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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हेमराज ठाकुर की रचनाएँ

यह क्या हो रहा है?

Kmsraj51 की कलम से…..

Yah Kya Ho Raha Hai? | यह क्या हो रहा है?

बड़े खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि यह आज समाज में हो क्या रहा है? मुद्दा आज सता पक्ष और विपक्ष की तू – तू मैं – मैं का नहीं है। मुद्दा है तो वह है देश की बहू बेटियों की असमत का।

वह चाहे मां – पत्नी हो या बहु हो या फिर बेटी,
दुख यह है कि क्यों की जा रही है उसकी अनदेखी?

साथियों यह भयानक मंजर हमने मीडिया में बड़े स्तर पर निर्भया मामले के समय देखा था। पूरा देश उस आक्रोश में उबल गया था। विपक्ष ने हवा को तूल दिया और सत्ता पक्ष ने कड़े कानून बनाने और दोषी को तुरन्त कड़ी सजा दिलाने का आश्वासन दिया। हम सब जानते हैं कि निर्भया मामले में दोषियों को सजा दिलाने तक का सफर कैसा रहा और कितना लम्बा रहा? ऐसा नहीं है कि इससे पूर्व बहू बेटियों के साथ कोई बलात्कार नहीं हुए थे। पर यह मामला पहली बार मीडिया में राष्ट्रव्यापी स्तर पर इस तरह से भटका था कि पूरे देश की आत्मा ही जैसे जाग उठी थी।

पर सवाल यह है कि क्या फिर ऐसी वारदातें होना बंद हो गई? यूपी के हाथरस की घटना हम कहां भूले हैं? रात के अंधेरे में ही दाह संस्कार हमे याद है। क्या पश्चिम बंगाल में हुई हिंसात्मक घटनाएं देश को शर्मसार नहीं करती? हाल ही में राजस्थान के अलवर में नाबालिग लड़की के साथ शादी और उसके साथ उसके ससुर, नंदोई और जेठ द्वारा पति की सहमति से सामूहिक बलातकार तब तक करना, जब तक वह बेहोश नहीं हो जाती। अब मणिपुर में महिलाओं के साथ एक घिनौना कुकृत्य दिन दहाड़े समाज द्वारा पुलिस की मौजूदगी में किया जाना। इधर हिमाचल में समाज के ही सामने युवतियों के साथ छेड़छाड़ और मार पीट।

मित्रों शर्मिंदगी राजनैतिक पार्टियों की कारगुजारी और बयानबाजी पर नहीं बल्कि समाज की कुत्सित सोच पर होती है। आखिर क्यों समाज इस कदर खुदगर्ज और मूक दर्शक तथा भीरू होता जा रहा है कि हकीकत को अपनी आंखों से देख कर भी वह अपना मुंह मोड़ कर वहां से इस कदर से निकल जाता है कि जैसे उसने कुछ होते हुए ही नहीं देखा?

सवाल सत्ताधीशों से भी है कि वे भी अपनी शक्ति का दुरुपयोग आखिर क्यों करते हैं? शायद यह हमारी कानून व्यवस्था और न्याय प्रणाली की कमजोरी को भी दर्शाता है।कानून में कई हथकंडे और लम्बे दौर तक चलती न्यायिक प्रक्रिया तथा कई मामलों में राजनैतिक संरक्षण अपराधियों के हौसलों को बुलन्द करता रहता है कि क्या होगा। जो भी होगा देखी जाएगी। कोर्ट में निपट लेंगे।

सबसे बड़ी चिन्ता तो समाज की पढ़ी-लिखी स्त्रियों के समुदाय की होती है कि वे अपने साथ हो रहे अन्याय में स्वयं ही एक जुट नहीं है। वे खेमों में और राजनैतिक दलों में विभाजित हो कर कई बार पक्ष-विपक्ष में वाद – विवाद प्रतियोगिता करती हुई नजर आती है। मेरा निवेदन उन सभी माताओं बहनों से है कि ऐसे मुद्दों में न ही तो हमे राजनैतिक दलदल में वोटों के नफे नुकसान में पड़ना चाहिए और न ही समाज को बांटने वाली विचारधारा का समर्थन करना चाहिए। ऐसे मुद्दों पर राजनीति, जाति, धर्म, सम्प्रदाय इत्यादि समाजगत कुत्सित भावबोधों से ऊपर उठ कर राष्ट्र की मानव समाज वाली भावना से काम करना चाहिए।

  • बेटी या औरत कोई भी हो और किसी भी जाति धर्म सम्प्रदाय इत्यादि की हो, वह हमारे देश की मातृ शक्ति है। उसके शील की रक्षा करना हमारा सामूहिक दायित्व है। यह माना कि कई मुद्दों पर महिलाएं भी गलत हो सकती है। पर जो ये घटनाएं ऊपर मैने गिनाई है। ये सब महिलाओं के साथ हुए घोर अन्याय और समाज की कुत्सित मानसिकता की उदाहरण है।
  • बंधुओ और भगनियों यह बात याद रखना कि दूसरों के घरों में लगी आग को बुझाने में जो लोग मदद नहीं करते बल्कि उससे अपनी रोटियां सेंकने का काम करते हैं। उन्हे यह कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारे घर भी यहीं नजदीक है। कहीं यह आग भड़क कर हमारे घर को भी न लील जाए।
  • आज किसी दूसरे की बहू बेटी के साथ किसी दूसरे के उन्मत बेटों ने गलत किया है और कल को यही घटना हमारी बहु – बेटियों या मां – पत्नियों के साथ भी हो सकती है और हमारे बेटे भी उन्मत हो कर ऐसी घटनाओं को मिलकर अंजाम दे सकते हैं।

इसलिए समाज को अपने दायित्व को समझना होगा। सोशल मीडिया और फिल्मी दुनियां के ऐसे अपराधिक दृश्यों का बहिष्कार करना चाहिए, जो युवा पीढ़ी को गलत करने के आइडिया देते हो।

जातिवाद, धर्मवाद और संप्रदायवाद के नाम पर समाज में नफरत फ़ैलाने वाले हर जाति – धर्म और सम्प्रदाय के व्यक्तियों को कड़े से कड़े कानून बनाकर कड़ी सजा का प्रावधान करने की मांग करनी चाहिए। फिर वह आग चाहे वोट के लिए भड़काई जाए या फिर किसी अन्य कारण से। एक व्यक्ति भड़काए या फिर कोई पूरा समुदाय।सामूहिक सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए। यह भीड़ तन्त्र तो फिर समाज की कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाता ही रहेगा, यदि इस व्यवस्था पर अंकुश न लगाया गया तो।

हमे समझना होगा कि समाज में मात्र एक ही धर्म कुदरत ने बनाया है, जो है मानव धर्म। दो ही जातियां हैं एक स्त्री और दूसरी पुरुष। उनमें किसी को कोई छूत भी नहीं लगती और न ही कोई अन्य बाधा है। दोनो जातियों को एक दूसरे की कुदरती नितान्त आवश्यकता है और उन्हें कुदरत के नियम का पालन कर के अपने – अपने जाति धर्म का ईमानदारी और सामाजिक मर्यादाओं से पालन करना चाहिए। न ही कोई लड़ाई होगी और न ही तो कोई झगड़ा दंगा – फसाद।

बाकी समाज बुद्धिजीवी है। ये अन्य जाति धर्म और सम्प्रदाय आज पढ़े – लिखे समाज में हमे मिल बैठकर अपने कई निजी स्वार्थों को छोड़ कर राष्ट्र हित में छोड़ देने चाहिए और कुदरत के सनातन नियम की जाति धर्म व्यवस्था को राष्ट्र हित के लिए स्वीकार करना चाहिए। माताओं को अपने साथ होने वाले अत्याचारों के खिलाफ एकजुट हो कर सामने आना होगा और पुरुष समाज को भी इसमें महिलाओं का साथ देना चाहिए। क्योंकि नारी किसी भी समाज या राष्ट्र का सम्मान होती है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — माताओं को अपने साथ होने वाले अत्याचारों के खिलाफ एकजुट हो कर सामने आना होगा और पुरुष समाज को भी इसमें महिलाओं का साथ देना चाहिए। क्योंकि नारी किसी भी समाज या राष्ट्र का सम्मान होती है। हमे समझना होगा कि समाज में मात्र एक ही धर्म कुदरत ने बनाया है, जो है मानव धर्म। दो ही जातियां हैं एक स्त्री और दूसरी पुरुष। उनमें किसी को कोई छूत भी नहीं लगती और न ही कोई अन्य बाधा है। दोनो जातियों को एक दूसरे की कुदरती नितान्त आवश्यकता है और उन्हें कुदरत के नियम का पालन कर के अपने – अपने जाति धर्म का ईमानदारी और सामाजिक मर्यादाओं से पालन करना चाहिए। न ही कोई लड़ाई होगी और न ही तो कोई झगड़ा दंगा – फसाद।

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यह लेख (यह क्या हो रहा है?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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सनातन, मीडिया और धीरेंद्र शास्त्री पर बवाल।

Kmsraj51 की कलम से…..

Ruckus on Sanatan media and Dhirendra Shastri | सनातन, मीडिया और धीरेंद्र शास्त्री पर बवाल।

यह कितनी विडम्बना है कि आज हर क्षेत्र में घपलाबाजी हो रही है। हद हो गई। नेता और अधिकारी मिलकर देश लूट रहे हैं। छोटे सरकारी कर्मचारी काम न कर के मात्र बैठ कर तनख्वाह ले कर देश लूट रहे हैं। या फिर घूंस ले कर लूट रहे हैं। देश के न्यायालयों में न्याय बिक रहा है। पत्रकार पैसों की लालच में सच को झूठ और झूठ को सच कहने पर तुले हैं। बड़ी विडम्बना है कि एक मात्र धर्म परेशान लोगों का सहारा बन कर रह गया था। वहां भी अब ढोंग पाखंड और नाटक होना शुरू हो चुका है। यही धर्म नेता यदि चमत्कार करता है तो सन्देह के घेरे में और यदि वह कुछ नहीं करता तो फिर वह निक्कमा है।

जनता को यदि सभी मामलों में परेशान कोई करता है तो वह है देश का जागरूक पत्रकार और प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और सोशल मीडिया। बेचारी जनता जाए तो जाए पर कहां जाए।

  • दिक्कत हमे हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि धर्मों और इन धर्मों के लोगों से नहीं है। यदि इन धर्मों के लोग सच में अपने धर्म को ईमानदारी से मानते हैं और उसका दिल से पालन करते हैं तो वे किसी दूसरे धर्म को भी परेशान नहीं करते हैं।
  • पर यह जो धर्म के नाम पर धर्म परिवर्तन, लव जेहाद या अन्य कई प्रकार की घटनाएं घट रही है। बहु – बेटियों को अर्धनग्न फिल्मे दिखा कर अंग प्रदर्शन की सीख दी जा रही है। बच्चों को, युवा पीढ़ी को नशे की लत लगाई जा रही है। क्या ये सारी बातें ठीक है?
  • यूं हम कहने को तो सब खुद को सनातनी कहते हैं पर हम अपनी सनातनी सभ्यता और संस्कृति के प्रति कितने समर्पित है? क्या कदम उठाते हैं उनके संरक्षण के लिए हम?
  • कुछ नहीं न। बस अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं हम। ये जो लीव इन रिलेशनशिप की बीमारी हमारे देश में आ रही है, क्या यह सनातन धर्म के अनुसार सही है?
  • क्या समलैंगिक विवाह ठीक है? पशु बनाने पर तुले है मानव को आज। क्यों और किस लिए और कौन?

यह चर्चा भी की किसी पत्रकार ने ईमानदारी से? बस लोक आस्थाओं और विश्वासों पर विज्ञान का सहारा लेकर तर्क देना ही मीडिया का काम रह गया है। हम आज समाज को मानव समाज नहीं बल्कि पढ़ा लिखा आदि मानव समाज बनाने पर तुले हैं।

फर्क ये हैं कि आदिमानव कच्चा मांस खाता था और हम पक्का। वे पेड़ – पौधे की छाल से निज गुप्तांगों को ढकते थे और हम बिकनी और ब्रा से ढक रहे हैं। वे अपने लिए जंगलों में पूर्ण स्वतंत्र हो कर मनमाफिक तरीके से अपनी – अपनी शक्ति के बल पर जीते थे और हम आज मानव समाज में कुछ इन्ही गुणों के सहारे जीना चाह रहे हैं। रोक – टोक, नियम – धर्म कुछ चाहते ही नहीं है बस। पूर्ण स्वतंत्रता चाहते हैं।

  • क्या ऐसे मुद्दों पर और शालीनता, सदाचार, मानवता तथा सभ्य व्यवहार पर भी किसी पत्रकार ने बनाया कभी वीडियो? नहीं न? फिर काहे कि सच्ची पत्रकारिता?
  • सब अपने – अपने नम्बर बनाने वाली बात है। राजनैतिक पार्टियां तो वोट के लिए नौटंकी करती ही थी पर अब देश के नामी गिरामी पत्रकार भी यूं ही खेमों में बांट कर रह गए हैं।
  • एक खेमा भाजपा का गुण गाता है तो दूसरा भाजपा विरोधी दलों का। मैं यह नहीं कहूंगा कि मीडिया के संचालक या पत्रकार इनके हाथों बिक गए हैं। बल्कि मैं यह कहूंगा कि यह बदलते दौर की विडम्बना है जो हर इन्सान खुद को और अपनी बात को ही ठीक समझने लगे हैं।

समाज के पुराने नीति – नियमों को कोरा पाखण्ड और कोरी कल्पना सिद्ध करने पर उतारू है। मैं धीरेंद्र शास्त्री का न पक्षधर हूं और न ही किसी और धर्म नेता के पक्ष में और खिलाफ में हूं।

  • आज हिन्दी की क्या दुर्दशा है आजाद भारत में? क्या हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा नहीं होनी चाहिए? कौन पत्रकार इस मुद्दे को उठाता है? कौन इस बात पर वीडियो बनाता है?
  • समाचार की भारत में अधिकतर भाषा हिन्दी। नेताओं की वोट मांगने की भारत में सर्वाधिक नहीं बल्कि 100 प्रतिशत भाषा हिन्दी या उसकी उप भाषाएं (जब चुनाव जीत लिए तो फिर तो लग गए अंग्रेजी बोलने)।
  • फिल्मों की अधिकतर भाषा हिन्दी या हिन्दी की उप भाषाएं। फिर हिन्दी हिंदुस्तान की राष्ट्र भाषा क्यों नहीं?
  • क्यों अंग्रेजी को सर्वाधिक महत्व हर कार्यालय, न्यायालय या सरकारी संप्रेषण और उच्च शिक्षा भाषा माध्यम में दिया जा रहा है? क्यों हम अंग्रेजी को भारत की अघोषित राष्ट्र भाषा बनाने पर तुले हैं?
  • हमारी मत मारी गई है शायद। अंग्रेज भारत से कब के चले गए हैं पर हम आज भी बोलचाल, खान पान और रहन सहन की दृष्टि से उनकी गुलामी मानसिक रूप से कर रहे हैं।
  • मानना पड़ेगा कि मैकाले की बुद्धि सच में ही चालाक और तेज थी। यूं तो सभी राजनैतिक दल कहते हैं कि हमने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। पर किस लिए?
  • उन्ही के पदचिन्हों पर तो तुम सभी दल दशकों से राज कर रहे हैं। कौन सा परिवर्तन लाया है तुमने? वही जाति धर्म के नाम पर फूट डालो और शासन करो की भ्रष्ट राजनीति।
  • असली पत्रकार वही है जो अपने राष्ट्र, संस्कृति और सभ्यता को सुरक्षित रखने के लिए समाज को और युवा पीढ़ी को सचेत करेगा।

जनता के सामने सरकारों, अधिकारियों, व्यापारियों, भ्रष्टाचारियों और धर्म नेताओं तथा संस्कृति और सभ्यता के साथ छेड़खानी करने वालों का सच लाने का काम करने वाला पत्रकार सही मायने में सच्चा पत्रकार है। खैर छोड़िए। शायद मैं गलत हूं। क्योंकि मैंने कहा कि आज सभी को यह लगता है कि मैं जो कह रहा हूं या जो सोच रहा हूं, वही ठीक है। यह सिद्धांत मुझ पर भी तो लागू होता है।

पर यह सार्भौमिक सत्य है कि किसी भी राष्ट्र की सभ्यता और संस्कृति की सुरक्षा करना उस राष्ट्र के शासकों – प्रशासकों से कहीं ज्यादा उस राष्ट्र के बुद्धिजीवियों का काम होता है। क्योंकि बड़े यानी बुद्धिजीवी और जन आदर्श लोग जो व्यवहार करते हैं राष्ट्र के सामान्य जन उसी का आचरण करते हैं। इस बात की पुष्टि श्री कृष्ण जी भी गीता में कर चुके है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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यह लेख (सनातन, मीडिया और धीरेंद्र शास्त्री पर बवाल।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी। ♦

गुलामी की जंजीरों से मुक्ति का संघर्ष लगभग विश्व के अधिकतर देश समय – समय पर अपने – अपने ढंग से करते आए हैं और उसी कड़ी में एक नाम हमारे भारत देश का भी है। भारत वर्ष के इतिहास की एक समृद्ध कहानी है। जहां यह देश विभिन्न आतताइयों से अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा के लिए निरन्तर कडा संघर्ष करता रहा, वहीं इसे एक लम्बे दौर तक व्यापार के बहाने हिन्दुस्तान के शासक बन बैठे अंग्रेजों की गुलामी का भी शिकार होना पड़ा।

भारतीय जातिवाद, धर्मवाद और साम्राज्यवाद को उकसा – उकसा कर अंग्रेजों ने सत्ताधीशों के साथ – साथ आम जनता को भी आपस में लड़वा – भिड़वा कर फूट डालो और शासन करो की नीति का सहारा लेकर पूरे भारत वर्ष पर धीरे – धीरे अधिकार प्राप्त किया।

अब वे व्यापारी से यहां के सरकारी हुक्काम बन बैठे। जब भारत के रियासती शासक वर्ग के साथ – साथ आम जनता को भी अंग्रेजी चाल का पता चला कि ये तो हमे उकसाने का और लड़ाने का काम कर रहे हैं और अपना सम्राज्य स्थापित कर रहे हैं, तो तब अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति पाने के लिए भारतीय शासक वर्ग के साथ – साथ आम जनता के जागरूक तबके ने भी आजादी की जंग मिलकर अंग्रेजी शासन व्यवस्था के खिलाफ छेड़ दी।

फिर वह चाहे 1857के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की बात हो या फिर असेंबली हाल के बम्ब विस्फोट की घटना। चाहे फिर आजाद हिन्द फौज की स्थापना की बात हो या फिर भारत छोड़ो आंदोलन की मुहिम। इन सभी प्रक्रियाओं में एक लम्बा वक्त जरूर लगा पर यह भी सत्य है कि यही वे घटनाक्रम थे, जिनकी बदौलत आज हम स्वतंत्र भारत में जी रहे हैं और “आजादी का अमृत महोत्सव” उत्सव मना रहे हैं।

यह भी सच है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इस महा अभियान में गर्म दल और नर्म दल दोनों ने अपनी – अपनी भूमिकाएं अपने – अपने तरीके से निभाई। पर न जाने आज “आजादी के 75साल” बीत जाने के बाद हम क्यों उन तमाम वीर शहीद बहादुरों को भूल से जा रहे हैं, जिन्होंने हमे यह आजादी की सौगात दिलाने में अंग्रेजी हुकूमत की कड़ी यातनाओं के साथ – साथ अपने प्राणों की आहुति भी खुशी – खुशी दी। यदि आज हम औपचारिकता के तौर पर विशेष अवसरों के मौकों पर चन्द स्वतंत्रता सेनानियों को और आजादी के प्रमुख नेताओं को याद करते भी हैं तो उसमें भी एक अधूरा सा पन मुझे नजर आता है।

मैं सोचता हूं कि क्या मात्र इन चन्द कद्दावर नेताओं या स्वतंत्रता सेनानियों ने ही भारत को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाई? यदि ऐसा ही था तो फिर भारत इतने लम्बे दौर तक गुलाम क्यों रहा? क्यों फिर रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व वाले आंदोलन के दौरान ही भारत आजाद नहीं हुआ? ऐसे अनगिनत सवाल बुद्धि के विवेक कक्ष में उठते हैं और दौड़ते रहते हैं।

यह सभी जानते हैं कि अकेला चना भाड़(पहाड़) नहीं फोड़ता। पर फिर भी पूरी मुहिम का अधिकाश श्रेय उस मुहिम के मुख्य पत्र को जाता है और जाना भी चाहिए, क्योंकि उसने उस मुहिम को शुरू किया होता है तथा बाकियों को चेतना दे कर उस मुहिम में शामिल किया होता है। परन्तु मेरे मन में फिर से एक प्रश्न कौंधता है कि ठीक है, मुख्य पत्र को श्रेय दो। परन्तु उस मुहिम को सफल बनाने में अपना योगदान देने वाले अनेकों साथियों को भी तो उस सन्दर्भ में याद किया जाना चाहिए, जिन्होंने उस मुहिम को कामयाब बनाया होता है। पर नहीं, यह एक परिपाटी सी बन गई है और निरन्तर चली आ रही है कि मुख्य पात्र को ही याद किया जाता है और बाकियों को समय के गहवर में बिसार दिया जाता है।

कुछ ऐसा ही आजादी के आंदोलन की घटना में भी देखने को मिलता है। जो लोग इस मुहिम के नायक थे या यूं कहो कि रसूखदार व्यक्तित्व थे, उन्हे तो आज भी हम याद करते हैं और उनके नाम के कसीदे गढ़ते हैं। पर जिन्होंने जमीनी स्तर पर इस पूरे घटनाक्रम को गति दी और अंजाम दिया, उन्हे इतिहास के पन्नों में स्थान तक नहीं दिया गया।

यह बात ठीक है कि प्रभावशाली व्यक्तित्वों का जिक्र विशेष रूप से होना चाहिए।परन्तु इसका मतलब यह कतई नहीं है कि फिर बाकियों को बिल्कुल भूल ही जाएं।यह तो उनके साथ न्याय नहीं है और इसके साथ – साथ यह रवैया नई पीढ़ी में भी नकारात्मकता भरता है कि “करता कोई और है और वाहवाही किसी और को ही मिलती है।” मेरा मानना है कि जिसका जो मान – सम्मान बनता है, वह उसे मिलना चाहिए। तभी किसी कार्य या बात का उत्कर्ष बना रहता है। वरना नकारात्मकता स्वभाविक है।

आज आजादी के अमृत महोत्सव के सुअवसर पर यह बात मैं इसलिए कर रहा हूं कि हम सब मिलकर इस बात का मन्थन करे कि इस आजादी को दिलाने में अपना योगदान और बलिदान देने वाले ऐसे कितने स्वतंत्रता सेनानी थे, जो हमारे क्षेत्र या जिले के थे पर इतिहास के पन्नों में उनका नाम न होने के कारण आज समाज उन्हें और उनके बलिदानों को थोड़ा सा भी नहीं जानता। यदि थोड़ा बहुत कुछ कोई जानता भी है तो वह भी गौण है।

मेरे जिला मण्डी हिमाचल प्रदेश से ऐसे कई नाम हैं, जिन्होंने इस लड़ाई में अपना योगदान तो दिया पर उन्हें इतिहास में या लोक साहित्य में वह स्थान नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिए था। हां कृष्ण कुमार नूतन और डा गंगा राम राजी ने अपने साहित्य में कुछ – कुछ जिक्र इन स्वतंत्रता सेनानियों का जरूर किया है पर उससे शायद इन्हें वह सम्मान मिला हो, जिसके ये हकदार हैं। इन स्वतंत्रता सेनानियों में कुछ की जानकारी जो मैं जुटा पाया हूं, कुछ यूं है :—

• रानी खैरागढ़ी उर्फ रानी ललिता कुमारी •

रानी खैरागढ़ी का नाम जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानियों में अग्रगण्य है। असल में इनका नाम रानी ललिता कुमारी था। परन्तु इनका पैतृक घर खैरागढ़ उत्तर प्रदेश में था, जहां से इनका विवाह जिला मण्डी के प्रथम पढ़े लिखे राजा भवानी सेन से हुआ था। शायद तत्कालीन पहाड़ी रिवायत के चलते मण्डी जनपद के लोगों ने रानी का नाम उनके मायके के नाम के आधार पर खैरीगढ़ी रख दिया हो। क्योंकि पहाड़ों में उस दौर औरतों को उनके असली नाम से हट कर उनके पैतृक गांव के आधार पर रखे नाम से ही पुकारा जाता था। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि रानी के राष्ट्र प्रेम से प्रभावित होकर जनता उन्हे प्यार से रानी खैरीगढी कहते और यही नाम मशूहर हो गया। जबकि रानी के पिता के गांव का नाम खैरागढ़ था तो उस आधार से नाम तो खैरागढी बनता था। पर जनता ने खैरीगढ़ी रख दिया तो वही प्रसिद्ध हुआ।

जानकारों की माने तो राजा भवानी सेन मण्डी का पहला पढ़ा लिखा राजा हुआ। इस कारण उनके लिए एक पढ़ी लिखी रानी के रिश्ते की तलाश की गई। चारों ओर जब खोजबीन शुरू हुई तो एक उचित रिश्ता खैरागढ़ उत्तर प्रदेश में जा कर रानी ललिता कुमारी का मिला। राजा की रानी से शादी हो गई। उत्तर प्रदेश में उन दिनों अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावतें चर्म पर थी। तो जाहिर है कि कुमारी ललिता भी पढ़ी लिखी सजग नारी होने के नाते उन बगावती सुरों में ताल देने में अहम किरदार रही होगी। रानी का यह चस्का विवाह के बाद भी कम नहीं हुआ। जब उसने देखा की मण्डी रियासत की जनता के साथ न्याय नहीं हो रहा है। वे अंग्रेजी शासन व्यवस्था के चंगुल में कोल्हू के बैल की तरह परेशान है और राजा तथा राजा के मंत्री भी जनता का शोषण ही कर रहे हैं।

उन्हे जनता के सुख – दुःख की चिन्ता ही नहीं है और राजा जनता से कट कर अपने ही रसूख में जी रहा है। तब रानी ने जनकल्याण और देश प्रेम की भावना राज्य की जनता में भरना शुरू की। यह खबर राजा को अंग्रेजों ने और राजा के चाटुकार मंत्रियों ने गुप्त रूप से देना शुरू कर दी थी और राजा को रानी के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया था। राजा मंत्रियों और अंग्रेजों की बातों में आ कर रानी से विमुख होता रहा। नौबत यहां तक आ गई कि रानी को राजा के प्रेम से वंचित रहना पड़ा। परन्तु रानी ने हार नहीं मानी। वह जनता की सेवा में लगी रही और उनमें राष्ट्र प्रेम की आग जलाती रही। जब रानी को लगा कि राजा उसकी बाते नहीं मानेगा तो वह स्वयं राज्य का कामकाज देखने लगी। परन्तु वहां भी मंत्रियों ने रानी के आदेशों की पालना को नकारना शुरू किया।

तब रानी को लगा कि व्यक्तिगत सुखों से कहीं ज्यादा बड़ा सुख जन सामूहिक सुख है। एक राज घराने का प्रमुख कर्तव्य भी वही होता है। रानी की यह सोच उसके अविवाहित जीवन के बगावती तेवरों को और ताव देती है तथा रानी इस पहाड़ी रियासत में आजादी के आंदोलन की प्रमुख पैरोकार बनी। अब उसे अपने जैसे कुछ और ऐसे सरफीरों की तलाश थी, जिनके भीतर भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ रानी की ही तरह बगावती आग जल रही थी। इतना ही नहीं, कुछ जानकारों का तो कहना है कि परिस्थितियां तो यहां तक बिगड़ गई थी कि रानी को इस सन्दर्भ में राजा भवानी सेन से भी दो – दो हाथ करने पड़े थे। यानी पहाड़ी रियासतों में रानी खैरागड़ी ने झांसी की रानी की भूमिका निभाई।

• भाई हिरदा राम •

इनका नाम मण्डी रियासत के क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों में प्रमुखता से लिया जाता है। इनका जन्म 28 नवम्बर 1885 को मण्डी शहर में श्री गज्जन सिंह जी के घर हुआ था। लोगों में इनको भाई के नाम से प्रसिद्धी मिली थी। स्वामी कृष्णानंद जी से प्रेरणा ले कर ये क्रांति पथ पर चल पड़े थे। सन 1914 में ये अमृतसर में रासबिहारी बोस, डा• मथरा सिंह, भाई परमानंद तथा पिंगले आदि क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आए। धीरे – धीरे ये रासबिहारी बोस के विश्वास पात्र बने।

31 दिसम्बर 1914 की विरपाली धर्मशाला में हुई क्रांतिकारियों की गुप्त बैठक में इन्हें बंब बनाने का काम दिया गया। यह बात भी खासी चर्चा में है कि भगत सिंह जी ने जो बंब असैम्बली हाल में फैंका था, वह भाई हिरदा राम ने बनाया था। इन्हे इस संघर्ष में अंग्रेजी सरकार द्वारा असैम्बली बंब धमाके की साजिश में पकड़े जाने पर फांसी की सजा सुनाई गई, परन्तु बाद में वह सजा आजीवन कारावास की सजा में बदली गई। आजीवन कारावास की सजा पाने के लिए इन्हें काला पानी यानी अंडोमान की जेल में भेजा गया। वहां पर वीर सावरकर और भाई हिरदा राम एक ही कोठरी में रखे गए थे।

सन 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो भाई जी को जेल से मुक्ति मिली। इस तरह अपने जीवन को राष्ट्र सेवा में समर्पित करते हुए 21अगस्त 1965 ई० को भाई जी पंच तत्त्व में विलीन हो गए। इनकी यादगार में आज मण्डी शहर के बीचो बीच बनी इन्दिरा मार्केट में एक प्रतिमा बनाई गई है, जिसका अनावरण 21अगस्त 2002 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल जी ने तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री भारत सरकार एवम पूर्व मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश श्री शांता कुमार जी के साथ मिल कर किया था। इस अवसर पर सांसद सुरेश चंदेल, महेश्वर सिंह और अनिल शर्मा जी भी मौजूद रहे।

• कृष्णा नन्द स्वामी •

स्वामी जी मण्डी शहर के निवासी थे। इनके स्वतंत्रता आन्दोलन का क्षेत्र सिंध प्रांत रहा। इनकी सारी गतिविधियां सिंध से ही चलती थी। स्वामी जी ने 35 वर्षों के अपने स्वतंत्रता संघर्ष में कई बार जेल की सजा भुगती। यही वे कारण थे, जिनके चलते सरदार पटेल ने इन्हे सिंध के गांधी की उपाधि दी थी। इन्होंने दो लाख से भी अधिक हिंदुओं को समुद्र के रास्ते सिंध से मुम्बई और अहमदाबाद पहुंचाया था।

इनकी जेल यातनाओं में 1921-22 में पिकेटिंग के लिए धारा 132 के अधीन एक वर्ष का कारावास, खुलेआम भाषण के लिए धारा 108 सी.पी. सी. के अधीन अक्टूबर 1922 से सितम्बर 1923 तक एक वर्ष का कारावास, सी. पी. सी.की धारा 177 के तहत 1930 से 1931 तक एक वर्ष का कारावास, 1932 से 1934 तक दो साल का कारावास तथा भारत छोड़ो आन्दोलन में 1942 से1945 तक तीन साल का कारावास गिना जाता है। भाई हिरदा राम जी ने भी स्वामी जी से ही क्रान्ति की प्रेरणा पाई थी।

• अर्जुन सिंह राणा •

अर्जुन सिंह राणा जी का जन्म 30 मई 1920 को जिला मंडी के नेरचौक नामक स्थान में हुआ। राणा जी एक पढ़े – लिखे व्यक्ति थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में बढ़-चढ़कर के भाग लिया। 1942 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज की स्थापना की थी, उस फौज में राणा जी ने कैप्टन के पद पर अपनी सेवाएं दी थी। राणा जी ने एक वर्ष तक का कारावास भी भोगा। इनका संबंध हिमाचल प्रदेश स्वतंत्रता सेनानी संगठन से भी रहा।

• केशव चंद्र शर्मा •

केशव चन्द्र शर्मा जी जिला मण्डी के रिवालसर नामक स्थान में रियूर नामक ग्राम के निवासी थे। 1944 में शर्मा जी प्रजामंडल की गतिविधियों में शामिल हुए थे। इतना ही नहीं ये नौकरी करते थे परंतु आंदोलन का सहयोग करने के लिए इन्होंने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। रियासती विलय आंदोलन में शर्मा जी ने भी भरपूर संघर्ष किया था। शर्मा जी ने 4 माह 10 दिन तक मंडी जेल में सजा भी काटी थी।

• खेम चंद •

खेम चंद जी का जन्म लगभग 1904 ई० के आस पास हुआ माना जाता है। इनके पिता का नाम श्री बृज लाल था। इनका जन्म स्थान जिला मंडी के मंडी शहर में भूतनाथ नामक स्थान पर हुआ था। इन्होंने अपने पिता के साथ जलावतन रहने से देशभक्ति की भावना प्राप्त की थी। मंडी राज्य में प्रजामंडल आंदोलन में खेम चंद जी ने अपनी सक्रिय भूमिका अदा की थी। इस दौरान इन्हें मुंशी की नौकरी से भी निष्कासित कर दिया गया था। सन 1936 – 37 में खेम चंद जी ने मंडी सत्याग्रह में भी अपनी भागीदारी प्रदान करके आजादी के संघर्ष में अपना योगदान दिया था।खेम चंद जी का स्वर्गवास 3 जुलाई 1982 ई० को हुआ।

• गुलजारी राम •

गुलजारी राम जी का जन्म 10 अगस्त 1915 ई० में जिला मंडी के सरका घाट इलाके में भदरोट नामक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री टोडर था। आजाद हिंद फौज में इन्होंने बतौर सैनिक काम किया। गुलजारी राम जी दिसंबर 1940 से मई 1946 तक सिंगापुर, रंगून और मलाया आदि स्थानों में लंबे कारावास में भी रहे। इन्हें बिना वेतन के निष्कासित कर दिया गया था और पांच वर्ष तक युद्ध बंदी बनाकर इन्हें कठिन से भी कठिन यातनाएं दी गई थी।

• गौरी प्रसाद •

गौरी प्रसाद जी का जन्म 18 अक्टूबर 1918 ई० को जिला मंडी के नेरचौक नामक स्थान पर हुआ था। प्रसाद जी लाहौर से मेडिसिन में डिग्री लेकर आए थे। उन दिनों लाहौर स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन चुका था इसलिए प्रसाद जी ने वहीं से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने की प्रेरणा प्राप्त की थी।

इस आंदोलन में कूदकर गौरी प्रसाद जी ने अपना बढ़-चढ़कर योगदान दिया। जब वहां से लौटकर वे मंडी आए तो उन्होंने 1940 में मंडी प्रजामंडल में प्रवेश किया। 1940 से लेकर 1947 ई॰ तक प्रजामंडल के प्रधान रहे। इसी दौरान उन्हें 6 मार्च की जेल की सजा भी खानी पड़ी थी। सन 1951 में प्रसाद जी को विधानसभा का सदस्य चुना गया था। प्रसाद जी का योगदान अनेक संस्थानों एवं गतिविधियों में निरंतर रहता था।

• जे पी बागी •

बागी जी का जन्म 15 जुलाई 1908 ई० को स्कूल बाजार जिला मंडी में हुआ माना जाता है। अंग्रेजो के खिलाफ हमेशा बगावती तेवर रखने वाले जे पी बागी को यह बागी नाम इसी कारण प्राप्त हुआ था। 1928 से 1934 तक लाहौर जेल में लाहौर षड्यंत्र के जुर्म में उन्हे 6 साल तक के कारावास की सजा भी हुई थी। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और 1947 तक 2 वर्ष 6 माह कारावास में रहे। कुल साढ़े ग्यारह वर्ष तक जेल यात्रा में रहे। भारत सरकार ने इन्हें ताम्रपत्र से सम्मानित किया था।

• नरेंद्र पाल जोशी •

नरेंद्र जी जिला मंडी के लूनापानी के निवासी थे। 15 मई 1892 में उनका जन्म हुआ था। इन्होंने 1912 में एक अंग्रेज की हत्या की थी। यही इनका स्वाधीनता संग्राम में प्रवेश होने का प्रथम सोपान था। इन्होंने शादी नहीं की थी। 1918 में सूरत के जंगलों में पुलिस मुठभेड़ में इन्हें गोली लगी थी। जलियावाला बाग कांड के बाद अंग्रेजों का विरोध करते हुए पकड़े गए और पांच साल तक जेल में ही रहे। 1942 में जब जेल से रिहाई हुई तो पुनः संघर्ष में जुट गए। रावलपिंडी बम विस्फोट में 3 वर्ष का कारावास हुआ। 1928 में अंग्रेजों ने इन्हे पुनः गिरफ्तार कर लिया। 1932 में हिसार में 1 वर्ष का कारावास और काटा। सन 1934 में पुनः 3 वर्ष की सजा हुई। 1936 के बाद आर्य प्रतिनिधि सभा में कार्य कियाl इसके बाद वे लूनापानी में स्थाई रूप से रहने लगे थे।

• बुद्ध भाट •

भाट जी जिला मंडी की तत्कालीन सुकेत रियासत के सुंदर नगर पुराना बाजार में रहते थे। इनकी भागीदारी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से रही। इन्होंने कई वर्षों तक कठिन सजा भी काटी। सुकेत रियासत के विरुद्ध क्रांति तथा षड्यंत्र के झूठे आरोप में अभियोग तथा लंबे समय के लिए कारावास की यातनाएं भाट जी ने सही। सुकेत रियासत की जेल तथा पंजाब जेल में ग्यारह मास, जालन्धर में छः मास, रायपुर में दस मास, मुल्तान में आठ मास, रावलपिंडी में दस मास तथा शिमला में एक मास तक कारावास काटा।

• सन्त सिंह आजाद •

सन्त सिंह जी का जन्म 1914 में कटोह नामक गांव में समराला में हुआ था। जब नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज खड़ी की तो सन्त सिंह आजाद जी भी नेता जी के आवाह्न पर उनकी फौज में लेफ्टिनेंट के पद पर शामिल हुए। आजाद हिन्द फौज का हिस्सा होने के नाते ही इन्होंने अपने नाम के साथ आजाद शब्द जोड़ दिया था।

सन्त सिंह आजाद ने नवम्बर 1943 में मांडला में “दिल्ली चलो” का नारा बुलन्द किया था तथा 1944 में दलेल नामक स्थान पर अंग्रेजों पर हमला किया था। इसी साल वे दीमापुर चले गए थे और वहां पर एक हमले के दौरान जख्मी हो गए थे।इसके बाद अंग्रेज सेना द्वारा गिरफ्तार किए गए।

17 अप्रैल 1946 को मण्डी पहुंच कर प्रजामंडल के सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य किया। सन 1947 में पुनः तीन मास के लिए मण्डी की जेल में कारावास काटा। सत्याग्रह आन्दोलन में शामिल होने के कारण बिलासपुर के राजा द्वारा बन्दी बना लिए गए तथा जेल में भारी मार पीट उनके साथ की गई थी। वहां से छूटने पर पुनः सत्याग्रह आन्दोलन में सक्रियता से जुट गए। भारत सरकार ने इन्हे 1972 में ताम्रपत्र से सम्मानित किया।

• कुछ नायक ऐसे भी •

कुछ नायक ऐसे भी थे जिन्होंने अपने परिवार की कोई परवाह न करते हुए देश से अंग्रेजों को खदेड़ने के कार्य में रात दिन एक कर दिया। मण्डी एक ऐसा जिला रहा है, जहां से बहुतेरे स्वतंत्रता सेनानी हुए हैं। इतना ही नहीं इन स्वतंत्रता प्रेमियों को राष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता था और मण्डी का नाम राष्ट्रीय फलक पर अंकित कर राष्ट्र की आजादी में अपना अहम योगदान दिया। इसी प्रकार के अनेकों रणबांकुरों ने अपने घर परिवार की परवाह छोड़ कर देश की आजादी के लिए अपना बलिदान दिया। परंतु उन्हें समय के प्रवाह में जमाने ने भूला दिया। वे सब उनके योगदान के अनुसार न ही तो आज याद किए जाते हैं और न ही उन्हें इतिहास के पन्नों में जगह मिली। यह दशा अपने आप में एक गम्भीर विडम्बना है। यही वे कारण है, जिनके चलते समाज में कोई भी किसी कुव्यवस्था के खिलाफ खड़ा हो कर अपना बलिदान नहीं देना चाहता। क्योंकि हमें समाज की काम निकल जाने के बाद भूल जाने की आदत पता है। इसलिए हम भी अपनी सुख सुविधा का उपभोग करते हुए व्यवस्था के साथ हो जाते हैं। जबकि हम सब जानते हैं कि यहां बहुत गलत हो रहा है।

अतः आज समाज को जरूरत है उन आजादी के रणबांकुरों के इतिहास को खोजने की और उस इतिहास को सबके सामने लाने की तथा युवा पीढ़ी को पढ़ाने की। ताकि युवा पीढ़ी को प्रेरणा और उन आजादी के परवानों को सम्मान मिल सके जो वक्त के गहर में कहीं खो से गए हैं।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आज समाज को जरूरत है उन आजादी के रणबांकुरों के इतिहास को खोजने की और उस इतिहास को सबके सामने लाने की तथा युवा पीढ़ी को पढ़ाने की। ताकि युवा पीढ़ी को प्रेरणा और उन आजादी के परवानों को सम्मान मिल सके जो वक्त के गहर में कहीं खो से गए हैं। गुलामी की जंजीरों से मुक्ति का संघर्ष लगभग विश्व के अधिकतर देश समय – समय पर अपने – अपने ढंग से करते आए हैं और उसी कड़ी में एक नाम हमारे भारत देश का भी है। भारत वर्ष के इतिहास की एक समृद्ध कहानी है। जहां यह देश विभिन्न आतताइयों से अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा के लिए निरन्तर कडा संघर्ष करता रहा, वहीं इसे एक लम्बे दौर तक व्यापार के बहाने हिन्दुस्तान के शासक बन बैठे अंग्रेजों की गुलामी का भी शिकार होना पड़ा। भारतीय जातिवाद, धर्मवाद और साम्राज्यवाद को उकसा – उकसा कर अंग्रेजों ने सत्ताधीशों के साथ – साथ आम जनता को भी आपस में लड़वा – भिड़वा कर फूट डालो और शासन करो की नीति का सहारा लेकर पूरे भारत वर्ष पर धीरे – धीरे अधिकार प्राप्त किया।

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यह लेख (आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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गुरु गुण और शिक्षा प्रणाली।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गुरु, गुण और शिक्षा प्रणाली। ♦

गुरु बिन गुण असम्भव।

गुरु शब्द अपने आप में एक पूर्ण शब्द है जो मानवता के कल्याण एवं उत्थान के लिए एक सर्वोपरि दायित्व है। भारतीय शिक्षा जगत में जहां गुरु पद की महिमा को विभिन्न उपाधियों से अलंकृत किया है वहीं अंतरराष्ट्रीय फलक पर भी गुरु के महत्व को नकारा नहीं जा सकता।

प्राचीनतम इतिहास में यदि हम देखें तो गुरु अध्यात्म विद्या से संबंधित ज्ञान को देने वाले एक विशिष्ट धर्मात्मा को कहा जाता था। लेकिन कालांतर में व्यवस्था बदलती गई और गुरु का वह स्थान वर्तमान शिक्षा प्रणाली में शिक्षक ने दे दिया है। जिसे आमतौर पर अध्यापक भी कहा जाता है।

• गुरुकुल शिक्षा प्रणाली •

यह भी एक पूर्ण सत्य है कि पुरातन समय में गुरु गुरुकुल व्यवस्था को संचालित करता था और वह उस कार्य के लिए किसी राज्य सरकार से कोई वेतन विशेष नहीं बल्कि अनुग्रहित अंशदान प्राप्त जरूर करता था।

गुरुकुल शिक्षा प्रणाली जहां सामाजिक निर्माण के साथ-साथ मानसिक निर्माण का बीड़ा उठाती थी वही वह अध्यात्म विद्या के साथ – साथ चरित्र निर्माण का बोध कराने वाली शिक्षा का भी प्रावधान करती थी। मानसिक, बौद्धिक, काल्पनिक, आध्यात्मिक, चारित्रिक और राष्ट्र निर्माण के साथ-साथ आत्मा सुरक्षा और राष्ट्र सुरक्षा के भावों से ओतप्रोत शिक्षा प्रणाली में निरंतर भारतवर्ष में दी जाती रही।

यहां इस बात को स्पष्ट करना अति आवश्यक हो जाता है कि इस प्रणाली में गुरु का जो मनोवैज्ञानिक प्रभाव था, वह अपने आप में महत्वपूर्ण था। मानव के भीतर मानवता, इंसान के भीतर इंसानियत, हुकमाराम के भीतर हुकूमत और आवाम के भीतर राज भक्ति और राष्ट्रभक्ति की भावना अगर कोई भरता था तो वह गुरु ही होता था।

इन सभी गुणों के साथ – साथ अध्यात्म का परम लक्ष्य युक्त भावबोध अपने शिष्यों के अंदर जागृत करना इन गुरुओं का परम कर्तव्य और दायित्व होता था। इस दायित्व का निर्वहन करने के लिए ये गुरु लोग किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते थे। शायद यही वह कारण था जिस कारण से वे गुरु के पद पर विराजमान थे और समाज इन्हें आदर की दृष्टि से पूर्ण सम्मान के साथ देखता था।

• वर्तमान समाज में भारतीय शिक्षा प्रणाली •

वर्तमान समाज में भारतीय शिक्षा प्रणाली में जो मैकाले शिक्षा पद्धति चली। उसमें गुरुकुल व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया तथा उसके स्थान पर स्कूल शिक्षा प्रणाली को लागू किया गया। स्कूलों में अध्यापक प्रतिनियुक्त किए गए। इससे धीरे-धीरे गुरु पद की मर्यादा और गरिमा हीन होती गई। इसके पीछे अध्यापकों का वेतन भोगी होना भी एक कारण हो सकता है और उसके साथ – साथ समाज का पाश्चात्य शैक्षिक रवैया भी एक कारण हो सकता है।

• भारतीय संस्कृति में मां को प्रथम गुरु का दर्जा •

परंतु इस सत्य को किसी भी तरह से नहीं चलाया जा सकता कि मनुष्य के जीवन में गुरु के बिना गुणों का प्रादुर्भाव संभव ही नहीं है। यही वह कारण है जिसके चलते भारतीय संस्कृति में मां को प्रथम गुरु का दर्जा दिया गया और उसके पश्चात तो निरंतर हमारे जीवन में कई गुरु विभिन्न क्षेत्रों में हमारा मार्गदर्शन करते हैं।

इस बात का स्पष्ट उदाहरण भारतीय पौराणिक आख्यानों में दत्तात्रेय के जीवन चरित्र से हमारे सामने आता है। गुरु के प्रति श्रद्धा, विनम्रता और सहजता ही इन गुणों को ग्रहण करने का एक मुख्य माध्यम होता है।

परंतु बड़े खेद की बात है कि आज के वर्तमान समाज में इन्हीं सब प्रारंभिक भावों का ही मनुष्य में पतन होता जा रहा है। गुरु शब्द का एक अर्थ बड़ा भी होता है। अर्थात अपने घर के, परिवार के और समाज के बड़ों के प्रति आदर, सम्मान, श्रद्धा और विश्वास रखना ही हम सब लोगों का दायित्व बनता है और वही दायित्व एक सद चरित्र व संतुलित – पुष्ट समाज का निर्माण करता है।

• बड़ों के प्रति तो श्रद्धा भाव घटता ही जा रहा है •

विडंबना यह है कि आज अपने बड़ों के प्रति तो श्रद्धा भाव घटता ही जा रहा है परंतु जो शिक्षक हमारी तोतली आवाज को सुधार कर एक पहलवानी का रूप प्रदान करता है और समाज को दशा और दिशा देता है। “छोटे से लेकर बड़े हो दीदार तक की मानस पटल को निखार करो” उसे देश और समाज का संचालन करने के लिए योग्य बनाता है। उसी गुरु के प्रति निरंतर श्रद्धा भाव घटता जा रहा है। शायद यही वह कारण है कि आज समाज में अनायास मानवीय घटनाएं हो रही है। अप्रिय वातावरण बढ़ता जा रहा है। चरित्र हीनता बढ़ती जा रही है। भ्रष्टाचार और लूट घसीट बढ़ती जा रही है।

मैं यह कतई नहीं कहता कि इसके लिए पूरी तरह से समाज ही जिम्मेवार है। मैं यह भी नहीं कहता कि इसके लिए पूरी तरह राजनेता और सरकारें ही जिम्मेवार है। हां इतना जरूर कहना चाहूंगा जो सरकार सत्ता में रह करके शिक्षकों के मान-सम्मान के प्रति इस समाज को जागृत करने का काम करेगी और शिक्षक वर्गों को चरित्रवान समाज के निर्माण के लिए प्रोत्साहित करेगी तथा शिक्षा प्रणाली में वह वातावरण तैयार करेगी। वह सरकार वास्तव में अपने दायित्व का पालन करने वाली राजनीतिक शक्ति कहलाएगी और इतिहास के पन्नों में अपना नया अध्याय अंकित करेगी।

ठीक इसी तरह समाज को भी अपने दायित्व का निर्वहन करने के लिए गुरु की मर्यादा का सम्मान करने वाले भावबोध को पुनः अपने भीतर जागृत करना होगा तथा सेवा, सत्कार और सत्संग जैसी महत्वपूर्ण गुणों को अपने भीतर पुनः समाहित करना होगा।

परंतु इस बात से भी मैं कभी गुरेज नहीं करता इसके लिए एक सद चरित्रवान गुरु का होना भी अनिवार्य है।

“आज के वर्तमान वातावरण में गुरु ने भी अपना चरित्र इस कारण से बिगाड़ दिया है, क्योंकि वह अपने आप को एक शिक्षक मान बैठा है। मैं यहां स्पष्ट शब्दों में कहना चाहूंगा कि मैकाले की जो मंशा थी। आज पूरे शिक्षक वर्ग को उस मंशा से बाहर निकलने की जरूरत है।”

• राष्ट्र निर्माण का दायित्व हमारे हाथों में •

भले ही हम वेतनभोगी हो। परंतु राष्ट्र निर्माण का दायित्व हमारे हाथों में होने के कारण आज हमें अपने दायित्व का भी बोध होना चाहिए। हमे पुनः अपने आप को शिक्षा जगत में कुछ इस तरह से प्रतिस्थापित करना होगा की सत्ता और समाज दोनों ही पूर्व की भांति हमारे पद चिन्हों का अनुसरण करें और हमारे अनुगामी बने।

हमें सेवा, साधना, सत्संग और सद चरित्र को पुनः महत्व देने की जरूरत है। एक शिक्षक के जीवन में यह गुण होना अति अनिवार्य है। यही गुण वह अपने शिष्यों में जब परिवर्तित करता है तो एक समृद्ध समाज का निर्माण होता है।

भारत की यही गुरु शिष्य परंपरा भारत को विश्व गुरु के पद पर जब विराजमान कर सकती है तो क्या वर्तमान समाज में हम सबको भारत को पुनः उस उत्कर्ष तक ले जाने के लिए कटिबद्ध नहीं हो जाना चाहिए ?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — राष्ट्र निर्माण का दायित्व हमारे हाथों में होने के कारण आज हमें अपने दायित्व का भी बोध होना चाहिए। हमे पुनः अपने आप को शिक्षा जगत में कुछ इस तरह से प्रतिस्थापित करना होगा की सत्ता और समाज दोनों ही पूर्व की भांति हमारे पद चिन्हों का अनुसरण करें और हमारे अनुगामी बने। हमें सेवा, साधना, सत्संग और सद चरित्र को पुनः महत्व देने की जरूरत है। एक शिक्षक के जीवन में यह गुण होना अति अनिवार्य है। यही गुण वह अपने शिष्यों में जब परिवर्तित करता है तो एक समृद्ध समाज का निर्माण होता है। भारत की यही गुरु शिष्य परंपरा भारत को विश्व गुरु के पद पर जब विराजमान कर सकती है तो क्या वर्तमान समाज में हम सबको भारत को पुनः उस उत्कर्ष तक ले जाने के लिए कटिबद्ध नहीं हो जाना चाहिए ?

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यह लेख (गुरु, गुण और शिक्षा प्रणाली।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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Filed Under: 2022-KMSRAJ51 की कलम से, गुण और शिक्षा प्रणाली।, गुरु, गुरु गुण और शिक्षा प्रणाली।, हिन्दी साहित्य, हेमराज ठाकुर जी की रचनाएँ। Tagged With: hemraj thakur, hemraj thakur articles, गुरु गुण और शिक्षा प्रणाली - हेमराज ठाकुर, गुरु-शिष्य परम्परा, गुरुकुल शिक्षा पद्धति, गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था के गुण-दोष, जानें कैसे गुरुकुल शिक्षा प्रणाली आधुनिक शिक्षा प्रणाली से अलग है?, नई शिक्षा नीति पर निबंध हिंदी में, निबंध हिंदी में, प्राचीन गुरुकुल शिक्षा प्रणाली, वैदिककालीन शिक्षा के गुण व दोष, हेमराज ठाकुर, हेमराज ठाकुर की रचनाएँ

दास्तान ए जात पात।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दास्तान ए जात पात। ♦

अपनी अरुणिमा को बिखेरते हुए सूर्य देव हिमालय की पावन वादियों में पहाड़ियों के बीचो बीच बसे इस छोटे से सुंदर एवं सुरम्य गांव को ऐसे नहला रहे थे, कि मानो आद्या सुंदरी परा शक्ति प्रकृति का चाकर बन कर अपनी सेवाएं नियमित दे रहे हो।घाटी के इस छोटे से गांव में कितनी आत्मीयता थी और कितना प्रेम और भाईचारा? कहते नहीं बनता। न कोई लड़ाई न कोई झगड़ा। न ही तो शहरों जैसी आपाधापी और लूट – खसोट। चारों ओर थी तो सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता और असीम सकून।

नित्य प्राकट्य की तरह आज भी आदित्य देव अपनी सेवाएं देने धीमे – धीमे तप और विशाल प्रकाश के साथ पहाड़ी की चोटी पर निकल आया था। गांव की जानकी चाची की आवाजे हर रोज की तरह कानों में गूंज उठी।

” राधा, शालू, कमला, मनु उठो भाई उठो। देखो तो सूरज चढ़ आया है। सारा संसार उजाला हो गया है और तुम ……….।” यह बोलते बोलते जानकी चाची उस कमरे में घुंस गई, जहां राधा सोई थी।

“अरे ओ मेरी भोली सी, प्यारी सी, अच्छी सी दादी। क्यों हर रोज सुबह – सुबह अपनी कोयल सी मधुर आवाज़ का प्रचार – प्रसार करती फिरती हो ? आस – पड़ोस को भी अलार्म का काम करती हो।” बिस्तर पर ऊंघते हुए से पलथी मार कर जानकी चाची के झुर्रियों से लबरेज चेहरे को चूमते हुए राधा बोली।

“तुझे अब सुबह इतनी देर तक सोए रहना शोभा नहीं देता राधा। शादी की उम्र हो गई है। मां का हाथ बंटाया कर। कुछ सीख भी जाएगी और मां की मदद भी हो जाएगी।”

जानकी चाची बूढ़ी आंखो की कोरों में पानी भरते हुए से बोली।
“बस भी कर मेरी प्यारी दादी। जब देखो तो तब उपदेश। और हां जो ये बात – बात पर इन झील सी आंखो में लहरे उठाती रहती हो ना, ये मत किया करो जी।” राधा जानकी चाची की झुर्रियों से लबरेज पोपलों को दोनों ओर से पकड़ते हुए और पुचकारते हुए से बोली।

“कैसे चुप रहूं बच्चा? दादी जो हूं तेरी।” जानकी चाची कोरो का पानी पोंछते हुए और राधा का सिर सहलाते हुए बोली।

“उमा। ओ उमा।” बाहर से मोहन भैया ने आवाज लगाई।
“जी आई।” अंदर से रोटियों को बेलते हुए उमा भाभी बोली।

“अरे मैं काम पर जा रहा हूं। देर हो रहा हूं। बाहर कुछ सामान रखा है। देखना उठा लेना। राधा को बोल दे चाहे।” जाते हुए से मोहन भैया बोले।

“जी उठा लूंगी। आपकी लाड़ली तो अभी खरांटे मार रही होगी। बिगाड़ रखा है बुढ़िया ने।” अंदर से उमा भाभी बोली।

“ठीक है। उठा लेना। बाहर गाय भी चुग रही है। कहीं खा न ले सामान।” मोहन भैया सड़क से बोले।

“जी उठा लूंगी। शाम को जल्दी अना।” अंदर से उमा भाभी बोली। पर शायद ये सब मोहन भैया ने नहीं सुना हो। वे निकल पड़े थे।

गाय को हट्टका करते हुए सामानों के थैले लिए हुए राधा और जानकी चाची रसोई में आई।

“क्यों री बुढ़िया की बच्ची? क्या कह रही थी ? बुढ़िया ने बिगाड़ रखा है!” जानकी चाची ने उमा भाभी के कान प्यार से पकड़ते हुए पुचकारते हुए से कहा।

“सॉरी – सॉरी अम्मा जी! अब नहीं बोलूंगी।” अपने कान पकड़ते हुए माफीनामे की तहजीब में उमा भाभी बोली।

“खबरदार जो आगे से किसी ने मेरी लाड़ली पोती को कुछ कहा तो।” फिर से आंखों की कोरें नम करते हुए से जानकी चाची बोली।

“नहीं कहूंगी कुछ अम्मा। पर इसकी मां हूं। चिंता तो होती है न! 24 की हो गई है।सबको आप जैसी सास थोड़े ही न मिलती है।” उमा भाभी रूआंसा चेहरा करके बोली।

“सो तो मैं भी इसे समझाती रहती हूं बेटा। पर यह मानती कहां है?” यह बोलते – बोलते जानकी चाची की आंखे छलक आई थी।

“ओ री ओ सुंदर सास – बहू की जोड़ी। ये रोना धोना छोड़ो और कुछ नाशता – पानी कराओ। भूख लगी है। तुम्हारी राधा जिंदा है अभी। मरी नहीं है।” राधा ने दोनों को छेड़ते हुए से कहा।

“चल ! झल्ली कहीं की? पहले नहा – धोकर आ, फिर खाना कुछ।” जानकी काकी आंसू पोंच्छते हुए बोली।

अपनी अहलड मस्ती में राधा नहाने जाती है। इस बीच चाची और उमा भाभी में यह बात हो रही थी कि परसों राधा को देखने लड़के वाले आ रहे हैं। “उमा के बाबू जी बोल रहे थे कि बेटी जवान हो गई है। हाथ पीले करना हमारा फ़र्ज़ है। फिर बी ए भी इस साल इसकी पूरी हो जाएगी।” उमा भाभी चाची से बोल रही थी।

“सो तो है बच्चा। बेटियां तो है ही पराया धन। कब तक पास रखोगे?” चाची उमा भाभी से बोल रही थी।

” जब देखो तब सब बस मेरे पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। किसी न किसी तरह से मुझे जल्दी भगाने की तैयारी में चुपके – चुपके लगे हैं। मैं नहीं करूंगी अभी शादी हां। कह दिया मैंने। जब तक एम ए न कर लूं।” राधा बाल झाड़ते हुए झल्ला कर बोली।

“बस कर री ओ छमक-छलो। कब तक बाप के यहां बैठी रहेगी? 24 की हो ली फिर कब 50 की करेगी शादी क्या? कौन वरे गा तब तुझे। तेरी उम्र की थी न हम। तो दो – दो औलाद जन बैठे थे।” पास मनु को नहला रही चंपा दीदी व्यंग्य करते हुए बोली। वह यहां मायके अपने बच्चों के साथ मेहमान आई थी। शायद राधा का यह रिश्ता भी उसी की सलाह पर उमा भाभी और मोहन भैया करवा रहे थे। पर इसमें राधा को विश्वास में न लिया गया हो शायद।

“वह आप का जमाना था फूफी। अब मॉडर्न जमाना है। समझी !” राधा पुचकारते हुए से बोली।

“हां – हां तोड़ ले अपने बाप की रोटियां और! तुझे कौन समझाएं?” चंपा दीदी बोली।

“बस भी कर चंपा! तू हमेशा इसे छेड़ते हुए क्यों ताने मारती रहती है?” जानकी चाची डांटते हुए से बोली।

“हां – हां मां और चढ़ाओ इसे सर पर। तूने ही तो इसे बिगाड़ रखा है। ठीक कहती है भाभी।” चंपा दीदी बोली।

“हर चीज का एक समय होता है बच्चा। शादी की भी एक उम्र होती है। ठीक कह रहे हैं सब।” राधा की बेनी बनाते हुए चाची बोली। तीसरे दिन लोक रीत के तहत बुलाए गए मेहमान आते हैं और राधा जैसी सुंदर और पढ़ी लिखी लड़की को देख कर रिश्ता तुरंत पक्का कर लेते हैं।

दिन गुजरते गए। यहां राधा ने बुद्धि से तो यह रिश्ता कबूल लिया था पर दिल से नाखुश ही थी। एक दिन पास में एक मेला था। राधा अपनी सहेली रूपा के साथ मेला देखने चली गई। रास्ते में उन्हें पिंकू मिला, जो उन का क्लास मेट था। वह पास के गांव का रहने वाला था और एक अच्छा लड़का था। उसने गाड़ी रोकी।

“अरे राधा और रूपा कहां जा रही हो?” पिंकू ने कहा।
“ओह पिंकू! हम मेले जा रही है और तुम?” रूपा ने चौंकते हुए से कहा।
“मैं भी मेले जा रहा हूं। आओ चलो बैठो।” पिंकू ने कहा।
दोनों गाड़ी में बैठ जाती है। और तीनों बतियाते – बतियाते मेले पहुंचे। बातचीत से माहौल तो पहले ही खुशनुमा हो गया था उस पर मेला भी आ गया। मेले के पास रास्ता कुछ खराब था। सो राधा ने पिंकू को हाथ दे कर मदद करने को कहा।

पिंकू ने जैसे ही ऊपर से नीचे को राधा को ऊपर खेंचाने के लिए हाथ किया, त्यूं ही उसकी नजर राधा के वक्ष स्थल के ऊपर वाले अधखुले भाग पर पड़ी। राधा ने पिंकू को देखते हुए भांप लिया। दोनों के दिलो में एक अजीब सी हलचल हुई, जो शायद इन दोनों ने पहली बार महसूस की थी। वे एक दूसरे को संभालते – संभालते नयन मटके में उस मेले के पास वाली किचन में फिसल गए। दोनों के कपड़े खराब हो गए। रूपा को वहीं बिठा कर वे पास के नल में अपने कपड़े साफ करने गए।

“तुम्हारी सगाई सच में हो गई क्या?” कपड़ों को झाड़ता हुआ पिंकू शरमाते हुए सा बोला।

“क्यों? नहीं हुई होती तो तब क्या तू………….?” राधा ने स्त्री सुलभ मुस्कुराहट बिखेरते हुए नीची नजर कर के तिरछी चितवन निहार कर कपड़े धोते हुए कहा।

” नहीं – नहीं। बस सुना था। सो पूछ लिया।” पिंकू उसी मुद्रा में बोला।

“हां हो गई है। ठीक सुना है तुमने।” राधा ने भी उसी मुद्रा में जबाव दिया। वे दोनों बातों ही बातों में मस्त हो गए थे। बाहरी परिचय तो उनका पहले से ही था, पर आज तो उनका रूहानी परिचय भी हो गया था शायद। ऊपर से धीमे से रूपा की आवाज आई,” ओ री ओ राधा। जल्दी कर बच्ची। तेरा मंगेतर मेले में पहुंच गया है शायद।फोन कर रहा है।”

“उठा ले तू ही।” राधा ने ठिठोली करते हुए कहा।
“अरे ओ लैला! कहीं उसने तुम्हे यूं देख लिया न पानी में आग लग जाएगी आग हां।जल्दी कर।” रूपा ने चठकरी करते हुए कहा।

“अच्छा पिक्की!” हाथ हिलाते हुए राधा ने पिंकू से जाते हुए कहा।

राधा के मुख से अपने लिए पिंक्की सुन कर पिंकू के दिल की आग में घी पड़ गया। शाम को राधा अपने घर पहुंची और सीधा अपने कमरे में चली जाती है।

“राधा। ओ राधा।” जानकी चाची ने आवाज लगाई।
“जी दादी।” राधा अंदर से कपड़े बदलते हुए बोली।
“देख तो तेरा फोन आया है।” चाची बोली।

“किसका है दादी?” राधा बोली।
“किसका होगा ? तुझे नहीं मालूम क्या?” चाची ठिठोली करते हुए बोली।
चाची की बातों से राधा ने अंदाजा लगाया लिया कि उसके मंगेतर का ही होगा। उसने उतना तबजो न दिया। कपड़े बदलती रही। इतने में शालू खिखियाते हुए राधा के कमरे में फोन ले कर आया।

“सुन भी तो लो दीदी। जीजा जी नाराज हो जाएंगे नहीं तो।” वह छुटकू राधा को छेड़ते हुए से बोला।

“होने दे नाराज। पीछा छूटेगा।” राधा अपनी घर वाली कमीज़ पहनते हुए बोली और उसके हाथ से फोन झुंझला कर ले लेती है।

“हेलो ! कौन है? अब बोलो भी चुप क्यों हो। कपड़े बदल रही थी। देर लग गई। इसमें नाराज होने की क्या बात है?
बोलो भी कुछ नहीं तो मैं काट रही हूं।” राधा त्योरियों को चढ़ाते हुए बोली।

“सुन – सुन, मैं पिंक्की बोल रहा हूं। फोन मत काटना प्लीज!” फोन पर पिंकू ने धीरे से कहा।

यह सुन कर राधा घर के पिछवाड़े में फोन सुनने चली गई। घरवालों ने सोचा कि यह हमसे शर्मा कर दामाद से बात करने पिछवाड़े गई है। चाची ने राधा का फोन पहले उठाया था। उस पर किसी मर्द की आवाज सुन कर अंदाजे से दामाद का फोन होने का अनुमान लगाया था।

सब खुश थे कि बेटी को दामाद का फोन आया है। पर किसे मालूम कि राधा ने फोन पर किसी और से कल मुलाकात का प्रोग्राम फिट किया है।

हल्की – हल्की बारिश बाहर हो रही थीं। कस्बे के नुकड़ पर बने रेन शेल्टर में राधा और पिंकू दो के दो बैठे हैं। कोई उन्हें देख नहीं रहा है।

“क्या तुम अपने मंगेतर से खुश नहीं है?” पिंकू ने राधा से कहा।
“किसने कहा?” राधा ने तल्खियों में कहा।

“तुम ही तो कल फोन पर कह रही थी।” पिंकू ने कहा। पिंकू ने राधा को शालू के छेड़ने पर बड़बड़ाते हुए सुन लिया था।

“हां नहीं हूं खुश। तो क्या कर लोगे तुम?” राधा बोली।

“तूने क्या यह फिल्म समझी है? कि हीरो विलन को पीट देगा।” पिंकू बोला।

“हीरो। और वो भी तू?” राधा हंसते हुए से बोली।

“हां – हां मैं। क्यों आपको कोई शक है?” पिंकू बड़े रुआब से बोला।
पिंकू की यह अदा तो राधा को और भी घायल कर गई।

“अच्छा – अच्छा एक बार फिर से करो ऐसा भला।” राधा ने अनुनय किया।
पिंकू ने क्रिया पुनः दोहराई।

उस रोज राधा के ससुराल वाले राधा की शादी की बात करने आए थे।

“देख भाई कुडमा (समधी)। अगले महीने तक जो देना ब्याह करी एबे। से मठा भी आई जाना घरा जो। फेरी कंपनी मंझा छुट्टी नी मिलदी।” राधा का ससुर मोहन भैया से बोल रहा था।
“हां बेटा ब्राह्मणा ते लग्न जोड़ी ले ओ। बाकी फेरी ब्याह रे घरा निकलें कई काम।” चाची ने हामी भरते हुए कहा।

शादी का लग्न शोध लिया गया था और तैयारियां दोनों ओर जोरों से थी। एक दिन दोनों परिवारों के लोग शहर शादी के जेवर – कपड़े खरीदने आए थे। राधा को भी पसंद का सामान खरीदने के लिए साथ लाया गया था। सभी खरीद फरोक्त कर रहे थे।

इस बीच राधा टॉयलेट गई। वहां से वह वापिस नहीं आई। थोड़ी देर बाद सब का ध्यान जब इस ओर गया तो दोनों परिवारों में खलबली मची। फोन लगाया। वह स्विच ऑफ आ रहा था। शहर का कोना – कोना छान डाला पर कोई खबर नहीं मिली। शाम होने वाली थी। तब सब ने निर्णय लिया कि पुलिस में रपट दर्ज की जाए। रपट लिखवाते ही सब अपने – अपने घरों को चले गए।

तीन दिन बाद डाकिया चिट्ठी को चाची के पास दोपहर को छोड़ गया था। चाची को पढ़ना आता नहीं था।
शाम को जब भैया और भाभी आए तो उन्हें दे दी।
“देखना मोहन तेरे नाम डाकिया चिट्ठी दे गया था।” चाची बोली।
मोहन भैया ने जब चिट्ठी पढ़ी तो आग बबूला हो उठा।

“नालायक को यह दिन दिखाने के लिए ही पाला – पोसा था हमने। नाक कटा डाली मूर्ख ने हमारी। मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा कहीं। क्या बोलेंगे समधी जी को। चलो उनसे तो ले दे के निपट भी लेंगे पर समाज को क्या कहेंगे?” मोहन भैया गुस्से से लाल हो कर बोल रहे थे।

“अरे हुआ क्या है? जरा हमें भी तो बता। बस उसे कोसता ही जा रहा है। ऐसा क्या किया है उसने?” चाची ने डांटते हुए से बोली।

“तुम तो चुप ही रहो अम्मा। तुम्हीं ने उसे अपने लाड़ प्यार से बिगाड़ा, जिसका परिणाम आज हम भुगत रहे हैं।” मोहन भैया झल्ला कर बोले।
“अरे मुझे जो भला – बुरा कहना है सो बाद में कहना। पहले बता तो सही हुआ क्या है?” चाची भी कड़की से बोली।

“होना क्या है अम्मा? यह कोर्ट की न्यायिक सूचना है। जिसमें लिखा है कि राधा ने पवन सुपुत्र बृजमोहन से शादी कर ली है और क्या?” मोहन भैया गुस्से से बोले।
उस दिन चंपा दीदी पुनः राधा के गायब होने की खबर सुन कर यहां खबर संभाल करने आई थी। वह चौंक कर बोली,” क्या? उस बृजमोहन के लड़के से, जो पड़ोस के गांव का है?”
“हां वही।” मोहन भैया ने ऊंघते हुए से बोला।

“देखा न। आखिर उसने अपनी करतूत दिखा ही ली आखिर। मैं न कहती थी कि यह लड़की तुमने कुछ ज्यादा ही सिर पर चढ़ा रखी है। बिगाड़ दी ना उसने जात। मेरी सुनता ही कौन था?” चंपा दीदी इठलाते हुए सी बोली।

“इससे तो वह मर ही गई होती तो एक ही दुख तो होता। अब तो वह जिंदगी भर खुद भी मरेगी और हमें भी मारती रहेगी।” छाती पीटते और रोते हुए उमा भाभी बोली।

“वह जिए अब अपने हाल में। मैं उसे अपने घर में घुसने नहीं दूंगा। मेरे लिए वह मर गई समझो।” मोहन भैया ने झुंझलाते हुए से कहा और अंदर चला गया।

कुछ दिन बाद राधा ने घर पर फोन किया। उमा भाभी ने उठाया। रोते – रोते बोली,” बेटा क्या कसर रखी थी हमने तुझे पालने में? तूने तो हमें कहीं का न छोड़ा! भागना भी था तो किसी अपनी जाति वाले के साथ भागती। क्या जरूरत पड़ी थी पिंकू के साथ भागने की? रिश्ता मंजूर न था तो मुझसे कहती, अपनी दादी से कहती। पर तूने तो हमारी नाक कटवा दी।,” रोते – रोते उमा भाभी ने फोन काट दिया।

राधा अभी अपनी बात कह ही नहीं पाई थी। वह कैसे बताती कि इश्क जात – पात को नहीं देखता। वह तो बस हो जाता है। और जब होता है तो सब नियम तोड़ कर अपनी मंजिल को लक्ष्य कर निशाना साधता है। पर वह जानती थी कि अभी मां का ही गुस्सा नहीं ठंडा है तो पिता जी का तो सातवें आसमान पर होगा।

कई दिन बीते पीछे बृजमोहन जी मोहन भैया के घर सुलह की बात करने आए। वह अपनी बिरादरी का गांव में ही नहीं इलाके में रसूखदार आदमी था। ऊंची जाति के लोग भी उसके ओहदे की तासीर के चलते ऊंची जुबान में उन से बात नहीं करते थे। पर वे दिल और व्यवहार के बहुत अच्छे थे। उन्होंने ही उस दिन कोर्ट में राधा और पिंकू की शादी करवाई थी। पिंकू को फोन पर जब राधा ने अपनी शादी की बात बताई थी तो उन्होंने इन दोनों की बाते सुन ली थी। सारी सेटिंग फोन पर इन्हीं की छत्र छाया में संपन्न हुई थी।

“अब क्या लेने आए हो बृजमोहन साहब? बेटी को तो ले गए हो बहला – फुसलाकर । उससे पेट नहीं भरा क्या? और क्या हमारी किरकिरी करने में अपनी ऊंची समझते हो?” मोहन भैया ने अनमने मन से कहा।

“नहीं मोहन बाबू। हम किसी को नीचा दिखाने नहीं आए हैं।बस सुलह करने आए हैं।” बृजमोहन शांति से बोले।

“काहे की सुलह ? कोई सुलह नहीं होगी। जाओ, चले जाओ यहां से। हमारे लिए वह मर गई और उसके लिए हम।” मोहन भैया झल्ला कर बोले। यहां गांव वालों ने मोहन भैया की बात की दात दी। उससे वे और शेर बन बैठे। उन्हें लगा कि अब गांव वाले मेरा आदर फिर से वैसे ही करेंगे, जैसे पहले करते थे।

“देखो मोहन बाबू! अब छोड़ो भी सारा गुस्सा। बच्चों ने प्यार किया कोई पाप नहीं किया। अब दोनों की कानूनी शादी भी हो चुकी है। अब तो उन्हें माफ कर लो और अपना लो। बच्चो को जितनी ही जरूरत हमारी है, उतनी ही आपकी भी है।” बृजमोहन पुनः शांति से बोले।

“क्या बात करते हो बृजमोहन साहब? अपने ओहदे और पैसों की धौंस मत जमाना।किस कानून की बात करते हो तुम? वही कानून तो तुम्हे जाति – पाती के प्रमाण पत्र बांटता है। फिर हम कैसे तुम्हारे साथ उठना – बैठना मंजूर करें?” मोहन भैया त्योरियां चढ़ाते हुए बोले।

“देखो मोहन भैया। इस संसार में कुदरत ने दो ही जातियां बनाई है। एक स्त्री और दूसरी पुरुष। वही सृष्टि के घटना चक्र को चलाने में सदा से कुदरत का साथ दे रही हैं। बाकी तो सब मनुष्य मन की खुरापात है। इसलिए इस जात – पात के विवाद में न पड़ कर बच्चों के बारे में सोचो।” बृजमोहन ने शांति से समझाते हुए से बोला।

“अपना यह ज्ञान कहीं और सुनाना, यहां नहीं। बड़े आए उपदेश देने। जब तुम एस. सी. का प्रमाण पत्र ले कर आरक्षण लेने के लिए अपनी जाति बड़े फखर से बताते हो, तब यह उपदेश नहीं देते? तब नहीं कहते कि हमें जाति प्रमाण पत्र नहीं चाहिए। हमें मानव होने का प्रमाण पत्र दो। अब अपनी जाति स्वीकारने में हेठी समझ रहे हो।” मोहन भैया ने अपने मन की सारी भड़ास उतार दी।

“अरे भाई क्यों बात उलझा रहे हो? मैं मानता हूं कि आरक्षण होना ही नहीं चाहिए।हो भी तो जातियों के आधार पर न हो। आर्थिक आधार पर हो। यह बहुत पहले हो जाना चाहिए था। ऐसा अगर समय पर हो गया होता तो इन आजादी के सत्तर साल में हमारे बच्चों ने आपसी रिश्ते कायम कर जात – पात का रोग ही मिटा दिया होता।पर यह तो राजनीतिक मसला है। इसमें हम क्या कर सकते हैं? और फिर इन बच्चों का तो कोई दोष ही नहीं।” बृजमोहन ने पुनः समझाते हुए से कहा।

“अच्छा! तुम कुछ नहीं कर सकते हो या कि जानबूझ कर कुछ करना ही नहीं चाहते? बृजमोहन साहब तुम जैसे रसूखदार जब इस बुराई का विरोध करें ना, सरकारों को रातों रात सब बदलना पड़ेगा। हम तुम्हारी चालाकियों को खूब समझते हैं। उससे पहले कि गांव वाले तुम्हारे साथ कुछ बुरा कर डालें, अपने रास्ते चलते बनो।” मोहन भैया विलक्षण मुद्रा में बोले।

बृजमोहन समझ गए कि इन तिलों से तेल नहीं निकले गा।अपने छोटे को इशारा कर घर को चले गए।

वर्षों बीत गए। वहां राधा और पिंकू के एक बेटी हुई। वह चार – पांच साल की हो गई थी। अब सुंदर बहू का मोह धीरे – धीरे राधा की सास से उतर रहा था। हररोज दोनों में घर के किसी न किसी कामकाज पर नोक – झोक होती ही रहती थी। उस दिन सास ने राधा को बहुत खरी – खोटी सुनाई थी,” तेरे मां – बाप ने तुझे रखा कहां था? खाना भी बनाना नहीं सिखाया। किसी भी काम की नहीं है डायन। मेरे बेटे को डोरे डाल कर अपना उल्लू सीधा कर गई बेईमान।” और भी न जाने क्या कुछ?

राधा अपनी बच्ची को उठा कर दुखी हो कर अपने पिता के यहां चली आई। सोचा मां – बाप माफ कर लेंगे। शाम के समय में जब वह अपने मायके पहुंची तो उसके पिता आंगन में बैठे थे। उससे पहले कि वह अपना दुख कहती। मोहन भैया ने आते ही उसे डांटना शुरू किया,
” क्यों आईं है यहां अब नालायक ? रह गई है कुछ कसर क्या?”
राधा रो रही थी। उसकी नन्ही सी मुन्नी उसके आंसू पोंछ रही थी और तोतली आवाज में बोल रही थी,” तुप तरो मम्मा! तुम तियुं डो डही हो? यह तुम्हे डांट रहे हैं। ये कौन है?”

मोहन भैया की ऊंची आवाज सुन कर घर के सब बाहर आ गए। पड़ोस के लोग भी बाहर निकल आए। राधा अपराधिनी की तरह नजरे झुकाए खड़ी थी।

“चुप भी कर अब मोहन। बस बोले ही जा रहा है। देखता नहीं कि कितने दिनों बाद बेटी आईं है?” चाची ने डांटते हुए कहा। और राधा को गले से लगा कर हालचाल पूछा।

दोनों को बतियते और रोते हुए उमा भाभी की आंखे भी भर आई। लोगों को बाहर देख कर राधा को दोनों मियां बीबी ने पुनः डांटना शुरू किया। डांटते – डांटते अंदर चले गए। सब लोग बाहर दात दे रहे थे। मोहन बिल्कुल ठीक बोल रहा है। इस कुलटा ने तो सारे गांव की नाक काट ली। उधर चाची ने सब को डांटा और भगा दिया।

अंदर भैया और भाभी आपस में मशविरा कर रहे हैं कि इसे रात को रखना कहां है? लोक लाज से बचने के लिए उसे बेटी के साथ नीचे वाले कमरे में रखने का निर्णय हुआ। सोचा धीरे -धीरे लोग भूल जाते हैं, तब सब ठीक होगा।

उस रात राधा को निचले कमरे में रखा गया। सुबह जब राधा की नन्ही बच्ची ममी – ममी चिलाने लगी तो सब निचले कमरे की ओर दौड़े। देखा वहां राधा थी ही नहीं।बच्ची को पूछा गया कि ममी कहां गई? पर उसे कुछ भी मालूम नहीं था। वह तो बस रो रही थी।

शालू रोता – रोता आया,” अरे पापा, पापा दीदी वहां चटान के पास पड़ी है। उसके मुंह से खून निकल रहा है।”
सब वहां भागे – भागे जाते हैं। पर राधा अब चली गई थी।

बच्ची ममी से चपटना चाह रही थी। उसे दूर ले जाया गया। सब रो रहे हैं। मोहन भैया भी फुट – फुट कर रो रहे हैं। शायद राधा ने रात को बच्ची को सुला कर उस पास वाली चटान से कूद कर अपनी जान दे दी थी। वह कुछ सहन नहीं कर पाई थी शायद। उसकी सहन शक्ति जबाव दे गई होगी। वहां सास की खींच – खींच और यहां उसे निचले कमरे में रखा जाना शायद रास नहीं आया। वह अंदर ही अंदर कुढ़ कर अपनी जान दे देती है।

उधर शहर से राधा के पति व ससुर घर पहुंचते हैं। उनसे राधा की सास ने कहानी उल्टी बता दी थी। पोस्ट मार्टम हुआ और लाश जाला दी गई। पुलिस केस दोहरा हो गया था। राधा के घर वालो ने मोहन भैया का केस किया और मोहन भैया ने घरेलू हिंसा का केस किया। दोनों परिवारों में आग लगी है। यहां पिंकू भी बहुत दुखी है।वह तो शायद दूसरी शादी करके संभल जाएगा पर बेचारी उस नन्ही सी बेटी की मां को कौन वापिस लाएगा? वह हर रोज मायूस होकर उस रास्ते को देखती रहती है, जहां से उसकी मां को जलाने के लिए ले जाया गया था।

घोषणा :- यह मेरी मौलिक और स्वरचित कहानी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — यह एक प्रेम कहानी है। इस कहानी में हेमराज ठाकुर जी ने भारतीय समाज की जात पात की रूढ़ भावना के चंगुल में जकड़े होने के उन कारणों पर भी प्रकाश डाला है, जिन के कारण आज की युवा पढ़ी लिखी पीढ़ी भी उसी छुआ छूत के जंजाल में फंसी पड़ी है। लेखक ने यह सिद्ध करने की कोशिश भी की है शायद कि आज़ादी के 74 सालों बाद भी भारतीय समाज जात पात की निकृष्ठ विचारणा से बाहर नहीं आ पाया है। इतना ही नहीं प्रेम के पाश में बंधे जोड़ो में यदि विजातीय प्रेम विवाह बच्चों के द्वारा किया जाता है तो उच्च वर्गीय समाज के अभिभावक अपनी सन्तान से नाता ही तोड़ देते हैं पर इस सामाजिक बुराई का विरोध नहीं कर पाते। चाहे उन्हे अपनी संतानों की जान ही क्यों न खोनी पड़े। सामाजिक नियमों और प्रतिष्ठाओं का इस सम्बन्ध में इतना प्रभाव है कि देश का कानून भी इसके आगे कुछ नहीं कर पाता। लेखक ने पात्रों के माध्यम से यह भी सिद्ध करने की कोशिश की है कि इस समस्या का मुख्य कारण वर्तमान पढ़े लिखे समाज के सामने जातिगत आरक्षण भी है शायद। संविधान में तो इस भेद भाव को मिटाने की बात की गई है और निम्न समझा जाने वाला समाज संविधान की इस दलील को पूर्ण रूप से लागू करने की मांग भी समाज से करता है। परन्तु आरक्षण छोड़ने को तैयार नहीं है। जबकि संविधान में आरक्षण का प्रावधान मात्र 10 साल तक प्रभावी रखने के निर्देश संविधान निर्माताओं ने दिए थे। इधर उच्च वर्गीय समाज को इस प्रथा से बाहर आने को कहा जाता है तो वह इसी जातिगत आरक्षण की बात डंके की चोट देकर करता है। एक छोड़ने को तैयार नहीं और दूसरा मानने को तैयार नहीं। इसी कारण नई और पढ़ी लिखी पीढ़ी में भी यह भावना सब कुछ जानते और समझते हुए भी निरंत बढ़ती ही जा रही है। लेखक का मानना है कि संसार में मात्र दो ही जातियां हैं, एक स्त्री और दूसरी पुरुष। जो प्रकृति ने सृष्टि संचालन के उद्देश्य से अपना सहयोग करने के लिए बनाई है। बाकी सब मानव मस्तिष्क की खुराफत है। अतः इस कहानी से हमे यह संदेश मिलता है कि भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने के लिए हमे भारत से जात पात के भेद भाव को जड़ से मिटाना होगा। पुनः वैदिक दर्प को स्थापित करना होगा।

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यह कहानी (दास्तान ए जात पात।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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हिन्दी साहित्य में नाथ परम्परा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हिन्दी साहित्य में नाथ परम्परा। ♦

नाथ परम्परा का नाम सुनते ही हमारे मनो मस्तिष्क में भभूतधारी अवधूत हठ योगियों की कर्णभेदी और कुंडलधारी, जटाजुट युक्त मृगछालधारी तथा गले में रुद्राक्ष मालाधारी व कांख में खप्परधारी छवि का दर्शन हो जाता है। सिंगी, त्रिशूल और आधारी को सदैव अपने साथ धारण करने वाला वह वैरागी समुदाय हमारे अंतःकरण में चलचित्र की भांति प्रकट होता है, जो सांसारिक भय, वितराग, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, वासनाओं और विपरीत लिंगी आकर्षण इत्यादि से सदैव मुक्त रहा तथा समाज को इसी दिशा की और चलने की शिक्षा – दीक्षा देता रहा।

इतिहास के गहन में जाकर जब खंगालने की कोशिश करेंगे तो हमें पता चलता है कि यह समुदाय हिंदी साहित्य के क्षेत्र में तब कूदा था जब सिद्ध परंपरा के साहित्य के उपभोग एवं विलासिता की पराकाष्ठा समाज में विद्यमान हो चुकी थी। ठीक -ठीक तो बताया नहीं जा सकता परंतु अंदाजन यह कहना गलत नहीं होगा कि लगभग नौवीं शताब्दी के बीच में इस परंपरा ने हिंदी साहित्य में अपने पंथ की विचारधारा को कलमबद्ध करके सामाजिक कुरीतियों का खंडन करना शुरू किया था।

अब इसके पीछे चाहे सिद्ध परंपरा के साहित्य का विरोध आधार बना हो या फिर तत्कालीन परिपेक्ष्य में अरब देशों से होने वाले विभिन्न आक्रमणकारियों एवं आतताइयों की आक्रमण शैली से समाज को बचाने के लिए उनका प्रतिकार करना रहा हो। सर्वधर्म समभाव की परिकल्पना भी उनकी एक विशुद्ध भावना इस काल में रही है।

आतताइयों के संक्रमण का खंडन करने वाली पृष्ठभूमि का एक उदाहरण गुरु गोरखनाथ जी के शिष्य की एक रचना के अंश से स्पष्ट देखा जा सकता है, जिसमे धर्मगत विभक्तता से ऊपर उठकर यौगिक विशिष्टता बताई गई है:—

हिंदू मुसलमान खुदाई के बंदे, हम जोगी न कोई किस्से के छन्दे।

यह कतई नहीं नकारा जा सकता कि नाथ परंपरा ने हिंदी साहित्य में जो अपना योगदान हिंदी साहित्य के इतिहास के प्रारंभिक दौर में प्रदान किया है, वह हिंदी साहित्य का आधार बन गया। यदि हम हिन्दी साहित्य के इतिहास को पढ़े तो पता चलता है कि हमारा हिंदी साहित्य का इतिहास विभिन्न काल खंडों में विभाजित किया गया है। हिंदी साहित्य के प्रारंभिक काल को आदिकाल के नाम से नामित किया गया है। उस आदिकाल के साहित्य को भी तीन वर्गों में बांटा गया है:—

  1. धार्मिक साहित्य।
  2. लौकिक साहित्य।
  3. इतर साहित्य।

इनमें से यदि नाथ परंपरा के साहित्य की बात की जाए तो यह साहित्य निश्चित ही धार्मिक साहित्य के अंतर्गत आता है। जिस कालखंड में नाथ परंपरा का साहित्य हिंदी साहित्य जगत में प्रकट हुआ, वह कालखंड निश्चित संक्रांति के दौर से गुजर रहा था। वहां जहां एक ओर से समाज सिद्ध परंपरा की भोग विलास पूर्ण साहित्य पद्धति का शिकार बनता जा रहा था तो वहीं दूसरी ओर विदेशी आक्रांताओं की आतंकपूर्ण जीवनशैली और भाषा वैविध्य के चक्रव्यू में भी निरंतर उलझता जा रहा था। इन सभी प्रकार के प्रपंचो से समाज को बाहर लाने के लिए नाथ परंपरा के साहित्यकारों ने अपनी साहित्यिक चमक को हिंदी साहित्य में प्रविष्ट करके भारतीय जनमानस को एक नई दिशा और गति दी।

अश्लीलता और मानसिक भ्रष्टाचार से बाहर ला कर समाज को आंतरिक शुद्धि एवं पवित्रता की ओर अग्रसर किया। आत्म संयम तथा मानसिक संतोष के सद चरित्र वाले जीवन को जीने के लिए जो मार्ग नाथ परम्परा के साहित्य ने भारतीय समाज को प्रशस्त किये, वे आगे चलकर कबीरपंथी विचारधारा में भी अपना वर्चस्व बनाए रखते हुए नजर आते हैं। यह बात जरूर है कि नारी जीवन से दूर रहने की प्रवृत्ति के कारण तथा उनके साधना तथा ज्ञान मार्ग की नीरसता एवं शुष्कता के कारण कालांतर में यह परंपरा धीरे – धीरे समाज के मानस पटल पर अपना दीर्घकालीन प्रभाव छोड़ने में असमर्थ रही। अपने शिष्यों की कड़ी परीक्षा लेने के कारण भी इस परंपरा में आगे शिष्यों का निरंतर जुडना बाधित हो गया। परंतु इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस परंपरा के नाथों और साहित्य ने तत्कालीन भारतीय जनमानस के अंतःकरण को आंदोलित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

◊ नाथ परम्परा ◊

इससे पहले कि हम इस परंपरा के साहित्य की प्रवृत्तियों के बारे में बात करें; हमें नाथ परम्परा के बारे में संक्षिप्त रूप से जान लेना चाहिए। एक किंवदंती के अनुसार इस परंपरा के आरंभ की घटना उस पौराणिक आख्यान से जोड़ी जाती है जो भगवान शिव तथा माता पार्वती के अमर कथा संवाद के दौरान घटी थी। माना जाता है कि एक बार चलते – चलते भगवान शिव और माता पार्वती को किसी वन प्रदेश में रात हो गई। वे दोनों उस रात्रि को एक पेड़ के नीचे विश्राम करने के लिए रुक गए।

इसी विश्राम के दौरान माता पार्वती ने भगवान शिव से अमर कथा सुनाने का आग्रह किया। माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने माता पार्वती को इस शर्त पर अमर कथा सुनाने की सहमति दी कि जब तक आप इस अमर कथा को सुनते – सुनते हुंकारा भरती रहेगी, तब तक मैं इस कथा को निर्बाध गति से सुनाता रहूंगा।जब हुंकारा बंद हो जाएगा तब मैं इस कथा को सुनाना बंद कर दूंगा। माता पार्वती ने भगवान शिव के इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और भगवान शिव समाधि में विलीन होकर अमर कथा को मां पार्वती को सुनाने लगे। इस बीच माता को अर्ध रात्रि के समीप नींद आ गई।

माता के बदले यह हुँकारा उस पेड की कोटर में एक शुक (तोते) के फटे हुए अण्डे के कुछ हिस्से में बचे हुए तरल पदार्थ से अमर कथा के प्रभाव से उत्पन्न शुक के बच्चे ने भरना शुरू किया। माना जाता है कि उस जीर्ण क्षीर्ण और परित्यक्त अण्डे के एक टुकड़े में जो भी तरल पदार्थ फटने के बाद शेष रह गया था, उसी से शुक के बच्चे का अमर कथा के प्रभाव से जन्म हुआ और उसी बच्चे ने मानवानुकर्ण करके माता के सोने के बाद अमर कथा का आनंद लेने हेतु हुंकारा भरना शुरू किया। जब प्रातः काल भगवान शिव ने अपने नेत्र खोले, तो पाया कि माता पार्वती तो सोई हुई है।

ऐसे में उन्होंने देखा कि उनके द्वारा सुनाई गई अमर कथा को तो एक शुक का बच्चा सुन गया। भगवान शिव ने विचार किया कि यह शुक पुत्र तो अमर हो जाएगा। तब उन्होंने त्रिशूल लेकर उस शुक पुत्र का पीछा किया। आगे-आगे शुक पुत्र और पीछे-पीछे भगवान शिव। आगे किसी झरने में महर्षि वेद व्यास जी की धर्म पत्नी प्रातः काल सनान कर रही थी। उसने कूला करने के नियमित मुंह खोला था कि वह शुक पुत्र शरण लेने हेतु उनके मुंह में घुसकर ऋषि पत्नी के गर्भ में छिप गया।

भगवान शिव को पीछा करते हुए जब महर्षि वेद व्यास जी ने देखा और पीछा करने का कारण पूछा तो मुस्करा दिए। जब भगवान शिव ने क्रोधित स्वर में व्यास जी से मुस्कराने का कारण पूछा तो व्यास जी ने मुस्कराते हुए ही जबाव दिया कि हे प्रभु ! इसीलिए तो आपको भोलेनाथ कहा जाता है। हे प्रभु! जिस जीव ने साक्षात स्वयं आपके श्री मुख से अमर कथा का श्रवण किया हो, उसे भला कौन मृत्यु दे सकता है।इसलिए हे प्रभु! गुस्सा त्याग दो और लौट जाओ। यह जो शुक पुत्र का पीछा आप इसके प्राण हरण के नियमित कर रहे हैं, यह व्यर्थ है।

यह सुनकर भगवान शिव प्रसन्न होकर लौट जाते हैं। वह शुक का बच्चा 12 वर्ष तक बाह्य माया के डर से ऋषि पत्नी के गर्भ में पड़ा रहा। 12 वर्ष बाद वेद व्यास जी ने उससे बाहर आने की प्रार्थना की, हे पुत्र ! यह संसार के नियम के विरुद्ध है। अब आप अपनी मां के गर्भ से बाहर निकलो। आपकी मां को अतिशय कष्ट हो रहा है। तो तब उस गर्भस्थ शुक पुत्र ने अंदर से आवाज दी कि हे पिताश्री मैं एक ही शर्त पर बाहर आऊंगा यदि आप अपने सिद्धि बल से जगतपति प्रभु से यह प्रार्थना करें कि जिस क्षण तक मैं संसार में प्रविष्ट होने की प्रक्रिया से गुजरूं, उस क्षण तक अपनी योग माया को वे संसार में प्रभावहीन कर दें।

◊ 84 सिद्ध 9 नाथ ◊

माना जाता है कि महर्षि वेद व्यास ने प्रभु से प्रार्थना की और प्रभु ने अपनी योग माया का प्रभाव क्षण भर के लिए संसार में रोक लिया। ठीक इसी क्षण शुकदेव के साथ-साथ 93 अन्य जीवात्माओं ने भी जन्म लिया। इस प्रकार उस माया हीन प्रभाव के क्षण में इस संसार में 94 जीवात्माएं पैदा हुई। उनमें 84 सिद्ध 9 नाथ और एक स्वयं शुकदेव जी महाराज उत्पन्न हुए। ये नौ नाथ निम्नलिखित माने जाते हैं:—

  1. आदिनाथ (स्वयं सदा शिव)।
  2. मच्छेंद्र नाथ या मत्स्येंद्र नाथ (गोरखनाथ के गुरु)।
  3. गुरु गोरखनाथ (नाथ साहित्य परंपरा के प्रवर्तक)।
  4. गहिणीनाथ।
  5. चर्पटनाथ।
  6. चौरंगीनाथ।
  7. जालंधर नाथ।
  8. भरथरी नाथ या भर्तृनाथ।
  9. गोपीचंद नाथ।

◊ नाथ संप्रदाय का आविर्भाव ◊

इस घटनाक्रम से भी नाथ पंथ या नाथ संप्रदाय को जोड़ा जाता है, जिसमें तर्क यह भी दिया जाता है कि भगवान सदा शिव उसी मायाहीन घड़ी में संसार में अपने पंथ का प्रादुर्भाव करने की इच्छा से लीला रूप में आए थे। इसके विपरीत यदि हिंदी साहित्य के इतिहास को खंगाले तो नाथ संप्रदाय का उद्भव हिंदी साहित्य में गुरु गोरखनाथ जी से उद्भूत हुआ मिलता है। गुरु गोरखनाथ जी के विषय में अगर इतिहास में देखें तो कुछ लोग उन्हें आठवीं सदी का मानते हैं तो कुछ 10वीं /11वीं या तेरहवीं सदी का मानते हैं। हालांकि गुरु गोरखनाथ जी का साहित्य लगभग 16वीं शताब्दी में सामने आता है। यह भी माना जाता है कि नाथपंथियों ने लगभग 40 ग्रंथों की रचना की। हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने तो नौवीं शताब्दी के मध्य में नाथ पंथ का प्रादुर्भाव माना है। डॉ पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने गोरखनाथ का काल 10 वीं शताब्दी में निर्धारित किया है। यदि डॉ श्रीनिवास शर्मा की माने तो उक्त दोनों विद्वानों की टिप्पणियों के आधार पर उन्होंने नाथ संप्रदाय का आविर्भाव नौवीं शताब्दी के मध्य भाग में माना है।

यदि उक्त टिप्पणियों के साथ – साथ समग्र हिंदी साहित्य के इतिहास का गहन अन्वेषण किया जाए तो कहना न होगा कि नाथ साहित्य परंपरा का प्रभाव लगभग 9वीं सदी से 14वीं सदी तक हिंदी साहित्य में बना रहा। नाथ परंपरा ने इस कालखंड में भारतीय जनमानस पर साहित्य और धर्म का शासन किया।

यदि राहुल सांकृत्यायन जी की बात को माना जाए तो निश्चित रूप से नाथ परंपरा सिद्ध परंपरा की वज्रयान शाखा की सहज मार्गी परंपरा से विकसित हुई एक परम्परा है। इधर एक मत यह भी है कि नाथ संप्रदाय पर बौद्ध धर्म के महायान की तंत्र परंपरा का प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलता है।

इस परम्परा के प्रादुर्भाव को स्पष्ट करते हुए सोशल मीडिया के कुछ आलेखों में पढ़ने को मिलता है की नाथ संप्रदाय का प्रादुर्भाव ना + थ से हुआ है। ‘ना’ का अर्थ ‘अनादि रूप है ‘ अर्थात सदाशिव तथा ‘थ’ का अर्थ वह अनादि धर्म है, जो भूवनत्रय की स्थिति का कारण है। नाथ – वह तत्व है जो मोक्ष प्रदान करता है।

इस परम्परा में नाथ एक उपाधि मानी जाती थी। जब कोई शिष्य गुरु परम्परा में कड़ी परीक्षा के बाद सफल सिद्ध होता था तो उसे यह नाथ की उपाधि प्रदान की जाती थी और वह शिष्य अपने नाम के पीछे नाथ शब्द का उपाधि सूचक शब्द लगाकर समाज में विशिष्ट व्यक्तित्व प्राप्त कर लेता था। ये अपने गुरु को ही भगवान मानते थे।

◊ नाथ परम्परा का हिंदी साहित्य को योगदान ◊

इस परम्परा का आदि गुरु भगवान शिव स्वयं काे माना जाता है। अर्थात आदिनाथ के रूप में भगवान शिव को ही इस परम्परा में स्थान प्राप्त है।
नाथ परम्परा का हिंदी साहित्य को योगदान :—…

हिंदी साहित्य को आदिकाल से आधुनिक काल तक एक दृष्टि से जब देखा जाए तो यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हिंदी साहित्य के क्षेत्र में जो शिष्टता, आंतरिक शुद्धि, इंद्रिय निग्रह, वैचारिक पवित्रता,अष्टांग साधना, कुंडलीनी जागरण तथा उसके साथ – साथ प्राण शोधन तथा हठयोग इत्यादि मानसिक संयमों का प्राकाट्य यदि सर्वप्रथम किसने किया था, तो वह इस नाथ परम्परा ने ही किया था।उसके पीछे पृष्ठभूमि भले ही कुछ भी रही हो। या फिर कारण कोई भी रहा हो। परंतु व्यक्तिक सद-चरित्रता का संदेश प्रथम बार हिंदी साहित्य में यदि किसी परंपरा ने दिया है तो वह निश्चित तौर से नाथ साहित्य परंपरा से प्राप्त होता है। इस साहित्य परंपरा की प्रमुख प्रवृतियां निम्नलिखित रही है:—

1. उलटवासियों का प्रयोग: नाथ संप्रदाय के नाथों एवं कवियों ने साहित्य के क्षेत्र में अपनी अंतरतम गहन साधना के रहस्य को भाषा के माध्यम से जिन छंदों और प्रतीकों के माध्यम से प्रकट किया है, उन्हें उल्टवासियों के नाम से जाना जाता है। यह रहस्य ऐसी शब्दावली के प्रयोग से प्रकट किया गया होता है कि आम जनमानस की समझ से कई बार परे हो जाता है ।उदाहरण के रूप में गुरु गोरखनाथ जी के गुरु मत्स्येंद्र नाथ की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत है : –

जल कुंच है माछली, खण कुंचा है मोर।
सेवक चाहे राम कूं, ज्यौं ध्यंतवत चंद चकोर॥

इसी प्रकार से गुरु गोरखनाथ जी के काव्य संग्रह – “गोरख वाणी“ का एक उदाहरण है:-

यह मन सकती यहु मन सीव।
यहु मन पांच तत का जीव॥

इन उलटवासियों का प्रभाव आगे चलकर संत साहित्य में भी विशेषकर कबीर पंथ में साफ – साफ दिखाई देता है। इसकी पुष्टि करता हुआ एक उदाहरण देखें : –

नाथ बोले अमृत वाणी, बरिषै कंवली भीजेगा पांणी।
कउवा की डाली पीपल बासै, मूसा के सबद बिलइया नासै॥

नाथों का साहित्य अधिकतर साधनापरक है, इसलिए उसमें अधिकतर काव्य तत्वों की सरसता का पर्याप्त अभाव है।

2. हठयोग एवं अष्टांग मार्ग का प्रतिपादन : नाथ परंपरा में हठयोग का विशेष महत्व रहा है, जिसका प्रभाव नाथ साहित्य में भी साफ- साफ नजर आता है। हठयोग से अभिप्राय नाथ परंपरा में – ‘ह’ से सूर्य और ‘ठ’ से चंद्र से है। अर्थात सूर्य और चंद्र स्वर की संयुक्त साधना जो शिव स्वर तन्त्र में त्रिनाड़ी तंत्र के अंतर्गत आती है; उस योग को हठयोग का नाम दिया गया है। कुछ लोग अपवाद स्वरूप इस को जबरदस्ती किया जाने वाला योग मार्ग भी कह देते हैं।जबकि यह नितांत गलत है। ध्यान से अगर हम नाथ साहित्य को पढ़ें तो स्वत: ही स्पष्ट हो जाता है कि महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग में जो साधना पद्धति बताई गई है, नाथ पथियों का हठयोग भी उसी से मेल खाता है। उदाहरण के लिए नाथ साहित्य के कुछ अंश इस प्रकार है : –

 १ . आसण बैसिवा पवन निरोधिवा वान मान सब धंधा।
बदंत गोरखनाथ आतमा विचारत ज्यूँ लज लज दीसै चंदा॥

२ . ईडा मारग चन्द्र मणीजै प्यगुला मारग मानं।
सुषमनां मारग वांणी बोलिए त्रिय मूल अस्थानं॥

३ . भोगिया सूते अजहुं न जागे भोग नहींज रे रोग अभागे।

अतः कहा जा सकता है कि नाड़ी शोधन में इडा, पिंगला, सुषुम्ना नाडियों का प्रयोग, षडचक्र में मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनहद, विशुद्ध और आज्ञा चक्र के साथ-साथ सहस्रार कमल या शुन्य समाधि स्थल का वर्णन भी नाथ साहित्य में मिलता है।कुंडली जागरण के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहना और शुन्य समाधि स्थल में पहुंचकर अपनी साधना के चरम को प्राप्त करना नाथ पंथियो का मोक्ष कहलाता है।

3. गुरु की महिमा : इस परंपरा में गुरु को साक्षात भगवान का दर्जा दिया जाता है। इतना ही नहीं इस परंपरा के सभी साधकों का मानना यह था की मुक्ति और निवृत्ति गुरु कृपा से ही संभव है। उदाहरण के लिए नाथ साहित्य का एक अंश देखा जा सकता है : –

गुरु कीजै गहिला, निगुरा न रहिला।
गुरु बिन ग्यांन न पाइलर रे भाइला॥

गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति असंभव है। इस बात की पुष्टि करती हुई ये पंक्तियां अपने आप उस युग के साक्ष्य को देती है कि नाथ पंथ गुरु के प्रति कितना समर्पित था।

4. परंपरागत रूढ़ियों एवं बाह्य आडम्बरों का विरोध : यह बात ऊपर ही पुष्ट कर दी गई है कि जिस काल में नाथ संप्रदाय का साहित्य समाज के सामने उद्घाटित हुआ। वह संक्रांति काल था। उस समय मुस्लिमों के आगमन के कारण तथा सिद्ध पंथियो के विलासितापूर्ण साहित्यिक भावबोध से समाज नवीन नाथ परंपरा के साहित्य की ओर अग्रसर हो रहा था। समाज उस वक्त नाना प्रकार की कर्मकांडी प्रक्रियाओं से गुजर रहा था। वे सभी स्थितियां एवं क्रियाएं अधिकतर बाह्या अडम्बरों से परिपूर्ण थी। ऐसी परिस्थिति में इन सभी परिस्थितियों का विरोध करता हुआ एक नया संप्रदाय समाज के सामने अपने साहित्य को लेकर आता है, जो नाथ परंपरा के नाम से जाना जाता है। गुरु गोरखनाथ जी की गोरख वाणी में तो इन आडम्बरों का विरोध हुआ ही, हुआ है बल्कि उनके आगे भी इस परंपरा में बाह्य आडंबर का निरंतर विरोध होता रहा। इन्होंने सहज, सरल एवं निश्छल जीवन को जीने की शिक्षा के साथ-साथ शोषण मुक्त समाज की परिकल्पना साकार करने की शिक्षा भी तत्कालीन समाज को अपने साहित्य के माध्यम से देने की पूरी- पूरी कोशिश की।

5. चित्त शुद्धि और सदाचार में विश्वास : इस परंपरा के संपूर्ण साहित्य में हमें निरंतर आत्म शुद्धि, आंतरिक पवित्रता, मानसिक संयम एवं तप, पवित्र दृष्टि और पावन व्यवहार इत्यादि का चित्रण देखने को मिलता है। यह बात अलग है कि इन लोगों का बाह्य हुलिया आम जनमानस को देखने में भले ही ठीक नहीं लगता होगा। परंतु इनका अंतः करण और इनका जीवन व्यवहार जिस तरह से पवित्र था, उसी तरह की बातें इनके द्वारा लिखे गए साहित्य में संपूर्ण समाज को सदाचार की शिक्षा देती हुई नजर आती है। इंद्रिय निग्रह, कुंडलीनी जागरण, चित्त शुद्धि आदि-आदि बातें इनकी जीवन शैली में साक्षात नजर आती है और उन्हीं का परिणाम इनके साहित्य में भी फलीभूत हुआ है।

6. गृहस्थ जीवन के प्रति नकारात्मकता : यह बात सही है कि सिद्ध साहित्य की तरह नाथ साहित्य में नारी जीवन और गृहस्थ जीवन के प्रति आस्था नजर नहीं आती, परंतु फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि नाथों का दृष्टिकोण नारी के प्रति और गृहस्थी के प्रति पूर्ण रूप से प्रतिकूल था। हां यह सत्य है कि इस ओर नाथ पंथियों की नकारात्मक दृष्टि जरूर थी। नाथ परंपरा में यह विचारधारा जरूर पुष्ट थी कि चारित्रिक पतन का कारण नारी रहती है और इसलिए वह हमेशा नारी से दूरी बनाए रखने की सलाह अपने शिष्य परंपरा में देते रहते थे। यही वह मुख्य कारण था जिसके चलते कालांतर में यह परंपरा समाज में अपना प्रभाव धीरे – धीरे खोती गई। कुछ विद्वानों का मानना यह भी है कि यह विचारधारा गुरु गोरखनाथ जी में तब घर कर गई थी, जब उन्होंने बौद्ध बिहारों में बौद्ध भिक्षुणियों के व्यवहार को देखा होगा।

हिंदी साहित्य के आगामी कालो पर नाथ साहित्य का प्रभाव : –

हिंदी साहित्य के इतिहास को जब हम पढ़ते हैं तो नाथ साहित्य का सीधा – सीधा प्रभाव भक्ति काल में निर्गुण मार्गी शाखा में दिखाई पड़ता है। निर्गुण मार्गी शाखा में भी ज्ञानाश्रयी कबीर पंथ पर इस साहित्य परंपरा का प्रभाव स्पष्ट नजर आता है। उक्त की सारी प्रवृतियां तथा उलटवासियों की वही नाथपंथी शब्दावली कबीर मार्गी शाखा में साफ – साफ देखी जा सकती है। आचरण की शुद्धता की ओर अग्रसर कबीर पंथ को यदि नाथ साहित्य के साथ जोड़ कर देखा जाए तो बहुत सारी बातें इन दोनों पंथों की आपस में कहीं न कहीं मेल खाती है।

निष्कर्ष (Conclusion) : –

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि नाथ परंपरा हिंदी साहित्य के इतिहास में आदिकाल के प्रारंभिक चरण में नवी शताब्दी के आसपास विकसित हुई और निरंतर चौदहवीं सदी के आसपास तक समाज में अपना धार्मिक और साहित्यिक प्रभाव बनाए रखने में कामयाब हुई। इस पंथ की साहित्य परंपरा ने हिंदी साहित्य में जिस तरह से अपना प्रभाव छोड़ा है, वह अपने आप में अद्वितीय है। अतीत के संस्कृत साहित्य की गहन एवं गुप्त रहस्यमई घटनाओं को आम जनमानस की भाषा में उद्घाटित करने का कार्य हिंदी साहित्य में नाथपंथी परंपरा ने ही किया था। समाज के चारित्रिक उत्थान तथा मानसिक विकास का आधार यही परंपरा हिंदी साहित्य में बनी। अष्टांग योग के रहस्य को जनभाषा में प्रस्तुत करने की परिकल्पना नाथ संप्रदाय ने ही हिंदी साहित्य को प्रदान की। जिसका प्रभाव आगे चलकर कबीर पंथ में भी नजर आता है। गुरु के महत्व को और बाहरी आडंबर के खंडन को नाथ पंथियों की विचारधारा का स्वस्थ एवं पुष्ट पक्ष कहा जा सकता है। अतः कहा जा सकता है कि जब तक साहित्य की दुनिया में हिंदी साहित्य का पठन-पाठन होता रहेगा। तब तक नाथ साहित्य के महत्व को भुलाया नहीं जा सकता।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — इस पंथ की साहित्य परंपरा ने हिंदी साहित्य में जिस तरह से अपना प्रभाव छोड़ा है, वह अपने आप में अद्वितीय है। अतीत के संस्कृत साहित्य की गहन एवं गुप्त रहस्यमई घटनाओं को आम जनमानस की भाषा में उद्घाटित करने का कार्य हिंदी साहित्य में नाथपंथी परंपरा ने ही किया था। समाज के चारित्रिक उत्थान तथा मानसिक विकास का आधार यही परंपरा हिंदी साहित्य में बनी। अष्टांग योग के रहस्य को जनभाषा में प्रस्तुत करने की परिकल्पना नाथ संप्रदाय ने ही हिंदी साहित्य को प्रदान की। आजकल की पीढ़ी आधुनिकता के नाम पर भूलते जा रहे है अपनी ही प्राचीन संस्कृति, संस्कार व सभ्यता को। “याद रखें- हवा में उड़ने वाले हर परिंदे को भी तो आखिर में, थक हार कर किसी न किसी शाख पर टिकना है।”

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यह लेख (हिन्दी साहित्य में नाथ परम्परा।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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Filed Under: 2022-KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य, हेमराज ठाकुर जी की रचनाएँ। Tagged With: article of hemraj thakur, author hemraj thakur, poet hemraj thakur, आदिकालीन नाथ साहित्य के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ, किस्से कहानियां, गोरख वाणी, नाथ परम्परा पर निबंध, नाथ संप्रदाय का इतिहास, नाथ संप्रदाय की उत्पत्ति कैसे हुई, नाथ साहित्य एवं नाथ पंथ के प्रमुख प्रवर्तक, नाथ साहित्य की विशेषताएँ, सिद्ध और नाथ साहित्य में अंतर, हिन्दी साहित्य में नाथ परम्परा, हेमराज ठाकुर की रचनाएँ

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