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हिन्दी साहित्य

भक्तिकालीन साहित्य – कवि आंदोलन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भक्तिकालीन साहित्य – कवि आंदोलन। ♦

भक्त कवियों ने राम के नाम को आराम से बढ़कर माना है। इस संबंध में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि —

राम सो बड़ों है कौन,
मोसों कौन छोटा?
राम सो खरो है कौन,
मोसों कौन खोटो?
तुलसीदास ने मानस में,
गुरु वंदना करते हुए कहा है कि-
‘बंदउ गुरु पद कंज, कृपा सिंधु नर रूप हरि ‘!

तुलसीदास जी को सगुण भक्ति काव्य धारा में इसीलिए शामिल किया गया कि वह सगुण उपासकों में से प्रतिष्ठित कवि हैं। सगुण विचारधारा का कवि ईश्वर को सगुण यानी सभी गुणों से युक्त परम उससे भी परे साकार यानी कि वह ईश्वर जगत में रूप धारण करके अवतरित होता है।

तुलसीदास जी ने ईश्वर के प्रति उत्कृष्ट प्रेम की भावना से ओतप्रोत उनका साहित्य मिलता है। यथा …

एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास।
एक राम घनश्याम हित, चातक तुलसीदास॥

कबीर दास जी ने अपने भक्ति साहित्य में भाव व्यक्त करते हुए कहा है कि —

आंखडिया झांई पड़ी, पंथ निहारि – निहारि।
जीभड़ियां छाला पड़यो, राम पुकारि – पुकारि॥

भक्तों की पहचान ईश्वर के प्रति प्रेम से होता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भक्ति आंदोलन पर विचार करते हुए सामान्य विशेषताओं का उल्लेख किया है…

  • भक्ति के बिना शास्त्र ज्ञान और पांडित्य को व्यर्थ कहा।
  • प्रेम ही परम पुरुषार्थ और मोक्ष है उन्होंने बताया।
  • द्विवेदी जी ने भक्तों को भगवान से बड़ा माना।
  • भगवान के प्रति प्रेम प्रतिज्ञा से बड़ी चीज कहा।
  • ईश्वर का नाम रूप से बढ़कर है।
  • भक्ति का अर्थ होता है सेवा करना।

भक्ति की उत्पत्ति भाग्य धातु से हुई माना जाता है। भक्ति का तात्पर्य ईश्वर के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति से ही है। जिसमें भगवान का भजन, प्रीति, अर्पण – समर्पण उसमें शामिल है।

भक्ति काल पर विचार करने पर ज्ञात होता है कि भक्त कवियों का काव्य भक्ति भावना से पूर्ण रूप से प्रेरित है। भक्ति के स्वरूप का विस्तृत चर्चा पुराण ग्रंथों में भी की गई है। भक्ति के सूत्र और मंत्र वेदों में भी मिलते हैं। विद्वान मानते हैं कि भक्ति का उद्गम वेदों से ही हुआ है। उपनिषदों में भी भक्ति के तत्व को पाया जाता है।

भागवत गीता में इसका विशेष विकास और विस्तार मिलता है। महाकाव्य महाभारत में तो कहा गया है कि —

‘भागवत गीता में ईश्वर के प्रति गहरी निष्ठा को जीवन का लक्ष्य बताया गया है’!
गीता कहती है कि ईश्वर को जिस रूप में भजते हो ईश्वर उसी रूप में प्राप्त होता है।

ईश्वर के प्रति भक्त की गहरी निष्ठा और उसकी भावना का प्रतिफल भक्ति का साहित्य है। भारत में भक्ति वह केंद्रीय तत्व है जो काव्य में अंतः धारा की भांति सर्वत्र प्रभाव प्रवाहित होता रहता है। ईश्वर की प्राप्ति का सबसे सुगम साधन यदि कुछ है तो वह है भक्ति भाव जो उत्तम मार्ग है।

भक्ति के अनेक मार्ग में…

  • स्मरण, ईश्वर के नाम रूप का।
  • कीर्तन, ईश्वर के नाम रूप और गुण का।
  • वंदना, ईश्वर के नाम रूप का।
  • श्रवण, ईश्वर के रूप में और लीला का।
  • पाद सेवन, ईश्वर के चरणों की सेवा का।
  • दास्य, ईश्वर को स्वामी मानकर सेवा अर्चना करना।
  • सख्य, ईश्वर को सखा मित्र और बंधु मानना।
  • आत्म निवेदन, ईश्वर के चरणों में सर्वस्व अर्पित करना।
  • अर्चना, ईश्वर की पूजा करते रहना।

ईश्वर प्राप्ति के अनेकों साधन बताए गए हैं जैसे—

  • कठोर तप और साधना।
  • ईश्वर के प्रति उत्कृष्ट आत्मीय प्रेम।
  • ईश्वर संबंधी तत्व चिंतन।
  • विधिक निषेध का पालन।
  • जीवन में योग, योग में ईश्वर का ध्यान।
  • प्राणायाम में ईश्वर की साधना।

आचार्य शुक्ल ने श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति कहा है। उन्होंने प्रेम के साथ श्रद्धा का संयोजन किया है। कहा है कि ईश्वर के प्रति की गई श्रद्धा अभिव्यक्ति है। श्रद्धा करने वाला व्यक्ति ईश्वर को पालन कर मार्गदर्शक और उद्धारक समझता है।

मनुष्य के जीवन में दिव्यता प्राप्त करने के लिए ईश्वर भक्ति की आवश्यकता इस संसार सागर में है।

भक्ति आंदोलन के कवि कृष्ण प्रेमी भक्त सूरदास ने अपने भक्ति साहित्य में सगुण भक्ति मार्ग को चुना। उन्होंने अपने काव्य में जीवन जीने की नई चाह पैदा की। लोक – चित्त से निराशा को उखाड़ फेंकने का कार्य अपने भारतीय भक्ति साहित्य से की। उन्होंने भक्ति मार्ग से विशाल सरस और सरल साहित्य प्रस्तुत किया।

सूरदास जी ने भगवान के भाषण के जीवन का वर्णन प्रिय विजन मानकर उत्कृष्ट तरीके से प्रस्तुत किया। उन्होंने निर्गुण को तिनका परंतु सगुण को सुमेरू की प्रधानता दी। यथा —

सुनि है कथा कौन निर्गुण की,
रचि – रचि बात बनावट।
सगुण सुमेरू प्रकट देखियत,
तुम तृण की ओर दुरावत॥

लीला कीर्तन में सूरदास जी ने लिखा —

जो यह लीला सुने सुनावै,
सो हरि भक्ति पाय सुख पावे।

श्रवण, कीर्तन और स्मरण में उनका मत है कि —

को को न तरयो हरिनाम लिये।

वंदन, अर्चन और पाद सेवन में अपना मत व्यक्त किया है —

जो सुख हो तो गोपालहिं गाएं,
वह सुख बैकुंठ में भी नहीं।
यह धरती बैकुंठ से भी श्रेष्ठ है।
यथा –
‘चरण कमल बंदों हरि राइ।’

इसी धरा पर हरिया अवतार धारण करके लीला करते हैं। इसी दृष्टि से यह धरा श्रेष्ठ हैं। भगवान के प्रेम में रूप लीला का वर्णन गीतिकाव्य में सूरदास ने हृदय से गाई है।

सूरदास का मन मुरली की मोहनी ता, जमुना ब्रज- कुंज, आनंद बधाई बाल क्रीड़ा प्रेम के रंग रहस्य और वियोग के भाव दशा में रमता है। वे अपने हृदय तल से संगीत को रचते हैं। भक्ति साहित्य काव्य में विविध रूप ढंग से सूर अपनी बात को कहते हैं। मुक्तक परंपरा का प्रतिपादन कला की कलात्मकता के लिए करते हैं।

तुलसीदास जी राम काव्य परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। राम काव्य परंपरा में उन्हें महत्वपूर्ण स्थान पर माना जाता है। भक्ति आंदोलन की क्रांतिकारी भूमिका का निर्वहन गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया।

तुलसी ने भक्ति की निर्गुण – सगुण परंपरा को वैचारिक स्तर पर एकता के सूत्र में बांधने का पूरा प्रयास किया। भावनात्मक रूप से जनता को एक करने का प्रयास किया। रामानंद ने लोक भाषाओं में काव्य रचने की प्रेरणा देकर हिंदी भक्ति काल को दिशा – दृष्टि देने का कार्य किया।

वेदों उपनिषदों से भक्ति की धारा जो उमड़ी, वह तीसरी से 9वीं शताब्दी तक भक्ति आंदोलन को तमिल से तीव्रता मिली। भक्ति आंदोलन तमिल ने तीव्र हुआ। संपूर्ण देश की कवियों में कश्मीर में लल देद, तमिल में आंडाल, बंगाल में चंडीदास, चैतन्य, पंजाब में नानक, गुजरात में नरसी मेहता आदि ने भक्त कवियों को पैदा किया। इन कवियों ने सांस्कृतिक – सामाजिक एकता के सूत्र पैदा किए।

निर्गुण भक्ति आंदोलन को उत्तर भारत में शोषित जनता का भरपूर सहयोग मिला। जिसमें कबीर, दादू रज्जब, पीपा, रैदास और सूरदास की कहानियों का संदेश जनता के लिए सुधारवादी और क्रांतिकारी सिद्ध हुआ।

सगुण भक्ति का मत निम्न वर्ग के साथ ही उच्च वर्ग को भी प्रभावित किया। इस विचारधारा का रामानुजाचार्य, रामानंद, वल्लभाचार्य से लेकर मध्या आचार्य तक का चिंतन और समर्थन प्राप्त हुआ।

इसी प्रभाव चिंतन में उत्तरी भारत में कृष्ण भक्ति और राम भक्ति धाराओं के प्रचार-प्रसार विकास में चार चांद लगा दिया। कृष्ण भक्ति की धारा में मीरा ने चैतन्य महाप्रभु के साथ अन्य आचार्यों के विचारों का प्रेम रस भक्ति काव्य के माध्यम से प्रभावित किया।

भारतीय भाषाओं के साहित्य में व्यापक स्तर पर राम काव्य की रचना का मूल आधार बना वाल्मीकि रामायण। हिंदी में 1286 ई. के आसपास कवि भूपति रचित ‘रामचरित रामायण’ का संकेत मिलता है परंतु यह कृति उपलब्ध नहीं है।

अतः तुलसीदास राम काव्य परंपरा में हिंदी के प्रतिनिधि के रूप में माने जाते हैं।

राम काव्य परंपरा का मंथन करने के उपरांत ही जिसे तुलसीदास जी ने पढ़ा होगा उसी से प्रभावित होकर राम चरित्र मानस के प्रारंभ में यह लिखकर अपना मनन चिंतन व्यक्त किया। कि …

‘नाना पुराण निगमा गम रघुनाथ गाथा’!

रामानंद द्वारा सन 1943 ईस्वी के आसपास उनके द्वारा रचित ‘राम रक्षा स्तोत्र’ को तुलसीदास जी ने उनकी परंपरा को आगे बढ़ाया जिसे रामानंद जी ने लोक शक्ति से जुड़ा था।

तुलसीदास जी का बचपन कष्ट में बीता इसके बारे में देखें —

बारे ते लाल बिललात द्वार – द्वार दीन।
जैसे रचना से संकेत मिलता है॥

गोस्वामी तुलसीदास जी पर हनुमान जी का विशेष प्रभाव पड़ा। हनुमान पूजा मध्य युग की शगुन राम उपासना का अनिवार्य अंग है। कहा जाता है कि राम को प्राप्त करने के लिए हनुमान की उपासना अति आवशक है।

तुलसीदास जी ने अनेकों जगह हनुमान की मूर्ति की स्थापना की जिसमें काशी (बनारस) मैं उन्होंने रामलीला के साथ-साथ लगभग एक दर्जन हनुमान जी की मूर्तियों की स्थापना की उन मूर्तियों में विशेष रूप से संकट मोचन मंदिर में और हनुमान फाटक पर बड़ी मूर्तियां स्थापित की बाकी हनुमान जी की, काशी में स्थापित मूर्तियां इन दो मूर्तियों से छोटी मूर्ति की स्थापना की।

उन्होंने काशी अयोध्या जगन्नाथपुरी रामेश्वरम द्वारिका होते हुए बद्रीनाथ की भी यात्रा की। वहीं से वे कैलाश और मानसरोवर जाने के उनके प्रमाण मिलते हैं। तुलसीदास चित्रकूट में अंत में जाकर बस गए वहीं उन्होंने सत्संग किया और वहीं रह गए। इसके उपरांत अयोध्या जाकर संवत् 1631 में मानस की रचना करने से जीवनकाल में ही गोस्वामी ने प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली।

तुलसीदास का 20 – 25 वर्ष काशी में कष्टप्रद बीता। कहा जाता है कि वह बिंदु माधव मंदिर के बगल संकट्ठा मंदिर के पास हनुमान जी की एक मूर्ति की स्थापना की थी परंतु काशी वासियों ने उन्हें शांति से लेखन का कार्य करने नहीं दिया। बाधा पहुंचाई जिसकी वजह से वह बिंदु माधव मंदिर में एक रूम में काशी के लोगों से छिपकर रचना की। नामा दास में ‘भक्त काल’ में कहा गया है कि—

‘जीव निस्तार हित वाल्मीकि तुलसी भयो’!

वर्तमान समय में कलिकाल का समय चल रहा है इसलिए हनुमान जी की पूजा का विशेष प्रभाव मानव पर पड़ सकता है। शास्त्रों का अध्ययन करने के उपरांत हमने अपना महत्व, मत व्यक्त करते हुए लिखा है कि हनुमान की गदा का प्रयोग प्रतीकात्मक हर हिंदू, हिंदुस्तानी को भी करना चाहिए। गुरु नानक देव जी ने लिखा है कि —

जानो रे जिन जागना,
अब जागिन की बारी।
फेरि कि जागो नानका,
जब सोबाऊ पांव पसारी॥

रहीम ने संप्रदाय से उठकर, संप्रदाय में बंध कर रचना नहीं किया, अपितु उन्होंने भी अपने काव्य में निर्गुण भक्ति, सगुण भक्ति, सूफी भक्ति के साथ ही सख्य, दास्य, शांत, श्रृंगार भक्ति के दर्शन लिखे हैं जो उनके साहित्य में मिलता है।

रहीम ने लिखा कि —

ते रहिमन मन आपनों,
कीन्हें चारु चकोर।
निसि बासर रहे,
कृष्ण चंद्र की ओर॥

वंदना में रहीम लिखते हैं कि —

पुनि – पुनि बंदो गुरु के पद जलजात।
जीहि प्रताप ते मन के तिमिर बिलात॥

ध्यान में रहीम लिखते हैं कि —

ध्यावहुं सोत विमोचन गिरजा ईश।
नागर भरण त्रिलोचन सुरसरी सीस॥

आगे भी रहीम कहते हैं कि —

जे गरीब पर हित करें,
ते रहीम बड़ लोग।
कहा सुदामा बापुरो,
कृष्ण मिताई जोग॥

भक्ति काल के आंदोलनकारी रचनाकारों पर ध्यान केंद्रित करने से ज्ञात होता है कि वास्तव में भक्तिकाल हिंदी साहित्य के इतिहास का सर्वोत्तम काल रहा है। माना जाता है कि भक्ति साहित्य का उदय पहले पहल दक्षिण भारत से हुआ। इसके बारे ईशा की दूसरी तीसरी शताब्दी के लिए लिखे गए साहित्य को पढ़ने से क्या होता है।

वहां पूर्व में बौद्ध और जैन धर्म का विशेष प्रभाव रहा हिंदी दोनों धर्म का प्रचार प्रसार और विकास परिलक्षित होता है। इन दोनों धर्मों का उन लोगों पर प्रभाव बढ़ने और सहने को लेकर इन्हीं प्रभाव के कारण भक्ति साहित्य को समृद्ध करने और यह जन तक उसे समझाने का प्रयत्न किया और विकसित करने का कार्य किया।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — यह मनुष्य जन्म मिला हैं भगवन भजन करने के लिए न की भोग विलाष के लिए। हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्ति काल महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आदिकाल के बाद आये इस युग को ‘पूर्व मध्यकाल’ भी कहा जाता है। इसकी समयावधि 1375 वि.सं से 1700 वि.सं तक की मानी जाती है। यह हिंदी साहित्य का श्रेष्ठ युग है जिसको जॉर्ज ग्रियर्सन ने स्वर्णकाल, श्यामसुन्दर दास ने स्वर्णयुग, आचार्य राम चंद्र शुक्ल ने भक्ति काल एवं हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लोक जागरण कहा। सम्पूर्ण साहित्य के श्रेष्ठ कवि और उत्तम रचनाएं इसी में प्राप्त होती हैं।

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यह लेख (भक्तिकालीन साहित्य – कवि आंदोलन।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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महिला सशक्तिकरण।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ महिला सशक्तिकरण। ♦

पढ़ी लिखी हूं,
घर को संभाल लूंगी।
बच्चों को भी पाल लूंगी,
रेलगाड़ी से लेकर जहाज चला लूंगी।
विश्व में परचम लहरा दूंगी,
अबला नहीं हूं।
नारी हूं शक्ति की मूरत हूं।

आज महिलाएं किसी भी क्षेत्र में देखो कमजोर नहीं है। आधुनिक युग में जागरूकता ने नारी को ऊंचाइयों पर ला दिया। अब बात साइकिल, स्कूटी, कार तक सीमित नहीं रही। महिलाएं अब रेलगाड़ी चलाने लगी। आसमान में जहाज उड़ाने लगी है।विश्व में देश का नाम आगे बढ़ाने लगी है। खेलों में भी अपना परचम लहरा रही हैं।

आज दौर आ गया है एक नारी पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। बात चाहे सोशल मीडिया की हो या घर-परिवार की हर जगह महिलाओं का वर्चस्व कायम है। हो भी क्यों ना हो, का खाना, झाड़ू, पोछा, बच्चों को संभाल कर। घर की जिम्मेदारियां पूरी कर निकल पड़ती है ऊंचाइयां छूने।

अब हम किसी भी क्षेत्र में चले जाएं महिलाएं पुरुषों के साथ काम कर रही है कुछ समय पहले ऐसा नहीं था परंतु महिलाओं ने अपनी मेहनत और लगन से ये स्थान हासिल कर लिया है। हर जगह महिलाएं अपने हुनर को दिखा रही हैं।

खाना, झाड़ू, पोछा, बच्चों को संभाल कर घर की जिम्मेदारियां पूरी कर निकल पड़ती है ऊंचाइयां छूने। अब हम किसी क्षेत्र में चले जाए महिला पुरुषों के साथ काम कर रही हैं। कुछ समय पहले जो दबी रहती थी आज आसमान में उड़ रही हैं।

बात चाहे धरती से आसमान की हो हर स्थान पर महिलाओं ने अपना वर्चस्व कायम कर लिया है। सब इनकी कठोर मेहनत, लगन का परिणाम है जो प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं ने अपने दम पर बड़ी-बड़ी कंपनियां स्थापित कर ली है।

जो खूब चल रही है अब महिला इतनी सक्षम हो गई है कि हजारों महिलाओं को अपने साथ काम दे रहीं है। इनकी ताकत हौसलें का ही परिणाम है कि पूरा दिन थक कर आकर भी घर के कामों में हाथ बटां देती हैं।

हम एक महिला की दूसरी महिला से तुलना नहीं करेंगे पर हर महिला अपने काम को बखूबी निभा रही है और घर का काम हो या ऑफिस का काम हो हर जगह अपना परचम लहरा रही है।

राजनीति में भी महिलाएं खूब नाम कमा रही है। और देश का नेतृत्व कर रही हैं। एक बात बिल्कुल सत्य है कि जब एक महिला पढ़ी लिखी हो तो वह एक साथ दो – दो परिवारों का जीवन बना देती है।

नारी शक्ति की मुरत है,
इसे बस थोड़े प्यार की जरूरत है।
आपको पता भी नहीं चलेगा,
कब एक नारी आपके घर को स्वर्ग बना देगी।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — महिला सशक्तिकरण में ये ताकत है कि वो समाज और देश में बहुत कुछ बड़ा बदल सकें। वो समाज में किसी भी समस्या को पुरुषों से बेहतर ढ़ंग से निपट सकती है। वो देश और परिवार के लिये अधिक जनसंख्या के नुकसान को अच्छी तरह से समझ सकती है। अच्छे पारिवारिक योजना से वो देश और परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रबंधन करने में भी पूरी तरह से सक्षम है। नारी शक्ति की मुरत है, इसे बस थोड़े प्यार की जरूरत है। आपको पता भी नहीं चलेगा, कब एक नारी आपके घर को स्वर्ग बना देगी।

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यह लेख (महिला सशक्तिकरण।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें व कहानी, लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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कंकड़ की सब्जी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कंकड़ की सब्जी। ♦

अरे! रोशनी आज मीरा को तू अपने साथ ले जाना। मैं आज देर से आऊंगी, शाम को आते वक्त अपने साथ लेकर आना परंतु मालकिन मेरे घर कैसे, जाते हुए विद्या ने बोला अरे! बस आज की ही बात है और साहब भी बाहर गए हैं। फिर दिन में मीरा अकेली कैसे रहेगी परंतु मालकिन विद्या ने बात काटते हुए कहा परंतु वरंतू कुछ नहीं तू ले जा और हां दिन में कुछ खिला देना गरम-गरम बनाकर।

अगर इधर से बनाकर लेकर जाएगी तो ठंडा हो जाएगा। जी मालकिन रोशनी ने सिर हिलाते हुए कहा, मन ही मन बहुत बेचैनी थी और बुड़बुड़ा रही थी। मैं अपने घर कैसे लेकर जाऊं मीरा को। यह पूरा दिन उस छोटे से कमरे में कैसी रहेगी? अनेक सवाल करते-करते काम कर रही थी। काम खत्म करके रोशनी अपने साथ मीरा को लेकर चल पड़ी। बाई जी मेरे तो पैर दर्द करने लगे और कितनी दूर है आपका घर, बस बेटा पास ही है।

पास-पास करते कितने दूर तो ले आए आप। मम्मी की तरह एक गाड़ी क्यों नहीं लेती? रे बेटा हम कहां से लें और मुझे तो चलानी भी नहीं आती। रोशनी ने कहा आप मम्मी से सीख लो, हां सही बोल रहे हैं आप। लो बेटा हमारा घर आ गया है। यह घर यह तो झोपड़ी है। हां बेटा हमारे पास इतने पैसे नहीं है कि बड़ा घर बना ले।

घर में मीरा के 5 बच्चे खेल रहे थे। रोशनी ने कहा आप इनके साथ खेलों, मैं काम करती हूं। जी बाई जी मीरा ने कहा। थोड़ी देर बाद रोशनी ने खाना बना दिया। सभी खाना खाने लगे। मीरा बोली बाई जी मुझे भी खाना खाना है। रोशनी अपने पति की तरफ देखते हुए बोली कुछ पैसे हैं तो मीरा के लिए बाहर से खाना ला दो ना। अरे!रोशनी तुझे तो पता है पिछले 10 दिन से मुझे कुछ काम नहीं मिला। मेरे पास तो एक रूपया भी नहीं है।

तु मैम साहब से क्यों नहीं मांग कर लाई। किस मुंह से मांगती, पहले ही एडवांस पगार लेकर खा चुके हैं। चलो ऐसा करो यही खाना दे दो मीरा को। कैसी बात करते हो मीरा तो टेबल-कुर्सी पर बैठकर 10 तरह के पकवान खाती है। यह कैसे खाएंगी, कोई नहीं अब उसे भूख लगी है तो यही दे दो। ठीक है रोशनी ने कहा। मीरा लो बेटा खाना खा लो। मीरा खाना खाने लगी जैसे ही उसने सब्जी को मुंह में डाला मीरा बोली यह कैसी सब्जी है दांत से कट ही नहीं रही।

रोशनी की बेटी ने कहा मीरा तू पानी में रोटी लगाकर खाओ और सब्जी चूस कर प्लेट में रख दो। यह सब्जी है मैंने तो आज तक नहीं खाई और बाई जी तो हमारे घर में कभी नहीं बनाती है ऐसी सब्जी। रोशनी की बेटी नंदिनी ने कहा, परंतु हम तो हर रोज यही सब्जी खाते हैं। हम रोड़ से कंकड़ उठा कर, तभी रोशनी ने डाटंते हुए कहा चुपचाप खाना खाओ। नंदनी चुपचाप खाना खाने लगी।

खाना खाकर बच्चे खेलने लगे और रोशनी अपना घर का काम करने लगी। जब तक शाम हो गई थी रोशनी मीरा को लेकर मालकिन के घर चली गई। मीरा की मां ने आते ही रोशनी से कहा जल्दी से खाना लगा दो बहुत भूख लगी है। मां आज पता है आपको मैंने चूस कर फेंकने वाली सब्जी खाई और मैं पूरा दिन बहुत खेली। मेरे पांच दोस्त बन गए। कौन सी सब्जी बनाई थी जरा मुझे भी तो बताना।

मैं-मैं क्या कर रही है बता ना। मैं हर रोज कंकड़ रोड़ से उठाकर लाते हैं और उन्हें धोकर साफ करके उसकी सब्जी बना लेते हैं। यह क्या बोल रही है रोशनी तू, विद्या ने आश्चर्य से कहा। हमारे पास पैसे नहीं है और उनका काम भी कभी-कभी लगता।

घर में 5 बच्चे हैं। पर तूने बताया क्यों नहीं कभी। पहले आप इतना कुछ दे देती हो मालकिन, खाने की तरफ देख कर आज विद्या का मन खाना खाने को नहीं किया। बिना खाए उठ गई। क्या हुआ मेम साहब, खाना अच्छा नहीं बना था क्या आज।

अरे नहीं थक गई हूं ना इसलिए बोल कर अपने कमरे के अंदर जाते हुए कुछ पैसे रोशनी के हाथ में थमा कर बोली जाते समय राशन ले जाना। मालकिन मैं तो पहले ही पगार ले चुकी। चुप रह तू और हां ये सारा खाना घर ले जाना और बच्चों को खिला देना। जी मालकिन, अब तुम जाओ रात ज्यादा हो गई है और हां कल से तेरे पति को भी साथ में लेकर आना काम पर।

जी मालकिन रोशनी अपनी मालकिन का शुक्रिया अदा करते-करते घर चली गई।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कहानी के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — दिल का साफ़ इंसान भले ही पैसे से गरीब होता है लेकिन एक अमीर दिल का मालिक होता हैं। सच्चे दिल वाला गरीब इंसान शर्म के कारण मांगता नहीं है, जल्दी कभी किसी से। वह रुखा सूखा खुद और अपने परिवार को खिला लेगा लेकिन जल्दी कभी भी किसी से मांगता नहीं। खास करके घर में काम करने वाली बाई। जो नेक दिल वाले मालिक और मालकिन होते है वह सत्य जानने के बाद उनको दिल से मदद करते है, जैसा की इस कहानी में विद्या ने रोशनी के साथ किया।

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यह कहानी (कंकड़ की सब्जी।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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संसार सागर में परमात्मा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ संसार सागर में परमात्मा। ♦

ईश्वर कहते है कि मुझे जानकर बहुत लोग भजन करके तर जाते हैं। ईश्वर के विषय का यथार्थ ज्ञान ही तप है। जाे ईश्वर को भजता है उसे ईश्वर भक्त कहते हैं। संसार के लोगों ने जिसे मूल्यवान समझा वाे उसे ही याद करते हैं। क्या पता कौन किस समय काम आ जाए इसका ध्यान नहीं रखते हैं।

“कहा जाता है कि अंगद ने हनुमान जी से कहा की हनुमान समय-समय पर मेरी याद भगवान को दिलाते रहना जिसे भगवान याद करते हैं उसका बड़ा भारी भाग्य होता है।“

भरत जी से भारद्वाज मुनि ने कहा सारी दुनिया भगवान को भजती है और तुम्हें भगवान भजते हैं। मानव का जन्म दिव्य है। लेकिन भगवान की तरह पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं है कुछ अंतर है भगवान जैसी पूर्ण शक्ति नहीं है। भगवान का संसार में आना हित हेतु हितकारी होता है। लेकिन मनुष्य भगवान की आज्ञा से ही आता है।

• भगवान में हर समय मन को रमाएं रहना कल्याणकारी •

ज्ञानी पुरुषों का कर्म मनुष्य की अपेक्षा दिव्य होता है। भगवान के भजन के प्रभाव से कल्याण होता है उसी प्रकार भगवान के हाथों से मरने पर उस जीव की मुक्ति हो जाती है। भगवान का नाम जप करें अथवा भजन करें या सत्संग करें ऐसे जीव का कल्याण होता है।

महापुरुषों का भी दर्शन मुक्ति देने वाला होता है। भगवान में हर समय मन को रमाएं रहना कल्याणकारी होता है। भगवान से प्रेम हो जाने पर शेष गौण हो जाता है। शरीर क्रिया करें अथवा न करें परंतु निश्चित रूप से संसार में रहकर ईश्वर का भजन मनन करना कल्याणकारी कदम है।

‘भगवान ने कहा है कि तू केवल मेरा भजन कर’। जिस प्रकार हिम्मत करने वाला व्यक्ति उद्देश्य तक जल्दी पहुंच जाता है कम हिम्मत करने वाला पछताता रहता है; रोता रहता है उसी प्रकार मन की चंचलता जब छूट जाती है तो ईश्वर अर्थात भगवान को पाने में देरी नहीं होती धीरे-धीरे ही सही वह ईश्वर तक पहुंच जाता है।

• मन से धनवान धरा पर बहुत थोड़े •

कहां जाता है कि परमात्मा की प्राप्ति बहुत ही सहज है। परोपकार में किया गया खर्च खुले हाथ से करना होगा। उदारता का भाव अपने पास रखना उत्तम होता है। आपके पास यदि ऐसा लगे कि कुछ भी नहीं है तो भी लोगों के समक्ष मीठी वाणी बोली बोलना ज्यादा लाभप्रद होता है। हमारा लक्ष्य होना चाहिए और मन से धनवान धरा पर बहुत थोड़े ही मिलते हैं।

जीवन में काम करना चाहिए बड़ाई की चाहत नहीं रखनी चाहिए। अच्छे कार्यों के संपन्न होने के बाद भी उसे प्रकाशित करने से क्या लाभ यदि प्रकाशित करते हैं तो वह बड़ा नहीं कही जाएगी। मनुष्य अपनी बुरे काम को छुपाता है, छुपाने की चेष्टा करता है। वही आप उत्तम काम करके प्रकट किए बिना रह नहीं सकते हैं। यदि आप उत्तम कार्य करते हैं तो आप का उद्धार होने में विलंब नहीं होता है। परमात्मा की प्राप्ति की इच्छा वाले मनुष्य को दंभ – पाखंडी, मान – बड़ाई की इच्छा को छोड़ देना उत्तम होता है।

• भगवान खेवनहार है। •

दिखावा करना, गलती को छुपाना, आलस्य का आना, पापों को छिपाने जैसा कृत्य है। कल्याण व्याकुलता से होता है व्याकुलता भगवान के लिए करनी पड़ती है। संसार समुद्र तट की भांति ही है साधन की कमी का रोना नहीं रोना चाहिए। भगवान खेवनहार है। जिस प्रकार समुद्र में डूबते हुए व्यक्ति के हाथ में यदि कोई रस्सी लग जाती है तो उसे नहीं छोड़ता उसी प्रकार संसार सागर में ईश्वर की भक्ति को नहीं छोड़ना चाहिए।

हमेशा चिंतन करनी चाहिए साधन तेज, मनुष्य को चिंता नहीं चिंतन करना चाहिए। चिंता दुख का कारण होता है और चिंतन से ही ईश्वर की प्राप्ति होती है। प्रेम और भय से होता है। धार्मिक देश में जन्म बहुत कठिन तपस्या के बाद होता है और उत्तम कुल में जन्म या उत्तम सत्संग मिलना बहुत कठिन कार्य है। यदि मिल जाए तो मनुष्य को उस समय को नहीं गंवाना चाहिए। परमात्मा के तत्व को जानने वाला जीव संसार के सारे कार्यों को मिट्टी के समान समझने लगता है।

• मृत्यु के उपरांत •

संसार सागर में जो कुछ हो रहा है परमात्मा तत्व जानने के बाद चिंता नहीं होना चाहिए। आपने इस संसार में जो कुछ बनवाया है जिसे आप कहते हैं कि हमने अमुक कार्य किया है वह मृत्यु के उपरांत किस काम का। आपको यह भी नहीं पता है कि आपका आगे का जन्म कहां और किस तरह में होगा।

न जाने कितनी बार मनुष्य का जन्म हुआ होगा; अगर मनुष्य उस जन्म काल में परमात्मा को जान लिया होता तो फिर अगला जन्म ही क्यों होता। परमात्मा की प्राप्ति 33 करोड़ मनुष्यों में किसी एक को होती है। धरा पर जीव करोड़ों के करोड़ों गुना हैं। परंतु उसमें से सबको मुक्ति नहीं मिलती है। इसलिए सर्वस्व निछावर कर देना चाहिए; सब कुछ चले जाने के बाद भी ईश्वर से प्रेम करना चाहिए।

• ईश्वर की शरण में… •

सांसारिक उन्नति देखकर मनुष्य प्रसन्न हो जाता है किंतु साधन के अभाव में घर जल जाता है। मनुष्य परमेश्वर से प्रार्थना करें कि ईश्वर उसे सद्बुद्धि दे; ज्ञान दे। भगवान की शरण में जो जाता है उसका प्रभु त्याग नहीं करता। ईश्वर की शरण में जाने के बाद; उससे जो लोग कुछ मांग नहीं करते, उसकी सुनवाई भगवान जल्दी करता है।

समय बहुत मूल्यवान होता है एक-एक पल वृथा नहीं खोना चाहिए। करोड़ों जन्मों के उपरांत मनुष्य का एक बार जन्म मिलता है। मोह से राग द्वेश रूपी द्वंद उत्पन्न होता है। द्वंद की स्थिति में मनुष्य मोहित हो जाता है। मोह हो जाने पर बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। मोह ईश्वर से करना होगा। बासुदेव में निरंतर भ्रमण करते रहना चाहिए जो प्राणी भजन कीर्तन और भगवान की भक्ति की चर्चा करते हैं भगवान के गुण और प्रभाव सहित कथन करके संतुष्ट होते हैं वह ईश्वर के करीब होते हैं।

“प्रभु कार्य किए बिना मोहि कहां विश्राम”

समर्पित भाव से समस्त कार्यों को ईश्वर को समर्पित करना सर्वथा उचित है।

‘येषा म् न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।

ऐसे लोग पृथ्वी पर भार स्वरूप हैं जिनके अंदर विद्या, तप, दान, ज्ञान अच्छे आचरण, सद्गुण नहीं है। मनुष्य का शरीर पाकर जो कर्तव्य पालन करते हैं उन्हीं को धन्यवाद है।

किसी बात की परवाह करना ही मुक्ति में बाधक होता है। भेजें बेटे – बेटी, नाती – पोता कमाने के लायक हो जाए तो भी ठीक है वह आपको कुछ दे रहे हैं अथवा नहीं दे रहे हैं इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए। सहनशीलता उत्तम होती है कायरता उत्तम नहीं है, उद्दंडता खराब है वीरता प्राप्त करने के उपरांत उद्दंडता नहीं किया जाना चाहिए।

अच्छे व्यक्तियों को ढिंढोरा पीटकर पढ़ाई नहीं करनी चाहिए। अधिकांश लोग ढोंग करते हैं। शास्त्र के अनुकूल कार्य में बेपरवाह नहीं रहना चाहिए। बेपरवाह होने को गफलत कहते हैं। गफलत बिल्कुल ही नहीं करनी चाहिए। मनुष्य का जन्म अनन्य भक्ति करने के लिए मिलता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — यह मनुष्य जन्म मिला हैं भगवन भजन करने के लिए न की भोग विलाष के लिए। भगवान केवल उन भक्तों का उद्धार करते हैं जो सच्चे मन से सम्पूर्ण समर्पण के साथ प्रेम से याद करते है उन्हें, सच्चे मन से पूर्ण प्रेम से भजन करते है जो भगवान का उनका सदैव ही ख्याल रखते हैं भगवान भी। हम मनुष्यों को भगवान का मनन और चिंतन करना है, चिंता बिलकुल भी नहीं करना है। ऐसे लोग पृथ्वी पर भार स्वरूप हैं जिनके अंदर विद्या, तप, दान, ज्ञान अच्छे आचरण, सद्गुण नहीं है। मनुष्य का शरीर पाकर जो कर्तव्य पालन करते हैं उन्हीं को धन्यवाद है।

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यह लेख (संसार सागर में परमात्मा।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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हम पुस्तकें पढ़ेंगे तो ही बच्चे पढ़ेंगे।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हम पुस्तकें पढ़ेंगे तो ही बच्चे पढ़ेंगे। ♦

आप सभी ने सुना होगा कि बच्चे देख कर ही सीखते हैं। जैसा हम करते हैं बच्चे भी हमारा अनुकरण करते हैं। इस आधुनिक युग में जब से फोन ने सबकी जिंदगी में कदम रखा है पुस्तकों का महत्व ही खत्म होता जा रहा है। परंतु कुछ समय पहले ऐसा नहीं था।

सबको पुस्तकों से लगाव था। घर में पुस्तक रखी रहती थी। धार्मिक पुस्तकें भी पढ़ाई की पुस्तकें भी। परंतु आजकल तो यह खत्म ही होता जा रहा है। फोन पर ही किताबें पढ़ी जाती है। इसलिए बच्चे भी आजकल जिद्दी हो गए हैं उनको भी फोन चाहिए। अगर हम घर में मात-पिता ही पुस्तक नहीं पढ़ेगें तो बच्चों से कैसे उम्मीद लगा सकते हैं कि वे पढ़ें। जरूरी नहीं है कि आप पढ़ाई कर रहे हो तभी किसी पुस्तक को पढ़े।

जब भी आपको शाम को खाली समय मिले तो जिस भी पुस्तक में आपकी रुचि है उसे लेकर आप बैठ जाइए। एक घंटा पढ़ेंगे भी तो बच्चे आपको देख कर खुद ब खुद किताब उठाकर पढ़ने लग जाएंगे। इससे एक पंथ दो काज हो जाएंगे आपको बोलना भी नहीं पड़ेगा और बच्चो के अंदर भी अच्छे संस्कार जागृत होंगे।

अगर पुस्तक नहीं पढ़ सकते तो अखबार तो पढ़ सकते हैं। एक दो घंटा अखबार लेकर बैठेंगे तो बच्चे आपको देख कर खुद ब खुद पढ़ने बैठ जाएंगे। आज के इस डिजिटल युग में सारे काम फोन से हो जाते हैं।

अच्छा भी है काम तुरंत हो जाते हैं। परंतु पुस्तक पढ़ने भी तो बहुत जरूरी है। अभी लॉकडाउन में सबको पता लग गया होगा कि पढ़ाई का महत्व स्कूल वाली पढ़ाई का ज्यादा महत्व है या फोन वाली पढ़ाई का।

अध्यापक के साथ बैठकर बच्चे किताब से पढ़ते हैं। उसका ज्यादा महत्व है। आपको देखकर उसकी भी आदत में शामिल हो जाएगा पढ़ना। आपको पता भी नहीं चलेगा कब आपने संस्कार का बीज बोया और वह कब फल बनकर तैयार हो जाएगा । “यह एक ऐसी क्रिया है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती जाएगी।”

जरूरी नहीं है किसी विषय की ही पुस्तक पढ़ी जाए। आप कोई भी किताब पढ़ लो जो आपको अच्छी लगे। या बच्चों की पाठ्यक्रम की पुस्तक भी पढ़ सकते हैं, पाठ्यक्रम की पुस्तकें बहुत ही ज्ञानवर्धक होती हैं।

उससे दो काम एक साथ में हो जाएंगे। बच्चे को भी पढ़ा दोगे। साथ में बच्चों को पढ़कर सुना सकते हैं खेल – खेल में बच्चों का पाठ भी हो जाएगा और आपका समय पास हो जाएगा। और अपने बच्चे के साथ अच्छा समय भी बिता पाओगे।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — पुस्तकें किसी भी इंसान की सबसे अच्छी व सच्ची मित्र है, “कोई ज्ञान कभी भी बुरा नहीं होता हां इंसान बुरे हो सकते है,” इसलिए जहां से भी हो सके ज्ञान अर्जित करने में शर्माना नहीं चाहिए कभी भी। जैसा हम करते हैं बच्चे भी हमारा अनुकरण करते हैं। इस आधुनिक युग में जब से फोन आया है तब से सबकी जिंदगी में पुस्तकों का महत्व ही खत्म होता जा रहा है। जब हम पुस्तकें पढ़ेंगे तो ही तो बच्चे भी पढ़ेंगे। आज भी जितने विद्वान् लोग है या बड़े बिजनेसमैन है सभी नियमित किताब पढ़ते हैं। जीवन के हर क्षेत्र में अगर आगे बढ़ना है तो पुस्तकें पढ़ना शुरू कर दे। आपको पढ़ता देखकर बच्चे भी पढ़ने लगेंगे। आओ हमसब मिलकर ये संकल्प ले की हमसब खुद भी पुस्तकें पढ़ेंगे और बच्चों के साथ-साथ सभी को पुस्तकें पढ़ने के लिए जागरूक करेंगे।

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यह लेख (हम पुस्तकें पढ़ेंगे तो ही बच्चे पढ़ेंगे।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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सत्य का ज्ञान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सत्य का ज्ञान। ♦

दीपक में केवल तेल, घी, और बाती होने से रौशनी नहीं मिलती, जब तक घने अंधकार में उसे प्रज्वलित न की जाए। तेल, बाती, अंधकार, अग्नि और इच्छा के बिना रौशनी की कल्पना नहीं की जा सकती। अंधकार से लड़ने की क्षमता केवल रोशनी में है। मनुष्य के अंधकारमय जीवन को सत्य का ज्ञान ही प्रकाश में ला सकता है।

बिना गुरु के सत्य का ज्ञान असम्भव, अकल्पनीय है, प्राचीन समय से शिक्षित, ज्ञानी, परमात्मा को जानने वाले, कलम एंव बुद्धि के धनी, समाज को सत्य के मार्ग पर अग्रसर करने वाले, रक्षा करने वाले, अंधकार से प्रकाश में लाने वाले, सही शिक्षा एंव संस्कार पर समान बल देने वाले, मनुष्य को अपने ज्ञान के माध्यम से न्याय के मार्ग पर चलते हुए, परमात्मा से जुड़ने का मार्ग गुरुओं ने बताया है —

“बिना गुरु ज्ञान कहाँ, जहॉं गुरु हर धाम वहां”

संस्कार मनुष्य को आत्मसंयमी, त्यागी एंव अहंकार रहित बना देता है। सही ज्ञान के अभाव में मनुष्य का जीवन कष्टों से घिर गया है, खुशी, शांति लुप्त हो गई। आज मनुष्य के भीतर संवेदना, प्रेम, त्याग, भाइचारे की कमी देखी जाती है। अमानवीय कार्य करने में थोड़ी भी झिझक नहीं होती। एक दूसरे का शोषण करना, अपना जन्म सिध्द अधिकार समझते हैं। यह दोष गलत शिक्षा, गलत परिवेश एंव गलत संस्कार का है।

दूसरे की निन्दा करना, कृतघ्नता, दूसरों के गुप्त भेद को खोलना, निष्ठुरता दिखाना, निर्दयी होना, परायी स्त्री का सेवन करना, दूसरों का धन हड़प लेना, अपवित्र रहना, धूर्त्त बनकर मनुष्य को ठगना, मनुष्यों के प्राण लेना, पद के अहंकार में अंधा हो जाना, किसी को दुःख देकर आनन्दित होना, गलत शिक्षा देकर दूसरे को भ्रमित करना, आजकल मनुष्य की प्रवृति बन गई, क्योंकि वर्त्तमान समय में इंसान वेद के उपदेशों को भूल गया।

वेद में बताए गये मार्ग को कुछ स्वार्थी, अयोग्य लोगों ने गलत ढंग से प्रस्तुत किया, षडयंत्र के तहत, लोग भ्रमित होते चले गये, शिक्षा का मतलब ही बदल गया। जब बीज ही खराब हो तो फसल कैसी होगी। सही शिक्षा लुप्त होती गई, मनुष्य के बीच ऊँच-नीच, बड़े-छोटे, छूआ-छूत का दरार पैदा हो गया। वेद को पढ़ने से वंचित कर दिया गया। सत्य को दबाकर, असत्य का प्रसार होने लगा। विद्वानों की अनदेखी होने लगी।

कुछ लोग ठेकेदार बन गए, लेकिन समय का चक्र बदलता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, श्री अरविन्द घोष, महर्षि महेश योगी, श्री परमहंस योगानन्द जी, श्री ठाकुर अनुकूल चन्द्र जी, गुरु नानक जी, सम्पूर्ण मानव जाति को विनाश से बचाने के लिए एक सूत्र में बॉंधकर सही मार्ग दिखाने का कार्य किया।

वेद स्वतः प्रमाण है।

वेद स्वतः प्रमाण है— ऐसी दृष्टि रखना, गुरु श्रेष्ठ, देवता, ऋषि, महात्माओं, माता-पिता एंव बड़ों का सत्कार करना, अच्छे कर्मों का अभ्यास करना, सब के प्रति मित्र भाव रखना। लेकिन आज के परिवेश में ये सभी चीजें विलुप्त होती जा रही है। इंसान कुत्ते को गोद में बिठाकर प्यार करता नजर आता है लेकिन इंसान से, अपनों से, छूआछूत एंव नफरत का भाव रखता है। अहंकार में दूरी बनाकर रखने में शान समझता है। कोई भी धर्म छूआछूत या नफरत फैलाने की इजाजत नहीं देता।

कोई भी पवित्र, स्वच्छ इंसान किसी भी धर्मस्थल पर जाने का अधिकारी है। “रोको मत, जाने दो, रोको, मत जाने दो।” इन दोनों वाक्यों में जो फर्क है, वही फर्क कुछ लोगों ने पैदा किया, समाज को बॉंटने के लिए, अपनी जीविका चलाने के लिए, अपनी रोटी सेंकने के लिए, नफरत की बीज बोने के लिए। नींव की ईंट कभी दिखाई नहीं पड़ती। गुनाहगार हमेशा पर्दे के पीछे रहना चाहता है, सत्य का ज्ञान नहीं होने के कारण लोग निर्दोष को ही गुनहगार मान लेते हैं।

आज मंदिर, गुरुद्वारा, जैन मंदिर, बौद्ध मंदिर, संतसंग, चर्चे हर जगह है, संख्या में काफी वृद्धि हो गई लेकिन गलत विचार के कारण गुनाहगारों की संख्या बढ़ती जा रही है। धार्मिक स्थल पर जाने के बाद बहुत शकुन, शांति मिलती है क्योंकि वहां विचार पवित्र हो जाता है।

अगर सत्य का ज्ञान हो तो घर में अकेले बैठकर आंख बंद कर लेने के बाद जो शांति मिलती है वह कहीं नहीं मिलेगी। भगवान तो दिल में है, हर इंसान भगवान का ही अंश है, हम सभी परमपिता परमेश्वर की संतान है, यह कैसी बिडम्बना है कि जिस भगवान ने इंसान को पैदा किया, वही इंसान भगवान पैदा करे, यह असंभव ही नहीं, अनुचित प्रतीत होता है, यह एक विचार है। भगवान तो सर्वप्रिय, सर्वमान्य हैं, उनके बिना इच्छा, एक पत्ता भी नहीं हिल सकता, वह सर्वशक्तिमान है। प्राण डालने का अधिकार केवल भगवान को है, इंसान, प्राण नहीं डाल सकता। जन्म और मृत्यु केवल भगवान के हाथ में है।

हर सम्प्रदाय या कुछ गुरु केवल अपनी बात थोपने का प्रयास करते हैं। खुद को ही भगवान घोषित कर देते हैं। शिक्षित, अशिक्षित सभी पूजने लगते है, इंसान कभी भगवान हो ही नहीं सकता। अच्छा बनने के लिए, बुराई को त्यागना पड़ता है। कोई भी इंसान धर्म का सही पालन करेगा, वह स्वतः बुराइयों से दूर हो जायेगा।

धरती पर लाखों धर्म स्थल हैं, लोगों की बहुत आस्था है फिर व्यभिचार, चोरी, बेईमानी, ईर्ष्या, जलन, कत्ल दंगे, फसाद क्यों, भगवान शिव, कृष्ण, मॉं दुर्गा, चित्रगुप्त, भगवान महावीर, बौद्ध, गुरु नानक, गुरु गोविंद सिंह के उपासक, आराधना करने वाले खुद ही संयमित होकर परोपकार करते हुए जीवन व्यतीत करने लगेंगे। लेकिन अशिक्षा और अज्ञानता के कारण लोग मार्ग से भटक गये हैं।

जो करना है, वह नहीं करते, जो नहीं करना है वो अवश्य करते हैं। सही कुलीन गुरु, सही मार्ग दर्शन देने वाले, भटके हुए को सही रास्ते पर लाने वाले, वेद का सही अर्थ समझाने वाले, आडम्बर से दूर रहने की सलाह देने वाले, शोषण से मुक्त रहने की प्रेरणा देने वाले गुरु ही सत्य का ज्ञान दे सकते हैं। सभी गुरुजनों को कोटी-कोटी नमन, सत्य को जाने, असत्य नरक का द्वार खोलता है। चूहा-सांप, मोर-बैल, शेर सभी एक साथ एक दूसरे का दुश्मन होते हुए भी, एक साथ शिव परिवार में रहते हैं। प्रभु चरण में समर्पित होने के बाद, अहंकार स्वतः गायब हो जाता हैं। जहाँ प्रेम, वहाँ भय कैसा, ये है सत्य का ज्ञान।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — ज्ञान, ध्यान और योग किसी भी इंसान के जीवन में सदैव ही खुशियाँ ले आती है। वेद, पुराण, श्रीमद भागवत गीता, रामायण, रामचरित मानस, का पाठ करना जरूरी है। गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता, समय-समय पर धर्म की रक्षा के लिए, महान आत्माये धरती पर आती रहती है, और धर्म का रक्षा करती हैं। अपने बच्चों को बचपन से ही धर्म और शास्त्र का ज्ञान दे, अच्छा संस्कार दे, तभी आपका बच्चा आगे चलकर, देश और समाज का भला करेगा।

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यह लेख (सत्य का ज्ञान।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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ज्ञान अहमियत रखता है ना की अंक।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ ज्ञान अहमियत रखता है ना की अंक। ♦

आजकल परीक्षा में ज्यादा अंक लाने की प्रवृत्ति दिन – प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अभिभावक चाहते हैं कि मेरे बच्चे पूरे के पूरे परीक्षा में अंक लाएं। चारों तरफ बस होड़ लगी हुई है एक – दूसरे से ज्यादा अंक लाने की। इस बात पर जोर क्यों नहीं दिया जाता कि अंको की अहमियत तभी है जब हमें पूरे पाठ्यक्रम का ज्ञान होगा। कई बार ऐसा होता है, आप लोगों ने सुना भी होगा और देखा भी है, कम अंक लाने वाला विद्यार्थी जीवन में सफल हो जाता है और हमेशा कक्षा में अव्वल रहने वाला विद्यार्थी कई बार पीछे छूट जाता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि दोनों ने पढ़ाई नहीं की दोनों ने पढ़ाई की होती है परंतु कई बार बच्चे सिर्फ किताबों तक ही सीमित रह जाते हैं। वास्तविकता से उन्हें कोई लेना – देना नहीं होता।

बच्चों को किताबी कीड़ा बनाने की बजाए शिक्षा के साथ-साथ उन्हें खेलकूद के क्षेत्र में भी योगदान देने की कहे। ताकि बच्चे हर क्षेत्र में अपने हाथ आजमा ले और जीवन में तनाव की स्थिति पैदा ना हो क्योंकि ज्यादा अंक प्राप्त करने की स्थिति में बच्चे चिड़चिड़े और हठी हो जाते हैं। कई बार बच्चे अवसाद से ग्रसित होकर छोटी सी उम्र में ही परेशान रहने लगते हैं।

किसी का कहना नहीं मानते और कई बार तो बच्चे मौत को भी गले लगा रहे हैं, क्योंकि ज्यादा अंक लाने की प्रवृत्ति उनके अंदर इतना घर कर चुकी होती है कि उनको ज्यादा अंकों के सिवा कुछ नहीं दिखाई देता। अगर कई बार परीक्षा में बच्चे का पेपर अच्छा नहीं होता तो बच्चा सोचता है अब मेरे अभिभावक क्या बोलेंगे? हमारे पड़ोसी क्या बोलेंगे?

जिससे वह तनाव में आकर यह कदम उठा लेता है। बच्चों को सिर्फ ज्यादा अंक लाने के लिए दबाव न डालें उन्हें अपनी मर्जी से अपने विषय लेने दे और उन्हें ज्यादा अंक लाने की बजाय यह समझाएं कि आपको अच्छे से पढ़ना है अंक चाहे जितने भी आ जाए। पहले हमारे समय में बच्चे के ऊपर इतना दबाव नहीं होता था। पहले पढ़ाई के साथ – साथ बच्चे खेलकूद, घरेलू कार्यों में अपना योगदान देते थे। दादा – दादी, नाना – नानी के पास बैठते थे। जो आज बिल्कुल खत्म होता जा रहा है।

बचपन अच्छे से जीते थे, आजकल तो बच्चों ने पढ़ना शुरू किया नहीं कि मां-बाप खींचना शुरू कर देते हैं कि तुझे अच्छे नंबर लाने हैं सबसे ज्यादा नंबर लाने है। बस इसी की दौड़ में लगे रहते हैं। कई बार तो ऐसा होता है सोसाइटी के दूसरे बच्चे और उनके दोस्त के बच्चे अच्छे नंबर ला रहे। तो अभिभावक चाहते हैं उनके बच्चे भी ऐसे ही नंबर लाए। अपना नाम ऊपर करने के लिए या दिखावा करने के लिए लोगों के सामने यह बोलते हैं हमारे बच्चे के कितने नंबर आए।

एक बच्चे का दूसरे बच्चे के साथ तुलना करते हैं जो बिल्कुल गलत है। क्योंकि सब बच्चों में अलग-अलग प्रतिभाएं होती हैं। क्या हमारे अभिभावकों ने कभी ऐसा किया था? जो आज हम अपने बच्चों के साथ कर रहे हैं।

फूल से मासूम है,
जी लेने दो उन्हें बचपन।
हंसने दो, खेलने दो, मुस्कुराने दो,
खुली हवा में सांस लेने दो।
एक बार आता है बचपन,
चला गया, लौट कर कभी नहीं आएगा।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आप कोई भी कार्य करे, हर कार्य में प्रैक्टिकल ज्ञान ही मुख्य होता, अगर आपको प्रैक्टिकल कार्य की जानकारी नहीं है तो आप कभी भी उस कार्य को अच्छे से नहीं कर पाएंगे। इसलिए ज्ञान अहमियत रखता है ना की अंक। फंडामेंटल प्रैक्टिकल ज्ञान पर फोकस करे और जितना हो सके अपने आपको उतना अच्छा व्यावहारिक प्रैक्टिकल ज्ञान पर ध्यान दे तभी आप कोई भी कार्य अच्छे से कर पाएंगे। इस संसार में आप जिधर भी नज़र घुमाएं आपको बहुत सारे ऐसे लोग मिल जायेंगे जिनके पास अच्छा नंबर और डिग्री नहीं है लेकिन वो आज के समय में अच्छा पैसा कमा रहे है, लेकिन जिनके पास अच्छा नंबर भी था और अच्छा डिग्री भी लेकिन आज भी बहुत मुश्किल से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। इसलिए अपने बच्चो पर कभी भी ये दबाव ना बनाये की अच्छा नंबर लाओ, इसकी जगह अपने बच्चो को समझाए की अच्छे से फंडामेंटल प्रैक्टिकल ज्ञान पर फोकस करे, और किसी भी विषय को प्रैक्टिकल रूप से अच्छे से समझे, जो उसे जीवन पर्यन्त लाभ पहुँचाये।

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यह लेख (ज्ञान अहमियत रखता है ना की अंक।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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पक्षियों की समझदारी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पक्षियों की समझदारी। ♦

अरे ! तोता, कबूतर, मैना सुना क्या तुमने आज। बड़ी चिड़िया आई मेरे घोसलें के पास मुझे गिरा कर खुद बैठ गई और बोली यह घर मेरा है। भाग जा यहां से। अच्छा बहन यह तो बहुत बुरा हुआ। हमने देखा था तूने कितनी मेहनत लगन से घोंसला बनाया था। हां इसी बात का तो रोना है पर हम छोटी चिड़िया कुछ कर भी तो नहीं सकते। उस बड़ी चिड़िया के सामने तोता, मैना, कबूतर सब ने कहा क्यों नहीं कर सकते हम मिलकर कोई तरकीब ढूंढते हैं। सभी मिलकर बड़ी चिड़िया को काली चिड़िया के घोसलें से निकालने की तरकीब सोचने लगे। फिर कबूतर को एक आईडिया आया। हम सब जैसे ही बड़ी चिड़िया तेरे घोंसले आएगी उसे देखकर बातें करेंगे कि अच्छा हुआ काली बहन जो तू इस घोसलें से निकल गई।

वरना आज तो। हां-हां क्यों नहीं मैं यह जरूर काम आएगा। कुछ समय पश्चात जैसे बड़ी चिड़िया घोंसले में आई। तोता, मैना, कबूतर चिड़िया जोर-जोर से बातें करने लगे काली चिड़िया अच्छा हुआ जो समय रहते घोसलें को छोड़ दिया। नहीं तो आज! इतना बोल कर सभी चुप हो गए। तभी बड़ी चिड़िया बोली नहीं तो क्या। कुछ नहीं बड़ी चिड़िया हम तो बस ऐसे ही। ऐसे ही क्या बोल रहे हो! खुल कर बोलो। नहीं तो तुम सब को मारकर खा जाऊंगी। हां हां हां बड़ी चिड़िया अभी बताते हैं।

हमने क्या देखा अभी कुछ समय पहले ही सांप आया था उसने घोंसले के चारो ओर देखा और देख कर बोला कोई नहीं चिड़िया अब तू घोसले में नहीं है जैसे ही आएगी उसे खा जाऊंगा। यह देखो सांप की केचूंली भी है। दिखाओ दिखाओ किधर किधर डर के मारे बड़ी चिड़िया का बुरा हाल हो रहा था। देखो हां हां ये तो सांप की केचूंली है।

सभी मन ही मन हंस रहे थे क्योंकि उन्होंने कहीं जंगल से केचूंली को लाकर रख दिया था। और वह भी टूटी-फूटी परंतु बड़ी चिड़िया ने तो डर के मारे देखा भी नहीं की कितनी पुरानी है और टूटी हुई भी है केचूंली।

देखते ही फुर से उड़ गई और सभी पक्षियों को बोली तुम भी भाग जाओ वरना सब के सब मारे जाओगे। सांप सब को खा जाएगा। सभी जोर-जोर से हंस रहे थे और बड़ी चिड़िया का मजाक बना रहे थे। परंतु सब की समझदारी से काली चिड़िया का घोंसला बच गया।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कहानी के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हसमझदारी और सूझबूझ से हर समस्या का समाधान किया जा सकता है। इसलिए जब भी जीवन में कोई समस्या आये तो घबराये नहीं, समझदारी और सूझबूझ से उस समस्या का समाधान निकाले। इस पृथ्वी पर एक भी ऐसी समस्या नहीं जिसका समाधान न हो, इसलिए धैर्य के साथ समझदारी और सूझबूझ से हर समस्या का समाधान करे। शांत मन से विचार करे आपको समाधान जरूर मिलेगा।

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यह कहानी (पक्षियों की समझदारी।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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भारतीय शिक्षा का प्राचीन स्वरूप : एक विवेचन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भारतीय शिक्षा का प्राचीन स्वरूप : एक विवेचन। ♦

भारतीय शिक्षा पद्धति, भारतीय ज्ञान-विज्ञान, भारतीय भाषाएं सदैव विश्व को ज्ञान देती आई है एवं हर दृष्टि से अग्रणी रही है। इसका प्रमाण हमें कई जगह पर दिखाई देता है। परंतु हमारी शिक्षा पद्धति लॉर्ड मैकाले की नीतियों पर ही आधारित है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम अपने ज्ञान को अपनी भाषा में स्थापित नहीं कर पाए हैं। परंतु यह सत्य है कि जितना ज्ञान, जितनी तकनीकी हमारे ग्रंथों में, हमारे उपनिषदों में है उतना किसी भी विदेशी भाषाओं में हो ही नहीं सकता।

हमारे चारों वेदों में दुनिया का ऐसा कोई विषय नहीं है जिसके बारे में इन में वर्णन ना मिलता हो। परंतु हम इस सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं और यह ज्ञान सार्वजनिक ना होने के कारण हमारी युवा पीढ़ी यह समझती है कि विज्ञान और तकनीकी में विदेशी हमसे आगे हैं जबकि सत्य कुछ और है।

इसी का यह प्रमाण मैं साझा करना चाह रही हूं कि मैकाले के भारत आगमन के पूर्व अपने देश में विश्वविद्यालय और गुरुकुलों की व्यवस्था इतनी थी कि प्रत्येक जनपद में कम से कम एक गुरुकुल था। लगभग साढे सात लाख गुरुकुल देश में थे। मॉनिटोरियल सिस्टम से अध्यापन होता था और विदेशों से भी लोग पढ़ने के लिए भारत आते थे।

उस समय में भारत में लगभग 13 विश्वविद्यालय थे जिन की जानकारी इतिहास में उपलब्ध होती है यह 13 ज्ञात विश्वविद्यालय हैं…

प्राचीन भारत के 13 विश्वविद्यालय, जहां पढ़ने आते थे दुनियाभर के छात्र। तुर्की मुगल आक्रमण ने सब जला दिया। बहुत हिन्दू मंदिर लुटे गये। नहीं तो मेगस्थनीज अलविरुनी इउ एन सांग के ग्रंथों में अति समृद्ध भारत के वर्णन है।

वैदिक काल से ही भारत में शिक्षा को बहुत महत्व दिया गया है। इसलिए उस काल से ही गुरुकुल और आश्रमों के रूप में शिक्षा केंद्र खोले जाने लगे थे। वैदिक काल के बाद जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया। भारत की शिक्षा पद्धति भी और ज्यादा पल्लवित होती गई। गुरुकुल और आश्रमों से शुरू हुआ शिक्षा का सफर उन्नति करते हुए विश्वविद्यालयों में तब्दील होता गया। पूरे भारत में प्राचीन काल में 13 बड़े विश्वविद्यालयों या शिक्षण केंद्रों की स्थापना हुई।

भारत पूरे विश्व में शिक्षा का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध केंद्र था।

8 वी शताब्दी से 12 वी शताब्दी के बीच भारत पूरे विश्व में शिक्षा का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध केंद्र था। गणित, ज्योतिष, भूगोल, चिकित्सा विज्ञान के साथ ही अन्य विषयों की शिक्षा देने में भारतीय विश्वविद्यालयों का कोई सानी नहीं था।

हालांकि आजकल अधिकतर लोग सिर्फ दो ही प्राचीन विश्वविद्यालयों के बारे में जानते हैं पहला नालंदा और दूसरी तक्षशिला। ये दोनों ही विश्वविद्यालय बहुत प्रसिद्ध थे। इसलिए आज भी सामान्यत: लोग इन्हीं के बारे में जानते हैं, लेकिन इनके अलावा भी ग्यारह ऐसे विश्वविद्यालय थे जो उस समय शिक्षा के मंदिर थे। आइए आज जानते हैं प्राचीन विश्वविद्यालयों और उनसे जुड़ी कुछ खास बातों को…

1. नालंदा विश्वविद्यालय (Nalanda University)

Nalanda University History in Hindi

यह प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण और विख्यात केन्द्र था। यह विश्वविद्यालय वर्तमान बिहार के पटना शहर से 88.5 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व और राजगीर से 11.5 किलोमीटर में स्थित था। इस महान बौद्ध विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके प्राचीन वैभव का बहुत कुछ अंदाज करा देते हैं।

सातवीं शताब्दी में भारत भ्रमण के लिए आए चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस विश्वविद्यालय के बारे में जानकारी मिलती है। यहां 10,000 छात्रों को पढ़ाने के लिए 2,000 शिक्षक थे। इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम 450-470 को प्राप्त है। गुप्तवंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा। इसे महान सम्राट हर्षवर्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी यहां शिक्षा ग्रहण करने आते थे।

अंतरर्राष्ट्रीय ख्याति

इस विश्वविद्यालय की नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक अंतरर्राष्ट्रीय ख्याति रही थी। सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र में बना हुआ यह विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना था। इसका पूरा परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था। जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य द्वार था। उत्तर से दक्षिण की ओर मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक भव्य स्तूप और मंदिर थे। मंदिरों में बुद्ध भगवान की सुन्दर मूर्तियां स्थापित थीं। केन्द्रीय विद्यालय में सात बड़े कक्ष थे और इसके अलावा तीन सौ अन्य कमरे थे।

इनमें व्याख्यान हुआ करते थे। अभी तक खुदाई में तेरह मठ मिले हैं। वैसे इससे भी अधिक मठों के होने ही संभावना है। मठ एक से अधिक मंजिल के होते थे। कमरे में सोने के लिए पत्थर की चौकी होती थी। दीपक, पुस्तक आदि रखने के लिए खास जगह बनी हुई है। हर मठ के आंगन में एक कुआं बना था। आठ विशाल भवन, दस मंदिर, अनेक प्रार्थना कक्ष और अध्ययन कक्ष के अलावा इस परिसर में सुंदर बगीचे व झीलें भी थी। नालंदा में सैकड़ों विद्यार्थियों और आचार्यों के अध्ययन के लिए, नौ तल का एक विराट पुस्तकालय था। जिसमें लाखों पुस्तकें थी।

2. तक्षशिला विश्वविद्यालय (Takshashila University)

Takshashila University Story in Hindi

तक्षशिला विश्वविद्यालय की स्थापना लगभग 2700 साल पहले की गई थी। इस विश्विद्यालय में लगभग 10500 विद्यार्थी पढ़ाई करते थे। इनमें से कई विद्यार्थी अलग-अलग देशों से ताल्लुुक रखते थे। वहां का अनुशासन बहुत कठोर था। राजाओं के लड़के भी यदि कोई गलती करते तो पीटे जा सकते थे। तक्षशिला राजनीति और शस्त्रविद्या की शिक्षा का विश्वस्तरीय केंद्र थी। वहां के एक शस्त्रविद्यालय में विभिन्न राज्यों के 103 राजकुमार पढ़ते थे।

आयुर्वेद और विधिशास्त्र के इसमे विशेष विद्यालय थे। कोसलराज प्रसेनजित, मल्ल सरदार बंधुल, लिच्छवि महालि, शल्यक जीवक और लुटेरे अंगुलिमाल के अलावा चाणक्य और पाणिनि जैसे लोग इसी विश्वविद्यालय के विद्यार्थी थे। कुछ इतिहासकारों ने बताया है कि तक्षशिला विश्विद्यालय नालंदा विश्वविद्यालय की तरह भव्य नहीं था। इसमें अलग-अलग छोटे-छोटे गुरुकुल होते थे। इन गुरुकुलों में व्यक्तिगत रूप से विभिन्न विषयों के आचार्य विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करते थे।

3. विक्रमशिला विश्वविद्यालय (Vikramshila University)

Vikramshila University in Hindi

विक्रमशीला विश्वविद्यालय की स्थापना पाल वंश के राजा धर्म पाल ने की थी। 8 वी शताब्दी से 12 वी शताब्दी के अंंत तक यह विश्वविद्यालय भारत के प्रमुख शिक्षा केंद्रों में से एक था। भारत के वर्तमान नक्शे के अनुसार यह विश्वविद्यालय बिहार के भागलपुर शहर के आसपास रहा होगा।

कहा जाता है कि यह उस समय नालंदा विश्वविद्यालय का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी था। यहां 1000 विद्यार्थीयों पर लगभग 100 शिक्षक थे। यह विश्वविद्यालय तंत्र शास्त्र की पढ़ाई के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता था। इस विषय का सबसे मशहूर विद्यार्थी अतीसा दीपनकरा था, जो की बाद में तिब्बत जाकर बौद्ध हो गया।

4. वल्लभी विश्वविद्यालय (Vallabhi University)

Vallabhi University History in Hindi

वल्लभी विश्वविद्यालय सौराष्ट्र (गुजरात) में स्थित था। छठी शताब्दी से लेकर 12 वी शताब्दी तक लगभग 600 साल इसकी प्रसिद्धि चरम पर थी। चायनीज यात्री ईत- सिंग ने लिखा है कि यह विश्वविद्यालय 7 वी शताब्दी में गुनामति और स्थिरमति नाम की विद्याओं का सबसे मुख्य केंद्र था। यह विश्वविद्यालय धर्म निरपेक्ष विषयों की शिक्षा के लिए भी जाना जाता था। यही कारण था कि इस शिक्षा केंद्र पर पढ़ने के लिए पूरी दुनिया से विद्यार्थी आते थे।

5. उदात्त पुरी विश्वविद्यालय (Odantapuri University)

Odantapuri University History in Hindi

उदात्तपुरी विश्वविद्यालय मगध यानी वर्तमान बिहार में स्थापित किया गया था। इसकी स्थापना पाल वंश के राजाओं ने की थी। आठवी शताब्दी के अंत से 12 वी शताब्दी तक लगभग 400 सालों तक इसका विकास चरम पर था। इस विश्वविद्यालय में लगभग 12000 विद्यार्थी थे।

6. सोमपुरा विश्वविद्यालय (Somapura Mahavihara)

Somapura Mahavihara History in Hindi

सोमपुरा विश्वविद्यालय की स्थापना भी पाल वंश के राजाओं ने की थी। इसे सोमपुरा महाविहार के नाम से पुकारा जाता था। आठवीं शताब्दी से 12 वी शताब्दी के बीच 400 साल तक यह विश्वविद्यालय बहुत प्रसिद्ध था। यह भव्य विश्वविद्यालय लगभग 27 एकड़ में फैला था। उस समय पूरे विश्व में बौद्ध धर्म की शिक्षा देने वाला सबसे अच्छा शिक्षा केंद्र था।

7. पुष्पगिरी विश्वविद्यालय (Pushpagiri University)

Pushpagiri University History in Hindi

पुष्पगिरी विश्वविद्यालय वर्तमान भारत के उड़ीसा में स्थित था। इसकी स्थापना तीसरी शताब्दी में कलिंग राजाओं ने की थी। अगले 800 साल तक यानी 11 वी शताब्दी तक इस विश्वविद्यालय का विकास अपने चरम पर था। इस विश्वविद्यालय का परिसर तीन पहाड़ों ललित गिरी, रत्न गिरी और उदयगिरी पर फैला हुआ था।

नालंदा, तशक्षिला और विक्रमशीला के बाद ये विश्वविद्यालय शिक्षा का सबसे प्रमुख केंद्र था। चायनीज यात्री एक्ज्युन जेंग ने इसे बौद्ध शिक्षा का सबसे प्राचीन केंद्र माना। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इस विश्ववविद्यालय की स्थापना राजा अशोक ने करवाई थी।

अन्य विश्वविद्यालय (Other Universities)

प्राचीन भारत में इन विश्वविद्यालयों के अलावा जितने भी अन्य विश्वविद्यालय थे। उनकी शिक्षा प्रणाली भी इन्हीं विश्वविद्यालयों से प्रभावित थी। इतिहास में मिले वर्णन के अनुसार शिक्षा और शिक्षा केंद्रों की स्थापना को सबसे ज्यादा बढ़ावा पाल वंश के शासको ने दिया।

8. जगददला विश्वविद्यालय (Jagaddala University)

पश्चिम बंगाल में पाल राजाओं के समय से भारत में अरबों के आने तक।

9. नागार्जुनकोंडा विश्वविद्यालय (Nagarjunakonda University)

आंध्र प्रदेश में।

10. वाराणसी विश्वविद्यालय (Varanasi University)

उत्तर प्रदेश में आठवीं सदी से आधुनिक काल तक।

11. कांचीपुरम विश्वविद्यालय (Kancheepuram University)

तमिलनाडु में।

12. मणिखेत विश्वविद्यालय (Manikhet University)

कर्नाटक में।

13. शारदा पीठ (Sharda Peeth)

कश्मीर में।

महर्षि वैदिक सेवा संस्थानम्
गीता भवन मन्दिर, पुण्डरीक तीर्थ पुण्डरी।

यह केवल 13 ही विश्वविद्यालयों की जानकारी है। इसके अतिरिक्त हमारे देश में इतना कुछ है वह हम एक जीवन में भी नहीं समझ पाएंगे। हमारा ज्ञान, हमारी संपदा, हमारी भाषाएं, हमारी बोलियां, हमारी आंचलिक सभ्यता-संस्कृति, हमारे संस्कार, हमारे मूल्य, हमारी नैतिकता हमारी धरोहर हैं जो दुनिया की किसी भी देश में नहीं पाई जा सकती। इसीलिए भारत सदैव अग्रगण्य रहा है और भविष्य में भी अग्रगण्य रहेगा।

अब तो सभी को भविष्य सामने नजर आ ही रहा है कि पूरे विश्व के सामने जिस तरह सभ्यता, संस्कृति, हमारे धर्म का प्रचार हमारी सरकार द्वारा किया जा रहा है, वह सराहनीय है। अपने मूल्यों को, अपनी पहचान को हम दुनिया के सामने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ ला रहे हैं। यह हम सभी भारत वासियों के लिए गर्व की बात है। इसलिए हमें अपने भारतवासी होने पर गर्व होना चाहिए।

जयतु संस्कृतम्, जयतु भारतम्।
संकलन एवं विश्लेषण।

हर हर महादेव…….हर हर महादेव

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

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  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — यह केवल 13 ही विश्वविद्यालयों की जानकारी है। इसके अतिरिक्त हमारे देश में इतना कुछ है वह हम एक जीवन में भी नहीं समझ पाएंगे। हमारा ज्ञान, हमारी संपदा, हमारी भाषाएं, हमारी बोलियां, हमारी आंचलिक सभ्यता-संस्कृति, हमारे संस्कार, हमारे मूल्य, हमारी नैतिकता हमारी धरोहर हैं जो दुनिया की किसी भी देश में नहीं पाई जा सकती। इसीलिए भारत सदैव अग्रगण्य रहा है और भविष्य में भी अग्रगण्य रहेगा।

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यह लेख (भारतीय शिक्षा का प्राचीन स्वरूप : एक विवेचन।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (डबल वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

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चेस्ट नंबर 13 हाजिर हो।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ चेस्ट नंबर 13 हाजिर हो। ♦

कलम वाला सैनिक

दूसरे हाथ में बंदूक थामें “एक गोली एक दुश्मन” और “SHOOT TO KILL” जैसे उद्देश्य में प्रशिक्षित होने के बावजूद एक सैनिक जिंदगी की नयी परिभाषायें और नये आयाम लिख रहा है। वह न सिर्फ राष्ट्र की एकता, अखंडता व अस्मिता की बाहरी दुश्मनों से रक्षा करता है बल्कि प्रकृति व प्रेम के गीत गाता है, जनमानस की आवाज बनता है और समाज में फैली कुरीतियों, विषमताओं व प्रायोजित भ्रष्टाचार के खिलाफ सजग प्रहरी बन आवाज बुलंद करता है। बंदूक के बैरल एवं सरहद के आखिरी छोर से निकली हुई प्यार, शांति, नफरत, फरेब, रिश्ते, मजबूरी, देशप्रेम, कर्तव्य व जिम्मेदारियों का एक भावात्मक व कलात्मक काव्य रूप है यह किताब और नायक है…⇒ “चेस्ट नंबर 13”

About the Book: क्यों पढ़ें यह किताब….?

एक सैनिक के हाथ में बंदूक ही नहीं कलम भी हो सकती है, बंदूक के नाल से भी गीत व गजल निकल सकती है, सरहद के आखिरी पत्थर पे भी कविताएँ लिखी जा सकती है, शब्द भी राष्ट्र की रक्षा और अखंडता के लिए गोला-बारुद बन सकता है और एक सैनिक शांतिकाल में भी कई मोर्चों पर लड़ता ही रहता है – बस जिगरा और जज्बा होना चाहिए। यही इस किताब का मूल कथ्य और संदेश है। यकीनन यह किताब आपको विचारों और भावनाओं के तल पर ले जाकर खुद के अंदर झाँकने व कुछ सोचने तथा करने पर मजबूर कर देगी।

About the Author:

शैलेश कुमार मिश्र “शैल” का जन्म मधुबनी, बिहार के एक मध्यवर्गीय ब्राह्मण परिवार में 1975 में हुआ। इन्होंने आपदा प्रबंधन में स्नातकोत्तर किया है। संयुक्त परिवार और गाँव की मिट्टी में लोट पोट हो जिंदगी के कई उतार-चढ़ावों को जीते एवं आत्मसात करते हुए 2001 में सीमा सुरक्षा बल (BSF) में सहायक कमांडेंट के पद पर भर्ती हो गए एवं फिलहाल द्वितीय कमान अधिकारी के रूप में इंदौर में पदस्थापित हैं। लेखन इनका शौक रहा है। पठन-पाठन, हिंदी संगीत, खेलकूद, पर्यटन, मंच संचालन, समाजसेवा इत्यादि में गहरी रूचि है। पाँच कविता संग्रह एवं विभागीय किताब अभी तक इनके द्वारा लिखी जा चुकी है।

संयुक्त राष्ट्रसंघ के तत्वावधान में अफ्रीका में शांति सेना के रूप में कार्यानुभव, गरीब बच्चों को छुट्टियों में मुफ्त पढ़ाना एवं गाँव में पुस्तकालय की स्थापना सह मुफ्त-संचालन, कैरियर कांउसिलिंग, नशापान के विरुद्ध जागरूकता अभियान इनका सामाजिक योगदान एवं उत्तम सेवा के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ का 2 पदक एवं महानिदेशक सीमा सुरक्षा बल द्वारा 3 अलंकरण खास व्यावसायिक उपलब्धियाँ रही है।

खुश रहें, खुश रखें और यथाशक्ति सामाजिक समरसता तथा राष्ट्रनिर्माण में योगदान इनकी जिंदगी का फलसफा है।

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Reading Age: 11 Years and up

Jai Hind – जय हिन्द

♦ शैलेश कुमार मिश्र (शैल) – मधुबनी, बिहार ♦

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