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You are here: Home / Archives for हेमराज ठाकुर

हेमराज ठाकुर

धागा प्रेम का।

Kmsraj51 की कलम से…..

Dhaga Prem Ka | धागा प्रेम का।

आज वह धागा प्रेम का ओ बहना, तुम जरूर पहनाना।
हर भाई को अपने बहन होने का, एहसास जरूर कराना।

इस नफ़रत भरे मतलबी दौर में, रिश्तों की रसम निभाना।
महज रसम न रखना ओ पगली, राखी का भाव जगाना।

वासना के बाजारों से पुरुष को, प्रेम के घर को ले आना।
कामुकता की खीर ठुकरा बहना, प्रेम का लड्डू खिलाना।

अपने पति के सिवाए पगली, हर नर की बहन बन जाना।
वरना तो तृष्णा में डूब जाएगा, ओ शालीनें! यह जमाना।

बहन भाव का उपहार ही मांगना, और न कुछ ले जाना।
तू भी भाई को कुमकुम का नहीं, भ्रातृत्व तिलक कराना।

महज की रसमों ने शुरू किया है, रिश्तों को पंगुन बनाना।
यह भाई बहन का रिश्ता है पगली! कमजोर न इसे कराना।

नशों दलदल से बाहर ला कर, तू भाभी को भाई लौटाना।
भगनी आलिंगन के जल से, भाई के दिल का मैल धुलाना।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता में प्रेम और भाई-बहन के आपसी संबंध की महत्वपूर्णता पर बल दिया गया है। रिश्तों की अनमोल भावना को जीवंत रखने की बात कही गई है, जहाँ राखी के पीछे छुपे भाव का महत्व बताया गया है। व्यक्ति को कामुकता के प्रति नहीं, बल्कि प्रेम के प्रति आकर्षित होना चाहिए। भाई-बहन के आपसी संबंध में मात्र रसमों से ज्यादा अपनत्व का प्रेम होता है और इसका सार कोई कमजोर नहीं कर सकता। अपने पति के आलावा, प्रत्येक पुरुष को हर औरत व लड़की को अपना भाई समझना चाहिए। भाई-बहन के प्रेम का मूल्य उपहारों से अधिक होता है और भाई को कुमकुम नहीं, बल्कि भ्रातृत्व का तिलक पहनना चाहिए।

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यह कविता (धागा प्रेम का।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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अमृत महोत्सव।

Kmsraj51 की कलम से…..

Amrit Mahotsav | अमृत महोत्सव।

राष्ट्रधर्म का गौरव प्यारा, आज हम हैं देखो बढ़ाने चले।
आजादी का प्रतीक तिरंगा, आज घर -घर में हैं फहराने चले।

उत्तुंग शिखर हिमालय से लेकर, हिन्द महासागर तक फैला है।
अरुणाचल से गुजरात कच्छ तक, यह भारत देश ही फैला है।

दसों दिशाएं आलोकित जिसकी, है वीरता जिसके जर्रे- जर्रे में।
पुरुषार्थ छिपा है राष्ट्रप्रेम का, यहां जीवन यापन के हर ढर्रे में।

तिरंगा है यह खिलौना नहीं, हर रंग का लहदा भाव निराला है।
शौर्य, वीरता, शान्ति, समृद्धि, मध्य चक्र प्रतीक समय का डाला है।

वीर बलिदानियों की कुर्बानी की कहानी, तिरंगा याद दिलाता है।
इतिहास पढ़ा देता है वह बंदा, जो घर – घर तिरंगा फहराता है।

आजादी के दीवानों ने प्रणाहुतियों से, यज्ञ को सफल बनाया था।
गुलामी की बेडौल जंजीरों से, भारत को आजाद करवाया था।

इसे संभालना, जश्न मनाना, अब तो हमारे ही हिस्से में आया है।
मिलजुल कर देश को बढ़ाने का, गुर पुरखों ने हमें सिखाया है।

आजादी के अमृत महोत्सव की, पावन बेला भारत में आई है।
बच्चे से बूढ़े, अमीर – गरीब ने, यह बेला सबने ही तो मनाई हैं।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता में भारत की भूगोलिक विशालता को हिमालय से लेकर हिन्द महासागर तक का संकेत दिया गया है, और अरुणाचल से लेकर गुजरात-कच्छ तक का भारतीय देश का विस्तार दिखाया गया है। कविता में दिशाओं की प्रकारों को प्रकाशित करते हुए यह कहा गया है कि वीरता हर जगह है, और राष्ट्रप्रेम की भावना हर व्यक्ति के जीवन में छिपी होती है। तिरंगे को खिलौना नहीं मानने के साथ ही, इसके हर रंग के पीछे भावनाओं की गहराई दिखाई गई है। यह शौर्य, वीरता, शान्ति, समृद्धि को प्रतिष्ठित करता है और समय के चक्र का प्रतीक होता है। कविता में वीर बलिदानियों की कहानी और उनकी कुर्बानियों का स्मरण कराया गया है, और तिरंगे के द्वारा उनकी यादें ताजगी देती है। जो व्यक्ति अपने घर में तिरंगा फहराता है, वह इतिहास को पढ़ता है और विशेष बनता है। कविता में स्वतंत्रता संग्राम के दीवानों ने यज्ञ को सफलता प्राप्त की थी, और उन्होंने गुलामी की बेडौल जंजीरों को तोड़कर भारत को आजादी दिलाई थी। कविता में इसे संभालने और मनाने की जिम्मेदारी को उठाने की बात की गई है, और गुरु पुरुषों द्वारा दिए गए सिखाने के उपदेश का उल्लेख किया गया है। कविता आजादी के अमृत महोत्सव की पवित्र अवधि का स्वागत करती है, जिसमें बच्चे से बूढ़े, अमीर से गरीब, सभी ने इस महत्वपूर्ण घटना का आयोजन किया है।

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यह कविता (अमृत महोत्सव।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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मौसमी तबाही।

Kmsraj51 की कलम से…..

Weather Disaster | मौसमी तबाही।

हिमाचल में फैली मौसमी तबाही,
पहाड़ों के पहाड़ ही दरक रहे हैं।
भूस्खलन कहीं बादलों का फटना,
पेड़ – पौधे और मकान सरक रहे हैं।

सड़के बन्द पैदल पथ भी हुए बन्द,
लोग बेघर हो कर अब तड़फ रहे हैं।
कई लोगों ने जान से ही हाथ धो डाले,
चीखतें हैं, “हे प्रभु! बड़े बुरे लटक रहे हैं।”

जुलाई – अगस्त 2023 की यह घटना,
लोगों के दिलों दिमाग को खटकाती है।
पुरखों की माने तो हर सौ साल के दौर में,
ऐसी कुदरती आफ़त हमेशा से ही आती है।

क्या माने? विज्ञान सही या ज्ञान सही,
या फिर पुरखों का अनुभव ही सच्चा है?
या फिर यह कुदरत का नियम है अपना?
या कि यह सब मानव निर्मित ही खता है?

सरकार बेबाक है, जनता भी परेशान है,
पक्ष – विपक्ष में है तीखी सी टोका-टोकी।
व्योवृद्ध कहते हैं, विपदा में एकजुट रहो,
क्यों सेंक रहे हैं आफ़त में सियासी रोटी?

सत्ता विपक्ष के सब नेता नित दौड़े हैं,
पीड़ितों की खैर – खबर सब लेते हैं।
यही सामाजिक चलन है जमाने का,
बाकी घरबार तो कौन बना कर देते हैं?

आए न मुसीबत दुश्मन को भी ऐसी,
हर जुबान से लोग यही बतियाते हैं।
पुरखों की माने तो यह मौके का डर है,
बाद में लोग फिर से दया धर्म भुलाते हैं।

कुछ भी कहो, यह सनातन सच है कि ,
कुदरत के आगे हम सब थोथे बौने हैं।
यह मेरा – तेरा, मैं बड़ा और वह छोटा,
सब मानुषी खेल झूठे और घिनौने हैं।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हिमाचल में फैली चारो तरफ मौसमी तबाही, पहाड़ों के पहाड़ ही दरक रहे हैं। भूस्खलन कहीं बादलों का फटना, पेड़ – पौधे और मकान सरक रहे हैं। सड़के बन्द पैदल पथ भी हुए बन्द, लोग बेघर हो कर अब तड़फ रहे हैं। कई लोगों ने जान से ही हाथ धो डाले, चीखतें हैं, “हे प्रभु! बड़े बुरे लटक रहे हैं।” पुरखों की माने तो हर सौ साल के दौर में, ऐसी कुदरती आफ़त हमेशा से ही आती रही है। याद रखें – व्योवृद्ध कहते हैं, विपदा में एकजुट रहो। आए न मुसीबत दुश्मन को भी ऐसी, हर जुबान से लोग यही बतियाते हैं। कुछ भी कहो, यह सनातन सच है कि कुदरत के आगे हम सब थोथे बौने हैं। यह मेरा – तेरा, मैं बड़ा और वह छोटा, सब मानुषी खेल झूठे और घिनौने हैं।

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यह कविता (मौसमी तबाही।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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कहानी पूर्वोत्तर की।

Kmsraj51 की कलम से…..

Story of Northeast | कहानी पूर्वोत्तर की।

पूर्वोत्तर के जवानों को देखो, क्या से क्या होने आए हैं?
जिन हाथों में किताबें होनी थी, उन्होंने हथियार उठाए हैं।

यह समुदायों की जाति दुश्मनी है, या किसी ने ये लड़ाए हैं?
बेखौफ दरिंदगी दिखाते हैं, निर्वस्त्र घुमाई जाती बेटी मांएं हैं।

सीमा गांव की सरहद बनी है, गभरु हिफाजत में लगाए हैं।
आगजनी और मारधाड़ ने, नागा, मैतेई, कूकी सभी डराए हैं।

दहशत है चारों ओर वहां पर, सुख – चैन सभी का छीना है।
ऐसे भयावह वातावरण में, बड़ा मुश्किल किसी का जीना है।

यहां सियासत घनी है, वहां आक्रोशित बेबस आगजनी है।
मीडिया में नीरे सवाल उठे हैं, आखिर सरकारें क्यों बनी है?

इस्तीफे की मांग है, पक्ष – विपक्ष में हो रही है बस थिपाथोपी।
झुलसती हमेशा जनता है, सियासतदान तो सेंकेंगे ही रोटी।

यह आज नहीं कई बार हुआ है, हर राज में होता आया है।
इतिहास गवाह है, दो के झगड़े में, तीसरे ने लाभ उठाया है।

आओ मिलकर बैठे हम सब, प्यार प्रेम से बात सुलझाते हैं।
सम्पत्ति विवाद में औरों को घुसाना, वे तो बात उलझाते हैं।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — मणिपुर में मुख्य रूप से मैतई, कुकी और नगा जाति रहते हैं। नगा और कुकी को पहले से ही आदिवासी का दर्जा मिला हुआ है, लेकिन 1949 में मैतेई से यह दर्जा छीन लिया गया था। इसके बाद से ही मैतेई समुदाय के लोग इसकी मांग कर रहे थे। जिसे लेकर दोनों समुदायों के बीच हिंसक झड़प हो रही है। यह आज नहीं कई बार हुआ है, हर राज में होता आया है। इतिहास गवाह है, दो के झगड़े में, तीसरे ने लाभ उठाया है। आओ मिलकर बैठे हम सब, प्यार प्रेम से बात सुलझाते हैं, सम्पत्ति विवाद में औरों को घुसाना, वे तो बात उलझाते हैं।

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यह कविता (कहानी पूर्वोत्तर की।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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क्यों कन्हैया?

Kmsraj51 की कलम से…..

Kyon Kanhaiya? | क्यों कन्हैया?

त्रिलोकी नाथ तुम, सकल अधिष्ठाता,
चराचर जगत के बस तुम ही रचयिया।
जन्म से निर्वाण पर्यन्त कष्ट ही कष्ट,
अपने भाग्य में क्यों लिखे कन्हैया?

जन्म कारा में, यमुना की जलधारा में
आकंठ पिता को क्यों था डुबाया?
कागासुर कभी शकटासुर गोकुल में,
पूतना जैसा हर संकट क्यों आया?

महिमा मंडन या दुख संसार की परिणति,
उद्देश्य जनार्दन था तुमने क्या ठाना?
या कुछ न था तुम्हारे भी हाथों में,
पर लोगों ने तो आपको ही प्रभु है माना।

वे रास लीला फिर विरह की पीड़ा,
राज पाया पर सुख कहां भोगा?
कंस, जरासंध फिर काल्यावन चढ़ाई,
कदम-कदम का कौतुक, अब क्या होगा?

महाभारत फिर निज कुल का खात्मा,
अंत समाधि में बहेलिए के हाथों हुआ निर्वाण।
कुल की स्त्रियां जब भिलों ने सताई,
तब क्यों बचाने न आए तुम ओ भगवान?

क्यों न जीता अर्जुन तब भीलों से,
महाभारत विजयी धनुर्धर सखा महान?
अर्जुन वहीं था, वही गांडीव था,
फिर क्यों न चले, तब वे धनुष – बाण?

सवाल कई हैं जहन में आज भी,
होनी बड़ी है कि आप प्रभु, या फिर इंसान?
विधि का लेखा ही सबसे बड़ा है क्या?
या तुम सबसे बड़ा भी, है कोई और ही भगवान?

यह निश्चित है कि सृष्टि संचालक,
नियंता रचैया है कोई न कोई जरूर।
जो हम ही होते स्वयंभू स्वयं तो,
क्यों होते फिर प्रकृति के हाथों यूं मजबूर?

याद करो प्रभु सहस्र विवाह अपने,
फिर भी प्रेम को तुमने क्यों न पाया?
राधा चाह कर भी क्यों एक न हो सकी?
यह सारा खेल तो हमारी समझ में न आया।

रामावतार में आकाश – पाताल खंगाले,
रावण से भिड़ कर भी सीता को पाया।
यहां तो हजारों विवाह कारा कर भी अपने,
आखिर, राधा रानी को क्यों था सताया?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — क्यों कन्हैया? तुमने अपने भाग्य में जन्म से लेकर निर्वाण तक कष्ट ही कष्ट लिखें, आखिर मानवता को कौन सी सीख देने के लिए ये सब लीलाएं की? सभी का दुःख हरने वाले कान्हा खुद अपने जीवन में इतने कष्ट क्यों झेलते रहे प्रभु? क्या आपसे भी ऊपर कोई और शक्ति है, या ये सब आपकी ही रची अलौकिक लीला थी? जीवन पर्यन्त राधा रानी के प्रेम से भी वंचित रहे प्रभु तुम क्यों? आखिर ये कैसी अलौकिक लीला थी?

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यह कविता (क्यों कन्हैया?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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अपनी बला से।

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Apni Bla Se | अपनी बला से।

सत्ता होती है बेकाबू तब तक,
जब तक जनता मदहोशी में सोती है।
इतिहास गवाह है धनवानों को कितनी,
पीड़ा गरीब और मजलूमों की होती है?

जनता जब जागेगी तो तभी सवेरा,
सत्ता भी तो तब काबू में आएगी।
यह गुड़ में जहर की शाजिस सत्ता,
जनता पर सदा – सदा ही आजमाएगी।

खामोश रह कर तो कोई बात न बनेगी,
मुद्दा तो जनता को अपना उठाना होगा।
लोकतन्त्र है भाई यह आजाद भारत का,
जनता को मत का बल तो दिखाना होगा।

हम करने चले हैं हुड़दंग ही बस नीरा,
मुद्दे की बात ही कहां कोई करता है?
जन सरोकारों की है चिन्ता ही किसको?
हर कोई निज स्वार्थ के खातिर लड़ता है।

देश डूबे तो वह अपनी बला से,
देश की किसको यहां चिन्ता है?
पक्ष – विपक्ष और जनता सबमें,
निज घोर स्वार्थ की ही हीनता है।

लाखों की लेते पगारें हैं अधिकारी,
फिर भी घूंस लेते भिखारी से फिरते हैं।
ठेकेदार को भी तो अपनी ही पड़ी है,
तभी तो पुल बनाते ही कई गिरते हैं।

जागो जनता गर जाग सको तो,
स्वार्थ की नींद को भगाना होगा।
वरना भ्रष्टाचार में डूबता देश है,
इसे मिलकर आज बचाना होगा।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — भटकी हुई नव पीढ़ी को फिर से राष्ट्रधर्म का पाठ पढ़ाना होगा, हर भारत वासी को अपने मत की शक्ति को समझना होगा। अपने निज स्वार्थ से ऊपर उठकर अपने राष्ट्र के हित में कदम उठाना होगा, ये आज़ाद भारत है भाई तुम्हें सही मांग के लिए आवाज उठाना होगा। जो गलत है उसको सबक सिखाने के लिए हम सबको आवाज तो उठाना होगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ सभी को मिलकर आवाज उठाना होगा। जागो जनता गर जाग सको तो, और स्वार्थ की नींद को भगा कर राष्ट्र हिट में अपने मत की शक्ति का सही प्रयोग करो तुम। मुफ्त के चक्कर में बिकना नही तुम वर्ना तुम्हारा अस्तित्व ही खत्म हो जायेगा, अब भी समय है जग जाओ, नहीं तो पछतावोगे।

—————

यह कविता (अपनी बला से।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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पुनः सनातन लाना होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

Punah Sanatan Lana Hoga | पुनः सनातन लाना होगा।

आओ मिलकर बीजते हैं बीज,
इस धरती पर सनातन का।
भटकी हुई नव पीढ़ी को फिर से,
पढ़ाते हैं पाठ पुरातन का।

जहां थी मान मर्यादाएं घनी,
अभाव में भी संतोषी आत्म था।
इस मानव समाज के बच्चे-बच्चे में,
कूट – कूट के अध्यात्म था।

सम दृष्टि थी हर मानव की,
दिखता हर घट में परमात्म था।
तन – बदन में शालीन वस्त्र थे,
सामाजिक नियम पुरातन था।

न जाति थी, न धर्म थे कोई,
न ही नर-नारी में कोई लड़ाई थी।
पूरी धरती शान्ति से,
वसुधैव कुटुंबकम के भाव में समाई थी।

दुरात्म भाव ने आ के धरा पर,
मानव से मानव लड़ाया था।
सुख – शान्ति, चैन और भाईचारा,
हम सबसे दूर भगाया था।

दुरात्म भाव को दूर भगाओ,
पाठ यह सबको पढ़ाना होगा।
अंध आधुनिकता को कर के पीछे,
पुनः सनातन लाना होगा।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — भटकी हुई नव पीढ़ी को फिर से पढ़ाते हैं पाठ पुरातन सनातन संस्कृति का जिससे सभी मानव जन्म को सार्थक बना सके। सनातन में न जाति थी, न धर्म थे कोई, न ही नर-नारी में कोई लड़ाई थी। पूरी धरती शान्ति से वसुधैव कुटुंबकम के भाव में समाई थी। पुनः सनातन लाना होगा। इस मानव समाज के बच्चे-बच्चे में कूट – कूट के अध्यात्म था। सनातन की उत्पति – सनातन किसी एक लेखक या दार्शनिक या किसी ऋषि के विचारों की बस उपज नहीं है, यह तो अनादि काल से प्रवाहमान और विकासमान रहा। विश्व के सभी धर्मों से सबसे पुराना सनातन धर्म है। मान्यता है कि वैदिक धर्म जिसमें परमात्मा को साकार और निराकार दोनों रुपों में पूजा जाता है । ये वेदों पर आधारित धर्म है।

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यह कविता (पुनः सनातन लाना होगा।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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तुम क्या हिन्द बनाएंगे।

Kmsraj51 की कलम से…..

Tum Kya Hind Banaenge | तुम क्या हिन्द बनाएंगे।

अंग्रेजी को बढ़ावा देने वालो, तुम क्या हिन्द बनाएंगे?
तुम्हारी रग-रग से वाकिफ हम, पछुआ रीत बढ़ाएंगे॥

हिन्दुस्तान में रह कर जो भी, हिन्दी की बात चलाएंगे।
राष्ट्र हित के रथ को असल में, वही ही सही चलाएंगे॥

अब जाग चुका है हर भारतवासी, कितना बुद्धू बनाएंगे?
हिन्दी में कर भाषण अपना, अंग्रेजी का जाल बिछाएंगे॥

वे चले गए हैं सैंतालीस के, जिनकी भाषा तुमको प्यारी है।
पचहत्तर सालों में न भूले उनको, वाह! जी कैसी यारी है?

अब तो छोड़ो मोह पछुआ से, राष्ट्र की बात को आगे करो।
जाति धर्म के बिखरे मानकों में, प्रेम – एकता के धागे भरो॥

भाषा वैविध्य का लाभ उठाकर, भारत को न परेशान करो।
राम कृष्ण की जाया भूमि, इस पर कुछ तो एहसान करो॥

संस्कृति सभ्यता की लुटिया डुबाने में, न यारो सहयोग करो।
निज राष्ट्र का गौरव उन्नत कर, राष्ट्र की रीत का भोग करो॥

मौंसी के घर की ठाठ में खोकर, मां का यूं न तिरस्कार करो।
मां तो मां ही होती है जी, कुछ तो लाज शर्म स्वीकार करो॥

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — राष्ट्र धर्म ही हमारे लिये तो सर्वोपरि है। राष्ट्र आराधना सबसे बड़ी ईश भक्ति है।। राष्ट्र धर्म से हमारी तो सांसे चल रही है। अंग्रेजी को बढ़ावा देने वालो भला तुम सब क्या हिन्द बनाएंगे? हम सब तुम्हारी रग-रग से वाकिफ है, तुम आगे भी पछुआ रीत बढ़ाएंगे। हम सभी अब जानते है की हिन्दुस्तान में रह कर जो भी, हिन्दी की बात चलाएंगे, असल में राष्ट्र हित के रथ को वही सही चलाएंगे। अब जाग चुका है हर भारतवासी, कितना बुद्धू बनाएंगे? हम सभी को, अब हिन्दी में कर भाषण अपना, अंग्रेजी का जाल बिछाएंगे। कितनी शर्म की बात है वे तो चले गए हैं सैंतालीस के ही, जिनकी भाषा तुमको अभी तक प्यारी है। पचहत्तर सालों में न भूले उनको, वाह! जी कैसी यह यारी है? अब तो छोड़ो प्यारे मोह पछुआ से और राष्ट्र की बात को आगे कर, जाति धर्म के बिखरे मानकों में, प्रेम – एकता के धागे भरो व आगे बढ़ो। भाषा वैविध्य का लाभ उठाकर, भारत को न परेशान करो। राम कृष्ण की जाया भूमि, इस पर कुछ तो एहसान करो तुम। संस्कृति सभ्यता की लुटिया डुबाने में, न यारो सहयोग करो और निज राष्ट्र का गौरव उन्नत कर, राष्ट्र की रीत का भोग करो प्यारों।मौंसी (अंग्रेजी) के घर की ठाठ में खोकर, मां का यूं न तिरस्कार करो। मां तो मां ही होती है जी, कुछ तो लाज शर्म स्वीकार करो। जय हिन्द!

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यह कविता (तुम क्या हिन्द बनाएंगे।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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यह क्या हो रहा है?

Kmsraj51 की कलम से…..

Yah Kya Ho Raha Hai? | यह क्या हो रहा है?

बड़े खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि यह आज समाज में हो क्या रहा है? मुद्दा आज सता पक्ष और विपक्ष की तू – तू मैं – मैं का नहीं है। मुद्दा है तो वह है देश की बहू बेटियों की असमत का।

वह चाहे मां – पत्नी हो या बहु हो या फिर बेटी,
दुख यह है कि क्यों की जा रही है उसकी अनदेखी?

साथियों यह भयानक मंजर हमने मीडिया में बड़े स्तर पर निर्भया मामले के समय देखा था। पूरा देश उस आक्रोश में उबल गया था। विपक्ष ने हवा को तूल दिया और सत्ता पक्ष ने कड़े कानून बनाने और दोषी को तुरन्त कड़ी सजा दिलाने का आश्वासन दिया। हम सब जानते हैं कि निर्भया मामले में दोषियों को सजा दिलाने तक का सफर कैसा रहा और कितना लम्बा रहा? ऐसा नहीं है कि इससे पूर्व बहू बेटियों के साथ कोई बलात्कार नहीं हुए थे। पर यह मामला पहली बार मीडिया में राष्ट्रव्यापी स्तर पर इस तरह से भटका था कि पूरे देश की आत्मा ही जैसे जाग उठी थी।

पर सवाल यह है कि क्या फिर ऐसी वारदातें होना बंद हो गई? यूपी के हाथरस की घटना हम कहां भूले हैं? रात के अंधेरे में ही दाह संस्कार हमे याद है। क्या पश्चिम बंगाल में हुई हिंसात्मक घटनाएं देश को शर्मसार नहीं करती? हाल ही में राजस्थान के अलवर में नाबालिग लड़की के साथ शादी और उसके साथ उसके ससुर, नंदोई और जेठ द्वारा पति की सहमति से सामूहिक बलातकार तब तक करना, जब तक वह बेहोश नहीं हो जाती। अब मणिपुर में महिलाओं के साथ एक घिनौना कुकृत्य दिन दहाड़े समाज द्वारा पुलिस की मौजूदगी में किया जाना। इधर हिमाचल में समाज के ही सामने युवतियों के साथ छेड़छाड़ और मार पीट।

मित्रों शर्मिंदगी राजनैतिक पार्टियों की कारगुजारी और बयानबाजी पर नहीं बल्कि समाज की कुत्सित सोच पर होती है। आखिर क्यों समाज इस कदर खुदगर्ज और मूक दर्शक तथा भीरू होता जा रहा है कि हकीकत को अपनी आंखों से देख कर भी वह अपना मुंह मोड़ कर वहां से इस कदर से निकल जाता है कि जैसे उसने कुछ होते हुए ही नहीं देखा?

सवाल सत्ताधीशों से भी है कि वे भी अपनी शक्ति का दुरुपयोग आखिर क्यों करते हैं? शायद यह हमारी कानून व्यवस्था और न्याय प्रणाली की कमजोरी को भी दर्शाता है।कानून में कई हथकंडे और लम्बे दौर तक चलती न्यायिक प्रक्रिया तथा कई मामलों में राजनैतिक संरक्षण अपराधियों के हौसलों को बुलन्द करता रहता है कि क्या होगा। जो भी होगा देखी जाएगी। कोर्ट में निपट लेंगे।

सबसे बड़ी चिन्ता तो समाज की पढ़ी-लिखी स्त्रियों के समुदाय की होती है कि वे अपने साथ हो रहे अन्याय में स्वयं ही एक जुट नहीं है। वे खेमों में और राजनैतिक दलों में विभाजित हो कर कई बार पक्ष-विपक्ष में वाद – विवाद प्रतियोगिता करती हुई नजर आती है। मेरा निवेदन उन सभी माताओं बहनों से है कि ऐसे मुद्दों में न ही तो हमे राजनैतिक दलदल में वोटों के नफे नुकसान में पड़ना चाहिए और न ही समाज को बांटने वाली विचारधारा का समर्थन करना चाहिए। ऐसे मुद्दों पर राजनीति, जाति, धर्म, सम्प्रदाय इत्यादि समाजगत कुत्सित भावबोधों से ऊपर उठ कर राष्ट्र की मानव समाज वाली भावना से काम करना चाहिए।

  • बेटी या औरत कोई भी हो और किसी भी जाति धर्म सम्प्रदाय इत्यादि की हो, वह हमारे देश की मातृ शक्ति है। उसके शील की रक्षा करना हमारा सामूहिक दायित्व है। यह माना कि कई मुद्दों पर महिलाएं भी गलत हो सकती है। पर जो ये घटनाएं ऊपर मैने गिनाई है। ये सब महिलाओं के साथ हुए घोर अन्याय और समाज की कुत्सित मानसिकता की उदाहरण है।
  • बंधुओ और भगनियों यह बात याद रखना कि दूसरों के घरों में लगी आग को बुझाने में जो लोग मदद नहीं करते बल्कि उससे अपनी रोटियां सेंकने का काम करते हैं। उन्हे यह कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारे घर भी यहीं नजदीक है। कहीं यह आग भड़क कर हमारे घर को भी न लील जाए।
  • आज किसी दूसरे की बहू बेटी के साथ किसी दूसरे के उन्मत बेटों ने गलत किया है और कल को यही घटना हमारी बहु – बेटियों या मां – पत्नियों के साथ भी हो सकती है और हमारे बेटे भी उन्मत हो कर ऐसी घटनाओं को मिलकर अंजाम दे सकते हैं।

इसलिए समाज को अपने दायित्व को समझना होगा। सोशल मीडिया और फिल्मी दुनियां के ऐसे अपराधिक दृश्यों का बहिष्कार करना चाहिए, जो युवा पीढ़ी को गलत करने के आइडिया देते हो।

जातिवाद, धर्मवाद और संप्रदायवाद के नाम पर समाज में नफरत फ़ैलाने वाले हर जाति – धर्म और सम्प्रदाय के व्यक्तियों को कड़े से कड़े कानून बनाकर कड़ी सजा का प्रावधान करने की मांग करनी चाहिए। फिर वह आग चाहे वोट के लिए भड़काई जाए या फिर किसी अन्य कारण से। एक व्यक्ति भड़काए या फिर कोई पूरा समुदाय।सामूहिक सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए। यह भीड़ तन्त्र तो फिर समाज की कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाता ही रहेगा, यदि इस व्यवस्था पर अंकुश न लगाया गया तो।

हमे समझना होगा कि समाज में मात्र एक ही धर्म कुदरत ने बनाया है, जो है मानव धर्म। दो ही जातियां हैं एक स्त्री और दूसरी पुरुष। उनमें किसी को कोई छूत भी नहीं लगती और न ही कोई अन्य बाधा है। दोनो जातियों को एक दूसरे की कुदरती नितान्त आवश्यकता है और उन्हें कुदरत के नियम का पालन कर के अपने – अपने जाति धर्म का ईमानदारी और सामाजिक मर्यादाओं से पालन करना चाहिए। न ही कोई लड़ाई होगी और न ही तो कोई झगड़ा दंगा – फसाद।

बाकी समाज बुद्धिजीवी है। ये अन्य जाति धर्म और सम्प्रदाय आज पढ़े – लिखे समाज में हमे मिल बैठकर अपने कई निजी स्वार्थों को छोड़ कर राष्ट्र हित में छोड़ देने चाहिए और कुदरत के सनातन नियम की जाति धर्म व्यवस्था को राष्ट्र हित के लिए स्वीकार करना चाहिए। माताओं को अपने साथ होने वाले अत्याचारों के खिलाफ एकजुट हो कर सामने आना होगा और पुरुष समाज को भी इसमें महिलाओं का साथ देना चाहिए। क्योंकि नारी किसी भी समाज या राष्ट्र का सम्मान होती है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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ये तो नाइंसाफी है।

Kmsraj51 की कलम से…..

This is Unfair | ये तो नाइंसाफी है।

बेतरतीब भभकती एक आग को देखा,
उसमें सुलगते नफरत के अंगारे देखे।
हिन्दू – मुस्लिम की उसमें ज्वालाएं देखी,
फिर भी लोगों में आपसी भाईचारे देखे।

कुछ लोग लगे हैं बस सत्ता के लोभ में,
सियासी घी डालकर लपटें भड़काने में।
विविधता में एकता का है मुल्क हमारा,
एक वर्ग लगा है सबको यह समझाने में।

कोई जाति – धर्म के तूफान है उड़ाता,
नफ़रत की लपटें और तेजी से भड़के।
फिर भी खड़ा मजबूती से भारत कैसे?
दुश्मनों के सोच में जैसे प्राण ही लटके।

कई लगे हैं समता की बरसात बरसाने,
वे चले हैं नफरतों की आग बुझाने को।
एक कुनबा भीतर ही भीतर ऐसा भी है,
जो लगा है राष्ट्र हित के मुद्दे दबाने को।

सत्ता समर में गुनहगारों को है मिलती,
हमेशा हम सबने देखी यारो माफ़ी है।
बेगुनाहों को सियासी चाल में फंसाना,
आजाद भारत में ये तो नाइंसाफी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आजकल के कुछ सियासी लोग अपनी जेब भरने के लिए दिखावटी फिक्रमंद बनकर जनता के बीच नफरत फैला रहे है, और आपस में सभी को लड़ा रहे है। हम भारत वासी है, अनेकता में एकता ही हमारी पहचान है। जिस भी भारतीय के अंदर देश प्रेम नहीं वह भारत देश के लिए नासूर के समान है, ऐसे ही लोग आगे चलकर सियासी पद पर पहुंचकर बाहर के देशो में जाकर अपने भारत देश की बुराई करते हैं। हमे ऐसे लोगों को पहचान कर इनके कहे में बिलकुल भी नहीं आना है, क्योकि ऐसे लोग हमे आपस में लड़ाकर अपनी ज़ेब भरते है, हमे ऐसे लोगों से सदैव ही सावधान रहना चाहिए। हम सभी को आपस में मिलजुलकर अपने भारत देश की उन्नति में हमेशा योगदान देना चाहिए, तभी अपना देश तेज गति से आगे बढ़ेगा। जय हिन्द!

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यह कविता (ये तो नाइंसाफी है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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  • क्या बदलाव लायेगा नया साल।
  • है तो नववर्ष।
  • मोह।
  • अपना धर्म सबसे उत्तम।
  • ठंडी व्यार।
  • रिश्तों को निभाना सीखो।
  • तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान में अंतर।
  • मित्र।
  • आखिर क्यों।
  • समय।
  • काले बादल।
  • सुबह का संदेश।

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निरर्थक रील्स की आरी – गुमराह होती नारी।

बात वक्त की।

तिरंगा का करें सम्मान।

एक सफर।

बाल विवाह – एक अभिशाप।

क्या बदलाव लायेगा नया साल।

है तो नववर्ष।

मोह।

अपना धर्म सबसे उत्तम।

ठंडी व्यार।

रिश्तों को निभाना सीखो।

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