सबसे लड़ रहे हो, वो ही अगर स्वार्थवश आपको ही मुजरिम बना दे? आपको ही सवालों के कटघरे में खड़ा कर दे? जहाँ आप मन मार कर अपने आपको मारकर उसकी खातिर झुक भी जाते हो। तो ये जीते जी कितना बड़ा मरना हो जाता है। की ये जानते हुए भी की आगे झूठ का, षड्यंत्रों का, अभद्र भाषा व्यवहार का कुआ है। पर फिर भी आप अपने किसी ख़ास को उसी कुएं से पानी पीता देख रहे हो। आँख पर पट्टी बाँध कर, जुबान को सिलकर।

आखिर में एक ही चीज समझ आई की सिवाय सतगुरु और इष्ट के कोई आपका अपना नहीं है। सब स्वार्थ के रिश्ते हैं जब तक आप स्वार्थ सिद्ध करते हैं आपकी पूँछ है जहाँ वक़्त ने करवट बदली वहां सबसे बड़े, आप नाकारा नाकाबिल घोषित कर दिए जाते हैं।
सुरक्षित रहिये, सावधान रहिये, दो गज की दूरी रखिये, मास्क पहनिए और खुश रहिये।

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तुम्हारी अंतिम यात्रा पर।

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♦ तुम्हारी अंतिम यात्रा पर। ♦

जब नसीब अच्छा हो।
कंकड़ को कागज़ के टुकड़े में।
लपेट कर भी दे-दें।
उसकी भी अहमियत बढ़ जाएगी॥

जनाज़े पर सजा फूल।
अज़ीब तरीके से हंसने लगा।
वजह ढूंढने की मेरी भी आदत पुरानी है।
आख़िर उसने राज़ खोल ही दिया॥

‘जीते जी हाथ छोडकर चला हर शख़्स।
इस अंतिम यात्रा के चरम गीत में,
सुर मिला रहा है।
ज़रा इसे ग़ौर से देख लेना।
तुम्हारी अंतिम यात्रा में भी, ठीक ऐसा ही होगा॥

रात भर नींद की ग़ैरहाज़िरी।
और आख़िरी प्रहर में।
आँख लगने लगती है तो,
जितनी भी सुरीली हो, अलार्म की धुन।
लगती है बेहद क्रूर और कर्ण-कटु॥

मोहल्ले में मछली वाला।
जब से मछलियां तोलने में लगा है।
तब से गहरी सोच में डूबी हूँ।
कि, इन मछलियों के क़त्ल में।
मेरे पाप का हिस्सा कितना है॥

कोई हाथ छोडकर दूर चला जाता है।
उसके लौट आने के भरोसे को ही, जी लेने को।
अमर प्रेम कहते है लोग।
जिस अमर प्रेम का कारण बने।
उस बेवफाई को, क्या नज़राना दिया जाये॥

खुशी हुई ये सुनकर कि,
‘जो बीच सड़क पर छोडकर जाएगा।
वो भी मेरी अंतिम यात्रा पर,
उस चरम गीत में अपना सुर मिलाएगा।’
इसे अगर मैं देख पाती।
तो और भी बड़ी खुशी होती॥

♦– मीरा मेघमाला –♦

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