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सुख मंगल सिंह

शिवाजी महाराज मराठा साम्राज्य का विस्तार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Expansion of the Maratha Empire by Shivaji Maharaj

| शिवाजी महाराज मराठा साम्राज्य का विस्तार।

शिवाजी महाराज ने अपने जीवन में कई महत्वपूर्ण युद्ध लड़े, जिनमें से कुछ प्रमुख युद्ध निम्नलिखित हैं:

  • रायगढ़ का युद्ध (1646) : शिवाजी महाराज ने आदिलशाही सल्तनत के जनरल मुल्ला अली को हराया और रायगढ़ किले पर कब्जा किया, जो उनकी राजधानी बन गया।
  • तोरणा की लड़ाई (1647) : शिवाजी महाराज ने आदिलशाही सेना को हराया और तोरणा किले पर कब्जा किया, जो उनके साम्राज्य के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
  • तंजावुर की लड़ाई (1656) : शिवाजी महाराज ने मदुरै के नायक राजा की सेना को हराया और तंजावुर शहर पर कब्जा किया, जो एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था।
  • कल्याण की लड़ाई (1657) : शिवाजी महाराज ने मुगल सेना को हराया और कल्याण शहर पर कब्जा किया, जो उनकी आय में वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण था।
  • प्रतापगढ़ का युद्ध (1659) : शिवाजी महाराज ने आदिलशाही सेनापति अफजल खान को हराया और उनकी सैन्य लोकप्रियता पूरे भारत में बढ़ गई।
  • पावनखिंड की लड़ाई (1660) : शिवाजी महाराज के सेनापति बाजी प्रभु देशपांडे ने आदिलशाही सेना के जनरल सिद्दी मसूद को हराया और विशालगढ़ किले की रक्षा की।
  • सोलापुर की लड़ाई (1664) : शिवाजी महाराज ने आदिलशाही सेना को हराया और सोलापुर शहर पर कब्जा किया।
  • पुरंदर की संधि (1665) : शिवाजी महाराज ने मुग़ल सम्राट औरंगजेब के साथ एक संधि की, जिसमें उन्होंने 23 किले मुग़लों को सौंप दिए और बदले में अपनी स्वतंत्रता बरकरार रखने की अनुमति मिली।
  • उमरगढ़ की लड़ाई (1666) : शिवाजी महाराज ने मुग़ल सेना को हराया और उमरगढ़ किले पर कब्जा किया।
  • शिंदे वंश के साथ युद्ध (1670-71) : शिवाजी महाराज ने शिंदे वंश को हराया और अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
  • बरार और खानदेश की विजय (1673-74) : शिवाजी महाराज ने बरार और खानदेश क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की और अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

इन युद्धों के माध्यम से, शिवाजी महाराज ने अपने साम्राज्य का विस्तार किया और एक शक्तिशाली और स्वतंत्र मराठा साम्राज्य की स्थापना की।

शिवाजी महाराज के समय में 12 बलिष्ठ और वफादार सरदार थे, जिन्हें “12 मावळ” या “अष्टप्रधान मंडल” नहीं, बल्कि “अहमदनगर के 12 मावळ” के सरदारों के रूप में जाना जाता है, लेकिन यहाँ पर शिवाजी महाराज के 12 महत्वपूर्ण सेनापतियों और सहयोगियों का वर्णन है जिन्होंने उनके राज्याभिषेक और स्वराज्य की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी:

  1. बाजी पासलकर : एक वफादार और बहादुर सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के साथ कई लड़ाइयों में भाग लिया था।
  2. बाजीराव पेशवा : एक कुशल और अनुभवी सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के लिए कई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ जीती थीं।
  3. मल्हारजी होलकर : एक वफादार और बहादुर सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के साथ कई लड़ाइयों में भाग लिया था।
  4. रघुनाथ बल्लाल आत्रे : एक कुशल और अनुभवी सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के लिए कई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ जीती थीं।
  5. कान्होजी जेधे : एक वफादार और बहादुर सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के साथ कई लड़ाइयों में भाग लिया था।
  6. बाबाजी मुदगलराव : एक कुशल और अनुभवी सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के लिए कई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ जीती थीं।
  7. खान्दोजी कदम : एक वफादार और बहादुर सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के साथ कई लड़ाइयों में भाग लिया था।
  8. येसाजी कंक : एक कुशल और अनुभवी सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के लिए कई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ जीती थीं।
  9. तानाजी मालसुरे : एक वफादार और बहादुर सेनापति जिन्होंने सिंहगढ़ की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
  10. सिद्दी हिलाल : एक वफादार और बहादुर सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के साथ कई लड़ाइयों में भाग लिया था।
  11. नारो मुकुंद सबनीस : एक कुशल और अनुभवी सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के लिए कई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ जीती थीं।
  12. अणाजी दत्तो : एक वफादार और अनुभवी सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के साथ कई लड़ाइयों में भाग लिया था और उनके राज्याभिषेक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इन सभी सेनापतियों और सहयोगियों ने शिवाजी महाराज के स्वराज्य की स्थापना और उनके राज्याभिषेक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके बलिदान और वफादारी ने शिवाजी महाराज के सपनों को साकार करने में मदद की।

जहाँ तक यूनेस्को की विश्व धरोहर की बात है, तो शिवाजी महाराज से संबंधित कई स्थलों को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल करने के लिए प्रस्तावित किया गया है, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:

  • रायगढ़ किला : शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक रायगढ़ किले में हुआ था, जो एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है।
  • सिंहगढ़ किला : यह किला शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण सैन्य अभियान का स्थल था, जहाँ पर तानाजी मालसुरे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इन स्थलों को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल करने के लिए प्रयास जारी हैं, जो शिवाजी महाराज के इतिहास और उनके स्वराज्य की स्थापना को विश्व स्तर पर प्रदर्शित करने में मदद करेगा।

शिवाजी महाराज के महाराष्ट्र में कई महत्वपूर्ण किले थे, जिन्होंने उनके स्वराज्य की स्थापना और सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यहाँ पर शिवाजी महाराज के 11 महत्वपूर्ण किलों का वर्णन है:

  1. रायगढ़ किला : यह शिवाजी महाराज का राजधानी किला था, जहाँ पर उनका राज्याभिषेक हुआ था। रायगढ़ किला महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित है।
  2. सिंहगढ़ किला : यह किला पुणे जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण सैन्य अभियान का स्थल था।
  3. प्रतापगढ़ किला : यह किला महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण किले के रूप में जाना जाता है।
  4. पन्हाला किला : यह किला महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण किले के रूप में जाना जाता है।
  5. विजयदुर्ग किला : यह किला महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण नौसैनिक अड्डे के रूप में जाना जाता है।
  6. सिंदुदुर्ग किला : यह किला महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज द्वारा निर्मित एक महत्वपूर्ण किला है।
  7. पुरंदर किला : यह किला महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण किले के रूप में जाना जाता है।
  8. कोंढाणा किला : यह किला महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित है और सिंहगढ़ किले के पास स्थित है।
  9. तोरणा किला : यह किला महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण किले के रूप में जाना जाता है।
  10. राजगढ़ किला : यह किला महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण किले के रूप में जाना जाता है।
  11. लोहगढ़ किला : यह किला महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण किले के रूप में जाना जाता है।

इन किलों ने शिवाजी महाराज के स्वराज्य की स्थापना और सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और आज भी ये किले महाराष्ट्र के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों के रूप में जाने जाते हैं।

शिवाजी महाराज का शासन प्रबंध बहुत ही कुशल और प्रभावी था। उन्होंने अपने स्वराज्य में एक मजबूत और अनुशासित प्रशासनिक प्रणाली की स्थापना की, जो उनके शासन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहाँ पर शिवाजी महाराज के शासन प्रबंध की कुछ विशेषताएं हैं:

  • अष्टप्रधान मंडल : शिवाजी महाराज ने अपने शासन में अष्टप्रधान मंडल की स्थापना की, जो आठ मंत्रियों की एक परिषद थी जो उनके शासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। इन मंत्रियों में शामिल थे:
  1. पेशवा (प्रधानमंत्री)
  2. अमात्य (वित्त मंत्री)
  3. मंत्री (गृह मंत्री)
  4. सचिव (विदेश मंत्री)
  5. सुमंत (विदेश सचिव)
  6. पंडितराव (धार्मिक मामलों के मंत्री)
  7. सेनापति (सैन्य कमांडर)
  8. न्यायाधीश (न्यायाधीश)
  • प्रशासनिक इकाइयाँ : शिवाजी महाराज ने अपने स्वराज्य को कई प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया, जिन्हें परगना कहा जाता था। प्रत्येक परगने का एक प्रशासक होता था जो शासन के कार्यों को संभालता था।
  • कर प्रणाली : शिवाजी महाराज ने एक न्यायसंगत कर प्रणाली की स्थापना की, जिसमें किसानों और व्यापारियों से कर वसूला जाता था। कर की दरें न्यायसंगत थीं और कर वसूली की प्रक्रिया पारदर्शी थी।
  • न्याय प्रणाली : शिवाजी महाराज ने एक न्यायसंगत, न्याय प्रणाली की स्थापना की, जिसमें न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती थी जो मामलों की सुनवाई करते थे और न्याय प्रदान करते थे।
  • सैन्य प्रशासन : शिवाजी महाराज ने अपने सैन्य बलों को मजबूत और अनुशासित बनाने के लिए एक प्रभावी सैन्य प्रशासन की स्थापना की। उन्होंने अपने सैन्य कमांडरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ सौंपीं और उन्हें सैन्य अभियानों के लिए तैयार किया।

इन विशेषताओं के माध्यम से, शिवाजी महाराज ने अपने स्वराज्य में एक मजबूत और प्रभावी शासन प्रबंध की स्थापना की, जो उनके शासन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

♦ जिंजी किला ♦

जिंजी किला : तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले में स्थित एक ऐतिहासिक किला है, जो अपनी विशाल और मजबूत संरचना के लिए प्रसिद्ध है। यह किला 9वीं शताब्दी में बनाया गया था और इसका निर्माण चोल वंश द्वारा करवाया गया था।

♦ इतिहास ♦

जिंजी किले का इतिहास बहुत पुराना है और यह किला कई शासकों के अधीन रहा है, जिनमें चोल, पांड्य, विजयनगर साम्राज्य और मराठा साम्राज्य शामिल हैं। 17वीं शताब्दी में, यह किला मराठा शासक शिवाजी महाराज के पुत्र राजाराम के लिए एक महत्वपूर्ण आश्रय स्थल बन गया था।

♦ वास्तुकला ♦

जिंजी किले की वास्तुकला बहुत ही प्रभावशाली है और यह किला अपनी विशाल और मजबूत संरचना के लिए प्रसिद्ध है। किले में कई मंदिर, तालाब और अन्य संरचनाएं हैं, जो इसकी वास्तुकला की विविधता को दर्शाती हैं।

♦ महत्वपूर्ण विशेषताएं ♦

जिंजी किले की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं:

  • किले की दीवारें : जिंजी किले की दीवारें बहुत ही मजबूत और विशाल हैं, जो इसकी सुरक्षा के लिए बनाई गई थीं।
  • मंदिर : किले में कई मंदिर हैं, जो इसकी धार्मिक महत्व को दर्शाते हैं।
  • तालाब : किले में कई तालाब हैं, जो इसकी जल संचयन प्रणाली को दर्शाते हैं।

♦ आज का महत्व ♦

जिंजी किला आज भी एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है और तमिलनाडु के पर्यटन स्थलों में से एक है। यह किला अपनी विशाल और मजबूत संरचना के लिए प्रसिद्ध है और इसकी वास्तुकला की विविधता को दर्शाता है।

शिवाजी महाराज के जीवन में कई महत्वपूर्ण कार्य थे जिन्होंने उनके स्वराज्य की स्थापना और सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यहाँ पर शिवाजी महाराज के कुछ महत्वपूर्ण कार्यों का वर्णन है:

  1. स्वराज्य की स्थापना : शिवाजी महाराज ने अपने स्वराज्य की स्थापना के लिए काम किया, जिसमें उन्होंने अपने अनुयायियों और सेनापतियों के साथ मिलकर मुगल साम्राज्य और अन्य शक्तियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी।
  2. किलों का निर्माण और जीर्णोद्धार : शिवाजी महाराज ने कई किलों का निर्माण और जीर्णोद्धार किया, जो उनके स्वराज्य की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण थे।
  3. नौसेना का निर्माण : शिवाजी महाराज ने एक मजबूत नौसेना का निर्माण किया, जो उनके स्वराज्य की समुद्री सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण थी।
  4. प्रशासनिक सुधार : शिवाजी महाराज ने अपने स्वराज्य में प्रशासनिक सुधार किए, जिसमें उन्होंने एक मजबूत और कुशल प्रशासनिक प्रणाली की स्थापना की।
  5. सैन्य सुधार : शिवाजी महाराज ने अपने सैन्य बलों में सुधार किए, जिसमें उन्होंने एक मजबूत और अनुशासित सेना की स्थापना की।
  6. आर्थिक विकास : शिवाजी महाराज ने अपने स्वराज्य के आर्थिक विकास के लिए काम किया, जिसमें उन्होंने व्यापार और उद्योग को बढ़ावा दिया।
  7. धार्मिक सहिष्णुता : शिवाजी महाराज ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई, जिसमें उन्होंने अपने स्वराज्य में सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार दिए।
  8. न्याय प्रणाली : शिवाजी महाराज ने एक न्यायसंगत न्याय प्रणाली की स्थापना की, जिसमें उन्होंने अपने स्वराज्य के नागरिकों को न्याय प्रदान किया।

इन कार्यों के माध्यम से, शिवाजी महाराज ने अपने स्वराज्य की स्थापना और सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और एक मजबूत और समृद्ध राज्य की स्थापना की।

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शिवाजी महाराज का प्रभुत्व मुख्य रूप से महाराष्ट्र और उसके आसपास के क्षेत्रों में था। उनके स्वराज्य की सीमाएँ समय-समय पर बदलती रहीं, लेकिन उनके चरमोत्कर्ष के समय में उनका प्रभुत्व निम्नलिखित राज्यों और क्षेत्रों तक था :

  1. महाराष्ट्र : शिवाजी महाराज का स्वराज्य मुख्य रूप से महाराष्ट्र में था, जिसमें वर्तमान महाराष्ट्र के अधिकांश हिस्से शामिल थे।
  2. कोंकण : शिवाजी महाराज का प्रभुत्व कोंकण क्षेत्र पर भी था, जो वर्तमान महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्र में आता है।
  3. गोवा : शिवाजी महाराज ने गोवा के कुछ हिस्सों पर भी अपना प्रभुत्व स्थापित किया था, जो उस समय पुर्तगाली शासन के अधीन था।
  4. कर्नाटक : शिवाजी महाराज का प्रभुत्व कर्नाटक के कुछ हिस्सों पर भी था, विशेष रूप से बेलगाम और बीजापुर के आसपास के क्षेत्र।
  5. आंध्र प्रदेश : शिवाजी महाराज का प्रभुत्व आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों पर भी था, विशेष रूप से वर्तमान तटीय आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्से।
  6. तमिलनाडु : शिवाजी महाराज का प्रभुत्व तमिलनाडु के कुछ हिस्सों पर भी था, विशेष रूप से वर्तमान तमिलनाडु के उत्तरी हिस्से।

शिवाजी महाराज के स्वराज्य की सीमाएँ समय-समय पर बदलती रहीं और उन्होंने अपने जीवनकाल में कई लड़ाइयाँ लड़ीं और संधियाँ कीं जिससे उनके स्वराज्य की सीमाएँ विस्तारित हुईं। उनके स्वराज्य की सबसे बड़ी सीमा लगभग वर्तमान महाराष्ट्र की सीमा के समान थी, लेकिन इसमें कुछ अन्य क्षेत्रों के हिस्से भी शामिल थे।

शिवाजी महाराज का प्रतापगढ़ से संबंधित एक महत्वपूर्ण घटना अफजल खान की हत्या है। अफजल खान बीजापुर सल्तनत का एक शक्तिशाली सेनापति था, जिसे शिवाजी महाराज को पराजित करने के लिए भेजा गया था।

♦ अफजल खान की हत्या ♦

अफजल खान एक बड़ी सेना के साथ प्रतापगढ़ की ओर बढ़ा, जहाँ शिवाजी महाराज ने अपनी सेना के साथ उसका सामना किया। दोनों नेताओं के बीच बातचीत हुई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। अंत में, अफजल खान ने शिवाजी महाराज को मारने का प्रयास किया, लेकिन शिवाजी महाराज ने अपनी बघनखा (एक प्रकार का हथियार) से अफजल खान के पेट को फाड़ दिया और उसकी हत्या कर दी।

♦ घटना का महत्व ♦

अफजल खान की हत्या एक महत्वपूर्ण घटना थी जिसने शिवाजी महाराज की स्थिति को मजबूत किया और उनके स्वराज्य की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस घटना ने शिवाजी महाराज की बहादुरी और उनकी सैन्य क्षमता को प्रदर्शित किया और उनके अनुयायियों का मनोबल बढ़ाया।

♦ प्रतापगढ़ का महत्व ♦

प्रतापगढ़ एक महत्वपूर्ण किला है जो महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित है। यह किला शिवाजी महाराज के समय में एक महत्वपूर्ण सैन्य अड्डा था और अफजल खान की हत्या की घटना के बाद यह किला और भी महत्वपूर्ण हो गया। आजकल, प्रतापगढ़ एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है जो शिवाजी महाराज के इतिहास और उनके स्वराज्य की स्थापना की कहानी को दर्शाता है।

सुवर्ण किले से संबंधित एक महत्वपूर्ण घटना पन्हाला किले की घेराबंदी के दौरान शिवाजी महाराज का बचाव है। यह घटना 1660 में हुई थी, जब शिवाजी महाराज को पन्हाला किले में सिद्दी जौहर की सेना ने घेर लिया था।

♦ पन्हाला किले की घेराबंदी ♦

सिद्दी जौहर ने पन्हाला किले को घेर लिया था और शिवाजी महाराज को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर करने की कोशिश की। लेकिन शिवाजी महाराज ने हार नहीं मानी और उन्होंने अपने सैनिकों के साथ किले की रक्षा करने का फैसला किया।

♦ शिवाजी महाराज का बचाव ♦

शिवाजी महाराज ने अपने विश्वासपात्र शिवाजी काशिद को अपने जैसे कपड़े पहनाकर और अपने स्थान पर बैठाकर एक चाल चली। शिवाजी काशिद को सिद्दी जौहर की सेना ने शिवाजी महाराज समझकर हमला किया, जबकि वास्तविक शिवाजी महाराज सुरक्षित रूप से किले से बाहर निकल गए।

♦ घटना का महत्व ♦

इस घटना ने शिवाजी महाराज की चतुराई और उनकी सैन्य क्षमता को प्रदर्शित किया। शिवाजी महाराज का बचाव एक महत्वपूर्ण घटना थी जिसने उनके स्वराज्य की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

♦ सुवर्ण किले का महत्व ♦

हालांकि, यह घटना पन्हाला किले से संबंधित है, न कि सुवर्ण किले से। सुवर्ण किला एक महत्वपूर्ण किला है जो महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले में स्थित है, लेकिन इस किले से संबंधित कोई विशिष्ट घटना मेरे पास नहीं है। अगर आपके पास कोई विशिष्ट जानकारी है, तो मैं आपको और अधिक जानकारी प्रदान कर सकता हूँ।

खंडेरी किला एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है जो महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित है। यह किला शिवाजी महाराज के समय में एक महत्वपूर्ण नौसैनिक अड्डा था। खंडेरी किले से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं निम्नलिखित हैं :

♦ खंडेरी किले का निर्माण ♦

खंडेरी किले का निर्माण शिवाजी महाराज ने 1679 में करवाया था। इस किले का उद्देश्य मराठा नौसेना के लिए एक सुरक्षित अड्डा प्रदान करना था।

♦ नौसैनिक अड्डा ♦

खंडेरी किला एक महत्वपूर्ण नौसैनिक अड्डा था जहाँ मराठा नौसेना के जहाजों को सुरक्षित रूप से लंगर डाला जा सकता था। इस किले ने मराठा नौसेना को समुद्री डाकुओं और अन्य शत्रुओं से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

♦ अंग्रेजों और पुर्तगालियों के साथ संघर्ष ♦

खंडेरी किले ने अंग्रेजों और पुर्तगालियों के साथ संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मराठा नौसेना ने इस किले का उपयोग करके इन शक्तियों के जहाजों पर हमला किया और उन्हें पराजित किया।

♦ ऐतिहासिक महत्व ♦

खंडेरी किला एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है जो शिवाजी महाराज के समय के नौसैनिक इतिहास को दर्शाता है। यह किला आज भी एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है जो महाराष्ट्र के ऐतिहासिक महत्व को प्रदर्शित करता है।

इन घटनाओं से पता चलता है कि खंडेरी किला शिवाजी महाराज के समय में एक महत्वपूर्ण नौसैनिक अड्डा था जिसने मराठा नौसेना को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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शिवनेरी किला एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है जो महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित है। यह किला शिवाजी महाराज के जन्मस्थान के रूप में प्रसिद्ध है। शिवनेरी किले से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं निम्नलिखित हैं :

♦ शिवाजी महाराज का जन्म ♦

शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 को शिवनेरी किले में हुआ था। उनके पिता शाहजी भोंसले एक मराठा सेनापति थे और उनकी माता जीजाबाई एक धार्मिक और संस्कृति से भरपूर महिला थीं।

♦ किले का महत्व ♦

शिवनेरी किला एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है जो शिवाजी महाराज के जीवन और उनके स्वराज्य की स्थापना के इतिहास को दर्शाता है। यह किला आज भी एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है जो महाराष्ट्र के ऐतिहासिक महत्व को प्रदर्शित करता है।

♦ किले की विशेषताएं ♦

शिवनेरी किला एक मजबूत और सुरक्षित किला है जो पहाड़ी पर स्थित है। इस किले की दीवारें और बुर्ज मजबूत पत्थरों से बने हुए हैं। किले में कई महत्वपूर्ण संरचनाएं हैं, जिनमें मंदिर, तालाब और सैन्य बैरकों शामिल हैं।

♦ पर्यटन स्थल ♦

शिवनेरी किला एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है जो अपनी ऐतिहासिक महत्व और सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। पर्यटक इस किले को देखकर शिवाजी महाराज के जीवन और उनके स्वराज्य की स्थापना के इतिहास को समझ सकते हैं।

♦ सांस्कृतिक महत्व ♦

शिवनेरी किला एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक स्थल है जो मराठा इतिहास और संस्कृति को दर्शाता है। यह किला आज भी मराठा समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है।

इन घटनाओं से पता चलता है कि शिवनेरी किला शिवाजी महाराज के जीवन और उनके स्वराज्य की स्थापना के इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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शिवाजी महाराज एक महान नेता, सैन्य रणनीतिकार और राजनेता थे, जिनसे हमें कई महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण सबक दिए गए हैं जो हमें शिवाजी महाराज से मिलते हैं:

  1. नेतृत्व : शिवाजी महाराज एक महान नेता थे जिन्होंने अपने अनुयायियों को प्रेरित किया और उन्हें एक साझा लक्ष्य की दिशा में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया।
  2. सैन्य रणनीति : शिवाजी महाराज एक महान सैन्य रणनीतिकार थे जिन्होंने गुरिल्ला युद्ध की तकनीकों का उपयोग करके अपने शत्रुओं को हराया।
  3. राष्ट्रवाद : शिवाजी महाराज एक सच्चे राष्ट्रवादी थे जिन्होंने अपने देश और अपने लोगों के लिए लड़ाई लड़ी।
  4. न्याय और समानता : शिवाजी महाराज एक न्यायप्रिय और समानता के समर्थक थे। उन्होंने अपने शासन में सभी वर्गों के लोगों को समान अवसर प्रदान किए।
  5. शिक्षा और संस्कृति : शिवाजी महाराज शिक्षा और संस्कृति के महत्व को समझते थे। उन्होंने अपने शासन में शिक्षा और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए।
  6. आत्मनिर्भरता : शिवाजी महाराज आत्मनिर्भरता के महत्व को समझते थे। उन्होंने अपने शासन में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए।
  7. धैर्य और साहस : शिवाजी महाराज एक धैर्यवान और साहसी व्यक्ति थे जिन्होंने अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम किया।
  8. नैतिकता और आदर्श : शिवाजी महाराज एक नैतिक और आदर्शवादी व्यक्ति थे जिन्होंने अपने जीवन में नैतिकता और आदर्शों को महत्व दिया।

इन सबकों अपनाकर, हम अपने जीवन में सफलता प्राप्त कर सकते हैं और एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।

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♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन प्रेरणा, साहस और राष्ट्रप्रेम का प्रतीक है। उन्होंने अपने अद्भुत नेतृत्व और नीतियों से भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अपना नाम अंकित किया। आज भी उनका नाम लेते ही प्रत्येक भारतीय के मन में गर्व और श्रद्धा की भावना जागृत होती है। वे केवल मराठाओं के ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के गौरव हैं। उनका स्वराज्य का सपना, न्यायपूर्ण शासन और निर्भीक नेतृत्व आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरणा देता रहेगा।

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यह लेख (शिवाजी महाराज मराठा साम्राज्य का विस्तार।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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राखो चुंदरिया संवारि।

Kmsraj51 की कलम से…..

Rakho Chundaria Sanvaari | राखो चुंदरिया संवारि।

भीगल जाले मोर चुनरिया, छुपाये छिपे ना द्युति दागरी।
चूक चटक चंदा जो छिपा था, चुंदरी तो चटकार री॥

भीगल चुंदरी निखिल निचोड़ा, मोहन ज्यों सपने साथ री।
घट-घट खोजत नीक चुनरिया, पायो अपने पास री॥

इहै चुनरिया नहीं तुम्हारी, प्यारी-प्यारी यारी दुलारी।
जेते सुन्दर चुंदरी पायो, तेते ज्ञान, मान, ग्यान अगाध री॥

जा बुन लायो मोहन मोरे, मौन ज्यों महा भंडार री।
चुनरी चुरा चारो चौकछु रे, सूर्य चन्द्रमा जान्यो संसार रे॥

आंगन लाये पिया चुनरिया भीगी झीनी सारी।
गणपति गावत बीच बाजार, नीक चुनरिया नीक किनारी॥

रंगी चुनरिया को रंग निराला, मागत मधुवन मां नन्दलाल।
मंगल मंदिर बूझत न्यारी, देखत बारी – बारी – सारी॥

सोलह सी बंद चुंदरी चोखी, चार चौपटा नाग-पास री।
रंगना धूमिल चुंदरी चटकीली, राखो राजे इसे संवारि री॥

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — यह कविता मोहन (श्री कृष्ण) और उसकी प्यारी चुंदरी के प्रेम की कहानी को व्यक्त करती है। चुंदरी को धीरे-धीरे मोहन की प्यारी यारी और उसके ज्ञान के साथ मिल जाती है। मोहन की प्रेरणा से, वह चुंदरी अपने स्वामी के पास आती है और उसका साथ देती है, जैसे सूर्य और चंद्रमा समय-समय पर संसार को प्रकाशित करते हैं। चुंदरी का रंग निराला होता है और वह मंगल मंदिर की शोभा को बढ़ाती है, जैसे मधुवन में नन्दलाल के साथ खुशियों की गाथा। इस रूप में, चुंदरी को मोहन के प्रेम और उसकी भक्ति का प्रतीक माना जा सकता है।

—————

यह कविता (राखो चुंदरिया संवारि।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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नागचंद्रेश्वर मंदिर।

Kmsraj51 की कलम से…..

Nagchandreshwar Mandir | नागचंद्रेश्वर मंदिर।

उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर।

भारतवर्ष के कोने-कोने में अलग-अलग शहरों नगर में मंदिर – मूर्ति हैं। चाहे जिस क्षेत्र में आपका कोई भी शहर, नगर, ऐसा नहीं होगा जिसमे मंदिर ना हो। परंतु उज्जैन एक ऐसा शहर है जहां पर भगवान नाग चंद्रेश्वर मंदिर है इस मंदिर की खास बात यह है कि इस मंदिर का कपाट केवल नाग पंचमी सावन मास की शुक्र पंचमी तिथि को ही खुलता है — सिर्फ साल में एक दिन।

भगवान शिव के आभूषण स्वरुप नागदेव की पूजा होती है। इस दिन दरवाजे पर नाग देवता की मूर्ति लगाई जाती है गाय का दूध और धान का लावा घर के हर कमरे में छिलका जाता है। मस्तक पर केसर चंदन लेप किया जाता है। यह सारी क्रियाएं सुबह स्नान करके घर की औरतें करती हैं।

मंदिरों का शहर उज्जैन

महाकाल का नगर उज्जैन को कौन नहीं जानता उज्जैन को मंदिरों के शहर के धाम नाम से जाना जाता है। उज्जैन शहर की गली-गली मोहल्ले-मोहल्ले में मंदिर स्थित है। उन्हीं मंदिरों में से एक विशेष मंदिर नागचंद्रेश्वर मंदिर है जो महाकाल मंदिर में अवस्थित है। नागचंद्रेश्वर मंदिर की आभा निराली है। यहां भी नागपंचमी को त्यौहार मनाया जाता है जबकि सम्पूर्ण भारतवर्ष में नागपंचमी का त्यौहार सावन मास की शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है।

नाग पंचमी के दिन औरतें नाग देवता की पूजा अर्चना करती हैं। ऐसा माना जाता है कि नाग देवता मनुष्य की रक्षा करते हैं। सनातन संस्कृति में नाग देवता का पूजन करने का विधान प्राचीन काल से प्रचलन में चलता चला रहा है। नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा का विधान है। पुनः गाय के दूध से स्नान कराया जाता है। इस दिन नाग पूजन के साथ ही भगवान शिव की पूजा रुद्राभिषेक करने से कालसर्प दोष खत्म हो जाता है। और राहु केतु के अशुभ दोष दूर हो जाते हैं।

वर्ष में केवल 24 घंटे के लिए खुलने वाला मंदिर

24 घंटे नागपंचमी के दिन भारतवर्ष में एक मात्र खुलने वाला मंदिर उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर है जो उज्जैन में महाकाल मंदिर के तीसरे भाग में विद्यमान है। नागचंद्रेश्वर मंदिर, यह नागचंद्रेश्वर की प्रतिमा उज्जैन के लिए नेपाल से लाई गई थी। यह प्रतिमा बहुत पुरानी है इस प्रतिमा के बारे में कहा जाता है कि यह प्रतिमा 11 वीं सदी की प्रतिमा है। खास बात तो यह है कि इस प्रतिमा में शिव – पार्वती अपने पूरे परिवार के साथ विराजमान है। शिव परिवार के ऊपर नाग देवता फन फैलाएं हुए हैं। इस तरह की प्रतिमा के बारे में खासकर उज्जैन में चंद्रेश्वर मंदिर उज्जैन के अलावा अन्यत्र कहीं भी नहीं है। ऐसी प्रतिमा देखने को भी नहीं मिलती है।

दुनिया का यह इकलौता मंदिर उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर है जहां शिव सपरिवार सांपों की शय्या पर विराजमान हो। मान्यता अनुसार सांपों के राजा तक्षक ने भगवान शिव को मनाने के लिए घोर तपस्या की। उनकी कठिन तपस्या से खुश होकर भगवान भोलेनाथ तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया वरदान प्राप्त करने के बाद से ही तक्षक राज ने भगवान शिव के सानिध्य में वास करना शुरु कर दिया।

उज्जैन के महाकाल मंदिर के आस पास प्राचीन काल से ही घोर जंगल था। इस क्षेत्र को महाकाल वन उपवन के रुप ने जाना जाता था। नाग देवता को महाकाल में वास करने के पीछे उनकी मनसा रही होगी कि एकांत में विघ्न न हो!

शायद यही कारण था कि नाग चंद्रेश्वर मंदिर नाग देवता के रहने के स्थान पर बना। नाग चंद्रेश्वर मंदिर का कपाट बार-बार नहीं, “वर्ष में एक दिन खुलता है।” वह भी सावन की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी के दिन, नाग दर्शन को खुलता है। नाग पंचमी के दिन ही उनका दर्शन होता है। मेला लगता है सुदूर से लोग दर्शन के लिए आते हैं।

समय और परंपरा के अनुसार मंदिर का कपाट बंद कर दिया जाता है। बाकी के दिनों में चंद्रेश्वर के सम्मान में प्राची परंपरा अनुसार मंदिर बंद ही रहता है। भगवान चंद्रेश्वर जी की त्रिकाल पूजा की जाती है। काल पूजा करने का विधान प्राचीन काल से चला रहा है।

त्रिकाल पूजा अलग-अलग समय में होती है।
पहली मध्यान रात में महा निर्माणी होती है।

दूसरी पूजा नाग पंचमी के दिन दोपहर के समय शासन प्रशासन द्वारा करायी जाती है।
तीसरी पूजा नाग पंचमी की शाम को भगवान महाकाल की पूजा के बाद मंदिर समिति द्वारा की जाती है।

पहले की भांति रात्रि 12:00 बजे भगवान चंद्रेश्वर के मंदिर का कपाट पुनः एक वर्ष के लिए बंद कर दिया जाता है।

ओम् नागेश्वराए नमः

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — दुनिया का यह इकलौता मंदिर उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर है जहां शिव सपरिवार सांपों की शय्या पर विराजमान हो। मान्यता अनुसार सांपों के राजा तक्षक ने भगवान शिव को मनाने के लिए घोर तपस्या की। उनकी कठिन तपस्या से खुश होकर भगवान भोलेनाथ तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया वरदान प्राप्त करने के बाद से ही तक्षक राज ने भगवान शिव के सानिध्य में वास करना शुरु कर दिया। 24 घंटे नागपंचमी के दिन भारतवर्ष में एक मात्र खुलने वाला मंदिर उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर है जो उज्जैन में महाकाल मंदिर के तीसरे भाग में विद्यमान है। नाग पंचमी के दिन औरतें नाग देवता की पूजा अर्चना करती हैं। ऐसा माना जाता है कि नाग देवता मनुष्य की रक्षा करते हैं। सनातन संस्कृति में नाग देवता का पूजन करने का विधान प्राचीन काल से प्रचलन में चलता चला रहा है। नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा का विधान है। इस दिन नाग पूजन के साथ ही भगवान शिव की पूजा रुद्राभिषेक करने से कालसर्प दोष खत्म हो जाता है। और राहु केतु के अशुभ दोष दूर हो जाते हैं।

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यह लेख (नागचंद्रेश्वर मंदिर।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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ज्ञानवापी षंड-धा।

Kmsraj51 की कलम से…..

Gyanvapi Shand-dha | ज्ञानवापी षंड-धा।

श्रृंगार गौरी जी की साधना के साधक शिव,
विविध प्रभाव छापे ‘ज्ञानवापी’ धाम हो।
जिनकी उपासना को महिमा बखाने जग,
नन्दीश्वर संग जो विराजे आठो याम हो।
काल – काल महाकाल ताल ठोंक खड़े हैं जो,
सदर अदालत दिया सर्वे प्रोग्राम हो।
भेष, निसून सर्वे हित अधिवक्ता चले,
नामित हुये थे सर्वे हित जो जो नाम हो।

कला कृतियों में का फोटोग्राफी लिया जाने लगा,
नोंक-झोंक होने लगा दोनों पक्षकार में।
बात पर बात बढ़ती ही गयी दोनो ओर,
सर्वे काम रोक दिया गया तकरार में।
नंदी महराज सामने मिला था शिवलिंग,
मिल गये बाबा शोर हुआ इजहार में।
मूर्तियों को तोड़ रखा गया तहखाने में था,
ताला नहीं खोला गया ही इन्तजार में।

टूटी मूर्तियाँ मिली अंधेरे में विराजमान,
उसकी रिकार्डिंग हुयी बैटरी प्रकाश में।
मिट्टी डाली नमी मिली दस दिन पहले की,
राज खुला पक्ष और विपक्ष बीच क्रास में।
लोम हर्षक घटना न घट पायी दुनो ओर,
पुलिस प्रशासन साथ दिया इतिहास में।
चुनके दिवाल जो छिपाये माता गौरी जी को,
‘मंगल’ मनाने लगे आस्था के सुभाष में।

जांच टीम संग दोनों पक्षकार साथ रहे,
सुबह दोपहरी से काम को निभाया था।
तहखाना इमेज में बनी जो दीवार रही,
वो श्रृंगार गौरी श्री मूर्ति को छिपाया था।
स्वेत सीमेंट तहखाने में मिला जो भी,
सद्व्यवहार भंग हुआ जो निभाया था।

मंगल’ मुरीद बीच तालमेल हुआ नहीं,
हताशा होने लगी साथ जो भी आया था।
सदी पन्द्रहवीं मूर्ति मिली तहखाने में जो,
भग्नावशेष का भण्डारण वहाँ भाया था।
यत्र-तत्र बिखरे हुए थे मूर्ति चारों ओर,
कुछ सही मूर्तियों को वहां पर छुपाया था।

फोटोग्राफी ली गयी करीने से सजा के इसे,
महमूद औरंगजेब मलवा बनाया था।
सर्वे ऑफ इण्डिया करेगी पहचान इसे,
न्याय प्रिय सर्वे का आदेश जो सुनाया था।

मिले हुए मलबे को छान रही सर्वे टीम,
सत्य दफनाया गया मलबे के ढेर में।
उजागर होते तथ्य कागज पे लाया गया,
बसते में बन्द करवाया गया देर में।

हाल ही में पेंटिंग तहखाने में हुयी है मिली,
किस सदी का है मुल्ला उलझाये फेर में।
कोर्ट के आदेश पर फिर जांच होगा क्योंकि,
दनुज प्रभाव सत्य छ्लें ना अहेर में।

कुछ कला कृतियाँ है कह रही लोगों से,
प्राचीन मूर्तियाँ दबा दी गयी तोड़ कर।
फोटो लिया जाने लगा बरामदा खम्भों का है,
रोशनी नीलाम हुयी शिव – धाम तोड़ कर।

रानी ग्वालियर बनवायी वहाँ मण्डप थी,
रास्ता सुरंग का है बना हुआ जोड़ कर।
कहा गया रामनगर किले में जा मिलता है,
राजघाट पुरातत्व में भी बना जोड़कर।

ताला खुला मिला तहखाने के दो कमरों का,
समय पाबंद सर्वे किया गया उसका।
देव परिसर की दुकाने सभी बन्द रहीं,
पाँव पयादे राहियों पर ध्यान जिसका।

तीसरे भी कमरे का ताला तोड़ा गया वहाँ,
चौथे कमरे का दरवाजा कहाँ खिसका।
अन्दर की चुनी गयी दीवारों के पीछे क्या है,
तोड़ने का न्यायिक आदेश नहीं उसका।

गुम्बद तालाब की भी रिकार्डिंग हु‌यी वहाँ,
साठ पैसठ परसेन्ट हुवा काम है।
देखने को शान्ति काशी वासियों में मिली अहा,
अधिवक्ता आयुक्त टीम भी ललाम हैं।

न्यायालय न्याय प्रिय काम को सराहें, लोग,
फर्स तोड़ जाँच हो तो सच खुले आम है।
‘मंगल’ मनावें लोग, देवता रमन्ते जहाँ,
मुल्ला कठमुल्ला छेड़ रहें, शिव-धाम है।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — श्रृंगार गौरी जी की साधना के साधक शिव, विविध प्रभाव छापे ‘ज्ञानवापी’ धाम हो। जिनकी उपासना को महिमा बखाने जग, नन्दीश्वर संग जो विराजे आठो याम हो। काल – काल महाकाल ताल ठोंक खड़े हैं जो, सदर अदालत दिया सर्वे प्रोग्राम हो। नंदी महराज सामने मिला था शिवलिंग, मिल गये बाबा शोर हुआ इजहार में। मूर्तियों को तोड़ रखा गया तहखाने में था, ताला नहीं खोला गया ही इन्तजार में। टूटी मूर्तियाँ मिली अंधेरे में विराजमान, उसकी रिकार्डिंग हुयी बैटरी प्रकाश में। मिट्टी डाली नमी मिली दस दिन पहले की, राज खुला पक्ष और विपक्ष बीच क्रास में। मिले हुए मलबे को छान रही सर्वे टीम, सत्य दफनाया गया मलबे के ढेर में। उजागर होते तथ्य कागज पे लाया गया, बसते में बन्द करवाया गया देर में। “सत्य छुपाये नहीं छुपता।”

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गुरु – शिष्य परम्परा की शुरुआत कब और कैसे?

Kmsraj51 की कलम से…..

Beginning of Guru Shishya tradition when and how | गुरु–शिष्य परंपरा की शुरुआत कब और कैसे हुई?

वैदिक युग के साहित्य अध्ययन की सुविधा से पूर्व वैदिक काल जो 1500 ई. पूर्व से लेकर 1000 ई. पूर्व तक तथा उत्तर वैदिक काल 1000 ई. पूर्व से लेकर 500 ई. पूर्व तक में विभक्त किया गया। ऋग्वेद से हमें पूर्णरूपेण ऋग्वैदिक काल का इतिहास ज्ञात होता है। उत्तर वैदिक काल का विकास संस्कृति का उत्थान ऋग्वेद से ही हुआ। इस काल का इतिहास संहिता अख्यक ग्रंथ ब्राह्मण एवं उपनिषदों से प्राप्त हुआ है। आर्य सभ्यता को फैलाव ऋग्वैदिक काल तक पंजाब एवं सिंध तक सीमित रहा, परंतु उत्तर वैदिक काल में आर्यों का प्रसार व्यापक क्षेत्र में हो गया। आर्य सभ्यता का केन्द्र सरस्वती से गंगा तक दोआब में विकसित-विस्तृत था। आध्यात्मिक तत्वों की विशाल राशि वेद है। इन तत्वों का अनुगमन ही धर्म है। धर्म का स्त्रोत वेद है।

वैदिक काल का जीवन दर्शन

वेद प्रत्यक्ष या अनुमान द्वारा अगम्य औषधि तत्वों का सुगमता से बोध अनुभव कराता है। अलौकिक तत्वों के रहस्य जानने के लिये वेद का अध्ययन जरूरी है। इसे जानने हेतु दर्शन एवं चिंतन की आवश्यता है। चिंतन से नवीन दार्शनिक आयाम प्राप्त होते है। वैदिक काल का जीवन दर्शन, निष्ठा, आस्था एवं अनुराग था। उक्त काल में कर्मठता, एकनिष्ठा, के आधार पर समन्वय अनुशासन अनुकरण करते रहे। वेदों के सूक्त, सरल, सुबोध, सुविधाजनक तथा देवताओं को प्रसन्न करने हेतु है। अथर्ववेद में वरुणा नदी का उल्लेख से कुछ विद्वान वाराणसी नाम की प्राचीनता का अनुमान करते हैं, तो भी यह नगर काशी की तुलना में जाती रही, परंतु मुख्य रूप से संस्कृत विद्या पर विशेष वद दिया जाता था।

ऋग्वेद कालीन समाज में भौतिक की अपेक्षा बौद्धिक ज्ञान के महत्व का लोगों के ऊँचे विचार ज्ञान की महिमा आध्यात्मिक चिंतन और भौतिक आकर्षण के प्रति विरक्त मनुष्य की जीवन के मूल्य थे। यहाँ वेद में गायत्री मंत्र ज्ञान के उच्चतम आधार थे। मंच द्रष्टा ऋषियों में उच्चतम दार्शनिक चिंतन दिग्दर्शिका होता था। ऋग्वेद के अनुसार स्वाध्याय एवं प्रवचन के अनुगमन से मनुष्य एकाग्र-चीना होता है। लोग विविध विद्या का अध्ययन कर देवताओं को प्रसन्न करते थे और अपनी कामयाबी की पूर्ति करते थे। वैदिक काल में प्रमुख रूप से वेद अध्ययन होता था।

शिक्षा शास्त्र का निर्माण स्वरों के अनुशासन एवं शुद्धता के लिये किया गया। योद्धा को धर्म की शिक्षायें कंठस्थ करायी जाती, तो वहीं पुरोहितों को संस्कार के मंत्रों का, शिक्षाओं की विस्तृत व्याख्या बतायी जाती थी। गुरू-शिष्य परम्परा का निर्वहन काशी में होता था। ब्रह्माघाट पर ब्रह्मशाला को ब्रह्मा जी ने आकर ब्राह्मण वंश चलाया था, ऐसी काशी की मान्यता है। विद्या, श्रद्धा और योग से किया गया कर्म संयुक्त होने का प्रबल हो जाता है। शिक्षा से सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का उत्कर्ष होता। ज्ञान शिक्षा से प्राप्त होता है, ज्ञान जीवन को प्रकाशवान बनाता है। मानव को संमार्ग अवलोकन कराता है। ज्ञान से जीवन का कठिनतम कठिनाइयों को दूर करने का सम्बल प्राप्त होता करने में शिक्षा का महत योगदान है। समाज को विकसित करने तथा जीवन को सात्विक और नैतिक निर्देशों का पालन करने का मार्ग शिक्षा द्वारा प्रदान होता है।

उपनयन संस्कार

व्यक्ति आत्मनिर्भर हो, बहुमूल्य शिक्षा का विकास करता है। पारिवारिक निर्वहन के साथ-साथ सामाजिक आर्थिक नैतिक, धार्मिक उत्थान करते हुये चरित्रवान बनकर उत्कृष्ट व्यक्तित्व के उत्तरदायित्वों के साथ सभ्य समाज का नवनिर्माण करता है। मौखिक शिक्षा का प्रचलन वैदिक काल में था। आगे चल कर कमल एवं भोजपत्र पर मयूर पंखों से लिखा जाने लगा। शिक्षा का आरम्भ ब्रह्मचर्य आश्रमों में उपनयन संस्कार के बाद ही होता था। विद्यारम्भ संस्कार के समय बालक गुरूवंदना कर गुरू के प्रति निष्ठा व्यक्त करता था। उपनयन उपरांत ब्रह्मचारी बालक को विद्यामय शरीर और ज्ञानमुक्ति मस्तिष्क प्राप्त होता था, जो माता-पिता से प्राप्त स्थल शरीर से भिन्न था। शिक्षा ग्रहण करने के काल का निर्धारण किया गया था, जो क्रमशः 8-10 वर्ष क्षत्रिय, 11-12 , वर्ष की आयु में शिक्षा प्रारम्भ करने का निर्धारण था। गुरूकुल की प्रथा थी कि गृह त्याग कर बालक गुरू आश्रमों में रहते और योग्यतानुसार शिक्षा प्रदान की जाती रही। उपनिषदों के गुरूकुल के स्थान आचार्य कुल का प्रयोग आते हैं। शिक्षा और विद्या के अद्धतीय अधिष्ठानों का उल्लेख महाकाव्य में गुरुकुल का उल्लेख मिलता है।

उच्चकोटि के गुरूकुल व आश्रम

पूर्वकाल में भारद्वाज एवं वाल्मीकि आश्रम उच्चकोटि के गुरूकुल थे। { महाभारत के द्वारा } मार्कण्डेय एवं कण ऋषि के आश्रम शिक्षा के प्रधान विद्या स्थल थे। वैदिक काल में गुरू के निम्न प्रकार बताये गये हैं। आचार्य, उपाध्याय, प्रवक्ता, अध्यापक, श्रोचिय, गुरू, ऋत्विक, चरक। उक्त गुरूओं का वैदिक काल एवं सूक्तयुग में वेद का ज्ञान स्मरण ! शक्ति पर आधारित था। वेद मंत्रों का कंठस्थ! किया जाता था। गुरूकुल में ज्ञान प्राप्त करने हेतु अध्ययन-अध्यापन कंठस्थ कर होता था। वैदिक युग में आचार्य और गुरू का स्थान देवता-सा था, जो आदरयुक्त, गरिमामय और प्रतिष्ठित था। अग्नि का आचार्य अंगिरा के रूप में अतवरण हुआ, इंद्र के गुरू के रूप में प्रतिष्ठा थी। ऋग्वैदिक आचार्य दिव्य और आलौकिक ज्ञान के प्रतीक थे।

शिक्षा केंद्रों द्वारा समाज को नई दिशा

दृष्टि के धनी होने और बुद्धि तीक्ष्ण होना! शिक्षा के कारण स्वभाविक हो सकता है। एक व्यक्ति से दूसरा अधिक विवेकशील तथा विद्वान हो सकता है। निरंतरता में त्रुटियों के बावजूद काशी की शिक्षा पद्धति ने समाज को एक नई दिशा प्रदान की। आज विश्वविद्यायल, काशी, कश्मीर, धारा, कनौज, उपहित्न पातन, कांची, नालंदा, विक्रमशीला, बल्लभी एवं त्रावस्ती जैसे शिक्षा केंद्रों द्वारा समाज को नई दिशा प्रदान करने का क्रम जारी है। काशी में छोटी-बड़ी वेदशालाओं में दर्जनों भर शिष्य वेद परम्पराओं का निर्वहन कर रहे हैं। ऋग्वेद की शाकल शाखा कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा शुक्लर यजुर्वेद की माध्यंदिन शाखापूर्ण रूप से काशी में विद्यमान है। सामवेद की रमणीय शाखा में आंशिक गान करने वाले भी कुछ गुरू-शिष्य परम्परा काशी में दृष्टिगत होती है।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — वैदिक काल का जीवन दर्शन, निष्ठा, आस्था एवं अनुराग था। उक्त काल में कर्मठता, एकनिष्ठा, के आधार पर समन्वय अनुशासन अनुकरण करते रहे। वेदों के सूक्त, सरल, सुबोध, सुविधाजनक तथा देवताओं को प्रसन्न करने हेतु है। अथर्ववेद में वरुणा नदी का उल्लेख से कुछ विद्वान वाराणसी नाम की प्राचीनता का अनुमान करते हैं, तो भी यह नगर काशी की तुलना में जाती रही, परंतु मुख्य रूप से संस्कृत विद्या पर विशेष वद दिया जाता था। ऋग्वेद कालीन समाज में भौतिक की अपेक्षा बौद्धिक ज्ञान के महत्व का लोगों के ऊँचे विचार ज्ञान की महिमा आध्यात्मिक चिंतन और भौतिक आकर्षण के प्रति विरक्त मनुष्य की जीवन के मूल्य थे।

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यह लेख (गुरु – शिष्य परम्परा की शुरुआत कब और कैसे ?) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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काशी कहां चली।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kashi Kahan Chali | काशी कहां चली।

काशी संसार सागर से पार उतारने वाली भक्ति भावन नगरी है। काशी समीचीन यथार्थ सुदृढ़ शोत्रसम्मत् सर्वसिद्धि तपोभूमि है। काशी में जहां मरणोपरांत भक्ति मुक्ति मिलती है वही काशी में किये पुण्य अथवा पाप कर्म भी अक्षुण्ण होते हैं। मानव यूं तो बुद्धिजीवी है, फिर काशी की गरिमा पर कहीं प्रश्नचिन्ह न लगे, आंच न आवे ऐसे कार्यो से भावुक हो लोग तमाम अनैतिक कार्यों में लिप्त नजर जाने क्यों लोग दिखते हैं। इससे साफ जाहिर है जन – जन में वैभव, पराक्रम मनस्विता और जीवट, ओजस् तेजस् की कमी कहीं न कहीं हमारे अंदर अवश्य ही प्रभावित कर रही है। फाल्गुन मास में बरसाने वृंदावन – मथुरा होली के माहौल में जब रंग विरंगे रंगों से सरावोर रहती है वहीं काशी, काशी में बाबा भोले भी इस सुअवसर से अछूते क्यों रह जायेंगे।

आमल एकादशी 

आमल एकादशी को भोले भी भाव विह्वल हो स्नान करते हैं, सप्रेम भरी होली-रंगभरी के रंग से सराबोर होते हैं साथ ही अतिविशिष्ट शृंगार भी कराते हैं। इन्हीं दिनों सिद्धि चक विधानानुसार धर्म के अष्ट चिन्ह के पूजा विधान में भी लिखा गया है—

कार्तिक फाल्गुन अषाढ़ के अंत अठ दिन माहि।
नन्दीश्वर श्वर जात है, हम पूजे इह ठाहिं॥

अर्थात् — जैन श्रावक उक्त मास के अंतम आठ दिन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक काल्पनिक रूप में इन्द्र इन्द्राणी देवता का विधानपूर्वक पूजन, भजन भी होता है। जब काशी का वर्णन हम कर रहे हों, वहां शिवलिंग का वर्णन न हो तो काशी का वर्णन संभवतः अधूरा प्रतीत होता है। वैगे तो मनुष्यों द्वारा कुछ भी पूर्ण कर पाना समीचीन नहीं हैं।

निराकार पार ब्रह्म परमेश्वर

पूर्ण तो मात्र ब्रह्म है जो निराकार पार ब्रह्म है जो निराकार पार ब्रह्मपरमेश्वर ही है। हम जिस ज्योतिर्लिंग का वर्णन यहां करने जा रहे हैं वह वही है जो आपकी आत्मा का स्वरूप है। जब बच्चा मां के गर्भ में आता है तो वही अंडाकार रूप धारण करता है जिस आकार में शिवलिंग होता है। मरणोपरांत अग्नि दहन के समय भी शनैः शनैः पुनः उन्हीं स्वरूप में ही, यह मानवीय रूपाकाया पंच भूतात्मा पंचतत्व में विलीन हो जाता है। शिव आनन्ददाता हैं। जिस दिन आप शिव में लीन होंगे और गंगा के पावन जल से परिपूर्ण हो जायेंगे उस दिन से कुछ शेष नहीं बचा। द्वंद नहीं निर्द्वद हो जायेंगे। विलक्षणता की अनुभूति होनी स्वभावतः हो जायेगी।

काशी में स्त्रैण और नगरी पुरुष को खोजते फिरते रहते हैं शायद उन्हें ज्ञात नहीं शिव अर्धनारीश्वर है। बांवले से सड़कों गलियों ऐसे में देखते ही होगें। आप में भी द्वंद्व होना स्वाभाविक है ही, क्योकि यह जगत ही द्वंद्व से निर्मित है। तो आप भी दो होंगे ही। इतना तो अवश्य ही है। द्वैत से अद्वैत में पहुंचने के मार्ग की आकांक्षा में आपको उस शिवलिंग की अपने घर में उपासना करनी होगी। जिसके द्वारा आप निर्द्वद्व हो जाय। वह तभी संभव होगी जब मेक्सिमम ६ अंगुल की ही मूर्ति विधान सहित स्थापित करने परांत आप के अन्दर ध्यान योग प्राणायाम अथवा अन्यान्य विधाओं से विह्वल विकल अति आतुरता आनन्द हो, जिस समय उस अलौकिक बोध गुदगुदाहट आलिंगन सा परम आनंद मिल जाये आप अनुभूति करें, काशी की एक रेखा तक पहुंच रहा हूँ।

प्रथम पूज्य देवाधिदेव – भोले के सुपुत्र गौरी के लाल गणेश जी

हमें काशी का वर्णन करते समय प्रथम पूज्य देवाधिदेव भोले के सुपुत्र गौरी के लाल गणेश जी को नहीं भूलना होगा जिसकी प्रतिमूर्ति बड़ा गणेश में प्रतिष्ठापित है। बड़ा गणेश जी को भी हमें हर शुभ कार्य में प्रथम सादर याद करना चाहिए। यहां गणेश चतुर्थी के दिन सैलानियों की भीड़ स्वाभाविक हर्षानुभूति कराता है। गणेश जी के लिए यह भी कहना अतिशयोक्ति न होगी—

सुख समृद्धि का जब आयेगा नया दौर।
गणपति गजबदना को पूजेंगे लोग॥

यहीं; मंगल ने कहा है—

  • मांगो न और काहू से याचक बन काशी में चातुर्मास बिताय रहतु ना एकै द्वार लेत न हाय वहां सव तीरथराज देवगण चरवन लेत चबाय चहु और महिमा काशी में।
  • पंचाक्षरी मंत्र पढ़ महिमा तन की काशी त्रिलोचन लोचन कर्णघंटा घंटा बजत गिरजानन्दन शिवयाचक वनि हो काशी में।

आज हम अध्यात्म, नैतिकता, संस्कृति पश्चिम से लेते जा रहे हैं। हमें याद करना होगा स्वामी विवेकानन्द जी के मुख, मुखार परमार्थ तप, सेवा को भी, हमें याद करना होगा, स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के उपदेशों को, कबीरदास के कर्मयोग, राजर्षि विश्वामित्र के ‘तप’ को, मीरा का प्रेम, राजा मान्धाता के ‘त्याग’ और राजा हरिश्चंद्र का ‘सत्य’, लक्ष्मीबाई के शौर्य को भी हमें नहीं भूलना होगा। आज काशी में ही क्या सारी पृथ्वी बोझ से दबी जा रही है। हमें मिटाना है काशी के साथ सारी धरती के क्लेश को?

गंगा में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है—

सद्भावना पूर्ण वातावरण का हम सब जन मिल निर्माण करें। काशी के हाथीघाट, शिवाला घाट वह स्थान है जहां राजा विजयानगरम् का हाथी आता था। इस घाट की बनावट ऐसी थी कि जो लोग तैरना नहीं जानते थे वे इस घाट पर कमर भर पानी में नहा सकते थे परंतु आज यहां कीचड़ का अम्बार रहता है इसलिए नहीं कि गंगा का बालू एकत्र हो गया है। बलात गंगा में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। चूंकि अंग्रेजों के समय में कस्साई बाड़ा के जो जानवरों का खून पहले गंगा जी में नहीं आता था आज खून शाम होते ही रंग बिरंगे रंगों में कभी लाल, कभी हरा, कभी बैगनी, कभी काला एवं मटमैले कलर की धार बन कर सम्वत् २०४६ से गंगा में अनवरत आ रहा है।

यही नहीं रंगाई के कारखानों का रंग एवं हजारों लीटर केमिकल तथा लगभग सौ लीटर खून डायरेक्ट गंगा में प्रतिदिन अनवरत बहाया जाता है। प्रतिदिन लोहता भिटारी के बीच बने नाले से भी केमिकल निरर्थक वरुणा नाले से होकर अनवरत वरुणा नदी में बहाया जा रहा है। वरुणा नदी भी उसे बेहिचक गंगा को अर्पित कर देती है। आज गंगा जी के दंडी घाट से गुलेरी घाट तक मनुष्य क्या बन्दर व गाय भी पानी पीने से दूर नहा सकने में भी हिचकिचाहट कर रहे हैं। इन घाटों को भैंसा घाट कहा जाय तो भी अतिशयोक्ति न होगी।

इस प्रकार वाराणसी के छः घाट उक्त प्रदूषण से जहां प्रभावित हैं वही राजेंद्र प्रसाद घाट, मर्णिकर्णिका घाट भी प्रदूषण से क्यों अछूता रह जाय। अस्सी घाट का पूछना ही क्या है। नाला द्वारा हजारों लीटर गन्दा पानी गंगा में बहाने से नगर निगम आखिर क्यों नहीं बाज आता। इससे साफ जाहिर होता है कि केंद्र अथवा राज्य द्वारा चलाई गई सफाई निर्मलीकरण योजना सफेद हाथी का सा रूप धारण कर रखा है। मणिकर्णिका, हरिश्चंद्र घाट से आज भी अधजले शव गंगा में बहाकर ही नहीं अपितु पशुओं के शव को गंगा में प्रवाह कर गंगा में हम सड़ान्ध क्यों पैदा कर रहे हैं? पुलिस प्रशासन भी मूक दर्शक आखिर क्यों बनी रहती है? ऐसे में अधिक अपराध के युग का श्रीगणेश भी इस दशक को कहने से लेखक नहीं चुकेगा। बशर्ते नाबालिग बच्चों का शव धार्मिक परम्परानुसार जल प्रवाह की अवधारणा जब तक नहीं बदलेगी। हम धार्मिक परम्परा का जिक्र कर रहे हैं तो धर्माचार्य का जो सत्य निष्ठा से आज का मानव जीव कल्यार्णाथ यज्ञ, हवन, पूजन, प्रवचन, हरिभजन, शिवअर्चन, चण्डी जाप, नाम जपन, भजन पर भी हमें जिक्र करना मुनासिब होगा। आप काशी में कम नहीं पायेंगे।

ज्ञान, भक्ति, अध्यात्म तीर्थों का भी तीर्थस्थल काशी है।

ज्ञान, भक्ति, अध्यात्म और सर्व प्रेम का प्रतीक यह तीर्थों का भी तीर्थ है। आध्यात्मिक, धार्मिक तथा भक्तिभाव प्रेरक धार्मिक सांस्कृतक लोक उन्नायक आयोजनों का यह तीर्थस्थल काशी है। काशी में नास्तिक विचारधारा से युक्त जो प्राणी आता है रमण भ्रमण करने, वह भी शिवमय हो रम जाता है। भोला भूदेवी, भवानी, भगवती, जगदम्बा में कारण शास्त्रों में वर्णित है।

भोला काशी परिक्षेत्र चौदह कोश में आने वाले प्राणी को रमणीय कर देते हैं। कारण स्पष्ट है। यहां प्रतिदिन गंगा में मणिकर्णिका घाट पर दो घड़ी उपरान्त दोपहर में समस्त देव गण देवलोक से स्नान करने आते ही रहते हैं। काशी में देवताओं का आना अनवरत समस्त युगों से रहा है तो क्या हिंदू/सिक्ख/इसाई अथवा मुसलमान जिनमें एक सा पंच तत्वों से बनी बुद्धि विवेक प्रभु ने दे रखी है, हम उस गंगा मां को जिसने देवलोक से हाहाकार कर हमारे पूर्वजों का तारंतार किया, कर रही है, हम पवित्र क्यों नहीं रख सकते हैं?

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — काशी जहां स्वयंभू भोलेनाथ माता पार्वती व गणपति सहित अनंत काल से विराजमान है। पतित पावनि माँ गंगा को अपनी जटाओ से धीरे-धीरे मध्यम जल धारा के रूप में मानव कल्याण के लिए छोड़ा है, लेकिन आज का मानव पतित पावनि माँ गंगा को बहुत ज्यादा प्रदूषित कर रखा है। अब भी सुधर जाओ और पतित पावनि माँ गंगा को स्वच्छ करो, इसे प्रदूषित करना बंद करो। ज्ञान, भक्ति, अध्यात्म और सर्व प्रेम का प्रतीक यह तीर्थों का भी तीर्थ है। आध्यात्मिक, धार्मिक तथा भक्तिभाव प्रेरक धार्मिक सांस्कृतक लोक उन्नायक आयोजनों का यह तीर्थस्थल काशी है। काशी में नास्तिक विचारधारा से युक्त जो प्राणी आता है रमण भ्रमण करने, वह भी शिवमय हो रम जाता है। भोला भूदेवी, भवानी, भगवती, जगदम्बा में कारण शास्त्रों में वर्णित है।

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भ्रमर गुंजार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Bhramar Gunjar | भ्रमर गुंजार।

भ्रमर तुम्हारे गुंजारों पर,
फूल-फूल हंसे कलियां मुस्कायी।
पंकज के पंखुड़ियों में तुम,
बंद हुये रजनी जब आई।

रजनी भर दुःख झेला तुमने,
रश्मि रथी जब नभ में छाई।
छिप गये तारे नभ में सारे,
उषा लली चिड़ियां चहकायी।

मुंह धोकर जल-पान कि ये सब,
उठ गये बाल युवा नर – नारी।
बांध पीठ पर बस्ता बालक,
पढ़ने की सब की तैयारी।

भौंरे सहगामी बन मधु-रस,
चूस सुमन से छत्ता भरते।
शहद बना जीवन हित ‘मंगल’,
दिनभर दौड़ लगाते रहते।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — भ्रमर(भौरे) दिन – रात एक करके जी-तोड़ मेहनत करती है, एक फूल से दूसरे फूल पर, फिर तीसरे फूल पर जाती है, इस तरह से वह अनगिनत फूलों पर जाती है और उन फूलों से थोड़ा – थोड़ा रस लेकर अपने छत्ते में इकट्ठा करती है। इतनी कड़ी मेहनत के बाद तब कही जाकर मधु बनता है, जो हम सभी को बहुत पसंद हैं। भ्रमर(भौरे) से हमें यह सीख मिलती है की कठिन से कठिन मेहनत करने से कतराना व घबराना नहीं चाहिए। हम सभी को हर परिस्थिति से डटकर सामना करना चाहिए।

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यह कविता (भ्रमर गुंजार।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जागृत का एक दिन।

Kmsraj51 की कलम से…..

A Day Of Awakening | जागृत का एक दिन।

सम्मुख तेरे प्राण वान हूं,
या निष्प्राण हूं क्या बतलाऊं।
जागृति दर्पण के सम्मुख मैं,
क्या देखूं क्या देख न पाऊं।

फिर भी देखो उस महात्मा को,
नीरव में रसना – अर्पण है।
स्वर से स्वर का सम्मेलन ही,
प्राणवान जागृत दर्पण है।

जहां अनुत्तरित प्रश्न वहीं पर,
मिथ्या जगत का स्वप्न बड़ा है।
एक दिवस उठकर दौडूंगा,
नापूंगा जो जहां जड़ा है।

कलम उठा लिखने बैठूंगा,
अपनी गौरव गाथा को।
सबको दिखा सकूं दर्पण में,
संस्कृति और सभ्यता को।

धरती से नवम मंडल तक मैं,
दीपक ज्योति जलाऊंगा।
ज्ञान ध्यान से कबीर जैसा,
‘मंगल’ दरश कराऊंगा।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — हम सब जानते है की इस मिथ्या जगत की सभी चीजें नाशवान है सब नष्ट हो जायेगा एक दिन, फिर क्यों इन नाशवान चीजों के लिए कभी किसी को तकलीफ़ दे। अपने कर्म ऐसे करते चले की सभी को प्रेरणा मिले अच्छा-अच्छा कर्म करने का। कभी भी कोई ऐसा कार्य न करें की आपके कार्य से किसी को दुःख पहुंचे। एक लेखक अपनी कलम से अपने देश की महान संस्कृति और सभ्यता को दिखाने की कोशिश करता है। धरती से नवम मंडल तक का दर्शन कराता है अपनी लेख से लेखक। अपना जन्म, अपने जननी, व जन्मभूमि राष्ट्र के लिए सच्चे मन से समर्पित करें।

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यह कविता (जागृत का एक दिन।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।

Kmsraj51 की कलम से…..

Coordinating Nature Of Kashi | काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।

काशी विश्व की प्राचीन नगरी है। बुद्ध की उपदेश स्थली, जैन तीर्थंकर महावीर की धर्म देशना स्थली तथा सुपार्श्वनाथ और जैन पार्श्वनाथ तीर्थंकरो की जन्मस्थली होने के साथ ही काशी रामानन्द, आदि शंकराचार्य, कबीर, रैदास, तुलसीदास विवेकानन्द जैसे महान धर्माचार्यों एवं चिंतकों की कर्म भूमि भी रही है।

विभिन्न पुराणों से विदित होता है कि काशी पहले विष्णुतीर्थ था जो बाद में शिवतीर्थ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यह प्रधानतः शिव की नगरी रही है। यहाँ के 17वीं से 20वीं शताब्दी ई० के लगभग सभी मंदिर भोलेनाथ शिव को समर्पित हैं। इन मंदिरों में गर्भगृह में शिवलिंग और चारो ओर की भित्तियों पर शक्ति, विष्णु, सूर्य एवं गणेश मूर्तियाँ हैं जो समन्वयात्मक धार्मिक आस्था की साक्षात साक्षी है। इतना ही नहीं काशी में लोक धर्म से सम्बन्धित पक्ष, नाग, वृक्षपूजन की परम्परा रही है। इसे न केवल शिव वरन् काशी में जन्में सुपार्श्वनाथ और पार्श्वनाथ के मस्तकों पर दिखाये जाने वाले सर्वफलों के रूप में भी देखे जा सकते हैं।

17वीं से 19वीं शताब्दी ई0 के बीच काशी की धार्मिक एवं सांस्कृति समन्वय की भंगिकी आदि केशव से अस्सी तक फैले हुए घाटों की अनवरत श्रृंखला में देखी जा सकती है। घाटों के मंदिरों, मठों और अन्य अवशेषों में पूरे भारतवर्ष का धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप मूर्तिमान हो उठा है।

यदि कहा जाय कि काशी में सम्पूर्ण विश्व सूक्ष्म रूप से विद्यमान है तो अतिश्योक्ति नहीं। मान्यता के अनुसार देश की सभी नदिया, पवित्र स्थल और देवता काशी में निवास करते हैं। मत्स्यपुराण में काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है जिसे शिव कभी नहीं छोड़ते। इसे महाश्मसान, आनन्दकानन और मोक्षदा अर्थात् मोक्ष देने वाली सप्तपुरियों में एक माना गया है। काशी का महात्म्य कुछ ज्यादा ही है तभी तो जब कभी ग्रहण लगता है तो काशी में बहुत भीड़ उमड़ पड़ती है। यद्यपि सूर्यग्रहण में सबसे बड़ा मेला कुरुक्षेत्र का होता है पर चन्द्रग्रहण में काशी में ही यात्रीगण देश के विभिन्न भागों से आने हैं। भविष्यपुराण में लिखा है :

कुरुक्षेत्रसमा गंगा यत्र कुत्रावगाहिता।
कुरुक्षेत्राहशगुणा यत्र विन्धेन संगता॥

काशी प्रधान तीर्थं स्थान है। यह शुद्ध रूप से तपोभूमि है। देवदर्शनल, मंदिरों की रचना और यहाँ के घाटों की छटा ही मुख्य दर्शनीय हैं। यहाँ गंगास्नान की महिमा अवर्णनीय मानी गई है। सर्वत्र गंगा स्नान पूण्यजनक है। वाराणसी (काशी) में गंगा स्नान बारहो मास नेमी लोग करते हैं। काशी की उत्तरवाहिनी गंगा की महिमा काशी यात्रा में सप्तभाग उल्लिखित है। पंचगंगा और परिसर के घाटों, मर्णिकर्णिका घाट एवं दशाश्वमेघ घाट पर प्रातः 3 बजे से ही स्नानार्थी आने लगते हैं। बाबा विश्वनाथ की नगरी में मरने का कोई डर नहीं होता क्योंकि यहाँ तो सभी मृत्यु को अपने पाहुन (अतिथि) की तरह जोहते ही रहते हैं।

यह सत्य है कि काशी वास करने में जो सुख यहाँ पर होता है वह समस्त ब्रह्मांड मंडप में कहीं भी उपलब्ध नहीं है। काशी में धर्म अपने चारो पैरों पर खड़ा है। अर्थ भी काशी में अनेक प्रकार से वर्तमान है। यही कारण है कि पाप-विनाशिनी देवगणों को भी दुर्लभ सतत गंगा-संगता, संसार पाशच्छेदिनी शिव-पार्वती से अविमुक्त, त्रिभुवन से अतीत मोक्षजननी काशी पुरी को मुक्त पुरुषगण कभी परित्याग नहीं करते। तभी तो जगत प्रसिद्ध जाबालि ऋषि ने कहा है। हे आरुणे ! असी नदी इड़ा नाड़ी और वरुणा नदी पिंगलानाड़ी कही गई है इन्हीं दोनों के मध्य में वह अविमुक्त क्षेत्र काशी है। यही काशी सुषुम्ना नाड़ी है। इन्हीं तीनों नदियों की यह वाराणसी है।

हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — यह सत्य है कि काशी वास करने में जो सुख यहाँ पर होता है वह समस्त ब्रह्मांड मंडप में कहीं भी उपलब्ध नहीं है। काशी में धर्म अपने चारो पैरों पर खड़ा है। अर्थ भी काशी में अनेक प्रकार से वर्तमान है। यही कारण है कि पाप-विनाशिनी देवगणों को भी दुर्लभ सतत गंगा-संगता, संसार पाशच्छेदिनी शिव-पार्वती से अविमुक्त, त्रिभुवन से अतीत मोक्षजननी काशी पुरी को मुक्त पुरुषगण कभी परित्याग नहीं करते। तभी तो जगत प्रसिद्ध जाबालि ऋषि ने कहा है। हे आरुणे ! असी नदी इड़ा नाड़ी और वरुणा नदी पिंगलानाड़ी कही गई है इन्हीं दोनों के मध्य में वह अविमुक्त क्षेत्र काशी है। यही काशी सुषुम्ना नाड़ी है। इन्हीं तीनों नदियों की यह वाराणसी है। काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

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यह लेख (काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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सत्यों की सत्य संजीवनी काशी।

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Satya Sanjivani Kashi of Truths | सत्यों की सत्य संजीवनी काशी।

काशी, गंगा और महादेव संपूर्ण भू भाग पर यदि कहीं अवस्थित हैं तो वह मात्र काशी पुण्य परिक्षेत्र में ही, अन्यत्र अविज्ञात है। काशीपुरी में धर्म-अधर्म अक्षुण्ण होता है। यह आनंदकानन अविमुक्त महाक्षेत्र है। काशी का माहात्म्य वैदिक एवं स्मार्त है। अतएव काशी में —

अब पुनि पुनि कलम उठायेंगे।
काशी ! रहि रहि गुन गायेंगे॥
लाख लताड़त शिव आयेंगे।
काशी करवटऽ सुनायेंगे॥

  • हिमालय पुत्री मां गंगा काशी में उत्तराभिमुख अविरल बहती है, जिसे ‘मुदिता’ कहा गया है। गंगा पितृ मुख होने से मुदित रहती है और शिव (पति) का सान्निध्य पाकर आह्लादित होती है शायद यही कारण है कि शिव ब्रह्म को काशी बड़ी प्रिय लगती है। शास्त्रों में वर्णन है कि नारायण की आराधना से प्रसन्न होकर परम शिव द्रवीभूत हो गये। वह ब्रह्माद्रव्य युक्तिकाशी भू पर स्थित होकर भी भू से पृथक है। जहाँ शंकरपूजन और शिव के मधुर गान से शिव ब्रह्म प्रसन्न होकर इच्छित वर प्रदान करते हैं, वहीं शैलपुत्री देवी सौभाग्य सुख प्रदान करती हैं।
  • काशी में भक्तों की मनोरथदात्री भवानी ही स्थिर वास करने देती है और भवानी ही काशीवासियों का सदा योगक्षेम करती हैं। भिक्षुक को काशी में मोक्षा काशी भिक्षा प्रदान करने वाली विश्वेश्वर की कुटुम्बिनी काशीवासियों को मोक्ष की भिक्षा प्रदान करती हैं, ओंकार का उच्चारण कराती है। ऊं शांतिः शान्तिः शान्तिः हृदयस्थ कराती है। अतएव इनकी सेवा करनी चाहिए, सेवा से प्रभु मुदित होते हैं। काशीवासियों को यदि कभी कुछ भी दुर्लभ हो तो पूजा पाठ करने से ही भवानी उसे सुलभ करा देती हैं। मानव को चैत्र की अष्टमी में रात्रिजागरण, गंगा स्नान और भव पूजन वांछित फल प्रदान करता है।

काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

जल, जीवन का प्रमुख रसायन तत्व है। काशी में गंगाजल का स्पर्श होते ही महापातुकावली का तुरंत क्षय हो जाता है। यही नहीं यहां वास करने वाले को पद-पद पर, धर्म की ढेर, मिलती है जिसे करोड़ों यत्न करने से भी वैसी धनराशि एकत्र नहीं की जा सकती, सो काशी की गलियों में घूमने (भ्रमण) से पद पर आपसे आप प्राप्त हो जाती है। धर्मपरायण मनुष्य! धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष पाने की अभिलाषा जनित त्रैलोक्य पावनी अविमुक्त क्षेत्र काशीपुरी की पदयात्रा करें। भारतीय धार्मिक संप्रदाय चाहे वैदिक हो या स्मार्त उन सबों का आदर विद्वानों महापुरुषों ने किया है।

वृहस्पति देव ने “काशी को मुक्तिपुरी कहा है। इन्द्र से तो यहां तक कह दिया कि काशी सदृश तुम्हारी देवपुरी भी नहीं है। वहीं जाकर मुक्ति हेतु तुम भी विश्वाराध्य विश्वेश्वर की आराधना करो। ऐसे में भला मुक्तिपुरी का दर्शन-वर्णन मेरे जैसे अल्पज्ञ क्यों नहीं करेगा।” यथा—

गंगा में खूब नहायेंगे,
भव भावन गीत सुनायेंगे।
भर भाँग धतूरा खायेंगे,
मेवा संग मिश्री मिलायेंगे।

और आगे का दृश्य-

भाँग धतूरा पीवत साथी,
पथिक पहलुआ पंडित पापी।
अबे तबे अरु चोखा – बाटी,
डंड बैठकी खुला सपाटी।

सौम्य तप जप को समय सीमा में न बांधकर बुद्धिमानजन काशी स्त्रोत की महिमा का वर्णन करता है। गाता-गुनगुनाता है। उसे हृदयस्थ करता है। स्तोता ब्रह्ममुहूर्त में उठकर ‘काशी’ मंत्र के जप – तप की युक्ति करता है। जप – तप की सामर्थ्य जिस महापुरुष में है, वह मुनि रूप पृथ्वी पर क्रोधी भी हो सकता है अन्यथा असमर्थ पुरुष, प्राणी क्षीणवृत्ति की तरह क्या कर सकता है। जो उद्गीथ है यानी गाने योग्य है वही प्रणव या ऊँकार है। ॐ की उपासना से ही देवता अमृत प्राप्त किये और मृत्यु को जीतकर अमरत्व पाए।

इतना याद रखें — अधम का भोग भोगने के उपरांत ही धर्म का फल प्राणी प्राप्त (भोगता) करता है। पुण्यशाली लोग इस लौकिक जगत में सदैव एकरूपता को नहीं छोड़ते यानी हर्ष और विषाद दोनों ही निष्फल है। आनंद कानन अविमुक्त महाक्षेत्र में सद्विचारयुक्त धर्म परायण धर्म, कर्म पालक और ध्यान ज्ञान युक्त तपी जपी मनुष्य तत्व अन्वेषण करता है और वेदशास्त्रों के स्वाध्याय, उसके अभ्यास से चित्त शुद्धि इंद्रियों पर विजय दम, दान और दया से परिपूर्ण घोर तपस्या की मदद से ही परमविज्ञ वर पा जाता है।

काशी में क्रोध से बचना चाहिए। काशी क्षेत्र ही क्या कहीं भी कभी भी क्रोधयुक्त होने से बड़े-बड़े कष्ट संचय, संचित तपस्या का वैसे ही क्षय हो जाता है – जैसे मानो बादल के आच्छादन से चंद्रमा और सूर्य का तेजपुंज प्रकाश प्रायः विलुप्त हो जाता है। मुनि, ज्ञानी अपने विवेकरूपी बांध से क्रोधरूपी नदी के वेग को स्वेच्छानुसार स्वयं प्रवाहित करता रहता है।

ज्ञान का महान प्रताप कोई विरल ही जानता है। जब आत्मा स्व स्वरूप में स्थित होती है तब उच्चारण करने वाला अन्य कोई नहीं होता अर्थात् वक्ता श्रोता का द्वैत मिट जाता है। मनुष्य में ईश्वरीय प्रेरणा से अचानक ब्रह्म चैतन्य का स्फुरण होता है और वह जिज्ञासु की नई स्थिति में आ जाता है। परंतु संसारी जीव में जिज्ञासा का उदय भी परमात्मा की कृपा से होता है। जब तक मनुष्य में माया से विरक्ति, ईश्वर से अनुरक्ति और सद्गुरु की कृपा नहीं होती, जीव में जिज्ञासा का उदय नहीं होता, गूढ़तत्व चैतन्य शक्ति का उदय नहीं होता। परम सत्य की उपलब्धि के बिना अज्ञान का नशा बार – बार मनुष्य पर छा जाता है।

जो मनुष्य इंद्रियों से विषय वासनाओं का त्याग करके तिमिराच्छन्न रजनी में जागृत अवस्था को प्राप्त कर लेता है काशी में भगवान भोले उसे तारक मंत्र देकर मोक्ष प्रदान करते हैं। तारकेश्वर मंदिर कोलकाता में है। काशी में विश्वनाथ मंदिर के पास स्थापित है। काशी में वर्तमान तारकेश्वर महादेव का जीर्णोद्धार हो रहा है। जिस प्रकार योग में प्रवेश पाने के लिए सद्गुरु कृपा प्रसाद ही सहायक होता है, कर्म से क्षत्रिय विप्र हो जाता है और गीता का सार त्याग है, ईश्वर की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ज्ञान है, उसी प्रकार काशी-काशी जपते-जपते रहने से प्रत्यक्ष मोक्ष है। काशी में मुक्तिमण्डप में मात्र बैठकर भव स्मरण यथा शक्ति धनदान एवं पवित्र कथाओं का श्रवण करने से करोड़ों गोदान का पुण्य प्राप्त होता है।

यहाँ मुनियों ने असंख्य शिवलिंग अनादिकाल से स्थापित किये हैं। जहां पर एक भी शिवलिंग की स्थापना करने से अखिल ब्रह्मांड की प्रतिष्ठा करने का फल प्राप्त होता है, भला उस पुण्य क्षेत्र काशी को कौन मानव जीव छोड़ सकता है। जबकि शास्त्र में कहा गया है काशी की प्राप्ति में पग-पग पर विघ्न आ पड़ते हैं। काशी में वास उन्हीं को मिलता है जो कठोर तपस्या बड़े से बड़े व्रत एवं महादानों के करने वाले होते हैं। काशी गुरु श्रेष्ठ है।

धर्मेश्वर ने मंदराचल पर जगदम्बा से कहा था — काशी की निर्वाण की भूमि है। लोमेश और व्यास जी का भी यही मत रहा। याज्ञवल्क्य मुनिराज ने तो कहा कि — काशी में मरण से परम पद प्राप्त होता है। त्रयमयी काशी समस्त विधाओं की आश्रयस्थली है, महालक्ष्मी की परालय एवं मुक्ति क्षेत्र है। ब्रह्माजी ने कहा — काशी में मरने वालों को मुक्ति मिलती है, यही कारण है कि यहाँ विविध धर्मशाला परिसर मुक्ति क्षेत्र में ठहरने हेतु आज कलिकाल में भी उपलब्ध है काशी ? काशन प्रकाशन करने वाली आत्मज्ञानवती बुद्धि का नाम काशी है।

आठवीं सदी में शंकराचार्य जी को भी बनारस (काशी) आकर अपने मत की विद्वानों द्वारा पुष्टि करानी पड़ी और संभवतः ब्रह्मसूत्र की रचना बनारस में गंगातट पर ही की थी। भागवत में – नदियों में गंगाजी, देवताओं में विष्णु भगवान, वैष्णवों में शंकरजी सर्वश्रेष्ठ है, पुराणों में- श्रीमद्भागवत, ऋषियों में शौनकादि उसी प्रकार श्रेष्ठ हैं जैसे- तीर्थों में काशी सर्वश्रेष्ठ है। इस लोक में बुद्धिमान सज्जनों की ही वह बुद्धि सब कुछ निश्चय करती है जिस नगरी में पुण्यजला स्वयं स्वर्गतरंगिणी गंगा बह रही हैं। वे ही चरण इस भू लोक पर विचरण करना जानते हैं यानी धन्य हैं जिन पुण्य प्राणियों के चरण विश्वनाथ जी के नगर ‘काशी’ में भूमि पर विचरण करते हैं। यद्यपि माघ – मास में सभी तीर्थ, तीर्थराज प्रयाग चले जाते हैं परन्तु अविमुक्त क्षेत्र के तीर्थ काशी में ही रहते हैं। लेखक की कलम से —

कैसा चरित रच्यों मेरो भाई।
बूझत अनबुझ मन जन खिसियाई॥
हलाहल गंगाजल अमरित साँईं।
अगणित कला को मंगल री गाई॥

पुण्य क्षेत्र में संन्यास लेकर रहने, भ्रमण करने वालों की जीवमुक्त और रुद्र स्वरूप मानना चाहिए। इस पुण्य अक्षुण्ण क्षेत्र में यदि प्राण संकट में पड़ा हो तो भी असत्य (मिथ्या) भाषण नहीं करना चाहिए। हां, किसी जीव के प्राण रक्षार्थ झूठ मजबूरी में बोला जा सकता है। काशी शिव को अति प्रिय है। शिव जी के मुख से- मैं ममता रहित हूँ। योगिनियाँ ब्रह्मा और रुद्रगण इसी कारण यहां बसे, काशी के ही हो गये। वे सब वाराणसी के प्रति शिव का प्रेम जानते थे।

जहां जय द्वारा ज्ञानी बटुक ब्रह्मवाद का निनाद करते हों, गुरुचरण विश्वनाथ साक्षात् विराजमान वर्तमानरूप से हों, महर्षि व्यास सदृश पुण्यात्मा वास करते हों, वैद्यराज, दान, ध्यान, तप, ज्ञान कलिकाल में भी हों साथ ही सर्वधर्म की मर्यादा मर्यादित पूर्वक अधिधार्मिक लोगों द्वारा पालन किया जा रहा हो उस मुक्तिदायिनी धर्मपरायण, विराटरूपा काशी को सत् सत् नमन, धरती पर कौन नहीं करेगा।

मुक्ति जन्म महि जानि, ज्ञान खानि, अध हानिकरि।
जहँ बसिं शंभु भवानि, सो काशी, सेइय कस न॥

हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — अधम का भोग भोगने के उपरांत ही धर्म का फल प्राणी प्राप्त (भोगता) करता है। पुण्यशाली लोग इस लौकिक जगत में सदैव एकरूपता को नहीं छोड़ते यानी हर्ष और विषाद दोनों ही निष्फल है। आनंद कानन अविमुक्त महाक्षेत्र में सद्विचारयुक्त धर्म परायण धर्म, कर्म पालक और ध्यान ज्ञान युक्त तपी जपी मनुष्य तत्व अन्वेषण करता है और वेदशास्त्रों के स्वाध्याय, उसके अभ्यास से चित्त शुद्धि इंद्रियों पर विजय दम, दान और दया से परिपूर्ण घोर तपस्या की मदद से ही परमविज्ञ वर पा जाता है। काशी में क्रोध से बचना चाहिए। काशी क्षेत्र ही क्या कहीं भी कभी भी क्रोधयुक्त होने से बड़े-बड़े कष्ट संचय, संचित तपस्या का वैसे ही क्षय हो जाता है – जैसे मानो बादल के आच्छादन से चंद्रमा और सूर्य का तेजपुंज प्रकाश प्रायः विलुप्त हो जाता है। मुनि, ज्ञानी अपने विवेकरूपी बांध से क्रोधरूपी नदी के वेग को स्वेच्छानुसार स्वयं प्रवाहित करता रहता है। काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

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यह लेख (सत्यों की सत्य संजीवनी काशी।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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