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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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सीमा रंगा इन्द्रा

सफर।

Kmsraj51 की कलम से…..

Journey | सफर।

अजीब नजारा लिए चलते हैं,
जब मुसाफिर राहों पर चलते हैं।

डगर नई मंजिल नई लिए चलते हैं,
पथ पर बेगानों को लिए चलते हैं।

मंजिल तलक मुस्कुराहट लिए चलते हैं,
छोड़ पीछे गम, हंसी लिए चलते हैं।

नित दोस्त नए-नए लिए चलते हैं,
दुश्मन को अपना बना लिए चलते हैं।

कुछ पलों को अपना बना लिए चलते हैं,
बदलती शख्सियत को साथ लिए चलते हैं।

माना मंजिल पानी सबको साथ लिए चलते हैं,
कौन जाने ? कौन रहबर बना लिए चलते हैं।

टेढ़े-मेढें रास्तों पर सीधा साथी लिए चलते हैं,
प्रतिदिन बदलते रास्ते लिए चलते हैं।

मेरी छोड़ो अपनी सुना सबको बता लिए चलते हैं,
कुछ पल ही सही सबका दुख लिए चलते हैं।

कब किसका बांट देंगे गम, दुखड़ा लिए चलते हैं,
कौन बनेगा? कब किसका सहारा लिए चलते हैं।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — अजीब नजारा लिए चलते हैं, जब भी मुसाफिर राहों पर चलते हैं। डगर नई होती, मंजिल भी नई लिए चलते हैं, पथ पर बेगानों को लिए चलते हैं। मन में व दिल में मंजिल तलक मुस्कुराहट लिए चलते हैं, छोड़ के पीछे सभी गम, हंसी लिए चलते हैं। रोज दोस्त नए-नए लिए राह में चलते हैं, राह में दुश्मन को भी अपना बनाये लिए चलते हैं। कुछ पलों के लिए ही सही अपना बनाये लिए चलते हैं। माना की सबको मंजिल पानी है पर सबको साथ लिए चलते हैं। प्रतिदिन बदलते टेढ़े-मेढें रास्तों पर सीधा व अच्छा साथी लिए चलते हैं। कुछ पल के लिए ही सही सबका दुख बाटते चलते हैं। कौन बनेगा? कब किसका सहारा इसलिए साथ लिए चलते हैं।

—————

यह कविता (सफर।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता Tagged With: best hindi poetry lines on life, kavita in hindi, poem on the journey in hindi, poet seema ranga indra poems, Seema Ranga Indra, seema ranga indra poems, short poem on journey in hindi, मोटिवेशनल कविता हिंदी में, सफर, सफर - सीमा रंगा इन्द्रा, सीमा रंगा इन्द्रा, सीमा रंगा इन्द्रा जी की कविताएं, सुंदर कविता हिंदी में

बेजार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Bejaar | बेजार।

मेरे लिए बेजार ना हुआ करो,
बेताबी अपनी बढ़ाया ना करो।

तलब लगी थी उल्फत की जो,
बाजारों में यूं रूसवा ना करो।

हमारी खातिर सबको यू दलील ना दो,
कमसिन को सरताज बनाया ना करो।

दे हीरे जवाहरात कीमत ना बढ़ाओ,
दे दिल बना रहीस कीमत लगाया ना करो।

अदब से होके रूबरू हमारे,
बैठा दिल बना रानी कुर्सी लगाया ना करो।

प्रिय तुम्हारी है बड़ी ताकतवर,
बना फुल नाजुक बनाया ना करो।

जान तेरी देख ना पाती परेशान रसिक तुझे,
अपना बना यूं बैगाना बनाया ना करो।

दिल में बैठा खंजर रख साथ,
बचा सबकी नजरों से बंद रखा ना करो।

तकलीफों में रख खुद को हरदम,
हमें हर सुख देने की चाहत रखा ना करो।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — मेरे प्रिय मेरे लिए इस तरह परेशान हुआ ना करो, हमारी खातिर सदैव ही सबको यू दलील ना दो। दे हीरे जवाहरात कीमत ना बढ़ाओ मेरा, देकर दिल बना रहीस फिर कीमत लगाया ना करो। यूँ अदब से होके रूबरू हमारे, बैठा दिल बना रानी कुर्सी मेरे लिए लगाया ना करो। ये ना भूलो प्रिय तुम्हारी है बड़ी ताकतवर, ऐसे बना फुल नाजुक बनाया ना करो। जान तेरी देख ना पाती परेशान जरा सा भी तुझे, यूँ अपना बना यूं बैगाना बनाया ना करो। तकलीफों में रख खुद को हरदम, यूँ ही हमें हर सुख देने की चाहत रखा ना करो।

—————

यह कविता (बेजार।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

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हर बार अंदाजा सही नहीं होता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हर बार अंदाजा सही नहीं होता। ♦

ट्रेन अपनी स्पीड से चली जा रही थी। परन्तु रमा की टिकट कन्फर्म नहीं हुई थी, परन्तु उनका जाना बहुत जरूरी था इसलिए रमा अपने तीन बच्चों के साथ बिना टिकट कन्फर्म ही ट्रेन में चढ़ गए थे। सोचे हो ही जाएगी, पर बैठने के बाद पता चला टिकट कन्फर्म नहीं हुई। टीटी ने उन्हें सीट पर बैठने को कहा, जैसे ही बैठे एक महिला ने कहा ये हमारी सीट है बड़े ही रोब से। बेचारी को कुछ राहत मिली ही थी। उसे क्या पता था कि उसकी खुशी बस कुछ ही पल की थी। एक आस लगाए टकटकी लगाए उसी महिला को बार-बार इस उम्मीद में निहार रही थी कि शायद वह अपनी एक सीट हमें दे-दें क्योंकि उसके दो बच्चे थे और एक बच्चा लगभग 4 साल का था। उसकी मां ने उसे पास ही अपनी सीट पर सुला रखा था। पर उन्होंने चार सीट बुक करवा रखी थी।

3 सीटों पर ही बैठे थे चौथी सीट खाली थी। रमा ने जैसा सोचा था ऐसा कुछ नहीं हुआ उस महिला ने उसकी तरफ मुड़ के देखा भी नहीं, उसी की बगल वाली सीट पर एक आदमी काफी देर से रमा को घूरे जा रहा था। रमा बार-बार उसे देखकर अपनी नजरें झुका मन ही मन बुदबुदा रही थी। कैसा आदमी है कब से घूरे जा रहा है शर्म नहीं आती है ऐसे लोग बुरे ही होते हैं। क्योंकि वह आदमी देखने में ऐसा लग रहा था शायद कई दिन से नहाया नहीं था। उसके कपड़े भी बहुत मैले- कुचैले थे। ऐसा करते-करते ट्रेन ने कब गति पकड़ ली और रात्रि का समय कब हो गया रमा को आभास ही नहीं हुआ।

वह आदमी अपनी सीट से उठकर आया और बोला बहन जी आप मेरी सीट पर आकर बैठ जाए। आप ऐसे कब तक बच्चों का हाथ पकड़े खड़ी रहेंगी। रमा का तो जैसे खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा था और वह धन्यवाद करते हुए शर्म के मारे गर्दन नीचे किए हुए और अपने तीनों बच्चों को सीट पर बैठा दिया और खुद भी बैठ गई।

आदमी ट्रेन के दरवाजे पर जाकर खड़ा हो गया। रमा लगातार उसे ही देखे जा रही थी। जैसे-जैसे ट्रेन अपनी रफ्तार पकड़ती जा रही थी रमा के अंदर भी प्रश्नों का भूचाल आ रहा था। मन ही मन सोच रही थी कि मैंने इनके कपड़ों को देखकर और इनके हाल को देखकर अंदाजा लगा लिया था कि यह कोई अपराधी प्रवृत्ति का आदमी है, परंतु मेरा अंदाजा बिल्कुल गलत निकला और मुझे अब अपनी सोच पर बहुत शर्म आ रही है। आज जब भी रमा को ट्रेन यात्रा की याद आती है तो हर बार रमा यही सोचती है कि हर बार हमारा अंदाजा सही नहीं होता।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जरुरी नही की हर बार आपका अंदाज़ा सही ही हो, कभी भी किसी के चेहरे और हावभाव को देखकर तुरंत उसके प्रति अपना नकारात्मक विचार नहीं बना लेना चाहिए। पहले सच्चाई के तह तक जाए और दिलसे सोचकर अपना विचार बनाएं। जैसे-जैसे ट्रेन अपनी रफ्तार पकड़ती जा रही थी रमा के अंदर भी प्रश्नों का भूचाल आ रहा था। मन ही मन सोच रही थी कि मैंने इनके कपड़ों को देखकर और इनके हाल को देखकर अंदाजा लगा लिया था कि यह कोई अपराधी प्रवृत्ति का आदमी है, परंतु मेरा अंदाजा बिल्कुल गलत निकला और मुझे अब अपनी सोच पर बहुत शर्म आ रही है। आज जब भी रमा को ट्रेन यात्रा की याद आती है तो हर बार रमा यही सोचती है कि हर बार हमारा अंदाजा सही नहीं होता।

—————

यह लेख (हर बार अंदाजा सही नहीं होता।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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परिवार की खुशी के लिए पुरुष का समर्पण।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ परिवार की खुशी के लिए पुरुष का समर्पण। ♦

आज के भागदौड़ भरे इस आधुनिक जीवन में किसी के पास वक्त ही नहीं है। एक घर में रहकर भी घर के सदस्य एक-दूसरे के साथ बैठकर खाना नहीं खा पाते, बात नहीं कर पाते हैं । “ऐसा नहीं है बात नहीं करना चाहते।” सभी करना चाहते पर घर-परिवार की जिम्मेदारियां और फिर कमाने की जद्दोजहद में सब व्यस्त रहते हैं।

सोचते हैं इस वर्ष की बात है अगले वर्ष सब ठीक हो जाएगा, परंतु अगले वर्ष करते-करते कब बुढ़े हो जाते हैं पता ही नहीं चलता? एक आदमी को सिर्फ कमाना ही नहीं होता बल्कि बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य, घरवालों के ख्याल के साथ-साथ बहुत से खर्चों का ध्यान रखना पड़ता है। उसे हमेशा एक ही चिंता रहती है कहीं घरवालों की जरूरतें पूरी ना हो, या कहीं कोई क़िस्त समय पर ना जाएं या फिर बच्चे की स्कूल फीस, ट्यूशन फीस लेट ना हो जाए। त्योहारों पर बच्चों की जरूरतों का सामान, खिलौने और ढेर सारी आवश्यकता की पूर्ति करता रहता है बिना कुछ बोले। उसे परिवार की खुशी सर्वप्रथम दिखती है।

मैंने देखा है एक पुरुष घर का सामान दिला देगा, बच्चों को, पत्नी को, मां को आवश्यकता की वस्तु परंतु जब उसकी बारी आती है तो हंसकर बोल देता है मेरे पास तो ढेर सारे कपड़े है। मुझे क्या जरूरत है। वह अपनी भावनाओं को सिर्फ और सिर्फ परिवार की खुशी के लिए दबा देता है। यह समर्पण ही परिवार में खुशी बनाए रखता है। हफ्ते में एक छुट्टी मिलती है आराम करने की। उसी छुट्टी में परिवार की खुशी की खातिर निकलता है बाहर परिवार को खुशी देने के लिए।

“उसका बड़ा मन होता है एक दिन का तो आराम करें, परंतु जिम्मेदारियां और परिवार को खुश रखने की चाहत उसे यह सब करने ही नहीं देती।” परिवार को खुश करने के लिए, उनके सपने सजाने के लिए, व बिना पक्षपात किए सभी की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए हैं कब वह बूढ़ा हो जाता है? उसे पता ही नहीं लगता। उसके त्याग से परिवार हंसता, खेलता, मुस्कुराता रहता है।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — परिवार जीवन का वो आधार स्तंभ है, जो हमें प्रेम, अपनापन, भावनात्मक सहारा प्रदान करता है। जीवन के कठिन दौर में जब दुनिया हमसे रूठ जाए, तब परिवार ही है, जो आगे बढ़कर हमें अपने गले लगा लेता है और हर तरह से हमारा साथ देता है। इसलिए सफ़लता प्राप्ति की राह में ऐसा न हो कि परिवार कहीं पीछे छूट जाये। “उसका बड़ा मन होता है एक दिन का तो आराम करें, परंतु जिम्मेदारियां और परिवार को खुश रखने की चाहत उसे यह सब करने ही नहीं देती।” परिवार को खुश करने के लिए, उनके सपने सजाने के लिए, व बिना पक्षपात किए सभी की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए हैं कब वह बूढ़ा हो जाता है? उसे पता ही नहीं लगता। उसके त्याग से परिवार हंसता, खेलता, मुस्कुराता रहता है।

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यह लेख (परिवार की खुशी के लिए पुरुष का समर्पण।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मां-बाप से बेहतर आपकी खुशी कोई नहीं चाह सकता?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मां-बाप से बेहतर आपकी खुशी कोई नहीं चाह सकता? ♦

समय आया है संभलने का,
मात-पिता की बात मानने का।
जज्बातों से काम चलेगा नहीं,
अब अनुभव काम आएगा।

मां-बाप से बेहतर आपकी खुशी कोई नहीं चाह सकता। अब समय आ गया संभल कर चलने का। संभल कर रहने का, चारों तरफ गिद्ध नजरे गड़ाए खड़े हैं। यह तुम्हें देखना है कि इनकी नजरों से खुद को कैसे सुरक्षित करें। हालांकि सभी ऐसे नहीं होते। परंतु कोई भी रिश्ता निभाने से पहले अपने माता-पिता से जरूर पूछ लेना चाहिए।उनके पास वर्षों का अनुभव होता है। तुम्हारा अच्छा- बुरा उनसे बेहतर कोई नहीं जान पाएगा और तुम्हारे लिए कौन कैसा साबित होगा उनकी पारखी नजरों से बच नहीं पाएगा। हालांकि ऐसा नहीं है कि अभिभावक मानेंगे नहीं उन्हें भी अपने बच्चों की खुशी का पता है।

बस उनका तरीका अलग है। जब तुम उनके सामने एक बेहतरीन जीवन साथी लाओगे भले ही एक बार मना कर दे पर कुछ समय के बाद मान भी जाएंगे। उन्हें समय चाहिए क्योंकि उन्हें भी तो अपनी जांच-पड़ताल करनी होती है। अगर नहीं मान रहे तो, उनके पीछे का कारण पहचानो। पूछो शायद ठीक हो अगर गलत समझ रहे हैं तो समझाए। जिसने जीवन के इतने कष्ट सहन कर आपको पाला-पोसा भला कैसे वे आपका बुरा चाहेंगे। बस वे चाहते हैं हमारे बच्चों का जीवन खराब नहीं हो। आपकी खुशी में ही उनकी खुशी है वह सिर्फ और सिर्फ आपको खुश देखना चाहते हैं।

आजकल यह बात आम हो गई है कि बच्चे आराम से बोल देते हैं यह हमारा जीवन है हम अपने हिसाब से जिएंगे। परंतु जिन्होंने आप को जन्म दिया आपको पाला-पोसा उनका भी तो कुछ हक है आप पर। भला कौन ऐसा मात-पिता है जो अपने बच्चों का जीवन बर्बाद कर देगा। उन्हें कष्ट दे देगा। हमेशा आपका भला ही चाहेंगे।

उन्होंने तुम्हें बचपन से देखा है। पढ़ा-लिखा कर अच्छा जीवन इसलिए दिया है ताकि आगे का भविष्य भी आपका सुखद रहे। आप जीवन में ऊंचाइयों तक जाओ। आपकी खुशी के लिए वह हमेशा तत्पर रहते हैं। उन्हे चाहे कितना ही कष्ट क्यों ना सहन करना पड़े उनका मकसद होता है कि आपकी खुशी सर्वप्रथम हो। उन्होंने जीवन में जो कड़वे अनुभव सहन किए हैं बस उन्हीं से आप को दूर रखना चाहते हैं।

वे नहीं चाहते उनके बच्चे जीवन में दुखद अनुभव से गुजरे और उनके जीवन में उदासी छाए। माता-पिता यही चाहते हैं हमारे बच्चे का आगे का जीवन बहुत ही खुशहाली और प्रेम-पूर्वक से बीते। इसलिए हमेशा वे एक ऐसे रिश्ते में आपको जोड़ना चाहते हैं जो आपके जीवन को सुखमय खुशहाल बनाएं। बाकी सब का समझने का नजरिया अलग-अलग होता है।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — माता- पिता बच्चे के प्रथम शिक्षक या गुरु होते है। माता-पिता बच्चे को जन्म ही नहीं देते बल्कि वे उन्हे पाल-पोषकर बड़ा करते है। माता-पिता एक बच्चे को बोलना, चलना, तथा उन्हे सभी संस्कार सिखाते है। हमे अपने माता पिता द्वारा बताये गये रास्ते पर चलना चाहिए। वे नहीं चाहते उनके बच्चे जीवन में दुखद अनुभव से गुजरे और उनके जीवन में उदासी छाए। माता-पिता यही चाहते हैं हमारे बच्चे का आगे का जीवन बहुत ही खुशहाली और प्रेम-पूर्वक से बीते। इसलिए हमेशा वे एक ऐसे रिश्ते में आपको जोड़ना चाहते हैं जो आपके जीवन को सुखमय खुशहाल बनाएं। बाकी सब का समझने का नजरिया अलग-अलग होता है।

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यह लेख (मां-बाप से बेहतर आपकी खुशी कोई नहीं चाह सकता?) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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प्रतिस्पर्धा कहीं बन ना जाए अवसाद का कारण?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ प्रतिस्पर्धा कहीं बन ना जाए अवसाद का कारण? ♦

जीत तू जरूर,
छू ऊंचाइयों को।
कर मेहनत जरूर,
सपने कर पूरे,
बस तू कर मेहनत।

आज के आधुनिक दौर में आगे निकलने की दौड़ में सभी अपना वजूद ही खोते जा रहे हैं। जो है उनके पास स्वीकार ही नहीं कर पा रहे हैं। मात-पिता प्रतिस्पर्धा की दौड़ में अपने बच्चे को ही प्रथम लाना चाहते हैं। अच्छी बात है, पर दूसरों के साथ तुलना करके क्यों? सभी बच्चों में कौशल होता। हालांकि ये अलग बात है कि प्रतिभा अलग-अलग है। जैसे कोई चित्रकारी में, कोई नृत्य में, कोई गाने में, कोई पढ़ने में, कोई खेल में, कोई अपने घर के कार्यों में, पर अभिभावक चाहते हैं कि हमारा बच्चा ही हर काम में प्रथम आए। हमें सिर्फ अपने बच्चे की प्रतिभा को देखना है। वह किस क्षेत्र में अच्छा है, उसकी प्रशंसा करना, ना कि उस पर इतना दबाव बनाना कि वह अवसाद में चला जाए।

आज के दौर की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बच्चे भी अवसाद से ग्रसित हो रहे हैं।पहले जमाने में तो अवसाद क्या होता है किसी को पता ही नहीं था। पर आज इसने अपना विकराल रूप धारण कर लिया है कि हमारे छोटे-छोटे बच्चों को भी नहीं छोड़ रहा है। यही माहौल हर जगह बन गया है सभी एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा रखते हैं। चाहे वह नौकरी हो, एक-दूसरे से आगे निकलना अच्छी बात है पर परंतु उसे अपने पर हावी ना होने दें।

हैसियत को देखकर ही तमाम कार्य करने चाहिए ना कि एक दूसरे की देखा-देखी।लोग दौड़ में लग जाते हैं उससे अच्छा घर, उससे अच्छे कपड़े, उससे अच्छी गाड़ी। क्यों? हमें सिर्फ और सिर्फ अपना देखना है हमारे हालात कैसे हैं। हमारे पास कितना धन है, यह नहीं कि दूसरों से अच्छा कैसे बनना और आगे कैसे निकलना है। क्योंकि सब में प्रतिभा होती है यह अलग बात है कि कोई पहचान लेता। कोई नहीं पहचानता, सिर्फ दौड़ में लग जाता है। यही दौड़ अवसाद का कारण बनती है क्योंकि हम एक-दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में समय, पैसा, सुख-चैन खो देते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कब हम इस प्रतिस्पर्धा की भाग दौड़ में समय, पैसा और सुख-चैन को खो दिया। जब तक बात हमें समझ आती है अवसाद हमें चारों तरफ से घेर लेता है।

दुनिया भर में अवसाद ने अपने पैर पसार रखे हैं। अकेले भारत में लगभग 20 करोड़ लोग अवसाद से ग्रसित है। हमें जो मिला है उसमें खुश क्यों नहीं। ऐसे ही सारी सुख- सुविधाएं होने के बाद भी खुश नहीं है। क्योंकि उन्हें दूसरों से ज्यादा कमाना है, कमाइए जरूर। पर उसे अपने जीवन पर हावी ना होने दें।

और-और की चाहत में,
जो है उससे भी हाथ ना धो बैठे।
और-और की चाहत में,
जो है उसका भी लुत्फ उठा ना पाते।

बहुत लोग दिन-रात मेहनत करते हैं। कई बार तो अपने घर वालों के साथ समय भी नहीं बिताते। ना ही परिवार के साथ बात करने का समय होता। और कई वर्ष लग जाते मंजिल तक पहुंचने में, कई असफल भी हो जाते हैं। और बाद में बोलते हैं कि हमें तो पता ही नहीं चला कब बच्चे बड़े हो गए। हम तो कमाने में व्यस्त थे कि बच्चों का बचपन भी नहीं देख पाए। कोई इस जमाने में खुश ही नहीं है चाहे उसकी तनख्वाह 50,000 है, या लाख-लाख है। कोई भी खुश नहीं है। सभी प्रतिस्पर्धा की दौड़ में जो है, उससे भी जाते है। इसीलिए ज्यादा से ज्यादा सोचते रहते हैं यही सोचना उन्हें अवसाद की तरफ ले जाता है ।

जिंदगी है हसीन,
जी ले इसे।
गंवा देखा कीमती वक्त,
रह जाएगा पछताता।
मिलेंगे ना दुबारा,
ये सुनहरे पल।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हमारे पास कितना धन है, यह नहीं कि दूसरों से अच्छा कैसे बनना और आगे कैसे निकलना है। क्योंकि सब में प्रतिभा होती है यह अलग बात है कि कोई पहचान लेता। कोई नहीं पहचानता, सिर्फ दौड़ में लग जाता है। यही दौड़ अवसाद का कारण बनती है क्योंकि हम एक-दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में समय, पैसा, सुख-चैन खो देते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कब हम इस प्रतिस्पर्धा की भाग दौड़ में समय, पैसा और सुख-चैन को खो दिया। जब तक बात हमें समझ आती है अवसाद हमें चारों तरफ से घेर लेता है।

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यह लेख (प्रतिस्पर्धा कहीं बन ना जाए अवसाद का कारण?) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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नववर्ष का आगाज।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नववर्ष का आगाज। ♦

आओ! करें नमन नववर्ष का,
भूल पुरानी यादों के समंदर को।
मना ले नवल का त्यौहार,
मिलजुल झूमे गीत गाए।

भूले दुःख-दर्द बीते वर्ष के,
माफ करे दिए कष्ट जिन्होंने।
इस नववर्ष की बेला पर,
बना लेते हैं शत्रु को भी मित्र।

चलेंगे संग में पुराने सखा,
भुला देंगे दुःख भरी यादों को।
अपनों का आशीर्वाद साथ में,
नववर्ष को लगा लो गले।

शीत-ऋतु की ठंड में करें आगाज,
मन के मतवाले बन छा जा जग में।
एक-दूजे का साथ निभा ले दोस्ती,
आलस त्याग संघर्ष को लगाओ गले।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — नया साल नई उम्मीदें, नए सपने, नए लक्ष्य और नए आइडियाज की उम्मीद देता है, इसलिए सभी लोग खुशी से इसका स्वागत करते है। ऐसा माना जाता है कि साल का पहला दिन अगर उत्साह और खुशी के साथ मनाया जाए, तो पूरा साल इसी उत्साह और खुशियों के साथ बीतेगा। हालांकि हिन्दू पंचांग के अनुसार नया साल 1 जनवरी से शुरू नहीं होता।

—————

यह कविता (नववर्ष का आगाज।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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एक हमसफ़र ऐसा भी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ एक हमसफ़र ऐसा भी। ♦

(सच्चा प्यार)

क्या हुआ मुझे दिया नहीं कभी लाखों का हार,
पर जीवन के हर पल को माला में संजोया है।

क्या हुआ मुझे कभी दिया नहीं कीमती उपहार,
पर अपने जीवन के कीमती पल मेरे नाम किए हैं।

क्या हुआ कभी मुझे महंगी साड़ी गिफ्ट नहीं की,
पर हमारे रिश्तों को एक-एक धागे में पिरोए रखा है।

क्या हुआ ऊंचे महलों में नहीं बिठाया कभी हमें,
पर छोटे से घर की एक-एक ईंट में प्यार भर दिया है।

क्या हुआ कभी हम गए नहीं विदेश घूमने तो,
स्वदेश के हर सुनहरे संगीत से रूबरू करवाया है।

कभी किया नहीं झूठा वादा कि ताज महल बनवा दूंगा,
पर घर के एक कोने में सुंदर सा कमरा हमारे नाम किया है।

क्या हुआ कभी हम धन-दौलत से भरा नहीं हमारा घर,
प्यार भरपूर देकर हमें रहीश बना दिया है।

दुनिया से अलग है मेरे हमसफर झूठे वादे करते नहीं,
मुझे हमेशा खुश रखते हैं हमारे लिए वही काफी है।

देख दुनिया जिन से सीख ले दुनिया ऐसा हमसफर मेरा है,
तभी तो खुदा से सातों जन्म मांगती तुझको हूं।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — क्या केवल धन से ही कोई अमीर होता है? हर इंसान के जीवन में एक समय ऐसा आता है जब उसे एहसास होता है की दिल से जो अमीर होता है, वही सच्चा अमीर है। अगर सच्चे दिलसे कोई आपको प्यार करे और आपका सदैव साथ दे तो उससे अच्छा कोई भी नहीं। मन से व दिलसे जो अमीर है वही सुखी है। जो सच्चा है वो आपको सदैव सहयोग करेगा, और जो दिखावा करता है उसके पास अपार धन होते हुए भी छोटी-छोटी बातों से दुःखी होता हैं।

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यह कविता (एक हमसफ़र ऐसा भी।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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बेरोजगार युवाओं का दर्द।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बेरोजगार युवाओं का दर्द। ♦

इन नौजवानों को देख लो जरा,
समझ जाओ ना इनकी तकलीफ।

रहते हरदम परेशान बेचारे,
समझो ना इनकी बेचैनी तुम।

गहराई में छुपे अश्रुओं को देखो तुम,
खाम का ही बोलते हो दर्द नहीं होता इन्हें।

उतर जाओ नैनों में इनके एक बार,
दुख की परछाई को झांक लो जरा तुम।

इनकी हंसी के पीछे छुपे गम जानो,
तड़पते मन को मरहम लगा दो पूछकर।

जिम्मेदारियों का वजन इन पर बहुत,
कभी तो उठा लो तुम भार इनका।

संभले, सुलझे लगे भले ही तुम्हें ये,
गहराई में जा इनकी उलझ न जाना तुम।

वक्त से पहले हो जवां उठा लेते जिम्मेदारियां,
बेरोजगारी छीन लेती बचपन की हठखेलियां।

खंडूस बोल दे ताने ना वार करो तुम,
समझो गहराई, नरमी, मासूमियत इनकी।

बना लो पहचान संग इनके तुम,
समझ पीड़ा देख दर्द मिटा दो ना।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — बेरोजगार युवाओं का दर्द कोई तो समझे, उनके आंतरिक दर्द को कोई तो महसूस करें। वह अपना दर्द कभी जल्दी किसी से बया नहीं करते, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है की उन्हें दर्द नहीं होता। बेरोजगारी समाज के लिए एक अभिशाप है। इससे न केवल व्यक्तियों पर बुरा प्रभाव पड़ता है बल्कि बेरोजगारी पूरे समाज को भी प्रभावित करती है। कई कारक हैं जो बेरोजगारी का कारण बनते हैं। बेरोजगार व्यक्ति को अपने ही समाज अपने ही रिश्तेदार परिवार और दोस्तों का नजरिया बदल जाता है वह बेरोजगार व्यक्ति को इस नजरिए से देखते हैं कि कहीं वह हमसे पैसा ना मांगे।

—————

यह कविता (बेरोजगार युवाओं का दर्द।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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नासमझ बेटा, समझ ना पाया बापू।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नासमझ बेटा, समझ ना पाया बापू। ♦

काश समझ पाते कीमत वक्त की,
काश मान जाते बात मात-पिता की।

काश रहते ना उतावले हमेशा,
काश कभी तो शांति से करते बात।

काश झुक जाते फर्ज की खातिर,
काश भनक लग जाती तूफ़ा की हमें भी।

काश आंचल में संभलते रहते धीरे-धीरे,
काश पिता का साया पहले याद करते।

काश कुछ जिम्मेदारियां हम भी बांट लेते,
काश कुछ वजन हम भी कर देते कम।

काश उन्हें भी सोने देते बेफिक्र होकर,
काश कभी हम भी उठ जाते पहले उनसे।

काश जिन हाथों ने हमेशा रखा सिर पर हाथ,
काश हम भी लगा लेते हाथ उनके चरणों के।

काश हमारी तरह होता सीना चौड़ा उनका,
काश मैं भी कर लेता पिता संग काम कुछ।

काश घर ऐसो आराम के बजाय दिखता घर,
काश हम भी समझ पाते दर्द उनका भी।

एक सच्चा पिता सदैव ही अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिये दिन-रात अनवरत (continuously) कार्य करता हैं। जहा माता अपने बच्चों के स्वास्थ्य का ध्यान रखती हैं ताे वही पिता उन्हे सही ज्ञान और समझ देते हैं। जहा प्रथम गुरु माँ हैं ताे वही पिता गुरु हाेने के साथ-साथ सच्चा संरक्षक भी हाेता हैं।-KMSRAJ51

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — बिना पिता के दुनिया कभी भी नहीं अपनाती हैं। पिता का जीवन में होना बहुत जरूरी है, जिनके पास पिता होते हैं उनके पास दुनिया की सबसे बड़ी ताकत होती है। पिता से ही नाम है और पहचान मिलती है, माता-पिता वो अनमोल रत्न है जिनके आशीर्वाद से हम दुनिया की सबसे बड़ी कामयाबी भी सरलता पूर्वक हासिल कर लेते है। अपने माता-पिता का सदैव ही पूर्ण मन से सम्मान करें, उनकी सेवा करें, जहां तक हो सके उनके कार्यों में उनकी मदद करें। एक बात सदैव ही याद रखें- माता-पिता का प्यार व आशीर्वाद सबको नसीब नहीं होता हैं।

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यह कविता (नासमझ बेटा, समझ ना पाया बापू।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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