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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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छोटी सी कविता हिंदी में

वेदना।

Kmsraj51 की कलम से…..

Pain | वेदना।

एक दिन ऐसा आएगा, हम तो चले जायेंगे।
कुछ को छोड़, सभी को याद बहुत आयेंगे।

ढूढ़ने वाले ढूंढते रहेंगे, पर हमें कहीं न ढूंढ पायेंगे।
ये मुराद कभी पूरी न होगी, कहीं भी न मिल पायेंगे।

मेरे सभी अजीज, अपनी दुनिया में मस्त रहेंगे।
हम किसी दूसरी दुनिया में खो जायेंगे।

कोई न रोक पायेगा, आने वाले आते रहेंगे।
जो आया इस जहां में, मुक़र्रर वक़्त पर जाते रहेंगे।

“भोला” का पथ सत्कर्म है, जीवन का यही मर्म है।
आना – जाना लगा रहेगा, यही कुदरत का क्रम है।

इससे मुक्ति मिल जायेगा, फिजूल वो भ्रम है।
भगवान के घर में, गुनाहगारों की शिनाख्त बाकी है।

थोड़ी इबादत राम, कृष्ण, चित्रगुप्त की कर लूं।
तू भी जा अब मस्जिद में, अज़ान तेरी बाकी है।

जाना हैं दोनों को भगवान के पास, तुझे भी मुझे भी।
गुज़ारिश है बन्दगी कर, जो साँसे बाकी है।

मिलना है ग़र प्रभु से, तो चलना है नेकी की राह पर।
आहत न हो कोई दिल, इसे अख़लाक़ कहते हैं।

मग फिरत के बाद, जन्नत मिल जाये।
इसे खुशकिस्मती, वो इत्तफाक कहते हैं।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

—————

  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — अन्‍य जीवों की तरह मनुष्य के प्राण संकट में नहीं होते तभी यह जीवन प्रभु स्मरण और भजन के लिए अनुकूल है। पर जीवों की वेदना से भी बड़ी वेदना मानव जन्म में तब होती है जब हम प्रभु के बनने का सुअवसर भी गवां देते है फालतू के कार्यों की वजह से। मानव जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते है, कभी भी एक जैसा समय लम्बे समय तक नहीं रहता हैं।

—————

यह कविता (वेदना।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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वैरागी जीवन।

Kmsraj51 की कलम से…..

Vairagi Jeevan | वैरागी जीवन।

बोये थे मैनें संदल के बन,
काँटे बिखरे राहों में बने बबूल।
घायल करते पग-पग पर,
बिखरे हुए बिसैले शूल।

दूर-दूर तक फैले स्याह मनोहर,
घन मिले मेघ शीतल साये से।
ऐसी बद्दुआ लगी थी कोई,
हर इक ने प्राण जलाये से।
मेरे जीवन को श्राप दे गई,
भोले बैरागी मन की चंचल भूल।

शिशिर पहने आये पतझड़,
हरे-भरे मेरे आँगन में।
वीरानों सी ख़ामोशी रहती,
अंत:पुर के शून्य गगन में।
छिद्रित हुए हृदय में शूल,
मेरे अँजुल में स्वप्नों की धूल।

नहीं पता मुझको कब किसके,
हृदय पंख नोचे मैनें।
उड़ान से पहले ही मर जाते,
संकल्प सलोने जो भी मैं बुनता।
अपने आँगना बोये थे हमने,
खिले मिले किसी और के घर फूल।

इस बैरागी के जीवन में,
होती सुबह-शाम कहाँ?
जन्मों का अभिशाप लिये चला,
इस युग का संताप कहाँ?
पग-पग पर थी ठोकर हरदम,
इक पल भी आराम कहाँ?
ये जीवन तो बना बस धूल का फूल,
खंडित हृदय तन रुधित मन रहा कूल।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (वैरागी जीवन।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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पिता की सीख ही सच्ची थी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Pita Ki Seekh Hi Sacchi Thi | पिता की सीख ही सच्ची थी।

“कहलाना तो है मानव हमको,
पर पशु सा हमे सब करने दो।
पिता हो तुम तो फिर क्या हुआ?
हमे मर्जी से ही सब करने दो।”

“जन्म दिया और पाला – पोसा,
पढ़ाया – लिखाया, बड़ा किया।”
“कौन सा तीर मारा है तुमने?
फर्ज मां – बाप का अदा किया।”

“धन्य लला तुम जो जान खपा कर,
आज तुमसे ये शब्द उपहार मिला।
नेकी कर दरिया में डाल का उम्दा,
पितृ कर्म का उत्तम उपकार मिला।

निवाला अपने मुंह का छीन कर,
तेरे मुंह में, इसी लिए ही डाला था?
नूर गंवाया, तेरी मां ने तुझे जनाया,
क्या इसी लिए ही तुझे पाला था?”

सुन भारी-भरकम बोझिल शब्द पिता के,
हुए अनुगुंजित अधिभारित अनुशासित थे।
हुए अंकुशित बुद्धि के घोड़े डर बेदखली के,
पर मनोभाव तो अभी भी त्यों विलासित थे।

होते ही जायदाद नाम अपने पिता की,
हुआ बेटा फिर से आपे से ही बेकाबू था।
उद्भासित पिता के अनुभव को भुला कर,
किया दूर प्रयोग से विवेक का तराजू था।

कुछ यारों ने लुटा, कुछ विकारों ने लुटा,
शेष कुछ लूट गई बेवफा महबूबा थी।
पिता की कमाई तो जाती रही हाथ से,
खुद के लिए तो कमाई उसे अजूबा थी।

पिता की पीठ में बजे नगाड़े की धुन,
समझा, कितनी मीठी, कितनी खट्टी थी।
मालामाल था, कंगाल हो लिया था जब,
तब समझा, पिता की सीख ही सच्ची थी।

गर्म खून था ठंडने लगा जब उसका,
लगा तोलने हर सौदा विवेक तराजू से।
संभलती दुकान फिर से जिंदगानी की,
तब तक जा चुकी थी ताकत ही बाजू से।

पछतावा तो था पर किस काम का ?
चिड़िया ने चुग लिए खेत अब सारे थे।
स्मृति पटल में अनुगुंजित शब्द पिता के,
अब समझा कि उनमें कौन से इशारे थे?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — पिताजी मुझे हार न मानने और हमेशा आगे बढ़ने की सीख देते हुए मेरा हौसला बढ़ाते हैं। पिता से अच्छा मार्गदर्शक कोई हो ही नहीं सकता। हर बच्चा अपने पिता से ही सारे गुण सीखता है जो उसे जीवन भर परिस्थितियों के अनुसार ढलने के काम आते हैं। उनके पास सदैव हमें देने के लिए ज्ञान का अमूल्य भंडार होता है, जो कभी खत्म नहीं होता। आमतौर पर एक बच्चे का जुड़ाव सबसे अधिक उसके माता-पिता से होता है क्योंकि उन्हीं को वो सबसे पहले देखता और जानता है। माँ-बाप को बच्चे का पहला स्कूल भी कहा जाता है। लेकिन आजकल के बच्चों को हो क्या गया है ओ यह क्यों भूल जाते है की जैसा ओ अपने माता-पिता के साथ करेंगे वैसा ही उनके बच्चे भी उनके साथ करेंगे। एक बात याद रखें – पिता सदैव ही अपने अनुभव से आपको अच्छी सीख देते है, उनका कभी भी अनादर न करे, माता-पिता का यदि आप अनादर करेंगे तो सबकुछ मिल तो जायेगा लेकिन वह जल्द ही ख़त्म भी हो जायेगा। उनकी दुआओ व सीख से ही आप जीवन में आगे बढ़ेंगे।

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यह कविता (पिता की सीख ही सच्ची थी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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खोता जा रहा बचपन।

Kmsraj51 की कलम से…..

Khota Ja Raha Bachpan | खोता जा रहा बचपन।

बच्चों की जिंदगी में अब आराम कहाँ,
बस्ता लादे फिरते दिखते जब देखो जहाँ।

हम एक बात पर सहज करते है विचार,
क्यों डाल रहे बच्चों पर पढ़ाई की मार।

तीन वर्ष की आयु में स्कूल क्या कम था,
अब तो चेहरे पर ट्यूशन का भी गम था।

जो उम्र थी उनके खिलखिलाने की,
छोटी ~ छोटी बातों पर मचल जाने की।

वो तो गिरवी रख दिया हमने उनका बचपन,
फिर कहां से आएगा उसमें वो अपनापन।

मासूम बच्चों को क्यों इसकी है जरूरत,
मां~बाप को बदलना होगा अपना मत।

बच्चों की झुंझलाहट साफ देती है दिखाई,
जब उनकी आँखें आंसुओं से होती नहाई।

चलो स्कूल जाने तक तो ठीक थी बात,
स्कूल में दिन बीता ट्यूशन में बीती रात।

इन मासूम बच्चों का खिलौनों से कोई सरोकार नही,
माता~पिता को क्या खुद पर ऐतबार नही।

इन नन्हें बच्चों के कंधो से ट्यूशन का बोझ उतारे,
खुद भी हम इनका कुछ तो भविष्य संवारे।

माता~पिता से बड़ा कभी कोई बना महान नही,
नन्हें बालकों को ट्यूशन भेजे कोई शान नही।

भविष्य तो तभी सुंदर होगा गौर करेगे जब वर्तमान पर,
बचपन थिरेकेगा जब परिवार के संस्कारों की तान पर।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — 2/5 वर्ष से 3 वर्ष के बच्चों के कंधे पर पढ़ाई का बैग लादकर स्कूल भेजना फिर उन्हें टूशन भेजना इस चक्कर में बेचारे बच्चे ऐसा चक्कर खा जाते है की बचपन क्या होता है वो समझ ही नहीं पाते। जो पढ़ाई के लिए होड़ मची है, इस होड़ की चक्की में बच्चे पीसकर रह गए है। बच्चों को बचपन का पूर्ण आनंद देने के लिए माता-पिता और टीचर्स को भी अपने पढ़ाने पर ध्यान देना होगा, जब टीचर्स स्कूल में अच्छे से पढ़ाएंगे तो बच्चों को अलग से टूशन की जरुरत ही नहीं होगी। टीचर्स को अपनी जिम्मेवारी ईमानदारी पूर्वक निभानी चाहिए, और इस कार्य में माता-पिता का सहयोग भी होना चाहिए। एक बात याद रखें – “ये बच्चे ही भविष्य के निर्माणकर्ता बनेगे, ये मन से जितने शांत व मज़बूत होंगे, उतना ही शांति पूर्वक अच्छे से कार्य करेंगे।” अगर ये बच्चे बचपन से ही अशांत व तनाव से भरे होंगे तो अपने अशांत व चिड़चिड़े मन से कोई भी अच्छा कार्य नहीं करेंगे, अपने व समाज के लिए हानिकारक साबित होंगे।

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यह कविता (खोता जा रहा बचपन।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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यह अकेला है।

Kmsraj51 की कलम से…..

Yah Akela Hai | यह अकेला है।

हमने जाड़े की सर्दी है झेली,
हर गर्मी का मौसम है झेला।
वसन्त ऋतु की बहारें हैं देखी,
देखा वर्षा ऋतु का क्रुद्ध खेला।

स्मृति के विलासित गहवार में,
हैं उभरती धंसती कई यादें।
हसरतें जो कुछ थी पूरी हुई,
रह गए अधूरे ही थे कई वादे।

इस जिन्दगी के अधूरे सफर में,
खूब है देखा यह जग का मेला।
किसी के धन की अम्बर है देखी,
किसी के नसीब में न देखा धेला।

अजूबों से भरी इस दुनियां में,
मैंने सपने सबके अधूरे देखे।
राजा रंक सब परेशान हैं देखे,
किसी के ख़्वाब नहीं पूरे देखे।

किसी को अहम से इठलाते देखा,
तो किसी को शर्म से शर्मिंदा देखा।
अमीर – गरीब सबको मरते हैं देखा,
किसी को सदा न यहां जिन्दा देखा।

पर होड़ाहोड़ी और आपाधापी में,
निरन्तर छटपटाते हैं सबको देखा।
लक्ष्मण रेखा को लांघते जो संघर्ष में,
उनको समाज द्वारा नकारते हैं देखा।

अजीब करिश्मा है इस जीवन का,
इस भीड़ भड़ाक में यह अकेला है।
इस जीवन ने अपने पूरे सफर में,
हर वफा व छल प्रपंच को झेला है।

यह जीवन इस जग के लगभग,
हर सम्भव सुख दुख से खेला है।
हसरतें तो थी आकाश में उड़ने की,
पर जीवन की हद ने इसे नकेला है।

अनुभव में जो आया है अब तक मेरे,
कि यह जीवन तो निरन्तर अकेला है।
आया इस दुनियां में यह अकेला ही था,
जाता भी इस दुनियां से यह अकेला है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — किसी भी मनुष्य के जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव आते है, लेकिन एक बात सदैव ही कॉमन होती है, कोई भी मनुष्य आता भी अकेला है और सदैव जाता भी अकेला ही है, कुछ साथ भी लेकर नही जाता है, तो सोचने वाली बात है की फिर मनुष्य अपने जीवन में अहंकार क्यों करता है, इतना गुमान किस बात का करता है। भगवान कृष्ण ने कहा है कि शरीर का निर्माण पांच तत्वों-पृथ्वी, जल, आकाश, वायु व अग्नि और तीन गुणों- सतो (सत), रजो (रज) व तमो (तम) से हुआ है। इसके बाद ब्रह्म का अंश जीव के रूप में शरीर में प्रवेश करके उसे जीवात्मा बनाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रकृति के गुण जीव निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जिस प्रकार मनुष्य बाल्यावस्था से प्रौढ़ावस्था और प्रौढ़ावस्था से वृद्धावस्था तक पारिवारिक जीवन चक्र की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हैं, उसी प्रकार परिवार भी विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हैं।

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यह कविता (यह अकेला है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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सुगंध भी सुलभ न होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सुगंध भी सुलभ न होगा। ♦

अगर न जागे आज दोस्तो,
कल को फिर से अंधेरा होगा।
पराधीनी में था किसने धकेला?
सवाल यह मेरा – तेरा होगा।

अपनी संस्कृति सभ्यता का शायद,
फिर सुगंध भी सुलभ न होगा।
कहीं आ न जाए फिर दौर वही,
जो सैंतालीस से पहले था भोगा।

यह पछुआ बयार कहीं ले ही न डूबे,
फिर से भारत के गौरव को।
आओ मिलकर पलवित पुष्पित करते हैं,
अपनी संस्कृति सभ्यता के सौरभ को।

उदासीनता भली नहीं है राष्ट्र धर्म में,
अपनी रीत तो अपनी ही होती है।
परिणाम कभी न अच्छा है होता,
जब देश की जनता सोती है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — अब भी समय है संभल जाओ, वर्ना अपनी संस्कृति सभ्यता का शायद फिर सुगंध भी सुलभ न होगा। कहीं आ न जाए फिर दौर वही, जो सैंतालीस से पहले था भोगा सभी ने। यह पछुआ बयार कहीं ले ही न डूबे, फिर से भारत के गौरव को। आओ मिलकर पलवित पुष्पित करते हैं, अपनी प्राचीन सभ्य संस्कृति सभ्यता के सौरभ को।

—————

यह कविता (सुगंध भी सुलभ न होगा।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बचपन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बचपन। ♦

काश! लौट आते वे बचपन के दिन आज,
जिसमें, दादी चूमती भालों को।

माता, लोरी गा कर सहज सुलाती,
बहना, चटकारी देती गालों को।

वह बाबुल की बाहों का झूला होता,
सागर समझता नदी और नलों को।

कोरे कागज की वह कश्ती होती,
खेलता, काठ के कृपाण और भालों को।

माँ डांटती, मैं रुस कर छुप जाता,
आँगन में बाबुल की पीठ के पीछे।

माँ खंगालती, घर का कोना – कोना,
दादी देखती, हर पलंग के नीचे।

बाबा, मौन रह देते, साथ मेरा तब,
गमछे से ढांपते, ताकि तनिक न दिखे।

बहना खोलती, भ्रातृ भेद सारा तब,
माँ झुंझलाती, अच्छा! तो ये तुम्हारी सीखें?

काश! मिट्टी के वे घरौंदे होते,
बनाता, मिटाता, फिर से बनाता।

किशोर पड़ोसिन कमला की चुगली,
तोतली आवाज में दादा से लगाता।

डांट पड़ती देख दादा से उसको,
मेरा रूआंसा सा चेहरा, फिर से खिलखिलाता।

काश! लौट आते वे बचपन के दिन आज,
जिंदगी जीने का बड़ा मजा आता।

आज न जाने क्या हो गया ये?
आलीशान बंगलों का सुख भी न भाता।

आंगन में लगे हुए झूले पर झूल कर भी,
वह बाबुल की बाहों सा चैन न आता।

काश! हुआ न होता बड़ा अगर मैं,
तो आज ये बचपन का भाव न सताता।

आज है भार सब अपने ही कंधों पर,
जो उठाया करते थे, तब मेरे पिता और माता।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — बचपन किसी भी इंसान के जीवन का बहुत ही महत्वपूर्ण समय होता है। बचपन में इतनी चंचलता और मिठास भरी होती है कि हर कोई फिर से उस बचपन को जीना चाहता है। बचपन में वह धीरे-धीरे चलना, गिर पड़ना कुछ देर के लिए रोना और फिर से उठकर दौड़ लगाना बहुत याद आता है। बचपन में दादी द्वारा प्यार से यूँ माथा को चूमना बहुत याद आता है। बचपन में पिताजी के कंधे पर बैठकर मेला देखने जाने का जो मजा होता था वह अब नहीं आता है। मां से डाट पड़ने पर पापा के पीछे यूँ छिप जाना, शरारत करने पर पिटाई के लिए खोजा जाना और दादा जी के पास छिप जाने का जो आनंद था उसका क्या कहना, बहन द्वारा पकड़वाना, फिर तो पिटाई होती थी। लेकिन आजकल के बच्चों का वह प्यारा सा बचपन तो कहीं खो ही गया। भावनात्मक या मन के स्तर पर मासूमों के पोषण की स्थिति दुनिया भर में बहुत ही बुरी है। भारत में हर दूसरा बच्चा वयस्कों की भावनात्मक प्रताड़ना का शिकार हो रहा है। खास बात यह है कि 83 फीसदी से ज्यादा मामलों में तो शोषण करने वाले खुद अपने मां-बाप होते हैं। बच्चों से उनका बचपन ना छीने, उन्हें उनका बचपन खुलकर जीने दे, तभी उनका सर्वांगीण विकास होगा।

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यह कविता (बचपन।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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जिंदगी का सफर।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जिंदगी का सफर। ♦

छोटी सी है जिंदगी,
सफर है बहुत लंबा।
सुख दुख मिले रहो में,
देख इंसान हो अचंभा।

निकले जिस गली से,
वापस वहीं है उसे आना।
सफर चाहे जैसे भी हो,
हमें गुनगुनाते है रहना।

टेडी मेडी पगडंडियों से,
भारी सड़क पर है गुजरना।
लेकर अपनी हजार ख्वाहिश,
जीवन के सफ़र को है काटना।

जीवन के हर एक मोड़ पर,
एक नया अनुभव मिलता है।
दो फूलो के संग सफ़र में,
कांटो को भी सहना पड़ता हैं।

सफर शुरू हुआ जिस मुकाम से,
खत्म होना भी है उसे अब यहां।
खफा नहीं हूं ये मेरी जिंदगी तुमसे,
ले चल मुझे, ले जाना तुझे जहां।

♦ अजय नायर जी – कोच्चि, केरल ♦

—————

• Conclusion •

  • “अजय नायर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — ये छोटी सी है जिंदगी, मगर सफर है बहुत लंबा इसलिए चाहे सुख हो या दुःख कभी भी निराश होकर जिंदगी बैठ न जाना या कोई भी गलत कदम ना उठाना। सुख और दुःख तो वर्षा ऋतू के बादल की तरह है इनका आना जाना तो जीवन में लगा ही रहेगा। इसलिए दुःखी होकर बैठ ना जाना जीवन में। सदैव यही कोशिश करना की तुम्हारी वजह से कभी भी किसी को कोई दुःख ना पहुंचे। जहां तक हो सके लोगों की मदद ही करें।

—————

यह कविता (जिंदगी का सफर।) “अजय नायर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम अजय नायर है। मैं एक प्राइवेट मल्टीनेशनल कंपनी में पब्लिक रिलेशन ऑफीसर के पद पर चेन्नई में कार्यरत हूं। मुझे लिखने का शौक बचपन से रहा। १५ (15) वर्ष की आयु में हमने पहली कविता “दोस्त” इस नाम से लिखी जो पहली बार अखबार में प्रकाशित हुई। तब से आज तक करीबन ३५०० (3500) से अधिक कविता / गजल/ बाल कविताएं/ शेरो शायरी लिखी है। जो की भारत के सभी अखबारों में अब तक प्रकाशित हुई है। साहित्य संगम संस्थान के सभी मंचो से हमें श्रेष्ठ रचनाकार, श्रेष्ठ टिप्पणी कार, श्रेष्ठ विषय प्रवर्तक आदि सम्मानों से सम्मानित किया गया है। काव्य गौरव सम्मान, कलम वीर सम्मान, गौरव सम्मान, मदर टेरेसा सम्मान, बेस्ट ऑथर सम्मान, आदि सम्मान अलग अलग साहित्य जगत से प्राप्त हुआ है। हमारी पहली शेरो शायरी की पुस्तक का प्रकाशन संकल्प पब्लिकेशन द्वारा २०२१ (2021) में हुआ है। जो की सरल सुगम हिंदी भाषा में लिखा हुआ है।

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मनुष्य की चाह।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मनुष्य की चाह। ♦

कार्य कितना भी कठिन हो,
मनुष्य जो चाह दे।
पथ पर पड़े कांटे जटिल,
क्षण भर में ढाह दे।

दुनिया दागी – गमगीन,
जिंदा दिलवर ला दे।
है कौन इन्सा जहां में,
मोहब्बत की गीत सुना दे।

दिल पर पत्थर रख बैठा जहां,
माहौल खुशनुमा बना दे।
शहर आईना निहार बैठा,
कोई तो चिराग जला दे।

शांति वीरान हुए जुल्म बहुत,
यारी पक्की करा दे।
सूख गई स्याह गुलशन की,
महफिल का रंग जमा दे।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — कोई भी कार्य कितना भी कठिन क्यों न हो, जब इंसान सच्चे मन से उस कार्य को करना चाहे तो, वह कार्य आसान हो जाता है। बस जरूरत है सच्चे मन से दृढ़ता के साथ उस कार्य की शुरुआत कर पूर्ण करने की।

—————

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यह कविता (मनुष्य की चाह।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

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मौसम बुलाने की कोशिश।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मौसम बुलाने की कोशिश। ♦

मौसम इशारों से बुलाने की सोचिए,
रुठा वह तो उसे मनाने की सोचिए।
जमाने में कोई दिवाना नहीं है तेरा,
गर मचले, सीने से लगाने की सोचिए।

ख़त लिख दी, एक प्यार की बातें,
तनहाई रंगीन बनाने की सोचिए।
जाग रहे मुझे अच्छा नहीं लगता,
अंधेरे की नींद चुराने की सोचिए।

मौसम मिजाज बढ़ चढ़ दिखाएं,
उमड़े ख्वाब दिखाने की कीजिए।
दिल को खुद समझाने की सोचिए,
पूर्वजों की थाती सजाने की सोचिए।

नदियां – झरना बचाने की सोचिए,
धरा पर पौधा लगाने की सोचिए।
कूड़ा – करकट हटाने की सोचिए,
मौसम धीरे से बुलाने की सोचिए।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — मनुष्य के द्वारा प्राकृतिक संसाधन के असंतुलित दोहन प्रकृति का संतुलन बिगाड़ रहा हैं। अगर चाहते हैं की आने वाली पीढ़िया सुखमय जीवन जिए तो – आओ हम सब मिलकर ये संकल्प ले की सभी को प्रत्येक वर्ष कम से कम 1 पेड़ जरूर लगाना है, और उसका देखभाल भी करना है, तब तक जब तक वो पेड़ अच्छे से अपना बचाव और बढ़ाव खुद न करने लगे। जब ज्यादा पेड़ होंगे वर्षा भी अच्छी होगी जिससे नदियां – झरना सब जल से भरपूर होंगे, चारो तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ होंगी। हमें साफ – सफाई का भी ध्यान रखना है कहीं भी यूँ ही कूड़ा – करकट नही करना हैं।

—————

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यह कविता (मौसम बुलाने की कोशिश।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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