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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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कर्म करने की प्रेरणा देने वाली कविता

जागृत का एक दिन।

Kmsraj51 की कलम से…..

A Day Of Awakening | जागृत का एक दिन।

सम्मुख तेरे प्राण वान हूं,
या निष्प्राण हूं क्या बतलाऊं।
जागृति दर्पण के सम्मुख मैं,
क्या देखूं क्या देख न पाऊं।

फिर भी देखो उस महात्मा को,
नीरव में रसना – अर्पण है।
स्वर से स्वर का सम्मेलन ही,
प्राणवान जागृत दर्पण है।

जहां अनुत्तरित प्रश्न वहीं पर,
मिथ्या जगत का स्वप्न बड़ा है।
एक दिवस उठकर दौडूंगा,
नापूंगा जो जहां जड़ा है।

कलम उठा लिखने बैठूंगा,
अपनी गौरव गाथा को।
सबको दिखा सकूं दर्पण में,
संस्कृति और सभ्यता को।

धरती से नवम मंडल तक मैं,
दीपक ज्योति जलाऊंगा।
ज्ञान ध्यान से कबीर जैसा,
‘मंगल’ दरश कराऊंगा।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — हम सब जानते है की इस मिथ्या जगत की सभी चीजें नाशवान है सब नष्ट हो जायेगा एक दिन, फिर क्यों इन नाशवान चीजों के लिए कभी किसी को तकलीफ़ दे। अपने कर्म ऐसे करते चले की सभी को प्रेरणा मिले अच्छा-अच्छा कर्म करने का। कभी भी कोई ऐसा कार्य न करें की आपके कार्य से किसी को दुःख पहुंचे। एक लेखक अपनी कलम से अपने देश की महान संस्कृति और सभ्यता को दिखाने की कोशिश करता है। धरती से नवम मंडल तक का दर्शन कराता है अपनी लेख से लेखक। अपना जन्म, अपने जननी, व जन्मभूमि राष्ट्र के लिए सच्चे मन से समर्पित करें।

—————

यह कविता (जागृत का एक दिन।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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ज्ञानसेनी।

Kmsraj51 की कलम से…..

GyanaSeni | ज्ञानसेनी।

“ज्ञानसेनी”
अधरों का पुष्प,
उम्मीदों का सूरज,
करें संकट दूर रघुवर,
ज्ञानसेनी सजाया है।

रिश्तों का मिठास,
हैं स्वप्नों में आप।
चलो फिर गीत गाएं,
ज्ञान दर्पण लाया हूं।

भोला का डिम डिम डमरू,
काशी की मस्ती भरी।
धनुष वाण में श्री राम,
ज्ञानसेनी भरत से मिलाया है।

स्मृतियों में अयोध्या धाम,
चक्रवर्ती साम्राज्य है नाम।
प्रकृति का आलिंगन,
ज्ञान सेनी ने दिखाया है।

ज्ञानसेनी …
ज्ञान की छोटी थाली,
नक्काशीदार थाली।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — अपने भारत देश में प्राचीन काल से ही हर रिश्तों का अपना – अपना महत्व व सम्मान है। श्री राम व उनके भाइयो लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न से हमे सीख़ मिलती है की भाई का भाई से कैसा प्रेम व व्यवहार होना चाहिए आपस में और माता-पिता का आदेश व सम्मान सर्वोपरि हैं। हमे गर्व है अपने प्राचीन काल से चली आ रही भारतीय संस्कृति, संस्कार व सभ्यता पर, “गर्व से कहो हम सनातनी है, जय जय श्री राम!” जैसे – जैसे समय बदला वैसे – वैसे इंसान के सोचने व समझने की छमता ख़त्म होती जा रही है, अपने प्राचीन महत्वपूर्ण संस्कारों को भूलता जा रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप कई तरह के समस्याओं से परेशान है। हे मानव अब भी समय है सुधर जाओ वर्ना ये पृथ्वी रहने लायक नहीं रहेगी। याद रखें की – जिस देश के लोग अपनी प्राचीन संस्कृति, संस्कार व सभ्यता को भूल जाते है, उनको विलुप्त होने से कोई भी नहीं बचा पायेगा। इसलिए अपने अंदरऔर वर्तमान पीढ़ी व आने वाली नई पीढ़ी को प्राचीन भारतीय संस्कृति, संस्कार व सभ्यता का पूर्ण ज्ञान दो, और उन्हें अनुसरण करना भी सिखाओ।

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sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह कविता (ज्ञानसेनी।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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विवेक और विचार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Vivek Aur Vichar | विवेक और विचार।

पंचायत नहीं विचारों में स्वतंत्रता लाएं,
विवेक कल्याण कारक होता है।
रीति – रिवाज, शास्त्र – नियम अपनाएं,
अंधानुकरण कभी ना करें।

समय – समय पर नियम बदलते रहते हैं,
विचार धाराओं में परिवर्तन होते रहते हैं।
उसमें कोई – कोई पिछड़ भी जाता है,
अंधानुकरण नहीं करना चाहिए।

परीक्षा लेना मानव व्यवहार में आता है,
परमात्मा दीया विवेक और विचार है।
जो बात बुद्धि – विवेक में खरी उतरे,
उस पर ही हमें अमल करना चाहिए।

विवेक पूर्ण किया गया निर्णय ही,
सर्वथा कल्याणकारी होता है।
न्यायशीलता – निष्पक्ष- सतोगुणी,
सहृदय, उदार और हितैषी बनें।

विवेकी व्यक्ति दुराग्रही नहीं होता है,
नीर – क्षीर विवेक अलग करता है।
नेक व्यक्ति में बुराई हो उसे छोड़ें,
बुरे व्यक्ति की भी अच्छाई ग्रहण करें।

सिद्धांतों का परीक्षण करना आवश्यक है,
परस्पर विरोधी विचार निरर्थक होता है।
समर्थक और विरोधी कम नहीं होते हैं,
दोनों विचारधाराएं आपस में टकराती हैं।

परीक्षण से सच – गलत की पहचान है,
परीक्षा और समीक्षा ही आधार है।
दूसरों की नकल करना सुगम है,
अधिक माथापच्ची लोग पसंद नहीं करते हैं।

वाणी द्वारा प्रकट विचार क्षण स्थाई होता है,
लेखनीबद्ध किया हुआ चिरस्थाई होता है।
बुद्धि को जो उचित लगे उसे अपनाते हैं,
अंधानुकरण नहीं, हम कतराते हैं।

किसी के महानता को कम ना आंकिए,
पवित्र ग्रंथों का आदर करते रहिये।
बुद्धि संगत अंश ग्रहण करना चाहिए,
जिज्ञासु के सत्य खोज को अपनाएं।

दुनिया उज्ज्वल व्यक्तित्व पर सिर नवाती है,
उनके अनीश्वरवादी मत को नहीं मानती है।
उपयोगी तत्व को ग्रहण करना भी आता है,
महापुरुषों के लेखन में समरसता है।

काल से ही मानव का सम्मान था,
आधुनिक काल में कुत्ते पर स्वाभिमान।
मनुष्य रोटी के लिए कड़ी मेहनत करता है,
परंतु कुत्ता ए .सी .गाड़ी में चलता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — जैसे – जैसे समय बदला वैसे – वैसे इंसान के सोचने व समझने की छमता ख़त्म होती जा रही है, अपने प्राचीन महत्वपूर्ण संस्कारों को भूलता जा रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप कई तरह के समस्याओं से परेशान है, फिर भी भौतिक विकास के नाम प्रकृति के पञ्च तत्वों से खिलवाड़ करने से नही चूक रहा है। हे मानव अब भी समय है सुधर जाओ वर्ना ये पृथ्वी रहने लायक नहीं रहेगी। याद रखें की – जिस देश के लोग अपनी प्राचीन संस्कृति, संस्कार व सभ्यता को भूल जाते है, उनको विलुप्त होने से कोई भी नहीं बचा पायेगा। इसलिए अपने अंदरऔर वर्तमान पीढ़ी व आने वाली नई पीढ़ी को प्राचीन भारतीय संस्कृति, संस्कार व सभ्यता का पूर्ण ज्ञान दो, और उन्हें अनुसरण करना भी सिखाओ।

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यह कविता (विवेक और विचार।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जागो अब तो जागो।

Kmsraj51 की कलम से…..

Jago Ab To Jago – जागो अब तो जागो।

ले रही अँगड़ाई, पूरब से है आई
रक्तिम कर लाई है।
प्रथम संदेशा आई है,
सूरज की अँगड़ाई है।
धरती की अरुणाई है,
जागोऽऽ अब तो जागो।

इठलाती वसुंधरा चली,
हरियाली की छाया तले।
सदियों से दु:ख झेले,
ममता के सजे मेले।
अब तो टूटे भव के बंधन,
जुड़े प्रेम के बंधन।
ली रेणुका ने अँगड़ाई है,
जागोऽऽ अब तो जागो।

आया जमाना नया-नया,
नई-नई इसकी सुबह।
उम्मीदों के दामन में,
घायल हुआ यकीन।
वैदिकता से भरा रहा,
भरतवंश का देश।
शौर्य सुहृद हरियाली, शांति का,
ऐसा ही है इसका परिवेश।
देख इसे रत्नगर्भा हर्षाई,
कहती जागोऽऽ अब तो जागो।

आये तुम गोदी में,
निर्वस्त्र न कर डालो।
माँ हूँ तुम सबकी,
कुछ शर्म तो दिखाओ।
सनातन धर्म को सुदृढ़ बनाओ,
रहो भूखे मगर
इक-दूसरे को खुशियों से भर जाओ।
प्रेम प्रीति त्याग की मूरत बन,
जग में ब्रह्मदेश का नाम कर जाओ,
जागोऽऽ अब तो जागो।

सदा पाठ पढ़ाया है,
अपना स्वार्थ भुलाया है।
दूसरे की खातिर,
प्राणों का जौहर कराया है।
भगवा लाल पीले से,
पन्थ शहीदों का कहलाया है।
विश्वास श्रद्धा कर्म-धर्म देकर,
तुम्हें सनातन मैनें बनाया है।
लाज मेरी तुम सब रख लेना,
तिरंगे की शान न घटने देना।
प्राणों को प्राणों मे भर लेना,
हँसकर तुम उसे दे देना,
जागोऽऽ अब तो जागो।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला – सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

—————

यह कविता (जागो अब तो जागो।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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आफताब बन जाऊँगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आफताब बन जाऊँगा। ♦

है बुलन्द हौसला दूर फ़लक पे छा जाऊँगा,
धरा क्या कहकशां में आशियां बनाऊँगा।
चमकने का थोड़ा-सा वक्त दे दो दोस्तो,
तपकर खुद ही आफताब बन जाऊँगा।

है मजबूत इरादे डगर हर पार कर जाऊँगा,
दिल में जज़्बा काट पर्वत राह नई बनाऊँगा।
निकल पड़ा हूँ अब मंजिल की ज़ुस्तज़ु में,
मरुधरा में शीतल सरिता धारा ले आऊँगा।

ढ़ल जायेगी ये स्याह रात नई सुबह लाऊँगा,
है कठिन राह जरा सी पर मैं ना घबराऊँगा।
है यकीन खुद के ही साहस दृढ़ मनोबल पर,
कर नव संकल्प तूफानों से भी टकराऊँगा।

मुश्किलें तो आएंगी जरूर मैं ना डगमगाऊँगा,
सितारों भरी रात में चाँद – सा खिल जाऊँगा।
हूँ जुगनू किसी रोशनी का, मैं मोहताज नहीं,
निशां कामयाबी के फ़लक पे छोड़ जाऊँगा।

♦ सुरेश राणा ‘सुमेश‘ जी – कैथल, हरियाणा ♦

—————

  • “सुरेश राणा ‘सुमेश‘ जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — साहस वह महत्वपूर्ण गुण हैं जो हमारे अंदर शारीरिक व नैतिक रूप में शामिल होता है। इसके द्वारा हम किसी भी परिस्थिति से लड़ने के लिए सदैव सक्षम रहते है। किसी भी परिस्थिति में कौन से साहस का उपयोग करना है, यह पूरी तरह से आपकेआत्मशक्ति पर निर्भर करता है। कोई भी चुनौतीपूर्ण कार्य केवल कहने मात्र से नहीं बल्कि उसे बहादुरी के साथ करना ही साहस है। कोई भी कार्य कहने मात्र से पूर्ण नहीं होता बल्कि साहस के साथ उस कार्य को करना होता हैं। जीवन में मुश्किलें तो आएंगी जरूर, लेकिन जीतता वही हैं जो बिना रुके, बिना थके व बिना डगमगाए आगे बढ़ता रहता है।

—————

यह कविता (आफताब बन जाऊँगा।) “श्री सुरेश राणा ‘सुमेश‘ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे। महाकाल और माता रानी की कृपा आप पर सदैव ही बनी रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सुरेश राणा ‘सुमेश‘ है। मैं राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय कमालपुर, कैथल, हरियाणा में “हिंदी प्राध्यापक” के पद पर कार्यरत हूँ। मेरी शिक्षा, एम. ए.,(हिंदी, अंग्रेजी) बी. एड., एम. फिल., डिप्लोमा इन एजुकेशन। अब तक शिक्षण अनुभव: 24 वर्ष का।

सम्मान: हरियाणा राज्य शिक्षक पुरस्कार (राज्यपाल से सम्मानित)

साहित्यिक उपलब्धियाँ —

पुस्तक प्रकाशित: अंकुरण, स्त्री अस्तित्व का संघर्ष(काव्य संग्रह)

मुख्य सम्पादक: बाल मंथन मासिक पत्रिका

♦ ⇒ विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में कहानियाँ, ग़ज़लें, कविताएं, शैक्षणिक लेख प्रकाशित। ‘शिक्षा सारथी’ हरियाणा शिक्षा विभाग की मासिक पत्रिका में नियमित शैक्षिक लेख प्रकाशित। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोध पत्र वाचन एवम प्रकाशन।

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चलो चलते हैं।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ चलो चलते हैं। ♦

चलो चलते है सब हौसलों की कमान लेकर।
सपनों को उमंग के पंखों की नई उड़ान देकर।

सीधे रास्ते कभी नही मिलते इस जीवन में।
जिस पर चलकर सहज खुशी हो जाए मन में।

राह में आयेंगे अनेकों बार दुखों के रोड़े।
पर धैर्य के दामन को हम कभी न छोड़े।

सहनशीलता है सबसे सुंदर गुण एक ऐसा।
सोने पर हो बिल्कुल सुहागे ही जैसा।

आओं तराश ले कुछ अपने ही हुनर को ऐसे।
सुनार सोने के आभूषण गढ़ सुंदर रूप दे जैसे।

रास्ते की आई किसी भी मुसीबत से न घबराना।
बस नेक कर्म संग प्रभु स्मरण ही करते जाना।

हर अंधेरा छंट जाएगा तेरी उस नायाब राह का।
जवाब हँसी में मिलेगा तुझें तेरी हर आह का।

विवेक को सदैव ही रखना दिल में करके समाहित।
फिर हासिल हो जाये जीवन में हर मंजिल की जीत।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जैसे सोने को जितना तपाया जाता है उससे सारी गंदगी बाहर आ जाती है, तब जाकर अच्छा आभूषण बनता है, अपने इसी सहनशीलता के गुण के कारण सोने का मूल्य बढ़ जाता है। मानव जीवन में भी बहुत उतार चढ़ाव आते है, लेकिन संयम व धैर्य से जीवन के हर मुश्किलों से बाहर निकला जा सकता हैं। एक बात सदैव ही याद रखे अपने कर्म पर व अपने आप पर सदैव ही विश्वास बनाये रखे, अपने सपनों को उमंग के पंखों की नई उड़ान देकर आगे चलते चले।

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यह कविता (चलो चलते हैं।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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रचनाएं भर रात जगाती।

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♦ रचनाएं भर रात जगाती। ♦

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भर रात जगाती रचनाएं,
नींद ना आती।
रात गुनगुना कर कह जाती,
कही कहानी अपनी।

चार दिसंबर दो हजार सत्तरह,
लहुरावीर की बात बताती।
लोगों में भरा कितना कलियुगी,
जीवन इतिहास दोहराती।

इठलाते-बलखाती व्यंग बराबर,
कसते उपहास उड़ाती।
इसे विडम्बना ही मानो ,
सच्चाई सपने में कह जाती।

वह दिन भी सूना ही होगा।
वस्तु लोग खोई लौटाते…
पर देशों की परम्परा को,
राष्ट्र हम नहीं ला पाते।

दक्षिण भारत की सभ्यता को,
भी हम नहीं अपनाते।
भूलें अपनी या प्रवंचना,
औरों को भी बतलाऊं।

उस गाथा को कैसे गाऊं,
अंधियारी की रात सुनाऊं।
नहीं-नहीं खिलखिली धुप में घुप,
हंसता हुआ मित्र एक आता।

अपनी वह पाथेय एक सौ छत्तीस,
साथ लेकर रचना जाता।
सुनकर क्या कर सकते हो ?
मेरी अमृत बीती गाथा।

अभी समय है सोई नहीं मेरे,
परीश्रम की मौन व्यथा।
साइट पर मेरे विद्यमान है,
लेकर एक सुनहरी आभा।

उसने व्यसन में अपने साथियों के,
साथ छका – गांठा।
कुतूहल थी जिन आँखों में,
उस दिन पानी भर आया।

स्वच्छंद सुमन जो खिले थे कल तक,
प्रतिभा छाया गुनगुना उठी।
कहती ! ठहरो कुछ सोचो -विचार करो,
अपने भी घातक होते लहरी।

हो चकित निकल आई सहसा।
कोमल पंखुड़ियां आँखों में गहरी।
‘मंगल’ सौन्दर्य जिसे कहते हैं।
अनंत अभिलाषा के सपने तुझमें।

सुन्दरता मेरी आँखों को रह-रहकर,
समझा जाती है, और बताती।
हलकी सुशान की भाषा में,
मित्रों की दुर्बलता को भी गाती है।

तुम्हें स्मित रेखा खींच कर एक अभी,
संधिपत्र लिखना ही होगा।
उस अंचल मन पर उन्हीं मित्रों से,
कुछ – कुछ सीखना होगा।

नित्य विरुद्ध संघर्ष सदा,
विश्वास, संकल्प अश्रु जल से।
आसमान में पक्षी उड़ती,
समंदर में तुझे उतरना होगा।

‘मंगल’ कह दो अपनी यादों को,
मुझे जलाना छोड़ दे।
उस पर आंसूं बहाना व्यर्थ है।
रक्त बहाना छोड़ दें।

बहुत पहेलियाँ सुलझाया होगा,
अपने इस जीवन पल में।
सद्भाव – प्रेम की पोथी पढाओ।
अपने विछुरे साथियों में।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – रियलिटी को समझो, अपने आप में सुधार करो, मायाजाल में न फसो।

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यह कविता “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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