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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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You are here: Home / Archives for Poems of Satish Shekhar Srivastava ‘Parimal’

Poems of Satish Shekhar Srivastava 'Parimal'

शोर मचाती जब-तब।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शोर मचाती जब-तब। ♦

गा रहे पल हरदम,
गुनगुनाती सी शाम है।
उजाले में कशमशा कर,
मचाती शोर जब-तब।

दूर किसी झरोखे से झाँक,
देख रही सदा ये जिंदगी।
कानों में आ-आकर,
कहती कथा कोई पुरागी।

रहती ओट में सदा,
लुक-छिपकर कोलाहल करती है।

अंत:करण की मूक आवाजें,
कलरव करती साँसों में।
थम-थम सी जाती धमनियों को,
चेता जाती आती-जाती आहों में।

खामोश रहती चुपचुप,
गुमसुम-सी चंचल रहती है।

झुरमुट की झँझरी छिदी-छिदी,
झरझर हो गई प्रत्याशा।
क्षणभंगुर-सा जीने को,
राग वेदना गाती शाशा।

सरगम के सुर-तालों में,
वेदना व्यथा बतलाती है।

नोट: शाशा – मनमुख(मन), पुरागी – दफन।
(ये शब्द मैनें कबीलाई भाषा से ली है।)

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

—————

यह कविता (शोर मचाती जब-तब।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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सूना-सूना दूर गगन है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सूना-सूना दूर गगन है। ♦

प्रेम के धागे टूटे, टूटा रक्त का संबंध,
बोलते मुखड़े पर, सूना-सूना दूर गगन है।

रुनझुन गाती भोर है,
दालान की साँझ सुहानी।
कच्ची गलियाँ गाँवों की,
बन गई बिसरी कहानी।
घनी छाँव पीपल की,
ढूँढ़ता श्रापित मन है।

रसभरी अमराईयों की,
वेदना प्राणों में जन्मती।
रह गये आँखों में अश्रु अकेले,
खोजती अँखियां नेह प्रीति।
हाय! बेचैनियाँ अधरों पर,
मोह यादों की चुभन है।

रहा मानस के जंगल में,
पहन स्वांगों के मुखौटे।
हर दिन ताजा चोट लेकर,
किंवाड़ पीछे साँझ लौटे।
कुहासों में घुली साँस है,
घावों की थकन पाँव में है।

निरर्थक सी जिंदगी को,
जी रही गुमसुम उदासी।
श्याम-शित पन्थों पर भटकती,
पी कोलाहल की आशा प्यासी।
अनुरक्ति में कसमसाता वह,
आज तक लड़कपन है।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (सूना-सूना दूर गगन है।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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लें संकल्प पुनरावर्तन का।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ लें संकल्प पुनरावर्तन का। ♦

अंतस् का विश्वास यह स्वर्ण-चक्र रुके नहीं,
मानस की सुमंगली कुंकुम कभी चुके नहीं।

प्रवाह रहे झिलमिल,
जैसे आदित्य की थाल।
वृन्तों पर अतीत के,
खिले आगम श्रीवास।
नैनों में धूप रक्तिम,
रंग उन अधरों की।
जिसके गातों तनुरूह में,
सिन्धुनंदनी की कली।

छाँव में पलकों के कलाधार कभी थके नहीं,
मानस की सुमंगली कुंकुम कभी चुके नहीं।

मन-आत्मा का अटल विश्वास,
धरा में जैसे ज्वाल रहे।
नजरों की अँगड़ाईयों में,
जैसे अदृश्य मनुहार रहे।
मिट्टी की खुशबू जल में,
विटप-वृंद में बयार रहे।
विचारों की शुचीर्य की,
पैदावार बारंबार रहे।

उर-अंतस्-प्राणों के संघर्षों में वेदनायें कभी दुखे नहीं,
मानस की सुमंगली कुंकुम कभी चुके नहीं।

भावी समय के पन्थ मिले,
अल्पना की कल्पना रंग भरे।
यामित रक्षित कंगूरों पर,
देश भविष्य का दीप धरे।
श्रद्धा आलंब आधार पर,
कभी न धूमिल साँझ घिरे।
आयुष्य प्रखर सुर-ताल बने,
युगों – युगों तक विश्व में,
भारत की जय गान बजे।

चरणों में अनाचार के मनु-आर्य के कभी झुके नहीं,
मानस के सुमंगली कुंकुम कभी चुके नहीं।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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आँखों में अश्रु भरे।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आँखों में अश्रु भरे। ♦

रख काँधे पर सर अपना,
अँखियों में अश्रु भरे हुए।
पहन अँधियारों को,
दर्द – पीड़ा की सुबकी लेते।
हर्ष – कर्ष की बातों में,
अब्धुमन की वीरानी खाती।

किसकी आहट सुनें,
पास कौन आयेगा।
अतिथि की आँखों को,
जो आँसू दे जायेगा।
किससे हम अनुरक्त हो,
भेजते उर-वेदना की पाती।

क्यूँ करे कोई याद,
इष्ट अपना यहाँ कौन।
जग इक बंधन है,
अनुराग इक सपन।
विचार कर अकुलाए,
अंत: करण को ढाँढ़स दे जाती।

है चंदा भी अकेला,
अकेली है उसकी चाँदनी।
मुग्ध हो हँसी दोनों,
ले ली है हृदय पर अपनी।
खाली मन प्राणों से,
मीत-प्रीति की चुटकियाँ ले आती।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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बीते काल की थकन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बीते काल की थकन। ♦

तू चल नये आगाज,
मिटा अपने तन-मन की थकन;
कर कथन अपने मन,
क्षुधा लिप्सा को कर अंतर्मन।
रे पंछी! न परवाज कर,
छोड़ अपने नीड़-चमन।

इस सृष्टि का कहीं न अन्त,
तू विश्राम कर आना – जाना।
पंखों को ले अपने समेट,
थकन तू अपनी ले मिटा।
रे तरंग! न सहला चल,
तू गुदगुदाते अपने पन्थ।

दिखे सब में प्रीति नेह विश्वास,
तटनी की भूल भुला दे।
वो कौन एक है जो,
छोड़े अपने शीलपन।
रे पवन! न हहर चल तू,
मौन हो संग-संग।

जग द्रोह से है भरा,
मोह तू छोड़ जरा।
ज्ञान-विज्ञान के लिये लड़ा,
क्यूँ जीवन – प्राण से भिड़ा।
प्रचंड प्रज्वलित रहा,
खुद में आनंद प्रसन्न रहा।
रे अंतस्! न विलासी तू,
तापस अंग को सुसुप्त कर।

जीवन का सकल आसय,
न ढो अब भ्रमित भाव से।
निष्कर्ष तू निकाल अभी,
मन को न तोल हार-जीत से।
अनगन न कर,
महा-वृन्त तू बन।
रे स्वरूप! न बिगाड़ तू,
संवार निरता का कर सृजन।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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अब सोने दो।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अब सोने दो। ♦

केशों में निशा की सवारी है अभी,
पिधान में तेज धारी है अभी।
सुरमयी रंग पे न गया कोई निखार,
विभावरी तो मधु – कुँवारी है अभी।

कौमूदी के पथ पर साथ तुम हो ना,
प्रीति हमारी युगों तक अमर होगी ना।
चाहे विष पिला देना तुम कल मुझको,
पर अमृततरंगिणी में प्रेम की बात होगी ना।

क्या सारंगों के इशारे हैं उस पर गौर करो,
कह रही बसंत बयार क्या जरा ध्यान दो।
जीवन तृषित खड़ी है चौखट पर तुम्हारे,
आज मिलन का पर्व प्रीति का दान दो।

कोमल केश लहरायें मचल-मचल कर,
गहन पलक लजा कर तनिक उठ गई।
जैसे किसी कामिनी कुँज की अब्धि पैठ पर,
घटायें झुक-झुक गई झूम कर छा गई।

झूम लिया सुप्तविग्रही श्वांसों को स्थिर करने दो,
अब तक गुमनाम था थोड़ा गुमराह होने दो।
आज छाई आँखों की पलकों पर छाँह छबीली,
चिर-निद्रित इन अँखियों को अब सोने दो।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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समर्पित नव वर्ष को।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ समर्पित नव वर्ष को। ♦

नयन में चंचला दीप्ति है,
बाँहों में बीजल धनु मण्डित।
केयूर स्थिरता चरण में,
उर में श्रद्धा अखंडित।

प्राणों में जलती ज्वालामुखी,
ड़मरु-मध्य हथेली पर सँभाले।
जा रहा है जो संभाग,
ध्वजस्तंभ को गगन में उछाले।

सुदर्शन विजय उद्घोष कर,
युग निर्माण में अभिनव बढ़ा है।
युधान को ललकारता जो,
शिखर शैलाधिराज पर चढ़ा है।

दर्प भी कन्दर्प का,
मुख कांति का देख मर्दित।
देश के उस ज्वान को,
मेरी काव्य संजीवनी समर्पित।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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अकेलेपन में किसे आवाज दूँ।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अकेलेपन में किसे आवाज दूँ। ♦

अकेलेपन में किसे आवाज दूँ,
दिगन्त पर नेह-प्रिया के देश।
मेरी मृगतृष्णा कहाँ ले आई,
मेरे प्राणों को किस परदेश।

महाशून्य में विलीन हो जाती,
कारुण्य शब्दों की निनाद तरंगें।
उठने से पहले सुप्त हो जाती,
नयनों के स्वप्न रंग – बिरंगें।
यह अखिल जगत स्वप्नों-सा,
क्षणिक पल सा परिवेश।

आतप अनंत कतरा भर छाया,
वाक्य हमारे अर्थ पराया।
अठखेलपना पल-पल छलती,
आकर्षण से मुग्धित माया।
श्याम-सखा बदरा से कैसे भेजूँ,
प्राण-प्रियतमे को संदेशा।

खिले – खिले कुसुमित फूलों की,
देख निशामुख झर गई लालिमा।
अकुंठ अरुण को खा लेती,
प्रचंड निशिता की घनी कालिमा।
समयकाल की अटल आधार पर,
निशान भंग के असंख्य शेष।

जन्म – जन्मांतर की अव्यक्त यातना,
अवदलित वृद्धता की दु:खद कहानी।
युग – युगान्तों से जल रही धरा पर,
द्वन्द – संघर्षों में सतत जवानी।
छलमय जमाने के निष्ठुर हाथों में,
जकड़ा है जीवन का केश।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (अकेलेपन में किसे आवाज दूँ।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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नया सवेरा होने वाला।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नया सवेरा होने वाला। ♦

पहल दिवा से पहले घनघोर अँधेरे घेरे,
शीतल किरणें ले आँखें अपनी खोले।
दूर क्षितिज की धुँधलाहट में,
अब कालरात्रि जाने वाली है।
नयन खोलो कलरव गान पंछियों के,
तालों से नया सवेरा होने वाला है।

इक – इक कर बुझते जाते दीपक,
झिलमिल – झिलमिल करते तारे।
अंतिम साँस लेने लगे हैं अँधियारे,
कोलाहल करते पंख – पखेरू सारे।
ज्योति जुगनुओं की जंगल में,
सम्भवत: अब सोने वाली है।

तपे मरुस्थल जितना दिनभर,
उतनी ही शीतल करे यामा निर्मल।
गझिन कालिमा के आँचल में,
उझाँकती अरुणा उज्जवल।
विपुला – वृजन और अर्णव को,
स्वर्णिम किरण धोने वाली है।

दुर्गम औंड़ा सघन सिंधु लहरों में,
उतर गहराई में मिलते मोती।
घने श्यामा के आलिंगन में,
कहीं छुपी रहती जीवन ज्योति।
घनघोर अमा की काली-काली रात,
दीप्ति – प्रकाश देने वाली है।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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स्वप्न कुसुम।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ स्वप्न कुसुम। ♦

काव्य : ज्योतित कर दे माँ।

अस्तमनबेला में मुस्कुराता हुआ,
मद्धिम सुंदर चाल विस्मित ईरण।
नंदिनी माँ उतरी मेरे अँगना,
इंदु की चुलबुल धवल चरण।

चल आई कितना अचम्भा – अध्व,
श्वेतरथ समीरण-सी निःशब्द परी।
तरंगों वाली आकाशगंगा की,
सुधा झागित सिंधुजात की लहरी।

शर्मायी अचंभित-सी निहार रही थी,
मेरा दिनांत-आलोक अरुनार।
लुकाछिपी का दृश्यकाव्य,
क्या कस रही है प्रणयी जानदार।

तरंगित चंद्रिका के मनोभाव की,
केश उद्भावना-सी सुकुमार।
हर्षित हो भव में बिखर पड़ी ले,
नई तारिकाओं से मनोवेग अपार।

अलस की नूतन स्याह-किनारे में,
वृजिन-वेली-सी शशि छविमान।
भर लाई माँ किस मधुवन से,
लख-लख स्वप्न-कुसुम अजान।

मंजु-रैन के अधरों की वह,
सुधा-कुसुमित मुग्धित तान।
मेरे निभृत सपन-निकेतन में,
माया जाल सी मोहित अनजान।

घिर आवे! ज्योतित कर दे माँ,
मेरा निद्रित नयनपट संसार।
विलक्षणा-बेली की चंद्र-कुमुद-केश,
ही मेरी चंद्रकांता बने साकार।

अर्थ: विलक्षणा-बेली = स्वप्न की घाटी,
वृजिन = आकाश, उद्भावना = कल्पना

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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