• Skip to main content
  • Skip to primary sidebar
  • Skip to footer
  • HOME
  • ABOUT
    • Authors Intro
  • QUOTES
  • POETRY
    • ग़ज़ल व शायरी
  • STORIES
  • निबंध व जीवनी
  • Health Tips
  • CAREER DEVELOPMENT
  • EXAM TIPS
  • योग व ध्यान
  • Privacy Policy
  • CONTACT US
  • Disclaimer

KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

Check out Namecheap’s best Promotions!

You are here: Home / Archives for stories in hindi

stories in hindi

Betal Pachisi – बेताल पच्चिसी – बच्चों के लिये कहानियां हिंदी में !!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..


kmsraj51 की कलम से …..
pen-kms


चंद्रशेखर नगर में रत्नदत्त नाम का एक सेठ रहता था। उसके एक लड़की थी। उसका नाम था उन्मादिनी।
जब वह बड़ी हुई तो रत्नदत्त ने राजा के पास जाकर कहा कि आप चाहें तो उससे ब्याह कर लीजिए। राजा ने तीन दासियों को लड़की को देख आने को कहा।

240

उन्होंने उन्मादिनी को देखा तो उसके रूप पर मुग्ध हो गईं, लेकिन उन्होंने यह सोचकर कि राजा उसके वश में हो जाएगा, आकर कह दिया कि वह तो कुलक्षिणी है, राजा ने सेठ से इंकार कर दिया।

इसके बाद सेठ ने राजा के सेनापति बलभद्र से उसका विवाह कर दिया। वे दोनों अच्छी तरह से रहने लगे।

एक दिन राजा की सवारी उस रास्ते से निकली। उस समय उन्मादिनी अपने कोठे पर खड़ी थी। राजा की उस पर निगाह पड़ी तो वह उस पर मोहित हो गया। उसने पता लगाया। मालूम हुआ कि वह सेठ की लड़की है।

249

राजा ने सोचा कि हो-न-हो, जिन दासियों को मैंने देखने भेजा था, उन्होंने छल किया है। राजा ने उन्हें बुलाया तो उन्होंने आकर सारी बात सच-सच कह दी। इतने में सेनापति वहां आ गया। उसे राजा की बैचेनी मालूम हुई।

उसने कहा, ‘स्वामी उन्मादिनी को आप ले लीजिए।’ राजा ने गुस्सा होकर कहा, ‘क्या मैं अधर्मी हूं, जो पराई स्त्री को ले लूं?’

राजा को इतनी व्याकुलता हुई कि वह कुछ दिन में ही मर गया। सेनापति ने अपने गुरु को सब हाल सुना कर पूछा कि अब मैं क्या करूं? गुरु ने कहा, ‘सेवक का धर्म है कि स्वामी के लिए जान दे दें।’
राजा की चिता तैयार हुई। सेनापति वहां गया और उसमें कूद पड़ा।

जब उन्मादिनी को यह बात मालूम हुई, तो वह पति के साथ जल जाना धर्म समझ कर चिता के पास पहुंची और उसमें जाकर भस्म हो गई।
इतना कहकर वेताल ने पूछा, ‘राजन्, बताओ, सेनापति और राजा में कौन अधिक साहसी था?’

राजा ने कहा, ‘राजा अधिक साहसी था; क्योंकि उसने राजधर्म पर दृढ़ रहने के लिए उन्मादिनी को उसके पति के कहने पर भी स्वीकार नहीं किया और अपने प्राणों को त्याग दिया।

सेनापति कुलीन सेवक था। अपने स्वामी की भलाई में उसका प्राण देना अचरज की बात नहीं।

असली काम तो राजा ने किया कि प्राण छोड़ कर भी राजधर्म नहीं छोड़ा।’
राजा का यह उत्तर सुनकर वेताल फिर पेड़ पर जा लटका।

Note::-

यदि आपके पास Hindi में कोई article, inspirational story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी Id है::- kmsraj51@yahoo.in . पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

Filed Under: MANMANI BABU ~ KMSRAJ51 Tagged With: betaal pachchisi stories, great kms, hindi kids stories, kids stories, kids stories in hindi, king-kms, kms, Kmsraj51, sap-kms, sapna meri jaan, Sapna-kms, stories in hindi, बेताल पच्चिसी, बेताल पच्चिसी की कहानियां, स्टोरीज, हिन्दी कहानियां

मेरी माँ।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

♦ मेरी माँ। ♦

mother essay in hindi-kmsraj51

मेरी माँ की सिर्फ एक ही आँख थी। और इसीलिए मैं उनसे बेहद नफ़रत करता था। वो फुटपाथ पर एक छोटी सी दुकान चलाती थी। उनके साथ होने पर मुझे शर्मिंदगी महसूस होती थी। एक बार वो मेरे स्कूल आई और मैं फिर से बहुत शर्मिंदा हुआ। वो मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकती है ? अगले दिन स्कूल में सबने मेरा बहुत मजाक उड़ाया।

मैं चाहता था मेरी माँ इस दुनिया से गायब हो जाये। मैंने उनसे कहा, “माँ तुम्हारी दूसरी आँख क्यों नहीं है?” तुम्हारी वजह से हर कोई मेरा मजाक उड़ाता है।

तुम मर क्यों नहीं जाती ? माँ ने कुछ नहीं कहा। पर मैंने उसी पल तय कर लिया कि बड़ा होकर सफल आदमी बनूँगा। ताकि मुझे अपनी एक आँख वाली माँ और इस गरीबी से छुटकारा मिल जाये।

उसके बाद मैंने मेहनत से पढाई की। माँ को छोड़कर बड़े शहर आ गया। यूनिविर्सिटी की डिग्री ली। शादी की। अपना घर ख़रीदा। बच्चे हुए। और मै सफल व्यक्ति बन गया। मुझे अपना नया जीवन इसलिए भी पसंद था क्योंकि यहाँ मेरी माँ से जुडी कोई भी याद नहीं थी।

मेरी खुशियाँ दिन-ब-दिन बड़ी हो रही थी। तभी अचानक मैंने कुछ ऐसा देखा जिसकी कल्पना भी नहीं की थी। सामने मेरी माँ खड़ी थी। आज भी अपनी एक आँख के साथ। मुझे लगा कि मेरी पूरी दुनिया फिर से बिखर रही है।

मैंने उनसे पूछा, ‘आप कौन हो? मै आपको नहीं जानता। यहाँ आने कि हिम्मत कैसे हुई? तुरंत मेरे घर से बाहर निकल जाओ।’ और माँ ने जवाब दिया, ‘माफ़ करना, लगता है गलत पते पर आ गयी हूँ।’ वो चली गयी और मै यह सोचकर खुश हो गया कि उन्होंने मुझे पहचाना नहीं।

एक दिन स्कूल री-यूनियन की चिट्ठी मेरे घर पहुची और मैं अपने पुराने शहर पहुँच गया। पता नहीं मन में क्या आया कि मैं अपने पुराने घर चला गया। वहां माँ जमीन मर मृत पड़ी थी।

मेरे आँख से एक बूँद भी आंसू तक नहीं गिरा। उनके हाथ में एक कागज़ का टुकड़ा था, वो मेरे नाम उनकी पहली और आखिरी चिट्ठी थी।

उन्होंने लिखा था – मेरे बेटे….. मुझे लगता है मैंने अपनी जिंदगी जी ली है।
मै अब तुम्हारे घर… कभी नहीं आउंगी… पर क्या यह आशा करना कि तुम कभी-कभार मुझसे मिलने आ जाओ… गलत है? मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है। मुझे माफ़ करना कि मेरी एक आँख कि वजह से तुम्हें पूरी जिंदगी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। जब तुम छोटे थे, तो एक दुर्घटना में तुम्हारी एक आँख चली गयी थी। एक माँ के रूप में मैं यह नहीं देख सकती थी कि तुम एक आँख के साथ बड़े हो, इसीलिए मैंने अपनी एक आँख तुम्हें दे दी।

मुझे इस बात का गर्व था कि मेरा बेटा मेरी उस आँख कि मदद से पूरी दुनिया के नए आयाम देख पा रहा है। मेरी तो पूरी दुनिया ही तुमसे है। चिट्ठी पढ़ कर मेरी दुनिया बिखर गयी। मैं उसके लिए पहली बार रोया जिसने अपनी जिंदगी मेरे नाम कर दी… मेरी माँ।

याद रखें: प्यारे दोस्तों! माँ की जगह इस संसार में कोई और नही ले सकता। एक माँ ही है जो निस्वार्थ स्नेह करती है। इसलिए सदैव ही अपने माँ का सम्मान और सेवा करे मन से। माता – पिता का कभी भी अनादर न करे। माता – पिता के आशीर्वाद से दुनिया की सारी मुसीबतों का सामना आसानी से कर पाएंगे। वह सबकुछ प्राप्त होगा जो आप चाहते है अपने जीवन में।

♦——♦——♦——♦

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें।

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ® ———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी Id है: kmsraj51@hotmail.com. पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

cymt-kmsraj51

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____Copyright ©Kmsraj51.com  All Rights Reserved.____

Filed Under: 2013 - KMSRAJ51 की कलम से, मेरी माँ।, शिक्षाप्रद कहानियों का विशाल संग्रह। Tagged With: essay on mother in hindi, Essay on Mother's Love in hindi, jivan mein maa ka mahatva hindi nibandh, maa ka mahatva in hindi, maa ki mamta essay in hindi, mother essay in hindi, stories in hindi, छोटी कहानियाँ, प्रेरणादायक हिंदी कहानियां, माँ पर निबंध हिंदी में, शिक्षाप्रद कहानियाँ

बेनाम रिश्ता।

Kmsraj51 की कलम से…..

cymt-kmsraj51-1

♣♥ बेनाम रिश्ता। ♣♥

-मृदुला सिन्हा।

चित्राजी निमंत्रण-पत्र के साथ हाथ से लिखे मनुहार पत्र के हर अक्षर को अपनी नजरों से आँकती उनमें अंतर्निहित भावों को सहलाने लगीं। कई बार पढ़े पत्र। सोचा विवाह में इकट्ठे लोग पूछेंगे—मैं कौन हूँ? क्या रिश्ता है शालिग्रामजी से मेरा? क्या जवाब दूँगी मैं? क्या जवाब देंगे शालिग्रामजी? दोनों के बीच बने संबंध को मैंने कभी मानस पर उतारा भी नहीं। नाम देना तो दूर की बात थी। बार-बार फटकारने के बाद भी वह अनजान, अबोल और बेनाम रिश्ता चित्राजी को जाना-पहचाना और बेहद आत्मीय लगने लगा था। कभी-कभी उसके बड़े भोलेपन से भयभीत अवश्य हो जाती थीं और तब उस रिश्ते के नामकरण के लिए मानो अपने शब्द भंडार में इकट्ठे हजारों शब्दों को खँगाल जातीं। नहीं मिला था नाम। और जब नाम ही नहीं मिला तो पुकारें कैसे?

इसलिए सच तो यही था कि उन्होंने कभी उस रिश्ते को आवाज नहीं दी। रिश्ते के जन्म और अपनी जिंदगी के रुक जाने के समय पर भी नहीं। जिंदगी के पुनःचालित होकर उसकी भाग-दौड़ में भी नहीं। शालिग्रामजी को कभी स्मरण नहीं किया। शालिग्रामजी ने ही बेनाम रिश्ते को याद रखने की पहल की थी।

बहुत सोच-विचार करने के बाद चित्राजी ने भोपाल जाना तय कर लिया। बहुत दूर जाना था। बस, और फिर ट्रेन की यात्रा। वह भी गरमी में। शालिग्रामजी ने दूरभाष पर ही विश्वास दिलाया था—‘आपको कोई दिक्कत नहीं होगी। मेहमानों को ठहराने की व्यवस्था करते समय भी हमने मौसम का ध्यान रखा है। मैं समझता हूँ, हमारे मेहमानों को कोई कष्ट नहीं होगा। और आप तो खास मेहमान हैं।’

चित्राजी कुछ नहीं बोलीं। उन्होंने जब जाने का निश्चय ही कर लिया था तो कष्ट और आराम का क्या? शिमला बस स्टैंड पर वॉल्वो बस में बैठ गई थीं। मोबाइल की घंटी बजी। शालिग्रामजी का फोन था। उन्होंने कहा, ‘‘आपकी बस के दिल्ली बस अड्डे पर रुकते ही हमारा एक आदमी मिलेगा। उसका नाम राकेश है। उसके पास आपकी रेल टिकट होगी।’’

चित्राजी ने कुछ नहीं कहा। इतना भी नहीं कि मैंने टिकट ले रखी है। और वैसा ही हुआ। उनकी बस के रुकते ही एक व्यक्ति अंदर घुसा। उसकी खोजी नजर ने चित्राजी को पहचान लिया। उनकी अटैची नीचे उतारकर बोला, ‘‘आपके पास यदि कोई टिकट है तो मुझे दे दीजिए। मैं उसे कैंसिल करवा दूँ। ए.सी. द्वितीय श्रेणी की यह टिकट रख लीजिए। ट्रेन शाम को निजामुद्दीन स्टेशन से जाती है। मैं आपको लेने आ जाऊँगा। मैं भी आपके साथ चल रहा हूँ।’’

चित्राजी ने उस व्यक्ति को स्लीपर क्लास की टिकट निकालकर दे दी। वे थ्री-व्हीलर में बैठकर गोल मार्केट स्थित अपनी एक सहेली के क्वार्टर में चली गईं। शाम को सबकुछ वैसे ही घटा जैसा राकेश ने बताया था।

सुबह-सुबह गाड़ी के भोपाल जंक्शन पर रुकते ही एक नौजवान उनकी सीट तक आ गया। उनके पैर छूकर बोला, ‘‘मैं दीपक हूँ। मेरे पिता का नाम शालिग्राम कश्यप है।’’

चित्राजी ने ‘खुश रहने’ का आशीष दिया और उसके पीछे चल पड़ीं। गाड़ी आगे बढ़ रही थी। रोड पर भीड़ के कारण कभी-कभी उसका हॉर्न बजता। अंदर पूरी शांति बनी रही। कोई कुछ नहीं बोला। चित्राजी उस नौजवान से बातें करना चाहती थीं, पर शुरुआत कैसे करें।
उस घर की चौहद्दी, आबादी, संस्कार और स्थितियाँ, कुछ भी तो नहीं जानती थीं। भोपाल शहर के बारे में पूछने ही जा रही थीं कि दीपक बोल पड़ा—‘‘मैं आपको आंटी कहूँ ?’’

‘‘हुँ’’
‘‘तो आंटी! बारात आज शाम को आ रही है, लोकल बारात है, इसलिए समय से ही आ जाएगी। मैंने सुना कि आप कल ही लौट रही हैं। आपके पास समय बहुत कम है। पिताजी ने कहा है कि आप भोपाल शहर पहली बार आ रही हैं। इसलिए भोपाल भी तो देखना चाहेंगी। बड़ा सुंदर शहर है हमारा। आप जल्दी से तैयार हो जाएँ। आपको मेरा मौसेरा भाई घुमाने ले जाएगा।’’

‘‘ठीक है।’’ इतना ही बोल पाईं चित्राजी। मन तो उस व्यक्ति के प्रति आभार प्रकट करने को बन आया था। उनकी इतनी चिंता करनेवाले नौजवान को शाबासी भी दी जा सकती थी। पर वे कुछ नहीं बोलीं। दीपक बोला, ‘‘मेरे पिताजी आपकी बहुत प्रशंसा करते हैं। कहते हैं, आप साक्षात् देवी की अवतार हैं। पर पता नहीं क्यों, न आप कभी भोपाल आईं, न हमें शिमला बुलाया। कुछ देर पहले ही आपके बारे में बताया। आपसे मिलने की चाहत पनप आई। इसलिए कई काम छोड़कर स्वयं स्टेशन आ गया।’’

चित्राजी कुछ बोलने के लिए जिह्वा पर शब्द सजाने लगीं कि ड्राइवर ने गाड़ी में ब्रेक लगा दिया था। गाड़ी किसी गेस्ट हाउस के सामने रुकी। गाड़ी से उनका सामान निकालकर दीपक आगे बढ़ा। वे पीछे-पीछे। उन्हें अंदर तक पहुँचाकर बोला, ‘‘आंटी! आप यहाँ नहा-धो लें। नाश्ता घर पर ही करना है। फिर आप भोपाल दर्शन के लिए निकलेंगी। दोपहर का भोजन भी घर पर ही है। भोजन के बाद फिर यहाँ आराम करिएगा। शाम को तो शादी ही है।’’

चित्राजी कुछ नहीं बोलीं। दीपक के कमरे से निकलने पर अवश्य उसके पीछे गईं। आँखों की पहुँच से उसकी काया ओझल हो जाने पर पीछे लौट कमरे की सिटकिनी बंद कर बिस्तर पर बैठ गईं। सोचने लगीं—दीपक कितना लायक लड़का है। उन्नीस-बीस वर्ष का होगा। इतना जिम्मेदार और पितृभक्त! समाज नाहक परेशान है कि युवा पीढ़ी बिगड़ गई। मेरे साथ थोड़ी देर गुजारकर इस युवा ने मेरे मन में जगह बना ली। पर श्रेय तो इसके पिता को ही जाता है, शालिग्रामजी को। उनका ध्यान आते ही चित्राजी उठ बैठीं। अपना ध्यान बँटाने के लिए तैयार होने लगीं। चित्राजी के नहा-धोकर तैयार होते ही नरेश आ गया था। उन्हें नाश्ते के लिए ले जाते हुए पूछा, ‘‘आप दीपक की बुआजी हैं? उसकी दो बुआओं से मिल चुका हूँ। आपसे पहली बार मिला। दीपक का मैं मित्र हूँ।’’

शालिग्रामजी शीघ्रता से गेट पर पहुँचे। उन्होंने चित्राजी का अभिवादन किया। नरेश ने कहा, ‘‘घुमा लाया आंटी को भोपाल। इन्हें तीनों ताल अच्छे लगे।’’

नरेश इतना नहीं कहता तो शायद चित्राजी सामने खड़े व्यक्ति को पहचान भी नहीं पातीं। कुछ दरक गया था चित्राजी के अंदर। उन्होंने अपने को सँभाला। हाथ जोड़कर उनके अभिवादन का उत्तर देते हुए चेहरे पर भी मुसकान थी। नाश्ते का इंतजाम फ्लैट के बाहरवाले हिस्से में ही किया गया था। कुछ लोग नाश्ता समाप्त कर चुके थे, कुछ का जारी था, कुछ आनेवाले थे। शालिग्रामजी को चित्राजी को लेकर नाश्ते के स्थान पर पहुँचने में दो मिनट भी नहीं लगे होंगे, पर वहाँ उपस्थित नाश्ता कर रहे मेहमानों के प्लेट में पडें स्वादिष्ट व्यंजनों में मानो एक विशेष व्यंजन आ टपका।

‘‘ये कौन हैं?’’ प्रश्न पसरा।
‘‘इन्हें तो पहले कभी नहीं देखा।’’ स्वाद लेने लगे लोग।
आपस में प्रश्नों का आदान-प्रदान हो रहा था। उत्तर किसी के पास नहीं था। शालिग्रामजी की पत्नी माला भी आ गईं। रिश्तेदारों से नाश्ता का स्वाद पूछतीं, कुछ और लेने का आग्रह करतीं, आगे बढ़ रही थीं। किसी ने पूछ ही लिया—‘‘वे कौन हैं? कोटा की साड़ी में वे सुंदर सी महिला?’’
माला ने इधर-उधर आँखें दौड़ाईं। दूसरी ने स्वर दाबकर ही कहा, ‘‘वही, जो शालिग्रामजी के साथ हैं। उन्हें शालिग्रामजी ने स्वयं अपने हाथों से प्लेट लगाकर दी है। देखिए!’’ ठीक ही तो कहा था सबने। माला ने भी यही देखा। चाय का प्याला लिये खड़े थे शालिग्रामजी। सौम्य आकृति, लगभग उसकी ही हम-उम्र, बड़े सलीके से नाश्ता कर रही, कौन है यह महिला? शालिग्रामजी ने तो कभी इसका जिक्र नहीं किया। आमंत्रण भेजनेवाली सूची भी माला ने पढ़ी थी। किसी अनजान महिला का नाम नहीं था। फिर कौन है यह?

प्रश्न तो अनेक थे। पर वह अवसर नहीं था पति से प्रश्न पूछने का। जबकि अधिकांश मेहमानों के बीच यही प्रश्न बॉल की भाँति दिन भर उछलता उसकी पाली में भी आता रहा। रीति-रिवाज और रस्म अदाएगी में सब एक-दूसरे से पूछते रहे। दोपहर के लंच के समय भी चित्राजी आ गईं थीं।
शालिग्रामजी की एक साली उनके पास गई। पूछा, ‘‘आप कहाँ से आई हैं?’’

दूसरा प्रश्न पूछने ही वाली थी—‘‘आप मेरे जीजाजी को कैसे जानती हैं?’’
इस बीच स्वयं जीजाजी उपस्थित हो गए थे। उन्होंने अपनी साली को किसी और विशेष मेहमान की खातिरदारी में लगा दिया था।
गेस्ट हाउस में आराम करते हुए चित्राजी का मन कई मसलों में उलझ गया था। बहुत दिनों बाद पच्चीस वर्ष पूर्व घटी घटना का संपूर्ण दृश्य नजरों के सामने रूढ़ हो गया। शिमला से गाड़ी में पति-पत्नी और दोनों बच्चे का कुल्लु-मनाली के लिए प्रस्थान। थोड़ी दूरी पर जाते ही गाड़ी का खड्डे में गिरना। पति के सिर में चोट आना। उनका होश नहीं लौटना। डॉक्टर से बातचीत। बेहाल-बेहोश चित्राजी के सामने डॉक्टर की एक माँग। माँग पर शीघ्रता से विचार करने का आग्रह। अकेली खड़ी चित्राजी। दो नन्हे बच्चे माँ से चिपके। अपना-पराया कोई साथ न था। निर्णय लेना था चित्राजी को। सबकुछ चला गया था। जो बचा था, उसकी माँग थी। चित्राजी ने वह वस्तु देना स्वीकार कर लिया, जो उनकी थी। डॉक्टर का सुझाव। और फिर मृत्यु के करीब गया व्यक्ति जीवित हो गया।

स्मृतियों में जीवित था सब दृश्य। कभी-कभी जीवंत हो जाता। पर चित्राजी ने दृढ़ निश्चय कर उन यादों को नजर के सामने से हटा दिया था। शुभ-शुभ का अवसर था। ‘जो बीत गई, वह बात गई’ कविता वे क्लास में पढ़ाती आई हैं। जिस लड़की का विवाह है, उसके लिए शुभ सोचना है। अवसर और समय की वही माँग थी।

बारात दरवाजे लगी। स्वागत में खड़े स्त्री-पुरुष तिरछी नजरों से चित्राजी की ओर अवश्य देखते रहे। प्रश्न वही—‘‘कौन है यह?’’, ‘‘क्या रिश्ता है शालिग्रामजी से?’’

शालिग्रामजी ने द्वार पर ही अपने समधी से चित्राजी का परिचय कराया था। उनकी दो सालियाँ अपने पतियों के साथ वहीं खड़ी थीं। उनका परिचय नहीं करवाया। और यह खबर उस भीड़ भरे स्थल पर भी आसानी से यात्रा कर गई। सबको मिल आई।

बराती और घराती के भोजनापरांत विवाह के रस्म पूरे किए जाने लगे। शालिग्रामजी को पंडितजी द्वारा मंडप पर कन्यादान के लिए बुलाया गया। मंडप पर बैठने के पूर्व उन्होंने चारों ओर निगाहें घुमाईं। उनकी दृष्टि के सम्मुख वह चेहरा नहीं आया, जिसकी उन्हें खोज थी। उनके आस-पास मंडप पर बैठी उनकी बहनों और सालियों ने भाँप लिया था। दो-तीन एक साथ बोल पड़ीं—‘‘वहाँ हैं आपकी मेहमान।’’

देखा माला ने भी। मानो खीझकर बोली, ‘‘अब बैठ जाइए। मनचित्त लगाकर कन्यादान करिए। इसी काम के लिए मेहमान और सारा इंतजाम है। बैठिए!’’

शालिग्रामजी ने ऊँची आवाज में कहा, ‘‘चित्राजी! आप इधर आइए। मंडप पर बैठिए। मेरी बेटी को आपका विशेष आशीर्वाद चाहिए।’’
चित्राजी अंदर से हिल गईं। ऊपर से उपस्थित जनों की निगाहों के तीरों से बिंध गईं। वे परेशान तो थी हीं। अपने स्थान पर खड़ी होकर बोलीं, ‘‘आप लोग शुभ कार्य के लिए वहाँ उपस्थित हुए हैं। बेटी का कन्यादान करिए। मुझे यहीं बैठना है। मैं विधवा हूँ। मेरा सुहाग नहीं है। समाज ऐसी महिला को किसी सौभाग्याकांक्षिणी को सुहाग देने की मनाही करता है। मैं दिल से आपकी बेटी का शुभ चाहती हूँ। इसलिए दूर बैठी हूँ। आप अपना पुनीत काम पूरा करें। मेरी चिंता छोड़ दें।’’ वे बैठ गईं।

‘‘मैं नहीं मानता ऐसे समाज के विधान को। मेरे परिवार के लिए, मेरी बेटी के लिए आपसे बढ़कर कोई शुभ नहीं हो सकता। आपकी कृपा के बिना तो न मैं होता न मेरी बेटी। आइए! आप मेरी प्रार्थना मानकर मेरी बेटी का कन्यादान करिए।’’ फिर तो पंडितजी भी परेशान हो गए। बोले, ‘‘शालिग्रामजी! आपकी मेहमान महिला ठीक कह रही हैं। आप कन्यादान करिए। अपनी पत्नी को साथ बैठाइए। मंडप पर बैठी सभी महिलाएँ सुहागन ही हैं।’’

शालिग्रामजी बिफर पड़े—‘‘आप सब आज सुबह से चित्राजी का परिचय जानने के लिए परेशान हैं। आपके बीच तरह-तरह की अटकलें लग रही हैं। कार्य व्यस्तता में भी मैं आपके प्रश्नों के बाणों से बिंधता रहा। जब तक मैं उनका परिचय न दे दूँ, आप सबों का ध्यान भी विवाह के रस्म-रिवाजों पर केंद्रित नहीं होगा। तो सुनिए!’’ और जो कुछ शालिग्रामजी ने सुनाया, सुनकर वहाँ बैठे उपस्थित लोगों के प्रश्न तो चुके ही, वे सब चित्राजी के प्रति नतमस्तक हो गए। वे अवाक् रह गए। ‘‘पच्चीस वर्ष पूर्व एक दुर्घटना में चित्राजी के पति घायल हो गए। उनके मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया था। जिस अस्पताल में उन्हें लाया गया, उसी के एक कमरे में मैं ऑपरेशन बेड पर लेटा था। मेरे दिल ने काम करना बंद कर दिया था। चिकित्सकों ने निर्णय लिया था—किसी का धड़कता दिल मिलने पर प्रत्यारोपण हो सकता है। आँख दान, किडनी दान जैसे अंग दान की बात तो सुनी गई थी। देहदान भी होने लगा था। पर हृदय दान तो तभी हो जब वह धड़कता हो, और जब तक दिल धड़कता है, आदमी जिंदा है। भला जीवित का हृदय कोई क्यों दान करे।

चित्राजी के पति का दिल धड़क रहा था। मस्तिष्क ने कार्य करना बंद कर दिया था। डॉक्टर शर्मा ने इनसे अनुरोध किया—‘‘आपके पति को अब हम नहीं बचा सकते। पर आपकी सहमति हो तो इनका दिल किसी और के शरीर में प्रत्यारोपित किया जा सकता है। वह जिंदा हो सकता है।

‘‘सुझाव सुनकर चित्राजी पर क्या बीती, मुझे नहीं मालूम। और किसी ने जानने की कोशिश भी की कि नहीं, मालूम नहीं। चित्राजी ने अनुमति दे दी थी। मेरा दिल पिछले पच्चीस वर्षों से धड़क रहा है, यह मेरा नहीं, इनके पति का दिल है। पर पिछले पच्चीस वर्षों में इन्होंने एक बार भी एहसान नहीं जताया। इन्होंने तो मुझे तब भी नहीं जाना, न देखा था। मैंने भी नहीं। इन्होंने कभी मुझे ढूँढ़ने की कोशिश भी नहीं की। पर मैं बहुत बेचैन था। जीवन देनेवाली के प्रति आभार भी नहीं प्रगट कर सका। दो वर्ष पूर्व इनके शहर में गया। डॉ. शर्मा मिल गए। मेरा दुर्भाग्य कि इनसे तब भी भेंट नहीं हो सकी। डॉ. शर्मा से इनका मोबाइल नंबर मिल गया। फोन पर ही मैंने इन्हें अपना परिचय दिया। मनुहार पत्र भेजा। फिर निमंत्रण। बहुत आग्रह करने पर ये मेरी बेटी के विवाह पर आईं हैं। मैंने भी इनको आज सुबह ही पहली बार देखा। अब आप ही सोचिए पंडितजी! हमारे परिवार के लिए इनसे बढ़कर शुभ और कौन होगा। मेरे विवाह और मेरे बच्चे होने के पीछे भी यही तो हैं। मैं हूँ, तभी तो सब है।’’

कन्यादान के रस्म के समय तो सबकी आँखें भरती हैं। शालिग्रामजी ने तो कन्यादान के पूर्व ही उपस्थित सभी आँखों में पानी भर दिया।
माला मंडप पर से उठी। सीधे चित्राजी के पास पहुँची। पैर छूकर आशीष लिये और हाथ पकड़कर मंडप पर ले आई। महिलाओं के झुंड ने आँसू पोंछकर गाना प्रारंभ किया —‘शुभ हो शुभ, आज मंगल का दिन है, शुभ होे शुुभ। शुभ बोलू अम्मा, शुभ बोलू पापा, शुभ नगरी के लोग सब, शुभ हो शुभ!’’

रिश्ते को नामकरण की आवश्यकता नहीं पड़ी। अनेक रिश्तों से भरा था प्रांगण। पर सबसे ऊँचा हो गया था शालिग्रामजी और चित्राजी का रिश्ता। बेनाम था तो क्या?

Please Share your comment`s.

© आप सभी का प्रिय दोस्त ®

Krishna Mohan Singh(KMS)
Head Editor, Founder & CEO
of,,  http://kmsraj51.com/

———– @ Best of Luck @ ———–

Note::-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी Id है: kmsraj51@hotmail.com. पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

Also mail me ID: cymtkmsraj51@hotmail.com (Fast reply)

cymt-kmsraj51

– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

kmsraj51- C Y M T

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

-KMSRAJ51

 

 

 

_______Copyright © 2015 kmsraj51.com All Rights Reserved._______

Filed Under: 2013-KMSRAJ51, MANMANI BABU ~ KMSRAJ51, POSITIVE THOUGHT`S - PAVITRA VEECHAR, सर्वश्रेष्ठ हिंदी-अंग्रेजी वेबसाइट !!, हिंदी Tagged With: Best Hindi Stories, Collection of Best 100 Hindi Stories, Great Indian Author kmsraj51, Hindi Kahani-हिंदी कहानी, Hindi Stories Website, Hindi Stories-kmsraj51, http://kmsraj51.com/, Kmsraj51, Moral Story in Hindi, stories in hindi, Top Hindi Stories Collection, प्रेरणात्मक हिंदी कहानी, बच्चों के लिए प्रेरणात्मक हिंदी कहानी का संग्रह, शैक्षिक हिंदी कहानी, हिंदी कहानी, हिंदी कहानी : Hindi Stories

बात का घाव।

Kmsraj51 की कलम से…..

Baat Ka Ghaav | बात का घाव।

After cutting the wood, the woodcutter took the lion to his home in the evening. Seeing the lion with the woodcutter, the woodcutter's wife and children got scared.बहुत पुरानी बात है। एक लकड़हारे और शेर में दोस्ती थी। दोनों का मन एक दूसरे के बिना नहीं लगता था। शेर जंगल में रहता था और लकड़हारा गांव में। लकड़हारा लकडिया काटकर और उन्हें बेचकर अपना घर चला रहा था। सारे दिन वह जंगल में लकडिम्यां काटता था और शेर उसके पास बैठकर उससे बातें किया करता था।

एक दिन लकड़हारे ने सोचा कि वह अपने दोस्त शेर को दावत पर बुलाए। अगले दिन उसने शेर के सामने दावत का प्रस्ताव रखा। शेर ने दावत का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। लकडियां काटने के बाद शाम को लकड़हारा शेर को अपने घर ले गया। शेर को लकड़हारे के साथ देखकर लकड़हारे की पत्नी और बच्चे डर गए।

उन्हें डरा हुआ देखकर लकड़हारे ने उनका डर दूर करते हुए बताया कि शेर उसका दोस्त है और आज हमारा मेहमान है। लकड़हारे ने शेर की खूब आवभगत की। रात को सोने का वक्त होने पर लकड़हारे ने शेर को अपने साथ घर में सुलाना चाहा, पर उसकी पत्नी ने शेर को घर में सुलाने का विरोध करते हुए कहा कि वह शेर को किसी कीमत पर घर में नहीं सोने देगी, क्योंकि शेर जैसे खूंखार जीव का कोई भरोसा नहीं होता। ऐसा जीव कभी भी नुकसान पहुंचा सकता है। पत्नी के विरोध करने पर लकड़हारे ने पत्नी को समझाया, ‘यह शेर और शेरों की तरह नहीं है।

यह साथ सोने पर किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचाएगा।’ लेकिन उसकी पत्नी शेर को घर में सुलाने को तैयार नहीं हुई। आखिर थककर लकड़हारे को अपनी पत्नी की बात माननी पड़ी। लकड़हारे की पत्नी ने लकड़हारे से शेर के गले में रस्सी बांधकर घर के बाहर खड़े पेड़ से बांधने को कहा। पत्नी की बात मानकर लकड़हारे ने ऐसा ही किया।

उस रात मौसम बहुत खराब हो गया, लकड़हारा अपनी पत्नी और बच्चों के साथ घर में आराम से सोता रहा, किंतु शेर बेचारा सारी रात पेड़ के नीचे बंधा बारिश और तेज हवा के थपेड़े सहता रहा। सुबह को लकड़हारा सोकर उठा तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ कि उसकी वजह से उसका मित्र सारी रात बारिश में भीगता रहा। यह सोचकर लकड़हारे को बहुत दुख हुआ, उसने शेर से माफी मांगी। शेर ने मुस्कराते हुए कहा, ‘इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है दोस्त, यह खराब मौसम की मेहरबानी है।’

शेर की बात सुनकर लकड़हारे को खुशी हुई कि उसका मित्र उससे नाराज नहीं है। लकड़हारा लकडिया काटने जंगल गया तो शेर को अपने घर पर रोकना चाहता था, पर शेर नहीं रुका। कई दिन गुजर गए। एक दिन लकड़हारा लकडियां काटने के बाद घर जाने की तैयारी में था तो शेर उसके पास आया और बोला, ‘दोस्त, अपनी कुल्हाड़ी मेरी पीठ पर मारो।’

शेर की बात सुनकर लकड़हारा चौंक गया। उसने सोचा, शायद शेर उससे मजाक कर रहा है। शेर ने दोबारा कुल्हाड़ी मारने को कहा तो लकड़हारा हैरानी से बोला, ‘तुम क्या कह रहे हो? मैं भला तुम्हें कुल्हाड़ी कैसे मार सकता हूं?’

लकड़हारे के इनकार करने पर शेर ने दहाड़ते हुए कहा, ‘अगर तुमने मेरा कहा नहीं माना तो मैं तुम्हें खा जाऊंगा।’

शेर का बदला रूप देखकर लकड़हारा डर गया। उसकी समझ में नहीं आया कि उसका मित्र उससे कुल्हाड़ी मारने को क्यों कह रहा है। उसने इस बारे में शेर से पूछा, लेकिन शेर ने कुछ नहीं बताया। शेर ने तीसरी बार चेतावनी देते हुए कुल्हाड़ी मारने के लिए कहा। मरता क्या न करता, लकड़हारे ने अपनी जान बचाने के लिए शेर की पीठ पर कुल्हाड़ी दे मारी। कुल्हाड़ी लगते ही शेर की पीठ पर गहरा जख्म हो गया, जिससे खून बहने लगा। शेर अपनी गुफा की ओर बढ़ गया।

अगले दिन लकड़हारा डरते-डरते जंगल में लकडियां काटने गया कि पता नहीं आज उसके प्रति शेर का कैसा व्यवहार होगा। शेर ने लकड़हारे के साथ और दिन की तरह व्यवहार किया तो लकड़हारे के दिल को तसल्ली हुई। शेर की पीठ का जख्म वक्त के साथ-साथ भरता गया।

एक दिन शेर ने लकड़हारे से अपने जख्म के बारे में पूछा तो लकड़हारे ने खुश होकर बताया, ‘मित्र, तुम्हारा जख्म अब पूरी तरह भर गया है।’

लकड़हारे के बताने पर शेर गंभीर होते हुए बोला, ‘जानना चाहते हो मित्र, मैंने तुमसे अपनी पीठ पर कुल्हाड़ी क्यों लगवाई थी?’ शेर के कहने पर लकड़हारे ने हामी भर दी। वह भी यह बात जानने को उत्सुक था। शेर उसे बताने लगा, ‘घर आया मेहमान भगवान के समान होता है दोस्त और मेहमान का आदर बड़े प्रेम से किया जाता है। मैं भी तुम्हारा मेहमान था, लेकिन तुमने मुझे घर से बाहर पेड़ से बांध दिया, जहां मैं सारी रात बारिश में भीगता रहा। उस दिन की बात का जख्म मेरे दिल पर आज भी ताजा है। मैंने तुमसे अपनी पीठ पर कुल्हाड़ी इसीलिए लगवाई थी ताकि मैं तुम्हें दिखा सकूं कि चोट का जख्म तो भर जाता है, किंतु बात का जख्म कभी नहीं भरता। एक बात कान खोलकर सुन लो, तुम्हारी और मेरी मित्रता केवल आज तक थी। आज के बाद न मैं तुम्हारा मित्र हूं और न ही तुम मेरे मित्र हो और अगर आज के बाद तुम मुझे इस जंगल में दिखाई दे गए तो मैं तुम्हें अपना भोजन बना लूंगा।’ शेर अपनी बात पूरी करने के बाद चला गया।

लकड़हारा शेर को जाते हुए देखता रहा। अपनी पत्नी के गलत व्यवहार की वजह से आज उसने अपना पुराना मित्र खो दिया था। उसे बहुत पछतावा हुआ, किंतु अब पछताने से क्या फायदा था। लकड़हारा दुखी मन से गांव की तरफ चल दिया।

क्या सीख सकते हो: किसी को भी बुरा मत बोलो। दोस्त को मजाक में भी अपशब्द न कहो। अगर तुम्हे किसी की कोई बात बुरी भी लगती है तो उसे बता दो कि तुम्हें इस तरह से बात करना पसंद नहीं है। हमेशा घर आए मेहमान का खूब आदर-सम्मान करो।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं ____

Filed Under: 2013-KMSRAJ51, POSITIVE THOUGHT`S - PAVITRA VEECHAR, हिंदी, हिन्दी साहित्य Tagged With: baat ka ghaav, Hindi Kahaniya, moral stories in hindi, stories in hindi, ‎कहानियां, छोटी कहानी इन हिंदी, जीवनी कहानियां, पंचतंत्र कहानियाँ, प्रेरणादायक कहानियां हिंदी में, बच्चों की कहानियाँ, बात का घाव।

सूफी संत ज़ुन्नुन से जुड़ा प्रसंग।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ सूफी संत ज़ुन्नुन से जुड़ा प्रसंग। ϒ

सूफी संत ज़ुन्नुन – इंसान की कीमत,

प्यारे दोस्तों – बहुत पुरानी बात है। मिस्र देश में एक सूफी संत रहते थे जिनका नाम ज़ुन्नुन था। एक नौजवान ने उनके पास आकर पूछा – “मुझे समझ में नहीं आता कि आप जैसे लोग सिर्फ एक चोगा ही क्यों पहने रहते हैं ? बदलते वक़्त के साथ यह ज़रूरी है कि लोग ऐसे लिबास पहनें जिनसे उनकी शख्सियत सबसे अलहदा दिखे और देखनेवाले वाहवाही करें।”

  • ज़ुन्नुन मुस्कुराये और अपनी उंगली से एक अंगूठी निकालकर बोले, “बेटे, मैं तुम्हारे सवाल का जवाब ज़रूर दूंगा लेकिन पहले तुम मेरा एक काम करो। इस अंगूठी को सामने बाज़ार में एक अशर्फी में बेचकर दिखाओ।”

नौजवान ने ज़ुन्नुन की सीधी-सादी सी दिखनेवाली अंगूठी को देखकर मन ही मन कहा, “इस अंगूठी के लिए सोने की एक अशर्फी। इसे तो कोई चांदी के एक दीनार में भी नहीं खरीदेगा।”

  • “कोशिश करके देखो, शायद तुम्हें वाकई कोई खरीददार मिल जाए,” ज़ुन्नुन ने कहा।

नौजवान तुरंत ही बाजार को रवाना हो गया। उसने वह अंगूठी बहुत से सौदागरों, परचूनियों, साहूकारों, यहाँ तक कि हज्जाम और कसाई को भी दिखाई पर उनमें से कोई भी उस अंगूठी के लिए एक अशर्फी देने को तैयार नहीं हुआ। हारकर उसने ज़ुन्नुन को जा कहा, “कोई भी इसके लिए चांदी के एक दीनार से ज्यादा रकम देने के लिए तैयार नहीं है।”

  • ज़ुन्नुन ने मुस्कुराते हुए कहा – “अब तुम इस सड़क के पीछे सुनार की दुकान पर जाकर उसे यह अंगूठी दिखाओ। लेकिन तुम उसे अपना मोल मत बताया, बस यही देखना कि वह इसकी क्या कीमत लगाता है।”

नौजवान बताई गयी दुकान तक गया और वहां से लौटते वक़्त उसके चेहरे पर कुछ और ही बयाँ हो रहा था। उसने ज़ुन्नुन से कहा- “आप सही थे। बाज़ार में किसी को भी इस अंगूठी की सही कीमत का अंदाजा नहीं है। सुनार ने इस अंगूठी के लिए सोने की एक हज़ार अशर्फियों की पेशकश की है। यह तो आपकी माँगी कीमत से भी हज़ार गुना है।”

ज़ुन्नुन ने मुस्कुराते हुए कहा – “और वही तुम्हारे सवाल का जवाब है। किसी भी इंसान की कीमत उसके लिबास से नहीं आंको, नहीं तो तुम बाज़ार के उन सौदागरों की मानिंद बेशकीमती नगीनों से हाथ धो बैठोगे। अगर तुम उस सुनार की आँखों से चीज़ों को परखने लगोगे तो तुम्हें मिट्टी और पत्थरों में सोना और जवाहरात दिखाई देंगे। इसके लिए तुम्हें दुनियावी नज़र पर पर्दा डालना होगा और दिल की निगाह से देखने की कोशिश करनी होगी। बाहरी दिखावे और बयानबाजी के परे देखो, तुम्हें हर तरफ हीरे-मोती ही दिखेंगे।”

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें।

SUBSCRIBE TO KMSRAJ51 VIA EMAIL
सब्सक्राइब करें और पाएं अपडेट सीधे अपने इनबॉक्स में।

Please Share your comments.

कृपया Comments के माध्यम से अपने विचार जरूर बताये।

आप सभी का प्रिय दोस्त

Krishna Mohan Singh(KMS)
Editor in Chief, Founder & CEO
of,,  https://kmsraj51.com/

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।~Kmsraj51

———– © Best of Luck ® ———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी Id है: kmsraj51@hotmail.com. पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

cymt-kmsraj51

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought to life by. By doing this you Recognize hidden within the buraiya ensolar radiation, and encourage good solar radiation to become themselves.

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

____Copyright ©Kmsraj51.com  All Rights Reserved.____

Filed Under: 2013-KMSRAJ51, POSITIVE THOUGHT`S - PAVITRA VEECHAR, कहानियों का विशाल संग्रह।, हिंदी कहानियाँ।, हिंदी कहानी, हिन्दी साहित्य Tagged With: Hindi Kahani-हिंदी कहानी, Hindi Stories, Short Stories in Hindi, stories for kids, stories in hindi, कथा हिंदी में, कहानियां हिन्दी में, कहानी-उपन्यास, कहानी-किस्से, नैतिक लघु कथाएँ, पढ़ें – शिक्षाप्रद कहानियों का विशाल संग्रह।, प्रेरणादायक हिन्दी कहानी।, बच्चों के लिए कहानियाँ हिन्दी में।, बच्चों के लिए शैक्षिक हिन्दी कहानियाँ, ‎लघु-कथाएं, सूफी संत ज़ुन्नुन से जुड़ा प्रसंग, हिंदी कहानी बच्चों के लिए

« Previous Page

Primary Sidebar

Recent Posts

  • उन्नत बिहार, उज्ज्वल बिहार।
  • योग दिवस – 2026
  • निरर्थक रील्स की आरी – गुमराह होती नारी।
  • बात वक्त की।
  • तिरंगा का करें सम्मान।
  • एक सफर।
  • बाल विवाह – एक अभिशाप।
  • क्या बदलाव लायेगा नया साल।
  • है तो नववर्ष।
  • मोह।
  • अपना धर्म सबसे उत्तम।
  • ठंडी व्यार।
  • रिश्तों को निभाना सीखो।
  • तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान में अंतर।
  • मित्र।
  • आखिर क्यों।
  • समय।

KMSRAJ51: Motivational Speaker

https://www.youtube.com/watch?v=0XYeLGPGmII

BEST OF KMSRAJ51.COM

उन्नत बिहार, उज्ज्वल बिहार।

योग दिवस – 2026

निरर्थक रील्स की आरी – गुमराह होती नारी।

बात वक्त की।

तिरंगा का करें सम्मान।

एक सफर।

बाल विवाह – एक अभिशाप।

क्या बदलाव लायेगा नया साल।

है तो नववर्ष।

मोह।

अपना धर्म सबसे उत्तम।

Footer

Protected by Copyscape

KMSRAJ51

DMCA.com Protection Status

Disclaimer

Copyright © 2013 - 2026 KMSRAJ51.COM - All Rights Reserved. KMSRAJ51® is a registered trademark.