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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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You are here: Home / Archives for Poems of Satish Shekhar Srivastava ‘Parimal’

Poems of Satish Shekhar Srivastava 'Parimal'

इस उम्र के…।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ इस उम्र के…। ♦

काव्य  : बीत गये दिन।

माह बरस पखवाड़े के ये पल,
देखो चले गये बीत गये ये दिन।
पल-पल यूँ बीत रहे खामोशी से चलते,
दौड़ लगाते भागते बीत गये ये दिन।

सोच रहे थाम लेगें,
फिर इसे जकड़ कर बांध लेगें।
रेत की तरह फिसल रहे,
दौर काल सब मुट्ठी से निकल रहे।

सदियों तक से तप किये,
गलियों पगडंडियों को नाप लिये।
साँसों के बंधन बांधने को,
देवस्त देवालय से नाता जोड़ लिये।

हिमाद्री के हिम की तरह पिघल रही,
शिशिर की तरह गिर रही।
चरमरा कर मर्मर बन चमक रही,
ये जिंदगी रेत की तरह फिसल रही।

आशाओं इच्छाओं की लड़ियाँ बुनते,
चाहत कामनाओं को संभाले।
लड़ रहे जीवन प्राणों की,
रोज-रोज इक नयी पिपासाओं को संभाले।

माह बरस पखवाड़े के ये पल,
देखो चले गये बीत गये ये दिन।
पल-पल यूँ बीत रहे खामोशी से चलते,
दौड़ लगाते भागते बीत गये ये दिन।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — मानव जीवन के सात चरण जानिए कौन सी उम्र में कौन सी अवस्था। मनुष्य के जीवन में अवस्थाएं क्रमशः गर्भावस्था, शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था एवं वृद्धावस्था होती हैं। हर अवस्था में शरीर का विकास, मानसिक विकास, सीखने, सोचने – समझने, दिखने के अलग अलग तरीके होते हैं। हर चरण का विकास एक विशेष तरीके से होता है। हर अवस्था में मनुष्य के अलग नियम, कर्तव्य और सावधानियां होती हैं। शारारिक और मानसिक विकास के लिए इन सभी का पालन करना भी जरूरी होता है, वरना परेशानियां होती हैं। बुढ़ापा का समय 65 वर्ष की उम्र से शुरू होता है। मानव का अवसत उम्र 70 से 85 वर्ष का होता है लेकिन ये स्वास्थ पर निर्भर करता है। कुछ लोगो का निधन 65 वर्ष उम्र से पहले ही हो जाता है। लेकिन कुछ लोगो का निधन 85 वर्ष के बाद होता है और यही पर मानव जीवन चक्र समाप्त होता है।

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यह कविता (इस उम्र के…।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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काल – समय।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ काल – समय। ♦

काव्य  : भिक्षुक।

सांझ शिखी के काल में फिर से चौखट पर तुम्हारे,
निन्दित नकारा हुआ वक्ता चिर-उन्मुक्त मन मारे।

ठंडा हुआ नंदिनी अभिमानिनि स्नेह की रानी,
रुक्ष इद्ध अँखियों में पिपासाकुल मधुल-दिवस सिरानी।

युगाब्धों की जीर्ण घूघी में कितनी लेकर प्रत्याशा,
निज-दहक की गर्जन पुंगलों में लहरित पिपासा।

दिवस भर टहला देवेशी! तुम्हारे दर्प-दीघंकृत मति में,
भिक्षा दी न गई इस अगाध क्रूरता तिक्त भव में।

निभृत क्षुब्ध विकल हो भटका गेह निकेतन में,
कितने दारुण गीत सुनाये वृजिन-व्याकुल निशदिन में।

आह! कोई न पिघला मैं चित्कार उठा विह्वल दुर्वचनी,
निशादि-सी उच्छवासित पुनीत तुम देख पड़ी तन्वंगिनी।

मुझे तो तुमने ही बनाया नकारा चिर-प्रवासी,
अब मेरी तुम्हीं हरो अध्व-उद्यम-ताप पराजित उदासी।

जाग्रत हो उठी ये कैसी धाधि दहक उठा उर तापी,
सांझ शिखी के काल में चौखटे पर तड़प रहा पापी।

पौ-पुनर्णव-इंदुकर-छाया में मुझे लुका पंछी गाता,
अधरात के सन-सन स्वर-सा प्राणंत सुधा नहाता।

कस्तूरी वेणा मरिचि-प्रांगण में लावण्य-पुंज मैथुन-अर्हन,
करो जब तुम दिवसमुख में लीन प्रभात-सी पावन।

इसी एक अभव में हो जाये मेरा भी लोमहर्ष-निर्वासन,
जैसे अपनी अरुण-वेली में ज्वाला सा कांतिहीन।

अर्थ: अरुण-वेली = सूर्य किरण, वेणा = खस, प्राणंत = हवा, पुनर्णव = नाखून,
इंदुकर = चंद्रमा को रौशनी, धाधि= ज्वाला, अध्व= राह, तन्वंगिनी = कोमलांगी,
दुर्वचनी = भिक्षुक, दीघंकृत = डूबा हुआ, घूघी = झोली

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — भोर में ही भिक्षुक उठकर अपने नित्य कर्म से निवृत होकर, सूर्य की पहली किरण के साथ ही अपनी झोली लेकर भिक्षा मांगने के लिए निकल पड़ता हैं। उस समय सुबह की मंद-मंद सेहतमंद हवा का आनंद लेते हुए निकल पड़ता है। जो भी प्रेम व सच्ची श्रद्धा से भिक्षा मिलता है वह लेकर वापस आ जाता है। निभृत क्षुब्ध विकल हो भटका गेह निकेतन में, कितने दारुण गीत सुनाये वृजिन-व्याकुल निशदिन में। समय चक्र से कोई भी प्राणी अछूता नही है।

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यह कविता (काल – समय।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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श्यामता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ श्यामता। ♦

काव्य  : विदेह

मैं बसंत बहार की कादंबरी उदास,
फैले हुए कंचन की नृप वल्लभा हूँ।
मैं हरियाली की तुहिन गिर तीर की,
भूली हुई सपन कथा आभा हूँ।

माँ की मैं अपनी बाँयी भौंह,
मर्यादा की हूँ धोमय साया।
मैं आकुल गोधुलि राग करुण,
मैं म्लान आभा की माया।

मैं शीर्णभास मैं वधित-प्रभा,
इस समय भिखारन अलमस्ता।
भग्नावशेष में शोध रही खुद को,
अवासित सौभाग्य की हूँ अरुनता।

मैं निषक्त-भूमिल की धर्म-अम्बा,
मेरे अंगज का विराट ज्ञान।
मेरी महिजा ने दिया लोक की,
जो ललिता को व्याख्या दान।

मैं वैशाली के सन्निकट,
बैठी नित्य अर्म में अनजान।
श्रवण करती सजल नयन अपने,
निच्छवि योद्धाओं के सुयश गान।

अघोष शर्वरी में चक्रकीनद प्रांजल,
देती कर मेरे प्राण विभोर।
मै ठढ़ी मंजुल पर सुनती हूँ,
कविवर की कविता के गान मधुर।

इंद्रनील-मेघ घोष गर्जना कर बरसे,
झिम-झिम झिम-झिम कर बहुत से।
हिलोरें गुनगुन करती राग बिहाग,
क्यूं रूठ गये मोहन कौन सी चूक भई मोसे।

कौमुदी मध्य वैभव भूमि में,
हरी-भरी बन झूमती हूँ।
कुछ-कुछ आती याद बावरी दौड़ी,
मैं तौलिहवा को जाती हूँ।

अस्त-व्यस्त केश अश्रुजल छलक रहे,
मैं बिचरती हूँ मारी – मारी।
कतरा-कतरा में शोध रही अपनी,
खोई अपार निधान सारी।

मैं वीरान वाटिका की मालिनी,
उठती मेरे उर में विषम वेदन।
शारदी नहीं इस निकुञ्ज अभ्यांतर में,
रुक-रुककर बीती-स्मृति करती कूजन।

मैं बसंत बहार की कादंबरी उदास,
फैले हुए कंचन की नृप वल्लभा हूँ।
मैं हरियाली की तुहिन गिर तीर की,
भूली हुई सपन कथा आभा हूँ।

अर्थ: श्यामता = उदासी, शीर्णभास = कमजोर रौशनी, वधित = हत्या,
अरुनता = लालिमा, निषक्त = बाप, महिजा = देवपुत्री,
शर्वरी = रात, शारदी = कोयल, अर्म = टूटा फूटा मकान (खंडहर)

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — प्रकृति की सुंदरता देखते ही बनती है हरी-भरी प्रकृति के कारण ही हमारा जीवन इतना अच्छा सरल सुन्दर है। मन की मन: स्तिथि खुद ही उलझती सुलझती रहती है, जो रख दी बातें सामने अपनों के मन का बोझ कर हल्का वो स्वछंद फिरा करती है। जो बातें रह गई दबी मन में, मन को व्याकुल कर सदा वो तनाव पैदा करती है। उलझनें हो लाख चाहे, दिख रही हो राह कोई सामने उस वक्त ही तो मन पर कस के लगाम लगानी पड़ती है। जो पा लिया काबू उस दौर पे, सुलझ जाएगी उलझनें सारी गर्त से बाहर आयेगा बस संयम की ज्योति जगानी पड़ती है।

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यह कविता (श्यामता।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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श्रीगन्ध बयार।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ श्रीगन्ध बयार। ♦

देखो आई श्रीगन्ध बयार रे,
किस दूरागत अनजान दिश से,
अलीयों की बहीर रे,
देखो आई श्रीगन्ध बयार रे।

असन्नद्ध आरस स्मित जोबन सिन,
मदिर शैया पर आसक्त बेजान।
कंपित कुसुमरेणु सा अवसन्न,
पसर गई विभावती चिकुरों की,
मंजरी भरी लर रे।

सार बूंदों का कोमल परस ले,
तिमिरारपु दग्ध फुलवा मुकुलों के,
बिखरा सौरभ का आलोक रे,
पल्लवन अबोध खड़ी सपनों की,
अमल वहती के कूल रे।

वनदेवी के नूतन वनांचल के अनुहार,
हिल रहा धरुण धवल शून्य तिमिर।
खुला धाराधर काल मिहिर-मयंक अनुहार,
कांत-निसर्ग प्राण बन कितने लुढ़क रहे।
क्षीर-वीर्य रे, देखो आई श्रीगन्ध बयार रे।

अर्थ: श्रीगन्ध = चंदन, अलीयों = भौंरा, बहीर = भीड़, कुसुमरेणु = केसर,
चिकुर = बाल(केश), वहती = नदी, धरुण = आग,
क्षीर-वीर्य = आत्मबल, परस = स्पर्श, स्मित = अधखिला पुष्प

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — प्रकृति की सुंदरता देखते ही बनती है हरी-भरी प्रकृति के कारण ही हमारा जीवन इतना अच्छा सरल सुन्दर है। बहती नदी के पानी का कलकल की आवाज मन को सुकून देता है। प्रकति के बीच रहने पर चंदन सा सुगन्धित जीवन व आत्मबल भी तेज होता है। सदैव रंग बदलती यह प्रकृति हर पल मन को भाए, नभ में कभी बादल तो कभी नीला आसमां हो जाए, जो मन को भाये, रूप तेरा (प्रकृति) देख कर हर किसी का मन मोहित हो जाए। प्रकृति हमें सब से प्रेम करना सिखाए। सुन्दर पक्षियों की मधुर आवाज मन को सदैव ही प्रफुल्लित कर जाये।

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यह कविता (श्रीगन्ध बयार।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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बहारों के दिन आ गये।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बहारों के दिन आ गये। ♦

देखो रे! बहारों के दिन आ गये,
कलिका बालाओं के रदों पर मधुकर गीत छाये।

अबोध वल्लरियों सार पनघट पर,
ले तरुणाई अंतर्घट हर्षित अंतर।

हँस रही अँखियों में अलसाई मधुल अनुराग भाये,
विपिन अमरी की रोमलताओं सी।

आनंदित हो उठी पर्ववल्ली दल इंदिरा श्री,
मीहिका कनों के धंधला कितने श्रम धूलिका लहराये।

कोरक कुंतल ने विभु लालसा से,
‘परिमल’ प्रसिद्ध प्रीति लज्जा से।

सौंदर्यांचल में मनोहर धुलि से मुक्तामणि बिखराये,
देखो रे! बहारों के दिन आ गये।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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कामना।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कामना। ♦

कामना – पिपासा द्वितीय।

पात रहा श्रीहत पिंडज, अब्धि में निराश्रित,
मेघ पलक में अस्तित् था, रश्मियों का संङ्घात।
कृति का अभिषंङ्ग दिवस, से कर रहा छल छंद,
पुष्पप्रिये का स्नेह संहृति, हो चला अब बंद।

चढ़ रही थी श्यामता कंजई दिगंत से हीन,
मिलता अन्त्य विक्रांत द्युतिमा कंचन दीन।
यह अनाढ्य संधान रहा जोग इक दया लोक,
रंज भर विजन आगार से छूटते थे कोक।

मनुज अभी तक चिंतन करते थे लगाये ध्यान,
कृत्य के संवाद से ही भर रहे थे कान।
यहाँ सदन में इकट्ठे थे करण दावेदार,
मोहना कीलाल या शस्य का होने लगा संञ्चार।

नूतन पिपासा खींच लाती पाहुन का संकेत,
विचल रहा था सुगम प्रभुत्व युक्त उत्तम रुचि समेत।
ताकते थे बाहुल – शाख से उत्कंठा संसृष्ट,
मानव अचंभित यथार्थ प्रारब्ध का खेले अंदु – अवेष्ट।

अर्थ : कंजई = मिट्टी का रंग, द्युतिमा= प्रकाश, कोक= चकवा,
मोहना= घास, कीलाल= जानवर, शस्य= अन्न,
बाहुल = आग, अंदु= बंधन,

आगे…

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — किसान अच्छी फसल से अच्छे पैदावार के लिए सदैव ही कामना करता है। मौसम के मार से डरते हुए, सदैव ही प्रभु से यही प्रार्थना करता है की फसल तैयार होने तक कोई भी प्राकृतिक आपदा न आये प्रभु, हम आपके बच्चे है हम पर दया करे, कोई गलती हुई हो हमसे तो, हमें क्षमा करें। क्योकि हम अपने परिवार के साथ – साथ और भी मनुष्यों का पेट भरने का कार्य कर रहे है दिन रात एक कर। जहां एक ओर किसान चिंतित भी है तो वहीं दूसरी तरफ प्रभु का ध्यान भी कर रहा हैं। प्रभु सदैव ही सभी का अच्छा ही करते है, सभी को अपने – अपने कर्मो का भुगतान तो करना ही हैं।

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यह कविता (कामना – पिपासा द्वितीय) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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कामना।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कामना। ♦

पिपासा (प्रथम)

कब के चल पड़े, दो हृदय पंथगामी हो अविरत,
मिलने के लिये यहाँ, गाहते थे जो हो उन्मत्त।
इक आश्रय नाथ दूजा था, पाहुन अतीत विकार,
यदि इक प्रश्न था, तो दूजा उत्तर उदार।

इक उमर सिंधु समर था, तो वह अर्ण ह्रस्व विकल,
इक नूतन विहान तो, वह हिरण्य रश्मि निर्मोल।
इक था मेघद्वार पावस, का अश्रुपूर्ण प्रगल्भ,
दूजा अनुरागी मयूख से, पिंगल अधिगत वृषदर्भ।

स्रोतस्विनी कूल के दिगन्त में, नव्य तलधर दिनांत,
खेलता इठलाता जैसे, दो दामनियों से माधुर्य भ्रांत।
जूझ रहे प्रतिक्षण यमल रहे, जीवात्मा के पास,
इक – दूसरे से कोई, न कर सकता फाँस।

अभ्यर्पण में गाहन का था, एक गर्भित मनोभाव,
अभ्युदय पर हठ करती थी, था आसङ्ग उलझाव।
रहा था चल निभृत – अध्व, पर रुचिर प्राण खेल
दो अनचीन्हों से भावी, अब अपेक्षित था मेल।

अनुदिन अगूढ़ हो रहे, रहा तब भी कुछ शेष,
अध्वस्त अंतस् का छुपा, रहता राज विशेष।
जैसे दूर घनेरे विपिन, पन्थ मरण का आलोक,
अनवरत होता जा रहा, हो दृग अमनि को रोक।

आगे…

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — प्रेम मतलब दो हृदय का मिलन, ना की दो जिस्म का मिलन। कहते है प्रेम में यदि इक प्रश्न था, तो दूजा उत्तर उदार। इक उमर सिंधु समर था, तो वह अर्ण ह्रस्व विकल, इक नूतन विहान तो, वह हिरण्य रश्मि निर्मोल। जैसे आत्मा व जीवात्मा, आत्मा जीवात्मा से अलग हो तो कुछ भी अनुभव नहीं, व जीवात्मा का आत्मा के बगैर कोई कीमत नहीं। आत्मा व जीवात्मा एक दूजे के पूरक हैं। अभ्यर्पण में गाहन का था, एक गर्भित मनोभाव, अभ्युदय पर हठ करती थी, था आसङ्ग उलझाव। रहा था चल निभृत – अध्व, पर रुचिर प्राण खेल दो अनचीन्हों से भावी, अब अपेक्षित था मेल।

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यह कविता (कामना – पिपासा {प्रथम}) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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बेचैन उर – व्यथा वसुंधरा की।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बेचैन उर – व्यथा वसुंधरा की। ♦

लिख डाला वृत्तांत धरा की, पर न आस न छूटी,
अंधियारी मिटाने को, तेरे द्वार आकर खड़ी।

है दीप्त मन भी, उतावला फिर मन भी,
कैसे पूर्ण करें हम, कोई राज नहीं है।

क्षिति की गोद में, बिलख रहें सब,
दूर खड़ा नभ भी, आँसू बहा रहा तब।

तृष्णा से तड़पता दिल, विह्वल सा दिख रहा है,
छटपटाहट जिगर की, सबको दिखला रहा है।

असिताङ्ग खड़ी है, अँधेरों ने आज घेरा है,
तिमिर मिटाने को, रोहिताश्व से लड़ा है।

प्रदीप अंतस् का, जलाने चला हूं,
उल्लास अपनी सब में, छितराने चला हूं।

कथा-कहानी सुनाने को, बेचैन बहुत हूं मगर,
हर घड़ी आतुर हो, कटिबद्ध खड़ा हूं।

जब साथ सकारे मिल जायें, गगन को झुका लूँगा,
कोई साथ दे दे तो मुझे, जलधि को सुखा लूँगा।

लगी दाढ़ा उर में मेरे, उसे और धधका लूंगा,
इस विश्व का गरल, कंठ में अपने समां लूंगा।

सांध्य – सवेरे मैं, वीणा के तान लगा कर,
आलाप अगर अधूरा होगा, तो राग विरह के गा लूंगा।

ऋतु की अगुवाई में, धरती का श्रृगांर कर जाऊं,
व्यथा-कथा वसुधा की, तालिस पत्र पर लिख जाऊं।

ऋषियों की तरह अडिग हो, चंद श्लोक लिख जाऊं,
व्याकुल वसुंधरा की व्यथा, कागज पर उकेर जाऊं।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — ग्लोबल वार्मिंग की वजह से अंटार्कटिक में बर्फ बहुत तेजी से पिघल रही है और वहां फिर इतनी बर्फ नहीं जम पाएगी। इस प्रक्रिया की गति को धीमा करने के लिए वातावरण से कार्बन निकालने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। ऑस्ट्रेलिया की एक जलवायु वैज्ञानिक और न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय में रिसर्च फेलो जोई थॉमस ने कहा, “हम पश्चिमी अंटार्कटिक में जो बर्फ की चादर देख रहे हैं कि उसके पिघलने की शुरुआत हो चुकी है। एक बार हम एक विशेष सीमा रेखा तक पहुंच गए तो फिर हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद इसे पिघलने से नहीं रोका जा सकता।” अगर अब भी मानव जाति नहीं सुधरी तो परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहे। कम से कम अब तो समझों पेड़ लगाना और उसकी देखभाल करना जरूरी हैं, नहीं तो इस पृथ्वी पर कोई भी जीव नहीं बचेगा। आओ हम सब मिलकर एक संकल्प ले की प्रत्येक वर्ष एक पेड़ जरूर लगाएंगे, और उसका अच्छे से देखभाल भी करेंगे।

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यह कविता (बेचैन उर – व्यथा वसुंधरा की।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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हिन्दू नववर्ष – आयो रे नवरात्रि।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हिन्दू नववर्ष – आयो रे नवरात्रि। ♦

शुभ मंगल गीत गाओ गुञ्जार करो भू-गगन को,
मैया की अगुवानी को आतुर नैना।
पर्ण-पलास पुष्पो से उसको सजाओ,
नववर्ष के नव दिन रहेगी मैया।
झूम-झूमकर गीत गाओ,
शुभ दिन आया है नवरात्रि का,
मंगलचारी गीत गाओ झूमों नाचो गाओ॥

शुभ आगमन है माँ का शुभ आगमन है,
मंजरित है आम की बगिया।
बाग – बहार रंगीली कलियों की निखार बनके,
रंगो – अबीरों से सज के सिंह पे सवार होके,
आई माता रानी, आजा मेरी मैया आजा।
शुभ आगमन है, माँ तेरा शुभ आगमन है,
मंगलचारी गीत गाओ झूमों नाचो गाओ॥

नवरात्री में आई नवदुर्गा नव रूप धरे,
हर रूप की महिमा अपनी।
जो शब्दों से बखान न हो सके,
कलश पर विराजे लक्ष्मी मैया।
संग-संग विराजे गणपति राजे,
पहली शैलपुत्री हिमराज सुता कहलाती।
दूसरी ब्रह्मचारिणी दुखियों की दुखहारिणी हो तुम॥

तीसरा रूप मैया का चंद्रघंटा कहलाये,
खल – अधम प्रकम्पित होते सारे।
चौथा रूप मैया का कुष्मांडा कहलाये,
पुलकित करती हर्ष – उल्लास जगाये।
पांचवी शक्ति स्कन्दन माता कहलाये,
शिव पुत्र कार्तिकेय के संग पूजी जाये।
छठवीं शक्ति मैया कात्यायनी हो तुम॥

ऋषिराज कात्यान की सुता बन आई,
सातंवा रुप है तेरा मैया कालरात्रि का।
दुर्जनों की विनाशक बन आई,
आठवां रूप महागौरी कहलाये।
अमोघ फलदायिनी तमाम कल्मष धोती मैया,
नौवीं मैया सिद्धिदात्री कहलाती।
सुख समृद्धि और मोक्ष की माता बन आई,
आई नवरात्रि हिन्दू नववर्ष ले आई।
मंगलचारी गीत गाओ झूमों नाचो गाओ॥

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — Hindu Calendar Vikram Samvat 2079, 2 अप्रैल, शनिवार से चैत्र नवरात्रि शुरू होने जा रहे हैं और इसी के साथ नया हिंदू वर्ष नवसंवत्सर 2079 भी आरंभ हो जाएगा। हर वर्ष चैत्र प्रतिपदा शुक्ल पक्ष को हिंदू नववर्ष प्रारंभ होता है। चैत्र का महीना हिंदू नववर्ष का पहला महीना होता है। इसका प्रारंभ सम्राट विक्रमादित्य ने किया था, जो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरु होता है। इस बार 02 अप्रैल को हिंदू नववर्ष 2079 या विक्रम संवत 2079 का प्रारंभ होगा। हिंदू नववर्ष को विक्रम संवत, नव संवत्सर, गुड़ी पड़वा, उगाड़ी आदि नामों से भी जाना जाता है। विक्रम संवत के प्रथम दिन से ही बसंत नवरात्रि का प्रारंभ होता है, जो चैत्र नवरात्रि के नाम से लो​कप्रिय है। नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरुपों मां शैलपुत्री, मां ब्रह्मचारिणी, मां चंद्रघंटा, मां कूष्मांडा, मां स्कंदमाता, मां कात्यायनी, मां कालरात्रि, मां महागौरी और मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना करते हैं और मां दुर्गा का आह्वान करते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों का व्रत रखा जाता है। पारण के साथ इसका समापन करते हैं। हालांकि जो लोग पूरे 9 दिन व्रत नहीं रहते हैं, वे प्रथम दिन और दुर्गाष्टमी के दिन व्रत रखते हैं।

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यह कविता (हिन्दू नववर्ष – आयो रे नवरात्रि।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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युद्ध की तबाही।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ युद्ध की तबाही। ♦

तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर आ खड़ा भव,
इस बारुदी फसलों में अब बम-बारूद उगायेंगे।
खून ही बोयेगें और लाशें ही उगायेंगे,
इस बसी-बसाई दुनिया को वीरान बनायेंगे।

हँसते-मुस्कुराते चमन के गुलाबों को,
बारूदी काले जादू से कलियों को।
अपनी उन्मुक्तता में झूमते बालियों को,
इठलाती बलखाती शोख फूलों के क्यारियों को।

नदियों समन्दरों की लहरों पहरा होगा,
कल-कल करते झरनों के स्वर पर पहरा होगा।
खग-वृंद के नटखट कलरव गुंजन पर,
मोर मैना भौंरो भृंगों के गुंजार पर पहरा होगा।

सब ओर धुंध-धुंआ बारूद बन छा जायेंगें,
कोयल का कुंजन रुदन बन चिल्लायेंगे।
पपीहे की प्रीत भी डर के साये में खो जायेंगें,
लुक-छुप कर गाने वाले मौत की नींद सो जायेंगे।

दामिनियों की कड़-कड़ भी इनके सामने अदने से,
चिंगारियां उठाती भकजोगनियां भी छिप जायेंगी।
झींगुरों-सियारों का रुदन ही हम सुन पायेंगे,
सब ओर सिमटकर खामोशी से तबाही के गीत गायेंगे।

गोलियों की बौछारों से सावन भी शरमायेंगे,
विनाश की अमराई घर गली चौराहों पर आयेंगें।
हर उपवन डाली पर बारूद अंगार बरसायेंगे,
नफरत घृणा लालच आगे-आगे डंका बजायेंगे।

आज तड़प रहा संस्कृति-संस्कारों का देश,
ऋषि-मुनियों और वेद पुराणों पर बना देश।
कहां गये कुरान की वो आयत जिसमें कहा था,
गये कहां यीशू-पैगम्बर शान्ति जो बतलाते थे।

इस युद्ध विभीषिका में नित नये अध्याय जुड़ रहे,
अपनी महत्वाकांक्षा के चलते इक सभ्यता निगल रहा।
हथियारों पर दंभ रखने वालों आगाह है तुमको,
नाको चने चबवाने को अदने भी अड़कर खड़े हैं।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — युद्ध से कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं होता। कहने को तो आज मानव अपने आपको बहुत बड़ा ज्ञानी कहता है, लेकिन उसके सोच व कर्म विकर्मी होते जा रहे हैं। पृथ्वी एक बार पुनः विनाश कि तरफ बढ़ रहा है, आज मानव ही मानव के खून का प्यासा हो गया हैं। कोई भी किसी कि कुछ भी सुनने को तैयार ही नहीं है, सभी अपनी-अपनी ही जोत रहे हैं, सभी एक दूसरे को मारने के लिए तैयार हैं। जरा सोचे क्या इसी दिन के लिए मानव सभ्यता का इतना विकास हुआ? क्या विकास का यह परिणाम होता हैं? अगर ऐसे ही मानव विकास होता है तो, इससे अच्छा तो प्राचीन सभ्यता ही अच्छा है आज से ५५०० वर्ष पूर्व का। अभी भी समय है समझदारी सभी अपना दिखाए और सभी मिलजुलकर रहे, नहीं तो मानव सभ्यता पूर्ण रूप से नष्ट हो जाएगा।

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यह कविता (युद्ध की तबाही।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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