• Skip to main content
  • Skip to primary sidebar
  • Skip to footer
  • HOME
  • ABOUT
    • Authors Intro
  • QUOTES
  • POETRY
    • ग़ज़ल व शायरी
  • STORIES
  • निबंध व जीवनी
  • Health Tips
  • CAREER DEVELOPMENT
  • EXAM TIPS
  • योग व ध्यान
  • Privacy Policy
  • CONTACT US
  • Disclaimer

KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

Check out Namecheap’s best Promotions!

You are here: Home / Archives for sukhmangal singh articles

sukhmangal singh articles

शिवाजी महाराज मराठा साम्राज्य का विस्तार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Expansion of the Maratha Empire by Shivaji Maharaj

| शिवाजी महाराज मराठा साम्राज्य का विस्तार।

शिवाजी महाराज ने अपने जीवन में कई महत्वपूर्ण युद्ध लड़े, जिनमें से कुछ प्रमुख युद्ध निम्नलिखित हैं:

  • रायगढ़ का युद्ध (1646) : शिवाजी महाराज ने आदिलशाही सल्तनत के जनरल मुल्ला अली को हराया और रायगढ़ किले पर कब्जा किया, जो उनकी राजधानी बन गया।
  • तोरणा की लड़ाई (1647) : शिवाजी महाराज ने आदिलशाही सेना को हराया और तोरणा किले पर कब्जा किया, जो उनके साम्राज्य के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
  • तंजावुर की लड़ाई (1656) : शिवाजी महाराज ने मदुरै के नायक राजा की सेना को हराया और तंजावुर शहर पर कब्जा किया, जो एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था।
  • कल्याण की लड़ाई (1657) : शिवाजी महाराज ने मुगल सेना को हराया और कल्याण शहर पर कब्जा किया, जो उनकी आय में वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण था।
  • प्रतापगढ़ का युद्ध (1659) : शिवाजी महाराज ने आदिलशाही सेनापति अफजल खान को हराया और उनकी सैन्य लोकप्रियता पूरे भारत में बढ़ गई।
  • पावनखिंड की लड़ाई (1660) : शिवाजी महाराज के सेनापति बाजी प्रभु देशपांडे ने आदिलशाही सेना के जनरल सिद्दी मसूद को हराया और विशालगढ़ किले की रक्षा की।
  • सोलापुर की लड़ाई (1664) : शिवाजी महाराज ने आदिलशाही सेना को हराया और सोलापुर शहर पर कब्जा किया।
  • पुरंदर की संधि (1665) : शिवाजी महाराज ने मुग़ल सम्राट औरंगजेब के साथ एक संधि की, जिसमें उन्होंने 23 किले मुग़लों को सौंप दिए और बदले में अपनी स्वतंत्रता बरकरार रखने की अनुमति मिली।
  • उमरगढ़ की लड़ाई (1666) : शिवाजी महाराज ने मुग़ल सेना को हराया और उमरगढ़ किले पर कब्जा किया।
  • शिंदे वंश के साथ युद्ध (1670-71) : शिवाजी महाराज ने शिंदे वंश को हराया और अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
  • बरार और खानदेश की विजय (1673-74) : शिवाजी महाराज ने बरार और खानदेश क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की और अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

इन युद्धों के माध्यम से, शिवाजी महाराज ने अपने साम्राज्य का विस्तार किया और एक शक्तिशाली और स्वतंत्र मराठा साम्राज्य की स्थापना की।

शिवाजी महाराज के समय में 12 बलिष्ठ और वफादार सरदार थे, जिन्हें “12 मावळ” या “अष्टप्रधान मंडल” नहीं, बल्कि “अहमदनगर के 12 मावळ” के सरदारों के रूप में जाना जाता है, लेकिन यहाँ पर शिवाजी महाराज के 12 महत्वपूर्ण सेनापतियों और सहयोगियों का वर्णन है जिन्होंने उनके राज्याभिषेक और स्वराज्य की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी:

  1. बाजी पासलकर : एक वफादार और बहादुर सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के साथ कई लड़ाइयों में भाग लिया था।
  2. बाजीराव पेशवा : एक कुशल और अनुभवी सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के लिए कई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ जीती थीं।
  3. मल्हारजी होलकर : एक वफादार और बहादुर सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के साथ कई लड़ाइयों में भाग लिया था।
  4. रघुनाथ बल्लाल आत्रे : एक कुशल और अनुभवी सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के लिए कई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ जीती थीं।
  5. कान्होजी जेधे : एक वफादार और बहादुर सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के साथ कई लड़ाइयों में भाग लिया था।
  6. बाबाजी मुदगलराव : एक कुशल और अनुभवी सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के लिए कई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ जीती थीं।
  7. खान्दोजी कदम : एक वफादार और बहादुर सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के साथ कई लड़ाइयों में भाग लिया था।
  8. येसाजी कंक : एक कुशल और अनुभवी सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के लिए कई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ जीती थीं।
  9. तानाजी मालसुरे : एक वफादार और बहादुर सेनापति जिन्होंने सिंहगढ़ की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
  10. सिद्दी हिलाल : एक वफादार और बहादुर सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के साथ कई लड़ाइयों में भाग लिया था।
  11. नारो मुकुंद सबनीस : एक कुशल और अनुभवी सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के लिए कई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ जीती थीं।
  12. अणाजी दत्तो : एक वफादार और अनुभवी सेनापति जिन्होंने शिवाजी महाराज के साथ कई लड़ाइयों में भाग लिया था और उनके राज्याभिषेक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इन सभी सेनापतियों और सहयोगियों ने शिवाजी महाराज के स्वराज्य की स्थापना और उनके राज्याभिषेक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके बलिदान और वफादारी ने शिवाजी महाराज के सपनों को साकार करने में मदद की।

जहाँ तक यूनेस्को की विश्व धरोहर की बात है, तो शिवाजी महाराज से संबंधित कई स्थलों को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल करने के लिए प्रस्तावित किया गया है, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:

  • रायगढ़ किला : शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक रायगढ़ किले में हुआ था, जो एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है।
  • सिंहगढ़ किला : यह किला शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण सैन्य अभियान का स्थल था, जहाँ पर तानाजी मालसुरे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इन स्थलों को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल करने के लिए प्रयास जारी हैं, जो शिवाजी महाराज के इतिहास और उनके स्वराज्य की स्थापना को विश्व स्तर पर प्रदर्शित करने में मदद करेगा।

शिवाजी महाराज के महाराष्ट्र में कई महत्वपूर्ण किले थे, जिन्होंने उनके स्वराज्य की स्थापना और सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यहाँ पर शिवाजी महाराज के 11 महत्वपूर्ण किलों का वर्णन है:

  1. रायगढ़ किला : यह शिवाजी महाराज का राजधानी किला था, जहाँ पर उनका राज्याभिषेक हुआ था। रायगढ़ किला महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित है।
  2. सिंहगढ़ किला : यह किला पुणे जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण सैन्य अभियान का स्थल था।
  3. प्रतापगढ़ किला : यह किला महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण किले के रूप में जाना जाता है।
  4. पन्हाला किला : यह किला महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण किले के रूप में जाना जाता है।
  5. विजयदुर्ग किला : यह किला महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण नौसैनिक अड्डे के रूप में जाना जाता है।
  6. सिंदुदुर्ग किला : यह किला महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज द्वारा निर्मित एक महत्वपूर्ण किला है।
  7. पुरंदर किला : यह किला महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण किले के रूप में जाना जाता है।
  8. कोंढाणा किला : यह किला महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित है और सिंहगढ़ किले के पास स्थित है।
  9. तोरणा किला : यह किला महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण किले के रूप में जाना जाता है।
  10. राजगढ़ किला : यह किला महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण किले के रूप में जाना जाता है।
  11. लोहगढ़ किला : यह किला महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित है और शिवाजी महाराज के एक महत्वपूर्ण किले के रूप में जाना जाता है।

इन किलों ने शिवाजी महाराज के स्वराज्य की स्थापना और सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और आज भी ये किले महाराष्ट्र के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों के रूप में जाने जाते हैं।

शिवाजी महाराज का शासन प्रबंध बहुत ही कुशल और प्रभावी था। उन्होंने अपने स्वराज्य में एक मजबूत और अनुशासित प्रशासनिक प्रणाली की स्थापना की, जो उनके शासन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहाँ पर शिवाजी महाराज के शासन प्रबंध की कुछ विशेषताएं हैं:

  • अष्टप्रधान मंडल : शिवाजी महाराज ने अपने शासन में अष्टप्रधान मंडल की स्थापना की, जो आठ मंत्रियों की एक परिषद थी जो उनके शासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। इन मंत्रियों में शामिल थे:
  1. पेशवा (प्रधानमंत्री)
  2. अमात्य (वित्त मंत्री)
  3. मंत्री (गृह मंत्री)
  4. सचिव (विदेश मंत्री)
  5. सुमंत (विदेश सचिव)
  6. पंडितराव (धार्मिक मामलों के मंत्री)
  7. सेनापति (सैन्य कमांडर)
  8. न्यायाधीश (न्यायाधीश)
  • प्रशासनिक इकाइयाँ : शिवाजी महाराज ने अपने स्वराज्य को कई प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया, जिन्हें परगना कहा जाता था। प्रत्येक परगने का एक प्रशासक होता था जो शासन के कार्यों को संभालता था।
  • कर प्रणाली : शिवाजी महाराज ने एक न्यायसंगत कर प्रणाली की स्थापना की, जिसमें किसानों और व्यापारियों से कर वसूला जाता था। कर की दरें न्यायसंगत थीं और कर वसूली की प्रक्रिया पारदर्शी थी।
  • न्याय प्रणाली : शिवाजी महाराज ने एक न्यायसंगत, न्याय प्रणाली की स्थापना की, जिसमें न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती थी जो मामलों की सुनवाई करते थे और न्याय प्रदान करते थे।
  • सैन्य प्रशासन : शिवाजी महाराज ने अपने सैन्य बलों को मजबूत और अनुशासित बनाने के लिए एक प्रभावी सैन्य प्रशासन की स्थापना की। उन्होंने अपने सैन्य कमांडरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ सौंपीं और उन्हें सैन्य अभियानों के लिए तैयार किया।

इन विशेषताओं के माध्यम से, शिवाजी महाराज ने अपने स्वराज्य में एक मजबूत और प्रभावी शासन प्रबंध की स्थापना की, जो उनके शासन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

♦ जिंजी किला ♦

जिंजी किला : तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले में स्थित एक ऐतिहासिक किला है, जो अपनी विशाल और मजबूत संरचना के लिए प्रसिद्ध है। यह किला 9वीं शताब्दी में बनाया गया था और इसका निर्माण चोल वंश द्वारा करवाया गया था।

♦ इतिहास ♦

जिंजी किले का इतिहास बहुत पुराना है और यह किला कई शासकों के अधीन रहा है, जिनमें चोल, पांड्य, विजयनगर साम्राज्य और मराठा साम्राज्य शामिल हैं। 17वीं शताब्दी में, यह किला मराठा शासक शिवाजी महाराज के पुत्र राजाराम के लिए एक महत्वपूर्ण आश्रय स्थल बन गया था।

♦ वास्तुकला ♦

जिंजी किले की वास्तुकला बहुत ही प्रभावशाली है और यह किला अपनी विशाल और मजबूत संरचना के लिए प्रसिद्ध है। किले में कई मंदिर, तालाब और अन्य संरचनाएं हैं, जो इसकी वास्तुकला की विविधता को दर्शाती हैं।

♦ महत्वपूर्ण विशेषताएं ♦

जिंजी किले की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं:

  • किले की दीवारें : जिंजी किले की दीवारें बहुत ही मजबूत और विशाल हैं, जो इसकी सुरक्षा के लिए बनाई गई थीं।
  • मंदिर : किले में कई मंदिर हैं, जो इसकी धार्मिक महत्व को दर्शाते हैं।
  • तालाब : किले में कई तालाब हैं, जो इसकी जल संचयन प्रणाली को दर्शाते हैं।

♦ आज का महत्व ♦

जिंजी किला आज भी एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है और तमिलनाडु के पर्यटन स्थलों में से एक है। यह किला अपनी विशाल और मजबूत संरचना के लिए प्रसिद्ध है और इसकी वास्तुकला की विविधता को दर्शाता है।

शिवाजी महाराज के जीवन में कई महत्वपूर्ण कार्य थे जिन्होंने उनके स्वराज्य की स्थापना और सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यहाँ पर शिवाजी महाराज के कुछ महत्वपूर्ण कार्यों का वर्णन है:

  1. स्वराज्य की स्थापना : शिवाजी महाराज ने अपने स्वराज्य की स्थापना के लिए काम किया, जिसमें उन्होंने अपने अनुयायियों और सेनापतियों के साथ मिलकर मुगल साम्राज्य और अन्य शक्तियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी।
  2. किलों का निर्माण और जीर्णोद्धार : शिवाजी महाराज ने कई किलों का निर्माण और जीर्णोद्धार किया, जो उनके स्वराज्य की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण थे।
  3. नौसेना का निर्माण : शिवाजी महाराज ने एक मजबूत नौसेना का निर्माण किया, जो उनके स्वराज्य की समुद्री सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण थी।
  4. प्रशासनिक सुधार : शिवाजी महाराज ने अपने स्वराज्य में प्रशासनिक सुधार किए, जिसमें उन्होंने एक मजबूत और कुशल प्रशासनिक प्रणाली की स्थापना की।
  5. सैन्य सुधार : शिवाजी महाराज ने अपने सैन्य बलों में सुधार किए, जिसमें उन्होंने एक मजबूत और अनुशासित सेना की स्थापना की।
  6. आर्थिक विकास : शिवाजी महाराज ने अपने स्वराज्य के आर्थिक विकास के लिए काम किया, जिसमें उन्होंने व्यापार और उद्योग को बढ़ावा दिया।
  7. धार्मिक सहिष्णुता : शिवाजी महाराज ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई, जिसमें उन्होंने अपने स्वराज्य में सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार दिए।
  8. न्याय प्रणाली : शिवाजी महाराज ने एक न्यायसंगत न्याय प्रणाली की स्थापना की, जिसमें उन्होंने अपने स्वराज्य के नागरिकों को न्याय प्रदान किया।

इन कार्यों के माध्यम से, शिवाजी महाराज ने अपने स्वराज्य की स्थापना और सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और एक मजबूत और समृद्ध राज्य की स्थापना की।

————♥————

शिवाजी महाराज का प्रभुत्व मुख्य रूप से महाराष्ट्र और उसके आसपास के क्षेत्रों में था। उनके स्वराज्य की सीमाएँ समय-समय पर बदलती रहीं, लेकिन उनके चरमोत्कर्ष के समय में उनका प्रभुत्व निम्नलिखित राज्यों और क्षेत्रों तक था :

  1. महाराष्ट्र : शिवाजी महाराज का स्वराज्य मुख्य रूप से महाराष्ट्र में था, जिसमें वर्तमान महाराष्ट्र के अधिकांश हिस्से शामिल थे।
  2. कोंकण : शिवाजी महाराज का प्रभुत्व कोंकण क्षेत्र पर भी था, जो वर्तमान महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्र में आता है।
  3. गोवा : शिवाजी महाराज ने गोवा के कुछ हिस्सों पर भी अपना प्रभुत्व स्थापित किया था, जो उस समय पुर्तगाली शासन के अधीन था।
  4. कर्नाटक : शिवाजी महाराज का प्रभुत्व कर्नाटक के कुछ हिस्सों पर भी था, विशेष रूप से बेलगाम और बीजापुर के आसपास के क्षेत्र।
  5. आंध्र प्रदेश : शिवाजी महाराज का प्रभुत्व आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों पर भी था, विशेष रूप से वर्तमान तटीय आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्से।
  6. तमिलनाडु : शिवाजी महाराज का प्रभुत्व तमिलनाडु के कुछ हिस्सों पर भी था, विशेष रूप से वर्तमान तमिलनाडु के उत्तरी हिस्से।

शिवाजी महाराज के स्वराज्य की सीमाएँ समय-समय पर बदलती रहीं और उन्होंने अपने जीवनकाल में कई लड़ाइयाँ लड़ीं और संधियाँ कीं जिससे उनके स्वराज्य की सीमाएँ विस्तारित हुईं। उनके स्वराज्य की सबसे बड़ी सीमा लगभग वर्तमान महाराष्ट्र की सीमा के समान थी, लेकिन इसमें कुछ अन्य क्षेत्रों के हिस्से भी शामिल थे।

शिवाजी महाराज का प्रतापगढ़ से संबंधित एक महत्वपूर्ण घटना अफजल खान की हत्या है। अफजल खान बीजापुर सल्तनत का एक शक्तिशाली सेनापति था, जिसे शिवाजी महाराज को पराजित करने के लिए भेजा गया था।

♦ अफजल खान की हत्या ♦

अफजल खान एक बड़ी सेना के साथ प्रतापगढ़ की ओर बढ़ा, जहाँ शिवाजी महाराज ने अपनी सेना के साथ उसका सामना किया। दोनों नेताओं के बीच बातचीत हुई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। अंत में, अफजल खान ने शिवाजी महाराज को मारने का प्रयास किया, लेकिन शिवाजी महाराज ने अपनी बघनखा (एक प्रकार का हथियार) से अफजल खान के पेट को फाड़ दिया और उसकी हत्या कर दी।

♦ घटना का महत्व ♦

अफजल खान की हत्या एक महत्वपूर्ण घटना थी जिसने शिवाजी महाराज की स्थिति को मजबूत किया और उनके स्वराज्य की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस घटना ने शिवाजी महाराज की बहादुरी और उनकी सैन्य क्षमता को प्रदर्शित किया और उनके अनुयायियों का मनोबल बढ़ाया।

♦ प्रतापगढ़ का महत्व ♦

प्रतापगढ़ एक महत्वपूर्ण किला है जो महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित है। यह किला शिवाजी महाराज के समय में एक महत्वपूर्ण सैन्य अड्डा था और अफजल खान की हत्या की घटना के बाद यह किला और भी महत्वपूर्ण हो गया। आजकल, प्रतापगढ़ एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है जो शिवाजी महाराज के इतिहास और उनके स्वराज्य की स्थापना की कहानी को दर्शाता है।

सुवर्ण किले से संबंधित एक महत्वपूर्ण घटना पन्हाला किले की घेराबंदी के दौरान शिवाजी महाराज का बचाव है। यह घटना 1660 में हुई थी, जब शिवाजी महाराज को पन्हाला किले में सिद्दी जौहर की सेना ने घेर लिया था।

♦ पन्हाला किले की घेराबंदी ♦

सिद्दी जौहर ने पन्हाला किले को घेर लिया था और शिवाजी महाराज को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर करने की कोशिश की। लेकिन शिवाजी महाराज ने हार नहीं मानी और उन्होंने अपने सैनिकों के साथ किले की रक्षा करने का फैसला किया।

♦ शिवाजी महाराज का बचाव ♦

शिवाजी महाराज ने अपने विश्वासपात्र शिवाजी काशिद को अपने जैसे कपड़े पहनाकर और अपने स्थान पर बैठाकर एक चाल चली। शिवाजी काशिद को सिद्दी जौहर की सेना ने शिवाजी महाराज समझकर हमला किया, जबकि वास्तविक शिवाजी महाराज सुरक्षित रूप से किले से बाहर निकल गए।

♦ घटना का महत्व ♦

इस घटना ने शिवाजी महाराज की चतुराई और उनकी सैन्य क्षमता को प्रदर्शित किया। शिवाजी महाराज का बचाव एक महत्वपूर्ण घटना थी जिसने उनके स्वराज्य की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

♦ सुवर्ण किले का महत्व ♦

हालांकि, यह घटना पन्हाला किले से संबंधित है, न कि सुवर्ण किले से। सुवर्ण किला एक महत्वपूर्ण किला है जो महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले में स्थित है, लेकिन इस किले से संबंधित कोई विशिष्ट घटना मेरे पास नहीं है। अगर आपके पास कोई विशिष्ट जानकारी है, तो मैं आपको और अधिक जानकारी प्रदान कर सकता हूँ।

खंडेरी किला एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है जो महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित है। यह किला शिवाजी महाराज के समय में एक महत्वपूर्ण नौसैनिक अड्डा था। खंडेरी किले से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं निम्नलिखित हैं :

♦ खंडेरी किले का निर्माण ♦

खंडेरी किले का निर्माण शिवाजी महाराज ने 1679 में करवाया था। इस किले का उद्देश्य मराठा नौसेना के लिए एक सुरक्षित अड्डा प्रदान करना था।

♦ नौसैनिक अड्डा ♦

खंडेरी किला एक महत्वपूर्ण नौसैनिक अड्डा था जहाँ मराठा नौसेना के जहाजों को सुरक्षित रूप से लंगर डाला जा सकता था। इस किले ने मराठा नौसेना को समुद्री डाकुओं और अन्य शत्रुओं से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

♦ अंग्रेजों और पुर्तगालियों के साथ संघर्ष ♦

खंडेरी किले ने अंग्रेजों और पुर्तगालियों के साथ संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मराठा नौसेना ने इस किले का उपयोग करके इन शक्तियों के जहाजों पर हमला किया और उन्हें पराजित किया।

♦ ऐतिहासिक महत्व ♦

खंडेरी किला एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है जो शिवाजी महाराज के समय के नौसैनिक इतिहास को दर्शाता है। यह किला आज भी एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है जो महाराष्ट्र के ऐतिहासिक महत्व को प्रदर्शित करता है।

इन घटनाओं से पता चलता है कि खंडेरी किला शिवाजी महाराज के समय में एक महत्वपूर्ण नौसैनिक अड्डा था जिसने मराठा नौसेना को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

————♥————

शिवनेरी किला एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है जो महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित है। यह किला शिवाजी महाराज के जन्मस्थान के रूप में प्रसिद्ध है। शिवनेरी किले से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं निम्नलिखित हैं :

♦ शिवाजी महाराज का जन्म ♦

शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 को शिवनेरी किले में हुआ था। उनके पिता शाहजी भोंसले एक मराठा सेनापति थे और उनकी माता जीजाबाई एक धार्मिक और संस्कृति से भरपूर महिला थीं।

♦ किले का महत्व ♦

शिवनेरी किला एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है जो शिवाजी महाराज के जीवन और उनके स्वराज्य की स्थापना के इतिहास को दर्शाता है। यह किला आज भी एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है जो महाराष्ट्र के ऐतिहासिक महत्व को प्रदर्शित करता है।

♦ किले की विशेषताएं ♦

शिवनेरी किला एक मजबूत और सुरक्षित किला है जो पहाड़ी पर स्थित है। इस किले की दीवारें और बुर्ज मजबूत पत्थरों से बने हुए हैं। किले में कई महत्वपूर्ण संरचनाएं हैं, जिनमें मंदिर, तालाब और सैन्य बैरकों शामिल हैं।

♦ पर्यटन स्थल ♦

शिवनेरी किला एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है जो अपनी ऐतिहासिक महत्व और सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। पर्यटक इस किले को देखकर शिवाजी महाराज के जीवन और उनके स्वराज्य की स्थापना के इतिहास को समझ सकते हैं।

♦ सांस्कृतिक महत्व ♦

शिवनेरी किला एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक स्थल है जो मराठा इतिहास और संस्कृति को दर्शाता है। यह किला आज भी मराठा समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है।

इन घटनाओं से पता चलता है कि शिवनेरी किला शिवाजी महाराज के जीवन और उनके स्वराज्य की स्थापना के इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

————♥————

शिवाजी महाराज एक महान नेता, सैन्य रणनीतिकार और राजनेता थे, जिनसे हमें कई महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण सबक दिए गए हैं जो हमें शिवाजी महाराज से मिलते हैं:

  1. नेतृत्व : शिवाजी महाराज एक महान नेता थे जिन्होंने अपने अनुयायियों को प्रेरित किया और उन्हें एक साझा लक्ष्य की दिशा में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया।
  2. सैन्य रणनीति : शिवाजी महाराज एक महान सैन्य रणनीतिकार थे जिन्होंने गुरिल्ला युद्ध की तकनीकों का उपयोग करके अपने शत्रुओं को हराया।
  3. राष्ट्रवाद : शिवाजी महाराज एक सच्चे राष्ट्रवादी थे जिन्होंने अपने देश और अपने लोगों के लिए लड़ाई लड़ी।
  4. न्याय और समानता : शिवाजी महाराज एक न्यायप्रिय और समानता के समर्थक थे। उन्होंने अपने शासन में सभी वर्गों के लोगों को समान अवसर प्रदान किए।
  5. शिक्षा और संस्कृति : शिवाजी महाराज शिक्षा और संस्कृति के महत्व को समझते थे। उन्होंने अपने शासन में शिक्षा और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए।
  6. आत्मनिर्भरता : शिवाजी महाराज आत्मनिर्भरता के महत्व को समझते थे। उन्होंने अपने शासन में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए।
  7. धैर्य और साहस : शिवाजी महाराज एक धैर्यवान और साहसी व्यक्ति थे जिन्होंने अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम किया।
  8. नैतिकता और आदर्श : शिवाजी महाराज एक नैतिक और आदर्शवादी व्यक्ति थे जिन्होंने अपने जीवन में नैतिकता और आदर्शों को महत्व दिया।

इन सबकों अपनाकर, हम अपने जीवन में सफलता प्राप्त कर सकते हैं और एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।

————♥————

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

————♥————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन प्रेरणा, साहस और राष्ट्रप्रेम का प्रतीक है। उन्होंने अपने अद्भुत नेतृत्व और नीतियों से भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अपना नाम अंकित किया। आज भी उनका नाम लेते ही प्रत्येक भारतीय के मन में गर्व और श्रद्धा की भावना जागृत होती है। वे केवल मराठाओं के ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के गौरव हैं। उनका स्वराज्य का सपना, न्यायपूर्ण शासन और निर्भीक नेतृत्व आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरणा देता रहेगा।

—————

यह लेख (शिवाजी महाराज मराठा साम्राज्य का विस्तार।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari Etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं! ____

Filed Under: 2025 - KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य Tagged With: Expansion of the Maratha Empire by Shivaji Maharaj, Sukhmangal Singh, sukhmangal singh articles, छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन, शिवाजी महाराज मराठा साम्राज्य का विस्तार, सुख मंगल सिंह

पं. महामना मदन मोहन मालवीय जी एक युगपुरुष।

Kmsraj51 की कलम से…..

Pt. Mahamana Madan Mohan Malviya Ji a Man of the Era | पं. महामना मदन मोहन मालवीय जी एक युगपुरुष।

Madan Mohan Malaviya was an Indian scholar, educational reformer and politician notable for his role in the Indian independence movement. He was president of the Indian National Congress four times and the founder of Akhil Bharat Hindu Mahasabha.भारत विचारवान महापुरूषों की जन्म भूमि है। यहां समय-समय पर महापुरूषों की भूमिका निभाने वालों का जन्म धरती माँ की गोंद में होता रहा हैं जिससे धरती धन्य होती रही है। उन्हीं महापुरूषों में मदन मोहन मालवीय जी का नाम भी प्रमुख रूप में लिया जाता हैं उन्होंने हिन्दू संगठनों का शक्तिशाली आन्दोलन चलाया जबकि इसके लिए उन्हें सहधर्मियों की उलाहना सहन करना पड़ा उलाहना का परवाह किए बिना कलकत्ता, काशी, प्रयाग नासिक आदि प्रमुख जगहों पर उन्होंने भंगियों को उपदेश दिया और मन्त्र दीक्षा भी दिया।

मालवीय जी व्यायाम और त्याग में अद्वितीय पुरूष थे। उन दिनों जब वाइस चांसलर का० हिं० विश्वविद्यालय के थे, तो भी वे सबेरे नियमित रूप से शरीर की मालिश कराया करते थे। वह सत्य ब्रह्मचर्य और देश भक्त उत्तम गुणों वाले महा मानव थें उनके कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं होता था। जो वे कहते उनको जीवन में पालन भी करते थे।

वह मृदृ भाषा पुरूष थे उनमें रोष तो मानों लेशमास भी छू न सका था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक पं0 मदन मोहन मालवीय जी की शताब्दी के अवसर पर दिसम्बर 25, सन 1961 को पन्दह पैसे का डाक टिकट जारी हुआ। वहीं आयरिश महिला एनीवेसेंट जो भारतीय सवतंत्रता आन्दोलन की समर्थक, सेनानी सामाजिक कार्यकर्ता शिक्षाविद् कोल रूल लीग की संस्थापक सन् 1917 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष के ऊपर अक्टूबर 01, सन् 1963 को डाक विभाग 15 पैसे का टिकट जारी किया। मालवीय जी की 150 वीं जयन्ती पर 05 रू0 का डाक टिकट दिसम्बर 27 सन् 2011 में जारी हुआ।

का० हि० वि० विद्यालय के प्रथम वाइस चांसलर पं० मालवीय जी

का० हि०वि० विद्यालय के प्रथम वाइस चांसलर पं० मालवीय जी बनाए गये। उन्होंने वि० विo के लिए शिक्षाभियान चलाया। जिसमें पं० जी सफल रहे। धर्म संस्कृति की उन्होंने रक्षा की, संस्कृति को संजोया। वह सादा जीवन उच्च विचारवान महामानव पुरूष थे। का० हि०वि० विद्यालय में मिलने देश-विदेश के लोग और मेहमान भी आते रहते थे। मेहमान नवाजी में विद्यालय पीछे नहीं हटता था।

कहा जाता है कि मालवीय जी का आदेश था कि “विश्वविद्यालय के धन का उनके (स्वयं) ऊपर एक पैसा भी व्यय न किया जायं” उनकी यात्रा आदि का खर्च कुछ धनी मित्र अपनी स्वेच्छा से श्रद्धा से करते थे। माना जाता है कि संस्कृत-संस्कृति के संवाहक मालवीय जी पुत्री के रूप में विद्यालय को माना होगा कारण पुत्री का धन खाना हिंदू धर्म शास्त्र में महा पातक कर्म माना गया है। वहीं उन दिनों वि0 वि0 के पास मोटर वाहन नहीं था जबकि रेलवे स्टेशन, बस अड्डा 8–9 किमी0 लगभग पर था। मालवीय जी प्रायः ‘इक्के’ से आते-जाते रहते थे।

एक बार लम्बी यात्रा के बाद …

एक बार लम्बी यात्रा के बाद इक्के की सवारी से आते लत-पथ हालत में देखकर कुंअर सुरेश सिंह एवं सुदरम् जो कि विद्यालय के ही छात्र थे ने वयोबृद्ध तपस्वी वाइसचांसलर की सेवा और वि० विद्यालय के लिए उनके समर्पण भाव को देखकर ‘व्यूक’ गाड़ी भेंट करने की जिज्ञासा संजोकर संकल्प कर होस्टलों में जाकर विद्यार्थियों से चंदा मांगा। मध्यम एवं निम्न मध्यम वर्गी छात्रों द्वारा चंदा सायं काल तक मात्र दो हजार रूपया ही मिल सका।

दोनों संकल्पित छात्र भूखे प्यासे हताशा की हालत में अंत में दानबीर बाबू शिव प्रसाद गुप्त जी के शरण में पहुंचे। उन्होंने इस सर्त पर किसी से मेरे रूपये देने की बात नहीं कहोगे! और वे शेष गाड़ी ‘व्यूक’ खरीदने के लिए पाँच हजार का चेक काट कर दे दिया। उन दिनों व्यूक सात हजार में मिलती थी। दोनों छात्र खुशी – ख़ुशी छात्रावास चले गये। उधर मालवीय जी दोनों विद्यार्थियों को पास आने का बुलावा छात्रावास भेजते रहे, उधर छात्र चंदा इकट्ठा करने में लगे रहे। उन तक सूचना नहीं पहुच सकी।

सायंकाल छात्र सुन्दरम् हास्टल पहुचा तो वह मालवीय जी से जा मिला। जो बातें हुई मोबाइल उन दिनों न होने से कु० सुरेश सिंह से नहीं बता सका। उधर कु० सुरेश सिंह सुबह वाइसचांसलर जी से मिलने पहुँचे। मालवीय जी नित्य की तरह नितकर्मानुसार मालिस करवा रहे थें कुवर सुरेश सिंह को देख कर मालवीय जी बोल- ‘कल-तुम दिन भर मेरे लिए एक मोटर खरीदने को चंदा इकट्ठा करते रहे । विश्वविद्यालय में सारे देश से गरीब लोगों के लड़के पढ़ने आते हैं । वे जब लौट कर अपने-अपने गाँव में जायेंगे और कहेंगे कि वहां तो मेरे सुख सुविधा के लिए उन गरीब विद्यार्थियों से पैसा वसूल किया जाता है। तब देशवासी मेरे बारे में क्या सोचेंगे?

कलंक नहीं लगा रहे …

और आगे सुरेश सिंह से कहा- “तुम तो ताल्लुकेदार के लड़के हो! ताल्लुके दारों को जब मोटर खरीदनी होती है तो वे अपनी रैयत से मोहरवारन वसूल करते हैं। प्रजा इससे कितनी त्रस्त होती होगी। और देश में इस प्रथा से उनकी कितनी भर्त्सना होती है? क्या तुम मेरे लिए भी ‘मोहरवारन’ की प्रथा यहाँ चलाकर मेरे नाम पर भी कलंक नहीं लगा रहे मेरे लिए अपयश से बढ़कर कौन सा दण्ड है? तुमने यह सब क्यों किया?”

हिंदी – अंग्रेजी दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ का सम्पादन

मालवीय जी ने हिंदी अंग्रेजी दैनिक’ हिन्दुस्तान’ का सम्पादन सन् 1887 में शुरू किया, उन्होंने देश भक्त राजा रामपाल सिंह जी के अनुरोध को आत्मसात कर लगभग तीस माह तक जनता को हिन्दुस्तान के माध्यम से जगाया। महामोपाध्याय पं० आदित्य राम भट्टाचार्य के साथ जो म्यामार कालेज (वर्तमान इलाहाबाद वि०वि०) के मनस्वी गुरू थे, के द्वारा 1880 ई0 में स्थापित ‘हिंदू समाज’ में मालवीय जी भाग ले रहे थे। मदन जी पं० अयाध्यानाथ जो कि कांग्रेस नेता थे उनके भी इंडियन ओपीनियन के सम्पादन में भी कार्य किया। और उन्होंने दैनिक लीडर को निकाल कर महान कार्य किया। वह लीडर सरकार समर्थक ‘पायोनियर’ के समकक्ष का था। जो सन् 1909 ई0 में सम्पादित हो रहा था। हिन्दुस्तान टाइम्स को सन् 1924 ई0 में सुव्यवस्थित किया और लाहौर से ‘विश्वबंध’ काशी से ‘सनातन धर्म’ के प्रचारार्थ प्रकाशित कराया। मालवीय जी खुद एक अच्छे सम्पादक थे।

मैं अन्न-जल न ग्रहण करूंगा

उधर वि० विद्यालय के छात्र सुरेश सिंह मालवीय जी के चंदे को लेकर हुई बात सुनकर हतप्रध हो बोले- “महाराज, लम्बी यात्रा से थके थकाये इक्के पर स्टेशन से आपको इस वृद्धावस्था में आते देख हमें दुःख हुआ। हमने सोचा वि०वि० के वाइस चांसलर के पास भी गाड़ी होनी चाहिए।” सो हमने ऐसा निर्णय किया। सादगी पूर्ण जीवन यापन करने वाले महात्मा जी ने यह सुनकर कहा- “कल तुमने चंदा पूरा होने तक उपवास रखा था अब तुम जाकर जिस-जिस से जितना पैसा लाये हो उसे लौटा दो और जब तक तुम आकर मुझे सूचित नहीं करते हो मैं अन्न-जल न ग्रहण करूंगा।

“यह सुनकर गुरू आज्ञा को शिरोधार्य कर दोनों विद्यालय के छात्र लोगों का पैसा लौटाने में लग गये। और जब पैसा लौटा कर दोनों छात्र मालवीय जी से फिर मिले तो कुंअर सुरेश सिंह व सुन्दरम् को वाइसचांसलर जी ने शाबाशी दी तथा अपना किया गया व्रत तोड़ा। लोगों द्वारा प्रायः नरमदल का कार्य कांग्रेस में छोड़ते रहने के वावजूद म० मो० मालवीय जी उसमे डटकर कार्य करते रहे। अतएव कांग्रेस ने उन्हें चार बार सभापति निर्वाचित किया। क्रम से सन् 1909 में लाहौर सन् 1918, 1931 ई0 में दिल्ली एवं सन् 1933 में कलकत्ता में उन्हें सम्मान मिला। दो बार वे सत्याग्रह के कारण गिरफ्तार भी हुए। मालवीय जी आज हमारे बीच न रह कर भी हमेशा-हमेशा अमर रहेंगे उनकी बीरगाथा, देश प्रेम, साहस, शौर्य, धर्मप्रचार एवं बलिदान का संदेश देश को नई ऊर्जा प्रदान करने में सहायक सिद्ध होगी।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — मदन मोहन मालवीय शिक्षा को मानव मात्र का अधिकार मानते थे तथा इसका समुचित प्रबन्ध करना राज्य का कर्त्तव्य मानते थे। वे शिक्षा की एक ऐसी राष्ट्रीय प्रणाली विकसित होते देखना चाहते थे जिसमें प्रारम्भिक और माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षा निःशुल्क हो। अध्यापकों एवं छात्रों के कर्तव्य, व्यायाम करके शरीर को बलशाली बनायें। पहले स्वास्थ्य सुधारें फिर विद्या पढ़ें। शाम को खेलें, मैदान में विचरें। पंडित मदन मोहन मालवीय ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेकर 35 साल तक कांग्रेस की सेवा की। उन्हें सन्‌ 1909, 1918, 1930 और 1932 में कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। मालवीयजी एक प्रख्यात वकील भी थे। एक वकील के रूप में उनकी सबसे बड़ी सफलता चौरीचौरा कांड के अभियुक्तों को फांसी से बचा लेने की थी। मदन मोहन मालवीय एक भारतीय विद्वान, शिक्षा सुधारक और राजनीतिज्ञ थे जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी भूमिका के लिए उल्लेखनीय थे। वह चार बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष और अखिल भारत हिंदू महासभा के संस्थापक थे।

—————

यह लेख (पं. महामना मदन मोहन मालवीय जी एक युगपुरुष।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari Etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं! ____

Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य Tagged With: essay on madan mohan malviya in hindi, Sukhmangal Singh, sukhmangal singh articles, पंडित मदन मोहन मालवीय के महान योगदान, पंडित मदन मोहन मालवीय के शैक्षिक विचार, मदन मोहन मालवीय पर निबंध, सुखमंगल सिंह, सुखमंगल सिंह जी की रचनाएँ

गुरु – शिष्य परम्परा की शुरुआत कब और कैसे?

Kmsraj51 की कलम से…..

Beginning of Guru Shishya tradition when and how | गुरु–शिष्य परंपरा की शुरुआत कब और कैसे हुई?

वैदिक युग के साहित्य अध्ययन की सुविधा से पूर्व वैदिक काल जो 1500 ई. पूर्व से लेकर 1000 ई. पूर्व तक तथा उत्तर वैदिक काल 1000 ई. पूर्व से लेकर 500 ई. पूर्व तक में विभक्त किया गया। ऋग्वेद से हमें पूर्णरूपेण ऋग्वैदिक काल का इतिहास ज्ञात होता है। उत्तर वैदिक काल का विकास संस्कृति का उत्थान ऋग्वेद से ही हुआ। इस काल का इतिहास संहिता अख्यक ग्रंथ ब्राह्मण एवं उपनिषदों से प्राप्त हुआ है। आर्य सभ्यता को फैलाव ऋग्वैदिक काल तक पंजाब एवं सिंध तक सीमित रहा, परंतु उत्तर वैदिक काल में आर्यों का प्रसार व्यापक क्षेत्र में हो गया। आर्य सभ्यता का केन्द्र सरस्वती से गंगा तक दोआब में विकसित-विस्तृत था। आध्यात्मिक तत्वों की विशाल राशि वेद है। इन तत्वों का अनुगमन ही धर्म है। धर्म का स्त्रोत वेद है।

वैदिक काल का जीवन दर्शन

वेद प्रत्यक्ष या अनुमान द्वारा अगम्य औषधि तत्वों का सुगमता से बोध अनुभव कराता है। अलौकिक तत्वों के रहस्य जानने के लिये वेद का अध्ययन जरूरी है। इसे जानने हेतु दर्शन एवं चिंतन की आवश्यता है। चिंतन से नवीन दार्शनिक आयाम प्राप्त होते है। वैदिक काल का जीवन दर्शन, निष्ठा, आस्था एवं अनुराग था। उक्त काल में कर्मठता, एकनिष्ठा, के आधार पर समन्वय अनुशासन अनुकरण करते रहे। वेदों के सूक्त, सरल, सुबोध, सुविधाजनक तथा देवताओं को प्रसन्न करने हेतु है। अथर्ववेद में वरुणा नदी का उल्लेख से कुछ विद्वान वाराणसी नाम की प्राचीनता का अनुमान करते हैं, तो भी यह नगर काशी की तुलना में जाती रही, परंतु मुख्य रूप से संस्कृत विद्या पर विशेष वद दिया जाता था।

ऋग्वेद कालीन समाज में भौतिक की अपेक्षा बौद्धिक ज्ञान के महत्व का लोगों के ऊँचे विचार ज्ञान की महिमा आध्यात्मिक चिंतन और भौतिक आकर्षण के प्रति विरक्त मनुष्य की जीवन के मूल्य थे। यहाँ वेद में गायत्री मंत्र ज्ञान के उच्चतम आधार थे। मंच द्रष्टा ऋषियों में उच्चतम दार्शनिक चिंतन दिग्दर्शिका होता था। ऋग्वेद के अनुसार स्वाध्याय एवं प्रवचन के अनुगमन से मनुष्य एकाग्र-चीना होता है। लोग विविध विद्या का अध्ययन कर देवताओं को प्रसन्न करते थे और अपनी कामयाबी की पूर्ति करते थे। वैदिक काल में प्रमुख रूप से वेद अध्ययन होता था।

शिक्षा शास्त्र का निर्माण स्वरों के अनुशासन एवं शुद्धता के लिये किया गया। योद्धा को धर्म की शिक्षायें कंठस्थ करायी जाती, तो वहीं पुरोहितों को संस्कार के मंत्रों का, शिक्षाओं की विस्तृत व्याख्या बतायी जाती थी। गुरू-शिष्य परम्परा का निर्वहन काशी में होता था। ब्रह्माघाट पर ब्रह्मशाला को ब्रह्मा जी ने आकर ब्राह्मण वंश चलाया था, ऐसी काशी की मान्यता है। विद्या, श्रद्धा और योग से किया गया कर्म संयुक्त होने का प्रबल हो जाता है। शिक्षा से सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का उत्कर्ष होता। ज्ञान शिक्षा से प्राप्त होता है, ज्ञान जीवन को प्रकाशवान बनाता है। मानव को संमार्ग अवलोकन कराता है। ज्ञान से जीवन का कठिनतम कठिनाइयों को दूर करने का सम्बल प्राप्त होता करने में शिक्षा का महत योगदान है। समाज को विकसित करने तथा जीवन को सात्विक और नैतिक निर्देशों का पालन करने का मार्ग शिक्षा द्वारा प्रदान होता है।

उपनयन संस्कार

व्यक्ति आत्मनिर्भर हो, बहुमूल्य शिक्षा का विकास करता है। पारिवारिक निर्वहन के साथ-साथ सामाजिक आर्थिक नैतिक, धार्मिक उत्थान करते हुये चरित्रवान बनकर उत्कृष्ट व्यक्तित्व के उत्तरदायित्वों के साथ सभ्य समाज का नवनिर्माण करता है। मौखिक शिक्षा का प्रचलन वैदिक काल में था। आगे चल कर कमल एवं भोजपत्र पर मयूर पंखों से लिखा जाने लगा। शिक्षा का आरम्भ ब्रह्मचर्य आश्रमों में उपनयन संस्कार के बाद ही होता था। विद्यारम्भ संस्कार के समय बालक गुरूवंदना कर गुरू के प्रति निष्ठा व्यक्त करता था। उपनयन उपरांत ब्रह्मचारी बालक को विद्यामय शरीर और ज्ञानमुक्ति मस्तिष्क प्राप्त होता था, जो माता-पिता से प्राप्त स्थल शरीर से भिन्न था। शिक्षा ग्रहण करने के काल का निर्धारण किया गया था, जो क्रमशः 8-10 वर्ष क्षत्रिय, 11-12 , वर्ष की आयु में शिक्षा प्रारम्भ करने का निर्धारण था। गुरूकुल की प्रथा थी कि गृह त्याग कर बालक गुरू आश्रमों में रहते और योग्यतानुसार शिक्षा प्रदान की जाती रही। उपनिषदों के गुरूकुल के स्थान आचार्य कुल का प्रयोग आते हैं। शिक्षा और विद्या के अद्धतीय अधिष्ठानों का उल्लेख महाकाव्य में गुरुकुल का उल्लेख मिलता है।

उच्चकोटि के गुरूकुल व आश्रम

पूर्वकाल में भारद्वाज एवं वाल्मीकि आश्रम उच्चकोटि के गुरूकुल थे। { महाभारत के द्वारा } मार्कण्डेय एवं कण ऋषि के आश्रम शिक्षा के प्रधान विद्या स्थल थे। वैदिक काल में गुरू के निम्न प्रकार बताये गये हैं। आचार्य, उपाध्याय, प्रवक्ता, अध्यापक, श्रोचिय, गुरू, ऋत्विक, चरक। उक्त गुरूओं का वैदिक काल एवं सूक्तयुग में वेद का ज्ञान स्मरण ! शक्ति पर आधारित था। वेद मंत्रों का कंठस्थ! किया जाता था। गुरूकुल में ज्ञान प्राप्त करने हेतु अध्ययन-अध्यापन कंठस्थ कर होता था। वैदिक युग में आचार्य और गुरू का स्थान देवता-सा था, जो आदरयुक्त, गरिमामय और प्रतिष्ठित था। अग्नि का आचार्य अंगिरा के रूप में अतवरण हुआ, इंद्र के गुरू के रूप में प्रतिष्ठा थी। ऋग्वैदिक आचार्य दिव्य और आलौकिक ज्ञान के प्रतीक थे।

शिक्षा केंद्रों द्वारा समाज को नई दिशा

दृष्टि के धनी होने और बुद्धि तीक्ष्ण होना! शिक्षा के कारण स्वभाविक हो सकता है। एक व्यक्ति से दूसरा अधिक विवेकशील तथा विद्वान हो सकता है। निरंतरता में त्रुटियों के बावजूद काशी की शिक्षा पद्धति ने समाज को एक नई दिशा प्रदान की। आज विश्वविद्यायल, काशी, कश्मीर, धारा, कनौज, उपहित्न पातन, कांची, नालंदा, विक्रमशीला, बल्लभी एवं त्रावस्ती जैसे शिक्षा केंद्रों द्वारा समाज को नई दिशा प्रदान करने का क्रम जारी है। काशी में छोटी-बड़ी वेदशालाओं में दर्जनों भर शिष्य वेद परम्पराओं का निर्वहन कर रहे हैं। ऋग्वेद की शाकल शाखा कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा शुक्लर यजुर्वेद की माध्यंदिन शाखापूर्ण रूप से काशी में विद्यमान है। सामवेद की रमणीय शाखा में आंशिक गान करने वाले भी कुछ गुरू-शिष्य परम्परा काशी में दृष्टिगत होती है।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — वैदिक काल का जीवन दर्शन, निष्ठा, आस्था एवं अनुराग था। उक्त काल में कर्मठता, एकनिष्ठा, के आधार पर समन्वय अनुशासन अनुकरण करते रहे। वेदों के सूक्त, सरल, सुबोध, सुविधाजनक तथा देवताओं को प्रसन्न करने हेतु है। अथर्ववेद में वरुणा नदी का उल्लेख से कुछ विद्वान वाराणसी नाम की प्राचीनता का अनुमान करते हैं, तो भी यह नगर काशी की तुलना में जाती रही, परंतु मुख्य रूप से संस्कृत विद्या पर विशेष वद दिया जाता था। ऋग्वेद कालीन समाज में भौतिक की अपेक्षा बौद्धिक ज्ञान के महत्व का लोगों के ऊँचे विचार ज्ञान की महिमा आध्यात्मिक चिंतन और भौतिक आकर्षण के प्रति विरक्त मनुष्य की जीवन के मूल्य थे।

—————

यह लेख (गुरु – शिष्य परम्परा की शुरुआत कब और कैसे ?) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari Etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं! ____

Filed Under: हिन्दी साहित्य Tagged With: Sukhmangal Singh, sukhmangal singh articles, उच्चकोटि के गुरूकुल व आश्रम, उपनयन संस्कार, गुरु - शिष्य की परंपरा की शुरुआत कब और कैसे? - सुख मंगल सिंह, लेखक सुखमंगल सिंह, वैदिक काल का जीवन दर्शन, शिक्षा केंद्रों द्वारा समाज को नई दिशा, सुख मंगल सिंह, सुख मंगल सिंह की रचनाएँ, सुखमंगल सिंह, सुखमंगल सिंह की रचनाएँ

काशी कहां चली।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kashi Kahan Chali | काशी कहां चली।

काशी संसार सागर से पार उतारने वाली भक्ति भावन नगरी है। काशी समीचीन यथार्थ सुदृढ़ शोत्रसम्मत् सर्वसिद्धि तपोभूमि है। काशी में जहां मरणोपरांत भक्ति मुक्ति मिलती है वही काशी में किये पुण्य अथवा पाप कर्म भी अक्षुण्ण होते हैं। मानव यूं तो बुद्धिजीवी है, फिर काशी की गरिमा पर कहीं प्रश्नचिन्ह न लगे, आंच न आवे ऐसे कार्यो से भावुक हो लोग तमाम अनैतिक कार्यों में लिप्त नजर जाने क्यों लोग दिखते हैं। इससे साफ जाहिर है जन – जन में वैभव, पराक्रम मनस्विता और जीवट, ओजस् तेजस् की कमी कहीं न कहीं हमारे अंदर अवश्य ही प्रभावित कर रही है। फाल्गुन मास में बरसाने वृंदावन – मथुरा होली के माहौल में जब रंग विरंगे रंगों से सरावोर रहती है वहीं काशी, काशी में बाबा भोले भी इस सुअवसर से अछूते क्यों रह जायेंगे।

आमल एकादशी 

आमल एकादशी को भोले भी भाव विह्वल हो स्नान करते हैं, सप्रेम भरी होली-रंगभरी के रंग से सराबोर होते हैं साथ ही अतिविशिष्ट शृंगार भी कराते हैं। इन्हीं दिनों सिद्धि चक विधानानुसार धर्म के अष्ट चिन्ह के पूजा विधान में भी लिखा गया है—

कार्तिक फाल्गुन अषाढ़ के अंत अठ दिन माहि।
नन्दीश्वर श्वर जात है, हम पूजे इह ठाहिं॥

अर्थात् — जैन श्रावक उक्त मास के अंतम आठ दिन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक काल्पनिक रूप में इन्द्र इन्द्राणी देवता का विधानपूर्वक पूजन, भजन भी होता है। जब काशी का वर्णन हम कर रहे हों, वहां शिवलिंग का वर्णन न हो तो काशी का वर्णन संभवतः अधूरा प्रतीत होता है। वैगे तो मनुष्यों द्वारा कुछ भी पूर्ण कर पाना समीचीन नहीं हैं।

निराकार पार ब्रह्म परमेश्वर

पूर्ण तो मात्र ब्रह्म है जो निराकार पार ब्रह्म है जो निराकार पार ब्रह्मपरमेश्वर ही है। हम जिस ज्योतिर्लिंग का वर्णन यहां करने जा रहे हैं वह वही है जो आपकी आत्मा का स्वरूप है। जब बच्चा मां के गर्भ में आता है तो वही अंडाकार रूप धारण करता है जिस आकार में शिवलिंग होता है। मरणोपरांत अग्नि दहन के समय भी शनैः शनैः पुनः उन्हीं स्वरूप में ही, यह मानवीय रूपाकाया पंच भूतात्मा पंचतत्व में विलीन हो जाता है। शिव आनन्ददाता हैं। जिस दिन आप शिव में लीन होंगे और गंगा के पावन जल से परिपूर्ण हो जायेंगे उस दिन से कुछ शेष नहीं बचा। द्वंद नहीं निर्द्वद हो जायेंगे। विलक्षणता की अनुभूति होनी स्वभावतः हो जायेगी।

काशी में स्त्रैण और नगरी पुरुष को खोजते फिरते रहते हैं शायद उन्हें ज्ञात नहीं शिव अर्धनारीश्वर है। बांवले से सड़कों गलियों ऐसे में देखते ही होगें। आप में भी द्वंद्व होना स्वाभाविक है ही, क्योकि यह जगत ही द्वंद्व से निर्मित है। तो आप भी दो होंगे ही। इतना तो अवश्य ही है। द्वैत से अद्वैत में पहुंचने के मार्ग की आकांक्षा में आपको उस शिवलिंग की अपने घर में उपासना करनी होगी। जिसके द्वारा आप निर्द्वद्व हो जाय। वह तभी संभव होगी जब मेक्सिमम ६ अंगुल की ही मूर्ति विधान सहित स्थापित करने परांत आप के अन्दर ध्यान योग प्राणायाम अथवा अन्यान्य विधाओं से विह्वल विकल अति आतुरता आनन्द हो, जिस समय उस अलौकिक बोध गुदगुदाहट आलिंगन सा परम आनंद मिल जाये आप अनुभूति करें, काशी की एक रेखा तक पहुंच रहा हूँ।

प्रथम पूज्य देवाधिदेव – भोले के सुपुत्र गौरी के लाल गणेश जी

हमें काशी का वर्णन करते समय प्रथम पूज्य देवाधिदेव भोले के सुपुत्र गौरी के लाल गणेश जी को नहीं भूलना होगा जिसकी प्रतिमूर्ति बड़ा गणेश में प्रतिष्ठापित है। बड़ा गणेश जी को भी हमें हर शुभ कार्य में प्रथम सादर याद करना चाहिए। यहां गणेश चतुर्थी के दिन सैलानियों की भीड़ स्वाभाविक हर्षानुभूति कराता है। गणेश जी के लिए यह भी कहना अतिशयोक्ति न होगी—

सुख समृद्धि का जब आयेगा नया दौर।
गणपति गजबदना को पूजेंगे लोग॥

यहीं; मंगल ने कहा है—

  • मांगो न और काहू से याचक बन काशी में चातुर्मास बिताय रहतु ना एकै द्वार लेत न हाय वहां सव तीरथराज देवगण चरवन लेत चबाय चहु और महिमा काशी में।
  • पंचाक्षरी मंत्र पढ़ महिमा तन की काशी त्रिलोचन लोचन कर्णघंटा घंटा बजत गिरजानन्दन शिवयाचक वनि हो काशी में।

आज हम अध्यात्म, नैतिकता, संस्कृति पश्चिम से लेते जा रहे हैं। हमें याद करना होगा स्वामी विवेकानन्द जी के मुख, मुखार परमार्थ तप, सेवा को भी, हमें याद करना होगा, स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के उपदेशों को, कबीरदास के कर्मयोग, राजर्षि विश्वामित्र के ‘तप’ को, मीरा का प्रेम, राजा मान्धाता के ‘त्याग’ और राजा हरिश्चंद्र का ‘सत्य’, लक्ष्मीबाई के शौर्य को भी हमें नहीं भूलना होगा। आज काशी में ही क्या सारी पृथ्वी बोझ से दबी जा रही है। हमें मिटाना है काशी के साथ सारी धरती के क्लेश को?

गंगा में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है—

सद्भावना पूर्ण वातावरण का हम सब जन मिल निर्माण करें। काशी के हाथीघाट, शिवाला घाट वह स्थान है जहां राजा विजयानगरम् का हाथी आता था। इस घाट की बनावट ऐसी थी कि जो लोग तैरना नहीं जानते थे वे इस घाट पर कमर भर पानी में नहा सकते थे परंतु आज यहां कीचड़ का अम्बार रहता है इसलिए नहीं कि गंगा का बालू एकत्र हो गया है। बलात गंगा में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। चूंकि अंग्रेजों के समय में कस्साई बाड़ा के जो जानवरों का खून पहले गंगा जी में नहीं आता था आज खून शाम होते ही रंग बिरंगे रंगों में कभी लाल, कभी हरा, कभी बैगनी, कभी काला एवं मटमैले कलर की धार बन कर सम्वत् २०४६ से गंगा में अनवरत आ रहा है।

यही नहीं रंगाई के कारखानों का रंग एवं हजारों लीटर केमिकल तथा लगभग सौ लीटर खून डायरेक्ट गंगा में प्रतिदिन अनवरत बहाया जाता है। प्रतिदिन लोहता भिटारी के बीच बने नाले से भी केमिकल निरर्थक वरुणा नाले से होकर अनवरत वरुणा नदी में बहाया जा रहा है। वरुणा नदी भी उसे बेहिचक गंगा को अर्पित कर देती है। आज गंगा जी के दंडी घाट से गुलेरी घाट तक मनुष्य क्या बन्दर व गाय भी पानी पीने से दूर नहा सकने में भी हिचकिचाहट कर रहे हैं। इन घाटों को भैंसा घाट कहा जाय तो भी अतिशयोक्ति न होगी।

इस प्रकार वाराणसी के छः घाट उक्त प्रदूषण से जहां प्रभावित हैं वही राजेंद्र प्रसाद घाट, मर्णिकर्णिका घाट भी प्रदूषण से क्यों अछूता रह जाय। अस्सी घाट का पूछना ही क्या है। नाला द्वारा हजारों लीटर गन्दा पानी गंगा में बहाने से नगर निगम आखिर क्यों नहीं बाज आता। इससे साफ जाहिर होता है कि केंद्र अथवा राज्य द्वारा चलाई गई सफाई निर्मलीकरण योजना सफेद हाथी का सा रूप धारण कर रखा है। मणिकर्णिका, हरिश्चंद्र घाट से आज भी अधजले शव गंगा में बहाकर ही नहीं अपितु पशुओं के शव को गंगा में प्रवाह कर गंगा में हम सड़ान्ध क्यों पैदा कर रहे हैं? पुलिस प्रशासन भी मूक दर्शक आखिर क्यों बनी रहती है? ऐसे में अधिक अपराध के युग का श्रीगणेश भी इस दशक को कहने से लेखक नहीं चुकेगा। बशर्ते नाबालिग बच्चों का शव धार्मिक परम्परानुसार जल प्रवाह की अवधारणा जब तक नहीं बदलेगी। हम धार्मिक परम्परा का जिक्र कर रहे हैं तो धर्माचार्य का जो सत्य निष्ठा से आज का मानव जीव कल्यार्णाथ यज्ञ, हवन, पूजन, प्रवचन, हरिभजन, शिवअर्चन, चण्डी जाप, नाम जपन, भजन पर भी हमें जिक्र करना मुनासिब होगा। आप काशी में कम नहीं पायेंगे।

ज्ञान, भक्ति, अध्यात्म तीर्थों का भी तीर्थस्थल काशी है।

ज्ञान, भक्ति, अध्यात्म और सर्व प्रेम का प्रतीक यह तीर्थों का भी तीर्थ है। आध्यात्मिक, धार्मिक तथा भक्तिभाव प्रेरक धार्मिक सांस्कृतक लोक उन्नायक आयोजनों का यह तीर्थस्थल काशी है। काशी में नास्तिक विचारधारा से युक्त जो प्राणी आता है रमण भ्रमण करने, वह भी शिवमय हो रम जाता है। भोला भूदेवी, भवानी, भगवती, जगदम्बा में कारण शास्त्रों में वर्णित है।

भोला काशी परिक्षेत्र चौदह कोश में आने वाले प्राणी को रमणीय कर देते हैं। कारण स्पष्ट है। यहां प्रतिदिन गंगा में मणिकर्णिका घाट पर दो घड़ी उपरान्त दोपहर में समस्त देव गण देवलोक से स्नान करने आते ही रहते हैं। काशी में देवताओं का आना अनवरत समस्त युगों से रहा है तो क्या हिंदू/सिक्ख/इसाई अथवा मुसलमान जिनमें एक सा पंच तत्वों से बनी बुद्धि विवेक प्रभु ने दे रखी है, हम उस गंगा मां को जिसने देवलोक से हाहाकार कर हमारे पूर्वजों का तारंतार किया, कर रही है, हम पवित्र क्यों नहीं रख सकते हैं?

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — काशी जहां स्वयंभू भोलेनाथ माता पार्वती व गणपति सहित अनंत काल से विराजमान है। पतित पावनि माँ गंगा को अपनी जटाओ से धीरे-धीरे मध्यम जल धारा के रूप में मानव कल्याण के लिए छोड़ा है, लेकिन आज का मानव पतित पावनि माँ गंगा को बहुत ज्यादा प्रदूषित कर रखा है। अब भी सुधर जाओ और पतित पावनि माँ गंगा को स्वच्छ करो, इसे प्रदूषित करना बंद करो। ज्ञान, भक्ति, अध्यात्म और सर्व प्रेम का प्रतीक यह तीर्थों का भी तीर्थ है। आध्यात्मिक, धार्मिक तथा भक्तिभाव प्रेरक धार्मिक सांस्कृतक लोक उन्नायक आयोजनों का यह तीर्थस्थल काशी है। काशी में नास्तिक विचारधारा से युक्त जो प्राणी आता है रमण भ्रमण करने, वह भी शिवमय हो रम जाता है। भोला भूदेवी, भवानी, भगवती, जगदम्बा में कारण शास्त्रों में वर्णित है।

—————

यह लेख (काशी कहां चली।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari Etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं! ____

Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य Tagged With: Kashi Kahan Chali, Sukhmangal Singh, sukhmangal singh articles, काशी इतना शक्तिशाली क्यों है?, काशी कहां चली, काशी कहां चली - सुखमंगल सिंह, काशी का महत्व क्या है?, काशी की क्या विशेषता?, काशी पर निबंध, काशी में कौन सी नदी बहती है?, काशी से क्या तात्पर्य है?, वाराणसी पर निबंध – Essay On Varanasi in Hindi, सुख मंगल सिंह, सुख मंगल सिंह की रचनाएँ

काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।

Kmsraj51 की कलम से…..

Coordinating Nature Of Kashi | काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।

काशी विश्व की प्राचीन नगरी है। बुद्ध की उपदेश स्थली, जैन तीर्थंकर महावीर की धर्म देशना स्थली तथा सुपार्श्वनाथ और जैन पार्श्वनाथ तीर्थंकरो की जन्मस्थली होने के साथ ही काशी रामानन्द, आदि शंकराचार्य, कबीर, रैदास, तुलसीदास विवेकानन्द जैसे महान धर्माचार्यों एवं चिंतकों की कर्म भूमि भी रही है।

विभिन्न पुराणों से विदित होता है कि काशी पहले विष्णुतीर्थ था जो बाद में शिवतीर्थ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यह प्रधानतः शिव की नगरी रही है। यहाँ के 17वीं से 20वीं शताब्दी ई० के लगभग सभी मंदिर भोलेनाथ शिव को समर्पित हैं। इन मंदिरों में गर्भगृह में शिवलिंग और चारो ओर की भित्तियों पर शक्ति, विष्णु, सूर्य एवं गणेश मूर्तियाँ हैं जो समन्वयात्मक धार्मिक आस्था की साक्षात साक्षी है। इतना ही नहीं काशी में लोक धर्म से सम्बन्धित पक्ष, नाग, वृक्षपूजन की परम्परा रही है। इसे न केवल शिव वरन् काशी में जन्में सुपार्श्वनाथ और पार्श्वनाथ के मस्तकों पर दिखाये जाने वाले सर्वफलों के रूप में भी देखे जा सकते हैं।

17वीं से 19वीं शताब्दी ई0 के बीच काशी की धार्मिक एवं सांस्कृति समन्वय की भंगिकी आदि केशव से अस्सी तक फैले हुए घाटों की अनवरत श्रृंखला में देखी जा सकती है। घाटों के मंदिरों, मठों और अन्य अवशेषों में पूरे भारतवर्ष का धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप मूर्तिमान हो उठा है।

यदि कहा जाय कि काशी में सम्पूर्ण विश्व सूक्ष्म रूप से विद्यमान है तो अतिश्योक्ति नहीं। मान्यता के अनुसार देश की सभी नदिया, पवित्र स्थल और देवता काशी में निवास करते हैं। मत्स्यपुराण में काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है जिसे शिव कभी नहीं छोड़ते। इसे महाश्मसान, आनन्दकानन और मोक्षदा अर्थात् मोक्ष देने वाली सप्तपुरियों में एक माना गया है। काशी का महात्म्य कुछ ज्यादा ही है तभी तो जब कभी ग्रहण लगता है तो काशी में बहुत भीड़ उमड़ पड़ती है। यद्यपि सूर्यग्रहण में सबसे बड़ा मेला कुरुक्षेत्र का होता है पर चन्द्रग्रहण में काशी में ही यात्रीगण देश के विभिन्न भागों से आने हैं। भविष्यपुराण में लिखा है :

कुरुक्षेत्रसमा गंगा यत्र कुत्रावगाहिता।
कुरुक्षेत्राहशगुणा यत्र विन्धेन संगता॥

काशी प्रधान तीर्थं स्थान है। यह शुद्ध रूप से तपोभूमि है। देवदर्शनल, मंदिरों की रचना और यहाँ के घाटों की छटा ही मुख्य दर्शनीय हैं। यहाँ गंगास्नान की महिमा अवर्णनीय मानी गई है। सर्वत्र गंगा स्नान पूण्यजनक है। वाराणसी (काशी) में गंगा स्नान बारहो मास नेमी लोग करते हैं। काशी की उत्तरवाहिनी गंगा की महिमा काशी यात्रा में सप्तभाग उल्लिखित है। पंचगंगा और परिसर के घाटों, मर्णिकर्णिका घाट एवं दशाश्वमेघ घाट पर प्रातः 3 बजे से ही स्नानार्थी आने लगते हैं। बाबा विश्वनाथ की नगरी में मरने का कोई डर नहीं होता क्योंकि यहाँ तो सभी मृत्यु को अपने पाहुन (अतिथि) की तरह जोहते ही रहते हैं।

यह सत्य है कि काशी वास करने में जो सुख यहाँ पर होता है वह समस्त ब्रह्मांड मंडप में कहीं भी उपलब्ध नहीं है। काशी में धर्म अपने चारो पैरों पर खड़ा है। अर्थ भी काशी में अनेक प्रकार से वर्तमान है। यही कारण है कि पाप-विनाशिनी देवगणों को भी दुर्लभ सतत गंगा-संगता, संसार पाशच्छेदिनी शिव-पार्वती से अविमुक्त, त्रिभुवन से अतीत मोक्षजननी काशी पुरी को मुक्त पुरुषगण कभी परित्याग नहीं करते। तभी तो जगत प्रसिद्ध जाबालि ऋषि ने कहा है। हे आरुणे ! असी नदी इड़ा नाड़ी और वरुणा नदी पिंगलानाड़ी कही गई है इन्हीं दोनों के मध्य में वह अविमुक्त क्षेत्र काशी है। यही काशी सुषुम्ना नाड़ी है। इन्हीं तीनों नदियों की यह वाराणसी है।

हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — यह सत्य है कि काशी वास करने में जो सुख यहाँ पर होता है वह समस्त ब्रह्मांड मंडप में कहीं भी उपलब्ध नहीं है। काशी में धर्म अपने चारो पैरों पर खड़ा है। अर्थ भी काशी में अनेक प्रकार से वर्तमान है। यही कारण है कि पाप-विनाशिनी देवगणों को भी दुर्लभ सतत गंगा-संगता, संसार पाशच्छेदिनी शिव-पार्वती से अविमुक्त, त्रिभुवन से अतीत मोक्षजननी काशी पुरी को मुक्त पुरुषगण कभी परित्याग नहीं करते। तभी तो जगत प्रसिद्ध जाबालि ऋषि ने कहा है। हे आरुणे ! असी नदी इड़ा नाड़ी और वरुणा नदी पिंगलानाड़ी कही गई है इन्हीं दोनों के मध्य में वह अविमुक्त क्षेत्र काशी है। यही काशी सुषुम्ना नाड़ी है। इन्हीं तीनों नदियों की यह वाराणसी है। काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

—————

यह लेख (काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari Etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं! ____

Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य Tagged With: Essay on Kashi Vishwanath Mandir, history of kashi vishwanath, Sukhmangal Singh, sukhmangal singh articles, काशी का समन्वयात्मक स्वरूप - सुख मंगल सिंह, काशी पर निबंध, काशी विश्वनाथ का रहस्य, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, काशी विश्वनाथ पर निबंध, काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास क्या है?, काशी विश्वनाथ मंदिर पर निबंध, काशी विश्वनाथ मंदिर में कितना सोना लगा है, श्री काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी उत्तर प्रदेश, सत्यों की सत्य संजीवनी काशी - सुख मंगल सिंह, सुख मंगल सिंह, सुख मंगल सिंह की रचनाएँ, सुखमंगल सिंह जी की रचनाएँ

सत्यों की सत्य संजीवनी काशी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Satya Sanjivani Kashi of Truths | सत्यों की सत्य संजीवनी काशी।

काशी, गंगा और महादेव संपूर्ण भू भाग पर यदि कहीं अवस्थित हैं तो वह मात्र काशी पुण्य परिक्षेत्र में ही, अन्यत्र अविज्ञात है। काशीपुरी में धर्म-अधर्म अक्षुण्ण होता है। यह आनंदकानन अविमुक्त महाक्षेत्र है। काशी का माहात्म्य वैदिक एवं स्मार्त है। अतएव काशी में —

अब पुनि पुनि कलम उठायेंगे।
काशी ! रहि रहि गुन गायेंगे॥
लाख लताड़त शिव आयेंगे।
काशी करवटऽ सुनायेंगे॥

  • हिमालय पुत्री मां गंगा काशी में उत्तराभिमुख अविरल बहती है, जिसे ‘मुदिता’ कहा गया है। गंगा पितृ मुख होने से मुदित रहती है और शिव (पति) का सान्निध्य पाकर आह्लादित होती है शायद यही कारण है कि शिव ब्रह्म को काशी बड़ी प्रिय लगती है। शास्त्रों में वर्णन है कि नारायण की आराधना से प्रसन्न होकर परम शिव द्रवीभूत हो गये। वह ब्रह्माद्रव्य युक्तिकाशी भू पर स्थित होकर भी भू से पृथक है। जहाँ शंकरपूजन और शिव के मधुर गान से शिव ब्रह्म प्रसन्न होकर इच्छित वर प्रदान करते हैं, वहीं शैलपुत्री देवी सौभाग्य सुख प्रदान करती हैं।
  • काशी में भक्तों की मनोरथदात्री भवानी ही स्थिर वास करने देती है और भवानी ही काशीवासियों का सदा योगक्षेम करती हैं। भिक्षुक को काशी में मोक्षा काशी भिक्षा प्रदान करने वाली विश्वेश्वर की कुटुम्बिनी काशीवासियों को मोक्ष की भिक्षा प्रदान करती हैं, ओंकार का उच्चारण कराती है। ऊं शांतिः शान्तिः शान्तिः हृदयस्थ कराती है। अतएव इनकी सेवा करनी चाहिए, सेवा से प्रभु मुदित होते हैं। काशीवासियों को यदि कभी कुछ भी दुर्लभ हो तो पूजा पाठ करने से ही भवानी उसे सुलभ करा देती हैं। मानव को चैत्र की अष्टमी में रात्रिजागरण, गंगा स्नान और भव पूजन वांछित फल प्रदान करता है।

काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

जल, जीवन का प्रमुख रसायन तत्व है। काशी में गंगाजल का स्पर्श होते ही महापातुकावली का तुरंत क्षय हो जाता है। यही नहीं यहां वास करने वाले को पद-पद पर, धर्म की ढेर, मिलती है जिसे करोड़ों यत्न करने से भी वैसी धनराशि एकत्र नहीं की जा सकती, सो काशी की गलियों में घूमने (भ्रमण) से पद पर आपसे आप प्राप्त हो जाती है। धर्मपरायण मनुष्य! धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष पाने की अभिलाषा जनित त्रैलोक्य पावनी अविमुक्त क्षेत्र काशीपुरी की पदयात्रा करें। भारतीय धार्मिक संप्रदाय चाहे वैदिक हो या स्मार्त उन सबों का आदर विद्वानों महापुरुषों ने किया है।

वृहस्पति देव ने “काशी को मुक्तिपुरी कहा है। इन्द्र से तो यहां तक कह दिया कि काशी सदृश तुम्हारी देवपुरी भी नहीं है। वहीं जाकर मुक्ति हेतु तुम भी विश्वाराध्य विश्वेश्वर की आराधना करो। ऐसे में भला मुक्तिपुरी का दर्शन-वर्णन मेरे जैसे अल्पज्ञ क्यों नहीं करेगा।” यथा—

गंगा में खूब नहायेंगे,
भव भावन गीत सुनायेंगे।
भर भाँग धतूरा खायेंगे,
मेवा संग मिश्री मिलायेंगे।

और आगे का दृश्य-

भाँग धतूरा पीवत साथी,
पथिक पहलुआ पंडित पापी।
अबे तबे अरु चोखा – बाटी,
डंड बैठकी खुला सपाटी।

सौम्य तप जप को समय सीमा में न बांधकर बुद्धिमानजन काशी स्त्रोत की महिमा का वर्णन करता है। गाता-गुनगुनाता है। उसे हृदयस्थ करता है। स्तोता ब्रह्ममुहूर्त में उठकर ‘काशी’ मंत्र के जप – तप की युक्ति करता है। जप – तप की सामर्थ्य जिस महापुरुष में है, वह मुनि रूप पृथ्वी पर क्रोधी भी हो सकता है अन्यथा असमर्थ पुरुष, प्राणी क्षीणवृत्ति की तरह क्या कर सकता है। जो उद्गीथ है यानी गाने योग्य है वही प्रणव या ऊँकार है। ॐ की उपासना से ही देवता अमृत प्राप्त किये और मृत्यु को जीतकर अमरत्व पाए।

इतना याद रखें — अधम का भोग भोगने के उपरांत ही धर्म का फल प्राणी प्राप्त (भोगता) करता है। पुण्यशाली लोग इस लौकिक जगत में सदैव एकरूपता को नहीं छोड़ते यानी हर्ष और विषाद दोनों ही निष्फल है। आनंद कानन अविमुक्त महाक्षेत्र में सद्विचारयुक्त धर्म परायण धर्म, कर्म पालक और ध्यान ज्ञान युक्त तपी जपी मनुष्य तत्व अन्वेषण करता है और वेदशास्त्रों के स्वाध्याय, उसके अभ्यास से चित्त शुद्धि इंद्रियों पर विजय दम, दान और दया से परिपूर्ण घोर तपस्या की मदद से ही परमविज्ञ वर पा जाता है।

काशी में क्रोध से बचना चाहिए। काशी क्षेत्र ही क्या कहीं भी कभी भी क्रोधयुक्त होने से बड़े-बड़े कष्ट संचय, संचित तपस्या का वैसे ही क्षय हो जाता है – जैसे मानो बादल के आच्छादन से चंद्रमा और सूर्य का तेजपुंज प्रकाश प्रायः विलुप्त हो जाता है। मुनि, ज्ञानी अपने विवेकरूपी बांध से क्रोधरूपी नदी के वेग को स्वेच्छानुसार स्वयं प्रवाहित करता रहता है।

ज्ञान का महान प्रताप कोई विरल ही जानता है। जब आत्मा स्व स्वरूप में स्थित होती है तब उच्चारण करने वाला अन्य कोई नहीं होता अर्थात् वक्ता श्रोता का द्वैत मिट जाता है। मनुष्य में ईश्वरीय प्रेरणा से अचानक ब्रह्म चैतन्य का स्फुरण होता है और वह जिज्ञासु की नई स्थिति में आ जाता है। परंतु संसारी जीव में जिज्ञासा का उदय भी परमात्मा की कृपा से होता है। जब तक मनुष्य में माया से विरक्ति, ईश्वर से अनुरक्ति और सद्गुरु की कृपा नहीं होती, जीव में जिज्ञासा का उदय नहीं होता, गूढ़तत्व चैतन्य शक्ति का उदय नहीं होता। परम सत्य की उपलब्धि के बिना अज्ञान का नशा बार – बार मनुष्य पर छा जाता है।

जो मनुष्य इंद्रियों से विषय वासनाओं का त्याग करके तिमिराच्छन्न रजनी में जागृत अवस्था को प्राप्त कर लेता है काशी में भगवान भोले उसे तारक मंत्र देकर मोक्ष प्रदान करते हैं। तारकेश्वर मंदिर कोलकाता में है। काशी में विश्वनाथ मंदिर के पास स्थापित है। काशी में वर्तमान तारकेश्वर महादेव का जीर्णोद्धार हो रहा है। जिस प्रकार योग में प्रवेश पाने के लिए सद्गुरु कृपा प्रसाद ही सहायक होता है, कर्म से क्षत्रिय विप्र हो जाता है और गीता का सार त्याग है, ईश्वर की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ज्ञान है, उसी प्रकार काशी-काशी जपते-जपते रहने से प्रत्यक्ष मोक्ष है। काशी में मुक्तिमण्डप में मात्र बैठकर भव स्मरण यथा शक्ति धनदान एवं पवित्र कथाओं का श्रवण करने से करोड़ों गोदान का पुण्य प्राप्त होता है।

यहाँ मुनियों ने असंख्य शिवलिंग अनादिकाल से स्थापित किये हैं। जहां पर एक भी शिवलिंग की स्थापना करने से अखिल ब्रह्मांड की प्रतिष्ठा करने का फल प्राप्त होता है, भला उस पुण्य क्षेत्र काशी को कौन मानव जीव छोड़ सकता है। जबकि शास्त्र में कहा गया है काशी की प्राप्ति में पग-पग पर विघ्न आ पड़ते हैं। काशी में वास उन्हीं को मिलता है जो कठोर तपस्या बड़े से बड़े व्रत एवं महादानों के करने वाले होते हैं। काशी गुरु श्रेष्ठ है।

धर्मेश्वर ने मंदराचल पर जगदम्बा से कहा था — काशी की निर्वाण की भूमि है। लोमेश और व्यास जी का भी यही मत रहा। याज्ञवल्क्य मुनिराज ने तो कहा कि — काशी में मरण से परम पद प्राप्त होता है। त्रयमयी काशी समस्त विधाओं की आश्रयस्थली है, महालक्ष्मी की परालय एवं मुक्ति क्षेत्र है। ब्रह्माजी ने कहा — काशी में मरने वालों को मुक्ति मिलती है, यही कारण है कि यहाँ विविध धर्मशाला परिसर मुक्ति क्षेत्र में ठहरने हेतु आज कलिकाल में भी उपलब्ध है काशी ? काशन प्रकाशन करने वाली आत्मज्ञानवती बुद्धि का नाम काशी है।

आठवीं सदी में शंकराचार्य जी को भी बनारस (काशी) आकर अपने मत की विद्वानों द्वारा पुष्टि करानी पड़ी और संभवतः ब्रह्मसूत्र की रचना बनारस में गंगातट पर ही की थी। भागवत में – नदियों में गंगाजी, देवताओं में विष्णु भगवान, वैष्णवों में शंकरजी सर्वश्रेष्ठ है, पुराणों में- श्रीमद्भागवत, ऋषियों में शौनकादि उसी प्रकार श्रेष्ठ हैं जैसे- तीर्थों में काशी सर्वश्रेष्ठ है। इस लोक में बुद्धिमान सज्जनों की ही वह बुद्धि सब कुछ निश्चय करती है जिस नगरी में पुण्यजला स्वयं स्वर्गतरंगिणी गंगा बह रही हैं। वे ही चरण इस भू लोक पर विचरण करना जानते हैं यानी धन्य हैं जिन पुण्य प्राणियों के चरण विश्वनाथ जी के नगर ‘काशी’ में भूमि पर विचरण करते हैं। यद्यपि माघ – मास में सभी तीर्थ, तीर्थराज प्रयाग चले जाते हैं परन्तु अविमुक्त क्षेत्र के तीर्थ काशी में ही रहते हैं। लेखक की कलम से —

कैसा चरित रच्यों मेरो भाई।
बूझत अनबुझ मन जन खिसियाई॥
हलाहल गंगाजल अमरित साँईं।
अगणित कला को मंगल री गाई॥

पुण्य क्षेत्र में संन्यास लेकर रहने, भ्रमण करने वालों की जीवमुक्त और रुद्र स्वरूप मानना चाहिए। इस पुण्य अक्षुण्ण क्षेत्र में यदि प्राण संकट में पड़ा हो तो भी असत्य (मिथ्या) भाषण नहीं करना चाहिए। हां, किसी जीव के प्राण रक्षार्थ झूठ मजबूरी में बोला जा सकता है। काशी शिव को अति प्रिय है। शिव जी के मुख से- मैं ममता रहित हूँ। योगिनियाँ ब्रह्मा और रुद्रगण इसी कारण यहां बसे, काशी के ही हो गये। वे सब वाराणसी के प्रति शिव का प्रेम जानते थे।

जहां जय द्वारा ज्ञानी बटुक ब्रह्मवाद का निनाद करते हों, गुरुचरण विश्वनाथ साक्षात् विराजमान वर्तमानरूप से हों, महर्षि व्यास सदृश पुण्यात्मा वास करते हों, वैद्यराज, दान, ध्यान, तप, ज्ञान कलिकाल में भी हों साथ ही सर्वधर्म की मर्यादा मर्यादित पूर्वक अधिधार्मिक लोगों द्वारा पालन किया जा रहा हो उस मुक्तिदायिनी धर्मपरायण, विराटरूपा काशी को सत् सत् नमन, धरती पर कौन नहीं करेगा।

मुक्ति जन्म महि जानि, ज्ञान खानि, अध हानिकरि।
जहँ बसिं शंभु भवानि, सो काशी, सेइय कस न॥

हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — अधम का भोग भोगने के उपरांत ही धर्म का फल प्राणी प्राप्त (भोगता) करता है। पुण्यशाली लोग इस लौकिक जगत में सदैव एकरूपता को नहीं छोड़ते यानी हर्ष और विषाद दोनों ही निष्फल है। आनंद कानन अविमुक्त महाक्षेत्र में सद्विचारयुक्त धर्म परायण धर्म, कर्म पालक और ध्यान ज्ञान युक्त तपी जपी मनुष्य तत्व अन्वेषण करता है और वेदशास्त्रों के स्वाध्याय, उसके अभ्यास से चित्त शुद्धि इंद्रियों पर विजय दम, दान और दया से परिपूर्ण घोर तपस्या की मदद से ही परमविज्ञ वर पा जाता है। काशी में क्रोध से बचना चाहिए। काशी क्षेत्र ही क्या कहीं भी कभी भी क्रोधयुक्त होने से बड़े-बड़े कष्ट संचय, संचित तपस्या का वैसे ही क्षय हो जाता है – जैसे मानो बादल के आच्छादन से चंद्रमा और सूर्य का तेजपुंज प्रकाश प्रायः विलुप्त हो जाता है। मुनि, ज्ञानी अपने विवेकरूपी बांध से क्रोधरूपी नदी के वेग को स्वेच्छानुसार स्वयं प्रवाहित करता रहता है। काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

—————

यह लेख (सत्यों की सत्य संजीवनी काशी।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari Etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं! ____

Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य Tagged With: Essay on Kashi Vishwanath Mandir, history of kashi vishwanath, Sukhmangal Singh, sukhmangal singh articles, काशी पर निबंध, काशी विश्वनाथ का रहस्य, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, काशी विश्वनाथ पर निबंध, काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास क्या है?, काशी विश्वनाथ मंदिर पर निबंध, काशी विश्वनाथ मंदिर में कितना सोना लगा है, श्री काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी उत्तर प्रदेश, सत्यों की सत्य संजीवनी काशी - सुख मंगल सिंह, सुख मंगल सिंह, सुखमंगल सिंह जी की रचनाएँ

प्रधानमंत्री मोदी की 1774 करोड़ की सौगात काशी में।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ प्रधानमंत्री मोदी की 1774 करोड़ की सौगात काशी में। ♦

आषाढ़ शुक्ल – अष्टमी तिथि, जुलाई 7, 2022 दिन बृहस्पतिवार को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काशी के सिगरा स्टेडियम में 1774 करोड़ की विकास परियोजना के लोकार्पण समारोह में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और राज्यपाल के साथ उपस्थित हुए।

प्रधानमंत्री का मुख्यमंत्री द्वारा स्वागत

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने विगत दिनों उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद पहली बार प्रधानमंत्री के काशी आगमन पर स्टेडियम मंच से मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया।

मुख्यमंत्री का वक्तव्य

उत्तर प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में काशी नई विकास यात्रा की ओर बढ़ रही हैं और काशी मां गंगा की अविरल निर्मल धारा को देख रही। अब काशी को चिकित्सा और शिक्षा के नए हब के रूप में देखा जा रहा। मुख्यमंत्री ने कहा प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में बदलती काशी को नये कलेवर के रूप में देखा गया है। काशी में शिक्षा स्वास्थ पर्यटन और खेल में काफी विकास कार्य हुए हैं।

यहां ग्राम पंचायत स्तर से बेसिक मंच पर विकासशील परियोजनाएं लाई गई है। योजनाओं का लाभ नौजवानों, महिलाओं, सभी समाज के अंतिम पंक्ति में बैठे लोगों को मिला है। जाति धर्म से ऊपर उठकर समाज के लोगों को लाभांवित किया गया है। इस महत्वपूर्ण समय पर आज के लिए मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री का आभार जताया।

प्रधानमंत्री ने कहा …

काशी के सांसद के रूप में अपने भाषण की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी अंदाज में किया और कहा काशी में कहीं जाला, सात बार अउर, नौ त्यौहार होला। काहे का मतलब ई है कि जहां रोज – रोज, नया – नया त्योहार मनावल जाला। इसके बाद उन्होंने कहा आप सब लोगों ने प्रणाम बा।

जनसभा को संबोधित करते हुए अपनी भाषण के दौरान विकास की अविरल धारा में आज और कई परियोजनाओं कि श्रृंखला जुड़ी है। काशी हमेशा से प्रभावशाली प्रबाहवान रही है। काशी ने एक तस्वीर पूरे देश को दिखाई है जिसमें विरासत भी है विकास भी है।

हमारा पूरा प्रयास है कि आत्मा वही रहे मगर काया में निरंतर नवीनता लाने का प्रयास जारी है। इसीलिए काशी में एक प्रोजेक्ट का काम पूरा होता है तो चार नया शुरू हो जाता है। काशी में सड़क, पानी, बिजली, शिक्षा, स्वच्छता और सुंदरीकरण कर ऐसे जुड़ी हजारों करोड़ रुपए की परियोजना शुरू हो चुकी है। काशी के लोगों ने उत्साह और उमंग के साथ मेरा समर्थन किया इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

सिगरा स्टेडियम मंच पर उपस्थित

स्टेडियम के मंच पर प्रधानमंत्री, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, केंद्रीय मंत्री डॉ महेंद्र नाथ पांडे, कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर, जया शंकर मिश्र दयालु, रविंदर जयसवाल अशोक धवन आदि लोग उपस्थित थे।

प्रधानमंत्री वेंडिंग जोन (पटरी व्यवसाय से जुडे) की चर्चा की

ठेला पटरी व्यवसाई संग के सचिव अभिषेख निगम और प्रकाश कुमार श्रीवास्तव गणेश जी – संयोजक रेहड़ी पटरी व्यवसाय प्रकोष्ठ काशी चेत्र भाजपा के नेतृत्व में साइकिलों, पटरी वाले प्रधानमंत्री जी की जनसभा में जय कारे कि नारे लगाते, भारत माता की जय, मोदी-मोदी, घर-घर मोदी, के नारे को लगाते हुए सभा स्थल पर पहुंचे। पटरी व्यवसाय से जुडे लोग प्रधानमंत्री जी की योजनाओं से काफी प्रसन्न दिखे।

IT कॉलेज में केंद्रीकृत रसोई अच्छय पात्र का उद्घाटन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी के IT कॉलेज परिसर में अक्षय पात्र रसोई का किया उद्घाटन इसके बाद महिला से सब्जी की धुलाई से लेकर दाल और चावल पकाने वाली मशीन के संचालन के बारे में जानकारी ली। किचन से निकलने के बाद पंडाल में प्रधानमंत्री ने बच्चों के साथ संवाद किया। ननिहाल की प्रतिभा को देखकर प्रधानमंत्री कायल हो गए।

अक्षय पात्र का उद्घाटन प्रधानमंत्री ने उस जगह किया है जहां कभी स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुष ने अपने पैरों से उधर आकर उस जगह को पवित्र किया था। कहां जाता है कि स्वामी विवेकानंद जी IT कॉलेज में पधारे थे।

प्रोटोकॉल को तोड़ कर प्रधानमंत्री नौनिहालों को दुलारने लगे

कोई भी कार्यक्रम हो भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी बच्चों के साथ दुलार करना नहीं भूलते। अर्दली बाजार एवं IT कॉलेज में बच्चों के साथ प्रधानमंत्री ने खूब बातें की। बच्चों से प्रधानमंत्री ने लक्ष्य के प्रति डटे रहने का संदेश दिया।

एक बच्चे ने शिव तांडव किया जिसे प्रधानमंत्री ने अपने पास बुला लिया। उसके सिर पर हाथ फेरकर शाबाशी दी। एक बच्चा नेशनल ओलिंपियाड में योग करके लौटा था, उसने अपने योग का प्रदर्शन किया, शिवम की ओर देख प्रधानमंत्री उसके मुरीद हुए। सेवापूरी का एक बालक ने लगभग सैकड़ो देशों का नाम बताया और राजधानी, प्रधानमंत्री ने कुछ देशों के नाम और राजधानी सुनी इसके बाद उन्होंने खूब ध्यान से पढ़ो और आगे बढ़ों कहा।

एक बच्चे ने संस्कृत में श्लोक सुनाया जिसे सुनकर प्रधानमंत्री चकित रह गए। उकथी कन्या विद्यालय की छात्रा ने महिषासुर मर्दिनी, और सा नानी संग स्थित में महिषासुर मर्दिनी सुनाया चंद मिनटों के लिए पंडाल में उपस्थित लोगों में सिर्फ उसकी ही आवाज गुंजन कर रही थी। साक्षी यादव ने कविता सुनाया। अतीत नामक छात्र ने आंख पर पट्टी बांधकर एशिया के अनेक देशों और उसकी राजधानी को बताया।सोहेल नाम छात्र ने प्रधानमंत्री के पंडाल में घुसने पर ढोल बजा कर उनका स्वागत किया और संस्कृत में प्रधानमंत्री को अपना परिचय दिया।

रुद्राक्ष कन्वेंशन में प्रधानमंत्री मोदी

7 जुलाई 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी के रुद्राक्ष कमीशन में आने पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने उन्हें अंग वस्त्र, स्मृति चिन्ह प्रदान की। रुद्राक्ष कंवेंशन में अखिल भारतीय शिक्षा समागम में प्रधानमंत्री ने कहा कि काशी को मोक्ष की नगरी इसलिए कहा जाता है क्योंकि हमारे यहां मुक्ति का एकमात्र उपाय विद्या और ज्ञान को माना गया है।

जब शिक्षा का इतना बड़ा आयोजन काशी में होगा तो देश को उसका बड़ा फायदा होगा। देश की महिलाओं, बेटियों के लिए जो क्षेत्र पहले बंद हुआ करते थे आज वह सेक्टर बेटियों की प्रतिभा के उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। तीन दिवसीय समागम से जो अमूल्य निधि निकलेगी वह शिक्षा को नई दिशा देगी। हमारे यहां उपनिषद ने कहा गया है कि विद्या अमृतमं अश्नुते, अर्थात विद्या ही अमरत्व है और अमृत तक ले जाती है।

प्रधानमंत्री ने शिक्षाविद से नए भारत का विजन साझा करते हुए कहा दुनिया भर में सौर ऊर्जा पर चर्चा हो रही है। हम भाग्यशाली हैं कि हमारे पास चमकता हुआ सूरज है। हमें सोलर एनर्जी का अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए।

अखिल भारतीय शिक्षा समागम

अखिल भारतीय शिक्षा समागम के दौरान राज्यपाल उत्तर प्रदेश आनंदीबेन पटेल, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, अन्नपूर्णा देवी, डॉ सुभाष सरकार, डॉ राजकुमार रंजन सिंह, वैज्ञानिक के कस्तूरी रंजन, उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय, मंत्री आशीष पटेल और रजनी तिवारी आदि मौजूद रहे।

अक्षय पात्र अभी है कहां-कहां

देश का कोई भी बच्चा भूख की वजह से शिक्षा से वंचित न हो इसके लिए प्रधानमंत्री ने यह योजना चलाई है जिसके तहत अब तक कानपुर, आगरा, गाज़ियाबाद, वृन्दावन, लखनऊ, गोरखपुर और वाराणसी में एकीकृत रसोई बनाने की प्रक्रिया शुरु हो गई है।

सोलर पैनल से अक्षय पात्र चलेगा

अक्षय पात्र फाउंडेशन के संयोजक ने बताया कि पर्यावरण संरक्षण उनको ध्यान में रखते हुए सोलर पैनल इन्फ्रा लाइटों से भोजन को तैयार किया जाता है।

अखिल भारतीय शिक्षा समागम काशी

काशी की धरती पर सब विद्या की राजधानी में 3 दिन के अखिल भारतीय शिक्षा समागम रुद्राक्ष कंवेंशन सेंटर शिक्षा मंत्रालय, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और बच्चों के सहयोग से आयोजित किया गया।

समागम का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षकों को उनके जिम्मेदारी का भी एहसास कराया। प्रधानमंत्री ने कहा लैब टू लैंड का रोड मैप होना चाहिए। कृषि विद्यालयों के लैब में होने वाले रिसर्च का लाभ किसानों को भी मिलना चाहिए और किसानों के अनुभव को लैब में भी प्रयोग करना चाहिए।

आज दुनिया के कई देश जड़ी – बूटी से पारंपरिक इलाज में हमसे आगे हैं। जिसका परिणाम दुनिया में देखा है। हमारे पास परिणाम के साथ-साथ प्रमाण भी होनी चाहिए।

प्रधानमंत्री ने कहा विकास का मतलब चमक दमक नहीं, अपितु वंचित तबके का सशक्तिकरण करना है। दुनिया के समृद्ध देश परेशान हैं, वहां बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है। युवा पीढ़ी ही कम हो रही है। हमारे यहां भी जल्द ऐसा समय आने वाला है इसका समाधान खोजना होगा। शिक्षा को 21वीं सदी के भविष्य से जोड़ना होगा।

अखिल भारतीय शिक्षा समागम का आयोजन उस पवित्र धरती पर हो रहा है जहां आजादी से पहले देश की इतनी महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय की स्थापना हो गई थी। शिक्षा और शोध का, विद्या और बोध का, इतना बड़ा मंथन होगा तो शेर निकलने वाला अमृत देश को नई दिशा देगा। प्रधानमंत्री जी ने कहा यह हमें क्लाइमेट चेंज पर काम चाहिए।

खेल जगत पर बोलते हुए कहा

भारत में लोग लगातार उपलब्धियां हासिल कर रहे है। खेल मैदान शाम को खिलाड़ियों से भरे होने चाहिए। विश्वविद्यालय खेल के क्षेत्र में लैक्चर बनाकर चल सकते हैं, आने वाले वर्षों में कितने गोल्ड मेडल ला सकते है, इस बारे में विचार करने की जरूरत हैं। हमारे बच्चे दुनिया भर में अखिल विश्व में खेलने जाएं।

मोदी की सौगात से सजेगा फ्लाईओवर

लहरतारा से चौका घाट फ्लाईओवर के नीचे 1.9 किलोमीटर में फैली आदिवासियों को प्रधानमंत्री ने नाईट बाजार की सौगात दी। इस बाजार के बन जाने के बाद काशी ही नहीं बल्कि दूर दराज से आने वाले पर्यटकों को काशी की कला व संस्कृति देखने के साथ ही बनारसी खानपान का स्वाद भी मिलेगा। रेलवे स्टेशन से निकलकर और वाराणसी के बस स्टेशन से बाहर आकर जनता को जरूरत की सामान्य वन प्ले सेटिंग में रात में भी मुहैया होगी।

सिगरा स्टेडियम का निर्माण

International Sports Complex के निर्माण के लिए खेलो इंडिया अब निवेश करेगी। इस Complex का निर्माण नई प्रणाली से 424 करोड की लागत से होगा। पहले चरण का निर्माण 87 करोड़ रुपए में होगा।

लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री

वायु सेना के विशेष विमान से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोपहर 1:24 पर लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर पहुंचे। प्रधानमंत्री के आगमन से पूर्व उनकी आगवानी के लिए राज्यपाल उत्तर प्रदेश आनंदीबेन पटेल और उत्तर प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी राजकीय विमान से 12:00 बजकर 35 मिनट पर एयरपोर्ट पहुंच गए। उन्हें कुछ पुष्प गुच्छ अंग वस्त्र भेटकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने स्वागत किया। इसके उपरांत तीनों लोग वाराणसी के पुलिस लाइन हेली पैड पर उत्तर हेलीकॉप्टर से रवाना हुए।

वाराणसी शहर में अनेक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के बाद प्रधानमंत्री, प्रकाश कुमार श्रीवास्तव ‘गणेश जी’ संयोजक रेहडी पटरी व्यवसाय प्रकोष्ठ काशी क्षेत्र भाजपा से मिलकर शाम 6:00 बजे वायु सेना के विमान से दिल्ली रवाना हो गए।

बहुत-बहुत तत्वदर्शी, दूरदर्शी व्यक्तियों के घनी तप और योग क्रियाओं को पहचान दिलाने वाले दुनिया में भारत का नाम आगे बढ़ाने वाले स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, अटल बिहारी वाजपेयी, श्यामा प्रसाद, राम मनोहर लोहिया स्वामी दयानंद सरस्वती से प्रेरणा लेकर भगवान राम के आदर्श को शिरोधार्य करके जगने वाले देश के माननीय प्रधानमंत्री का काशी में जो संस्कृति और विद्या की जननी वाली नगरी है। बाबा भोलेनाथ को समर्पित किया।

जय हिन्द – जय जवान – जय किसान। भारत माता की जय।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — देश का कोई भी बच्चा भूख की वजह से शिक्षा से वंचित न हो इसके लिए प्रधानमंत्री ने यह योजना चलाई है जिसके तहत अब तक कानपुर, आगरा, गाज़ियाबाद, वृन्दावन, लखनऊ, गोरखपुर और वाराणसी में एकीकृत रसोई बनाने की प्रक्रिया शुरु हो गई है। लहरतारा से चौका घाट फ्लाईओवर के नीचे 1.9 किलोमीटर में फैली आदिवासियों को प्रधानमंत्री ने नाईट बाजार की सौगात दी। इस बाजार के बन जाने के बाद काशी ही नहीं बल्कि दूर दराज से आने वाले पर्यटकों को काशी की कला व संस्कृति देखने के साथ ही बनारसी खानपान का स्वाद भी मिलेगा। जब शिक्षा का इतना बड़ा आयोजन काशी में होगा तो देश को उसका बड़ा फायदा होगा। देश की महिलाओं, बेटियों के लिए जो क्षेत्र पहले बंद हुआ करते थे आज वह सेक्टर बेटियों की प्रतिभा के उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं।

—————

sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह लेख (प्रधानमंत्री मोदी की 1774 करोड़ की सौगात काशी में।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं! ____

Filed Under: 2022-KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य Tagged With: author sukhmangal singh article, PM मोदी ने वाराणसी को दी 1774 करोड़ रुपए की सौगात, sukhmangal singh articles, अखिल भारतीय शिक्षा समागम वाराणसी, प्रधानमंत्री मोदी की 1774 करोड़ की सौगात काशी में, रुद्राक्ष कन्वेंशन में प्रधानमंत्री मोदी, वाराणसी में एकीकृत रसोई, सुख मंगल सिंह, सुख मंगल सिंह अवध निवासी, सौर ऊर्जा

जर्मनी के म्युनिख में नरेंद्र मोदी और जर्मन का इतिहास।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जर्मनी के म्युनिख में नरेंद्र मोदी और जर्मन का इतिहास। ♦

जर्मनी के म्युनिख में नरेंद्र मोदी और जर्मन का (संक्षिप्त) इतिहास।

Narendra Modi in Munich Germany and History of German

जर्मनी का म्यूनिख शहर अच्छे शहरों में एक है। G7 के 48th वे शिखर सम्मेलन में शामिल होने भारत के प्रधानमंत्री मोदी पहुंचे। भारतीय समुदाय द्वारा आयोजित जर्मनी के म्यूनिख में एक कार्यक्रम में उनका भव्य स्वागत किया गया और मोदी मोदी के जय कारे से वातावरण गूंज उठा। प्रधानमंत्री मोदी के भाषण से पहले राष्ट्रगान किया गया और अंत में भारत माता की जय के नारे लगाए गए।

• प्रधानमंत्री मोदी का वक्तव्य •

प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीयों को संबोधित करते हुए कहा कि लोकतंत्र पर भारतीयों को गर्व होना चाहिए और वह गर्व के साथ कह सकते हैं कि भारत लोकतंत्र की जननी है। आज का भारत सपनों को पूरा करने के लिए अधीर है। हम अपने पुराने रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं।

भारत ने 2016 में ही तय किया था कि 40 फ़ीसदी बिजली का उत्पादन जीवाश्म ईंधन से किया जाएगा। वर्तमान समय में उस लक्ष्य को भारत ने हासिल कर लिया है। प्रधानमंत्री ने कहा सबको साथ लेकर देश का विकास किया जाता है तो दुनिया की बड़ी शक्तियां भी उसके साथ आ जाती हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि देश का पैसा देश में लगेगा — आज एक मजबूत सरकार देश का नेतृत्व कर रही है लोगों को पता है उसका पैसा भ्रष्टाचार में नहीं देश के विकास में लगेगा।

• देश चलता है और चलेगा की मानसिकता बदली •

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा कि एक वक्त था जब देश होता है “ऐसा होता रहता है”, चलता है, ऐसा ही चलेगा की मानसिकता से चल रहा था।

आज का भारत इस मानसिकता से बाहर निकल चुका है और आज देश करना है और करना ही है के संकल्प के साथ चल रहा है। पवित्र, सच्चे व अच्छे कार्यों से देश चलेगा और सम्पूर्ण विकास हो रहा हैं।

• सही फैसले लेता है भारत •

कोई देश जब सही फैसले लेता है तो उसका तेजी से विकास होता है। 21वीं सदी का भारत पीछे रहने वालों में नहीं है बल्कि, यौगिक क्रांति का नेतृत्व करने वाला भारत है। आज भारत में सबसे सस्ता डाटा है। डिजिटल ट्रांजैकन 40 फ़ीसदी भारत में हो रहा है।

• ग्रामीण विकास पर फोकस करते हुए कहा •

भारत के हर गांव में बिजली है हर गांव सड़क से जुड़ चुका है, आज का भारत बदल रहा है। भारत में 99 परसेंट लोगों के पास गैस कनेक्शन है।

• स्वास्थ्य पर फोकस •

आज भारत के गरीब के पास 500000 के इलाज की सुविधा है हर परिवार बैंक से जुड़ा है। कोरोना में हर परिवार को मुफ्त राशन दिया गया।

• स्टार्टअप के क्षेत्र में भारत •

प्रधानमंत्री ने कहा स्टार्टअप के लिए आज देश में तीसरा सबसे बड़ा इको सिस्टम है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता है। कल तक जो भारत दूसरे से मोबाइल खरीदता था वह आज सबसे बड़ा निर्माता साबित हुआ है।

• आपातकाल पर चर्चा •

26 जून 2022 को प्रधानमंत्री म्युनिख जर्मनी में अपने वक्तव्य में कहा हम भारत के लोग जहां भी रहे अपने लोकतंत्र पर गर्व करते हैं। हर भारतीय के डीएनए में लोकतंत्र है। आगे उन्होंने कहा कि 47 साल पहले लोकतंत्र को दबाने और कुचलने का प्रयास किया गया भारतीय लोकतंत्र के जीवंत इतिहास में आपातकाल काले धब्बे की तरह है।

• अप्रवासी भारतीयों से मुलाकात •

जर्मनी के म्यूनिख में भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी ने भाषण के अंत में भारत माता के जयकारे लगवाए और उसके बाद लोगों को आशीर्वाद प्रदान करते हुए दोनों हाथ हिलाते हुए जन जन तक पहुंचने का प्रयास किया एक बच्ची से उन्होंने पूछा कि हिंदी जानती हो? जर्मनी में अप्रवासीय भारतीय अपने प्रधानमंत्री को पाकर बहुत खुश थे और भाषण के दौरान हाथ हिलाते रहे बीच-बीच में मोदी मोदी कह कर जयकारे लगाते रहे।

एक रचना प्रस्तुत…

बड़ी कठिनाइयों से गुजर कर,
हमने अपने देश को सजाया है।
दुनिया में फैली महामारी के समय,
अमृत का घड़ा आगे बढ़ाया है।

  • कोरोना काल में भारत विश्व को जिस तरह से वैक्सीन के माध्यम से लोगों की जान बचाया उसका श्रेय भारत के वैज्ञानिकों और प्रधानमंत्री को जाता है।
  • G -7 शिखर सम्मेलन म्यूनिख में 26 जून 2022 से 28 जून 2022 तक चला फिर प्रधानमंत्री मोदी संयुक्त अरब अमीरात का दौरा करेंगे।

• जर्मनी का संक्षिप्त इतिहास (Brief history of Germany) •

सर्वप्रथम 8 फरवरी 1871 ईस्वी में विलियम को जर्मन संघ के सम्राट के रूप में ताजपोशी की गई। जर्मनी का सबसे शक्तिशाली राज्य ‘प्रशा’ था। जर्मनी का एकीकरण बिस्मार्क ने किया था। जो ‘प्रशा’ के शासक विलियम प्रथम का प्रधानमंत्री था। बिस्मार्ट जर्मनी को प्रसाद के नेतृत्व में चाहता था। परंतु बिस्मार्ट को अधिक भय फ्रांस का था।

सन 1815 से 1850 ईस्वी तक जर्मन साम्राज्य ऑस्ट्रेलिया के आधिपत्य में था।

• जर्मनी का निर्माण किया •

जर्मनी राष्ट्र के निर्माण में बोमर, लसर, और राके आदि दार्शनिकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय ऑस्ट्रेलिया का चांसलर मेटरनिख का काल था।

• विलियम प्रथम का राज्याभिषेक •

बिस्मार्क ने ‘वर्साय’ के राजमहल में जर्मनी के सम्राट के रूप में विलियम प्रथम का राज्याभिषेक कराया।—(G.K)

• विलियम प्रथम बिस्मार्क को कहता •

विलियम प्रथम जो जर्मनी ‘प्रशा’ का प्रधानमंत्री था जिसने (बिस्मार्क) को जर्मनी का एकीकरण कराया था उसे बाजीगर कहता था।

• जर्मनी का एकीकरण किन परिस्थितियों में हुआ •

जर्मनी का एकीकरण सूडान युद्ध के बाद संभव हो सका। कहा जाता है कि फ्रांस और प्रशा के मध्य 10 मई 1871 ईस्वी में फ्रैंकफर्ट की संधि हुई। सन 1870 (अट्ठारह सौ सत्तर) में ‘प्रशा’ युद्ध में नेपोलियन तृतीय ने 1 सितंबर 1870 (अट्ठारह सौ सत्तर) को आत्मसमर्पण कर दिया था। और 15 जुलाई 1870 ईस्वी को फ्रांस और ‘प्रशा’ के बीच सूडान का युद्ध हुआ। ऑस्ट्रेलिया और ‘प्रशा’ के बीच 1866 ईसवी में युद्ध हुआ, उस युद्ध में ऑस्ट्रेलिया ने ‘प्रशा’ के आगे घुटने टेकते हुए आत्मसमर्पण कर दिया था। और 23 अगस्त 1866 ईसवी में ऑस्ट्रेलिया जर्मन संघ में शामिल हो गया था।

• वर्तमान में ऑस्ट्रेलिया की राजधानी •

वर्तमान समय में ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा है इसका बड़ा नगर सिडनी है।

• ए एच पामर ने लिखा (A H. Palmer) •

क्वींसलैंड के औपनिवेशिक सचिव ए एच पामर, 1884 ई. में लिखा कि’ — आज शहीदों का स्वभाव इतना अधिक कपट पूर्ण था कि वे केवल भय के द्वारा ही संचालित होते थे वस्तुतः ऑस्ट्रेलियाई आदिवासियों पर शासन करपाना केवल क्रूर बल प्रयोग द्वारा ही संभव हो सकता है। —(Hindi Wikipedia)

ऑस्ट्रेलिया में नरसंहार के आने का स्थल मौजूद हैं जबकि समर्थन के दस्तावेज में भिन्न-भिन्न है।

भारत के प्रधानमंत्री का G7 के 48वां शिखर सम्मेलन में शामिल होना म्यूनिख में पहुंचकर डायस्पोरा में प्रवासी भारतीयों के साथ राष्ट्रगान करना और भारत का संदेश देना अपने आप में एक महत्वपूर्ण संदेश देता है।

जर्मनी में श्लॉस एल्माऊ (Schloss Elmau) होटल में G7 शिखर सम्मेलन का 48वां आयोजन हुआ। इस होटल की खासियत क्या है कि भगवान गणेश का इस पर प्रभाव दिखता है और भारत की सांस्कृतिक विरासत से प्रेरित है।

♦—♦ ♥ ♦—♦

• भारत और जर्मनी की रणनीतिक साझेदारी •

G7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जर्मनी के चांसलर ओलाफ शोल्ज से मुलाकात की। इन दोनों नेताओं ने भारत और जर्मनी की रणनीतिक साझेदारी की गति को बनाए रखने के साथ ही द्विपक्षीय दोस्ती में विविधता लाने पर सहमति व्यक्त की।

• भारतीय प्रधानमंत्री और फ्रांस •

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच गर्मजोशी दिखाई दी। दोनों लोग एक दूसरे के गले लगे।

• भारत के प्रधानमंत्री और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति •

प्रधानमंत्री मोदी कि दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामसोफा से भी मुलाकात हुई।

• मोदी की अमेरिका के राष्ट्रपति से मिलन •

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन खुद आकर प्रधानमंत्री मोदी से हाथ मिलाया। जिस स्थान पर कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मौजूद थे। खुद अमेरिका के राष्ट्रपति आकर प्रधानमंत्री के कंधे पर हाथ रखा और फिर दोनों लोग गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाए। कहा जाता है कि जापान में मई में हुए सम्मेलन के बाद मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति की यह पहली मुलाकात है।

• ऊर्जा, अमीरों का विशेषाधिकार नहीं •

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा ऊर्जा उपयोग पर केवल अमीरों का विशेषाधिकार नहीं होना चाहिए। उस पर गरीब परिवारों का भी समान अधिकार है। भू राजनीतिक तनाव से ऊर्जा की लागत आसमान छू रही है तो इस बात को याद रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

• मोदी का विकासशील देशों को प्रेरणा •

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि जब भारत जैसे विशाल देश महत्वाकांक्षा दिखाता है तो विकासशील देशों को भी प्रेरणा मिलती है। आज भारत में स्वच्छ ऊर्जा तकनीक के लिए विशाल बाजार उभर रहा है। G7 देश इस क्षेत्र में रिसर्च इनोवेशन और विनिर्माण में निवेश कर सकते हैं।

मोदी ने G7 सम्मेलन के सदस्यों को अपनी तरफ आकृष्ट करते हुए कहा …

“यह भ्रांति है कि गरीब देश पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुंचाते हैं!” भारत का 1000 साल से अधिक का इतिहास इस दृष्टिकोण का पूरी तरह से खंडन करता है। हमने समृद्धि का समय देखा है सदियों की गुलामी भी झेली है।

अब आजाद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था है। आगे कहा 17 फ़ीसदी जनसंख्या दुनिया की, केवल भारत में निवास करती है। परंतु बेसिक कार्बन उत्सर्जन में हमारा योगदान मात्र 5% है। इसके पीछे मुख्य कारण हमारी जीवन शैली है जो प्रकृति के साथ सह अस्तित्व के सिद्धांत पर आधारित है।

मोदी ने स्वास्थ्य पर वक्तव्य में …

भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने कहा मानव और ग्रह की सेहत आपस में जुड़ी हुई है। इसलिए हमने वन वर्ल्ड वन हेल्थ के दृष्टिकोण को अपनाया। कोरोना महामारी के दौरान भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र में डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल के कई रचनात्मक तरीके खोजे।

G7 देश इस इनोवेशन को विकासशील देशों में ले जाने में भारत की मदद कर सकते हैं। कोरोना संकटकाल में योग दुनियाभर के लिए स्वास्थ्य निवारक का बड़ा माध्यम बना और इससे शारीरिक मानसिक सेहत बनाए रखने में बहुत मदद मिली।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — आजाद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था है। आगे कहा 17 फ़ीसदी जनसंख्या दुनिया की, केवल भारत में निवास करती है। परंतु बेसिक कार्बन उत्सर्जन में हमारा योगदान मात्र 5% है। इसके पीछे मुख्य कारण हमारी जीवन शैली है जो प्रकृति के साथ सह अस्तित्व के सिद्धांत पर आधारित है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा ऊर्जा उपयोग पर केवल अमीरों का विशेषाधिकार नहीं होना चाहिए। उस पर गरीब परिवारों का भी समान अधिकार है। भू राजनीतिक तनाव से ऊर्जा की लागत आसमान छू रही है तो इस बात को याद रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है। कोरोना संकटकाल में योग दुनियाभर के लिए स्वास्थ्य निवारक का बड़ा माध्यम बना और इससे शारीरिक मानसिक सेहत बनाए रखने में बहुत मदद मिली। “यह भ्रांति है कि गरीब देश पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुंचाते हैं!” भारत का 1000 साल से अधिक का इतिहास इस दृष्टिकोण का पूरी तरह से खंडन करता है। हमने समृद्धि का समय देखा है सदियों की गुलामी भी झेली है।

—————

sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह लेख (जर्मनी के म्युनिख में नरेंद्र मोदी और जर्मन का इतिहास।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं! ____

Filed Under: 2022-KMSRAJ51 की कलम से Tagged With: 48वां आयोजन G7 शिखर सम्मेलन का, author sukhmangal singh, Brief history of Germany, G7 शिखर सम्मेलन का 48वां आयोजन, History of German, Narendra Modi in Munich Germany in hindi, Sukhmangal Singh, sukhmangal singh articles, जर्मनी का संक्षिप्त इतिहास, जर्मनी के म्युनिख में नरेंद्र मोदी और जर्मन का इतिहास, लेखक सुख मंगल सिंह, सुख मंगल सिंह

संसार सागर में परमात्मा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ संसार सागर में परमात्मा। ♦

ईश्वर कहते है कि मुझे जानकर बहुत लोग भजन करके तर जाते हैं। ईश्वर के विषय का यथार्थ ज्ञान ही तप है। जाे ईश्वर को भजता है उसे ईश्वर भक्त कहते हैं। संसार के लोगों ने जिसे मूल्यवान समझा वाे उसे ही याद करते हैं। क्या पता कौन किस समय काम आ जाए इसका ध्यान नहीं रखते हैं।

“कहा जाता है कि अंगद ने हनुमान जी से कहा की हनुमान समय-समय पर मेरी याद भगवान को दिलाते रहना जिसे भगवान याद करते हैं उसका बड़ा भारी भाग्य होता है।“

भरत जी से भारद्वाज मुनि ने कहा सारी दुनिया भगवान को भजती है और तुम्हें भगवान भजते हैं। मानव का जन्म दिव्य है। लेकिन भगवान की तरह पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं है कुछ अंतर है भगवान जैसी पूर्ण शक्ति नहीं है। भगवान का संसार में आना हित हेतु हितकारी होता है। लेकिन मनुष्य भगवान की आज्ञा से ही आता है।

• भगवान में हर समय मन को रमाएं रहना कल्याणकारी •

ज्ञानी पुरुषों का कर्म मनुष्य की अपेक्षा दिव्य होता है। भगवान के भजन के प्रभाव से कल्याण होता है उसी प्रकार भगवान के हाथों से मरने पर उस जीव की मुक्ति हो जाती है। भगवान का नाम जप करें अथवा भजन करें या सत्संग करें ऐसे जीव का कल्याण होता है।

महापुरुषों का भी दर्शन मुक्ति देने वाला होता है। भगवान में हर समय मन को रमाएं रहना कल्याणकारी होता है। भगवान से प्रेम हो जाने पर शेष गौण हो जाता है। शरीर क्रिया करें अथवा न करें परंतु निश्चित रूप से संसार में रहकर ईश्वर का भजन मनन करना कल्याणकारी कदम है।

‘भगवान ने कहा है कि तू केवल मेरा भजन कर’। जिस प्रकार हिम्मत करने वाला व्यक्ति उद्देश्य तक जल्दी पहुंच जाता है कम हिम्मत करने वाला पछताता रहता है; रोता रहता है उसी प्रकार मन की चंचलता जब छूट जाती है तो ईश्वर अर्थात भगवान को पाने में देरी नहीं होती धीरे-धीरे ही सही वह ईश्वर तक पहुंच जाता है।

• मन से धनवान धरा पर बहुत थोड़े •

कहां जाता है कि परमात्मा की प्राप्ति बहुत ही सहज है। परोपकार में किया गया खर्च खुले हाथ से करना होगा। उदारता का भाव अपने पास रखना उत्तम होता है। आपके पास यदि ऐसा लगे कि कुछ भी नहीं है तो भी लोगों के समक्ष मीठी वाणी बोली बोलना ज्यादा लाभप्रद होता है। हमारा लक्ष्य होना चाहिए और मन से धनवान धरा पर बहुत थोड़े ही मिलते हैं।

जीवन में काम करना चाहिए बड़ाई की चाहत नहीं रखनी चाहिए। अच्छे कार्यों के संपन्न होने के बाद भी उसे प्रकाशित करने से क्या लाभ यदि प्रकाशित करते हैं तो वह बड़ा नहीं कही जाएगी। मनुष्य अपनी बुरे काम को छुपाता है, छुपाने की चेष्टा करता है। वही आप उत्तम काम करके प्रकट किए बिना रह नहीं सकते हैं। यदि आप उत्तम कार्य करते हैं तो आप का उद्धार होने में विलंब नहीं होता है। परमात्मा की प्राप्ति की इच्छा वाले मनुष्य को दंभ – पाखंडी, मान – बड़ाई की इच्छा को छोड़ देना उत्तम होता है।

• भगवान खेवनहार है। •

दिखावा करना, गलती को छुपाना, आलस्य का आना, पापों को छिपाने जैसा कृत्य है। कल्याण व्याकुलता से होता है व्याकुलता भगवान के लिए करनी पड़ती है। संसार समुद्र तट की भांति ही है साधन की कमी का रोना नहीं रोना चाहिए। भगवान खेवनहार है। जिस प्रकार समुद्र में डूबते हुए व्यक्ति के हाथ में यदि कोई रस्सी लग जाती है तो उसे नहीं छोड़ता उसी प्रकार संसार सागर में ईश्वर की भक्ति को नहीं छोड़ना चाहिए।

हमेशा चिंतन करनी चाहिए साधन तेज, मनुष्य को चिंता नहीं चिंतन करना चाहिए। चिंता दुख का कारण होता है और चिंतन से ही ईश्वर की प्राप्ति होती है। प्रेम और भय से होता है। धार्मिक देश में जन्म बहुत कठिन तपस्या के बाद होता है और उत्तम कुल में जन्म या उत्तम सत्संग मिलना बहुत कठिन कार्य है। यदि मिल जाए तो मनुष्य को उस समय को नहीं गंवाना चाहिए। परमात्मा के तत्व को जानने वाला जीव संसार के सारे कार्यों को मिट्टी के समान समझने लगता है।

• मृत्यु के उपरांत •

संसार सागर में जो कुछ हो रहा है परमात्मा तत्व जानने के बाद चिंता नहीं होना चाहिए। आपने इस संसार में जो कुछ बनवाया है जिसे आप कहते हैं कि हमने अमुक कार्य किया है वह मृत्यु के उपरांत किस काम का। आपको यह भी नहीं पता है कि आपका आगे का जन्म कहां और किस तरह में होगा।

न जाने कितनी बार मनुष्य का जन्म हुआ होगा; अगर मनुष्य उस जन्म काल में परमात्मा को जान लिया होता तो फिर अगला जन्म ही क्यों होता। परमात्मा की प्राप्ति 33 करोड़ मनुष्यों में किसी एक को होती है। धरा पर जीव करोड़ों के करोड़ों गुना हैं। परंतु उसमें से सबको मुक्ति नहीं मिलती है। इसलिए सर्वस्व निछावर कर देना चाहिए; सब कुछ चले जाने के बाद भी ईश्वर से प्रेम करना चाहिए।

• ईश्वर की शरण में… •

सांसारिक उन्नति देखकर मनुष्य प्रसन्न हो जाता है किंतु साधन के अभाव में घर जल जाता है। मनुष्य परमेश्वर से प्रार्थना करें कि ईश्वर उसे सद्बुद्धि दे; ज्ञान दे। भगवान की शरण में जो जाता है उसका प्रभु त्याग नहीं करता। ईश्वर की शरण में जाने के बाद; उससे जो लोग कुछ मांग नहीं करते, उसकी सुनवाई भगवान जल्दी करता है।

समय बहुत मूल्यवान होता है एक-एक पल वृथा नहीं खोना चाहिए। करोड़ों जन्मों के उपरांत मनुष्य का एक बार जन्म मिलता है। मोह से राग द्वेश रूपी द्वंद उत्पन्न होता है। द्वंद की स्थिति में मनुष्य मोहित हो जाता है। मोह हो जाने पर बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। मोह ईश्वर से करना होगा। बासुदेव में निरंतर भ्रमण करते रहना चाहिए जो प्राणी भजन कीर्तन और भगवान की भक्ति की चर्चा करते हैं भगवान के गुण और प्रभाव सहित कथन करके संतुष्ट होते हैं वह ईश्वर के करीब होते हैं।

“प्रभु कार्य किए बिना मोहि कहां विश्राम”

समर्पित भाव से समस्त कार्यों को ईश्वर को समर्पित करना सर्वथा उचित है।

‘येषा म् न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।

ऐसे लोग पृथ्वी पर भार स्वरूप हैं जिनके अंदर विद्या, तप, दान, ज्ञान अच्छे आचरण, सद्गुण नहीं है। मनुष्य का शरीर पाकर जो कर्तव्य पालन करते हैं उन्हीं को धन्यवाद है।

किसी बात की परवाह करना ही मुक्ति में बाधक होता है। भेजें बेटे – बेटी, नाती – पोता कमाने के लायक हो जाए तो भी ठीक है वह आपको कुछ दे रहे हैं अथवा नहीं दे रहे हैं इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए। सहनशीलता उत्तम होती है कायरता उत्तम नहीं है, उद्दंडता खराब है वीरता प्राप्त करने के उपरांत उद्दंडता नहीं किया जाना चाहिए।

अच्छे व्यक्तियों को ढिंढोरा पीटकर पढ़ाई नहीं करनी चाहिए। अधिकांश लोग ढोंग करते हैं। शास्त्र के अनुकूल कार्य में बेपरवाह नहीं रहना चाहिए। बेपरवाह होने को गफलत कहते हैं। गफलत बिल्कुल ही नहीं करनी चाहिए। मनुष्य का जन्म अनन्य भक्ति करने के लिए मिलता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — यह मनुष्य जन्म मिला हैं भगवन भजन करने के लिए न की भोग विलाष के लिए। भगवान केवल उन भक्तों का उद्धार करते हैं जो सच्चे मन से सम्पूर्ण समर्पण के साथ प्रेम से याद करते है उन्हें, सच्चे मन से पूर्ण प्रेम से भजन करते है जो भगवान का उनका सदैव ही ख्याल रखते हैं भगवान भी। हम मनुष्यों को भगवान का मनन और चिंतन करना है, चिंता बिलकुल भी नहीं करना है। ऐसे लोग पृथ्वी पर भार स्वरूप हैं जिनके अंदर विद्या, तप, दान, ज्ञान अच्छे आचरण, सद्गुण नहीं है। मनुष्य का शरीर पाकर जो कर्तव्य पालन करते हैं उन्हीं को धन्यवाद है।

—————

sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह लेख (संसार सागर में परमात्मा।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं! ____

Filed Under: 2022-KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य Tagged With: author sukhmangal singh, sukhmangal singh articles, ईश्वर की कृपा पर कविता, ईश्वर प्रेम पर कविता, ईश्वर प्रेम पर निबंध, ईश्वर सुविचार हिंदी, भक्ति - ईश्वर के प्रति प्रेम - content in Hindi, भक्ति और प्रेम, भक्ति कोट्स इन हिंदी, भगवान की सच्ची भक्ति क्या है? भगवान के लिए भक्ति, भगवान से प्यार कैसे करें?, सद्भावना सुविचार, संसार सागर में परमात्मा, सुखमंगल सिंह की रचनाएँ

प्रातः उठ हरि हर को भज।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ प्रातः उठ हरि हर को भज। ♦

प्रातः उठ हरि हर को भज लो,
धरती का अभिनंदन कर लो।
उल्लसत मनसे बंदन कर लो,
मुक्त कंठ में चंदन धर लो॥

निर्मल पानी गुनगुन पी लो,
चाय की चुस्की रुक कर ले लो।
लिखनी ले साहित्य लिख लो,
प्रातः उठ हरि हर भज लो॥

नित्य – क्रिया में निवृत्ति हो,
गंगा जल ले काया धो लो।
धूप – दीप ले प्रभु से बोलो,
प्रातः उठकर आंखें खोलो॥

पेपर आया उसको पढ़ लो,
देश दुनिया की खबर ले लो।
दूरदर्शन से – मेल कर लो,
प्रातः उठ हरि विनती कर लो॥

भूखा – नंगा जो भी भेजा,
झोली सबकी भर के दे दो।
कोई खाली हाथ न जाये,
प्रातः उठकर प्रभु से बोलो॥

कभी न गलती हरि करने दो,
स्वच्छ हृदय मन भरने को।
अपना हमको प्रभु बना लो,
प्रातः उठ हरिहर को जप लो॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में बताया है, सुबह उठकर आपका नित्य क्रिया कर्म, का क्या क्रम होना चाहिए। जिससे आपका हर एक कार्य शांति पूर्वक, सही समय पर पूर्ण हो जाये।

—————

sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह कविता (प्रातः उठ हरि हर को भज।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

ज़रूर पढ़ें: पृथु का प्रादुर्भाव।

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी Idहै:kmsraj51@hotmail.com.पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

cymt-kmsraj51

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

____Copyright ©Kmsraj51.com All Rights Reserved.____

Filed Under: 2021-KMSRAJ51 की कलम से, प्रातः उठ हरि हर को भज।, सुखमंगल सिंह जी की कविताये।, सुखमंगल सिंह जी की रचनाएँ, हिंदी कविता, हिन्दी साहित्य, हिन्दी-कविता Tagged With: 4 लाइन की कविता हिंदी में, Best Prernadayak Kavita in Hindi, hindi, Hindi Kavita, Hindi Me Kavita on Life, Hindi Poems, Hindi Poems of famous poets, Inspirational Hindi Poem, kavi sukhmangal singh, kavita in hindi, most haunted places in india, most haunted places in india in hindi, poems, Poetry, Sukhmangal Singh, sukhmangal singh articles, sukhmangal singh poems, कविता, कविता हिंदी में, कविता हिंदी में बच्चों के लिए, कविता हिंदी में लिखी हुई, कवि‍ताएँ, गजल, गीत क्षणिकाएं व अन्य हिंदी काव्य पढ़ें, छोटी सी कविता हिंदी में, मोटिवेशनल कविता हिंदी में, सुंदर कविता हिंदी में, सुबह उठकर भजन करो, सुबह की प्रार्थना में जागें, हिंदी दोहे

Next Page »

Primary Sidebar

Recent Posts

  • निरर्थक रील्स की आरी – गुमराह होती नारी।
  • बात वक्त की।
  • तिरंगा का करें सम्मान।
  • एक सफर।
  • बाल विवाह – एक अभिशाप।
  • क्या बदलाव लायेगा नया साल।
  • है तो नववर्ष।
  • मोह।
  • अपना धर्म सबसे उत्तम।
  • ठंडी व्यार।
  • रिश्तों को निभाना सीखो।
  • तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान में अंतर।
  • मित्र।
  • आखिर क्यों।
  • समय।
  • काले बादल।
  • सुबह का संदेश।

KMSRAJ51: Motivational Speaker

https://www.youtube.com/watch?v=0XYeLGPGmII

BEST OF KMSRAJ51.COM

निरर्थक रील्स की आरी – गुमराह होती नारी।

बात वक्त की।

तिरंगा का करें सम्मान।

एक सफर।

बाल विवाह – एक अभिशाप।

क्या बदलाव लायेगा नया साल।

है तो नववर्ष।

मोह।

अपना धर्म सबसे उत्तम।

ठंडी व्यार।

रिश्तों को निभाना सीखो।

Footer

Protected by Copyscape

KMSRAJ51

DMCA.com Protection Status

Disclaimer

Copyright © 2013 - 2026 KMSRAJ51.COM - All Rights Reserved. KMSRAJ51® is a registered trademark.