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हिन्दी साहित्य

प्रधानमंत्री मोदी की 1774 करोड़ की सौगात काशी में।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ प्रधानमंत्री मोदी की 1774 करोड़ की सौगात काशी में। ♦

आषाढ़ शुक्ल – अष्टमी तिथि, जुलाई 7, 2022 दिन बृहस्पतिवार को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काशी के सिगरा स्टेडियम में 1774 करोड़ की विकास परियोजना के लोकार्पण समारोह में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और राज्यपाल के साथ उपस्थित हुए।

प्रधानमंत्री का मुख्यमंत्री द्वारा स्वागत

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने विगत दिनों उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद पहली बार प्रधानमंत्री के काशी आगमन पर स्टेडियम मंच से मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया।

मुख्यमंत्री का वक्तव्य

उत्तर प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में काशी नई विकास यात्रा की ओर बढ़ रही हैं और काशी मां गंगा की अविरल निर्मल धारा को देख रही। अब काशी को चिकित्सा और शिक्षा के नए हब के रूप में देखा जा रहा। मुख्यमंत्री ने कहा प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में बदलती काशी को नये कलेवर के रूप में देखा गया है। काशी में शिक्षा स्वास्थ पर्यटन और खेल में काफी विकास कार्य हुए हैं।

यहां ग्राम पंचायत स्तर से बेसिक मंच पर विकासशील परियोजनाएं लाई गई है। योजनाओं का लाभ नौजवानों, महिलाओं, सभी समाज के अंतिम पंक्ति में बैठे लोगों को मिला है। जाति धर्म से ऊपर उठकर समाज के लोगों को लाभांवित किया गया है। इस महत्वपूर्ण समय पर आज के लिए मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री का आभार जताया।

प्रधानमंत्री ने कहा …

काशी के सांसद के रूप में अपने भाषण की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी अंदाज में किया और कहा काशी में कहीं जाला, सात बार अउर, नौ त्यौहार होला। काहे का मतलब ई है कि जहां रोज – रोज, नया – नया त्योहार मनावल जाला। इसके बाद उन्होंने कहा आप सब लोगों ने प्रणाम बा।

जनसभा को संबोधित करते हुए अपनी भाषण के दौरान विकास की अविरल धारा में आज और कई परियोजनाओं कि श्रृंखला जुड़ी है। काशी हमेशा से प्रभावशाली प्रबाहवान रही है। काशी ने एक तस्वीर पूरे देश को दिखाई है जिसमें विरासत भी है विकास भी है।

हमारा पूरा प्रयास है कि आत्मा वही रहे मगर काया में निरंतर नवीनता लाने का प्रयास जारी है। इसीलिए काशी में एक प्रोजेक्ट का काम पूरा होता है तो चार नया शुरू हो जाता है। काशी में सड़क, पानी, बिजली, शिक्षा, स्वच्छता और सुंदरीकरण कर ऐसे जुड़ी हजारों करोड़ रुपए की परियोजना शुरू हो चुकी है। काशी के लोगों ने उत्साह और उमंग के साथ मेरा समर्थन किया इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

सिगरा स्टेडियम मंच पर उपस्थित

स्टेडियम के मंच पर प्रधानमंत्री, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, केंद्रीय मंत्री डॉ महेंद्र नाथ पांडे, कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर, जया शंकर मिश्र दयालु, रविंदर जयसवाल अशोक धवन आदि लोग उपस्थित थे।

प्रधानमंत्री वेंडिंग जोन (पटरी व्यवसाय से जुडे) की चर्चा की

ठेला पटरी व्यवसाई संग के सचिव अभिषेख निगम और प्रकाश कुमार श्रीवास्तव गणेश जी – संयोजक रेहड़ी पटरी व्यवसाय प्रकोष्ठ काशी चेत्र भाजपा के नेतृत्व में साइकिलों, पटरी वाले प्रधानमंत्री जी की जनसभा में जय कारे कि नारे लगाते, भारत माता की जय, मोदी-मोदी, घर-घर मोदी, के नारे को लगाते हुए सभा स्थल पर पहुंचे। पटरी व्यवसाय से जुडे लोग प्रधानमंत्री जी की योजनाओं से काफी प्रसन्न दिखे।

IT कॉलेज में केंद्रीकृत रसोई अच्छय पात्र का उद्घाटन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी के IT कॉलेज परिसर में अक्षय पात्र रसोई का किया उद्घाटन इसके बाद महिला से सब्जी की धुलाई से लेकर दाल और चावल पकाने वाली मशीन के संचालन के बारे में जानकारी ली। किचन से निकलने के बाद पंडाल में प्रधानमंत्री ने बच्चों के साथ संवाद किया। ननिहाल की प्रतिभा को देखकर प्रधानमंत्री कायल हो गए।

अक्षय पात्र का उद्घाटन प्रधानमंत्री ने उस जगह किया है जहां कभी स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुष ने अपने पैरों से उधर आकर उस जगह को पवित्र किया था। कहां जाता है कि स्वामी विवेकानंद जी IT कॉलेज में पधारे थे।

प्रोटोकॉल को तोड़ कर प्रधानमंत्री नौनिहालों को दुलारने लगे

कोई भी कार्यक्रम हो भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी बच्चों के साथ दुलार करना नहीं भूलते। अर्दली बाजार एवं IT कॉलेज में बच्चों के साथ प्रधानमंत्री ने खूब बातें की। बच्चों से प्रधानमंत्री ने लक्ष्य के प्रति डटे रहने का संदेश दिया।

एक बच्चे ने शिव तांडव किया जिसे प्रधानमंत्री ने अपने पास बुला लिया। उसके सिर पर हाथ फेरकर शाबाशी दी। एक बच्चा नेशनल ओलिंपियाड में योग करके लौटा था, उसने अपने योग का प्रदर्शन किया, शिवम की ओर देख प्रधानमंत्री उसके मुरीद हुए। सेवापूरी का एक बालक ने लगभग सैकड़ो देशों का नाम बताया और राजधानी, प्रधानमंत्री ने कुछ देशों के नाम और राजधानी सुनी इसके बाद उन्होंने खूब ध्यान से पढ़ो और आगे बढ़ों कहा।

एक बच्चे ने संस्कृत में श्लोक सुनाया जिसे सुनकर प्रधानमंत्री चकित रह गए। उकथी कन्या विद्यालय की छात्रा ने महिषासुर मर्दिनी, और सा नानी संग स्थित में महिषासुर मर्दिनी सुनाया चंद मिनटों के लिए पंडाल में उपस्थित लोगों में सिर्फ उसकी ही आवाज गुंजन कर रही थी। साक्षी यादव ने कविता सुनाया। अतीत नामक छात्र ने आंख पर पट्टी बांधकर एशिया के अनेक देशों और उसकी राजधानी को बताया।सोहेल नाम छात्र ने प्रधानमंत्री के पंडाल में घुसने पर ढोल बजा कर उनका स्वागत किया और संस्कृत में प्रधानमंत्री को अपना परिचय दिया।

रुद्राक्ष कन्वेंशन में प्रधानमंत्री मोदी

7 जुलाई 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी के रुद्राक्ष कमीशन में आने पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने उन्हें अंग वस्त्र, स्मृति चिन्ह प्रदान की। रुद्राक्ष कंवेंशन में अखिल भारतीय शिक्षा समागम में प्रधानमंत्री ने कहा कि काशी को मोक्ष की नगरी इसलिए कहा जाता है क्योंकि हमारे यहां मुक्ति का एकमात्र उपाय विद्या और ज्ञान को माना गया है।

जब शिक्षा का इतना बड़ा आयोजन काशी में होगा तो देश को उसका बड़ा फायदा होगा। देश की महिलाओं, बेटियों के लिए जो क्षेत्र पहले बंद हुआ करते थे आज वह सेक्टर बेटियों की प्रतिभा के उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। तीन दिवसीय समागम से जो अमूल्य निधि निकलेगी वह शिक्षा को नई दिशा देगी। हमारे यहां उपनिषद ने कहा गया है कि विद्या अमृतमं अश्नुते, अर्थात विद्या ही अमरत्व है और अमृत तक ले जाती है।

प्रधानमंत्री ने शिक्षाविद से नए भारत का विजन साझा करते हुए कहा दुनिया भर में सौर ऊर्जा पर चर्चा हो रही है। हम भाग्यशाली हैं कि हमारे पास चमकता हुआ सूरज है। हमें सोलर एनर्जी का अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए।

अखिल भारतीय शिक्षा समागम

अखिल भारतीय शिक्षा समागम के दौरान राज्यपाल उत्तर प्रदेश आनंदीबेन पटेल, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, अन्नपूर्णा देवी, डॉ सुभाष सरकार, डॉ राजकुमार रंजन सिंह, वैज्ञानिक के कस्तूरी रंजन, उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय, मंत्री आशीष पटेल और रजनी तिवारी आदि मौजूद रहे।

अक्षय पात्र अभी है कहां-कहां

देश का कोई भी बच्चा भूख की वजह से शिक्षा से वंचित न हो इसके लिए प्रधानमंत्री ने यह योजना चलाई है जिसके तहत अब तक कानपुर, आगरा, गाज़ियाबाद, वृन्दावन, लखनऊ, गोरखपुर और वाराणसी में एकीकृत रसोई बनाने की प्रक्रिया शुरु हो गई है।

सोलर पैनल से अक्षय पात्र चलेगा

अक्षय पात्र फाउंडेशन के संयोजक ने बताया कि पर्यावरण संरक्षण उनको ध्यान में रखते हुए सोलर पैनल इन्फ्रा लाइटों से भोजन को तैयार किया जाता है।

अखिल भारतीय शिक्षा समागम काशी

काशी की धरती पर सब विद्या की राजधानी में 3 दिन के अखिल भारतीय शिक्षा समागम रुद्राक्ष कंवेंशन सेंटर शिक्षा मंत्रालय, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और बच्चों के सहयोग से आयोजित किया गया।

समागम का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षकों को उनके जिम्मेदारी का भी एहसास कराया। प्रधानमंत्री ने कहा लैब टू लैंड का रोड मैप होना चाहिए। कृषि विद्यालयों के लैब में होने वाले रिसर्च का लाभ किसानों को भी मिलना चाहिए और किसानों के अनुभव को लैब में भी प्रयोग करना चाहिए।

आज दुनिया के कई देश जड़ी – बूटी से पारंपरिक इलाज में हमसे आगे हैं। जिसका परिणाम दुनिया में देखा है। हमारे पास परिणाम के साथ-साथ प्रमाण भी होनी चाहिए।

प्रधानमंत्री ने कहा विकास का मतलब चमक दमक नहीं, अपितु वंचित तबके का सशक्तिकरण करना है। दुनिया के समृद्ध देश परेशान हैं, वहां बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है। युवा पीढ़ी ही कम हो रही है। हमारे यहां भी जल्द ऐसा समय आने वाला है इसका समाधान खोजना होगा। शिक्षा को 21वीं सदी के भविष्य से जोड़ना होगा।

अखिल भारतीय शिक्षा समागम का आयोजन उस पवित्र धरती पर हो रहा है जहां आजादी से पहले देश की इतनी महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय की स्थापना हो गई थी। शिक्षा और शोध का, विद्या और बोध का, इतना बड़ा मंथन होगा तो शेर निकलने वाला अमृत देश को नई दिशा देगा। प्रधानमंत्री जी ने कहा यह हमें क्लाइमेट चेंज पर काम चाहिए।

खेल जगत पर बोलते हुए कहा

भारत में लोग लगातार उपलब्धियां हासिल कर रहे है। खेल मैदान शाम को खिलाड़ियों से भरे होने चाहिए। विश्वविद्यालय खेल के क्षेत्र में लैक्चर बनाकर चल सकते हैं, आने वाले वर्षों में कितने गोल्ड मेडल ला सकते है, इस बारे में विचार करने की जरूरत हैं। हमारे बच्चे दुनिया भर में अखिल विश्व में खेलने जाएं।

मोदी की सौगात से सजेगा फ्लाईओवर

लहरतारा से चौका घाट फ्लाईओवर के नीचे 1.9 किलोमीटर में फैली आदिवासियों को प्रधानमंत्री ने नाईट बाजार की सौगात दी। इस बाजार के बन जाने के बाद काशी ही नहीं बल्कि दूर दराज से आने वाले पर्यटकों को काशी की कला व संस्कृति देखने के साथ ही बनारसी खानपान का स्वाद भी मिलेगा। रेलवे स्टेशन से निकलकर और वाराणसी के बस स्टेशन से बाहर आकर जनता को जरूरत की सामान्य वन प्ले सेटिंग में रात में भी मुहैया होगी।

सिगरा स्टेडियम का निर्माण

International Sports Complex के निर्माण के लिए खेलो इंडिया अब निवेश करेगी। इस Complex का निर्माण नई प्रणाली से 424 करोड की लागत से होगा। पहले चरण का निर्माण 87 करोड़ रुपए में होगा।

लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री

वायु सेना के विशेष विमान से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोपहर 1:24 पर लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर पहुंचे। प्रधानमंत्री के आगमन से पूर्व उनकी आगवानी के लिए राज्यपाल उत्तर प्रदेश आनंदीबेन पटेल और उत्तर प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी राजकीय विमान से 12:00 बजकर 35 मिनट पर एयरपोर्ट पहुंच गए। उन्हें कुछ पुष्प गुच्छ अंग वस्त्र भेटकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने स्वागत किया। इसके उपरांत तीनों लोग वाराणसी के पुलिस लाइन हेली पैड पर उत्तर हेलीकॉप्टर से रवाना हुए।

वाराणसी शहर में अनेक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के बाद प्रधानमंत्री, प्रकाश कुमार श्रीवास्तव ‘गणेश जी’ संयोजक रेहडी पटरी व्यवसाय प्रकोष्ठ काशी क्षेत्र भाजपा से मिलकर शाम 6:00 बजे वायु सेना के विमान से दिल्ली रवाना हो गए।

बहुत-बहुत तत्वदर्शी, दूरदर्शी व्यक्तियों के घनी तप और योग क्रियाओं को पहचान दिलाने वाले दुनिया में भारत का नाम आगे बढ़ाने वाले स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, अटल बिहारी वाजपेयी, श्यामा प्रसाद, राम मनोहर लोहिया स्वामी दयानंद सरस्वती से प्रेरणा लेकर भगवान राम के आदर्श को शिरोधार्य करके जगने वाले देश के माननीय प्रधानमंत्री का काशी में जो संस्कृति और विद्या की जननी वाली नगरी है। बाबा भोलेनाथ को समर्पित किया।

जय हिन्द – जय जवान – जय किसान। भारत माता की जय।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — देश का कोई भी बच्चा भूख की वजह से शिक्षा से वंचित न हो इसके लिए प्रधानमंत्री ने यह योजना चलाई है जिसके तहत अब तक कानपुर, आगरा, गाज़ियाबाद, वृन्दावन, लखनऊ, गोरखपुर और वाराणसी में एकीकृत रसोई बनाने की प्रक्रिया शुरु हो गई है। लहरतारा से चौका घाट फ्लाईओवर के नीचे 1.9 किलोमीटर में फैली आदिवासियों को प्रधानमंत्री ने नाईट बाजार की सौगात दी। इस बाजार के बन जाने के बाद काशी ही नहीं बल्कि दूर दराज से आने वाले पर्यटकों को काशी की कला व संस्कृति देखने के साथ ही बनारसी खानपान का स्वाद भी मिलेगा। जब शिक्षा का इतना बड़ा आयोजन काशी में होगा तो देश को उसका बड़ा फायदा होगा। देश की महिलाओं, बेटियों के लिए जो क्षेत्र पहले बंद हुआ करते थे आज वह सेक्टर बेटियों की प्रतिभा के उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं।

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यह लेख (प्रधानमंत्री मोदी की 1774 करोड़ की सौगात काशी में।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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कर्मों का फल।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कर्मों का फल। ♦

मनुष्य का जीवन एक खेत की तरह है, जिसमें उसके कर्म बोए जाते हैं और मनुष्य अपने कर्मों के अच्छे व बुरे फल काटते हैं। बुरे कर्म करने वाले बुराई की दल-दल में फंस कर बुराई बटोरता रहता है; आम बोने वाला आम खाता है, बबूल बोने वाले के नसीब में कांटा ही कांटा होता है।

बबूल बोकर आम प्राप्त करने की कामना, प्रकृति के नियम के विरुध्द है, असंभव है, उसी प्रकार बुराई के बीज बोकर भलाई की उम्मीद करना, मृत इन्सान को जिन्दा देखने के समान है।

इतिहास गवाह है; कार्य कभी कारण रहित नहीं होते और कोई भी परिणाम अकारण नहीं होता। जो परीक्षा ही नहीं देगा उसका परिणाम कैसे निकलेगा। परिणाम हमेशा व्यक्ति के कर्मों की कलम से लिखी जाती है।

भाग्य का निर्माण कर्म से ही होता है। समाज, राष्ट्र या व्यक्ति कभी बुराई से नहीं पनपता। जीवन के हर क्षण का लेखा-जोखा भगवान चित्रगुप्त के पास होता है, कोई प्राणी बुरा कर्म करके बच नहीं सकता। जल कीचड़ से बहेगा, सड़े हुए चीज में दुर्गंध होगी, गंदे नाले का पानी पेय होगा-यह मात्र भ्रम है। सच्चाई से कोई वास्ता नहीं, ठीक उसी प्रकार बुरे कर्म, धोखे की असफलताएँ “पतन” और अपयश को जन्म देती है, कर्म फल अकाट्य है।

कल की सुबह का पता नहीं, लेकिन योजना लम्बी बनाने वाले, अंहकार में चूर इन्सान, दूसरे के विनाश की सोच रखने वाले, गरीबों का खून चूसने वाले, अपने कर्म की परवाह न करने वाले, अमावस्या की रात को चांदनी की कल्पना करते है जो कभी संभव नहीं है।

जैसा अन्न वैसा मन, अगर एक लड़के का चप्पल समुद्र में चला जाए तो वह समुद्र को चोर कहेगा, अगर किसी को मोती मिल जाए तो वह दानी कहेगा, जैसा अन्ना, वैसा मन, जैसी भावना, वैसा विचार। जिसे तुम अच्छा मानते हो, यदि उसे अपने व्यवहार में नहीं लाते, तो यह तुम्हारी कायरता है। अगर भय तुम्हें ऐसा करने से रोकता है तो न तो तुम्हारा चरित्र उठेगा और ना हीं तुम्हें प्रतिष्ठा मिलेगी।

मन की इच्छा को बार-बार दबाना, अपने विचारों को खुलकर व्यक्त नहीं करना, आत्महत्या करने के समान है। यदि ऐसा करके कोई किसी लाभ की उम्मीद करके बैठा है तो वह बहुत बड़े धोखे में है, बिन बादल बरसात की आश में है।

मनुष्य का जीवन दुःखों से भरा है, शारीरिक, आर्थिक, मानसिक, सामाजिक, चाहे कुछ भी हो, हर इन्सान इससे निजात पाने के लिए, सुख की प्राप्ति के लिए हर संभव प्रयास करता है; परन्तु विडंबना यह है कि कुछ ही लोगों को सुख की प्राप्ति होती है। अधिकतर लोगों की झोली में असफलता, असंतोष, अभाव, अतृप्ति एंव दुःख ही मिलता है। लोग भटकते हैं सुख की प्राप्ति के लिए, लेकिन मिलता है दुःख, अपमान, यही पीड़ा और वेदना है हर इन्सान की।

सुख ढूढ़ने वाले ये भूल जाते हैं कि दुःख कहीं बाहर से नहीं आता, दुःखों का मूल हमारे भीतर होता है। बाहर ढूढ़ने के कारण तो हजारों हो सकते हैं लेकिन समाधान कहीं नहीं मिल सकता। दुःखों से मुक्ति पाने के लिए दृष्टिकोण में बदलाव लाते हुए, दिल की गहराई में आत्मसात करना होगा।

जिम्मेदार कोई और नहीं- “केवल मैं खुद हूँ” ये हमारे ही द्वारा किए गए कर्मों का परिणाम है। बाहर दिखने वाली हर चीज अन्दर की छाया है। सुख हो या दुःख, आनंद हो या विषाद, सम्मान हो या अपमान – ये सभी अपने कर्मों का ही फल है। स्वंय पर जिम्मेदारी लेने के बाद ही दृष्टिकोण में बदलाव संभव है। क्रांन्ति उन्हीं के जीवन में घटती है जो जिम्मेदारी लेना जानते हैं। जो अपनी गलतियों के लिए दूसरों को दोषी ठहराते हैं वो अपने अन्दर बदलाव कभी नहीं ला सकते।

दुःख का कारण अपने अंदर तलाशने वाले ही समाधान ढूढ़ सकते हैं। किसी इन्सान को यह पता नहीं, वह कब तक जिन्दा रहेगा। अगर किसी को यह पता चल जाए कि कल उसकी मौत निश्चित है; तो क्या उसका व्यवहार वही रहेगा जो वह प्रतिदिन रखता है। निश्चित रुप से उसके व्यवहार में बदलाव आ जाएगा, किसी का दिल नहीं दुखाएगा, अंहकार त्याग देगा, विनम्र भाव से पेश आएगा, हर गलत कर्मों के लिए माफी मांगेगा, माया-मोह के बंधन से मुक्त होने की कोशिश करेगा। जब यही सत्य है कि जीवन अपने हाथ में नहीं तो अपने कर्मों को सुधार कर क्यूं न अच्छा मनुष्य बने।

किसी को दोष देने से बेहतर है खुद को दोषी मानें; यही सत्य है।

“जिन्दगी है बहुत छोटी, इसका न कोई ठिकाना।
किसके लिए बना रहे हो, ये महल, ये आशियाना॥”

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — देर हो सकता है लेकिन अंधेर नहीं होता हैं; कर्मो का फल एक न एक दिन जरूर मिलता हैं। अगर किसी को यह पता चल जाए कि कल उसकी मौत निश्चित है; तो क्या उसका व्यवहार वही रहेगा जो वह प्रतिदिन रखता है। निश्चित रुप से उसके व्यवहार में बदलाव आ जाएगा, किसी का दिल नहीं दुखाएगा, अंहकार त्याग देगा, विनम्र भाव से पेश आएगा, हर गलत कर्मों के लिए माफी मांगेगा, माया-मोह के बंधन से मुक्त होने की कोशिश करेगा। जब यही सत्य है कि जीवन अपने हाथ में नहीं तो अपने कर्मों को सुधार कर क्यूं न अच्छा मनुष्य बने। इतिहास गवाह है; कार्य कभी कारण रहित नहीं होते और कोई भी परिणाम अकारण नहीं होता। जो परीक्षा ही नहीं देगा उसका परिणाम कैसे निकलेगा। परिणाम हमेशा व्यक्ति के कर्मों की कलम से लिखी जाती है।

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यह लेख (कर्मों का फल।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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अब प्याज भी रुलाएगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अब प्याज भी रुलाएगा। ♦

हम सब के भोजन में अभी तक कही न कही और किसी न किसी रूप में प्याज का प्रयोग हो रहा है। कच्चे प्याज के लाभों को देखकर तो पहले लगभग हर घर में कच्चे प्याज को खाया जाता था चाहे हर रोज सिलबट्टे पर प्याज की चटनी ही क्यों न बनानी पड़े। लेकिन धीरे-धीरे इसका प्रयोग केवल पका ही किया जाने लगा।

हाल ये है कि बच्चें अब घर के खाने में प्याज आने से नाक-भौ सिकोड़ते है वहीं पर हॉट डॉग व बर्गर में सड़क पर चाव से खाते है। चलो कोई बात नही ये मान लेते है कि चलो कोई तो प्याज का गुण इनके शरीर में जा रहा होगा।

लेकिन अब प्याज के गुणों का एक नई जगह ही प्रयोग हो रहा है। हम सभी हर रोज देखते भी हैं।

क्या हुआ सोच में पड़ गए। अरे हां आप सभी सही समझे वो है प्याज शैम्पू।

इस प्याज शैम्पू की तो इस तरह से बाढ़ आ गयी है, ऐसे लग रहा कि बालों की हर बीमारी का इलाज प्याज में ही छिपा है। आज लगभग हर शैम्पू अब प्याज शैम्पू बन गया।

अब तो अमीरों की डाइनिंग टेबल पर जहाँ फलों की टोकरी होती थी वहाँ पर अब प्याज भर-भरकर टोकरी रखी होती है। ऐसा लगता है बस सभी पैसों वालों को बालों की बीमारी लगी है और फिर सैलून में जाकर प्याज वाले शैम्पू से हर समस्या का इलाज मिनटों में हो जाता है।

अब जो गरीब तबका और मध्यमवर्गीय लोग प्याज के साथ अपने भोजन को अच्छे से खा लेते थे। अब उसमें से प्याज भी धीरे-धीरे निकल जायेगा ऐसा लगता है।

पर इसमें एक विचारणीय विषय जरूर है कि शायद इसके गुणों को भूल गए थे और कच्चा प्याज किसी भी रूप में खाना छोड़ दिया। अब वही दूसरे रूप में इस्तेमाल होने लगा है।

अब एक ही विचारणीय विषय है बस अगर हम इसको खाते तो शायद इसको लगाने की नौबत इस कदर नही आती।

क्योंकि ये बेशकीमती प्याज हम सबके शरीर में अपने अच्छे गुणों को छोड़ता और अनेक बीमारियों से हमें स्वतः ही बचा लेता। चाहे वो बालों की ही समस्या क्यों न हो।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — प्याज (Raw Onion Benefits) को सेहत के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है। प्याज (Onion Benefits) में एंटी-एलर्जिक, एंटी-ऑक्सीडेंट और एंटी-कार्सिनोजेनिक गुण होते हैं। इसके अलावा प्याज में भरपूर मात्रा में विटामिन ए, बी6, बी-कॉम्प्लेक्स और सी भी पाया जाता है। प्याज के सेवन से शरीर को इंफेक्शन के खतरे से बचाया जा सकता है। प्याज के रस बालों और स्कैल्प को पोषण देता है। प्याज के रस में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं। इस कारण यह स्कैल्प पर होने वाले किसी भी प्रकार के संक्रमण से बचाव कर बालों को झड़ने से रोक सकता है। इसमें प्रचुर मात्रा में सल्फर होता है, जो स्कैल्प के ब्लड सर्कुलेशन में भी सुधार लाकर नए बालों को जड़ से मजबूत बनाने में मदद करता हैं।

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यह लेख (अब प्याज भी रुलाएगा।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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ये कैसी भिक्षावृत्ति।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ ये कैसी भिक्षावृत्ति। ♦

प्राचीनकाल में केवल वही लोग द्वार-द्वार जाकर भिक्षा मांगते थे जो लोग संन्यास धारण करते थे या समाज की भलाई के लिए तप करते थे। तब उनके शिष्य ही केवल भिक्षा में केवल इतना मांग कर ले जाते थे जितना उनका सुबह या शाम के भोजन का कार्य चलता था।

धीरे-धीरे ये प्रचलन इतना बढ़ता चला गया कि धार्मिक स्थानों पर इनकी इतनी भीड़ एकत्रित होने लगी कि उन स्थानों के दर्शन करने भी दुर्लभ हो गए।

अब ये भिक्षावृति ने एक अलग से नया रूप धारण किया कि विकलांगों, अनाथों और गऊ शालाओं के नाम पर अब घर की घंटी बजाकर कोई दान नही बल्कि रुपयों की पर्ची काटते हैं।

अगर इनसे कोई भी उस पर्ची के बारे में कुछ भी सवाल पूछा जाए तो वो आना कानी करके अगले घर की ओर बढ़ जाते है। सबसे बड़ी हैरानी की बात तो ये होती है कि वो शारारिक रूप से बिल्कुल हट्टे-कट्टे होते है कमाने के लायक।

अब हमें ये समझना होगा कि इस प्रकार के पात्र दान के काबिल है या नही। हम इनको रुपयों का दान न देकर बल्कि किसी भी अनाथालय या किसी भी आश्रम में कोई भी दान देना हो तो हम स्वयं जाकर उनकी जरूरत का सामान और गौशाला में अपने हाथों से हरा चारा देकर दान की सार्थकता को सिद्ध कर सकते है।

इससे एक तो हमारी आत्मसंतुष्टि होती है दूसरा किया गया दान सुपात्र को जाता है। इस प्रकार की भिक्षावृत्ति को रोकने में एक सभ्य नागरिक की एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते है।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जब भी दान दे पात्र को देखकर दे वो भी जरूरत का सामान ना की पैसा। किसी भी अनाथालय या किसी भी आश्रम में कोई भी दान देना हो तो हम स्वयं जाकर उनकी जरूरत का सामान और गौशाला में अपने हाथों से हरा चारा देकर दान की सार्थकता को सिद्ध कर सकते है।

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यह लेख (ये कैसी भिक्षावृत्ति।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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अंधविश्वास।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अंधविश्वास। ♦

मानव समाज युगों-युगों से अंधविश्वास की कड़ियों में जकड़ा हुआ है। धर्म की आड़ में इन्सान के सोचने की शक्ति खत्म हो जाती है। इस धरती पर कई महापुरुष, ज्ञानी, संत, अवतरित हुए, समाज में प्रचलित अंधविश्वास, कुरीतियों को दूर करने के लिए। श्री राजाराम मोहन राय, श्री स्वामी विवेकानन्द, श्री महर्षि महेश योगी, श्री परमहंस योगानन्द जी, श्री महर्षि दयानन्द सरस्वती, श्री गुरु नानक देव जी वगैरह ने मानव समाज को अंधविश्वास से मुक्ति दिलाने का प्रयास किया।

• अंधविश्वास का बोलबाला •

आज भी समाज में अंधविश्वास का बोलबाला है चाहे इन्सान कितना भी शिक्षित हो जाए, किसी भी धर्म का अनुयायी हो; अंधविश्वास उसका पीछा कभी नहीं छोड़ता। कुछ ऐसे बंधन हैं जो इन्सान को कभी मुक्त नहीं होने देता।

स्वार्थ एंव वर्चस्व की लड़ाई में जघन्य अपराध का समर्थन करते हैं, बच्चों की बलि देना, जानवरों की बलि देना, अपने ही समाज के कमजोर महिला को लाक्षंन लगाकर अपमानित करना, श्राध्द के नाम पर शोषण करना, अंधविश्वास के प्रमाण हैं।

भूत-प्रेत, डायन, काली-बिल्ली, विधवा औरत का अलग ही महत्व है। पूरी दुनिया में अंधविश्वास फैलाने में बिल्लियों का बड़ा योगदान है। क्या आप जानते हैं- “काली बिल्ली के प्रति अंधविश्वास” भारतवर्ष में शादी से पहले काली बिल्ली देखना खुशनसीबी मानी जाती है।

• बिल्ली एक, अंधविश्वास अनेक •

स्काटलैण्ड में अगर काली बिल्ली बरामदे में धूमती नजर आती है, इसका मतलब कोई मुसीबत आने वाली है। इग्लैण्ड में अगर काली बिल्ली अपने कान के पीछे सफाई करती नजर आए तो बारिश जरुर होगी। आयरलैण्ड में अगर बिल्ली चन्द्रमा की रौशनी में रास्ता काट दे तो किसी की मौत महामारी से होगी।

फ्रांस में यदि बिल्ली दिखाई दे नदी के पास, तो लोग पानी में नहीं जाते। तुर्की में यदि काली बिल्ली दिखाई दे तो लोग अपने बालों को पकड़ लेते हैं, अन्यथा बदनसीबी आ जायेगी। अमेरिका में यदि एक ऑंख की काली बिल्ली दिखाई पड़ती है तो लोग अपने एक हाथ के अंगूठे को दूसरे हथेली पर कसकर दबाते हैं और मुराद मांगते हैं। बिल्ली एक, अंधविश्वास अनेक।

• वैज्ञानिक युग में भी लोगों का विचार पुर्ववत •

इस वैज्ञानिक युग में भी लोगों का विचार पुर्ववत, भिन्न-भिन्न हैं। विद्वता, शिक्षा का कोई प्रभाव नहीं। जापान में लोग आमदनी बढाने के लिए अपने पर्स में सांप की केचुली रखते हैं और अंक चार शुभ माना जाता हैं।

ताइवान में सुबह-सुबह काला कौआ देखना अशुभ माना जाता हैं। तुर्की में दो व्यक्ति यदि एक नाम वाले एक साथ खड़े हों तो उनके बीच में खड़े होने से मन्नत पूरी होती हैं। वेनेजुएला में लोग रुमाल का उपहार नहीं लेते। कोरिया में लोग परीक्षा के दिन बाल नहीं धोते, चीन में दीवाल घड़ी तोहफा में नहीं लेते।

रुस में यदि कुछ लेने के लिए लौटते हैं तो बिना आईना देखे घर से वापस नहीं जाते। चाहे कोई भी देश कितना भी विकसित हो, अंधविश्वास को मानने वाले की कभी नहीं हैं। विधवा औरत को शादी के रस्म से दूर रखा जाता हैं।

जन्म और मृत्यु किसी भी दिन, किसी भी मुहुर्त्त में होती हैं फिर भी इंसान शुभ मुहुर्त्त के पीछे जीवन भर भागता हैं। शादी शुभ मुहुर्त्त में विद्वान पंडित करवाते हैं सभी बड़े आशीर्वाद देते हैं फिर भी औरत विधवा हो जाती हैं और पुरुष विधुर। जिम्मेदार कौन है- कोई नहीं। अगर लड़की पैदा होती है या शादी के बाद लड़की के ससुराल में किसी की मृत्यु हो जाती है तो लड़की (दुल्हन) अशुभ मानी जाती हैं।

अगर गंगा में नहाने से पाप धूल जाता तो गंगा पुत्र भीष्म वाण की शैया पर प्राण नहीं त्यागते। मछली और अन्य जीव-जन्तु को मोक्ष मिलता। गंगा की कोई जिम्मेदारी नहीं हैं। वह तो सब कुछ समुद्र को दे देती हैं। समुद्र वाष्प बनाकर आसमान में भेज देती हैं फिर बादल बनकर धरती पर पानी के रुप में आ जाता है।

• इविल आई •

गंगा स्नान से पाप धूल जाएगा यह आग लगने पर स्वतः बरसात हो जाएगी, के समान हैं। काला टीका लगाकर नजर उतारी जाती हैं। मिश्र में काटों की ऑंख का लाकेट पहनने से देखने वाली हर बुरी निगाह का उल्टा असर होता है। मिश्र एंव तुर्की से आई “इविल आई” का सारी दुनिया में प्रचलन है।

• टोटका या अंधविश्वास •

समाज में कुछ लोग वहम, टोटका या अंधविश्वास को हवा देते रहते हैं। आज के वैज्ञानिक युग में सच्चाई में ही विश्वास करना चाहिए, न कि अंधविश्वास में। अंधविश्वास हमें पूर्वजों से विरासत में मिली है।

वक्त के साथ जब हम पोशाक बदल रहे हैं, नई-नई प्रथाऍं समाज में स्वतः अपनायी जा रही है तो फिर अंधविश्वास में विश्वास क्यों, हर शिक्षित व जागरुक व्यक्ति का यह धर्म है कि वह समाज को अंधविश्वास से मुक्त करे।

अंधविश्वास के जंजीर को तोड़ना ही, विज्ञान की उपलब्धि होगी। श्री राजा राम मोहन राय अपशब्द सुनकर भी भारतीय समाज को सती प्रथा से मुक्त किया। इन्हीं की प्रेरणा से वैशाली जिले के महनार तहसील के जहॉंजीरपुर शाम में कुछ बुध्दिजीवियों ने गॉंव को अंधविश्वास से मुक्त किया, आज सभी खुशहाल हैं।

—♥—

दुःख में सब को सिखाए मुस्कुराना,
अंधविश्वास तो धोखा है, सत्य ही अपनाना।
चाहे दुनिया कुछ भी कहे, मुझे आवाज लगाना,
अगर देर हो गई, गुजर जाएगा जमाना।

जिन लोगों ने समाज सेवा के साथ साथ,
अंधविश्वास के खिलाफ लोगों को,
जागृत किया, उन्हें गॉंव के लोग,
बच्चा-बच्चा उनके अच्छे कर्मों के,
लिए आज भी याद करता है।

डा. शम्भु शरण अपने अच्छे कार्यो,
के लिए अमर हो गए, गॉंव का हर
व्यक्ति अपने में सुधार लाने की,
प्रतिज्ञा करता हैं, समाज उन लोगों
का ऋणी होता है जो समाज के उत्थान,
के लिए अपने को समर्पित कर देते हैं।

आज इस गॉंव में साक्षरता बढ़ गई,
आज हर सपना साकार होता हुआ नजर आता हैं।
“जब तक अंधविश्वास रहेगा,
इन्सान भय त्रस्त और परेशान रहेगा।

पहले घर में करो उजाला,
फिर मंदिर में दीप जलाओ।
मानव-मानव में भेद नहीं,
सब को अपने गले लगाओ।

जैसे किसी के द्वारा प्रार्थना किए,
बिना ही सूर्य कमल-समूह को,
विकसित करता हैं, जैसे चन्द्रमा,
कैरव-समूह को प्रफुल्लित करता हैं।

तथा जिस प्रकार मेघ बिना मांगे,
ही प्राणियों को जल देता हैं।
उसी प्रकार महापुरुष स्वाभाविक,
स्वंय ही परहित में लगे रहते हैं,
ताकि समाज की बुराइयां,
स्वतः दूर हो जाए।

“कोपरनिकस” ने कहा पृथ्वी गोल हैं,
यह वैज्ञानिक खोज धार्मिक तथ्यों से,
अलग होने के कारण, कोपरनिकस को
मौत मिली, अंधविश्वास से मुक्ति
तभी मिलेगी जब सोच वैझानिक हो।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — वक्त के साथ जब हम पोशाक बदल रहे हैं, नई-नई प्रथाऍं समाज में स्वतः अपनायी जा रही है तो फिर अंधविश्वास में विश्वास क्यों, हर शिक्षित व जागरुक व्यक्ति का यह धर्म है कि वह समाज को अंधविश्वास से मुक्त करे। अंधविश्वास के जंजीर को तोड़ना ही, विज्ञान की उपलब्धि होगी।

—————

यह लेख (अंधविश्वास।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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छाया चित्रों की भरमार।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ छाया चित्रों की भरमार। ♦

इस डिजिटल जमाने में जो सबसे ज्यादा हुआ है वो है फ़ोटो खींचने का चलन। क्योंकि ये किसी भी बात का मजबूत प्रमाण बनते हैं। सब जगह देखों तो सेल्फी या फ़ोटो लेने का जमाना ही रह गया। कई बार ऐसा लगता है कि इस दिखावे के पीछे असलियत छिपती जा रही है। झूठ ने इस फोटो के सच का पहनावा पहन लिया है।

अभी हम सब ने विश्व पर्यावरण दिवस मनाया। तो उसमें जहाँ पर भी देखो इस प्रकार के छाया चित्रों की भरमार थी जैसे एक नन्हें से पौधे को लगाकर उसके साथ तीन से लगभग आठ व्यक्तियों का खड़ा होना, और ऐसा लग रहा था मानो जैसे नन्हा पौधा पुकार कर रहा हो कि अरे दूर हटो मुझें भी तो फ़ोटो में आने दो!

निस्वार्थ भाव से की गई हर चीज फलदायी होती है। इस बात को सदैव ही हम अपने दिल में धारण कर रखें। कुछ भी सिर्फ फ़ोटो के लिए न करके दिल से उस कार्य को आत्मसात करें। तभी हमारा, समाज का, देश का व पूरे विश्व का कल्याण है।

निस्वार्थ भाव व नेक कर्म से कार्य करें और छाया चित्र भी लीजिये। लेकिन हर हाल में वास्तविकता दर्शाती हुई होनी चाहिए। कहीं ऐसा न हो इन फ़ोटो की अधिकता में उस कार्य का अस्तित्व ही खतरे में आ जाये, जिसके लिए हमने कर्म किया।

निःस्वार्थ भाव से हर कर्म हम करते जाए।
छायाचित्र में कर्म का अस्तित्व न छिप जाए॥
परोपकार की भावना सदैव दिल में बसाए।
पर्यावरण की रक्षा कर खुद पर कर्म कमाए॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — प्रकृति संतुलन बनाए उसके लिए हम सभी दिल से प्रत्येक इंसान प्रत्येक वर्ष एक पेड़ जरूर लगाए और उस पेड़ का देखरेख तब तक करे, जब तक वह पेड़ जमीन से अपना ख़ुराक खुद न लेने लगे। निस्वार्थ भाव से की गई हर चीज फलदायी होती है। इस बात को सदैव ही हम अपने दिल में धारण कर रखें। कुछ भी सिर्फ फ़ोटो के लिए न करके दिल से उस कार्य को आत्मसात करें। तभी हमारा, समाज का, देश का व पूरे विश्व का कल्याण है।

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यह लेख (छाया चित्रों की भरमार।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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दिवस मनाने की होड़।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दिवस मनाने की होड़। ♦

आज कल भारत में भी दिवसों को मनाने की होड़ लगी हुई है। एक विशेष दिवस को मनाने की बात समझ में आती थी जैसे शिक्षक दिवस, चिकित्सक दिवस। लेकिन ये क्या अब ये दिवस मनाने में रिश्तें भी पीछे नही रहे। जैसे मातृ-पितृ दिवस।

ये रिश्ता तो इस पृथ्वी पर इतना अहमियत रखता है जिसके आगे देव भी नमन करते हैं। आओं विचार करे कि इन दिवसों को मनाने की जरूरत है या नही। क्योंकि हमारी भारतीय संस्कृति में तो पुराने जमाने में सबसे पहले घर में बने भोजन का भी घर के बड़ों को ही परोसा जाता था। तो ये उनको पूजने जैसा ही तो था, क्योंकि इस कार्य में उनका आदर-मान होता था।

फिर ये दिवस मनाने की जरूरत क्यों आई?
क्या एक ही दिन ही हमें इनको खुश रखना हैं?

पहले हमारे भारत में अनाथ आश्रम तो थे। लेकिन वृद्धाश्रम नही थे। आज वृद्धाश्रम की अधिकता हो गयी। क्योंकि आधुनिकता की दौड़ में घरों के बुजुर्गों का मान सम्मान केवल दिवसों में सिमट कर रह गया है।

मात-पिता का तो हर दिन होता है क्योंकि इनके बिना हम सबका कोई अस्तित्व नही है, तो बस एक ही बात इस दिनों को मनाने को सार्थक कर सकती है जब हम हर अपने मात-पिता का आदर करे।

हमारे माता-पिता हमारे घरों के अंदर हम सब के मध्य ही मुस्कराए। अपने बच्चों को भी हम भारतीय संस्कृति के गुणों को आत्मसात कर बड़ों का दिल से आदर करना सिखाए, क्योंकि बच्चें बड़ों को देखकर ही ज्यादा सीखते है।

तो आओं हम सब अपने माता-पिता का दिलों से सम्मान कर भावी पीढ़ी में भी ये गुण भर दे। ताकि किसी के घर का कोई भी बुज़ुर्ग सड़क पर या वृद्धाश्रम में न हो।

दिवस मनाने की सार्थकता तो तभी है जब…

जब अपनों के मध्य ही इनके चेहरे खिले रहे।
जब तक जीये ये हमारे घरों की ढाल बने रहे॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — स्त्री ईश्वर की वह सुन्दर रचना है जिसमें त्याग, स्नेह, भावनाओं और समर्पण भरपूर होता है। स्त्री अनेक भूमिकाओं को बखूबी निभाती है। वैसे – माता और पिता दिवस ताे हर मनुष्य काे अपने अंतिम श्वास तक मनाना चाहिये। एक सच्चा पिता सदैव ही अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिये दिन-रात अनवरत (continuously) कार्य करता हैं। जहा माता अपने बच्चों के स्वास्थ्य का ध्यान रखती हैं ताे वही पिता उन्हे सही ज्ञान और समझ देते हैं। जहा प्रथम गुरु माँ हैं ताे वही पिता गुरु हाेने के साथ-साथ सच्चा संरक्षक भी हाेता हैं।

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यह लेख (दिवस मनाने की होड़।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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पारिवारिक जीवन में कलेश का कारण।

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♦ पारिवारिक जीवन में कलेश का कारण। ♦

आज कल हर एक परिवार में कलेश, मन मुटाव, नोक झोक नजर आता है। चाहे वो इंसान झोपड़े में रहता है या फिर किसी राज हवेली में। कलह कलेश तो हर परिवार में होता ही रहता है। इसी कलह के कारण मनुष्य का जीवन खंडहर सा बन जाता है।

घर की सारी खुशियां खत्म होकर एक रेगिस्तान जैसा हो जाता है। वहां सिर्फ कटिले पौधे ही नजर आते है। जो अति तीखे और दर्द भरे होते है। आज मैं अपने लेख के माध्यम से कुछ ऐसी छोटी मोटी बातों को आपके सामने रखना चाहुंगा जिससे आपस में कलह का निर्माण होता है।

अगर घर में पारिवारिक शांति न मिले, घर में लोगों के आपस में रिश्ते अच्छे न हों, पारिवारिक सदस्यों में हमेशा मतभेद होता हो, लोग एक-दूसरे से उखडे़-उखड़े रहते हो, हर बात में विवाद होता हो तो यह सब गृह कलेश के कारण होता है। जब आपस में बात करने पर झगडे़ हों, एक-दूसरे की बात की विरोध करने की आदत बन जाए।

सास बहू में मनमुटाव

  • अगर कोई बेटा अपने मां बाप के विरुद्ध प्रेम विवाह करके अपने घर आता है तो उस घर में अक्सर प्रेम भाव कम पाया जाता है। सांस बहू के बीच बात बात पर कलह होता रहता है। बहू के हाथो से बनाया खाना परिवार वालो को पसंद नहीं आता। अगर मजबूरन खाना खा भी लिए तो उस खाने में खोट निकालते फिरते है।की खाना में नमक ज्यादा था हल्दी तो डाली ही नहीं? तेल तो इतना डालती है कि सब्ज़ी के ऊपर पकोड़े तला जाय? अगर सासुं खाना बनाए तो बहू को पसंद नहीं आता। फिर तांडव घर में चालू हो जाता है।
  • अगर सांसू मां टीवी में कोई धार्मिक कार्यक्रम देख रही हो उसी वक्त बहू आ कर अपना मनपसंद सीरियल लगा देती है जिस से सांसु मां का पारा गरम हो जाता है और बहू को उल्टा सीधा बोल देती है। बहू भी अपनी तीखी वाणी से मां को मूर्छित कर जाती हैं। और पति को आते देख मुंह फुलाके बैठ जाती हैं। मां अपने बेटे से और पत्नी अपने पति से एक दूसरे के गलती को तू तू मैं मैं कर बताते है। और फिर एक बार तांडव तीनों के बीच हो जाता है।
  • घर का खाने पीने का सामान खत्म होने पर सास का ताने मारते हुए कहना। पहले तो राशन महीनों चलता था। जब से ये महालक्ष्मी आई है राशन तो हप्ता भर नहीं चलता। कितना खर्च करती है। जैसे इसका बाप अंबानी हो। बस यह सुनते ही बहू सीधे फूलन देवी का रूप धारण कर लेती है। और फिर एक बार तांडव चालू हो जाता है।
  • अगर घर में रिवाज हो की औरते सुबह जल्दी उठकर घर का सारा काम कर, नहा धोकर पूजा पाठ करे, मिल जुलकर काम में हाथ बटाएं। अगर किसी कारण वश दोनों में से कोई एक जल्दी ना उठ पाए तो फिर देखिए घरों में बर्तन की आवाज हर तरफ सुनाई आएगी। रसोई से लेकर स्नान के कमरे तक फिर बाजू वाले घर तक और थोड़ी देर के बाद फिर एक बार तांडव चालू हो जाता है।
  • अगर सांस ससुर को दिन में दो चार बार चाय पीने की आदत हो और चाय पीने का समय मालूम होने के बाद भी बहू अपने कामों में व्यस्त रहती है। फिर एक बार सांस की कती पिटी बात सुनने के लिए बहू अपना रुद्र अवतार देखा देती है और फिर एक बार तांडव चालू हो जाता है।
  • सासू मां के रिश्तेदार घर पर आने पर, घर पर मेहमानों की खातिरदारी में अनेक प्रकार के व्यंजन बनाना, उनको घुमाने ले जाना, सिनेमा देखने जाना सभी होता है।अगर बहू के घर से कोई उनका अपना जैसे उनका भाई, बहन, मां परिवार आए तो उनकी मेहमान नवाजी में यह सभी नहीं हो, तो बहू को बहुत गुस्सा आता है। मेहमान के वापिस जाते ही फिर एक बार बातो ही बातो मे तांडव चालू हो जाता है।
  • ऐसे ही अनेक उदाहरण हमारे पारिवारिक जीवन में आते रहते है। और जीवन में रोते रहते है लेकिन कभी खुद को और दूसरों को समझने का प्रयास नहीं करते। जब तक समझ नहीं पाएंगे। तब तक समझाना मुश्किल होता है। वास्तविकता क्या है। उसे समझ लिया जाय तो घर में कोई तांडव नहीं होगा।

पति पत्नी में तकरार

पति पत्नी के संबंधों के बीच में अक्सर तकरार होती रहती है। कभी कभी ये छोटी सी तु तु मैं मैं एक भयंकर विनाशक रूप धारण कर बैठती हैं। सिर्फ दोनों की नासमझ के कारण।

  • अगर पति अपने किसी काम से घर में व्यस्त हो और पति का फोन मेज पर रखा हो, उसी वक्त किसी का फोन आता है। पत्नी देखती है। की उसमे किसी लड़की के चित्र के संग फोन आ रहा है। पत्नी फोन को बिना उठाए चली जाती है। संग अपने दिमाख में एक शक लेकर अपने कमरे में जाती है। ये शक हमेशा उसके नजरों के साथ होता ही। धीरे-धीरे उसे हर बात पर शक होने लगता है। एक देर रात फिर से फोन आता है। पत्नी बिना सोचे समझे फोन को तोड़ देती है। और दोनों में रात भर तकरार होने लगती है। फिर एक बार तांडव चालू हो जाता है।
  • सोचने वाली बात यह है कि पत्नी को पति से पूछना चाहिए था। की फोन किसका आया है। कौन है क्या है। हो सकता है वो लड़की उसकी दोस्त हो। या फिर दफ्तर की कोई अधिकारी हो। पहले पता करना चाहिए था फिर तांडव करना चाहिए। इसी तरह के छोटी सी बात का बतंगा बनाकर हम अपने जीवन में कलेश पैदा करते है।
  • महीने की तनख्वाह मिलते ही बेटा अपने मां के हाथों में सारी पगार दे देता। जब भी जरूरत होती। अपने मां से मांग लेता। लेकिन पत्नी को यह अच्छा नहीं लगता और बात-बात पर ताना कसा करती। यह सुन कर सांस भी तू तू मैं पर उतर आती। रात को फिर बिस्तर पर पति पत्नी का तांडव चालू हो जाता।
  • यहां सोचने वाली बात यह है अगर बेटा अपनी पगार, अपने मां के हाथों में देता है तो क्या ग़लत करता है। इसमें तू तू मैं मैं करने को कोई बात नहीं। सिर्फ समझदारी और सोचने की बात है कि गलत क्या है। क्योंकि जहां समझ नहीं वहीं कलेश निर्माण होता है।

♦ अजय नायर जी – कोच्चि, केरल ♦

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• Conclusion •

  • “अजय नायर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — चाहे पति पत्नी में तकरार की बात हो या फिर सास बहू में मनमुटाव की बात हो, अगर प्रेम से सोच समझकर एक दूसरे का सम्मान व आदर करते हुए बात व कर्म किया जाये तो तकरार न के बराबर होगा परिवार में। परिवार के सभी सदस्यों को एक दूसरे से सम्मान पूर्वक बात करना चाहिए। सभी कार्यो को मिल जुलकर कर लेना चाहिए, जिससे जो भी कार्य हो सके जरूर करना चाहिए। अगर समझदारी पूर्वक सभी एक दूसरे को समझे तो जीवन में कभी भी तकरार नही होगा, और जीवन में खुशी ही खुशी होंगी।

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यह लेख (पारिवारिक जीवन में कलेश का कारण।) “अजय नायर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम अजय नायर है। मैं एक प्राइवेट मल्टीनेशनल कंपनी में पब्लिक रिलेशन ऑफीसर के पद पर चेन्नई में कार्यरत हूं। मुझे लिखने का शौक बचपन से रहा। १५ (15) वर्ष की आयु में हमने पहली कविता “दोस्त” इस नाम से लिखी जो पहली बार अखबार में प्रकाशित हुई। तब से आज तक करीबन ३५०० (3500) से अधिक कविता / गजल/ बाल कविताएं/ शेरो शायरी लिखी है। जो की भारत के सभी अखबारों में अब तक प्रकाशित हुई है। साहित्य संगम संस्थान के सभी मंचो से हमें श्रेष्ठ रचनाकार, श्रेष्ठ टिप्पणी कार, श्रेष्ठ विषय प्रवर्तक आदि सम्मानों से सम्मानित किया गया है। काव्य गौरव सम्मान, कलम वीर सम्मान, गौरव सम्मान, मदर टेरेसा सम्मान, बेस्ट ऑथर सम्मान, आदि सम्मान अलग अलग साहित्य जगत से प्राप्त हुआ है। हमारी पहली शेरो शायरी की पुस्तक का प्रकाशन संकल्प पब्लिकेशन द्वारा २०२१ (2021) में हुआ है। जो की सरल सुगम हिंदी भाषा में लिखा हुआ है।

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योग दिवस।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ योग दिवस। ♦

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस हर वर्ष 21 जून को मनाया जाता है। पहला अंतराष्ट्रीय योग दिवस 2015 में मनाया गया था तबसे ही इसकी शुरूआत हुई। इस दिन विश्व में करोड़ो लोगों ने योग किया। योग व्यायाम एक प्रभावशाली प्रकार है जिसके माध्यम से शरीर के अन्य अंगों को मजबूत बनाया जा सकता है।

मन, मस्तिष्क और आत्मा में संतुलन बनाया जाता है योग से अनेक प्रकार के लाभ होते है जब हम ज्यादा थकान महसूस करते है तो योगा करने से हमें थोड़ी शांति मिलती है ये अनेक प्रकार से लाभकारी है यही कारण है योग से शारीरिक और मानसिक बीमारियों से मुक्ति मिल सकती है।

योग शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द के युज शब्द से हुई है जिसका अर्थ होता है आत्मा का सार्वभोमिक मिलन चेतना से होता है।

योग दस हजार वर्ष से अपनाया जा रहा है। हिन्दू धर्म में योग साधु, संतों के द्वारा प्राचीन काल से अपनाया गया है। योग की महिमा को आधुनिक युग में एक विधा के रूप अपनाया गया है।

आज की जीवन शैली को देखते हुए यह बहुत जरूरी हो गया है कि हम अपनी व्यस्त जिंदगी में से थोड़ा समय निकाल कर योग करें और अपने स्वास्थ्य को ठीक रखें। जब शरीर स्वस्थ होगा तो मन भी स्वस्थ होगा। जब ही देश का हर एक नागरिक स्वस्थ होगा तब ही वो देश की सेवा में अपना सहयोग दे पाएंगे।

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस प्रत्येक वर्ष 21 जून को मनाया जाता है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने ही इस दिन को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव दिया था। योग का अभ्यास एक बेहतर इंसान बनने के साथ एक तेज दिमाग, स्वस्थ दिल और एक सुकून भरे शरीर को पाने के तरीकों में से एक है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — योग आकाश के नीचे लगभग किसी भी बीमारी को ठीक कर सकता है। वास्तव में यह कहना उचित होगा कि यदि आप प्रतिदिन योग का अभ्यास करते हैं तो आप सभी रोगों से मुक्त रह सकते हैं। योग एक कला है जो हमारे शरीर, मन और आत्मा को एक साथ जोड़ता है और हमें मजबूत और शांतिपूर्ण बनाता है। योग आवश्यक है क्योंकि यह हमें फिट रखता है, तनाव को कम करने में मदद करता है और समग्र स्वास्थ्य को बनाए रखता है और एक स्वस्थ मन ही अच्छी तरह से ध्यान केंद्रित करने में सहायता कर सकता है। योग के अभ्यास की कला व्यक्ति के मन, शरीर और आत्मा को नियंत्रित करने में मदद करती हैं। यह भौतिक और मानसिक संतुलन कर के शान्त शरीर और मन प्राप्त करवाता हैं। तनाव और चिंता का प्रबंधन करके आपको राहत देता हैं। यह शरीर में लचीलापन, मांसपेशियों को मजबूत करने और शारीरिक स्वास्थ्य को बढ़ाने में भी मदद करता हैं।

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यह लेख (योग दिवस।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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प्राचीन हिन्दू सभ्यता का इतिहास।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ प्राचीन हिन्दू सभ्यता का इतिहास। ♦

इतिहास बीती हुई सच्ची घटनाओं का विवरण होता है जो हो चुका है वही इतिहास का विषय है। इतिहास किसी मनुष्य अथवा देश के भूतकाल का वर्णन करता है। इसका संबंध समाज के लिए आदर्श प्रस्तुत करने के साथ ही साहित्य – कला नीतिशास्त्र से भी होता है।

इतिहास लेखन वर्तमान और भविष्य से इतर बीते समय का लेखा – जोखा महत्वपूर्ण संपूर्ण सभ्यताओं के साथ परिपूर्ण रूप से प्रस्तुत करता है परंतु वर्तमान भविष्य में इसके पोषक तत्व से लोग प्रभावित होते हैं। इतिहास में भूतकाल की घटनाओं का उल्लेख किया जाता है।

• वास्तविकता के आधार पर निर्मित इतिहास •

भूतकाल की घटनाएं उनके वृतांत विशमृत होकर समय काल के अनुसार मर जाते हैं। इतिहास निर्माण में वृत्तांतो का लेखा-जोखा होना नितांत आवश्यक होता है। वास्तविकता के आधार पर निर्मित इतिहास पक्षपात रहित सरल और निष्कपट भाव रखकर इतिहासकार सामग्री का उपयोग करता है।

हालांकि राजनीति में संलिप्त रचनाकार इतिहास रचना करते समय शुद्र ,सजग, युक्ति, तिथि, क्रम, क्षेत्रवाद से कुंठित होकर इतिहास की रचना साहित्यकार यदि करता है तो उसके अध्ययन से मिलावट होना उसमें परिलक्षित हो सकता है।

• भारत में लेखन कला —

भारत में 800 ईसवी पूर्व से पहले ही लेखन कला थी। जबकि यह सभी को मान्य नहीं है परंतु भारत में लिपि से बहुत पहले साहित्य बन चुका था। गुरु – शिष्य पीढ़ी दर पीढ़ी श्रुति परंपराओं के द्वारा इसकी रक्षा का क्रम चलता रहा।

गुरुकुल में भारतीय शिक्षा प्रबल थी। भारतीय गुरुकुल में सुर्ख़ियों से आगे शास्त्र को बढ़ाया जाता रहा। इस परंपरा के अनुसार स्मृतियां – कंठ में संचित रहती थी। उस समय के विद्वान चलते फिरते ग्रंथालय थे (हिंदू सभ्यता 22/23 राधा मुकुंद मुखर्जी कृत)।

• धर्म के क्षेत्र में भारत —

भारत में धर्म के क्षेत्र में सबसे अधिक विभिन्नता है। हिंदू धर्म समन्वय आत्मक और सर्वग्राही रूप में व्याप्त है। भारत में यहां सभी विश्व – धर्म पाए जाते हैं। जिनका दर्शनशास्त्र विश्व जनित है इसके गाथा शास्त्र और पुराणों की कथाएं बहु प्रतीक्षित है। अनेक बातों से अवगत और नई स्थिति के अनुरूप प्रकाश डालने की क्षमता हिंदू धर्म में है।

यह देश लोक धर्म, जन विश्वास, रीति-रिवाज, रहन-सहन, मत-मतांतर, भाषा-बोली, जाति-समाज और संस्थाओं की दृष्टि से इसे एक पूरा संग्रहालय कहा जा सकता है (हिंदू सभ्यता 71 राधा मुकुंद मुखर्जी कृत)।

हिंदू कालीन भारत में एक बार ऐसा देखने में आता है कि समस्त देश एक ही शासन तंत्र और एक ही ऐतिहासिक धारा के अंतर्गत आ गया था यह अशोक और मौर्य साम्राज्य था। जिसने अपने शासन प्रशासन संपूर्ण देश पर भारत के अंग भूत अफगानिस्तान और बलूचिस्तान पर भी स्थापित किया और सार्वभौम सम्राट हुआ।

• काशी, कोसल और विदेह —

कोसल, काशी और विदेह के बारे में शतपथ ब्राह्मण के उपाख्यान से ज्ञात होता है कि विदेह के राजा माधव, जो सरस्वती से चलकर यहां वैदिक संस्कृत की मूल भूमि पर सदानीरा नदी पार करते हैं। जहां कौशल की पूर्वी सीमा की आधुनिक गंडक और विदेह भूमि में आर्यों का पूर्व की ओर प्रसार हुआ। ऐसा ज्ञात होता है कि इस समय वैदिक संस्कृत के मुख्य केंद्र में काशी, कोसल और विदेह रहा। जो कभी एक साथ मिल जाते थे। ( शांख्योपन स्तोत्र सूत्र 16/9/11)

इस काल में काशी के राजा अजातशत्रु और विदेह के राजा जनक दार्शनिक सम्राट थे। उनके राज्य में विचार जगत का नेतृत्व श्वेत केतु और याज्ञवल्क्य जी करते थे।

पुराणों की प्राचीनता उपनिषद काल तक जाती है जहां इतिहास पुराण को अध्ययन का मान्य विषय स्वीकृत किया गया है। यहां तक कि इसे पंचवेद में कहा गया है। रामायण और महाभारत के साथ पुराण भी जनता के लिए वेद की भांति होते हैं। प्राचीनतम उल्लेख विद्यमान पुराण ग्रंथ संबंधी ‘आपस्तंब’ धर्मसूत्र में आता है। (महाभारत 2/9/ 24/6)

• राजवंशों का उद्गम —

आदि राज मनु से राजवंशों का उद्गम हुआ। इनकी पुत्री इला थी। उत्तरी इला ने पुरुरवा ऐला को जन्म दिया। वर्तमान प्रयाग के पास झूसी को अपनी राजधानी बना कर राज्य किया।

इक्ष्वाकु के पुत्र निमी ने विदेह में खुद को प्रतिष्ठित किया। इनके पुत्र दंडक ने दक्षिण के वन क्षेत्र में और मनु के अन्य पुत्र सौदुम्न ने गया के साथ-साथ पूर्वी जनपदों में राज्य स्थापना की। इनके पुत्र अमावसु ने कान्यकुब्ज और पौत्रों ने काशी बसाई।

ययाति की अधीनता में जो इक्ष्वाकु के वंशज थे उन्होंने एल सम्राज्य की स्थापना की। ययाति के पांचों पुत्रों का नाम क्रमशः यदु, तुर्वसू, द्रहयू , अनु और पुरु है। जो ऋग्वेद के समय प्रसिद्ध हो चुके थे। इन पांचों पुत्रों ने भारत के उत्तरी मध्य भाग को आपस में बांट लिया जिसमें काशी, कान्यकुब्ज, प्राचीन ऐल राज्य में थे।

‘यदु’ को – दक्षिण-पश्चिम भाग चर्मवती (चंबल) वेत्रवती (बेतवा) और शक्ति मती (केन) नदियों से सिंचित क्षेत्र प्राप्त हुआ।

‘तुर्वसू’ ने – रीवा क्षेत्र के समीप ही दक्षिण – पूर्व में अपने आप को स्थापित किया।

‘द्रहयु’ ने यमुना के पश्चिमी चंबल के उत्तर वाले पश्चिमी भाग में अपना साम्राज्य स्थापित किया।

‘अनु’ अनु ने उत्तर में गंगा जमुना के उत्तरार्ध में अपने साम्राज्य का फैलाव किया।

‘पुरु’ पुरु को पितृ – पितामह का बीच का प्रदेश गंगा – जमुना का दक्षिण क्षेत्र जिसकी राजधानी प्रतिष्ठान थी प्राप्त हुआ।

यदु के वंशजों ने विशेष उन्नति योग वृद्धि को प्राप्त किया। फिर है हव – यादव को दो शाखाओं में बट गए।

यादों में सत बिंदु के नेतृत्व में कदम बढ़ा कर, पौरव और द्रहयु का प्रदेश जीत लिया।

दिग्विजय राजा अयोध्या नरेश मांधाता की प्रतिक्रिया से है हव लोग, आनव, और द्रहयु लोगों में उथल पुथल हुआ। जिससे ‘आनव’ – पंजाब की ओर फैल गए। ‘द्रहयु’ लोग गांधार की ओर चले गए।

कार्तवीर्य अर्जुन कॉल परिस्थित विजई के रूप में उभर कर सामने आया। जिसने नर्मदा तट पर बसे भार्गव ब्राह्मण को मार भगाया। उन्होंने पुरुरवा के पुत्र अमावसु के कान्यकुब्ज और मांधाता के अयोध्या में छत्री के यहां शरण ली।

जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने ब्राम्हणों के प्रति शोध में ताल जंघ के अधीन है, हव राज्य को नष्ट कर डाला। जिसे स्व-काल्पनिक कहा गया।

ताल जांघों की आगे चलकर पांच शाखाएं हो गई। उन्होंने उत्तर भारत में अपने राज्य का विस्तार किया। इसी बीच उतर पश्चिम से आए शक, यवन, कंबोज, पारद और पहलवों की मदद से कान्यकुब्ज और अयोध्या को काफी हानी पहुंचाई।

अयोध्या नगरी सगर के नेतृत्व में फिर से उठकर है हव के प्रभुत्व को मिटाकर उत्तर भारत में अपने राज्य की स्थापना की। सगर की मृत्यु के उपरांत पुराना पौरव राज भी दुष्यंत और उसके पुत्र भरत के नेतृत्व में पुनः उत्थान को प्राप्त हुआ। (हि. स.158)

अयोध्या को भगीरथ, दिलीप, रघु, अज़, और दशरथ आदि अत्यंत योग्य राजाओं के अधीन राज्य उन्नत किया। इन्हीं के समय में अजोध्या का नाम कोसल पड़ गया। उधर ‘मध’ राजा के अधीन माधवों का राज गुजरात से यमुना तक फैल गया।

• हड़प्पा संस्कृति —

हड़प्पा संस्कृति के अवशेषों से साक्ष्य प्राप्त होते हैं की पुरातन काल से शिवलिंग की उपासना होती रही। अथर्ववेद में शिव को भव, शर्व, पशुपति एवं भूपति कहा गया है।

अथर्व वेद की रचना अथवा ऋषि द्वारा किया गया है जिसमें रोग निवारण, तंत्र मंत्र, जादू टोना, शाप, वशीकरण आशीर्वाद स्तुति, प्रायश्चित, औषधि अनुसंधान, विवाह, प्रेम, राज कर्म, मातृभूमि – महात्म आदि विविध विषयों पर मंत्र की रचना की है।

• शैव संप्रदाय —

लिंग पूजन का स्पष्ट विवरण मत्स्य पुराण में लिखा गया है। अगर हम वामन पुराण की बात करते हैं तो उसमें शैव संप्रदाय की संख्या 4 बताई गई है। यथा – पाशुपत, कापालिक, काला मुंख और लिंगायत।

पाशुपत संप्रदाय, ही सर्वाधिक प्राचीन संप्रदाय है। इसके संस्थापक लकु लीश थे। जिनको भगवान शिव के 18 अवतारों में माना जाता है।

कापालिक संप्रदाय, का प्रमुख केंद्र श्रीशैल नामक स्थान था इस संप्रदाय के इष्ट देवता भैरव जी हैं।

काला मुख संप्रदाय, कहा जाता है कि इस संप्रदाय के लोग नर कपाल में ही भोजन करते हैं यह लोग सुरा पान भी करते हैं और शरीर पर चिता भस्म को मलते हैं।

लिंगायत संप्रदाय, इस संप्रदाय के लोग दक्षिण भारत में भी रहते हैं इस संप्रदाय के लोग शिवलिंग की उपासना करते हैं।

अनादिकाल से शैव और वैष्णो धर्म सनातन संस्कृति में रहा है। वैष्णो धर्म की जानकारी उपनिषदों से मिलती है।

• प्रमुख संप्रदाय —

नारायण पूजा वैष्णो धर्म के पूजक कहे जाते हैं। इसका विकास भगवत धर्म से हुआ है। विष्णु के 10 अवतारों का उल्लेख मत्स्य पुराण में मिलता है। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए सर्वाधिक महत्व भक्ति को दिया गया है।

इसके प्रमुख संप्रदायों का अगर जिक्र करें तो वैष्णव संप्रदाय, ब्रह्म संप्रदाय, रुद्र संप्रदाय और सनक संप्रदाय का जिक्र मिलता है। जिनके आचार्य क्रमशह रामानुज, आनंद तीर्थ, वल्लभाचार्य और निंबार्क हैं।

• मगध राज्य —

मगध राज्य – मगध राज्य की प्राचीन वंश के संस्थापक ब्रिहद्रथ मौर्य को माना जाता है। ब्रिहद्रथ मौर्य ने अपनी राजधानी राजगृह अर्थात गिरी ब्रज को बनाया था। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार बिंबिसार मगध की गद्दी पर 544 ईसवी पूर्व आसीन हुआ। कहां जाता है कि वह बौद्ध धर्म का अनुयाई था। बिंबिसार ने लगभग 52 वर्षों तक मगध पर शासन किया। उसने ब्रह्म दत्त को हराकर ‘अंग’ राज्य को अपने में मिला लिया था। बिंबिसार की हत्या अजातशत्रु ने 493 ईसवी पूर्व में करके गद्दी पर बैठा।

अजातशत्रु जिसका उपनाम कुडिक था। उसने भी मगज पर 32 वर्षों तक राज्य किया जबकि वह जैन धर्म का अनुयाई था।

• हर्यक वंश —

हर्यक वंश के अंतिम राजा के रूप में नाग दशक का नाम आता है। नाग दशक को शिशुनाग ने 412 ईसवी पूर्व में सत्ता से अपदस्थ करके मगध पर शिशुनाग वंश की स्थापना कर दिया।

शिशुनाग ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र से हटाकर वैशाली में स्थापित किया। कालांतर में शिशुनाग का पुत्र उत्तराधिकारी काला शोक पुनः अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में ले गया। शिशुनाग वंश का अंतिम राजा नंदी वर्धन को माना जाता है।

• ‘मौर्य वंश’ की स्थापना —

नंद वंश का संस्थापक महापद्मनंद था। नंद वंश का अंतिम शासक धनानंद था। जिसे चंद्रगुप्त मौर्य ने पराजित किया और मगध पर नए सिरे से ‘मौर्य वंश’ की स्थापना की।

चंद्रगुप्त मौर्य जैन धर्म का अनुयाई था। बताया जाता है कि उसने अपना अंतिम समय कर्नाटक के श्रवणबेलगोला नामक स्थान पर बिताया। इसने गुरु भद्रबाहु से जैन धर्म की दीक्षा ली।

उस समय पाटलिपुत्र एक विशाल प्राचीर से घिरा हुआ था जिसमें 570 बुर्ज और 64 द्वार थे। दो तीन मंजिले घर को कच्ची ईंटों और लकड़ी से बनाया गया था राजा का महल भी कार्ड से ही बना था पत्थरों की नक्काशी से अलंकृत किया गया था इसके चारों तरफ बगीचा और चिड़िया को रहने का बसेरा से गिरा हुआ था।

प्लूटार्क/जस्टिन के अनुसार चंद्रगुप्त की सेना में 50,000 आरोही सैनिक, नव हजार हाथी और 8000 रथ था । सैनिक विभाग का सबसे बड़ा अधिकारी सेनापति होता था। अर्थशास्त्र में गुप्तचर को गूढ़ पुरुष कहा जाता था। उस समय सरकारी भूमि को ‘सीता भूमि’ के नाम से जाना जाता था।

राजा ने अनेक समितियां गठित की थी जिसमें जल सेना की व्यवस्था, यातायात और रसद की व्यवस्था, पैदल सैनिकों की देखरख, गज सेना की देखरेख, आशा रोगियों की सेना की देखरेख, औरत सेना की देखरेख की जिम्मेदारी सैन्य समिति को दी गई थी।

• चंद्रगुप्त मौर्य का उत्तराधिकारी बिंदुसार (बिंबिसार) —

चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद वंश के विनाश के लिए कश्मीर के राजा पर्वतक से सहायता ली थी। अशोक के राज्य में जनपदीय न्यायालय के न्यायाधीश को राजुक कहा जाता था। मौर्य का उत्तराधिकारी बिंदुसार हुआ। बिंदुसार ने अपने पिता के संप्रदाय को बदलकर आजीवक संप्रदाय का अनुयाई बना। भाई पुराण के अनुसार बिंबिसार को ‘भद्र सार’ कहा जाता है।

बिंदुसार के बारे में बहुत विद्वान तारा नाथ ने लिखा है कि – जैन ग्रंथों के अनुसार बिंबिसार को सिंह सेन कहा गया है। तारा नाथानुसार – यह सोलह राज्यों का विजेता हुआ था।

• बिंबिसार का उत्तराधिकारी अशोक —

बिंबिसार का उत्तराधिकारी अशोक हुआ। जो मगध की राज गद्दी पर 269 ईसवी पूर्व बैठा। पुराणों के अनुसार अशोक को अशोक वर्धन कहा गया है। अशोक को ‘उप गुप्त’ नामक बौद्ध भिक्षु ने बौद्ध धर्म की दीक्षा दी। अशोक ने धर्म प्रचार के लिए अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा था। अशोक की माता का नाम ‘शुभद्रांगी’। अशोक के शासनकाल से ही शिलालेख का प्रचलन सर्वप्रथम भारत में शुरू हुआ।

• गुप्त साम्राज्य —

तीसरी शताब्दी के अंत में गुप्त साम्राज्य का उदय प्रयाग के निकट कौशांबी में हुआ। गुप्त वंश का संस्थापक श्री गुप्त 240 से 280 ईसवी में माना जाता है। श्री गुप्त का उत्तराधिकारी घटोत्कच 280 से 320 ईसवी में माना गया।

गुप्त वंश का प्रथम महान सम्राट चंद्रगुप्त प्रथम था जो 320 ईसवी में गद्दी पर बैठा और उसने व्हिच वी राजकुमारी कुमार देवी से विवाह किया। इसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। तदुपरांत उसका उत्तराधिकारी समुद्रगुप्त हुआ जो 335 ईसवी में गद्दी पर बैठा।

समुद्रगुप्त विष्णु का उपासक था। इसका दरबारी कवि हरिषेण था जिसने इलाहाबाद प्रशस्ति लेख की रचना की। समुद्रगुप्त का उत्तराधिकारी चंद्रगुप्त द्वितीय हुआ। चंद्रगुप्त द्वितीय का उत्तराधिकारी कुमारगुप्त प्रथम वा गोविंद गुप्ता हुआ।

• नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना —

कहा जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना कुमार गुप्त ने की थी। और कुमारगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी स्कंद गुप्त हुआ। स्कंद गुप्त ने गिरनार पर्वत पर सुदर्शन झील का पुनरुद्धार कराया।

• हूणों का आक्रमण —

स्कंद गुप्त के शासनकाल में ही हूणों का आक्रमण शुरू हो गया अंतिम गुप्त शासक विष्णु गुप्त था। गुप्त काल में प्रसिद्ध मंदिर विष्णु मंदिर जबलपुर मध्य प्रदेश में, शिव मंदिर भूमरा नागदा मध्यप्रदेश में, पार्वती मंदिर नैना कोठार मध्य प्रदेश में, दशावतार मंदिर देवगढ़ ललितपुर उत्तर प्रदेश में, शिव मंदिर खोह नागौद मध्यप्रदेश में, भीतरगांव मंदिर – भीतरगांव, लक्ष्मण मंदिर कानपुर उत्तर प्रदेश में निर्मित कराया था।

• कवि कालिदास व आयुर्वेदाचार्य धनवंतरी —

चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में संस्कृत भाषा का सबसे प्रसिद्ध कवि कालिदास को कहा जाता था। इन के दरबार में आयुर्वेदाचार्य धनवंतरी थे।

• पुष्प भूति वंश —

गुप्त वंश के पतन के बाद राजवंशों का उदय हुआ इन राजवंशों में शासकों ने सबसे विशाल साम्राज्य स्थापित किया। पुष्प भूति वंश के संस्थापक पुष्यभूति ने अपनी राजधानी थानेश्वर हरियाणा प्रांत के कुरुक्षेत्र मैं स्थित थानेसर नामक स्थान पर बनाई। इस वंश के श्री प्रभाकर वर्धन ने महाराजाधिराज जैसी सम्मानजनक उपाधियां धारण की।

प्रभाकर वर्धन की पत्नी यशोमती से 2 पुत्र राजवर्धन और हर्षवर्धन हुए तथा एक कन्या जिसका नाम राजश्री है उत्पन्न हुई। राजश्री का विवाह कन्नौज के मौखरि राजा ग्रह वर्मा के साथ हुआ।

मालवा के राजा देव गुप्ता ने ग्रह वर्मा की हत्या कर दी और राजश्री को बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया। राजवर्धन देव गुप्त को मार डाला परंतु देव गुप्त का मित्र शशांक ने धोखा देकर राजवर्धन की हत्या कर दी।

राजवर्धन की मृत्यु के बाद 16 वर्ष की अवस्था में ही हर्ष वर्धन थानेश्वर की गद्दी पर बैठा, हर्षवर्धन को शिलादित्य के नाम से भी जाना जाता है। हर्ष ने शशांक को पराजित करके कन्नौज का अधिकार अपने हाथ में ले लिया और उसे अपनी राजधानी बनाया।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — हिन्दू समुदाय का इतिहास सबसे प्राचीन है। इस धर्म को वेदकाल से भी पूर्व का माना जाता है, क्योंकि वैदिक काल और वेदों की रचना का काल अलग-अलग माना जाता है। यहां शताब्दियों से मौखिक (तु वेदस्य मुखं) परंपरा चलती रही, जिसके द्वारा इसका इतिहास व ग्रन्थ आगे बढ़ते रहे। वैदिक काल में भारतीय उपमहाद्वीप के धर्म के लिये ‘सनातन धर्म’ नाम मिलता है। ‘सनातन’ का अर्थ है – शाश्वत या ‘हमेशा बना रहने वाला’, अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त। सनातन धर्म मूलतः भारतीय धर्म है, जो किसी समय पूरे बृहत्तर भारत (भारतीय उपमहाद्वीप) तक व्याप्त रहा है।

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यह लेख (प्राचीन हिन्दू सभ्यता का इतिहास।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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