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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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Hindi Shayari

संवेदना।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ संवेदना। ♦

अरे भाई, न जाने इस भूपटल पर,
क्यों आज संवेदनाएं खो गई है?
विकल – व्यथित है बच्चा – बच्चा,
समूची मानवता क्यों रो रही है?

मानव – मानस में सिर्फ स्पर्धाएं रह गई,
सारा संवेदन खो गया।
आदमी – आदमी से लड़ – भीड़ रहा है,
न जाने यह क्या हो गया?

कहां तो थे यहां चौरासी से ऊपर,
मानव – मानस के कोमल भाव।
परहित में अपनी जाने गवा दी,
अब कहां गया वह मानव पड़ाव?

महल – अटालिकाएं खूब बनाई,
भाई – भाई में रहा न संवेदन – प्रेम।
बेहाता बहने पराई हो गई अब,
कौन पूछता है, उनका योग – क्षेम?

सास – ससुर से छुटकारा हो कैसे?
बहू – बेटियां भी ऐसा चाहती है।
जब बूढ़ों को ठुकराते बेटे उनके,
तब मानव संवेदना शर्मसार हो जाती है।

धान में सुलगी आग आज तो,
पराल भी कल जल जाएगा।
न जाने इन पश्चिम के अनुयायियों को,
यह सत्य समझ कब आएगा?

संवेदनहीन मानव, “मानव” कहां फिर?
वह पशु से भी बड़ा ढोर बन जाएगा।
यूं गिरता मानव – मानस कल तक,
समाज को, गर्त में ही ले जाएगा।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — “दिल की गहराई तक जो पहुंच कर अपने अनुभव कराएं संवेदना वह मानसिक प्रक्रम है, जो आगे विभाजन योग्य नहीं होता। यह ज्ञानेन्द्रियों को प्रभावित करने वाली उत्तेजना द्वारा उत्पादित होता है, तथा इसकी तीव्रता उत्तेजना पर निर्भर करती है, और इसके गुण ज्ञानेन्द्रिय की प्रकृति पर निर्भर करते हैं।” जब माता-पिता बूढ़े हो जाते है तो आजकल के युवा पीढ़ी द्वारा खासकर नई नवेली बहु द्वारा बूढ़े सास-ससुर का अनादर व खरी-खोटी बोलना उन्हें अंदर तक झकझोर कर रख देता हैं। ये युवा पीढ़ी यह कैसे भूल जाते है की जो वह जो अपने माता-पिता के साथ कर रहे है… उनका अपना पुत्र भी उनके साथ वैसा ही करेगा। एक बात याद रखे कभी भी आप अपने माता-पिता का अनादर कर जीवन के किसी भी क्षेत्र में तरक्की नही कर पाएंगे, माता-पिता का आशीर्वाद ही आपके सफलता का सीढ़ी बनता हैं। इसलिए कभी भी अपने माता-पिता का अनादर ना करें, वर्ना जीवन में कभी भी सुखी नहीं रह पाएंगे।

—————

यह कविता (संवेदना।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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वाणी वंदना।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ वाणी वंदना। ♦

शारदा मां, हंसासिनी,
मन वाणी शुभ कर्म।
अवसर सेवा देना,
मां सत्य ज्योति देना।

देवांगना सुहासिनी,
ध्वनि रस मनोभाव।
कला का विन्यास देना,
त्याग सत वृत्ति देना।

ध्यायिनी वीणा वादिनी,
अर्थ रमणीयता में।
दृश्य का विधान देना,
प्रीति सुकाज देना।

सत्यज्ञानी सुभाषिनी,
देश सेवा मंत्र देना।
भाव कला शब्द शैली,
नीति संगति देना।

♦ प्रो• मीरा भारती जी – पुणे, महाराष्ट्र  ♦

—————

  • “प्रो• मीरा भारती जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से बताने की कोशिश की है — शारदा मां के गुणों और शक्तियों का वर्णन किया है। मां से प्रार्थना कर रही है मन, वाणी व सुबह कर्म करने की शक्ति देना, मन में हो सदैव सेवा भाव, सत्य की ज्योति सदैव ही जलती रहे मन में मां। वाणी में मधुरता देना व कला का गन विन्यास देना, त्याग सत वृत्ति देना मां मुझे। मेरी आँखे हमेशा कल्याणकारी शुभ ही देखे ऐसी शक्ति देना मां। मेरे मन के अंदर सदैव ही अपनी जननी मातृभूमि की सेवा का भाव देना मां। मेरी संगती अच्छी हो, नियमित व संयमित जीवन हो मेरा ऐसा आशीर्वाद देना मां।

—————

यह कविता (वाणी वंदना।) “प्रो• मीरा भारती जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं से नई पीढ़ी को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम मीरा भारती (मीरा मिश्रा/भारती) है। मैंने BRABU Muzaffarpur, Bihar, R.S College में प्राध्यापिका के रूप में 1979 से 2020 तक सक्रिय चिंतन और मनन, अध्यापन कार्य किया, आनलाइन शिक्षण कार्यक्रम से वर्तमान में भी जुड़ी हूं, मेरे द्वारा प्रशिक्षित बच्चे लेखनी का सुंदर उपयोग किया करते हैं। मैंने लगभग 130 कविताएं लिखी है, जिसमें अधिक प्रकाशित हैं, कई आलेख भी, लिखे हैं। दृढ़ संकल्प है, कि लेखन और अध्यापन से, अध्ययन के सामूहिक विस्तारण से समाज कल्याण – कार्य के कर्तृत्व बोध में वृद्धि हो सकती है। अधिक सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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वरदान – प्राणवान वसुंधरा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ वरदान – प्राणवान वसुंधरा। ♦

केंद्रीय तत्व अस्तित्व विधान का,
सकार जीवन अग्नि यज्ञ समान।

हुताशन अजस्त्र प्रेरणा है,
शिक्षा समृद्धि प्रतिभा और विज्ञान।

आत्मसात करती दिव्य प्रबल प्रभाव संधान,
कौटुंबिकता सहृदयता शब्द और उदान।

नभमंडल का करता शुद्ध सद्गुण दैवी समान,
अनुगमन करता इहलोक का ज्ञान।

सामूहिक उत्कर्ष की सशक्त साधन पहचान,
यज्ञाग्नि की आहुति से सद्भावों का होता आविर्भाव।

अग्नि की दीपशिखा पर होता विषम दबाव,
प्रसस्त ऊर्ध्व उद्वेग से उत्ताल अग्निशिखा समान।

नाश कर भय प्रलोभन विषम का ताप,
संकल्प जिजीविषा मनोबल का करे उत्थान।

पांचजन्य उष्णता ऊर्जा और प्रकाश,
सदृश पावक पवित्र दाहक समान।

वायु रूप बनकर जड़-चेतन को करें प्रकाशवान,
गुप्त शत्रु का भेदने, करे धूमल मरुत समान।

श्लोकों की ध्वनि के गुंजन का ही विधान,
स्वाहा प्रचंड प्रभाव है स्वधा उसका संहार।

यज्ञाग्नि से लोक – परलोक सुधरे,
प्राणवान वसुंधरा के लिये है वरदान।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — हम सभी जानते है की भगवान ने अपने अंश से पंचतत्व यानि पृथ्वी, आकाश, वायु, अग्नि और जल का समावेश कर मानव देह की रचना की और उसे सम्पूर्ण योग्यताएं व शक्तियां भी देकर इस संसार में स्वच्छतापूर्वक जीवन बिताने के लिए भेजा है। पृथ्वी तत्त्व यानि जड़ तत्त्व, यह तत्व अनंत सहनशीलता को दर्शाता है व इस तत्त्व से मनुष्य अन्न, धन, धान्य से सम्पूर्ण होता है। इसमें विकार जब उत्पन्न होता है तब इंसान स्वार्थी हो जाता हैं। जल तत्व यानि शीतलता प्रदान करने वाला तत्व। इसमें मिलावट होने पर इसकी सौम्यता कम हो जाती है। अग्नि तत्व, विचार शक्ति में निर्णय करने में सहायक होता है विचारों के भेद अंतर को परखने वाली शक्ति को सरल सुचारु रूप प्रदान करता है। जब इसमें विकार आता है तब इंसान की सोचने समझने की शक्ति का ह्रास होने लगता है, और इंसान गुस्से वाला होकर अपना ही सर्वनाश करता है। वायु तत्व, मानसिक ऊर्जा तथा स्मृति शक्ति की क्षमता को पोषण प्रदान करता है। अगर इसमें विकार आ जाए तो इंसान की स्मरण शक्ति कम होने लगती है। आकाश तत्व, शरीर में आवश्यकतानुसार संतुलन को बनाए रखने का कार्य करता है। जब इसमें विकार आता है तब इंसान शारीरिक संतुलन खोने लगता है। जप, कीर्तन, भजन, यज्ञ-हवन, ध्यान साधना से मनुष्य का इस लोक के साथ-साथ परलोक भी सुधर जाता हैं।

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यह कविता (वरदान – प्राणवान वसुंधरा।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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हिन्दी काव्य दर्शन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हिन्दी काव्य दर्शन। ♦

जीवन शैली है, भागवत धर्म,
हृदय सहजात है, हमारा।

इक मुल्क, कौम, संगत है,
कोई कभी न पराया।
मन तरंग आत्म बोध से,
क्षण एक में जुटता गया।

झुकने न दिया अन्य को,
सम्मान दिया हर विचार को।
हर वर्दी के नीचे, है नाम,
इक मात वसुंधरा का।

हर आत्म तन्मय जन है यहां,
योगी, हर दिवा है अर्पित प्रेम।
यज्ञ को, थाहे कौन बुनियाद,
इस भरत जन ज्ञान – विज्ञान का।

घटक अनेक राम – कृष्ण के,
इस देश में, असंख्य जाति।
धर्म, वर्ग, पंथ हैं, सुर – ताल,
लय, मन के द्वार हैं एकल।

विभिन्नता ही है छवि सुभग,
इस महा जीवन – मंत्र श्रृंगार का।
मत – भेदी होते… एकमना,
प्रश्न आता जब राष्ट्र के सेवा अस्मिता का।

संभव है, क्रूर हो कोई दस्यु ,
अंगुलिमाल सम, भाव हो अशुभ।
बुद्ध का प्रेम, ले भावांजलि,
गढ़े शुभत्व, हर नर में राम का।

कौम है यह संगम प्रेम, संयम, क्षमा का,
न रहा कभी मत्स्य न्याय यहां।
जलधार है नेह, दया, सेवा, सुख है,
वैराग्य, सहयोग, सदाचार यहां।

अमर बेल से एकत्व से बनता,
विश्व धर्म जन मन संगीत सदा।
है जनाधार सत् चित् आनन्द का,
आत्मबल ही… मनमीत यहां।

हिन्दी ही जोड़े, गुण धर्म सभी के,
गुण ग्राहिता, हर जन सम्मान यहां।

♦ प्रो• मीरा भारती जी – पुणे, महाराष्ट्र  ♦

—————

  • “प्रो• मीरा भारती जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से बताने की कोशिश की है — अतुल्य हमारा भारत देश सबसे न्यारा है, यहां बहुत सारी जातियों और धर्म के लोग, अलग – अलग बोली भाषा के साथ रहते है फिर भी सभी के बीच एक बात कॉमन है, सभी अपने मातृभूमि से अटूट प्रेम करते है। हर भारतीय के अंदर अपने देश के प्रति सच्चा प्रेम है, देश के लिए कुछ भी कर गुजरने का जज्बा है। हम आध्यात्मिकता, अहिंसा और वसुधैव कुटुम्बकम वाले लोग है, हम सभी से प्यार करते है, हम कभी भी किसी का बुरा नही चाहते है। हम सदैव से ही पूरी मानव जाती के कल्याण के लिए कार्य करते आ रहे है।

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यह कविता (हिन्दी काव्य दर्शन।) “प्रो• मीरा भारती जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं से नई पीढ़ी को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम मीरा भारती (मीरा मिश्रा/भारती) है। मैंने BRABU Muzaffarpur, Bihar, R.S College में प्राध्यापिका के रूप में 1979 से 2020 तक सक्रिय चिंतन और मनन, अध्यापन कार्य किया, आनलाइन शिक्षण कार्यक्रम से वर्तमान में भी जुड़ी हूं, मेरे द्वारा प्रशिक्षित बच्चे लेखनी का सुंदर उपयोग किया करते हैं। मैंने लगभग 130 कविताएं लिखी है, जिसमें अधिक प्रकाशित हैं, कई आलेख भी, लिखे हैं। दृढ़ संकल्प है, कि लेखन और अध्यापन से, अध्ययन के सामूहिक विस्तारण से समाज कल्याण – कार्य के कर्तृत्व बोध में वृद्धि हो सकती है। अधिक सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं।

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भगवान धन्वन्तरि – धनतेरस।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भगवान धन्वन्तरि – धनतेरस। ♦

आयुर्वेद के हैं प्रणेता,
धनतेरस अवतरण दिवस।
समुद्र मन्थन की समाप्ति पर,
हुए प्रकट ले अमृत – कलश।

देवराज ने की जो विनती,
आग्रह उनका मान लिया।
अमृत कलश से सब देवों ने,
अमृत सुधा का पान किया।

दीर्घतथा माता हैं उनकी,
लिखा है विष्णु पुराण में।
श्यामवर्ण चतुर्भुज हैं निपुण,
वनस्पतियों के ज्ञान में।

विनीत भाव से बोले इन्द्र,
आयुदाता भगवान से।
स्वीकार करो पद देव – वैद्य,
हे… तेजपुंज सम्मान से।

कालक्रम में मानव जगत के,
बहु रोगों से पीड़ित हुए।
कल्याण हेतु सकल जगत के,
वे धरा पर अवतरित हुए।

अवतार लिया काशी नगरी,
कहलाए नृप दिवोदास।
लिखा ग्रन्थ ‘धन्वन्तरि संहिता’,
रोग निवृत्ति का इतिहास।

आदि आचार्य सुश्रुत मुनि ने,
उनसे ज्ञान प्राप्त किया।
धन्वन्तरि से हो कर दीक्षित,
लोगों का कल्याण किया।

धनतेरस की तिथि है पावन,
श्रद्धा से सम्मान करें।
प्रसन्न हों भगवान सभी पर,
तन निरोगी, प्रदान करें।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

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  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वन्तरि हैं। यूं तो प्राचीन काल से ही आयुर्वेद में जटिल से जटिल रोगों का इलाज होता आया है। और तो और कोविड काल में हर व्यक्ति आयुर्वेद के महत्व से भी अच्छे परिचित हो गया। आयुर्वेदिक दवा स्वर्णप्राशन को तो स्वयं आयुष मंत्रालय ने रिसर्च के बाद कोविड में बच्चों के इलाज में सर्वाधिक इम्युनिटीवर्धक घोषित भी किया और लोगों को इससे लाभ भी हुआ।

—————

यह कविता (भगवान धन्वन्तरि – धनतेरस।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी मुक्तक/कवितायें/गीत/दोहे/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई आई टी . शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक. समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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राम : द्वारा दुष्टों का संहार।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ राम : द्वारा दुष्टों का संहार। ♦

राजा दशरथ के सत्य वचन की रक्षा में,
श्रीराम राज पाठ छोड़ कर वन में निकले।
वन में वे चलते चलते जब थक जाते,
हनुमान और लखन उनका पांव दबाते॥

सहन नहीं कर पाते कुमारी से पांव दबवाना,
जनक नंदिनी सुकुमारी जानकी जी को सबने माना।
श्रीराम के वक्ष: स्थल में जिसे सम्मान मिला,
उन्हें लक्ष्मी – सीता जी का ही नाम मिला है॥

लक्ष्मण द्वारा रावण की बहन सूर्पनखा का,
नाक कान काटने से,
अपनी प्रियतमा का वियोग उन्हें सहना पड़ा।
वियोग के कारण उनकी क्रोध में तनी भौहों से,
भारी समुद्र को भी भयभीत होना पड़ा॥

लंका जाने के लिए एक पुल बाधा गया,
समुद्र ऊपर पुल से सेना लंका कूंच किया।
पहले ही वीर हनुमान ने लंका को जैसे जला दिया।
जस जंगल की दावाग्नि जले वैसे ही मिटा दिया॥

सीता स्वयंबर में शिव का धनुष जिसको,
बड़ा – बड़ा वीर योद्धा भी हिला नहीं पाया।
गुरु का आदेश मिलते ही बात – बात में राम ने,
डोरी चढ़ा खींच कर दो टुकड़ा उसका कर दिया॥

पिता वचन शिरोधार्य कर स्वजन छोड़ जंगल  पयान,
योगी जैसे काया छोड़ चलता है अपने धाम।
खर दूषण, तृषिरा जैसे राक्षसों का संहार किया,
महा धनुष बाण चला कर दुष्टों पर वार किया॥

पर्ण कुटी तक स्वर्ण हिरण भेष में छुपे मरीच आया,
श्री राम ने उसको भी दौड़ा कर मार गिराया।
दक्ष प्रजापति को जैसे वीरभद्र ने मारा था,
उसी तरह श्री राम ने उसका पीछा कर संहार किया॥

सुग्रीव का बड़ा भाई बलवान और था आतताई,
बालि हरण कर सुग्रीव की पत्नी को घर लाया।
वचन देकर सुग्रीव को श्री राम ने उसको मारा,
मार उसे राम ने वचन और मित्रता का धर्म निभाया॥

राम और रावण की सेना में भीषण युद्ध हुआ,
एक एक कर क्रमश: रावण के वीरों का संहार किया।
जब श्री राम जी के सम्मुख था रावण आया,
शिरोमणि राम ने अभिमानी को फटकार लगाया॥

मेरी अनुपस्थिति में प्राण प्रिया मेरी हर कर लाया?
काल को कोई टाल नहीं सकता तेरी सामत आई!
वज्र समान वाण चलाया, खून फेंक दिया रावण वहीं,
रावण का हृदय विदीर्ण हुआ वह हुआ धरासाई॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में — समय समय पर रावण से लेकर खर दूषण, तृषिरा जैसे राक्षसों का संहार किया – मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी ने, बहुत ही खूबसूरत वर्णन किया है।

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यह कविता (राम: द्वारा दुष्टों का संहार।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जगत जननी का परित्याग।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जगत जननी का परित्याग। ♦

पता क्या जगत जननी सीता को,
फिर जंगल में जाना होगा।
घनी पश्चिम की पहाड़ी के जंगल में,
जीवन उन्हें बिताना होगा।

श्रीराम के निर्मल देह पर,
मृग – चर्म जूट जटाएं फाहरेंगी।
हवन चंदन गंध व दहकते,
गुगल से ऋचाएं होंगी।

रथ साथ सारथी पुत्रवत लखन,
घने जंगल में छोड़ेंगे।
जिसने अपने जीवन में,
सीता के मुख नहीं देखे होंगे।

पर विधाता का लिखा लिखनी,
कौन मिटा सकता है यहां।
वहीं विश्व विख्यात विधाता,
सीता को जंगल पहुंचा सकता जहां।

धैर्य – धर्म की मूर्ति मई कल्याणी तुम,
खंडित व्यक्तित्व लिए विलख रही।
सच कहूं प्रिय! मेरी सीते!
मैं राम तत्वों का आदर्श लिए थक रहा।

विवश हूं प्रजा की बात पर,
धर्म की मर्यादा और राज पाठ पर।
स्वयं दंड दूंगा मैं अपने आप को,
धर्म की धात्री तुम अयोध्या राज की।

लोका पवाद में घिरा अवध की,
शाम मंत्रणा राज लखन से बोले राम।
राजा का राज्य पर निष्ठा निर्विवाद,
विधि के विधान पर किसका अधिकार।

संकल्पों का विकल्प नहीं होता,
वैराग्य धर्म बन वासी मेरी नियति।
विकल्प केवल सीता का परित्याग,
प्रिये मेरी अभिन्न अंग हो, ना होना खिन्न।

मेरी निर्णय को कहना ना तू कठोर,
सीता कल निर्वासन का है भोर।
अभिषेक करेगी तेरी वन्य भोर,
संदेशवाहक दिल से निकलेगा चोर।

रथारूढ़ जाना गंगा तट पर लेकिन,
उद्घाटित अभी करना ना भेद गूढ़।
लक्ष्मण राम के मंत्रणा परिपूर्ण,
आरण्य निकट सीते को छोड़ना तुम।

देना धो आंचल का उभरा कालुष्य,
रूधने लगा कहते कंठ राम।
बिकट लगा उस संध्या का गुंजा शूल,
कर प्रणाम अस्ताचल ढल गया सूर्य।

छलक उठे लक्ष्मण के भरे नैन,
थरथर कांप उठा धरती का स्वर्ग मौन।
देख रहा मौन रहकर राजमहल,
धार सरयू की हुई स्तब्ध अंतर्मन।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – जगत जननी माता सीता जी का परित्याग, करते समय श्री राम जी के मनःस्थिति का खूबसूरत वर्णन किया है। माता सीता जी से श्री राम जी कहते है “धैर्य – धर्म की मूर्ति मई कल्याणी तुम खंडित व्यक्तित्व लिए विलख रही। सच कहूं प्रिय! मेरी सीते! मैं राम तत्वों का आदर्श लिए थक रहा। विवश हूं प्रजा की बात पर धर्म की मर्यादा और राज पाठ पर। स्वयं दंड दूंगा मैं अपने आप को धर्म की धात्री तुम अयोध्या राज की।”

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यह कविता (जगत जननी का परित्याग।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने की राह में कौन बना है रोड़ा?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने की राह में कौन बना है रोड़ा? ♦

भारत के हिन्दी भाषी क्षेत्रों के अधिकांश पढ़े-लिखे लोग भी यही मानते है कि भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी है। यह जरूर है कि भारतीयों ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा मान लिया है परंतु हमें शायद यह ज्ञान नहीं है कि संवैधानिक तौर पर हिन्दी आज भी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है। भले ही समूचे विश्व में हिन्दी को जानने वाले लोगों की तादाद 200 करोड़ से अधिक हो चुकी है, पर हिन्दी को अपने देश में न्याय नहीं मिल पाया है।

इतना ही नहीं संस्कृत भाषा की तकनीक को संगणकीय पृष्ठभूमि पर खरा पाए जाने के कारण आज हिन्दी को वैश्विक भाषा के रूप में प्रतिस्थापित किए जाने की मुहिम शुरू हो चुकी है क्योंकि संस्कृत तो अब अधिकतर चलन की भाषा नहीं रही, पर उससे उद्भूत हिन्दी को यह सम्मान दिए जाने की पूरी पैरवी की जा रही है। पर भारत में हिन्दी नगण्य क्यों है? इसके लिए हमें इतिहास से लेकर वर्तमान तक को एक नजर में जरूर देखना होगा।

इतिहास से लेकर वर्तमान तक को एक नजर में।

भारतीय इतिहास का ज्ञान रखने वाले प्रत्येक भारतीय को यह पूरी तरह से मालूम है कि हजारों वर्ष तक भारत की भाषाएं राजकाज के कार्यों से विदेशी आक्रांताओं की शासकीय पकड़ के चलते नदारद रही। मुगल शासन काल में राजकाज की भाषा अरबी और फारसी रही और उसके बाद अंग्रेजी शासन काल में यह स्थान अंग्रेजी ने लिया। भारत को अंग्रेजों के चंगुल से छुड़ाने के लिए आजादी की लड़ाई लड़ने वालों का एक लंबा चौड़ा इतिहास है।

उसी इतिहास में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एक विशेष स्थान रखते हैं। उन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए विशेष प्रयास किए थे। इसी के चलते उन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने के लिए सन 1917 में भरूच (गुजरात) में पहली बार हिंदी को राष्ट्रभाषा का नाम दिया था। इस मुहिम में नेहरू जी ने भी गांधी जी का साथ दिया था, यह भी पढ़ने को मिलता है। इसी के चलते आजादी के बाद इस मुद्दे पर भारतीय नेताओं के दो गुट बने, जिसके चलते संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को मुंशी आयंगर समझौते के तहत हिन्दी को संस्कृत की लिपि देवनागरी में टंकित किए जाने और राजभाषा का दर्जा दिए जाने की बात स्वीकार की।

भारतीय संविधान में केवल दो ऑफिशियल भाषाओं को स्थान।

भारतीय संविधान में केवल दो ऑफिशियल (राजभाषा भाषाओं) भाषाओं (अंग्रेजी और हिंदी) को स्थान दिया गया है। वहां किसी भी राष्ट्रभाषा का जिक्र न होने के कारण शायद हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने के संदर्भ में एक बहुत बड़ा अड़ंगा बन गया है। इसमें यह भी जिक्र किया गया था की 26 जनवरी 1950 को भारत के संविधान के लागू होने से लेकर 26 जनवरी 1965 तक धीरे-धीरे अंग्रेजी का प्रयोग शासकीय कार्य में कम किया जाएगा और 15 सालों के बाद हिन्दी में ही भारत के शासकीय कार्य किए जाने हैं।

1950 में संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के तहत देवनागरी लिपि में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया गया। ये राजभाषा संबंधी प्रावधान संविधान में अनुच्छेद 343 से 351 तक अंकित किए गए हैं। 14 सितंबर 1953 को राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के अनुरोध पर पहली बार हिंदी दिवस मनाया गया था। धीरे-धीरे हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की मुहिम और तेज होने लगी। इसमें हिन्दी के पक्षधर नेता बालकृष्ण और पुरुषोत्तम दास टंडन के आंदोलनों ने विशेष भूमिका निभाई।

1960 में राष्ट्रपति के आदेश पर इस संबंध में एक आयोग बना। 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित हुआ जिसके तहत राजभाषा के प्रयोग से सम्बन्धित तीन क्षेत्र क, ख, ग बनाए गए। इस अधिनियम में यह तय किया गया कि हिन्दी और अंग्रेजी के अलावा अन्य भाषा में किए गए पत्राचारों के जवाब:-

1. क क्षेत्र के राज्यों को हिन्दी में ही दिए जाएंगे।
2. ख क्षेत्र से प्राप्त अन्य भाषाई पत्रों का जवाब 60% हिन्दी और अंग्रेजी में तथा बाकी 40% सिर्फ अंग्रेजी में ही दिए जाएंगे।
3. ग क्षेत्र से प्राप्त ऐसे पत्राचारों का जवाब 40% हिन्दी और अंग्रेजी में और बाकी सिर्फ अंग्रेजी में दिया जाएगा।

ये प्रावधान संविधान में निर्दिष्ट संविधान लागू होने की 15 सालों के बाद हिन्दी को अधिमान दिए जाने के तहत किए गए।

द्विभाषी पद्धति को मान्यता।

1965 में जब कांग्रेस सरकार ने पूरे भारत में हिंदी के प्रयोग को सर्वत्र अनिवार्य किए जाने पर चर्चा की तो तमिलनाडु में इसके विरोध में हिंसक प्रदर्शन हुए। भले ही ये प्रदर्शन राजनीति प्रेरित थे, परंतु कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने इन प्रदर्शनों को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया कि जब आजादी के 15 साल बाद भी पूरे भारत के सभी राज्य हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में ग्रहण करने को तैयार नहीं है तो यह फैसला वापस ले लेना चाहिए। इसी के चलते सन 1967 मैं पुनः 1963 के राजभाषा अधिनियम को संशोधित किया गया और पुनः शासकीय कार्य में राजभाषा के रूप में द्विभाषी पद्धति को मान्यता प्रदान की गई। ये दो भाषाएं वहीं पूर्व की अंग्रेजी और हिन्दी थी।

1971 मैं क्षेत्रीय भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में जोड़ने की कवायद तेज हुई। इसमें आजादी के समय में तो 14 भाषाएं जोड़ी गई थी। बाद में ये 17 हुई और अब 2007 तक इनकी संख्या 22 हो चुकी है। एक यह भी मुहिम चली कि इन्हें भी राजभाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए। ये भारतीय संविधान में भाषा अधिनियम के तहत भाषाएं तो स्वीकारी गई परंतु राजभाषा का दर्जा इन्हें पूर्ण तौर से नहीं दिया गया शायद।

फिर 1976 में राजभाषा अधिनियम की धारा 4 के तहत राजभाषा संसदीय समिति बनाई गई, जिसने राष्ट्रपति की अनुशंसा पर राजभाषा नीति बनाकर लागू की। अब राजभाषा विभाग मासिक, त्रैमासिक और अर्धवार्षिक सतत निगरानी व विश्लेषण भी करता है और समेकित रिपोर्ट 30 सदस्यों वाली (जिसमें 10 सदस्य राज्यसभा तथा 20 सदस्य लोकसभा के होते हैं) संसदीय राजभाषा समिति को सौंपता है। यह संसदीय समिति अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपती है।

हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने के संबंध में गुजरात हाईकोर्ट में भी एक याचिका दायर की गई थी। 25 जनवरी 2010 को इस याचिका का फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों के आधार पर यह निर्णय दिया था कि जो दलीलें भारत में अधिकतर लोग हिन्दी भाषा बोलने और जानने वाले हैं आदि – आदि के आधार पर दी जा रही है। वे कहीं भी किसी रिकॉर्ड में अंकित नहीं है और न ही इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा किसी रिकॉर्ड में अंकित है। इसके अलावा संविधान में भी हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने की बात अंकित नहीं है। अतः यह पैरवी निराधार है। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद यह मामला पुनः ठंडे बस्ते में चला गया।

मुख्यतः चर्चित विवाद।

रही बात हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने वाले गुट और न देने वाले गुट की तो उसमें मुख्यत ये विवाद चर्चित रहे:-

1. हिन्दी का विरोध करने वाले गुट का यह मानना है कि जब भारत के 29 में से 20 राज्यों में हिन्दी बोलने वाले लोग बहुत ही कम है, तो फिर हिंदी को ही राष्ट्रभषा का दर्जा क्यों दिया जाए? राष्ट्रभाषा तो वह होनी चाहिए जिसे समूचे देश के अधिकतर भागों के लोग जानते, बोलते और समझते हो।

2. जो राज्य हिन्दी भाषी चिन्हित किए भी गए हैं, उनमें भी अधिकतर क्षेत्रों में जनजातिय और क्षेत्रीय भाषाएं बोली और समझी जाती है। ऐसे में उन्हें भी हिन्दी भाषी चिन्हित करना न्याय संगत नहीं है।

3. हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने वालों की यह दलील कि देश की पूर्ण जनसंख्या का 50% हिस्सा हिंदी बोलता और समझता है तथा शेष गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रों के लोगों का भी 20% हिस्सा हिन्दी समझता है। ऐसे में हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिला ही चाहिए।
उस पर विरोधी विद्वान टिप्पणी करते हैं कि जिन 50% लोगों की आप बात करते हैं, उनमें से अधिकतर जनजातिय और क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग करते हैं। तो फिर वे हिन्दी भाषी कैसे सिद्ध हुए?

4. हिन्दी विरोधी विद्वानों का तर्क यह भी है कि भारत में हिंदी से भी पुरानी तमिल, कन्नड़, तेलुगू , मलयालम, मराठी, गुजराती, सिंधी, कश्मीरी ओड़िया, बंगला, नेपाली और असमिया जैसी भाषाएं हैं। तो ऐसे में इनसे कहीं बाद दिल्ली के आसपास की चर्चित खड़ी बोली से विकसित हिन्दी को कैसे राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाए?

तर्क – वितर्क का यह सिलसिला तो तब तक चलता ही रहेगा जब तक किसी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल जाता। चर्चा में तो यह भी एक विषय उठता है कि संविधान सभा के समक्ष नेहरू जी ने यह भी प्रस्ताव रखा था कि हिन्दी और अंग्रेजी दोनों को ही राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाए, परंतु वह प्रस्ताव भी खारिज कर दिया गया था। खैर कुछ भी हो। किसी भी राष्ट्र की निजी पहचान और उन्नति के लिए उसकी अपनी राष्ट्रभाषा का होना बहुत जरूरी होता है। इस संबंध में हमारा भारत देश आज तक बौना है। एन डी ए सरकार ने 2014 में अपने मंत्रियों और अधिकारियों को सारे शासकीय कार्य हिन्दी में करने की हिदायत जरूर दी थी, परंतु हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के संदर्भ में वह भी चुप्पी साधे है।

मानसिक रूप से आज भी हम अंग्रेजी के गुलाम है।

बड़े हैरत में डालता है संविधान समिति का वह निर्णय, जिस निर्णय ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं बल्कि राजभाषा का दर्जा दिलाया। सब जानते हैं कि एक लंबी जद्दोजहद के बाद भारत मुश्किल से अंग्रेजों की गुलामी से छुटकारा प्राप्त करता है। असल में यह गुलामी आज भी बरकरार है। यह सत्य है कि भारत का प्रत्येक नागरिक शारीरिक रूप से आज अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हो चुका है, परंतु इस सत्य को भी झूठलाया नहीं जा सकता कि मानसिक रूप से आज भी हम अंग्रेजी के गुलाम है।

14 सितंबर 1949 को हमारे संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो दिया गया, परंतु हिंदी की हालत आज भी ऐसी है कि मानो अपने ही घर में अपनी ही मां के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा हो। न्यायालय की बड़ी-बड़ी टिप्पणियां, बहसें और न्याय प्रक्रिया के बाद आने वाले निर्णय के लिखित प्रारूप, चिकित्सा व्यवस्था की सारी लिखित और मौखिक जानकारी, शिक्षा व्यवस्था के वैज्ञानिक पहलुओं का लिखित एवं मौखिक ढांचा तथा अधिकतर उच्च प्रतियोगिताओं की परीक्षा भाषा आज भी अंग्रेजी ही बनी हुई है।

इतना ही नहीं, ये सब प्रारूप इतने जटिल और दुरूह होते हैं कि इन व्यवसायों और प्रक्रियाओं पर जिसने शिक्षा प्राप्त नहीं कर रखी है, उस शिक्षित व्यक्ति को भी इन प्रारूपों और व्यवस्थाओं की भाषा शैली को समझाने के लिए, इन्हीं व्यवसायों में काम करने वाले लोगों के पास जाना पड़ता है।

भले ही इन व्यवसायों के अंतर्गत काम न करने वाला व्यक्ति कितना ही पढ़ा लिखा क्यों न हो? या यूं कहें कि उसे अंग्रेजी का कितना ही अच्छा ज्ञान क्यों न हो फिर भी उसे इन प्रारूपों और व्यवस्थाओं को समझने में कहीं न कहीं दिक्कत आ ही जाती है। ऐसे में उसे पढ़ा – लिखा होने के बावजूद भी कई बार लाखों का खर्चा मात्र इन चीजों को समझने और समझाने के लिए ही मुफ्त में करना पड़ता है।

प्रायोजित साजिश तो नहीं है?

समझ ही नहीं आता कि आखिर क्यों इन व्यवस्थाओं को आजादी के आज 74 साल बाद भी अंग्रेजी में प्रारूपित किया जाता है? किया भी जाता है तो फिर भी सवाल उठता है कि क्यों इतना जटिल भाषा शैली में यह सब लिखा जाता है? और देखिए! राजस्व विभाग की भाषा शैली आज भी मुगलिया सल्तनत के दौर की ही बरकरार है। फिर तो जहन में सवाल कौंधे गा ही कि कहीं यह एक सोची-समझी और प्रायोजित साजिश तो नहीं है?

भारत की अधिकांश जनता हिन्दी बोलती है, हिन्दी जानती है और हिन्दी समझती है। उसके बावजूद भी हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा आज तलक प्राप्त नहीं हो सका। राजभाषा होने के बावजूद भी राजकाज के अधिकतर कार्य आज तक अंग्रेजी में ही संपादित किए जाते हैं। सबसे बड़ी हैरत तो तब होती है, जब एक छोटे से छोटे कार्यालय का सामान्य दस – बारह पढ़ा-लिखा बाबू भी बड़े रूआब से जवाब देता है, “सर अंग्रेजी में बोलिए अंग्रेजी में, हिन्दी मुझे लिखनी नहीं आती।”

भले ही उसे अंग्रेजी समझ नहीं आती हो पर चिट्ठी वह भी अंग्रेजी में ही लिखता है। फिर चाहे उसे उसके लिए नकल ही क्यों ना मारनी पड़े? फिर हर कार्यालय में वही रटी रटाई अंग्रेजी की प्रारूपित चिट्ठियां अंग्रेजों के जमाने से आज तक प्रचलित है। कोई कुछ नया अपनी मौलिक शब्द शक्ति के साथ करना चाहे, तो कार्यालय के बड़े अधिकारी पुनः ड्राफ्टिंग करवाते हैं। यानी नकल करो बस। नया बिल्कुल भी न सोचो। यह उनका दोष नहीं है। यह तो हमारी अंग्रेजी मानसिकता का दोष है।

अंग्रेजी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने का भूत।

आज के दौर में तो एक और नया भूत लोगों पर सवार हुआ है। अंग्रेजी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने का भूत। बड़े-बड़े कान्वेंट स्कूल में तो व्यवस्था यह भी है कि बच्चों को दाखिल करवाने से पहले उनके अभिभावकों का टेस्ट होता है। यदि उन्हें अंग्रेजी बोलनी और समझनी न आए तो उनके बच्चों को इन कॉन्वेंट स्कूलों में दाखिला नहीं दिया जाता। ऐसी स्थिति में उन अभिभावकों को मायूस होना पड़ता है। आखिर इसमें बच्चों का क्या दोष?

भले ही हिन्दी स्कूल कितना ही अच्छा क्यों न हो? वहां पर कितने ही पढ़े लिखे और प्रशिक्षित अध्यापक क्यों न हो? फिर भी लोगों की मानसिकता शटर में चलने वाले अंग्रेजी स्कूलों के प्रति इतनी दृढ़ है कि जिसे तोड़ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

जब किसी कारोबार की बात होती है तो तब सारा का सारा बड़ा कारोबार हिन्दी में किया जाता है। राजनीति की भाषा (भाषण)हिन्दी। फिल्मी कारोबार की भाषा हिन्दी। प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अधिकतम भाषा हिन्दी।

अरे भाई जब अंग्रेजी इतनी महत्वपूर्ण है तो फिर ये सब कारोबार भी अंग्रेजी में ही क्यों नहीं करते हो? सवाल तो बनता है। शायद इसलिए कि इन कारोबारों का उपभोक्ता या मतदाता आम व्यक्ति है, जिसे अंग्रेजी नहीं आती। कमाई तो उसी से करनी है। कमाने के लिए हिंदी और भुनाने के लिए अंग्रेजी। वाह! यह कैसी आजादी और कैसी व्यवस्था?

संत श्रेष्ठ तुलसीदास जी।

हमें याद है कि संत श्रेष्ठ तुलसीदास जी ने संस्कृत की अधिकृतता को चुनौती देते हुए अवधि में जब रामायण को लिखना शुरू किया था तो लोगों ने उनकी प्रतिलिपि को ही पानी में फेंक दिया था। क्योंकि संस्कृत को जानने वाले वर्ग के भीतर एक खासा आक्रोश था, कि कहीं यह महान ग्रंथ आम जन भाषा में संपादित हो गया तो हमारी प्रतिष्ठा और रोटी को बट्टा लग सकता है।

जिस तरह से वे नहीं चाहते थे कि आम जनता को इस समूची महाविद्या का सरल ज्ञान हो जाए, ठीक उसी तरह आजाद भारत का एक तथाकथित प्रतिष्ठित और शारीरिक रूप से आजाद तथा मानसिक रूप से अंग्रेजी का गुलाम वर्ग भी शायद यह नहीं चाहता कि भारत की आम जनता को उसकी जन भाषा में उपरोक्त सभी जटिल भाषाई पहलुओं के साथ जटिल विषयों का ज्ञान प्राप्त हो जाए। यदि ऐसा हुआ तो सभी व्यक्ति कानून के अच्छे खासे जानकार हो जाएंगे। सभी को चिकित्सा संबंधी और राजस्व संबंधी सूक्ष्म से सूक्ष्म जानकारियां स्वयं प्राप्त हो जाएगी।

आम जनता का मेहनती और बुद्धिमान बच्चा बड़े-बड़े ओहदों को प्राप्त कर लेगा। जनता इतनी चालाक हो जाएगी कि वह हुक्मरानों, अफसरानों और बड़े – बड़े कारोबारियों के नको दम कर देगी। अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। इसके बिना आज की दुनियां में जीना असंभव है। आदि – आदि बातें इतनी ज्यादा सशक्त नहीं है, जीतने की इन तथाकथित अंग्रेजी मानसिकता के गुलाम लोगों के निजी स्वार्थ है।

शिक्षा संबंधी एक बार खड़ी करना चाहते हैं।

ये लोग जानबूझकर आम जनमानस और विशिष्ट जनमानस के बीच में शिक्षा संबंधी एक बार खड़ी करना चाहते हैं ताकि इनकी और इनके परिवारों की प्रतिष्ठा और विशिष्टत्व बना रहे। बाकी जनमानस इनके आगे हाजिर सलामी करता रहे। यदि ऐसा नहीं है तो फिर विश्व के अनेक विकसित देशों के लोग अपनी भाषा को महत्व देकर तरक्की क्यों कर रहे हैं।

उदाहरण के तौर पर हमारे पड़ोसी देश चीन को ही लिया जाए। क्या वह वैश्विक धरातल पर खड़ा नहीं हुआ है? खड़ा होना ही नहीं बल्कि उसे तो वैश्विक धरातल पर दौड़ना आता है।

यह बात अलग है कि आज वह करोना, सीमा विवादों, तथा कूटनीतिक राजनीतिक हलचलों के चलते चौतरफा घिरा हुआ है, परंतु इस सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि उसने आज जो तरक्की प्राप्त की है वह अपनी भाषा के बलबूते ही प्राप्त की है।

उसने सूक्ष्म से सूक्ष्म विज्ञान को अपनी जन भाषा में लोगों को मुहैया करवाया और प्रत्येक व्यक्ति को इतना दक्ष बनाया कि वह छोटे से लेकर बड़ा प्रोडक्ट तैयार करने के लिए सक्षम है।

हमारे भारत में हमारे बच्चों की आधी जिंदगी तो अंग्रेजी सीखने में ही गुजर जाती है। जब उसे अंग्रेजी का थोड़ा बहुत ज्ञान होता है तो तब वह कहीं वैज्ञानिक पहलुओं को समझने लगता है। जितने को वह इन वैज्ञानिक पहलुओं की थोड़ी सी समझ तैयार करता है, उतने को उसकी जिंदगी ढल चुकी होती है।

मुझे राष्ट्रभाषा का दर्जा दो।

हमारी तो आज हालत यह है कि हम न तो अंग्रेजी के हो पा रहे हैं और न ही हिन्दी के रह गए हैं। हिंदी ने हर भाषा को अपने भीतर समेटा। तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी आदि विशाल शब्दकोश के साथ अब हमारे सामने खड़ी है। हमें पुकार रही है कि “मैं तुम्हारे हिसाब से हर तरह से ढलने को तैयार हूं, पर तुम मेरा दर्द समझो और मुझे राष्ट्रभाषा का दर्जा दो। मुझे हजारों सालों से आक्रांताओं के द्वारा कुचलने की पूरी कोशिश की गई, पर मैं तुम्हारे लिए आज तक जिंदा हूं।”

दुख तब होता है जब आजादी के इतने लंबे दौर के बाद भी हम अपने देश की जन भाषा को राष्ट्रभाषा का सम्मान नहीं दे पा रहे हैं। माना कि उस दौर में सब कुछ अंग्रेजी में और मुगलिया सल्तनत की भाषा शैली में प्रारूपित था। उस सब को एकदम से तब्दील नहीं किया जा सकता था।

परंतु आज तक तो धीरे-धीरे सब कुछ बदला जाना चाहिए था ना। फिर क्यों नहीं बदला गया? क्या यह एक साजिश है? ऐसे बहुत सारे सवाल आज की नई पीढ़ी के भीतर घर कर रहे हैं। हमारी हालत आज ऐसी हो गई है कि एक वाक्य में यदि चार शब्द हम अंग्रेजी के रूआब झड़ने के लिए बोलना शुरू करते हैं तो हर पांचवा शब्द हिन्दी का बोलना ही पड़ता है।

यह हालत बड़े से बड़े तथाकथित विद्वानों की भी कई बार हो जाती है। ऐसे में क्यों फिर यह बवंडर बना कर रखा है? क्यों न हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा प्रदान करके भारतीय जनमानस के शैक्षिक धरातल पर प्रस्तुत किया जाता है? ताकि आम व्यक्ति लूटने से बचे और अपने भारत के पुरातन विज्ञान को अपनी जन्म भाषा में खंगाल कर भारत को पुनः विश्व गुरु के स्थान पर स्थापित कर सकें।

विश्व में शिक्षा के क्षेत्र में एजुकेशन हब।

हम इतिहास को जानते है। हमें यह मालूम है कि एक समय भारत और चीन दो ऐसे देश थे जो पूरे विश्व में शिक्षा के क्षेत्र में एजुकेशन हब माने जाते थे। भारत की तक्षशिला और नालंदा यूनिवर्सिटी पूरे विश्व में शिक्षा के लिए विख्यात थी।

क्या वहां पर उस दौर में अंग्रेजी में शिक्षा दी जाती थी? नहीं ऐसा नहीं है। यदि उस दौर में हमारी जन भाषा में या फिर संस्कृत में शिक्षा ग्रहण करने लोग बाहर से हमारे देश में आते थे, तो आज भी आ सकते हैं।

परंतु इस सब के लिए राजनीतिक दृढ़ इच्छाशक्ति का होना और भारतीय जनमानस को अंग्रेजी मानसिकता की गुलामी से मुक्त करवाना बहुत जरूरी है। चीन ने तो अपनी भाषा को आज तक बनाए रखा है, इसीलिए वह आज विकसित की श्रेणी में है शायद। और एक हम हैं कि अपनी भाषा को तवज्जो ही नहीं देना चाहते।

आज लोग अधिकतर मैकाले को ही हिन्दी की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। मैं कहूंगा इसमें न तो अंग्रेजी का दोष है और न ही तो मैकाले का। वे दोनों सन 1947 में भारत छोड़कर चले गए थे। फिर क्यों आजाद भारतीयों ने उनके द्वारा स्थापित किए गए मापदंडों को हारिल की लकड़ी की तरह पकड़ के रखा?

क्या हमारे आजाद देश की राजनीति, व्यवस्था और जनता इतने आलसी हो गए कि आजादी के 74 साल बीत जाने के बाद भी उन अंग्रेजों और मुगलों द्वारा प्रतिस्थापित किए गए मापदंडों को हटाकर हिंदी में प्रतिस्थापित नहीं कर सके? यह दोष न मुगलों का है और न ही तो अंग्रेजों का है।

यह हमारी राजनैतिक और व्यवस्था जनक साजिशों का परिणाम है। आज पार्टियां भले ही एक दूसरे के सिर पर इस बात का ठीकरा फोड़ती हो। परंतु यह कटु सत्य है कि ये सब पार्टियां सत्ता में बारी बारी से आ चुकी है। सब का यही परिणाम है। इसके लिए जनता भी कम उत्तरदाई नहीं है।

विदेशों में प्रतिष्ठित लोगों के घरों में भी अपनी भाषा की पत्रिकाएं और समाचार पत्र पढ़ने को मिलेंगे। एक हमारा देश है, जिसमें बड़े – बड़े घरानों में अपनी भाषा के पत्र – पत्रिकाओं के स्थान पर अंग्रेजी भाषा के अखबार या पत्रिकाएं पढ़ने को मिलेंगे। हमारे भारत के उच्च मध्यवर्गीय या फिर उच्च वर्गीय लोग तो इसको अपनी शान समझते हैं और हिन्दी में कुछ पढ़ना – लिखना अपनी तौहीन समझते हैं।

यह भी सत्य है।

यह भी सत्य है कि देश की सत्ता और व्यवस्था में इन्हीं लोगों का सिक्का चलता है। आम जनता का उसमें कोई लेना-देना नहीं होता। वह तो महज वोटर थी, है और रहेगी शायद।

फिर क्यों जनाक्रोश का बहाना बनाकर हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया जाता? यदि ये तीन समुदाय के लोग अपनी एंठ और राजनैतिक स्वार्थ छोड़ दें, तो भारत के किसी भी प्रांत और किसी भी धर्म, जाति तथा संप्रदाय के लोग हिंदी को राष्ट्रभाषा स्वीकार करने से कभी मना नहीं करेंगे।

समूची शिक्षा प्रणाली भारतवर्ष में हिंदी होना चाहिए।

वैश्विक धरातल पर आज हिंदी का बोलबाला धीरे-धीरे हो रहा है। हमारे कई कवि महोदय और धर्मगुरु विदेशों में अपने धर्म का प्रचार – प्रसार और कविताओं का प्रचार – प्रसार करने जाते हैं।

करोड़ों की तादात में लोग विदेशों में भी उनके अनुयाई बन चुके हैं, तो फिर हमारी सरकारें और व्यवस्थाएं यह कैसे कह सकती है कि हिन्दी वैश्विक धरातल पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकती? अंग्रेजी पूरे विश्व की भाषा है, इसलिए इसे महत्व देना ही होगा।

इन प्रचार – प्रसारों से यह स्वयं ही सिद्ध हो जाता है कि हिन्दी कमजोर नहीं है, कमजोर है तो वह है हमारी अपनी मानसिकता। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने की राह में यदि कोई रोड़ा है तो वह हमारी अंग्रेजी की गुलाम मानसिकता ही है, दूसरा कोई नहीं है।

अंग्रेजी बुरी नहीं है और न ही तो कोई दूसरी भाषा बुरी है। परंतु मेरे कहने का अर्थ यह है कि इन भाषाओं को मात्र एक विषय के रूप में, अन्य भाषाओं को सीखने की दृष्टि से स्कूलों कालेजों में पढ़ाया जाना चाहिए।

न कि इन्हें समूची शिक्षा प्रणाली का माध्यम बनाना चाहिए। समूची शिक्षा प्रणाली का यदि कोई माध्यम हो, तो भारतवर्ष में वह हिंदी होना चाहिए। मुझे नहीं लगता कि ऐसा करने से देश को कोई घाटा होगा बल्कि उल्टा मुनाफा होगा।

नई शिक्षा नीति।

आज जो नई शिक्षा नीति भारत में अधिसूचित की गई है उसमें प्रारंभिक स्तर पर स्थानीय भाषाओं को महत्त्व जरूर दिया गया है, परंतु हिन्दी को पूर्ण मान – सम्मान वहां भी नहीं मिल पाया है।

उच्च शिक्षाओं की किताबे फिर से उन्हीं जटिल भाषा और शिल्प में ही पढ़नी पड़ेगी। एक लंबे अरसे के बाद बड़ी जद्दोजहद के बाद भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने इस मसौदे को मंजूरी दी। पर उस मंजूरी में भी हिन्दी को न्याय नहीं मिल सका। प्रारंभिक स्तर में तो पहले भी ऐसी व्यवस्था थी।

हम लोगों ने अंग्रेजी पांचवी या छठी के बाद पढ़ी है। मेरे हिसाब से यह हिन्दी के लिए कुछ ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो पाया है। महत्वपूर्ण तो तब होता जब उच्च शिक्षा व्यवस्था में भी हिन्दी भाषा में ही शिक्षा देने का प्रावधान किया जाता। परंतु यह हमारे देश के शिक्षाविदों को और सत्ता धारियों को रास नहीं आया शायद।

आजादी से आज तक निरंतर राष्ट्रभाषा हिन्दी बनने का सपना बहुतों ने संजोया और वह अभी तक संजोया हुआ ही रह गया है। बस उम्मीद बाकी है कि एक न एक दिन यह सपना जरूर पूरा होगा। अब देखना यह है कि इस मुद्दे पर कौन कब क्या करता है? मेरे देश की आम जनता को कब न्याय मिलता है?

नोट: यह आर्टिकल बड़ा है, अगर आप एक बार में पूरा आर्टिकल नहीं पढ़ पा रहे है तो घबराये नही, आर्टिकल के लिंक को अपने लैपटॉप या कंप्यूटर / स्मार्टफोन के ब्राउज़र पर बुकमार्क कर ले, जिससे आप इस आर्टिकल को दो से तीन बार में पूरा पढ़ ले।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने की राह में आखिर कब तक रुकावट आता रहेगा। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का कब और किसके द्वारा क्या प्रयास हुआ, इसका विस्तार से वर्णन किया है। हिन्दी भाषा के महत्व को भी समझाया है, सभी जानते है की भारत देश में एकमात्र हिंदी भाषा ही राष्ट्रभाषा बनने लायक हैं। आखिर क्यों हिंदी को राष्ट्रभाषा नहीं बनाया जा रहा है। क्यों हम अंग्रेजो की बनाई हुई नीति को आज तक ढ़ो रहे है। अपने आप से हम सभी क्यों प्रश्न नहीं करते की – मानसिक रूप से आज भी हम अंग्रेजी के गुलाम क्यों है। बहुत जल्द हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना ही होगा, इसके अलावा और कोई चारा नहीं है। किसी भी देश के विकास के लिए एक राष्ट्रभाषा का होना बहुत जरूरी है।

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यह लेख (हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने की राह में कौन बना है रोड़ा?) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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मैं धीर भरी सुख की बदली।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मैं धीर भरी सुख की बदली। ♦

मैं धीर भरी सुख की बदली।
बदली दुनिया मैं भी बदली।

हो पीर भले चाहे जितनी।
जीना अब मैंने सीख लिया।
जो शूल बिछे पथ में मेरे,
वो शूल हटाना सीख लिया।

कंटक पथ पर, उर साहस भर।
मासूम कली मैं चल निकली।
मैं धीर भरी सुख ………
बदली दुनिया मैं ………

नैनों से चाहे नीर बहे।
हिय से अनुराग बहाती हूँ।
यूँ ही नहीं मैं इस सृष्टि की,
अनुपम रचना कहलाती हूँ।

असुरों का वध करने को अब,
खुद आयुध लेकर चल निकली।
मैं धीर भरी सुख ……..
बदली दुनिया मैं ……..

नीरव नीरस गृह को मैं ही,
मधुर सुरों से भर देती हूँ।
निर्जीव खड़ी दीवारों की,
जड़ता सारी हर लेती हूँ।

कण – कण घर का महके ऐसे,
मानो सुवासित बयार चली।
मैं धीर भरी सुख ……..
बदली दुनिया मैं ………

केवल भीतों के आयत से,
होता है निर्मित सदन नहीं।
गृहलक्ष्मी बन कर आ जाऊँ।
बस जाता है फिर भवन वहीं।

मंगल गायन उत्सव पूजा,
लगती हैं सको बहुत भली।
मैं धीर भरी सुख की ……..
बदली दुनिया मैं ………..

हो जाऊँ मैं पल भर ओझल।
अनुपस्थिति मेरी बहुत खले।
दृष्टि पड़े जब भी मुझ पर तो,
मुख पर सबके मुस्कान खिले।

केवल मेरे होने से ही।
सूरत सबकी है खिली – खिली।
मैं धीर भरी सुख की बदली।
दुनिया बदली मैं भी बदली।

औरों की गलती पर मैंने,
अब नीर बहाना छोड़ दिया।
नभ तक परचम फहराया है।
धारा का रुख़ ही मोड़ दिया।

निज सक्षमता के बल पर ही,
लाचारी पीछे छोड़ चली।
मैं धीर भरी सुख की बदली।
दुनिया बदली मैं भी बदली।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

—————

  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों में समझाने की कोशिश की हैं – “नारी तू नारायणी” एक नारी से ही घर का रौनक है, वही है जो हरेक हालात, में घर को व घर के सभी सदस्यों का देखभाल करती हैं। “नीरव नीरस गृह को मैं ही मधुर सुरों से भर देती हूँ, निर्जीव खड़ी दीवारों की जड़ता सारी हर लेती हूँ। हो जाऊँ मैं पल भर ओझल, अनुपस्थिति मेरी बहुत खले, दृष्टि पड़े जब भी मुझ पर तो, मुख पर सबके मुस्कान खिले।”

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यह कविता (मैं धीर भरी सुख की बदली।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई आई टी . शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक. समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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जनता सकपकाई है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जनता सकपकाई है। ♦

बक्सर के गंगा घाट में बहती, लाशें देती गवाही है।
भारत में कोरोना द्वितीय ने, घनी मचाई तबाही है।

यह दुष्ट बीमारी दुनियां में, जाने कहां से आई है?
बेगुनाहों की जिन्दगियां, इसके आगोश में समाई है।

शमशानों में जगह नहीं, बिन जले ही लाशें बहाई है।
पानी में बहती लाशों को देख, जनता सकपकाई है।

गांव – गांव में है घुमा कोरोना, नंगा नाच नचाया है।
चुन चुन बदला ले रहा है, हमने इसका क्या खाया है?

जाति धर्म का भेद नहीं, ऊंच नीच का न कोई ख्याल।
बिन एस ओ पी के इससे बचे, किसकी ऐसी मजाल ?

सत्ता पक्ष के नथुने है फूले, विपक्ष ने मचाई धमाल है।
पक्ष – विपक्ष के इस झगड़े में, बेचारी जनता बेहाल है।

हस्पतालों में बिस्तर न, ऑक्सीजन की किल्लत भारी है।
हल्के में न लो इसको कोई भईया, यह खूनी महामारी है।

सौ सालों के अंतरालों में, सुना ऐसा कुछ न कुछ होता है।
काटता इन्सान फसले वही है, जैसा वह खेतों में बोता है।

भ्रष्टाचार और फरेबी, मकारी, जब नस नस में समाई है।
कुदरती तिलसम वाजिव है, बबुल में आमें तो न आई है।

खुद को खुदा की पदवियां, नेता – धर्मनेता जब जब देते हैं।
इतिहास गवाह है कुदरत के मालिक, सजा तब तब देते हैं।

आदमी ने खोई अदमियत सारी, इंसानियत का गला है रेता।
शैतानी फितरत में जी रहा है, यूं ही खुदा यह सिला न देता।

यूं ही न बहती लाशें गंगा घाट में, इंसानों की बेबस ढोरों सी।
काले जो लगे हैं करने अब करतूतें, आज फिरंगी गोरों सी।

अपनों का बैरी अपना बने, दुश्मनों की दुश्मनी तब बौनी है।
दौर -ए -नाजुक में हालात को समझो, राजनीति घिनौनी है।

उससे पहले कि कातिल हो जाए पवने, सावधानी जरूरी है।
इस गर्दिशे माहौल में, सेनेटाइजर, मास्क, दूरियां मजबूरी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – कोरोना काल में आम जनता किस तरह से मर रही है, चारो तरफ सभी परेशान है इस कोरोना से, न जाने अभी क्या – क्या गुल खिलायेगा ये कोरोना। वर्तमान सरकार अपनी तरफ से हर संभव कोशिश कर रही है कोरोना को काबू करने के लिए। लेकिन सभी विरोधी पार्टी गन्दी राजनीती कर रही है, कोरोना पर और वैक्सीन पर। इनके गन्दी राजनीती से आम जनता मर रही है।

—————

यह लेख (भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति का तुलनात्मक अध्ययन।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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