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हेमराज ठाकुर जी की रचनाएँ।

हिन्दू और हिंदुत्व।

Kmsraj51 की कलम से…..

Hindu and Hindutva – हिन्दू और हिंदुत्व।

हिन्दू और हिंदुत्व – एक समीक्षा।

हिंदुस्तान में हिन्दू और हिन्दुत्व की बात न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। आज पूरी दुनियां में भारत एक ऐसा देश है, जिसमें हिन्दू और हिन्दुत्व के ऊपर एक जंग सी छिड़ गई है। सोशल मीडिया हो या प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया हो या सामान्य जन वार्ता। राजनैतिक दल हो या फिर सामाजिक – धार्मिक संगठन। सभी की टिप्पणियां और मुहिमें हिन्दू और हिन्दुत्व के पक्ष और विपक्ष में निरन्तर चलती रहती है।

ऐसा नहीं है कि हिन्दू और हिन्दुत्व के विपक्ष में मात्र गैर हिन्दू समुदाय ही खड़े नजर आते हैं। बल्कि खुद को कट्टर हिन्दू कहने वाले लोग भी हिन्दू और हिन्दुत्व के खिलाफ मुक्त स्वर में बोलते हुए नजर आते हैं। खैर विचारधारा अपनी – अपनी।

पर यहां कई सवाल खड़े होते हैं कि जो ये लोग हिन्दू और हिन्दुत्व के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और जो ये हिन्दू और हिन्दुत्व के पक्ष में आंदोलित लोग नजर आ रहे हैं; ये सभी असल में हिन्दू और हिन्दुत्व के अर्थ को जानते भी है या नहीं। या फिर मात्र पक्ष के लिए पक्ष और विरोध के लिए विरोध करते रहते हैं। कहीं ये राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक संगठनात्मक विचारधारा से बंध कर तो यह सब करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं? कहीं ये सामाजिक सरोकारों को ठोकर मारकर अपने संगठनात्मक सरोकारों को साधने की कोशिश करते हुए तो ऐसी हरकत करने की जरूरत नहीं कर रहे हैं, जो समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।

• हिन्दू शब्द का अर्थ •

उससे पूर्व की हम आगे की बात करें। हिन्दू शब्द के अर्थ को समझना जरूरी है। यूं तो भारत में हिन्दू कहलाने वाले लोग स्वयं को सनातनी कहते हैं, जो सनातन धर्म की “वसुधैव कुटुंबकम्” की अवधारणा के धरातल पर खड़ी एक मानवीय सरोकारों की इमारत है। पर फिर भी हिन्दू शब्द के अर्थ को समझना जरूरी है। मेरे मत के अनुसार यदि हिन्दू शब्द को भाषिक संरचना के आधार पर परिभाषित किया जाए तो हिन्दू शब्द “हिं + दू” के मेल से बना है। इसमें “हिं” का अर्थ हिंसा और “दू” का अर्थ दूर होता है। अर्थात ऐसा व्यक्ति/समुदाय/समाज जो हिंसा से दूर रहता हो, वह हिन्दू है।

हिंसा मानसिक, तानसिक या फिर कोई भी हो सकती है। इसी प्रकार अहिंसात्मक भावना से ओतप्रोत मानस ही हिन्दुत्व है। इस सन्दर्भ में यह भी समझने की कोशिश करनी चाहिए कि सत्य और अहिंसा के पथ पर चलने वाला हर व्यक्ति हिन्दू है, वह चाहे किसी भी धर्म या संप्रदाय का क्यों न हो। वह हिन्दू हो या मुस्लिम, सिख हो या इसाई या फिर पारसी। जो सत्य और अहिंसा परमो धर्म का मार्ग नहीं अपनाता, वह हिन्दू धर्म का होकर भी हिन्दू नहीं है। यदि मैं गलत हूं तो फिर हिन्दू धर्म की पवित्र पुस्तकों के प्रमाण भी गलत है। महर्षि वाल्मिकी और तुलसी कृत रामायण में महा पण्डित रावण को राक्षस और कविलाई समाज के नायक गुह को तथा पशु समुदाय यानी वानर तथा रिक्ष समुदाय के हनुमान, सुग्रीव, अंगद तथा जामवंत आदि को साधु व सज्जन सिद्ध करना इसी हिंदूवादी सोच का उदाहरण है।

शबरी जैसी निम्न जाति की वृद्ध औरत के जूठे बेर प्रभु राम द्वारा खाना तथा केवट जैसे सामान्य जन के गले लगना आदि सभी प्रमाण हिंदूवादी सोच को पुष्ट करते हैं। और भी न जाने कितने-कितने प्रमाण कई शास्त्रों में भरे पड़े हैं। पर नहीं आज ये बाते किसी को न ही तो सुननी है और न ही समझनी है।

आज तो बस एक ही भूत सबके सिर पर सवार है कि मैं हिन्दू माता-पिता की संतान हूं तो मैं हिन्दू हूं। अधिकांश भाई बहन ऐसे हैं जिन्हें हिन्दू धर्म का क ख ग तक मालूम नहीं है पर है हम हिन्दू। मेरी बात झूठ है तो करें सर्वे। पूछिए जरा हिन्दू कहलाने वाले लोगों से कि वेद कितने हैं? पुराण कितने हैं? क्रमबद्ध उनकी सूची बनाने को कहे।इतनी सी बात से ही सारी हेकड़ी निकल जाएगी। उन ग्रंथों में लिखा ज्ञान तो दूर की कौड़ी है।

मेरा मक़सद किसी को जलील करना और किसी की पैरवी करना नहीं है। सोशल मीडिया में कई मुस्लिम भाई भी राम को अपना पूर्वज बताते हुए नजर आते हैं और वे ये मानते हैं कि हमारे पूर्वज हिन्दू थे। उनकी कवरगाहों में उर्फ कर के उनके हिन्दू होने का प्रमाण लिखा हुआ मिलता है। खैर मैं इस बात की पुष्टि नहीं कर रहा हूं। पर उन्हे बोलते मैने जरूर सुना है।

मेरा मतलब है कि फिर इस हिन्दू और हिन्दुत्व के मुद्दे पर इतनी जुमानी जंग क्यों? विशेष तौर पर इस मुद्दे पर भाजपा और आर एस एस से समर्थित लोगों को निशाने पर गैर भाजपाई और गैर आर एस एस संगठनों के हिन्दू कहलाने वाले लोग ही रखते हैं।खैर गैर हिंदूवादी संगठनों और समुदाय की बात तो अलग है। इस सन्दर्भ में मुझे तो इतना सा ही कहना है कि वह चाहे किसी भी दल या विचारधारा से जुड़ा हुआ व्यक्ति क्यों न हो। यदि वह किसी जीव की बलि चढ़ाता है, मांस खाता है, मदिरा पीता है, नशा करता है, अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके दूसरे के मन को ठेस पहुंचाता है, भ्रष्टाचार, अनाचार, दुर्व्यवहार, बलात्कार और कोई अन्य असामाजिक कृत्य करता है तो वह हिन्दू हो ही नहीं सकता। शायद इस बात से बहुतों को बुरा भी लगे, क्योंकि आज का अधिकांश हिन्दू समाज इन्ही बुराइयों से बुरी तरह से घिरा हुआ है। “पर हित सरिस धर्म न भाई” की लोक मंगल भावना बहुतायत गायब सी हो रही है।

• संपूर्ण हिंदुत्व को प्रतिस्थापित करना? •

आज हिन्दू समाज को जाति प्रथा, बलि प्रथा, धर्मवाद और आरक्षण व्यवस्था जैसी मुसीबतों से दो-दो हाथ होना बहुत जरूरी है। जातिवाद के नाम पर हिन्दू धर्म को मानने वाले वर्गों में ही संघर्ष है। इस लड़ाई में कई राजनैतिक दल भी आमने सामने है। भीम आर्मी के लोग जहां जाति प्रथा को मनु स्मृति का फैलाया भ्रम समझते हैं तो वहीं अपने आपको उच्च वर्ग समझने वाला हिंदू समाज इस बात को मानने को कतई राजी नहीं है। उच्च वर्गीय कहलाने वाले हिंदू समाज का मानना है कि मनुस्मृति में कहीं भी ऐसा उल्लेख नहीं मिलता कि शुद्र का बेटा शूद्र और ब्राह्मण का बेटा ब्राम्हण ही कहलाएगा। अर्थात वहां कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था का नियम प्रतिपादित किया गया है न कि जातिगत दासता का। उनके अनुसार यह वंशानुगत जातिगत परंपरा हमारे भारतीय संविधान की देन है, जिसमें ब्राह्मण का बेटा ब्राम्हण और शूद्र का बेटा शूद्र कहलाने की संवैधानिक मंजूरी प्रदान करके रखी है। इस सन्दर्भ में वे आरक्षण का भी हवाला देते हैं। इधर जातिगत आधार पर आरक्षण पाने वाले समुदायों के लोग अपना आरक्षण छोड़ने को किसी भी हद तक मंजूर नहीं है। ऐसे में भारतीय समाज से जातिगत भावना को दूर किए बिना संपूर्ण हिंदुत्व को प्रतिस्थापित करना कहीं से भी संभव होता हुआ नजर नहीं आता।

• जातिगत भेदभाव और छुआछूत •

आजादी के 75 वर्ष बीत जाने के बाद भी हमारे भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव और छुआछूत उतने ही मजबूत और दृढ़ है जितने कि वे स्वतंत्रता से पहले थे। इसमें भी अगर गौर से देखें उच्च वर्गीय कहलाने वाले समाज में इस प्रथा में कुछ सुधार जरूर हुए हैं। यहां ब्राह्मण, राजपूत, ठाकुर, राणा, कनैत, राठी, कुम्हार, तरखान आदि जातियों का आपस में एक साथ उठना बैठना और एक दूसरे के साथ मिलकर के खाना-पीना तथा आपस में अपने बेटे – बेटियों के रिश्ते तय करना लगभग शुरू हो चुका है; जो सामाजिक उत्थान की दिशा में एक अच्छा कदम है।

परंतु दूसरी ओर आरक्षण का लाभ लेने वाले निम्न वर्गीय कहलाने वाली जातियों के लोग आपस में यह क्रिया करते हुए नजर नहीं आते। लोहार और कोली, चर्मकार तथा अन्य निम्न जाति के लोग आपस में न ही तो सामाजिक तौर पर इकट्ठे बैठकर के खाना खाते हैं और न ही सामाजिक रिश्तो को निभाने में आपस में रिश्तेदारी करते हैं। सबसे पहले हिंदू और हिंदूवादी संगठनों को भारत से इस जातिवाद के भूत को बाहर फेंकना होगा। उसके साथ – साथ दूसरी सबसे बड़ी चुनौती भारतीय देवी-देवताओं को खुश करने के लिए निरीह पशु – पक्षियों की बलि चढ़ाने की प्रथा को समाप्त करने की है।

क्या यह हिंसात्मक घटनाएं नहीं है? सब जानते हैं कि ये कुप्रथाएं हैं और ये बंद होनी चाहिए। पर बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन? हिंदू धर्म के गैर भाजपाई और गैर स्वयं सेवक संगठन के लोग इन विचारधाराओं से जुड़े हुए हिंदुत्व का पक्षधर बनने वाले लोगों को साफ नसीहत देते हुए नजर आते हैं कि खुद ये लोग सभी प्रकार की हिंसाएं करते हैं और दूसरों को हिंदू बनने की नसीहत देते हैं। आखिरकार इस दोहरे चरित्र से ये लोग कब बाहर आएंगे, जिससे इनकी कथनी और करनी में एकरूपता नजर आए और हिन्दू समाज इनकी विचारधारा पर विश्वाश कर सके ? सवाल यह भी जायज है। यह तो नहीं चलेगा कि औरों को उपदेश और खुद को गोहटे।

⇒ भारत में हिंदुत्व कायम करना है तो…

हिंदूवादी संगठनों को यदि सचमुच भारत में हिंदुत्व कायम करना है तो उन्हें अपनी विचारधारा के साथ-साथ अपने सामाजिक व्यवहार को भी हिंदुत्व के आधार पर ही ढालना होगा। रही बात धर्मवाद की; उसमें तो भारत में असंख्य चुनौतियां हैं। यह ठीक है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है परंतु फिर भी हिंदुत्व की भावना सभी धर्मों से ऊपर उठकर धर्मनिरपेक्ष ही है। यह सच है कि सिख धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म आदि कई धर्म हिंदू धर्म के ही घटक है परंतु यहां भारतीय धार्मिक परंपरा के अनुसार मुस्लिम धर्म को हिंदू धर्म का कट्टर विरोधी धर्म भी माना जाता है। इसके समकक्ष ईसाई धर्म का प्रारूप भी खड़ा कर दिया जाता है। परंतु मैं इस बारे में अपनी राय ऊपर ही स्पष्ट कर चुका हूं कि अहिंसा की भावना से ओतप्रोत हर व्यक्ति मेरी नजर में हिंदू है।

उपरोक्त सभी कारण इस बात की पुष्टि करते हैं कि कुछ लोग मात्र विरोध के लिए विरोध और मात्र पक्ष के लिए पक्ष करते हुए नजर आते हैं, जबकि उन्हें हिंदू और हिंदुत्व की सही-सही समझ है ही नहीं। हालात यहां तक हो गए है कि हिंदू धर्म के ही मानने वाले कुछ राजनैतिक दलों के उच्च पदस्थ नेता हिंदू समाज के ही बीच में शहर ए आम हिंदुत्व को हराने की बात तक कह डालते हैं। आज भारत के लिए सचमुच एक बहुत बड़ी विडंबना है कि जिन पूर्वजों ने हिंदुत्व की भावना को पुष्ट करने के लिए अपनी अस्थियां तक गला दी, उनको आज यह कहकर श्रद्धांजलि दी जा रही है कि हमने हिंदुस्तान में हिंदू बहुल क्षेत्र में हिंदुत्व को परास्त कर दिया है।

• मानव धर्म •

शारीरिक संरचना के आधार पर देखें तो समूचे विश्व के लोग एक जैसी संरचना के आधार पर बने हुए हैं। उनके रंग जरूर अलग-अलग हो सकते हैं परंतु शरीर की बनावट एक जैसी है। उनके जन्मने और मरने का तरीका एक जैसा है। भले ही अंत्येष्टि की क्रिया अलग-अलग हो। उनके रक्त का रंग सबका एक जैसा है, भले ही उनके ग्रुप अलग – अलग हो। इस आधार पर अगर धर्म को परिभाषित करने की कोशिश करें तो कहना न होगा कि कुदरत ने मनुष्य जाति के लिए धरती पर एक ही धर्म प्रतिस्थापित किया है जिसका नाम है मानव धर्म।

• हिंदुत्व का मूल मंत्र •

संरचनात्मक ढांचे के अनुसार कुदरत ने जातियां भी दो ही बनाई हैं, जिनका नाम है नर और नारी। फिर ये बाकी के विवाद क्यों और किस लिए? संसार को सुंदर बनाने के लिए और अधिक सुखदाई बनाने के लिए हमें अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके दूसरे की सुख – शांति में कभी बाधा नहीं पहुंचानी चाहिए। यही हिंदुत्व का मूल मंत्र है।

• चन्द पैसों के लालच में अपना जमीर नहीं बेचना •

पर न जाने आज समाज के हर बुद्धिजीवी वर्ग को और समाज के हर प्रतिष्ठित व्यक्ति को कौन सा नशा लग गया है कि वे अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला दे रहे हैं और जनमानस के एक बड़े भाग की भावना को अपनी आर्थिक समृद्धि या सांस्कृतिक उठापटक के चलते आहत कर रहे हैं। उन्हे यह ध्यान रखना चाहिए कि वे समाज के आदर्श होते हैं। वे यदि समाज में फुहड़ता परोसेंगे तो समाज उनकी नकल करके फुहड़ता का शिकार बनता जाएगा। वे यदि शालीनता पेश करेंगे तो समाज भी शालीन होगा। इसलिए उन्हें बड़ी जिम्मेवारियों के साथ हर भूमिका अदा करनी चाहिए। चन्द पैसों के लालच में अपना जमीर नहीं बेचना चाहिए।

हर नेता – अभिनेता को बड़ी जिम्मेवारी के साथ अपना बयान देना चाहिए। हिंदुस्तान में हिंदुत्व की भावना को हराने की बात करना अपने आप में बहुत बड़ी विडंबना है। इसका सीधा सा अर्थ है हिंदुस्तान में अहिंसात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देना और असामाजिक व्यवस्थाओं को बढ़ावा देना। आज प्रत्येक भारतीय को जाति, धर्म और सम्प्रदाय के झगड़ों से ऊपर उठ कर पूर्ण हिंदुत्व को समझना होगा तथा उपनिवेशवाद की विकृत मानसिकता से बाहर आना होगा। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जिस दिन हम पूरे भारत को मानसिक रूप से विदेशी संस्कृति और सभ्यता का गुलाम बना देंगे।

• शारीरिक गुलामी से कहीं ज्यादा खतरनाक मानसिक गुलामी •

यह विषय भी विचारणीय है कि शारीरिक गुलामी से कहीं ज्यादा खतरनाक मानसिक गुलामी होती है। इस बात के प्रमाण इतिहास में भरे पड़े हैं कि संस्कृति और सभ्यताएं कई बार विकृत मानसिकता की शिकार हो चुकी है। उदाहरण के लिए पारसी धर्म है, जो आज लगभग अपने ही जन्म स्थल देश में समाप्त सा हो चुका है। हां भारत ही एक ऐसा देश है, जहां उसके भी कुछ अंश शेष है। यही है हिंदुत्व के समर्थक हिन्दुस्तान का हिन्दू जनमानस। जो सब धर्मों का सम्मान करता है पर शर्त यह है कि वे दूसरे धर्मों के मतावलंबी भी किसी दूसरे धर्म के भाव बोध को जाने – अनजाने में ठेस पहुंचाने की कोशिश न करें।

जबकि आज के दौर में यही सब जान बूझ कर हो रहा है। भारत में दक्षिण और वाम पंथ की लड़ाई अधिकतर इन्ही वैचारिक संघर्षों के धरातल पर निरन्तर जारी है। आज लोग अपनी मानवीय संवेदनाओं को खोते जा रहे हैं। हमे निर्भया हत्या काण्ड के दौरान हुए राष्ट्रव्यापी आंदोलनों का दृश्य और भाव भी याद है तथा आज श्रद्धा और उसके जैसी कई और निर्मम हत्याओं के मामले भी याद है। पर यह साफ – साफ देखा जा सकता है कि धीरे – धीरे देश के लोगों की मानसिक भावनाएं व संवेदनाएं निरन्तर पतन की ओर जा रही है।

निर्भया के दौर का जन भाव आज श्रद्धा के मामले तक फीका पड़ गया। ऐसा नहीं है कि सब कुछ खत्म ही हो गया है। पर यह सत्य है कि लोग व्यवस्था की चक्की में पिस कर ज्यादा चिकने हो गए हैं। या शायद उन्हे यह ज्ञान हो गया हो कि व्यवस्था का विरोध करने से कुछ नहीं होगा क्योंकि यहां सुनता ही कोई नहीं है। यहां तो हकीकत यह हो गई है कि जिसकी चलती है तो उसकी क्या गलती है?

उदाहरण के लिए हाल ही में विवादों में घिरी पठान फिल्म के गाने को ही ले लो। एक पक्ष उसे ठीक ठहरा रहा है और दूसरा गलत। जबकि दोनों पक्षों में वाद विवाद करने वाले अधिकतर हिन्दू ही है। जबकि असलियत तो यह है कि इस तरह के अश्लील चलचित्रों को स्क्रीन पर प्रदर्शित करने से रोकने के लिए तो सभी धर्मों के लोगों को एक जुट होकर सामने आना चाहिए। इस प्रकार की अर्धनग्नता भरी सभ्यता समाज में परोसना नीरी पाश्विकता परोसना है। यह पाश्विकता न ही तो हिन्दू धर्म वालों की सामाजिकता के लिए ठीक है और न ही तो मुस्लिम धर्म के लोगों की सामाजिकता के लिए।

इतना ही नहीं किसी भी धर्म की सामाजिकता के लिए ऐसी पाश्विकता बिल्कुल भी सुसभ्य नहीं है। ऐसी घटनाएं चाहे जान बूझ कर कोई करे चाहे अनजाने में। उसका सार्वजनिक विरोध होना चाहिए। फिर वह किसी भी धर्म का हो या फिर किसी भी समुदाय का। यह फूहड़ मानसिकता समाज के लिए किसी भी सूरत में ठीक नहीं है। ऐसे उचाटन भरे फिल्मी दृश्य तथा नशीले पदार्थों के सेवन समाज को मानसिक तौर पर अपाहिज बना कर छोड़ेंगे।

शायद इससे बड़ी कोई और हिंसा, मानसिक हानि हो ही नहीं सकती। फिर भी किसी को अपनी ही बात को सही ठहराना हो तथा अपनी रोजी के चक्कर में समाज के पतन को नजरंदाज करना हो, तो उसका कोई इलाज नहीं है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

Must Read : क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है?

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — मेरे मत के अनुसार यदि हिन्दू शब्द को भाषिक संरचना के आधार पर परिभाषित किया जाए तो हिन्दू शब्द “हिं + दू” के मेल से बना है। इसमें “हिं” का अर्थ हिंसा और “दू” का अर्थ दूर होता है। अर्थात ऐसा व्यक्ति/समुदाय/समाज जो हिंसा से दूर रहता हो, वह हिन्दू है। अगर धर्म को परिभाषित करने की कोशिश करें तो कहना न होगा कि कुदरत ने मनुष्य जाति के लिए धरती पर एक ही धर्म प्रतिस्थापित किया है जिसका नाम है मानव धर्म। संरचनात्मक ढांचे के अनुसार कुदरत ने जातियां भी दो ही बनाई हैं, जिनका नाम है नर और नारी। फिर ये बाकी के विवाद क्यों और किस लिए? संसार को सुंदर बनाने के लिए और अधिक सुखदाई बनाने के लिए हमें अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके दूसरे की सुख – शांति में कभी बाधा नहीं पहुंचानी चाहिए। यही हिंदुत्व का मूल मंत्र है। अश्लील चलचित्रों को स्क्रीन पर प्रदर्शित करने से रोकने के लिए तो सभी धर्मों के लोगों को एक जुट होकर सामने आना चाहिए। इस प्रकार की अर्धनग्नता भरी सभ्यता समाज में परोसना नीरी पाश्विकता परोसना है। यह पाश्विकता न ही तो हिन्दू धर्म वालों की सामाजिकता के लिए ठीक है और न ही तो मुस्लिम धर्म के लोगों की सामाजिकता के लिए।

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यह लेख (हिन्दू और हिंदुत्व – एक समीक्षा।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है? ♦

समाज की युवा पीढ़ी यह जरूर पढ़े: —

प्रिय मित्रो हिंदुस्तान के माथे पर आज एक और कलंक आफताब और श्रद्धा की लिव इन रिलेशनशिप की कहानी के दर्दनाक अन्त से लगा है। साथियों आज के इस अंध आधुनिकता के दौर में हमारी युवा पीढ़ी पश्चिम की अति स्वतंत्रय प्रिय सभ्यता को अपनाने में उतारू है और उसी पागलपन के नशे में हमारे बच्चे विपरीत लैंगिक होते हुए भी लीव इन रिलेशनशिप के नाम पर बिना विवाह किए ही पति – पत्नी की तरह इकट्ठा रहने लगे हैं। एक तो यह परम्परा भारतीय परिवारवाद और समाजवाद की दृष्टि में पहले ही भद्दा एवम भुंडा कर्म है। ऐसी वृति को हमारे यहां पशु वृति की संज्ञा शास्त्रों में दी गई है।

उसके बावजूद भी यदि पश्चिमी सभ्यता के अंधा अनुकरण में नई पीढ़ी इस व्यवस्था में दैहिक विपासा के कारण रहना ही चाहती है और यह पीढ़ी इस व्यवहार को कोई पाश्विकता नहीं मानती बल्कि पश्चिमी देशों के कानून की तर्ज पर इसे अपना कानूनी अधिकार समझती है तो इसमें समाज उनकी दुर्दशा के लिए कहां तक जिम्मेदार है? खैर यह घटना आज जिरह की नहीं है बल्कि दिल को दहला देने वाली है। इस पर हर किसी को आफताब की करतूत पर गुस्सा आ रहा है और आना भी चाहिए। यह श्रद्धा की विकट मौत का ही वाक्य नहीं है बल्कि हिंदुस्तान की हर जाति, धर्म और सम्प्रदाय की नौजवान बहु – बेटियों की सुरक्षा का सवाल है।

पर बड़े दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि आखिर क्या जरूरत है बिना शादी के लड़का – लड़की को सांसारिक व्यवहार में रहने की? हमारी भारतीय संस्कृति की व्यवस्था के मुताबिक 25 वर्ष तक का समय पढ़ने – लिखने का है और उस बीच दो लड़का – लड़की में प्रेम भी हो जाता है तो कोई गुनाह नहीं है। शर्त यह है कि वह प्रेमी जोड़ा विवाह पूर्व शारीरिक संबंध स्थापित न करें। हमारी संस्कृति के नौजवान अधिकांश भले ही सामाजिक लाज लपेट के चलते ही सही; इस नियम का पालन भी करते आए हैं। उसके पश्चात विवाह घर वालों की सहमति से करते हैं और सांसारिक जीवन का आनंद लेते हैं।

हमारी संस्कृति में बेटी जब एक बार ससुराल जाती थी तो उसे शिक्षा दी जाती थी कि कभी ससुराल को छोड़ कर वापिस पीहर मत आना। वह बेटी भी उसी शिक्षा का पालन करती थी। युग बदला परिस्थितियां बदली। अंग्रेज भारत में आए, उन्होंने भारतीय सामाजिक और वैवाहिक जीवन के ढर्रे को बदलने में अहम भूमिका निभाई। लोग दैहिक सुख को व्यक्तिक अधिकार समझने लगे। बड़े – बड़े घरानों के लोग इस बात को कोई बेगैरत नहीं बल्कि रईसी रसूख समझने लगे।

हमारी माताएं बहनें औरत/देवी से मैडम के पद पर पदच्युत हुई। उसी बीच बेदवा यानी डाइवर्स ने भी भारत में प्रवेश किया। हां तलाख तो मुगल काल में ही आ गया था पर भारत में डाइवर्स अंग्रेजों की देन हैं। क्योंकि यह पश्चिम की रीत थी। “वहां अत्यधिक स्वातंत्र्य के चलते शादी ज्यादा दिनों तक टिकती ही नहीं थी। यदि किसी की साल भर टिक गई तो सालगिरह मनाई जाती थी और 25 साल टिकी तो सिलवर जुबली मनाई जाती थी। यूं ही गोल्डन जुबली आदि। पर यह मौका पश्चिम में बहुत कम लोगों को मिलता था। भारत में ये कोई भी प्रक्रम मौजूद नहीं थे। यहां शादी का नाम एक वचन था, जिसे एक पवित्र रिश्ता एवम जीवन यज्ञ समझा जाता था। हम इसे जीवनपर्यंत हर हाल में निभाते थे। बाहरी संस्कृतियों के संक्रमण ने हमारी संस्कृति और समाज का तरीका बदला। हम पश्चिम का अनुकरण करने लगे और आज तलाक, डाइवर्स, सालगिरह आदि रस्मे हमारे समाज में आम प्रक्रियाएं हो गई है।”

खैर यह एक चर्चा का विषय था। पर मेन मुद्दा श्रद्धा की लाश को 35 टुकड़ों में काट कर अलग – अलग स्थलों में ले जा कर सबूतों को जड़ से मिटाने का तथा उस नव युवती की बेरहमी से की गई हत्या का है। प्रिय मित्रो आज भले ही हमारे देश के कई विद्वान और व्यक्तिक स्वातंत्र्य के प्रेमी लिव इन रिलेशनशिप के मुद्दे पर कड़ा कानून बनाने की बात कर रहे हो। पर मेरे विचार से लिव इन रिलेशनशिप जैसे कानून को भारत में कोई जगह नहीं दी जानी चाहिए।

क्योंकि हमारी सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था इतनी मजबूत और पवित्र है कि उसमें दम्पति से ले कर बच्चे और बूढ़े तक सुरक्षित है। यदि लिव इन रिलेशनशिप का कानून भारत में स्थान प्राप्त करता है तो भारतीय समाज हवस का शिकार हो जाएगा। न ही तो रिश्तों नातों की अहमियत रहेगी और न ही नारी जाति का सम्मान रहेगा।भविष्य की नई पीढ़ी और वृद्ध लोग असहज और असुरक्षित होंगे तथा इस प्रकार की श्रद्धा की कहानी जैसी कई घटनाएं सामने आएगी। इसमें मात्र लड़कियां ही घटना की शिकार नहीं होगी बल्कि लड़के भी इस लिव इन रिलेशनशिप के चंगुल में फंस कर शिकार होंगे।

यह हम सभी जानते हैं कि एक वक्त के बाद अक्सर हम स्त्री – पुरुष, पति- पत्नी व्यवहार में रह कर एक दूसरे से ऊब ही जाते हैं। वह तो हम लोक लाज और बच्चों की वजह से ताउम्र पति – पत्नी हो कर जिन्दगी भर साथ रह लेते हैं और रहना भी चाहिए। यदि लिव इन रिलेशनशिप हमारे समाज पर हावी हुआ तो महिलाओं का और बच्चों का घणा शोषण होगा। वह कैसे और क्यों? इसका जबाव समाज स्वयं जानता है। अधिकतर लोग विवाह से पूर्व ही दैहिक भोग को भोग कर एक दूसरे से ऊब कर किनारा कर लेंगे और यह सिलसिला समाज में आम हो जाएगा। नए – नए साथी के साथ रहने का शौक स्त्री पुरुष दोनों में जन्मेगा और सामाजिक ढांचा विकृत हो जाएगा। चरित्र नाम की बात बेईमानी हो जाएगी। बाकी सभी की अपनी – अपनी सोच है।

अब सवाल उठाते हैं कि :—

  1. क्या भारत में संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की शिक्षा स्कूलों में शुरू नहीं करनी चाहिए?
  2. क्या यह भारत की अति सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता का परिणाम है?
  3. क्या यह घटना लव जिहाद का मामला है?
  4. क्या भारत में डेटिंग एप जैसे समाज विरोधी सोशल मीडिया पर बैन लगाना चाहिए?
  5. क्या यह घटना हिन्दू – मुस्लिम भाईचारे और प्यार पर कलंक नहीं है?
  6. क्या लव जेहाद और धर्म परिवर्तन भारतीय समाज में राष्ट्र द्रोह के समक्ष जुर्म नहीं है?
  7. क्या एक देश एक विधान जरूरी नहीं है?
  8. क्या स्कूली पाठ्यक्रम में धार्मिक और सांस्कृतिक विषयवस्तु के साथ – साथ सभी धर्मों के सार तत्व मानवीय मूल्यों की शिक्षण सामग्री डलवाना जरूरी नहीं है?
  9. क्या इस्लामिक शिक्षा पद्धति के संस्थानों “मदरसों” को औपचारिक शिक्षा व्यवस्था से बाहर करके उन सभी मुस्लिम बच्चों को भी सामान्य भारतीय शिक्षा व्यवस्था के आम संस्थानों यानी सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाना चाहिए? आखिर मदरसों की क्या जरूरत है?
  10. क्या निजी शिक्षण संस्थानों को बन्द करके सरकारी शिक्षण संस्थानों को और उन्नत कर के, उनमें संस्कारवान अध्यापक, अध्यापिकाओं की भर्ती कर एक देश एक शिक्षा व्यवस्था और एक ही पाठ्यक्रम की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?
  11. क्या अध्यापक भर्ती का पैरामीटर लिखित, मौखिक परीक्षाओं से हट कर उसकी जगह चारित्रिक आंकलन पर आधारित नहीं होना चाहिए? अध्यापक बनने वाले प्रार्थी का खानपान, रहन सहन, पहनावा, बातचीत, सेवा, सत्कार, संयम, साधना,
    त्याग, समाज और राष्ट्र के प्रति सोच और निस्वर्थता, ईमानदारी, शालीनता, गुरुत्व व गंभीरतव आदि पहलू चैक नहीं होने चाहिए क्या? मात्र सैलरी के लिए शिक्षक का कार्य करने वाला शिक्षक शिक्षिका क्या उचित शिक्षक हो सकते हैं क्या?
  12. स्कूली बच्चों को स्कूलों में अध्यापक द्वारा संस्कार स्थापित करने के लिए आंशिक डांट – फटकार और सजा देने का कानूनन प्रावधान नहीं होना चाहिए क्या?
  13. अत्यधिक स्वातंत्र्य शिक्षार्थी जीवन में ठीक है क्या?
  14. माता – पिता और अभिभावकों को भी कमाई से ज्यादा फिक्र अपने बच्चों के संस्कारों की नहीं करनी चाहिए क्या? जो हम उन्हे आवारा छोड़ देते हैं और सारा ठीकरा अध्यापक के सिर पर फोड़ते है, वह ठीक है क्या?
  15. क्या एक अध्यापक को भी अपने छात्र और छात्राओं के प्रति उतने ही चिन्तित और संवेदनशील नहीं होना चाहिए, जितना कि वह अपने बच्चों के प्रति होता है?
  16. क्या महिलाओं की निर्मम हत्या सिर्फ मुस्लिम समुदाय के पुरुष ही करते हैं या बाकी धर्मों ( हिन्दू धर्म, सिख धर्म और ईसाई आदि) के पुरुष भी करते हैं? और भी बहुत कुछ। पर कितना लिखे?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — “वहां अत्यधिक स्वातंत्र्य के चलते शादी ज्यादा दिनों तक टिकती ही नहीं थी। यदि किसी की साल भर टिक गई तो सालगिरह मनाई जाती थी और 25 साल टिकी तो सिलवर जुबली मनाई जाती थी। यूं ही गोल्डन जुबली आदि। पर यह मौका पश्चिम में बहुत कम लोगों को मिलता था। भारत में ये कोई भी प्रक्रम मौजूद नहीं थे। यहां शादी का नाम एक वचन था, जिसे एक पवित्र रिश्ता एवम जीवन यज्ञ समझा जाता था। हम इसे जीवनपर्यंत हर हाल में निभाते थे। बाहरी संस्कृतियों के संक्रमण ने हमारी संस्कृति और समाज का तरीका बदला। हम पश्चिम का अनुकरण करने लगे और आज तलाक, डाइवर्स, सालगिरह आदि रस्मे हमारे समाज में आम प्रक्रियाएं हो गई है।”

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यह कविता (क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी। ♦

गुलामी की जंजीरों से मुक्ति का संघर्ष लगभग विश्व के अधिकतर देश समय – समय पर अपने – अपने ढंग से करते आए हैं और उसी कड़ी में एक नाम हमारे भारत देश का भी है। भारत वर्ष के इतिहास की एक समृद्ध कहानी है। जहां यह देश विभिन्न आतताइयों से अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा के लिए निरन्तर कडा संघर्ष करता रहा, वहीं इसे एक लम्बे दौर तक व्यापार के बहाने हिन्दुस्तान के शासक बन बैठे अंग्रेजों की गुलामी का भी शिकार होना पड़ा।

भारतीय जातिवाद, धर्मवाद और साम्राज्यवाद को उकसा – उकसा कर अंग्रेजों ने सत्ताधीशों के साथ – साथ आम जनता को भी आपस में लड़वा – भिड़वा कर फूट डालो और शासन करो की नीति का सहारा लेकर पूरे भारत वर्ष पर धीरे – धीरे अधिकार प्राप्त किया।

अब वे व्यापारी से यहां के सरकारी हुक्काम बन बैठे। जब भारत के रियासती शासक वर्ग के साथ – साथ आम जनता को भी अंग्रेजी चाल का पता चला कि ये तो हमे उकसाने का और लड़ाने का काम कर रहे हैं और अपना सम्राज्य स्थापित कर रहे हैं, तो तब अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति पाने के लिए भारतीय शासक वर्ग के साथ – साथ आम जनता के जागरूक तबके ने भी आजादी की जंग मिलकर अंग्रेजी शासन व्यवस्था के खिलाफ छेड़ दी।

फिर वह चाहे 1857के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की बात हो या फिर असेंबली हाल के बम्ब विस्फोट की घटना। चाहे फिर आजाद हिन्द फौज की स्थापना की बात हो या फिर भारत छोड़ो आंदोलन की मुहिम। इन सभी प्रक्रियाओं में एक लम्बा वक्त जरूर लगा पर यह भी सत्य है कि यही वे घटनाक्रम थे, जिनकी बदौलत आज हम स्वतंत्र भारत में जी रहे हैं और “आजादी का अमृत महोत्सव” उत्सव मना रहे हैं।

यह भी सच है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इस महा अभियान में गर्म दल और नर्म दल दोनों ने अपनी – अपनी भूमिकाएं अपने – अपने तरीके से निभाई। पर न जाने आज “आजादी के 75साल” बीत जाने के बाद हम क्यों उन तमाम वीर शहीद बहादुरों को भूल से जा रहे हैं, जिन्होंने हमे यह आजादी की सौगात दिलाने में अंग्रेजी हुकूमत की कड़ी यातनाओं के साथ – साथ अपने प्राणों की आहुति भी खुशी – खुशी दी। यदि आज हम औपचारिकता के तौर पर विशेष अवसरों के मौकों पर चन्द स्वतंत्रता सेनानियों को और आजादी के प्रमुख नेताओं को याद करते भी हैं तो उसमें भी एक अधूरा सा पन मुझे नजर आता है।

मैं सोचता हूं कि क्या मात्र इन चन्द कद्दावर नेताओं या स्वतंत्रता सेनानियों ने ही भारत को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाई? यदि ऐसा ही था तो फिर भारत इतने लम्बे दौर तक गुलाम क्यों रहा? क्यों फिर रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व वाले आंदोलन के दौरान ही भारत आजाद नहीं हुआ? ऐसे अनगिनत सवाल बुद्धि के विवेक कक्ष में उठते हैं और दौड़ते रहते हैं।

यह सभी जानते हैं कि अकेला चना भाड़(पहाड़) नहीं फोड़ता। पर फिर भी पूरी मुहिम का अधिकाश श्रेय उस मुहिम के मुख्य पत्र को जाता है और जाना भी चाहिए, क्योंकि उसने उस मुहिम को शुरू किया होता है तथा बाकियों को चेतना दे कर उस मुहिम में शामिल किया होता है। परन्तु मेरे मन में फिर से एक प्रश्न कौंधता है कि ठीक है, मुख्य पत्र को श्रेय दो। परन्तु उस मुहिम को सफल बनाने में अपना योगदान देने वाले अनेकों साथियों को भी तो उस सन्दर्भ में याद किया जाना चाहिए, जिन्होंने उस मुहिम को कामयाब बनाया होता है। पर नहीं, यह एक परिपाटी सी बन गई है और निरन्तर चली आ रही है कि मुख्य पात्र को ही याद किया जाता है और बाकियों को समय के गहवर में बिसार दिया जाता है।

कुछ ऐसा ही आजादी के आंदोलन की घटना में भी देखने को मिलता है। जो लोग इस मुहिम के नायक थे या यूं कहो कि रसूखदार व्यक्तित्व थे, उन्हे तो आज भी हम याद करते हैं और उनके नाम के कसीदे गढ़ते हैं। पर जिन्होंने जमीनी स्तर पर इस पूरे घटनाक्रम को गति दी और अंजाम दिया, उन्हे इतिहास के पन्नों में स्थान तक नहीं दिया गया।

यह बात ठीक है कि प्रभावशाली व्यक्तित्वों का जिक्र विशेष रूप से होना चाहिए।परन्तु इसका मतलब यह कतई नहीं है कि फिर बाकियों को बिल्कुल भूल ही जाएं।यह तो उनके साथ न्याय नहीं है और इसके साथ – साथ यह रवैया नई पीढ़ी में भी नकारात्मकता भरता है कि “करता कोई और है और वाहवाही किसी और को ही मिलती है।” मेरा मानना है कि जिसका जो मान – सम्मान बनता है, वह उसे मिलना चाहिए। तभी किसी कार्य या बात का उत्कर्ष बना रहता है। वरना नकारात्मकता स्वभाविक है।

आज आजादी के अमृत महोत्सव के सुअवसर पर यह बात मैं इसलिए कर रहा हूं कि हम सब मिलकर इस बात का मन्थन करे कि इस आजादी को दिलाने में अपना योगदान और बलिदान देने वाले ऐसे कितने स्वतंत्रता सेनानी थे, जो हमारे क्षेत्र या जिले के थे पर इतिहास के पन्नों में उनका नाम न होने के कारण आज समाज उन्हें और उनके बलिदानों को थोड़ा सा भी नहीं जानता। यदि थोड़ा बहुत कुछ कोई जानता भी है तो वह भी गौण है।

मेरे जिला मण्डी हिमाचल प्रदेश से ऐसे कई नाम हैं, जिन्होंने इस लड़ाई में अपना योगदान तो दिया पर उन्हें इतिहास में या लोक साहित्य में वह स्थान नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिए था। हां कृष्ण कुमार नूतन और डा गंगा राम राजी ने अपने साहित्य में कुछ – कुछ जिक्र इन स्वतंत्रता सेनानियों का जरूर किया है पर उससे शायद इन्हें वह सम्मान मिला हो, जिसके ये हकदार हैं। इन स्वतंत्रता सेनानियों में कुछ की जानकारी जो मैं जुटा पाया हूं, कुछ यूं है :—

• रानी खैरागढ़ी उर्फ रानी ललिता कुमारी •

रानी खैरागढ़ी का नाम जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानियों में अग्रगण्य है। असल में इनका नाम रानी ललिता कुमारी था। परन्तु इनका पैतृक घर खैरागढ़ उत्तर प्रदेश में था, जहां से इनका विवाह जिला मण्डी के प्रथम पढ़े लिखे राजा भवानी सेन से हुआ था। शायद तत्कालीन पहाड़ी रिवायत के चलते मण्डी जनपद के लोगों ने रानी का नाम उनके मायके के नाम के आधार पर खैरीगढ़ी रख दिया हो। क्योंकि पहाड़ों में उस दौर औरतों को उनके असली नाम से हट कर उनके पैतृक गांव के आधार पर रखे नाम से ही पुकारा जाता था। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि रानी के राष्ट्र प्रेम से प्रभावित होकर जनता उन्हे प्यार से रानी खैरीगढी कहते और यही नाम मशूहर हो गया। जबकि रानी के पिता के गांव का नाम खैरागढ़ था तो उस आधार से नाम तो खैरागढी बनता था। पर जनता ने खैरीगढ़ी रख दिया तो वही प्रसिद्ध हुआ।

जानकारों की माने तो राजा भवानी सेन मण्डी का पहला पढ़ा लिखा राजा हुआ। इस कारण उनके लिए एक पढ़ी लिखी रानी के रिश्ते की तलाश की गई। चारों ओर जब खोजबीन शुरू हुई तो एक उचित रिश्ता खैरागढ़ उत्तर प्रदेश में जा कर रानी ललिता कुमारी का मिला। राजा की रानी से शादी हो गई। उत्तर प्रदेश में उन दिनों अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावतें चर्म पर थी। तो जाहिर है कि कुमारी ललिता भी पढ़ी लिखी सजग नारी होने के नाते उन बगावती सुरों में ताल देने में अहम किरदार रही होगी। रानी का यह चस्का विवाह के बाद भी कम नहीं हुआ। जब उसने देखा की मण्डी रियासत की जनता के साथ न्याय नहीं हो रहा है। वे अंग्रेजी शासन व्यवस्था के चंगुल में कोल्हू के बैल की तरह परेशान है और राजा तथा राजा के मंत्री भी जनता का शोषण ही कर रहे हैं।

उन्हे जनता के सुख – दुःख की चिन्ता ही नहीं है और राजा जनता से कट कर अपने ही रसूख में जी रहा है। तब रानी ने जनकल्याण और देश प्रेम की भावना राज्य की जनता में भरना शुरू की। यह खबर राजा को अंग्रेजों ने और राजा के चाटुकार मंत्रियों ने गुप्त रूप से देना शुरू कर दी थी और राजा को रानी के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया था। राजा मंत्रियों और अंग्रेजों की बातों में आ कर रानी से विमुख होता रहा। नौबत यहां तक आ गई कि रानी को राजा के प्रेम से वंचित रहना पड़ा। परन्तु रानी ने हार नहीं मानी। वह जनता की सेवा में लगी रही और उनमें राष्ट्र प्रेम की आग जलाती रही। जब रानी को लगा कि राजा उसकी बाते नहीं मानेगा तो वह स्वयं राज्य का कामकाज देखने लगी। परन्तु वहां भी मंत्रियों ने रानी के आदेशों की पालना को नकारना शुरू किया।

तब रानी को लगा कि व्यक्तिगत सुखों से कहीं ज्यादा बड़ा सुख जन सामूहिक सुख है। एक राज घराने का प्रमुख कर्तव्य भी वही होता है। रानी की यह सोच उसके अविवाहित जीवन के बगावती तेवरों को और ताव देती है तथा रानी इस पहाड़ी रियासत में आजादी के आंदोलन की प्रमुख पैरोकार बनी। अब उसे अपने जैसे कुछ और ऐसे सरफीरों की तलाश थी, जिनके भीतर भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ रानी की ही तरह बगावती आग जल रही थी। इतना ही नहीं, कुछ जानकारों का तो कहना है कि परिस्थितियां तो यहां तक बिगड़ गई थी कि रानी को इस सन्दर्भ में राजा भवानी सेन से भी दो – दो हाथ करने पड़े थे। यानी पहाड़ी रियासतों में रानी खैरागड़ी ने झांसी की रानी की भूमिका निभाई।

• भाई हिरदा राम •

इनका नाम मण्डी रियासत के क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों में प्रमुखता से लिया जाता है। इनका जन्म 28 नवम्बर 1885 को मण्डी शहर में श्री गज्जन सिंह जी के घर हुआ था। लोगों में इनको भाई के नाम से प्रसिद्धी मिली थी। स्वामी कृष्णानंद जी से प्रेरणा ले कर ये क्रांति पथ पर चल पड़े थे। सन 1914 में ये अमृतसर में रासबिहारी बोस, डा• मथरा सिंह, भाई परमानंद तथा पिंगले आदि क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आए। धीरे – धीरे ये रासबिहारी बोस के विश्वास पात्र बने।

31 दिसम्बर 1914 की विरपाली धर्मशाला में हुई क्रांतिकारियों की गुप्त बैठक में इन्हें बंब बनाने का काम दिया गया। यह बात भी खासी चर्चा में है कि भगत सिंह जी ने जो बंब असैम्बली हाल में फैंका था, वह भाई हिरदा राम ने बनाया था। इन्हे इस संघर्ष में अंग्रेजी सरकार द्वारा असैम्बली बंब धमाके की साजिश में पकड़े जाने पर फांसी की सजा सुनाई गई, परन्तु बाद में वह सजा आजीवन कारावास की सजा में बदली गई। आजीवन कारावास की सजा पाने के लिए इन्हें काला पानी यानी अंडोमान की जेल में भेजा गया। वहां पर वीर सावरकर और भाई हिरदा राम एक ही कोठरी में रखे गए थे।

सन 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो भाई जी को जेल से मुक्ति मिली। इस तरह अपने जीवन को राष्ट्र सेवा में समर्पित करते हुए 21अगस्त 1965 ई० को भाई जी पंच तत्त्व में विलीन हो गए। इनकी यादगार में आज मण्डी शहर के बीचो बीच बनी इन्दिरा मार्केट में एक प्रतिमा बनाई गई है, जिसका अनावरण 21अगस्त 2002 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल जी ने तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री भारत सरकार एवम पूर्व मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश श्री शांता कुमार जी के साथ मिल कर किया था। इस अवसर पर सांसद सुरेश चंदेल, महेश्वर सिंह और अनिल शर्मा जी भी मौजूद रहे।

• कृष्णा नन्द स्वामी •

स्वामी जी मण्डी शहर के निवासी थे। इनके स्वतंत्रता आन्दोलन का क्षेत्र सिंध प्रांत रहा। इनकी सारी गतिविधियां सिंध से ही चलती थी। स्वामी जी ने 35 वर्षों के अपने स्वतंत्रता संघर्ष में कई बार जेल की सजा भुगती। यही वे कारण थे, जिनके चलते सरदार पटेल ने इन्हे सिंध के गांधी की उपाधि दी थी। इन्होंने दो लाख से भी अधिक हिंदुओं को समुद्र के रास्ते सिंध से मुम्बई और अहमदाबाद पहुंचाया था।

इनकी जेल यातनाओं में 1921-22 में पिकेटिंग के लिए धारा 132 के अधीन एक वर्ष का कारावास, खुलेआम भाषण के लिए धारा 108 सी.पी. सी. के अधीन अक्टूबर 1922 से सितम्बर 1923 तक एक वर्ष का कारावास, सी. पी. सी.की धारा 177 के तहत 1930 से 1931 तक एक वर्ष का कारावास, 1932 से 1934 तक दो साल का कारावास तथा भारत छोड़ो आन्दोलन में 1942 से1945 तक तीन साल का कारावास गिना जाता है। भाई हिरदा राम जी ने भी स्वामी जी से ही क्रान्ति की प्रेरणा पाई थी।

• अर्जुन सिंह राणा •

अर्जुन सिंह राणा जी का जन्म 30 मई 1920 को जिला मंडी के नेरचौक नामक स्थान में हुआ। राणा जी एक पढ़े – लिखे व्यक्ति थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में बढ़-चढ़कर के भाग लिया। 1942 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज की स्थापना की थी, उस फौज में राणा जी ने कैप्टन के पद पर अपनी सेवाएं दी थी। राणा जी ने एक वर्ष तक का कारावास भी भोगा। इनका संबंध हिमाचल प्रदेश स्वतंत्रता सेनानी संगठन से भी रहा।

• केशव चंद्र शर्मा •

केशव चन्द्र शर्मा जी जिला मण्डी के रिवालसर नामक स्थान में रियूर नामक ग्राम के निवासी थे। 1944 में शर्मा जी प्रजामंडल की गतिविधियों में शामिल हुए थे। इतना ही नहीं ये नौकरी करते थे परंतु आंदोलन का सहयोग करने के लिए इन्होंने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। रियासती विलय आंदोलन में शर्मा जी ने भी भरपूर संघर्ष किया था। शर्मा जी ने 4 माह 10 दिन तक मंडी जेल में सजा भी काटी थी।

• खेम चंद •

खेम चंद जी का जन्म लगभग 1904 ई० के आस पास हुआ माना जाता है। इनके पिता का नाम श्री बृज लाल था। इनका जन्म स्थान जिला मंडी के मंडी शहर में भूतनाथ नामक स्थान पर हुआ था। इन्होंने अपने पिता के साथ जलावतन रहने से देशभक्ति की भावना प्राप्त की थी। मंडी राज्य में प्रजामंडल आंदोलन में खेम चंद जी ने अपनी सक्रिय भूमिका अदा की थी। इस दौरान इन्हें मुंशी की नौकरी से भी निष्कासित कर दिया गया था। सन 1936 – 37 में खेम चंद जी ने मंडी सत्याग्रह में भी अपनी भागीदारी प्रदान करके आजादी के संघर्ष में अपना योगदान दिया था।खेम चंद जी का स्वर्गवास 3 जुलाई 1982 ई० को हुआ।

• गुलजारी राम •

गुलजारी राम जी का जन्म 10 अगस्त 1915 ई० में जिला मंडी के सरका घाट इलाके में भदरोट नामक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री टोडर था। आजाद हिंद फौज में इन्होंने बतौर सैनिक काम किया। गुलजारी राम जी दिसंबर 1940 से मई 1946 तक सिंगापुर, रंगून और मलाया आदि स्थानों में लंबे कारावास में भी रहे। इन्हें बिना वेतन के निष्कासित कर दिया गया था और पांच वर्ष तक युद्ध बंदी बनाकर इन्हें कठिन से भी कठिन यातनाएं दी गई थी।

• गौरी प्रसाद •

गौरी प्रसाद जी का जन्म 18 अक्टूबर 1918 ई० को जिला मंडी के नेरचौक नामक स्थान पर हुआ था। प्रसाद जी लाहौर से मेडिसिन में डिग्री लेकर आए थे। उन दिनों लाहौर स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन चुका था इसलिए प्रसाद जी ने वहीं से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने की प्रेरणा प्राप्त की थी।

इस आंदोलन में कूदकर गौरी प्रसाद जी ने अपना बढ़-चढ़कर योगदान दिया। जब वहां से लौटकर वे मंडी आए तो उन्होंने 1940 में मंडी प्रजामंडल में प्रवेश किया। 1940 से लेकर 1947 ई॰ तक प्रजामंडल के प्रधान रहे। इसी दौरान उन्हें 6 मार्च की जेल की सजा भी खानी पड़ी थी। सन 1951 में प्रसाद जी को विधानसभा का सदस्य चुना गया था। प्रसाद जी का योगदान अनेक संस्थानों एवं गतिविधियों में निरंतर रहता था।

• जे पी बागी •

बागी जी का जन्म 15 जुलाई 1908 ई० को स्कूल बाजार जिला मंडी में हुआ माना जाता है। अंग्रेजो के खिलाफ हमेशा बगावती तेवर रखने वाले जे पी बागी को यह बागी नाम इसी कारण प्राप्त हुआ था। 1928 से 1934 तक लाहौर जेल में लाहौर षड्यंत्र के जुर्म में उन्हे 6 साल तक के कारावास की सजा भी हुई थी। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और 1947 तक 2 वर्ष 6 माह कारावास में रहे। कुल साढ़े ग्यारह वर्ष तक जेल यात्रा में रहे। भारत सरकार ने इन्हें ताम्रपत्र से सम्मानित किया था।

• नरेंद्र पाल जोशी •

नरेंद्र जी जिला मंडी के लूनापानी के निवासी थे। 15 मई 1892 में उनका जन्म हुआ था। इन्होंने 1912 में एक अंग्रेज की हत्या की थी। यही इनका स्वाधीनता संग्राम में प्रवेश होने का प्रथम सोपान था। इन्होंने शादी नहीं की थी। 1918 में सूरत के जंगलों में पुलिस मुठभेड़ में इन्हें गोली लगी थी। जलियावाला बाग कांड के बाद अंग्रेजों का विरोध करते हुए पकड़े गए और पांच साल तक जेल में ही रहे। 1942 में जब जेल से रिहाई हुई तो पुनः संघर्ष में जुट गए। रावलपिंडी बम विस्फोट में 3 वर्ष का कारावास हुआ। 1928 में अंग्रेजों ने इन्हे पुनः गिरफ्तार कर लिया। 1932 में हिसार में 1 वर्ष का कारावास और काटा। सन 1934 में पुनः 3 वर्ष की सजा हुई। 1936 के बाद आर्य प्रतिनिधि सभा में कार्य कियाl इसके बाद वे लूनापानी में स्थाई रूप से रहने लगे थे।

• बुद्ध भाट •

भाट जी जिला मंडी की तत्कालीन सुकेत रियासत के सुंदर नगर पुराना बाजार में रहते थे। इनकी भागीदारी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से रही। इन्होंने कई वर्षों तक कठिन सजा भी काटी। सुकेत रियासत के विरुद्ध क्रांति तथा षड्यंत्र के झूठे आरोप में अभियोग तथा लंबे समय के लिए कारावास की यातनाएं भाट जी ने सही। सुकेत रियासत की जेल तथा पंजाब जेल में ग्यारह मास, जालन्धर में छः मास, रायपुर में दस मास, मुल्तान में आठ मास, रावलपिंडी में दस मास तथा शिमला में एक मास तक कारावास काटा।

• सन्त सिंह आजाद •

सन्त सिंह जी का जन्म 1914 में कटोह नामक गांव में समराला में हुआ था। जब नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज खड़ी की तो सन्त सिंह आजाद जी भी नेता जी के आवाह्न पर उनकी फौज में लेफ्टिनेंट के पद पर शामिल हुए। आजाद हिन्द फौज का हिस्सा होने के नाते ही इन्होंने अपने नाम के साथ आजाद शब्द जोड़ दिया था।

सन्त सिंह आजाद ने नवम्बर 1943 में मांडला में “दिल्ली चलो” का नारा बुलन्द किया था तथा 1944 में दलेल नामक स्थान पर अंग्रेजों पर हमला किया था। इसी साल वे दीमापुर चले गए थे और वहां पर एक हमले के दौरान जख्मी हो गए थे।इसके बाद अंग्रेज सेना द्वारा गिरफ्तार किए गए।

17 अप्रैल 1946 को मण्डी पहुंच कर प्रजामंडल के सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य किया। सन 1947 में पुनः तीन मास के लिए मण्डी की जेल में कारावास काटा। सत्याग्रह आन्दोलन में शामिल होने के कारण बिलासपुर के राजा द्वारा बन्दी बना लिए गए तथा जेल में भारी मार पीट उनके साथ की गई थी। वहां से छूटने पर पुनः सत्याग्रह आन्दोलन में सक्रियता से जुट गए। भारत सरकार ने इन्हे 1972 में ताम्रपत्र से सम्मानित किया।

• कुछ नायक ऐसे भी •

कुछ नायक ऐसे भी थे जिन्होंने अपने परिवार की कोई परवाह न करते हुए देश से अंग्रेजों को खदेड़ने के कार्य में रात दिन एक कर दिया। मण्डी एक ऐसा जिला रहा है, जहां से बहुतेरे स्वतंत्रता सेनानी हुए हैं। इतना ही नहीं इन स्वतंत्रता प्रेमियों को राष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता था और मण्डी का नाम राष्ट्रीय फलक पर अंकित कर राष्ट्र की आजादी में अपना अहम योगदान दिया। इसी प्रकार के अनेकों रणबांकुरों ने अपने घर परिवार की परवाह छोड़ कर देश की आजादी के लिए अपना बलिदान दिया। परंतु उन्हें समय के प्रवाह में जमाने ने भूला दिया। वे सब उनके योगदान के अनुसार न ही तो आज याद किए जाते हैं और न ही उन्हें इतिहास के पन्नों में जगह मिली। यह दशा अपने आप में एक गम्भीर विडम्बना है। यही वे कारण है, जिनके चलते समाज में कोई भी किसी कुव्यवस्था के खिलाफ खड़ा हो कर अपना बलिदान नहीं देना चाहता। क्योंकि हमें समाज की काम निकल जाने के बाद भूल जाने की आदत पता है। इसलिए हम भी अपनी सुख सुविधा का उपभोग करते हुए व्यवस्था के साथ हो जाते हैं। जबकि हम सब जानते हैं कि यहां बहुत गलत हो रहा है।

अतः आज समाज को जरूरत है उन आजादी के रणबांकुरों के इतिहास को खोजने की और उस इतिहास को सबके सामने लाने की तथा युवा पीढ़ी को पढ़ाने की। ताकि युवा पीढ़ी को प्रेरणा और उन आजादी के परवानों को सम्मान मिल सके जो वक्त के गहर में कहीं खो से गए हैं।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आज समाज को जरूरत है उन आजादी के रणबांकुरों के इतिहास को खोजने की और उस इतिहास को सबके सामने लाने की तथा युवा पीढ़ी को पढ़ाने की। ताकि युवा पीढ़ी को प्रेरणा और उन आजादी के परवानों को सम्मान मिल सके जो वक्त के गहर में कहीं खो से गए हैं। गुलामी की जंजीरों से मुक्ति का संघर्ष लगभग विश्व के अधिकतर देश समय – समय पर अपने – अपने ढंग से करते आए हैं और उसी कड़ी में एक नाम हमारे भारत देश का भी है। भारत वर्ष के इतिहास की एक समृद्ध कहानी है। जहां यह देश विभिन्न आतताइयों से अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा के लिए निरन्तर कडा संघर्ष करता रहा, वहीं इसे एक लम्बे दौर तक व्यापार के बहाने हिन्दुस्तान के शासक बन बैठे अंग्रेजों की गुलामी का भी शिकार होना पड़ा। भारतीय जातिवाद, धर्मवाद और साम्राज्यवाद को उकसा – उकसा कर अंग्रेजों ने सत्ताधीशों के साथ – साथ आम जनता को भी आपस में लड़वा – भिड़वा कर फूट डालो और शासन करो की नीति का सहारा लेकर पूरे भारत वर्ष पर धीरे – धीरे अधिकार प्राप्त किया।

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यह लेख (आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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गुरु गुण और शिक्षा प्रणाली।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गुरु, गुण और शिक्षा प्रणाली। ♦

गुरु बिन गुण असम्भव।

गुरु शब्द अपने आप में एक पूर्ण शब्द है जो मानवता के कल्याण एवं उत्थान के लिए एक सर्वोपरि दायित्व है। भारतीय शिक्षा जगत में जहां गुरु पद की महिमा को विभिन्न उपाधियों से अलंकृत किया है वहीं अंतरराष्ट्रीय फलक पर भी गुरु के महत्व को नकारा नहीं जा सकता।

प्राचीनतम इतिहास में यदि हम देखें तो गुरु अध्यात्म विद्या से संबंधित ज्ञान को देने वाले एक विशिष्ट धर्मात्मा को कहा जाता था। लेकिन कालांतर में व्यवस्था बदलती गई और गुरु का वह स्थान वर्तमान शिक्षा प्रणाली में शिक्षक ने दे दिया है। जिसे आमतौर पर अध्यापक भी कहा जाता है।

• गुरुकुल शिक्षा प्रणाली •

यह भी एक पूर्ण सत्य है कि पुरातन समय में गुरु गुरुकुल व्यवस्था को संचालित करता था और वह उस कार्य के लिए किसी राज्य सरकार से कोई वेतन विशेष नहीं बल्कि अनुग्रहित अंशदान प्राप्त जरूर करता था।

गुरुकुल शिक्षा प्रणाली जहां सामाजिक निर्माण के साथ-साथ मानसिक निर्माण का बीड़ा उठाती थी वही वह अध्यात्म विद्या के साथ – साथ चरित्र निर्माण का बोध कराने वाली शिक्षा का भी प्रावधान करती थी। मानसिक, बौद्धिक, काल्पनिक, आध्यात्मिक, चारित्रिक और राष्ट्र निर्माण के साथ-साथ आत्मा सुरक्षा और राष्ट्र सुरक्षा के भावों से ओतप्रोत शिक्षा प्रणाली में निरंतर भारतवर्ष में दी जाती रही।

यहां इस बात को स्पष्ट करना अति आवश्यक हो जाता है कि इस प्रणाली में गुरु का जो मनोवैज्ञानिक प्रभाव था, वह अपने आप में महत्वपूर्ण था। मानव के भीतर मानवता, इंसान के भीतर इंसानियत, हुकमाराम के भीतर हुकूमत और आवाम के भीतर राज भक्ति और राष्ट्रभक्ति की भावना अगर कोई भरता था तो वह गुरु ही होता था।

इन सभी गुणों के साथ – साथ अध्यात्म का परम लक्ष्य युक्त भावबोध अपने शिष्यों के अंदर जागृत करना इन गुरुओं का परम कर्तव्य और दायित्व होता था। इस दायित्व का निर्वहन करने के लिए ये गुरु लोग किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते थे। शायद यही वह कारण था जिस कारण से वे गुरु के पद पर विराजमान थे और समाज इन्हें आदर की दृष्टि से पूर्ण सम्मान के साथ देखता था।

• वर्तमान समाज में भारतीय शिक्षा प्रणाली •

वर्तमान समाज में भारतीय शिक्षा प्रणाली में जो मैकाले शिक्षा पद्धति चली। उसमें गुरुकुल व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया तथा उसके स्थान पर स्कूल शिक्षा प्रणाली को लागू किया गया। स्कूलों में अध्यापक प्रतिनियुक्त किए गए। इससे धीरे-धीरे गुरु पद की मर्यादा और गरिमा हीन होती गई। इसके पीछे अध्यापकों का वेतन भोगी होना भी एक कारण हो सकता है और उसके साथ – साथ समाज का पाश्चात्य शैक्षिक रवैया भी एक कारण हो सकता है।

• भारतीय संस्कृति में मां को प्रथम गुरु का दर्जा •

परंतु इस सत्य को किसी भी तरह से नहीं चलाया जा सकता कि मनुष्य के जीवन में गुरु के बिना गुणों का प्रादुर्भाव संभव ही नहीं है। यही वह कारण है जिसके चलते भारतीय संस्कृति में मां को प्रथम गुरु का दर्जा दिया गया और उसके पश्चात तो निरंतर हमारे जीवन में कई गुरु विभिन्न क्षेत्रों में हमारा मार्गदर्शन करते हैं।

इस बात का स्पष्ट उदाहरण भारतीय पौराणिक आख्यानों में दत्तात्रेय के जीवन चरित्र से हमारे सामने आता है। गुरु के प्रति श्रद्धा, विनम्रता और सहजता ही इन गुणों को ग्रहण करने का एक मुख्य माध्यम होता है।

परंतु बड़े खेद की बात है कि आज के वर्तमान समाज में इन्हीं सब प्रारंभिक भावों का ही मनुष्य में पतन होता जा रहा है। गुरु शब्द का एक अर्थ बड़ा भी होता है। अर्थात अपने घर के, परिवार के और समाज के बड़ों के प्रति आदर, सम्मान, श्रद्धा और विश्वास रखना ही हम सब लोगों का दायित्व बनता है और वही दायित्व एक सद चरित्र व संतुलित – पुष्ट समाज का निर्माण करता है।

• बड़ों के प्रति तो श्रद्धा भाव घटता ही जा रहा है •

विडंबना यह है कि आज अपने बड़ों के प्रति तो श्रद्धा भाव घटता ही जा रहा है परंतु जो शिक्षक हमारी तोतली आवाज को सुधार कर एक पहलवानी का रूप प्रदान करता है और समाज को दशा और दिशा देता है। “छोटे से लेकर बड़े हो दीदार तक की मानस पटल को निखार करो” उसे देश और समाज का संचालन करने के लिए योग्य बनाता है। उसी गुरु के प्रति निरंतर श्रद्धा भाव घटता जा रहा है। शायद यही वह कारण है कि आज समाज में अनायास मानवीय घटनाएं हो रही है। अप्रिय वातावरण बढ़ता जा रहा है। चरित्र हीनता बढ़ती जा रही है। भ्रष्टाचार और लूट घसीट बढ़ती जा रही है।

मैं यह कतई नहीं कहता कि इसके लिए पूरी तरह से समाज ही जिम्मेवार है। मैं यह भी नहीं कहता कि इसके लिए पूरी तरह राजनेता और सरकारें ही जिम्मेवार है। हां इतना जरूर कहना चाहूंगा जो सरकार सत्ता में रह करके शिक्षकों के मान-सम्मान के प्रति इस समाज को जागृत करने का काम करेगी और शिक्षक वर्गों को चरित्रवान समाज के निर्माण के लिए प्रोत्साहित करेगी तथा शिक्षा प्रणाली में वह वातावरण तैयार करेगी। वह सरकार वास्तव में अपने दायित्व का पालन करने वाली राजनीतिक शक्ति कहलाएगी और इतिहास के पन्नों में अपना नया अध्याय अंकित करेगी।

ठीक इसी तरह समाज को भी अपने दायित्व का निर्वहन करने के लिए गुरु की मर्यादा का सम्मान करने वाले भावबोध को पुनः अपने भीतर जागृत करना होगा तथा सेवा, सत्कार और सत्संग जैसी महत्वपूर्ण गुणों को अपने भीतर पुनः समाहित करना होगा।

परंतु इस बात से भी मैं कभी गुरेज नहीं करता इसके लिए एक सद चरित्रवान गुरु का होना भी अनिवार्य है।

“आज के वर्तमान वातावरण में गुरु ने भी अपना चरित्र इस कारण से बिगाड़ दिया है, क्योंकि वह अपने आप को एक शिक्षक मान बैठा है। मैं यहां स्पष्ट शब्दों में कहना चाहूंगा कि मैकाले की जो मंशा थी। आज पूरे शिक्षक वर्ग को उस मंशा से बाहर निकलने की जरूरत है।”

• राष्ट्र निर्माण का दायित्व हमारे हाथों में •

भले ही हम वेतनभोगी हो। परंतु राष्ट्र निर्माण का दायित्व हमारे हाथों में होने के कारण आज हमें अपने दायित्व का भी बोध होना चाहिए। हमे पुनः अपने आप को शिक्षा जगत में कुछ इस तरह से प्रतिस्थापित करना होगा की सत्ता और समाज दोनों ही पूर्व की भांति हमारे पद चिन्हों का अनुसरण करें और हमारे अनुगामी बने।

हमें सेवा, साधना, सत्संग और सद चरित्र को पुनः महत्व देने की जरूरत है। एक शिक्षक के जीवन में यह गुण होना अति अनिवार्य है। यही गुण वह अपने शिष्यों में जब परिवर्तित करता है तो एक समृद्ध समाज का निर्माण होता है।

भारत की यही गुरु शिष्य परंपरा भारत को विश्व गुरु के पद पर जब विराजमान कर सकती है तो क्या वर्तमान समाज में हम सबको भारत को पुनः उस उत्कर्ष तक ले जाने के लिए कटिबद्ध नहीं हो जाना चाहिए ?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — राष्ट्र निर्माण का दायित्व हमारे हाथों में होने के कारण आज हमें अपने दायित्व का भी बोध होना चाहिए। हमे पुनः अपने आप को शिक्षा जगत में कुछ इस तरह से प्रतिस्थापित करना होगा की सत्ता और समाज दोनों ही पूर्व की भांति हमारे पद चिन्हों का अनुसरण करें और हमारे अनुगामी बने। हमें सेवा, साधना, सत्संग और सद चरित्र को पुनः महत्व देने की जरूरत है। एक शिक्षक के जीवन में यह गुण होना अति अनिवार्य है। यही गुण वह अपने शिष्यों में जब परिवर्तित करता है तो एक समृद्ध समाज का निर्माण होता है। भारत की यही गुरु शिष्य परंपरा भारत को विश्व गुरु के पद पर जब विराजमान कर सकती है तो क्या वर्तमान समाज में हम सबको भारत को पुनः उस उत्कर्ष तक ले जाने के लिए कटिबद्ध नहीं हो जाना चाहिए ?

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श्रीलंका की स्थिति से सबक लेना जरूरी है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ श्रीलंका की स्थिति से सबक लेना जरूरी है। ♦

यूं तो आज विश्व के समस्त देशों में कहीं ना कहीं घमासान छिड़ा है। कोई अपनी राजनैतिक शक्ति को बढ़ाने की होड़ में लगा है तो कोई अपनी आर्थिक शक्ति को सब पर हावी करने पर लगा है। जहां एक ओर चीन और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश अन्य शक्तिशाली देशों को आपसी कलह में डलवा कर आर्थिक और सामरिक सुरक्षा की दृष्टि से कमजोर करने के लिए प्रयास कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ छोटे और कमजोर देश स्वयं ही अपनी राजनैतिक ताकतों की मनमानियों के बोझ तले आर्थिक रूप से इतने कमजोर हो चुके हैं कि उनका दिवाला निकलने वाला है।

उपरोक्त सभी संदर्भों के उदाहरण यदि हम ढूंढना चाहे तो यूक्रेन और रशिया अन्तर कलह और इधर भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका की विकट आर्थिक स्थिति इसके ज्वलंत उदाहरण है।

⇒ जनता का आक्रोश

यह बात किसी से छुपी नहीं है कि हाल ही में श्रीलंका के राष्ट्रपति ने अपने देश को छोड़कर मालदीव को पलायन किया है। उनकी गैरमौजूदगी में श्रीलंका के प्रधानमंत्री श्रीलंका के अंतरिम राष्ट्रपति घोषित होकर श्रीलंका की शासन व्यवस्था को चलाने की हरकत में आए हैं। परंतु जब यह खबर श्रीलंका की आम जनता को प्राप्त हुई तो समस्त जनता श्रीलंका की सड़कों पर इस पूरे घटनाक्रम का विरोध करने के लिए उतर आई। इतना ही नहीं श्रीलंका के अंतरिम राष्ट्रपति ने इस पूरी मुहिम को रोकने के लिए श्रीलंका की सेना को पूर्ण रूप से अधिकृत किया। उसके पश्चात भी गुस्साई जनता को प्रधानमंत्री भवन पर कब्जा करने से कोई नहीं रोक पाया। अर्थात इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि जनता का आक्रोश जब अपने चरम पर होता है तो बड़ी से बड़ी ताकत भी उसे रोकने में नाकाम रहती है।

⇒ कौन जिम्मेदार

सवाल ये उठता है कि श्रीलंका में ये परिस्थितियां पैदा क्यों हुई ? आर्थिक विशेषज्ञों की माने तो श्रीलंका की आर्थिक स्थिति वर्तमान में इतनी खराब है कि उसका कुछ करके भी कुछ नहीं बन सकता। ना ही तो गाड़ियों को चलाने के लिए ईंधन प्राप्त हो रहा है और ना ही आम जनता की खानपान के लिए उचित रूप से राशन पानी की व्यवस्था हो पा रही है। इस पूरी व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने के लिए श्रीलंका की जनता राजपक्षे परिवार को जिम्मेवार ठहराए या फिर श्रीलंका के राष्ट्रपति की सनक को जिम्मेदार ठहराए। दोनों स्थितियों में बात एक ही है। यदि इस बात का विश्लेषण राजनीतिक विशेषज्ञों की दृष्टि से किया जाए तो यह दुर्दशा शासन व्यवस्था को परिवारवाद की पूंजी बनाने के कारण हुई है।

खैर कुछ भी हो। श्रीलंका की इस भयानक स्थिति से सभी राजनैतिक दलों को और सभी राष्ट्र अध्यक्षों को तथा राज्य प्रमुखों को गंभीरता से गौर करना चाहिए।राजनीतिक लोगों को राष्ट्र संचालित करने के लिए या फिर राज्य को संचालित करने के लिए जो शक्तियां जनता के द्वारा प्रदान की जाती है। सभी राजनीतिक लोग उन शक्तियों को अपना विशेषाधिकार ना माने बल्कि राज्य या राष्ट्र की सेवा करने के लिए जनता के द्वारा दिया गया आशीर्वाद समझे।

राज्य या राष्ट्र के खजाने को इस भाव से खर्च ना करें कि राष्ट्र की स्थिति ही कमजोर हो जाए। पूर्व में इतिहास के पन्नों में हमें उपनिवेशवाद की कई झांकियां देखने को प्राप्त होती है और उन झांकियों में उस राष्ट्र की असली जनता के साथ किस तरह का व्यवहार उपनिवेश वादियों के द्वारा किया जाता था; वह चित्र किसी के मन-मस्तिष्क से बाहर नहीं है। हम देख रहे हैं कि यह दशा जो आज श्रीलंका की हुई है; वह बहुत ही जल्द भारत के कई अन्य पड़ोसी देशों के साथ-साथ विश्व पटल पर कई छोटे देशों की भी होने वाली है। वे सभी छोटे देश जो अपने देश को संचालित करने के लिए निरंतर विश्व बैंक से या अंतरराष्ट्रीय स्तर के बड़े-बड़े पूंजीपति देशों से ऋण पर ऋण लिए जा रहे हैं। वे सभी ऐसी स्थिति में आने वाले हैं।

⇒ अर्थविदों की माने तो…

अर्थविदों की माने तो बांग्लादेश, भूटान, पाकिस्तान जैसे भारत के पड़ोसी देशों में से भी कई देश इस आर्थिक संकट की दलदल में फंसने की कगार पर खड़े हैं।अमेरिका एवं चीन जैसे बड़े-बड़े देश इन छोटे देशों को ऋण दे-दे कर बिल्कुल कमजोर करने पर तुले हैं और शायद यह पुनः उपनिवेशवाद की ओर बढ़ता हुआ एक कदम है।

खैर यह तो अंतरराष्ट्रीय धरातल पर आर्थिक रूप से दिवालिये के कगार पर खड़े राष्ट्रों की बात हुई। परंतु हम अपने ही राष्ट्र भारत की बात करें तो यहां भी कई राज्यों की स्थिति आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार इतनी कमजोर है कि यदि स्वयं वे स्वतंत्र राष्ट्र होते तो आज श्रीलंका से पहले उनका दिवाला निकल गया होता।

⇒ आर बी आई के आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट

यह मैं अपनी मर्जी से नहीं कह रहा हूं। आर बी आई के आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट को यदि ध्यान में रखा जाए तो आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार पंजाब, राजस्थान, गुजरात, पश्चिम बंगाल तथा बिहार जैसे राज्य की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। ये सभी राज्य, राज्य को प्राप्त ऋण लेने की अधिकृत सीमा से दो तीन गुना ऋण ले चुके हैं जो अब चुकता करना बहुत मुश्किल लग रहा है। ऐसे में यदि केंद्र सरकार इन राज्यों की आर्थिक मदद विशेष पैकेज देकर के करती है तो बात अलग है। वरना ये सभी राज्य गंभीर आर्थिक संकट में आने वाले हैं।

अब इस आर्थिक संकट में इन राज्यों को धकेलने की बात का कारण पूछा जाए तो सभी अर्थविदों का एक मत होता है कि यह पूरी स्थिति राजनैतिक दलों के लोकलुभावन घोषणा पत्रों की वजह से पैदा हुई है। कहीं बिजली फ्री, कहीं पानी फ्री, कहीं बस किराए में छूट तो कहीं राशन और अन्य सुविधाओं पर सब्सिडी प्रदान करके ये सभी राजनैतिक दल हर राज्य को निरंतर कर्ज के बोझ तले दबाते चले जा रहे हैं।

सत्ता पक्ष से अगर पूछा जाए तो वह पूर्व की सरकारों को इसके लिए दोषी ठहराता है और अगर विपक्ष से पूछा जाए तो वह सत्ता पक्ष को दोषी ठहराता है। इस पूरी विकट स्थिति की जिम्मेवारी लेने के लिए कोई भी तैयार नहीं है। इस तरह की ही वोट की राजनीति अगर होती रही तो वह दिन दूर नहीं कि हमारे राष्ट्र में भी यह गंभीर परिस्थिति पैदा हो जाए। जब तक यह थोपाथापी का खेल खत्म नहीं होगा। तब तक इस मामले पर पूर्ण विराम लगाना दूर की कौड़ी है।

⇒ जनता को मुफ्त की आदत डालने की कोशिश

देश की जनता को मुफ्त की आदत डालने की कोशिश किसी भी राजनैतिक दल को नहीं करनी चाहिए। मुफ्त खोरी से जनता निकम्मी होती है और वह देश की अर्थव्यवस्था को बिगाड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती। यहां अगर दूसरा कारण इसके पीछे बताया जाता है तो वह राष्ट्रव्यापी भ्रष्टाचार कहा जाता है। भ्रष्टाचार तो आज चंद लोगों को छोड़ कर, छोटे से लेकर के बड़े कर्मचारियों में इस तरह से घर कर गया है मानो वह उनका संवैधानिक अधिकार है।

कोई छोटे से छोटा कार्य भी किसी सरकारी कर्मचारी / अधिकारी से या फिर किसी गैर सरकारी क्षेत्र के अधिकारी से करवाना हो तो उसके लिए रिश्वत लिए बिना उनकी नियत काम करने की नहीं होती। जब उन्हें तनख्वाह की या कानून की दुहाई देते हैं तो अधिकतर लोगों का यही कहना होता है कि यह तो यहां की रीत है जी। यदि काम जल्दी करवाना चाहते हो तो ले दे करके निपट लो। वरना काटते रहो दफ्तरों के चक्कर।

⇒ भ्रष्ट व्यवस्था के चंगुल में

यूं तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध बड़े से बड़े कानून बने हैं। परंतु जब कोई इस भ्रष्ट व्यवस्था के चंगुल में फंसता है तो कोई भी कानून उसकी किसी भी तरह की मदद नहीं कर पाता। देश को भ्रष्टाचार ने पूर्ण रूप से खोखला कर दिया है। यह मात्र एक देश की ही कहानी नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय बीमारी है। इसका इलाज करना बहुत कठिन लग रहा है।

यदि जनता एकता दिखाए और स्वार्थ से ऊपर उठकर के सर्व हित की बात करेगी तो इस लाइलाज बीमारी का इलाज करना भी संभव है। परंतु जनता है कि वह भी मुफ्त खोरी की आदत से पूरी तरह से मदहोश है और अपना उल्लू सीधा करने में हमेशा लगी रहती है। वह खुद घूंस खिला कर अपना हित साधने में मस्त है और इसे अपनी बुद्धिमानी और चालाकी समझती है।

उसे ना समाज की चिंता है और ना ही तो राष्ट्र की चिंता है। 100 में से दो चार लोग इस भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ जाते भी है तो उन्हें भी भ्रष्ट लोगों की फौज झूठे इल्जाम लगाकर धराशाई कर देती है। ना जाने क्यों हम लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि जब राष्ट्र है तो, तभी ही हमारी संपत्ति का महत्व है। वरना हमारे पास संपत्ति होकर के भी उसका कोई मोल नहीं है। इसलिए श्रीलंका की स्थिति को हम सभी को गंभीरता से लेना चाहिए और अपने राष्ट्र की आर्थिक मजबूती के लिए मिलकर प्रयास करना चाहिए।

⇒ राष्ट्र के प्रति समर्पित सरकार हो

मेरा मानना है आज हमारे राष्ट्र में एक ऐसी सरकार की आवश्यकता है जो राष्ट्र के प्रति समर्पित हो और राष्ट्र के आर्थिक कर्ज को दूर करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहे। वोट की राजनीति ना करें। सभी राज्यों को वह सरकार दो टूक निर्देश दे सके कि अपने कर्मचारियों, अधिकारियों तथा व्यापारियों की कमाई का 10% हर मास अपने राज्य के कर्ज को उतारने के लिए साल-दो साल के लिए उनके खाते से काटकर इकट्ठा किया जाए और राष्ट्रीय स्तर पर तथा राज्य स्तर पर इस 10% अंशदान के लिए एक विशेष खाता राज्य स्तर पर और राष्ट्रीय स्तर पर खोला जाए।उन खातों को ऑनलाइन किया जाए। जिनमें पूरी तरह से पारदर्शिता हो। 7% हिस्सा राज्य के कर्ज को चुकाने के लिए लगाया जाए और 3% हिस्सा सभी राज्य राष्ट्रीय स्तर के कर्ज मुक्ति खाते में डालें ताकि राष्ट्रीय स्तर का कर्जा भी चुकाया जा सके।

भविष्य में तब तक राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर तक कोई विकास कार्य ना किया जाए जब तक राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर के कर्जे पूर्ण रूप से खत्म ना हो जाए। कर्ज मुक्त होने के बाद भी सभी राज्य एवं राष्ट्रीय सत्ता को इस तरह की कार्य योजना को प्रारूपित करना होगा कि फिर कभी हमें कर्ज के बोझ तले डूबने की नौबत ना आ सके।

⇒ सारे लेन देन डिजिटल माध्यम से हो

सभी का धन बैंकों में जमा होना चाहिए और सारे लेन देन डिजिटल माध्यम से ही होने चाहिए। नगद भुगतान पाई का भी मान्य न हो। फिर कोई भी न ही टैक्स चोरी करेगा और न ही भ्रष्टाचार करेगा। व्यक्तिगत धन संचय की भी एक सीमा तय होनी चाहिए और अचल संपत्ति की भी राजा से लेकर रंक तक एक सीमा तय हो। तय सीमा से ऊपर की सम्पत्ति सरकारी घोषित होनी चाहिए।

वेतनमान की सीमा कम की जानी चाहिए। दो तीन – तीन लाख तनख्वाह लेने वाले का वेतनमान यदि 50 हजार अधिकतम किया जाए तो उसी पैसे में उसके पूरे परिवार को रोजगार मिलेगा तथा देश का उत्पादन दर भी बढ़ेगा। इतना ही नहीं सभी के व्यस्त रहने से उत्पात भी घटेगा। वरना खाली दिमाग शैतान का घर।

जब चल और अचल सम्पत्ति के संग्रह की एक सीमा तय होगी तो कोई भी फिर उससे अधिक संचित नहीं करेगा। उसे खर्च करना ही होगा। ऐसे में सम्पति का समान वितरण होगा। पर इसके लिए सर्व प्रथम राजनेताओं और धनाढ्य वर्ग को अपना अहम छोड़ना पड़ेगा। वरना श्रीलंका के राष्ट्रपति की तरह न हो जाए।

यह ठीक है कि पेंशन का प्रावधान सभी को हो। फिर मैं देखता हूं कि कैसे नहीं मिलेगा हर हाथ को काम ? खैर मुझे मालूम है कि बहुत सारे कर्मचारी, अधिकारी एवं व्यापारी मेरी बात से बिल्कुल विपरीत होंगे। परंतु एक सच्चा नागरिक होने के नाते यह जिम्मेवारी हम सब लोगों को सामूहिक रूप से उठानी ही होगी।

इस अंशदान में मात्र कर्मचारी और अधिकारी तथा व्यापारी ही नहीं बल्कि आम जनता के साथ – साथ राजनेताओं को भी बढ़-चढ़कर के अपना योगदान देना चाहिए ताकि हमारी भविष्य की पीढ़ियां आर्थिक रूप से मजबूत हो और सामरिक रूप से सुरक्षित हो।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आप और आपका मकान, परिवार, संपत्ति तभी तक सुरक्षित है, जब तक आपका राष्ट्र मज़बूत और सुरक्षित हैं। सभी का धन बैंकों में जमा होना चाहिए और सारे लेन देन डिजिटल माध्यम से ही होने चाहिए। नगद भुगतान पाई का भी मान्य न हो। फिर कोई भी न ही टैक्स चोरी करेगा और न ही भ्रष्टाचार करेगा। व्यक्तिगत धन संचय की भी एक सीमा तय होनी चाहिए और अचल संपत्ति की भी राजा से लेकर रंक तक एक सीमा तय हो। तय सीमा से ऊपर की सम्पत्ति सरकारी घोषित होनी चाहिए। यह ठीक है कि पेंशन का प्रावधान सभी को हो। फिर मैं देखता हूं कि कैसे नहीं मिलेगा हर हाथ को काम ? खैर मुझे मालूम है कि बहुत सारे कर्मचारी, अधिकारी एवं व्यापारी मेरी बात से बिल्कुल विपरीत होंगे। परंतु एक सच्चा नागरिक होने के नाते यह जिम्मेवारी हम सब लोगों को सामूहिक रूप से उठानी ही होगी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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क्या निजीकरण का विरोध जायज है?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ क्या निजीकरण का विरोध जायज है? ♦

आजकल जिस तरह से सरकारी कर्मचारी की हालत हुई है। उस लिहाज से निजीकरण बहुत जरूरी है। काम करने को कहे तो लाख बहाने और कानून बताते हैं। जब तनखाओं की बात आती है तो उस के लिए तो सड़कों में उतरते हैं। एफसीलाखों की तनख्वाह चाहिए पर काम करना ही नहीं चाहते हैं। मुफ्त में चाहिए। जब कोई ऐसा कहे कि काम करो भाई तुम्हे इसकी तनख्वाह मिलती है। तो कहते हैं इसके लिए हमने दिन रात कड़ी मेहनत की है और ऊंची पढ़ाई की है। तब जाकर इस पद पर पहुंचे है। यूं ही नहीं मिली है नौकरी। जैसे उन्हे नौकरी लगने की प्रतियोगिता को पास करने के ईनाम के रूप में जिंदगी भर मोटी तनख्वाह देने का अनुबंध सरकार ने हस्ताक्षरित किया हो। जैसे टेस्ट पास कर के उन्होंने जनता पर बड़ा एसान किया हो। इतनी पढ़ी लिखी जनता बेरोजगारी से जूझ रही है और परेशान हैं। उसका शोषण हो रहा है। वह किसी को नहीं दिखता।

बस निजीकरण न हो। ठेकेदारी न हो। क्यों? जब लोग कुली के काम में भी ईमानदारी से काम करना ही नहीं चाहते हैं तो फिर तो ठेका जरूरी है। वहां प्रोग्रेस भी मिलती है और काम भी हो जाता है। रही गुणवाता की गड़बड़ी की बात तो उसके लिए फिर से सरकारी अधिकारी और कर्मचारी ही दोषी हैं। जो घूंस खाकर ठेकेदारों के कामों को पास करते हैं। यदि ठेकेदार घूस न दे तो वे बिल ही पास नहीं करते। ऐसे में ठेकेदारों को भी गुणवत्ता में गड़बड़ करनी पड़ती है। यानी सरकारी सेक्टर में जो भी लगा समझो की पावर और कानूनों का दूर-उपयोग करना उसका निजी अधिकार बन जाता है।

जनता अपने-अपने काम को निकालने के चक्कर में और किसी से बुरा न बनने के चक्कर में घूस देने को विवश हो जाती है और अब धीरे-धीरे जनता को भी भ्रष्टाचार की लत लग गई है। सिखाई किसने? सरकारी अधिकारी और कर्मचारी वर्ग ने। छोटे से छोटा बाबू भी बिना घूस के फाइल नहीं सरकाता। चपरासी तक भ्रष्ट हैं, और तो और मनरेगा के मजदूरों से भी जबाव मिलता है कि जब सब खा रहे हैं तो हमारे लिए प्रोग्रेस क्यों? हम भी सारा दिन अपनी मर्जी का काम करेंगे और 203 रुपए पूरा दिन लेंगे। यदि वह तकनीकी लोगों ने कम आंका तो पंचायत प्रतिनिधि की खाल उधेड़ देते हैं। या तो प्रोग्रेस के बदले में दुगना तिगुना दिन मांगते हैं। अब वहां एडजस्टमेंट करनी पड़ेगी।

उस एडजस्टमेंट को कानूनी रूप से तकनीकी लोग या ओहदेदार लोग कानूनन गलत ठहराते हैं। ऐसे में पंचायत प्रतिनिधियों को ही नुकसान झेलना पड़ता है और हर तरफ से समझौता करना पड़ता है। लोगों को प्रोग्रेस के चक्कर में दुगना तिगुना दिन देना पड़ता है और तकनीकी तथा ओहदेदार लोगों को घूस खिलानी पड़ती है। ऐसे में कार्य की गुणवत्ता यदि लानी हो तो घाटा होगा नहीं तो गुणवत्ता से भी समझौता करना पड़ता है। अब दोषी कौन?

लोगों की नजरों में ठेकेदार या पंचायत प्रतिनिधि खा गए आदि-आदि, का भाव होता है और खाने वालों की एक लम्बी कतार होती है। यह सचाई सब जानते हैं पर मुंह कोई नहीं खोलना चाहते। अन्ना आंदोलन ने आवाज उठाई जरूर थी परन्तु वह भी समय और व्यवस्था की गर्त में दब गई। फिर ठेकेदारी प्रथा से नफरत क्यों? जब लोग ही मिलकर इसका विरोध नहीं करना चाहते तो सरकार का क्या कसूर?

गरीबों के काम तो कतई नहीं होते। इतनी तनख्वाह लेने के बाबजूद भी हर काम के लिए रिश्वत मांगते हैं। हद हो गई है अब तो। हां सेना के मामले में, पुलिस के मामले में ठेका सही नहीं है। बाकी देश के विकास के लिए सब जायज है। अध्यापक तनख्वाह लेने के बाबजूद भी क्लास को नहीं जाना चाहते और जाता है तो गाइडों से पढ़ाना शुरू करता है। कौन पढ़ता है आज किताबें? कौन जाता है आज लाइब्रेरी? जो काम करते हैं उन्हे उल्टा क्रश किया जाता है। उन्हे पफोन्नत नहीं मिलती पर वरिष्टता के हिसाब से पदोन्नति मिलती है।

सभी विभागों के कर्मचारी रिश्वत बिना काम नहीं करना चाहते। फिर क्या गलत है? सरकारी सेक्टर की तरह निजी में नहीं होता। वहां प्रोग्रेस के पैसे मिलते हैं न कि ओहदे और डिग्री के बल पर पास किए टेस्ट के। वहां पदोन्नति भी काम के हिसाब से होती है न कि सिनियोर्टी के आधार पर। तब इस क्षेत्र को बढ़ावा दिया जाना कहां से गलत है? या तो लोग अपनी मानसिकता को सुधारे या फिर निजीकरण को स्वीकारें।

निजीकरण के सकारात्मक प्रभाव :

  1. सरकारी ऋण में कमी : निजीकरण के मुख्य आशावादी प्रभावों में से एक यह है कि इसने संघीय सरकार के पैसे को कम कर दिया है।
  2. बेहतर सेवाएं।
  3. नए-नए तरह के उत्पाद।
  4. कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं।
  5. प्रतियोगी दरें।

घोषणा :- यह मेरी मौलिक और स्वरचित रचना (विचार) है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — गरीबों के काम तो कतई नहीं होते। इतनी तनख्वाह लेने के बाबजूद भी हर काम के लिए रिश्वत मांगते हैं। हद हो गई है अब तो। हां सेना के मामले में, पुलिस के मामले में ठेका सही नहीं है। बाकी देश के विकास के लिए सब जायज है। अध्यापक तनख्वाह लेने के बाबजूद भी क्लास को नहीं जाना चाहते और जाता है तो गाइडों से पढ़ाना शुरू करता है। सभी विभागों के कर्मचारी रिश्वत बिना काम नहीं करना चाहते। फिर क्या गलत है? सरकारी सेक्टर की तरह निजी में नहीं होता। वहां प्रोग्रेस के पैसे मिलते हैं न कि ओहदे और डिग्री के बल पर पास किए टेस्ट के। वहां पदोन्नति भी काम के हिसाब से होती है न कि सिनियोर्टी के आधार पर। तब इस क्षेत्र को बढ़ावा दिया जाना कहां से गलत है? या तो लोग अपनी मानसिकता को सुधारे या फिर निजीकरण को स्वीकारें।

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यह कहानी (क्या निजीकरण का विरोध जायज है?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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Note:-

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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दास्तान ए जात पात।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दास्तान ए जात पात। ♦

अपनी अरुणिमा को बिखेरते हुए सूर्य देव हिमालय की पावन वादियों में पहाड़ियों के बीचो बीच बसे इस छोटे से सुंदर एवं सुरम्य गांव को ऐसे नहला रहे थे, कि मानो आद्या सुंदरी परा शक्ति प्रकृति का चाकर बन कर अपनी सेवाएं नियमित दे रहे हो।घाटी के इस छोटे से गांव में कितनी आत्मीयता थी और कितना प्रेम और भाईचारा? कहते नहीं बनता। न कोई लड़ाई न कोई झगड़ा। न ही तो शहरों जैसी आपाधापी और लूट – खसोट। चारों ओर थी तो सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता और असीम सकून।

नित्य प्राकट्य की तरह आज भी आदित्य देव अपनी सेवाएं देने धीमे – धीमे तप और विशाल प्रकाश के साथ पहाड़ी की चोटी पर निकल आया था। गांव की जानकी चाची की आवाजे हर रोज की तरह कानों में गूंज उठी।

” राधा, शालू, कमला, मनु उठो भाई उठो। देखो तो सूरज चढ़ आया है। सारा संसार उजाला हो गया है और तुम ……….।” यह बोलते बोलते जानकी चाची उस कमरे में घुंस गई, जहां राधा सोई थी।

“अरे ओ मेरी भोली सी, प्यारी सी, अच्छी सी दादी। क्यों हर रोज सुबह – सुबह अपनी कोयल सी मधुर आवाज़ का प्रचार – प्रसार करती फिरती हो ? आस – पड़ोस को भी अलार्म का काम करती हो।” बिस्तर पर ऊंघते हुए से पलथी मार कर जानकी चाची के झुर्रियों से लबरेज चेहरे को चूमते हुए राधा बोली।

“तुझे अब सुबह इतनी देर तक सोए रहना शोभा नहीं देता राधा। शादी की उम्र हो गई है। मां का हाथ बंटाया कर। कुछ सीख भी जाएगी और मां की मदद भी हो जाएगी।”

जानकी चाची बूढ़ी आंखो की कोरों में पानी भरते हुए से बोली।
“बस भी कर मेरी प्यारी दादी। जब देखो तो तब उपदेश। और हां जो ये बात – बात पर इन झील सी आंखो में लहरे उठाती रहती हो ना, ये मत किया करो जी।” राधा जानकी चाची की झुर्रियों से लबरेज पोपलों को दोनों ओर से पकड़ते हुए और पुचकारते हुए से बोली।

“कैसे चुप रहूं बच्चा? दादी जो हूं तेरी।” जानकी चाची कोरो का पानी पोंछते हुए और राधा का सिर सहलाते हुए बोली।

“उमा। ओ उमा।” बाहर से मोहन भैया ने आवाज लगाई।
“जी आई।” अंदर से रोटियों को बेलते हुए उमा भाभी बोली।

“अरे मैं काम पर जा रहा हूं। देर हो रहा हूं। बाहर कुछ सामान रखा है। देखना उठा लेना। राधा को बोल दे चाहे।” जाते हुए से मोहन भैया बोले।

“जी उठा लूंगी। आपकी लाड़ली तो अभी खरांटे मार रही होगी। बिगाड़ रखा है बुढ़िया ने।” अंदर से उमा भाभी बोली।

“ठीक है। उठा लेना। बाहर गाय भी चुग रही है। कहीं खा न ले सामान।” मोहन भैया सड़क से बोले।

“जी उठा लूंगी। शाम को जल्दी अना।” अंदर से उमा भाभी बोली। पर शायद ये सब मोहन भैया ने नहीं सुना हो। वे निकल पड़े थे।

गाय को हट्टका करते हुए सामानों के थैले लिए हुए राधा और जानकी चाची रसोई में आई।

“क्यों री बुढ़िया की बच्ची? क्या कह रही थी ? बुढ़िया ने बिगाड़ रखा है!” जानकी चाची ने उमा भाभी के कान प्यार से पकड़ते हुए पुचकारते हुए से कहा।

“सॉरी – सॉरी अम्मा जी! अब नहीं बोलूंगी।” अपने कान पकड़ते हुए माफीनामे की तहजीब में उमा भाभी बोली।

“खबरदार जो आगे से किसी ने मेरी लाड़ली पोती को कुछ कहा तो।” फिर से आंखों की कोरें नम करते हुए से जानकी चाची बोली।

“नहीं कहूंगी कुछ अम्मा। पर इसकी मां हूं। चिंता तो होती है न! 24 की हो गई है।सबको आप जैसी सास थोड़े ही न मिलती है।” उमा भाभी रूआंसा चेहरा करके बोली।

“सो तो मैं भी इसे समझाती रहती हूं बेटा। पर यह मानती कहां है?” यह बोलते – बोलते जानकी चाची की आंखे छलक आई थी।

“ओ री ओ सुंदर सास – बहू की जोड़ी। ये रोना धोना छोड़ो और कुछ नाशता – पानी कराओ। भूख लगी है। तुम्हारी राधा जिंदा है अभी। मरी नहीं है।” राधा ने दोनों को छेड़ते हुए से कहा।

“चल ! झल्ली कहीं की? पहले नहा – धोकर आ, फिर खाना कुछ।” जानकी काकी आंसू पोंच्छते हुए बोली।

अपनी अहलड मस्ती में राधा नहाने जाती है। इस बीच चाची और उमा भाभी में यह बात हो रही थी कि परसों राधा को देखने लड़के वाले आ रहे हैं। “उमा के बाबू जी बोल रहे थे कि बेटी जवान हो गई है। हाथ पीले करना हमारा फ़र्ज़ है। फिर बी ए भी इस साल इसकी पूरी हो जाएगी।” उमा भाभी चाची से बोल रही थी।

“सो तो है बच्चा। बेटियां तो है ही पराया धन। कब तक पास रखोगे?” चाची उमा भाभी से बोल रही थी।

” जब देखो तब सब बस मेरे पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। किसी न किसी तरह से मुझे जल्दी भगाने की तैयारी में चुपके – चुपके लगे हैं। मैं नहीं करूंगी अभी शादी हां। कह दिया मैंने। जब तक एम ए न कर लूं।” राधा बाल झाड़ते हुए झल्ला कर बोली।

“बस कर री ओ छमक-छलो। कब तक बाप के यहां बैठी रहेगी? 24 की हो ली फिर कब 50 की करेगी शादी क्या? कौन वरे गा तब तुझे। तेरी उम्र की थी न हम। तो दो – दो औलाद जन बैठे थे।” पास मनु को नहला रही चंपा दीदी व्यंग्य करते हुए बोली। वह यहां मायके अपने बच्चों के साथ मेहमान आई थी। शायद राधा का यह रिश्ता भी उसी की सलाह पर उमा भाभी और मोहन भैया करवा रहे थे। पर इसमें राधा को विश्वास में न लिया गया हो शायद।

“वह आप का जमाना था फूफी। अब मॉडर्न जमाना है। समझी !” राधा पुचकारते हुए से बोली।

“हां – हां तोड़ ले अपने बाप की रोटियां और! तुझे कौन समझाएं?” चंपा दीदी बोली।

“बस भी कर चंपा! तू हमेशा इसे छेड़ते हुए क्यों ताने मारती रहती है?” जानकी चाची डांटते हुए से बोली।

“हां – हां मां और चढ़ाओ इसे सर पर। तूने ही तो इसे बिगाड़ रखा है। ठीक कहती है भाभी।” चंपा दीदी बोली।

“हर चीज का एक समय होता है बच्चा। शादी की भी एक उम्र होती है। ठीक कह रहे हैं सब।” राधा की बेनी बनाते हुए चाची बोली। तीसरे दिन लोक रीत के तहत बुलाए गए मेहमान आते हैं और राधा जैसी सुंदर और पढ़ी लिखी लड़की को देख कर रिश्ता तुरंत पक्का कर लेते हैं।

दिन गुजरते गए। यहां राधा ने बुद्धि से तो यह रिश्ता कबूल लिया था पर दिल से नाखुश ही थी। एक दिन पास में एक मेला था। राधा अपनी सहेली रूपा के साथ मेला देखने चली गई। रास्ते में उन्हें पिंकू मिला, जो उन का क्लास मेट था। वह पास के गांव का रहने वाला था और एक अच्छा लड़का था। उसने गाड़ी रोकी।

“अरे राधा और रूपा कहां जा रही हो?” पिंकू ने कहा।
“ओह पिंकू! हम मेले जा रही है और तुम?” रूपा ने चौंकते हुए से कहा।
“मैं भी मेले जा रहा हूं। आओ चलो बैठो।” पिंकू ने कहा।
दोनों गाड़ी में बैठ जाती है। और तीनों बतियाते – बतियाते मेले पहुंचे। बातचीत से माहौल तो पहले ही खुशनुमा हो गया था उस पर मेला भी आ गया। मेले के पास रास्ता कुछ खराब था। सो राधा ने पिंकू को हाथ दे कर मदद करने को कहा।

पिंकू ने जैसे ही ऊपर से नीचे को राधा को ऊपर खेंचाने के लिए हाथ किया, त्यूं ही उसकी नजर राधा के वक्ष स्थल के ऊपर वाले अधखुले भाग पर पड़ी। राधा ने पिंकू को देखते हुए भांप लिया। दोनों के दिलो में एक अजीब सी हलचल हुई, जो शायद इन दोनों ने पहली बार महसूस की थी। वे एक दूसरे को संभालते – संभालते नयन मटके में उस मेले के पास वाली किचन में फिसल गए। दोनों के कपड़े खराब हो गए। रूपा को वहीं बिठा कर वे पास के नल में अपने कपड़े साफ करने गए।

“तुम्हारी सगाई सच में हो गई क्या?” कपड़ों को झाड़ता हुआ पिंकू शरमाते हुए सा बोला।

“क्यों? नहीं हुई होती तो तब क्या तू………….?” राधा ने स्त्री सुलभ मुस्कुराहट बिखेरते हुए नीची नजर कर के तिरछी चितवन निहार कर कपड़े धोते हुए कहा।

” नहीं – नहीं। बस सुना था। सो पूछ लिया।” पिंकू उसी मुद्रा में बोला।

“हां हो गई है। ठीक सुना है तुमने।” राधा ने भी उसी मुद्रा में जबाव दिया। वे दोनों बातों ही बातों में मस्त हो गए थे। बाहरी परिचय तो उनका पहले से ही था, पर आज तो उनका रूहानी परिचय भी हो गया था शायद। ऊपर से धीमे से रूपा की आवाज आई,” ओ री ओ राधा। जल्दी कर बच्ची। तेरा मंगेतर मेले में पहुंच गया है शायद।फोन कर रहा है।”

“उठा ले तू ही।” राधा ने ठिठोली करते हुए कहा।
“अरे ओ लैला! कहीं उसने तुम्हे यूं देख लिया न पानी में आग लग जाएगी आग हां।जल्दी कर।” रूपा ने चठकरी करते हुए कहा।

“अच्छा पिक्की!” हाथ हिलाते हुए राधा ने पिंकू से जाते हुए कहा।

राधा के मुख से अपने लिए पिंक्की सुन कर पिंकू के दिल की आग में घी पड़ गया। शाम को राधा अपने घर पहुंची और सीधा अपने कमरे में चली जाती है।

“राधा। ओ राधा।” जानकी चाची ने आवाज लगाई।
“जी दादी।” राधा अंदर से कपड़े बदलते हुए बोली।
“देख तो तेरा फोन आया है।” चाची बोली।

“किसका है दादी?” राधा बोली।
“किसका होगा ? तुझे नहीं मालूम क्या?” चाची ठिठोली करते हुए बोली।
चाची की बातों से राधा ने अंदाजा लगाया लिया कि उसके मंगेतर का ही होगा। उसने उतना तबजो न दिया। कपड़े बदलती रही। इतने में शालू खिखियाते हुए राधा के कमरे में फोन ले कर आया।

“सुन भी तो लो दीदी। जीजा जी नाराज हो जाएंगे नहीं तो।” वह छुटकू राधा को छेड़ते हुए से बोला।

“होने दे नाराज। पीछा छूटेगा।” राधा अपनी घर वाली कमीज़ पहनते हुए बोली और उसके हाथ से फोन झुंझला कर ले लेती है।

“हेलो ! कौन है? अब बोलो भी चुप क्यों हो। कपड़े बदल रही थी। देर लग गई। इसमें नाराज होने की क्या बात है?
बोलो भी कुछ नहीं तो मैं काट रही हूं।” राधा त्योरियों को चढ़ाते हुए बोली।

“सुन – सुन, मैं पिंक्की बोल रहा हूं। फोन मत काटना प्लीज!” फोन पर पिंकू ने धीरे से कहा।

यह सुन कर राधा घर के पिछवाड़े में फोन सुनने चली गई। घरवालों ने सोचा कि यह हमसे शर्मा कर दामाद से बात करने पिछवाड़े गई है। चाची ने राधा का फोन पहले उठाया था। उस पर किसी मर्द की आवाज सुन कर अंदाजे से दामाद का फोन होने का अनुमान लगाया था।

सब खुश थे कि बेटी को दामाद का फोन आया है। पर किसे मालूम कि राधा ने फोन पर किसी और से कल मुलाकात का प्रोग्राम फिट किया है।

हल्की – हल्की बारिश बाहर हो रही थीं। कस्बे के नुकड़ पर बने रेन शेल्टर में राधा और पिंकू दो के दो बैठे हैं। कोई उन्हें देख नहीं रहा है।

“क्या तुम अपने मंगेतर से खुश नहीं है?” पिंकू ने राधा से कहा।
“किसने कहा?” राधा ने तल्खियों में कहा।

“तुम ही तो कल फोन पर कह रही थी।” पिंकू ने कहा। पिंकू ने राधा को शालू के छेड़ने पर बड़बड़ाते हुए सुन लिया था।

“हां नहीं हूं खुश। तो क्या कर लोगे तुम?” राधा बोली।

“तूने क्या यह फिल्म समझी है? कि हीरो विलन को पीट देगा।” पिंकू बोला।

“हीरो। और वो भी तू?” राधा हंसते हुए से बोली।

“हां – हां मैं। क्यों आपको कोई शक है?” पिंकू बड़े रुआब से बोला।
पिंकू की यह अदा तो राधा को और भी घायल कर गई।

“अच्छा – अच्छा एक बार फिर से करो ऐसा भला।” राधा ने अनुनय किया।
पिंकू ने क्रिया पुनः दोहराई।

उस रोज राधा के ससुराल वाले राधा की शादी की बात करने आए थे।

“देख भाई कुडमा (समधी)। अगले महीने तक जो देना ब्याह करी एबे। से मठा भी आई जाना घरा जो। फेरी कंपनी मंझा छुट्टी नी मिलदी।” राधा का ससुर मोहन भैया से बोल रहा था।
“हां बेटा ब्राह्मणा ते लग्न जोड़ी ले ओ। बाकी फेरी ब्याह रे घरा निकलें कई काम।” चाची ने हामी भरते हुए कहा।

शादी का लग्न शोध लिया गया था और तैयारियां दोनों ओर जोरों से थी। एक दिन दोनों परिवारों के लोग शहर शादी के जेवर – कपड़े खरीदने आए थे। राधा को भी पसंद का सामान खरीदने के लिए साथ लाया गया था। सभी खरीद फरोक्त कर रहे थे।

इस बीच राधा टॉयलेट गई। वहां से वह वापिस नहीं आई। थोड़ी देर बाद सब का ध्यान जब इस ओर गया तो दोनों परिवारों में खलबली मची। फोन लगाया। वह स्विच ऑफ आ रहा था। शहर का कोना – कोना छान डाला पर कोई खबर नहीं मिली। शाम होने वाली थी। तब सब ने निर्णय लिया कि पुलिस में रपट दर्ज की जाए। रपट लिखवाते ही सब अपने – अपने घरों को चले गए।

तीन दिन बाद डाकिया चिट्ठी को चाची के पास दोपहर को छोड़ गया था। चाची को पढ़ना आता नहीं था।
शाम को जब भैया और भाभी आए तो उन्हें दे दी।
“देखना मोहन तेरे नाम डाकिया चिट्ठी दे गया था।” चाची बोली।
मोहन भैया ने जब चिट्ठी पढ़ी तो आग बबूला हो उठा।

“नालायक को यह दिन दिखाने के लिए ही पाला – पोसा था हमने। नाक कटा डाली मूर्ख ने हमारी। मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा कहीं। क्या बोलेंगे समधी जी को। चलो उनसे तो ले दे के निपट भी लेंगे पर समाज को क्या कहेंगे?” मोहन भैया गुस्से से लाल हो कर बोल रहे थे।

“अरे हुआ क्या है? जरा हमें भी तो बता। बस उसे कोसता ही जा रहा है। ऐसा क्या किया है उसने?” चाची ने डांटते हुए से बोली।

“तुम तो चुप ही रहो अम्मा। तुम्हीं ने उसे अपने लाड़ प्यार से बिगाड़ा, जिसका परिणाम आज हम भुगत रहे हैं।” मोहन भैया झल्ला कर बोले।
“अरे मुझे जो भला – बुरा कहना है सो बाद में कहना। पहले बता तो सही हुआ क्या है?” चाची भी कड़की से बोली।

“होना क्या है अम्मा? यह कोर्ट की न्यायिक सूचना है। जिसमें लिखा है कि राधा ने पवन सुपुत्र बृजमोहन से शादी कर ली है और क्या?” मोहन भैया गुस्से से बोले।
उस दिन चंपा दीदी पुनः राधा के गायब होने की खबर सुन कर यहां खबर संभाल करने आई थी। वह चौंक कर बोली,” क्या? उस बृजमोहन के लड़के से, जो पड़ोस के गांव का है?”
“हां वही।” मोहन भैया ने ऊंघते हुए से बोला।

“देखा न। आखिर उसने अपनी करतूत दिखा ही ली आखिर। मैं न कहती थी कि यह लड़की तुमने कुछ ज्यादा ही सिर पर चढ़ा रखी है। बिगाड़ दी ना उसने जात। मेरी सुनता ही कौन था?” चंपा दीदी इठलाते हुए सी बोली।

“इससे तो वह मर ही गई होती तो एक ही दुख तो होता। अब तो वह जिंदगी भर खुद भी मरेगी और हमें भी मारती रहेगी।” छाती पीटते और रोते हुए उमा भाभी बोली।

“वह जिए अब अपने हाल में। मैं उसे अपने घर में घुसने नहीं दूंगा। मेरे लिए वह मर गई समझो।” मोहन भैया ने झुंझलाते हुए से कहा और अंदर चला गया।

कुछ दिन बाद राधा ने घर पर फोन किया। उमा भाभी ने उठाया। रोते – रोते बोली,” बेटा क्या कसर रखी थी हमने तुझे पालने में? तूने तो हमें कहीं का न छोड़ा! भागना भी था तो किसी अपनी जाति वाले के साथ भागती। क्या जरूरत पड़ी थी पिंकू के साथ भागने की? रिश्ता मंजूर न था तो मुझसे कहती, अपनी दादी से कहती। पर तूने तो हमारी नाक कटवा दी।,” रोते – रोते उमा भाभी ने फोन काट दिया।

राधा अभी अपनी बात कह ही नहीं पाई थी। वह कैसे बताती कि इश्क जात – पात को नहीं देखता। वह तो बस हो जाता है। और जब होता है तो सब नियम तोड़ कर अपनी मंजिल को लक्ष्य कर निशाना साधता है। पर वह जानती थी कि अभी मां का ही गुस्सा नहीं ठंडा है तो पिता जी का तो सातवें आसमान पर होगा।

कई दिन बीते पीछे बृजमोहन जी मोहन भैया के घर सुलह की बात करने आए। वह अपनी बिरादरी का गांव में ही नहीं इलाके में रसूखदार आदमी था। ऊंची जाति के लोग भी उसके ओहदे की तासीर के चलते ऊंची जुबान में उन से बात नहीं करते थे। पर वे दिल और व्यवहार के बहुत अच्छे थे। उन्होंने ही उस दिन कोर्ट में राधा और पिंकू की शादी करवाई थी। पिंकू को फोन पर जब राधा ने अपनी शादी की बात बताई थी तो उन्होंने इन दोनों की बाते सुन ली थी। सारी सेटिंग फोन पर इन्हीं की छत्र छाया में संपन्न हुई थी।

“अब क्या लेने आए हो बृजमोहन साहब? बेटी को तो ले गए हो बहला – फुसलाकर । उससे पेट नहीं भरा क्या? और क्या हमारी किरकिरी करने में अपनी ऊंची समझते हो?” मोहन भैया ने अनमने मन से कहा।

“नहीं मोहन बाबू। हम किसी को नीचा दिखाने नहीं आए हैं।बस सुलह करने आए हैं।” बृजमोहन शांति से बोले।

“काहे की सुलह ? कोई सुलह नहीं होगी। जाओ, चले जाओ यहां से। हमारे लिए वह मर गई और उसके लिए हम।” मोहन भैया झल्ला कर बोले। यहां गांव वालों ने मोहन भैया की बात की दात दी। उससे वे और शेर बन बैठे। उन्हें लगा कि अब गांव वाले मेरा आदर फिर से वैसे ही करेंगे, जैसे पहले करते थे।

“देखो मोहन बाबू! अब छोड़ो भी सारा गुस्सा। बच्चों ने प्यार किया कोई पाप नहीं किया। अब दोनों की कानूनी शादी भी हो चुकी है। अब तो उन्हें माफ कर लो और अपना लो। बच्चो को जितनी ही जरूरत हमारी है, उतनी ही आपकी भी है।” बृजमोहन पुनः शांति से बोले।

“क्या बात करते हो बृजमोहन साहब? अपने ओहदे और पैसों की धौंस मत जमाना।किस कानून की बात करते हो तुम? वही कानून तो तुम्हे जाति – पाती के प्रमाण पत्र बांटता है। फिर हम कैसे तुम्हारे साथ उठना – बैठना मंजूर करें?” मोहन भैया त्योरियां चढ़ाते हुए बोले।

“देखो मोहन भैया। इस संसार में कुदरत ने दो ही जातियां बनाई है। एक स्त्री और दूसरी पुरुष। वही सृष्टि के घटना चक्र को चलाने में सदा से कुदरत का साथ दे रही हैं। बाकी तो सब मनुष्य मन की खुरापात है। इसलिए इस जात – पात के विवाद में न पड़ कर बच्चों के बारे में सोचो।” बृजमोहन ने शांति से समझाते हुए से बोला।

“अपना यह ज्ञान कहीं और सुनाना, यहां नहीं। बड़े आए उपदेश देने। जब तुम एस. सी. का प्रमाण पत्र ले कर आरक्षण लेने के लिए अपनी जाति बड़े फखर से बताते हो, तब यह उपदेश नहीं देते? तब नहीं कहते कि हमें जाति प्रमाण पत्र नहीं चाहिए। हमें मानव होने का प्रमाण पत्र दो। अब अपनी जाति स्वीकारने में हेठी समझ रहे हो।” मोहन भैया ने अपने मन की सारी भड़ास उतार दी।

“अरे भाई क्यों बात उलझा रहे हो? मैं मानता हूं कि आरक्षण होना ही नहीं चाहिए।हो भी तो जातियों के आधार पर न हो। आर्थिक आधार पर हो। यह बहुत पहले हो जाना चाहिए था। ऐसा अगर समय पर हो गया होता तो इन आजादी के सत्तर साल में हमारे बच्चों ने आपसी रिश्ते कायम कर जात – पात का रोग ही मिटा दिया होता।पर यह तो राजनीतिक मसला है। इसमें हम क्या कर सकते हैं? और फिर इन बच्चों का तो कोई दोष ही नहीं।” बृजमोहन ने पुनः समझाते हुए से कहा।

“अच्छा! तुम कुछ नहीं कर सकते हो या कि जानबूझ कर कुछ करना ही नहीं चाहते? बृजमोहन साहब तुम जैसे रसूखदार जब इस बुराई का विरोध करें ना, सरकारों को रातों रात सब बदलना पड़ेगा। हम तुम्हारी चालाकियों को खूब समझते हैं। उससे पहले कि गांव वाले तुम्हारे साथ कुछ बुरा कर डालें, अपने रास्ते चलते बनो।” मोहन भैया विलक्षण मुद्रा में बोले।

बृजमोहन समझ गए कि इन तिलों से तेल नहीं निकले गा।अपने छोटे को इशारा कर घर को चले गए।

वर्षों बीत गए। वहां राधा और पिंकू के एक बेटी हुई। वह चार – पांच साल की हो गई थी। अब सुंदर बहू का मोह धीरे – धीरे राधा की सास से उतर रहा था। हररोज दोनों में घर के किसी न किसी कामकाज पर नोक – झोक होती ही रहती थी। उस दिन सास ने राधा को बहुत खरी – खोटी सुनाई थी,” तेरे मां – बाप ने तुझे रखा कहां था? खाना भी बनाना नहीं सिखाया। किसी भी काम की नहीं है डायन। मेरे बेटे को डोरे डाल कर अपना उल्लू सीधा कर गई बेईमान।” और भी न जाने क्या कुछ?

राधा अपनी बच्ची को उठा कर दुखी हो कर अपने पिता के यहां चली आई। सोचा मां – बाप माफ कर लेंगे। शाम के समय में जब वह अपने मायके पहुंची तो उसके पिता आंगन में बैठे थे। उससे पहले कि वह अपना दुख कहती। मोहन भैया ने आते ही उसे डांटना शुरू किया,
” क्यों आईं है यहां अब नालायक ? रह गई है कुछ कसर क्या?”
राधा रो रही थी। उसकी नन्ही सी मुन्नी उसके आंसू पोंछ रही थी और तोतली आवाज में बोल रही थी,” तुप तरो मम्मा! तुम तियुं डो डही हो? यह तुम्हे डांट रहे हैं। ये कौन है?”

मोहन भैया की ऊंची आवाज सुन कर घर के सब बाहर आ गए। पड़ोस के लोग भी बाहर निकल आए। राधा अपराधिनी की तरह नजरे झुकाए खड़ी थी।

“चुप भी कर अब मोहन। बस बोले ही जा रहा है। देखता नहीं कि कितने दिनों बाद बेटी आईं है?” चाची ने डांटते हुए कहा। और राधा को गले से लगा कर हालचाल पूछा।

दोनों को बतियते और रोते हुए उमा भाभी की आंखे भी भर आई। लोगों को बाहर देख कर राधा को दोनों मियां बीबी ने पुनः डांटना शुरू किया। डांटते – डांटते अंदर चले गए। सब लोग बाहर दात दे रहे थे। मोहन बिल्कुल ठीक बोल रहा है। इस कुलटा ने तो सारे गांव की नाक काट ली। उधर चाची ने सब को डांटा और भगा दिया।

अंदर भैया और भाभी आपस में मशविरा कर रहे हैं कि इसे रात को रखना कहां है? लोक लाज से बचने के लिए उसे बेटी के साथ नीचे वाले कमरे में रखने का निर्णय हुआ। सोचा धीरे -धीरे लोग भूल जाते हैं, तब सब ठीक होगा।

उस रात राधा को निचले कमरे में रखा गया। सुबह जब राधा की नन्ही बच्ची ममी – ममी चिलाने लगी तो सब निचले कमरे की ओर दौड़े। देखा वहां राधा थी ही नहीं।बच्ची को पूछा गया कि ममी कहां गई? पर उसे कुछ भी मालूम नहीं था। वह तो बस रो रही थी।

शालू रोता – रोता आया,” अरे पापा, पापा दीदी वहां चटान के पास पड़ी है। उसके मुंह से खून निकल रहा है।”
सब वहां भागे – भागे जाते हैं। पर राधा अब चली गई थी।

बच्ची ममी से चपटना चाह रही थी। उसे दूर ले जाया गया। सब रो रहे हैं। मोहन भैया भी फुट – फुट कर रो रहे हैं। शायद राधा ने रात को बच्ची को सुला कर उस पास वाली चटान से कूद कर अपनी जान दे दी थी। वह कुछ सहन नहीं कर पाई थी शायद। उसकी सहन शक्ति जबाव दे गई होगी। वहां सास की खींच – खींच और यहां उसे निचले कमरे में रखा जाना शायद रास नहीं आया। वह अंदर ही अंदर कुढ़ कर अपनी जान दे देती है।

उधर शहर से राधा के पति व ससुर घर पहुंचते हैं। उनसे राधा की सास ने कहानी उल्टी बता दी थी। पोस्ट मार्टम हुआ और लाश जाला दी गई। पुलिस केस दोहरा हो गया था। राधा के घर वालो ने मोहन भैया का केस किया और मोहन भैया ने घरेलू हिंसा का केस किया। दोनों परिवारों में आग लगी है। यहां पिंकू भी बहुत दुखी है।वह तो शायद दूसरी शादी करके संभल जाएगा पर बेचारी उस नन्ही सी बेटी की मां को कौन वापिस लाएगा? वह हर रोज मायूस होकर उस रास्ते को देखती रहती है, जहां से उसकी मां को जलाने के लिए ले जाया गया था।

घोषणा :- यह मेरी मौलिक और स्वरचित कहानी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — यह एक प्रेम कहानी है। इस कहानी में हेमराज ठाकुर जी ने भारतीय समाज की जात पात की रूढ़ भावना के चंगुल में जकड़े होने के उन कारणों पर भी प्रकाश डाला है, जिन के कारण आज की युवा पढ़ी लिखी पीढ़ी भी उसी छुआ छूत के जंजाल में फंसी पड़ी है। लेखक ने यह सिद्ध करने की कोशिश भी की है शायद कि आज़ादी के 74 सालों बाद भी भारतीय समाज जात पात की निकृष्ठ विचारणा से बाहर नहीं आ पाया है। इतना ही नहीं प्रेम के पाश में बंधे जोड़ो में यदि विजातीय प्रेम विवाह बच्चों के द्वारा किया जाता है तो उच्च वर्गीय समाज के अभिभावक अपनी सन्तान से नाता ही तोड़ देते हैं पर इस सामाजिक बुराई का विरोध नहीं कर पाते। चाहे उन्हे अपनी संतानों की जान ही क्यों न खोनी पड़े। सामाजिक नियमों और प्रतिष्ठाओं का इस सम्बन्ध में इतना प्रभाव है कि देश का कानून भी इसके आगे कुछ नहीं कर पाता। लेखक ने पात्रों के माध्यम से यह भी सिद्ध करने की कोशिश की है कि इस समस्या का मुख्य कारण वर्तमान पढ़े लिखे समाज के सामने जातिगत आरक्षण भी है शायद। संविधान में तो इस भेद भाव को मिटाने की बात की गई है और निम्न समझा जाने वाला समाज संविधान की इस दलील को पूर्ण रूप से लागू करने की मांग भी समाज से करता है। परन्तु आरक्षण छोड़ने को तैयार नहीं है। जबकि संविधान में आरक्षण का प्रावधान मात्र 10 साल तक प्रभावी रखने के निर्देश संविधान निर्माताओं ने दिए थे। इधर उच्च वर्गीय समाज को इस प्रथा से बाहर आने को कहा जाता है तो वह इसी जातिगत आरक्षण की बात डंके की चोट देकर करता है। एक छोड़ने को तैयार नहीं और दूसरा मानने को तैयार नहीं। इसी कारण नई और पढ़ी लिखी पीढ़ी में भी यह भावना सब कुछ जानते और समझते हुए भी निरंत बढ़ती ही जा रही है। लेखक का मानना है कि संसार में मात्र दो ही जातियां हैं, एक स्त्री और दूसरी पुरुष। जो प्रकृति ने सृष्टि संचालन के उद्देश्य से अपना सहयोग करने के लिए बनाई है। बाकी सब मानव मस्तिष्क की खुराफत है। अतः इस कहानी से हमे यह संदेश मिलता है कि भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने के लिए हमे भारत से जात पात के भेद भाव को जड़ से मिटाना होगा। पुनः वैदिक दर्प को स्थापित करना होगा।

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यह कहानी (दास्तान ए जात पात।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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हिन्दी साहित्य में नाथ परम्परा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हिन्दी साहित्य में नाथ परम्परा। ♦

नाथ परम्परा का नाम सुनते ही हमारे मनो मस्तिष्क में भभूतधारी अवधूत हठ योगियों की कर्णभेदी और कुंडलधारी, जटाजुट युक्त मृगछालधारी तथा गले में रुद्राक्ष मालाधारी व कांख में खप्परधारी छवि का दर्शन हो जाता है। सिंगी, त्रिशूल और आधारी को सदैव अपने साथ धारण करने वाला वह वैरागी समुदाय हमारे अंतःकरण में चलचित्र की भांति प्रकट होता है, जो सांसारिक भय, वितराग, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, वासनाओं और विपरीत लिंगी आकर्षण इत्यादि से सदैव मुक्त रहा तथा समाज को इसी दिशा की और चलने की शिक्षा – दीक्षा देता रहा।

इतिहास के गहन में जाकर जब खंगालने की कोशिश करेंगे तो हमें पता चलता है कि यह समुदाय हिंदी साहित्य के क्षेत्र में तब कूदा था जब सिद्ध परंपरा के साहित्य के उपभोग एवं विलासिता की पराकाष्ठा समाज में विद्यमान हो चुकी थी। ठीक -ठीक तो बताया नहीं जा सकता परंतु अंदाजन यह कहना गलत नहीं होगा कि लगभग नौवीं शताब्दी के बीच में इस परंपरा ने हिंदी साहित्य में अपने पंथ की विचारधारा को कलमबद्ध करके सामाजिक कुरीतियों का खंडन करना शुरू किया था।

अब इसके पीछे चाहे सिद्ध परंपरा के साहित्य का विरोध आधार बना हो या फिर तत्कालीन परिपेक्ष्य में अरब देशों से होने वाले विभिन्न आक्रमणकारियों एवं आतताइयों की आक्रमण शैली से समाज को बचाने के लिए उनका प्रतिकार करना रहा हो। सर्वधर्म समभाव की परिकल्पना भी उनकी एक विशुद्ध भावना इस काल में रही है।

आतताइयों के संक्रमण का खंडन करने वाली पृष्ठभूमि का एक उदाहरण गुरु गोरखनाथ जी के शिष्य की एक रचना के अंश से स्पष्ट देखा जा सकता है, जिसमे धर्मगत विभक्तता से ऊपर उठकर यौगिक विशिष्टता बताई गई है:—

हिंदू मुसलमान खुदाई के बंदे, हम जोगी न कोई किस्से के छन्दे।

यह कतई नहीं नकारा जा सकता कि नाथ परंपरा ने हिंदी साहित्य में जो अपना योगदान हिंदी साहित्य के इतिहास के प्रारंभिक दौर में प्रदान किया है, वह हिंदी साहित्य का आधार बन गया। यदि हम हिन्दी साहित्य के इतिहास को पढ़े तो पता चलता है कि हमारा हिंदी साहित्य का इतिहास विभिन्न काल खंडों में विभाजित किया गया है। हिंदी साहित्य के प्रारंभिक काल को आदिकाल के नाम से नामित किया गया है। उस आदिकाल के साहित्य को भी तीन वर्गों में बांटा गया है:—

  1. धार्मिक साहित्य।
  2. लौकिक साहित्य।
  3. इतर साहित्य।

इनमें से यदि नाथ परंपरा के साहित्य की बात की जाए तो यह साहित्य निश्चित ही धार्मिक साहित्य के अंतर्गत आता है। जिस कालखंड में नाथ परंपरा का साहित्य हिंदी साहित्य जगत में प्रकट हुआ, वह कालखंड निश्चित संक्रांति के दौर से गुजर रहा था। वहां जहां एक ओर से समाज सिद्ध परंपरा की भोग विलास पूर्ण साहित्य पद्धति का शिकार बनता जा रहा था तो वहीं दूसरी ओर विदेशी आक्रांताओं की आतंकपूर्ण जीवनशैली और भाषा वैविध्य के चक्रव्यू में भी निरंतर उलझता जा रहा था। इन सभी प्रकार के प्रपंचो से समाज को बाहर लाने के लिए नाथ परंपरा के साहित्यकारों ने अपनी साहित्यिक चमक को हिंदी साहित्य में प्रविष्ट करके भारतीय जनमानस को एक नई दिशा और गति दी।

अश्लीलता और मानसिक भ्रष्टाचार से बाहर ला कर समाज को आंतरिक शुद्धि एवं पवित्रता की ओर अग्रसर किया। आत्म संयम तथा मानसिक संतोष के सद चरित्र वाले जीवन को जीने के लिए जो मार्ग नाथ परम्परा के साहित्य ने भारतीय समाज को प्रशस्त किये, वे आगे चलकर कबीरपंथी विचारधारा में भी अपना वर्चस्व बनाए रखते हुए नजर आते हैं। यह बात जरूर है कि नारी जीवन से दूर रहने की प्रवृत्ति के कारण तथा उनके साधना तथा ज्ञान मार्ग की नीरसता एवं शुष्कता के कारण कालांतर में यह परंपरा धीरे – धीरे समाज के मानस पटल पर अपना दीर्घकालीन प्रभाव छोड़ने में असमर्थ रही। अपने शिष्यों की कड़ी परीक्षा लेने के कारण भी इस परंपरा में आगे शिष्यों का निरंतर जुडना बाधित हो गया। परंतु इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस परंपरा के नाथों और साहित्य ने तत्कालीन भारतीय जनमानस के अंतःकरण को आंदोलित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

◊ नाथ परम्परा ◊

इससे पहले कि हम इस परंपरा के साहित्य की प्रवृत्तियों के बारे में बात करें; हमें नाथ परम्परा के बारे में संक्षिप्त रूप से जान लेना चाहिए। एक किंवदंती के अनुसार इस परंपरा के आरंभ की घटना उस पौराणिक आख्यान से जोड़ी जाती है जो भगवान शिव तथा माता पार्वती के अमर कथा संवाद के दौरान घटी थी। माना जाता है कि एक बार चलते – चलते भगवान शिव और माता पार्वती को किसी वन प्रदेश में रात हो गई। वे दोनों उस रात्रि को एक पेड़ के नीचे विश्राम करने के लिए रुक गए।

इसी विश्राम के दौरान माता पार्वती ने भगवान शिव से अमर कथा सुनाने का आग्रह किया। माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने माता पार्वती को इस शर्त पर अमर कथा सुनाने की सहमति दी कि जब तक आप इस अमर कथा को सुनते – सुनते हुंकारा भरती रहेगी, तब तक मैं इस कथा को निर्बाध गति से सुनाता रहूंगा।जब हुंकारा बंद हो जाएगा तब मैं इस कथा को सुनाना बंद कर दूंगा। माता पार्वती ने भगवान शिव के इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और भगवान शिव समाधि में विलीन होकर अमर कथा को मां पार्वती को सुनाने लगे। इस बीच माता को अर्ध रात्रि के समीप नींद आ गई।

माता के बदले यह हुँकारा उस पेड की कोटर में एक शुक (तोते) के फटे हुए अण्डे के कुछ हिस्से में बचे हुए तरल पदार्थ से अमर कथा के प्रभाव से उत्पन्न शुक के बच्चे ने भरना शुरू किया। माना जाता है कि उस जीर्ण क्षीर्ण और परित्यक्त अण्डे के एक टुकड़े में जो भी तरल पदार्थ फटने के बाद शेष रह गया था, उसी से शुक के बच्चे का अमर कथा के प्रभाव से जन्म हुआ और उसी बच्चे ने मानवानुकर्ण करके माता के सोने के बाद अमर कथा का आनंद लेने हेतु हुंकारा भरना शुरू किया। जब प्रातः काल भगवान शिव ने अपने नेत्र खोले, तो पाया कि माता पार्वती तो सोई हुई है।

ऐसे में उन्होंने देखा कि उनके द्वारा सुनाई गई अमर कथा को तो एक शुक का बच्चा सुन गया। भगवान शिव ने विचार किया कि यह शुक पुत्र तो अमर हो जाएगा। तब उन्होंने त्रिशूल लेकर उस शुक पुत्र का पीछा किया। आगे-आगे शुक पुत्र और पीछे-पीछे भगवान शिव। आगे किसी झरने में महर्षि वेद व्यास जी की धर्म पत्नी प्रातः काल सनान कर रही थी। उसने कूला करने के नियमित मुंह खोला था कि वह शुक पुत्र शरण लेने हेतु उनके मुंह में घुसकर ऋषि पत्नी के गर्भ में छिप गया।

भगवान शिव को पीछा करते हुए जब महर्षि वेद व्यास जी ने देखा और पीछा करने का कारण पूछा तो मुस्करा दिए। जब भगवान शिव ने क्रोधित स्वर में व्यास जी से मुस्कराने का कारण पूछा तो व्यास जी ने मुस्कराते हुए ही जबाव दिया कि हे प्रभु ! इसीलिए तो आपको भोलेनाथ कहा जाता है। हे प्रभु! जिस जीव ने साक्षात स्वयं आपके श्री मुख से अमर कथा का श्रवण किया हो, उसे भला कौन मृत्यु दे सकता है।इसलिए हे प्रभु! गुस्सा त्याग दो और लौट जाओ। यह जो शुक पुत्र का पीछा आप इसके प्राण हरण के नियमित कर रहे हैं, यह व्यर्थ है।

यह सुनकर भगवान शिव प्रसन्न होकर लौट जाते हैं। वह शुक का बच्चा 12 वर्ष तक बाह्य माया के डर से ऋषि पत्नी के गर्भ में पड़ा रहा। 12 वर्ष बाद वेद व्यास जी ने उससे बाहर आने की प्रार्थना की, हे पुत्र ! यह संसार के नियम के विरुद्ध है। अब आप अपनी मां के गर्भ से बाहर निकलो। आपकी मां को अतिशय कष्ट हो रहा है। तो तब उस गर्भस्थ शुक पुत्र ने अंदर से आवाज दी कि हे पिताश्री मैं एक ही शर्त पर बाहर आऊंगा यदि आप अपने सिद्धि बल से जगतपति प्रभु से यह प्रार्थना करें कि जिस क्षण तक मैं संसार में प्रविष्ट होने की प्रक्रिया से गुजरूं, उस क्षण तक अपनी योग माया को वे संसार में प्रभावहीन कर दें।

◊ 84 सिद्ध 9 नाथ ◊

माना जाता है कि महर्षि वेद व्यास ने प्रभु से प्रार्थना की और प्रभु ने अपनी योग माया का प्रभाव क्षण भर के लिए संसार में रोक लिया। ठीक इसी क्षण शुकदेव के साथ-साथ 93 अन्य जीवात्माओं ने भी जन्म लिया। इस प्रकार उस माया हीन प्रभाव के क्षण में इस संसार में 94 जीवात्माएं पैदा हुई। उनमें 84 सिद्ध 9 नाथ और एक स्वयं शुकदेव जी महाराज उत्पन्न हुए। ये नौ नाथ निम्नलिखित माने जाते हैं:—

  1. आदिनाथ (स्वयं सदा शिव)।
  2. मच्छेंद्र नाथ या मत्स्येंद्र नाथ (गोरखनाथ के गुरु)।
  3. गुरु गोरखनाथ (नाथ साहित्य परंपरा के प्रवर्तक)।
  4. गहिणीनाथ।
  5. चर्पटनाथ।
  6. चौरंगीनाथ।
  7. जालंधर नाथ।
  8. भरथरी नाथ या भर्तृनाथ।
  9. गोपीचंद नाथ।

◊ नाथ संप्रदाय का आविर्भाव ◊

इस घटनाक्रम से भी नाथ पंथ या नाथ संप्रदाय को जोड़ा जाता है, जिसमें तर्क यह भी दिया जाता है कि भगवान सदा शिव उसी मायाहीन घड़ी में संसार में अपने पंथ का प्रादुर्भाव करने की इच्छा से लीला रूप में आए थे। इसके विपरीत यदि हिंदी साहित्य के इतिहास को खंगाले तो नाथ संप्रदाय का उद्भव हिंदी साहित्य में गुरु गोरखनाथ जी से उद्भूत हुआ मिलता है। गुरु गोरखनाथ जी के विषय में अगर इतिहास में देखें तो कुछ लोग उन्हें आठवीं सदी का मानते हैं तो कुछ 10वीं /11वीं या तेरहवीं सदी का मानते हैं। हालांकि गुरु गोरखनाथ जी का साहित्य लगभग 16वीं शताब्दी में सामने आता है। यह भी माना जाता है कि नाथपंथियों ने लगभग 40 ग्रंथों की रचना की। हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने तो नौवीं शताब्दी के मध्य में नाथ पंथ का प्रादुर्भाव माना है। डॉ पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने गोरखनाथ का काल 10 वीं शताब्दी में निर्धारित किया है। यदि डॉ श्रीनिवास शर्मा की माने तो उक्त दोनों विद्वानों की टिप्पणियों के आधार पर उन्होंने नाथ संप्रदाय का आविर्भाव नौवीं शताब्दी के मध्य भाग में माना है।

यदि उक्त टिप्पणियों के साथ – साथ समग्र हिंदी साहित्य के इतिहास का गहन अन्वेषण किया जाए तो कहना न होगा कि नाथ साहित्य परंपरा का प्रभाव लगभग 9वीं सदी से 14वीं सदी तक हिंदी साहित्य में बना रहा। नाथ परंपरा ने इस कालखंड में भारतीय जनमानस पर साहित्य और धर्म का शासन किया।

यदि राहुल सांकृत्यायन जी की बात को माना जाए तो निश्चित रूप से नाथ परंपरा सिद्ध परंपरा की वज्रयान शाखा की सहज मार्गी परंपरा से विकसित हुई एक परम्परा है। इधर एक मत यह भी है कि नाथ संप्रदाय पर बौद्ध धर्म के महायान की तंत्र परंपरा का प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलता है।

इस परम्परा के प्रादुर्भाव को स्पष्ट करते हुए सोशल मीडिया के कुछ आलेखों में पढ़ने को मिलता है की नाथ संप्रदाय का प्रादुर्भाव ना + थ से हुआ है। ‘ना’ का अर्थ ‘अनादि रूप है ‘ अर्थात सदाशिव तथा ‘थ’ का अर्थ वह अनादि धर्म है, जो भूवनत्रय की स्थिति का कारण है। नाथ – वह तत्व है जो मोक्ष प्रदान करता है।

इस परम्परा में नाथ एक उपाधि मानी जाती थी। जब कोई शिष्य गुरु परम्परा में कड़ी परीक्षा के बाद सफल सिद्ध होता था तो उसे यह नाथ की उपाधि प्रदान की जाती थी और वह शिष्य अपने नाम के पीछे नाथ शब्द का उपाधि सूचक शब्द लगाकर समाज में विशिष्ट व्यक्तित्व प्राप्त कर लेता था। ये अपने गुरु को ही भगवान मानते थे।

◊ नाथ परम्परा का हिंदी साहित्य को योगदान ◊

इस परम्परा का आदि गुरु भगवान शिव स्वयं काे माना जाता है। अर्थात आदिनाथ के रूप में भगवान शिव को ही इस परम्परा में स्थान प्राप्त है।
नाथ परम्परा का हिंदी साहित्य को योगदान :—…

हिंदी साहित्य को आदिकाल से आधुनिक काल तक एक दृष्टि से जब देखा जाए तो यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हिंदी साहित्य के क्षेत्र में जो शिष्टता, आंतरिक शुद्धि, इंद्रिय निग्रह, वैचारिक पवित्रता,अष्टांग साधना, कुंडलीनी जागरण तथा उसके साथ – साथ प्राण शोधन तथा हठयोग इत्यादि मानसिक संयमों का प्राकाट्य यदि सर्वप्रथम किसने किया था, तो वह इस नाथ परम्परा ने ही किया था।उसके पीछे पृष्ठभूमि भले ही कुछ भी रही हो। या फिर कारण कोई भी रहा हो। परंतु व्यक्तिक सद-चरित्रता का संदेश प्रथम बार हिंदी साहित्य में यदि किसी परंपरा ने दिया है तो वह निश्चित तौर से नाथ साहित्य परंपरा से प्राप्त होता है। इस साहित्य परंपरा की प्रमुख प्रवृतियां निम्नलिखित रही है:—

1. उलटवासियों का प्रयोग: नाथ संप्रदाय के नाथों एवं कवियों ने साहित्य के क्षेत्र में अपनी अंतरतम गहन साधना के रहस्य को भाषा के माध्यम से जिन छंदों और प्रतीकों के माध्यम से प्रकट किया है, उन्हें उल्टवासियों के नाम से जाना जाता है। यह रहस्य ऐसी शब्दावली के प्रयोग से प्रकट किया गया होता है कि आम जनमानस की समझ से कई बार परे हो जाता है ।उदाहरण के रूप में गुरु गोरखनाथ जी के गुरु मत्स्येंद्र नाथ की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत है : –

जल कुंच है माछली, खण कुंचा है मोर।
सेवक चाहे राम कूं, ज्यौं ध्यंतवत चंद चकोर॥

इसी प्रकार से गुरु गोरखनाथ जी के काव्य संग्रह – “गोरख वाणी“ का एक उदाहरण है:-

यह मन सकती यहु मन सीव।
यहु मन पांच तत का जीव॥

इन उलटवासियों का प्रभाव आगे चलकर संत साहित्य में भी विशेषकर कबीर पंथ में साफ – साफ दिखाई देता है। इसकी पुष्टि करता हुआ एक उदाहरण देखें : –

नाथ बोले अमृत वाणी, बरिषै कंवली भीजेगा पांणी।
कउवा की डाली पीपल बासै, मूसा के सबद बिलइया नासै॥

नाथों का साहित्य अधिकतर साधनापरक है, इसलिए उसमें अधिकतर काव्य तत्वों की सरसता का पर्याप्त अभाव है।

2. हठयोग एवं अष्टांग मार्ग का प्रतिपादन : नाथ परंपरा में हठयोग का विशेष महत्व रहा है, जिसका प्रभाव नाथ साहित्य में भी साफ- साफ नजर आता है। हठयोग से अभिप्राय नाथ परंपरा में – ‘ह’ से सूर्य और ‘ठ’ से चंद्र से है। अर्थात सूर्य और चंद्र स्वर की संयुक्त साधना जो शिव स्वर तन्त्र में त्रिनाड़ी तंत्र के अंतर्गत आती है; उस योग को हठयोग का नाम दिया गया है। कुछ लोग अपवाद स्वरूप इस को जबरदस्ती किया जाने वाला योग मार्ग भी कह देते हैं।जबकि यह नितांत गलत है। ध्यान से अगर हम नाथ साहित्य को पढ़ें तो स्वत: ही स्पष्ट हो जाता है कि महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग में जो साधना पद्धति बताई गई है, नाथ पथियों का हठयोग भी उसी से मेल खाता है। उदाहरण के लिए नाथ साहित्य के कुछ अंश इस प्रकार है : –

 १ . आसण बैसिवा पवन निरोधिवा वान मान सब धंधा।
बदंत गोरखनाथ आतमा विचारत ज्यूँ लज लज दीसै चंदा॥

२ . ईडा मारग चन्द्र मणीजै प्यगुला मारग मानं।
सुषमनां मारग वांणी बोलिए त्रिय मूल अस्थानं॥

३ . भोगिया सूते अजहुं न जागे भोग नहींज रे रोग अभागे।

अतः कहा जा सकता है कि नाड़ी शोधन में इडा, पिंगला, सुषुम्ना नाडियों का प्रयोग, षडचक्र में मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनहद, विशुद्ध और आज्ञा चक्र के साथ-साथ सहस्रार कमल या शुन्य समाधि स्थल का वर्णन भी नाथ साहित्य में मिलता है।कुंडली जागरण के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहना और शुन्य समाधि स्थल में पहुंचकर अपनी साधना के चरम को प्राप्त करना नाथ पंथियो का मोक्ष कहलाता है।

3. गुरु की महिमा : इस परंपरा में गुरु को साक्षात भगवान का दर्जा दिया जाता है। इतना ही नहीं इस परंपरा के सभी साधकों का मानना यह था की मुक्ति और निवृत्ति गुरु कृपा से ही संभव है। उदाहरण के लिए नाथ साहित्य का एक अंश देखा जा सकता है : –

गुरु कीजै गहिला, निगुरा न रहिला।
गुरु बिन ग्यांन न पाइलर रे भाइला॥

गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति असंभव है। इस बात की पुष्टि करती हुई ये पंक्तियां अपने आप उस युग के साक्ष्य को देती है कि नाथ पंथ गुरु के प्रति कितना समर्पित था।

4. परंपरागत रूढ़ियों एवं बाह्य आडम्बरों का विरोध : यह बात ऊपर ही पुष्ट कर दी गई है कि जिस काल में नाथ संप्रदाय का साहित्य समाज के सामने उद्घाटित हुआ। वह संक्रांति काल था। उस समय मुस्लिमों के आगमन के कारण तथा सिद्ध पंथियो के विलासितापूर्ण साहित्यिक भावबोध से समाज नवीन नाथ परंपरा के साहित्य की ओर अग्रसर हो रहा था। समाज उस वक्त नाना प्रकार की कर्मकांडी प्रक्रियाओं से गुजर रहा था। वे सभी स्थितियां एवं क्रियाएं अधिकतर बाह्या अडम्बरों से परिपूर्ण थी। ऐसी परिस्थिति में इन सभी परिस्थितियों का विरोध करता हुआ एक नया संप्रदाय समाज के सामने अपने साहित्य को लेकर आता है, जो नाथ परंपरा के नाम से जाना जाता है। गुरु गोरखनाथ जी की गोरख वाणी में तो इन आडम्बरों का विरोध हुआ ही, हुआ है बल्कि उनके आगे भी इस परंपरा में बाह्य आडंबर का निरंतर विरोध होता रहा। इन्होंने सहज, सरल एवं निश्छल जीवन को जीने की शिक्षा के साथ-साथ शोषण मुक्त समाज की परिकल्पना साकार करने की शिक्षा भी तत्कालीन समाज को अपने साहित्य के माध्यम से देने की पूरी- पूरी कोशिश की।

5. चित्त शुद्धि और सदाचार में विश्वास : इस परंपरा के संपूर्ण साहित्य में हमें निरंतर आत्म शुद्धि, आंतरिक पवित्रता, मानसिक संयम एवं तप, पवित्र दृष्टि और पावन व्यवहार इत्यादि का चित्रण देखने को मिलता है। यह बात अलग है कि इन लोगों का बाह्य हुलिया आम जनमानस को देखने में भले ही ठीक नहीं लगता होगा। परंतु इनका अंतः करण और इनका जीवन व्यवहार जिस तरह से पवित्र था, उसी तरह की बातें इनके द्वारा लिखे गए साहित्य में संपूर्ण समाज को सदाचार की शिक्षा देती हुई नजर आती है। इंद्रिय निग्रह, कुंडलीनी जागरण, चित्त शुद्धि आदि-आदि बातें इनकी जीवन शैली में साक्षात नजर आती है और उन्हीं का परिणाम इनके साहित्य में भी फलीभूत हुआ है।

6. गृहस्थ जीवन के प्रति नकारात्मकता : यह बात सही है कि सिद्ध साहित्य की तरह नाथ साहित्य में नारी जीवन और गृहस्थ जीवन के प्रति आस्था नजर नहीं आती, परंतु फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि नाथों का दृष्टिकोण नारी के प्रति और गृहस्थी के प्रति पूर्ण रूप से प्रतिकूल था। हां यह सत्य है कि इस ओर नाथ पंथियों की नकारात्मक दृष्टि जरूर थी। नाथ परंपरा में यह विचारधारा जरूर पुष्ट थी कि चारित्रिक पतन का कारण नारी रहती है और इसलिए वह हमेशा नारी से दूरी बनाए रखने की सलाह अपने शिष्य परंपरा में देते रहते थे। यही वह मुख्य कारण था जिसके चलते कालांतर में यह परंपरा समाज में अपना प्रभाव धीरे – धीरे खोती गई। कुछ विद्वानों का मानना यह भी है कि यह विचारधारा गुरु गोरखनाथ जी में तब घर कर गई थी, जब उन्होंने बौद्ध बिहारों में बौद्ध भिक्षुणियों के व्यवहार को देखा होगा।

हिंदी साहित्य के आगामी कालो पर नाथ साहित्य का प्रभाव : –

हिंदी साहित्य के इतिहास को जब हम पढ़ते हैं तो नाथ साहित्य का सीधा – सीधा प्रभाव भक्ति काल में निर्गुण मार्गी शाखा में दिखाई पड़ता है। निर्गुण मार्गी शाखा में भी ज्ञानाश्रयी कबीर पंथ पर इस साहित्य परंपरा का प्रभाव स्पष्ट नजर आता है। उक्त की सारी प्रवृतियां तथा उलटवासियों की वही नाथपंथी शब्दावली कबीर मार्गी शाखा में साफ – साफ देखी जा सकती है। आचरण की शुद्धता की ओर अग्रसर कबीर पंथ को यदि नाथ साहित्य के साथ जोड़ कर देखा जाए तो बहुत सारी बातें इन दोनों पंथों की आपस में कहीं न कहीं मेल खाती है।

निष्कर्ष (Conclusion) : –

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि नाथ परंपरा हिंदी साहित्य के इतिहास में आदिकाल के प्रारंभिक चरण में नवी शताब्दी के आसपास विकसित हुई और निरंतर चौदहवीं सदी के आसपास तक समाज में अपना धार्मिक और साहित्यिक प्रभाव बनाए रखने में कामयाब हुई। इस पंथ की साहित्य परंपरा ने हिंदी साहित्य में जिस तरह से अपना प्रभाव छोड़ा है, वह अपने आप में अद्वितीय है। अतीत के संस्कृत साहित्य की गहन एवं गुप्त रहस्यमई घटनाओं को आम जनमानस की भाषा में उद्घाटित करने का कार्य हिंदी साहित्य में नाथपंथी परंपरा ने ही किया था। समाज के चारित्रिक उत्थान तथा मानसिक विकास का आधार यही परंपरा हिंदी साहित्य में बनी। अष्टांग योग के रहस्य को जनभाषा में प्रस्तुत करने की परिकल्पना नाथ संप्रदाय ने ही हिंदी साहित्य को प्रदान की। जिसका प्रभाव आगे चलकर कबीर पंथ में भी नजर आता है। गुरु के महत्व को और बाहरी आडंबर के खंडन को नाथ पंथियों की विचारधारा का स्वस्थ एवं पुष्ट पक्ष कहा जा सकता है। अतः कहा जा सकता है कि जब तक साहित्य की दुनिया में हिंदी साहित्य का पठन-पाठन होता रहेगा। तब तक नाथ साहित्य के महत्व को भुलाया नहीं जा सकता।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — इस पंथ की साहित्य परंपरा ने हिंदी साहित्य में जिस तरह से अपना प्रभाव छोड़ा है, वह अपने आप में अद्वितीय है। अतीत के संस्कृत साहित्य की गहन एवं गुप्त रहस्यमई घटनाओं को आम जनमानस की भाषा में उद्घाटित करने का कार्य हिंदी साहित्य में नाथपंथी परंपरा ने ही किया था। समाज के चारित्रिक उत्थान तथा मानसिक विकास का आधार यही परंपरा हिंदी साहित्य में बनी। अष्टांग योग के रहस्य को जनभाषा में प्रस्तुत करने की परिकल्पना नाथ संप्रदाय ने ही हिंदी साहित्य को प्रदान की। आजकल की पीढ़ी आधुनिकता के नाम पर भूलते जा रहे है अपनी ही प्राचीन संस्कृति, संस्कार व सभ्यता को। “याद रखें- हवा में उड़ने वाले हर परिंदे को भी तो आखिर में, थक हार कर किसी न किसी शाख पर टिकना है।”

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यह लेख (हिन्दी साहित्य में नाथ परम्परा।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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