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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिन्दी साहित्य

नायक – नायिका।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नायक – नायिका। ♦

भारत में युगों से महिलाओं का गौरव गान किया जाता है।

“यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता।”

अर्थात:— जहां नारी का पूजन और सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं।

महा राष्ट्रीय में कहा गया है कि —

‘नारी जनमांची पुण्याई ‘!

श्री हरि चरित्रामृत सागर, में आधारानंद स्वामी लिखते हैं कि सत्संग में महिलाएं भी बहुत उच्च स्तर की थीं।

स्वामीनारायण संप्रदाय में भक्ति धर्म बैरागी एवं ज्ञान से युक्त बहुत सी ऐसी स्त्री – भक्त थीं, जिनकी तुलना पौराणिक युग की स्त्री भक्तों से किया जा सकता है। अत्यंत ही प्रेम पूर्वक मानसी – पूजा करतीं और मार्ग में चलते समय किसी पुरुष के सामने दृष्टि नहीं करी थीं। (भक्त रत्न महिलाएं पृ १३ भाग ४)!

महिला शब्द का प्रयोग वयस्क स्त्रियों के लिए किया जाता है।

वेदों – पुराणों में कहा गया है कि —

“यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रफला क्रिया।।”

जिस कुल में स्त्री की पूजा होती है उस कुल पर देवता प्रसन्न रहते हैं और जहां स्त्रियों की पूजा, वस्त्र भूषण, तथा मधुर वचन आदि से सत्कार नहीं किया जाता उस कुल का सभी कर्म विफल हो जाता है।

पुरुषों में आठ गुण ख्याति बढ़ाते हैं —

बुद्धि, कुशलता, इंद्रिय निग्रह, शास्त्र ज्ञान, पराक्रम, आधिक नहीं बोलना, शक्ति के अनुसार दान और कृतज्ञता।

‘अष्टौ गुणा: पुरुषं दीपयन्ति,
प्रज्ञा च कौल्यं च दम: श्रुतं च।
पराक्रम श्चाबहुभाषिता च,
दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च।।(विदुर नीति पृ २८)

वेद काल में नारी — वेद काल में नारियों की सभी कार्यों में भूमिका, पत्नी को सम्मान मिलता था। समान अधिकार प्राप्त था नारियों को।

ऋग्वेद काल में नारियों की दशा — ऋग्वेद काल में स्त्रियों को सर्वोच्च शिक्षा दी जाती थी। नारियां शास्त्र और कला के क्षेत्र में निपुणता की परिचायक होती थी।

प्रकांड विद्वान स्त्रियां — वैदिक काल में भारतीय नारियों में विदुषी लोप मुद्रा – जो अगस्त की पत्नी थीं।

विदुषी प्रीति येयी — जो महर्षि दाधीच की धर्मपत्नी थीं।

विदुषी सुलभा — यह जनक राज की विदुषी थीं। जिसने जनक को ही शास्त्रार्थ में हरा दिया था।

ब्रह्मवाहिनी रोमशा — बृहस्पति की पुत्री और भाव भव्य की धर्मपत्नी थीं। इन्होंने ज्ञान का व्यापक प्रचार किया।

ब्रह्म वादिनीं गार्गी — इन्होंने महान विद्वान ज्ञागबल्क को शास्त्रार्थ में हरा दिया।

ब्रह्म वादिनी वाक् — अमृण ऋषि कन्या थी जिन्होंने अंत में अनुसंधान किया और समाज को खेती करने के लिए अन्न दिया।

विदुषी तपती — आदित्य की पुत्री और सावित्री की छोटी बहन थीं। यह अति सुंदरी और प्रकांड विद्वान थी। इनका अयोध्या में संवरण जी से विवाह हुआ था।

शत रुपा, सांगली, मैं ना, स्वाहा, संज्ञा, अपाला आज महिलाओं के साथ-साथ अनुसुइया, सावित्री, तारामती, द्रोपदी जैसी सती जी के गुणों से आज भी विश्व जगत में प्रेरणा प्रदान कर रहे हैं।

तुलसीदास जी ने लिखा है कि —

‘मूढ तो हिं अतिशय अभिमाना,
नारि सिखावन करसि काना।

तुलसीदास जी का इस दोहे में कहने का तात्पर्य है कि यदि कोई आपके फायदे की बात करें तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए।

कबीर दास की दृष्टि में नारी — इन्होंने नारियों को दो प्रकार का बताया है।

  1. एक प्रकार की नारी साधना में बाधा नहीं पहुंचाती हैं और पतिव्रता होती हैं।
  2. दूसरी तरह की नारी साधना में अवरोध पैदा करती हैं ऐसी नारियों का कबीर ने विरोध नहीं किया है परंतु उनका तिरस्कार कर दिया है।

सूरदास की दृष्टि में नारी — यमन ऋषि की कथा राम बिलावल में, नवम स्कन्द में…

‘सुखदेव कह्यो, सुनौ हो राव!
नारी नागिन एक स्वभाव।
नागिन के कांटै विष होई,
नारी चितवन नर रहै भोई।
नारी सो नर प्रीति लगावै,
पै नारी तिहिं मन नहिं ल्यावै।
नारी संग प्रीति जो करै,
नारी ताहि तुरंत पंरिहरै॥

चाणक्य ने नारी के लिए कहा —

नारी में दया और विनम्रता होती है।
नारी धैर्य का पालन करती है।
समाज के निर्माण में नारी की विशेष भूमिका है।
नारी समाज की निर्माणकर्ता होती हैं।
नारी शरीर से दुर्बल होते हुए भी,
प्राण से वह पुरुष से भी अधिक शक्तिशाली होती है।

‘ जिनी सुंतत्र भए बिगरहिं ‘

जिस समय विरहणी स्वतंत्र हो जाती है। फिर उसके अलग-अलग रूप और कर्म देखे जाते हैं।

नायक कहता है कि —

गोरो गाल तिल तापे काला,
मोहन ‘मंगल’ कैसो जादू डाला।
वदन चंद्र सम मृगनयनी गोरी।
नैना चंचल दिखे चकोरी॥

अपने पति से प्रेमातुर स्त्री दुखी होकर कहती है —

मोसों ना बात बना चातुरी,
गोर सांवरिया माटी जब खोटो!
नायिका प्रीतम से रूठ कर लंदन चली जाती है।

नायक कहता है कि —

मेरी मालन खेलन जात बलैया,
मुंह मोड़ चली लंदन मा गोरी।
कैसो बनि गयो देखो कठोरी,
मान तज्यो अरमान लियो गोरी,
राधा रिसानी मनाय लायो कोई!
रितु की मार सहन नहीं होई॥

प्रेमातुर नायिका का भाव —

प्रिय प्रेम से बावरी,
सांवरो नाच नचायो।
उठि उठि जात पहर में,
भोरहरी ना उसे दिखाय।
सांवतिया काहें को जरि जाय,
सजनवा आपनो देख मुस्कात।
हमारी ओर देखा करो सांवरो,
नाहीं तो हम पीहर जाब॥

चंद्रमा को नहीं पता होता है कि उसकी चाहत में चकोरी अपना प्राण त्याग देगी। नायिका प्रेम में इतना विहवल हो, गयो है जानने और पहचानने की आवश्यकता नायक को करना चाहिए।

नई नवेली नायिका ससुराल में कहती है कि —

कुआं पानी भरन ना जैहों,
काला जादू नजर लगी तैहों।
रंगरेजवा रची रची रच्यो,
गरबीली बनो मोरिया अंगिया?
मोती मढायो पीहर चुनरिया,
बार-बार निखत दर्पण गोरिया।

गुण गर्विता होकर गुजरिया कहती है कि —

पिया तोरा पानी हम से भरा न जाए,
वह काया यह इसलिए नहीं बनायो!

पति पर भरोसा कर नायिका कहती है कि —

अपने राजा में हमरो भरोसो,
बसे पिया आंख में आंजन भयो!
मोरा बिनु सांवरो जिया न जाय,
पास पड़ोस घूमि घरवा आवै।
प्रेम से मिल कर गले लगा ले,
निक निक बतिया से दुलरावै॥

‘जेष्ठा और स्त्री कनिष्ठा ‘—

जिसे पिया चाहे वही सुहागिन,
जाहि स्त्री अधिक चाहे सो जेष्ठा।
कम चाहे जेहि नारी वही कनिष्ठा॥
दोउ लड़ी लड़ी बात बनायो,
पिए को रहि रहि दोऊ समझावैं।
मोहिं काहे को ब्याहे है लायो,
हमरौ आंचल में आगि लगायों॥

मुग्धा भाव —

भौंरा लुभाय रह्रियों कलियन संग,
गगरी ना छलके गोरिया धीरे चलो।
सारी बहोर लहरियों तारों डगरिया,
मारो मन मारि रह्यो संग संवरिया॥

यौवन से अनजान नायिका —

सरकत जाती कहां हे मोर घाघरो,
हुलसित तन मन ओर सांवरो॥

यौवना नायिका —

सतायो जनि सैया,
भरी लेहु मोंहिं बहियां!
सवतन संग जाई रह्यो,
बोलहु नहीं मोसो सैयां।
जाए मनायो सौतन को,
बात बनायो ना हमसो॥

मध्य धीरा नायिका —

मोरा सैयां बेदर्दी,
दर्द ना ही जानै!
तीज त्योहार मा भी,
परदेसवा मां बितावै।
कहा जाता है कि मछली की तड़प का पता समुद्र को नहीं होता है।

मुग्धा नायिका —

भय और लाज से रति न चाहने वाली नायिका मुग्धा नायिका कहलाती है।

कहती –
मोरी बहिया ना पकड़ो,
श्याम गिरधारी!
गल बहिंया ने डारो रे,
ओ बेदर्दी बालमा।

मध्या नायिका —

जिस नारी के तन में मर्यादा और लाज दोनों समान होते हैं वह मध्या नारी कहीं जाती है!

नैना लजाय दिल नहीं मानै,
मोहिं त धीरे जगाए लेना।
हाउ तोहरा ओसारी रे,
जरा अखियां पानी लगा लेना।

विश्रब्धनवोड़ा मुग्धा नायिका —

वह नायिका, जो किंचित भय और लज्जा से रति नहीं चाहने वाली होती है।

मोरा छोड़ दो अचरवा,
मैं प्यार मां झूलूंगी!
आसपास में मेरे लोगवा,
हरि संग प्रीति में खेलूंगी॥

मध्या धीरा नायिका —

अपने पति से आदर युक्त व्यंग कोप जताने वाली।

आयो हमरी अंखियां,
बोलो ना हमसे पिया!
उनको
हमसे ना बोलो पिया?
रात रात निंदिया न आवै!
हरि आज ऊं घी में आवै,
निंदिया गवांय डाली,
भोर भयो आयो अंगना॥

मध्या अधीरा नायिका —

वह नायिका जो पति से अनादर युक्त क्रोध जाने वाली हो, मध्या अधीरता होती हैं।

का हौ करते, कैसो करवावत।
पानी यों कर्यो छिप ना पावर॥

प्रौढ़ धीरा —

अपने पति को डर दिखाकर रति से उदास रहा मानवती स्त्री।

ज्यों पति कुछ बोल्यो,
ललाई बाबा नैना।
मुंह फेरि चल्यो मचल,
36 अंक सो आगे बढ़॥

परकीया नायिका —

वह नायिका जो पराई (पराय) पुरुष से प्रेम करती है।

घर बालम छोड़ी आयो,
बितायिब इहवां रसिया!
मुह हमारा यौहिं ओकरा,
ललचाई नजरों में रतिया॥

प्रौढ़ा नायिका —

वह नायिका दो अत्यंत काम रखती है परंतु कुछ कुछ लज्जा लिए।

प्यारे बलम तोहैं जाने ना दूंगी,
श्याम मोरे नैना का तारा रे !

रतिप्रीका नायिका —

विशेष रति की चाह वाली प्रौढ़ा नायिका।

मोहिं डर लागे अकेला रे,
रात पिया जागत रहियो!
प्रीतम नूपुर मोर ना उतारो,
सांग में अखिल विचार्यौ॥

प्रौढ़ा अधीरता नायिका —

पति त्याग – ताड़ना, कोप जनाने वाली नारी प्रौढ़ा अधीरा कही जाती है।

मैं नहीं जाती पास सैंया के पैंया,
मछरियां बिंदिया लै गई मोर!
मुझ पर डार गयो सारे रंग गागर।

नोट: यहां नायक और नायिका के रूप में वर्णन किया गया। इससे किसी को भी, किसी भी प्रकार का आघात पहुंचाने का कोई मकसद नहीं है। यह एक शोधकर्ता की भाति शोध है। जिसका सूत्र पुस्तकों में अलग-अलग तरह से मिल सकता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — स्त्रियां कई रूप में होती है ज्ञान व गुणों, लोक-लज्जा तथा व्यवहार के आधार पर। इस लेख में नायक व नायिका के माध्यम से लेखक ने विस्तार से बताया है की कैसे व किस-किस प्रकार की स्त्रियां इस संसार में होती है। जैसे – मुग्धा भाव वाली नायिका, यौवन से अनजान नायिका, यौवना नायिका, मध्य धीरा नायिका, मुग्धा नायिका, मध्या नायिका, विश्रब्धनवोड़ा मुग्धा नायिका, मध्या धीरा नायिका, मध्या अधीरा नायिका, प्रौढ़ धीरा, परकीया नायिका, प्रौढ़ा नायिका, रतिप्रीका नायिका, प्रौढ़ा अधीरता नायिका, इत्यादि प्रकार के नायिका के माध्यम से समझाया हैं। यह एक शोधकर्ता की भाति शोध है। इस लेख के माध्यम से किसी को भी किसी बी तरह का आघात पहुंचाने का कोई इरादा नही हैं।

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sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह लेख (नायक – नायिका।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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सफल जीवन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सफल जीवन। ♦

इस संसार में कहीं भी, कोई भी, कभी भी किसी के भी साथ हमेशा नहीं रह सकता। यह एक कटु सत्य है। जो भी आपस में जुड़े हुए हैं, आज न कल उन्हें एक-दूसरे से बिछड़ना ही पड़ेगा। रिश्ता चाहे पत्नी का हो, पुत्र का हो, पुत्री का हो, धन का हो, मकान का हो, अपने शरीर का हो, एक दिन छोड़कर जाना ही पड़ेगा। माया, मोह, भ्रम में इन्सान सत्य से भटक जाता है।

एक ही अन्न खाकर बच्चा जवान होता है, वही अन्न खाकर जवान बूढ़ा होता होता है, और बूढ़ा व्यक्ति धीरे-धीरे मौत के मुँह में चला जाता है— आखिर क्यों ?

• पाप-पुण्य का फल •

हर इन्सान अकेले पैदा होता है, अकेले दर्द का एहसास करता है और अकेले ही मरता भी है। पाप-पुण्य का फल अकेले ही भोगता है। अधर्म की कमाई से परिवार का पालन-पोषण करने वाले अकेले ही पाप की गठरी सिर पर लादकर घोर नरक में जाते है। दर्द में कोई दवा दे सकता है लेकिन अनुभव स्वंय ही करनी पड़ती है।

सदगुणों की शुरुआत स्वंय से ही करनी होती है। जब तक खुद की उंगली पर कुमकुम नहीं लगेगा तब तक दूसरे के ललाट पर तिलक नहीं लगा सकते। सारे सुख एंव दुःख का कारण मन है। मन की बात न सुनकर आत्मा की आवाज सुनने पर, दुःख और सुख का अनुभव स्वतः समाप्त हो जायेगा। यदि खेत में बीज न डाला जाए तो घास-फूस अपने आप निकल जाते हैं।

• अच्छे व बुरे विचार •

दिमाग में अगर अच्छे विचार न भरे जाऍं तो बुरे विचार अपने आप जगह बनाकर इन्सान की जिन्दगी को बर्बाद कर देगें, भोजन, न पचने पर रोग बढ़ता है, पैसा न पचने पर व्यभिचार और दिखावा बढ़ता है, बात न पचने पर चुगली बढ़ती है, प्रशंसा न पचने पर, अहंकार बढ़ता है, निंदा न पचने पर, दुश्मनी बढ़ती है, दुःख न पचने पर निराशा बढ़ती है, सुख न पचने पर, पाप बढ़ता है, दौलत न पचने पर, खतरा बढ़ता है।

जवानी, धन-संम्पत्ति, सत्ता, मूर्खता, अहंकार, शक्ति, व्यक्ति को मार्ग से भटका देती है। व्यक्ति बुराइयों में फॅंसकर, डूब जाता है और अपने साथ-साथ दूसरे का भी जीवन नष्ट कर देता है। अच्छे कर्म ही इन्सान को बुराइयों से दूर रख सकता है।

• हर कर्म धर्मानुसार •

भगवान शिव, भोला, शंकर, औघर दानी की आराधना के पवित्र सावन महीने में शिव जी की सवारी नंदी बैल जो हमेशा साथ रहता है, आखिर क्यों ? यह धर्म का स्वरुप है। बैल की सवारी का मतलब हर कर्म धर्मानुसार करना। जिस मानव के जीवन में धर्म ही नहीं हो वह साधन सम्पन्न होने के बावजूद भी उसका जीवन दुःखों से भरा रहेगा।

प्रसन्नता भीतर की स्थिति है। धर्म के मार्ग पर चलने से नव संकल्पों का सृजन होता है और आत्मा तृप्त रहती है। शिव को देवों के देव महादेव कहते हैं उनके पास धर्म रुपी साधना है, सुख धन से नहीं धर्म से प्राप्त होता है। विष पीने के बाद भी, औघर दानी है, वो राजा नहीं है लेकिन सर्वप्रिय और पूज्य है त्याग की मूर्ति हैं। आदि काल से भगवान शिव की पूजा होती आ रही है।

• ढाई अक्षर में ही सारी दुनिया निहित है —

ढाई अक्षर की महिमा जो समझ लिया, वो वास्तव में झानी और महापुरुष हो गया…

ढाई अक्षर के ब्रहमा, ढाई अक्षर की सृष्टि,
ढाई अक्षर के विष्णु, ढाई अक्षर की कान्ता (राधा),
ढाई अक्षर की दुर्गा, ढाई अक्षर की शक्ति,
ढाई अक्षर की श्रध्दा, ढाई अक्षर की भक्ति
ढाई अक्षर का ध्यान, ढाई अक्षर का त्याग,
ढाई अक्षर का धर्म, ढाई अक्षर का कर्म,
ढाई अक्षर का ग्रन्थ, ढाई अक्षर का सन्त,
ढाई अक्षर का मन्त्र, ढाई अक्षर का यन्त्र,
ढाई अक्षर का जन्म, ढाई अक्षर की अस्थि,
ढाई अक्षर की अर्थी,
ढाई अक्षर में ही सारी दुनिया निहित है, जो समझ लिया वो स्वामी विवेकानन्द।

महर्षि महेश योगी, महर्षि में ही, परमहंस योगानन्द, महर्षि दयानंद, गुरु नानक, श्री अरविन्दो धोष हो गये, ‘राम’ में दो अर्थ व्यंजित हैं- दुःख में हे राम, पीड़ा में अरे राम, लज्जा में हाय राम, अशुभ में अरे राम-शम, अभिवादन में राम-राम, शपथ में राम दुहाई, अझानता में राम जाने, अनिश्चितता में राम भरोसे, अचूकता के लिए रामबाण, मृत्यु के लिए राम नाम सत्य, सुशासन के लिए राम राज्य, निर्बल के बल राम। हमारे अन्दर जो कुछ अनुकरणिय है वह राम है, शाश्वत है।

⇒ ज्ञानी कौन ?

इन्सान मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, इत्यादि में जाता है। तीर्थ स्थल में जाकर सदबुध्दि के लिए प्रार्थना करता है। जब भगवान के दरबार में सर्प, मोर, चूहा, शेर, बैल एक साथ रह सकते हैं तो अपने को सबसे उत्तम और ज्ञानी कहने वाला मनुष्य क्यों नहीं ? अज्ञानी सर्प, मोर, चूहा, बैल, शेर, एक जगह शांति पूर्वक महादेव की शरण में रहते हैं, लेकिन मनुष्य अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, जलन के कारण विनाश का कारण बन
जाता है। सुख-शांति से दूर दर्द भरी जिन्दगी जीने के लिए मजबूर हो जाता है।

सही ज्ञान धर्म के मार्ग पर चलकर ही सच्चा सुख व शांति मिलता है। सही ज्ञान ही “सफल-जीवन” की कुन्जी है।

“न जीवन न मृत्यु, क्या है तेरे हाथ,
गले से गले लगाओ, जीलो कुछ दिन साथ”

⇒ अमरत्व प्राप्त करने के लिए धर्म के मार्ग पर चले…

भगवान शिव, राम, कृष्ण, चित्रगुप्त, ब्रह्मा, विष्णु ने अपने नाम के आगे सिंह, शर्मा, दुबे, प्रसाद नहीं लगाया, भगवान महावीर ने जैन नहीं लगाया क्योंकि वो किसी जाति के नहीं है, वो सर्वव्यापी, सर्वप्रिय, सर्वज्ञानी हैं वो कण-कण में हैं, सभी उनकी पूजा करते हैं। जब तक इन्सान अपने-आप को पूरे मानव समाज के लिए समर्पित नहीं करेगा, त्यागी नहीं बनेगा, जीवन सुखमय एंव सफल नहीं बनेगा। अपनी पहचान बनाते-बनाते धरती छोड़ देता है फिर भी पहचान खुद-ब-खुद मिट जाती है। अमरत्व प्राप्त करने के लिए धर्म के मार्ग पर ही चलना होगा।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — प्रसन्नता भीतर की स्थिति है। धर्म के मार्ग पर चलने से नव संकल्पों का सृजन होता है और आत्मा तृप्त रहती है। शिव को देवों के देव महादेव कहते हैं उनके पास धर्म रुपी साधना है, सुख धन से नहीं धर्म से प्राप्त होता है। विष पीने के बाद भी, औघर दानी है, वो राजा नहीं है लेकिन सर्वप्रिय और पूज्य है त्याग की मूर्ति हैं। दिमाग में अगर अच्छे विचार न भरे जाऍं तो बुरे विचार अपने आप जगह बनाकर इन्सान की जिन्दगी को बर्बाद कर देगें। हर इन्सान अकेले पैदा होता है, अकेले दर्द का एहसास करता है और अकेले ही मरता भी है। पाप-पुण्य का फल अकेले ही भोगता है। इस संसार में कहीं भी, कोई भी, कभी भी किसी के भी साथ हमेशा नहीं रह सकता। यह एक कटु सत्य है।

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यह लेख (सफल जीवन।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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एक नजर इन पर भी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ एक नजर इन पर भी। ♦

प्रकृति प्रेमियों के चेहरे पर खुशी झलकती है मानसून के आते ही। क्योंकि इसके आते ही उनका पौधा रोपण का कार्य शुरू हो जाता है।

अति प्रेरणादायी बात होती है जब सभी पौधा-रोपण पर कार्य शुरू हो जाता है। लेकिन इस मानसून से पहले एक विशेष बात पर ध्यान देना चाहिए वो है सड़क के दोनों ओर लगे हुए पेड़ों का सूखा होना।

अगर हम किसी भी सड़क पर चल रहें हैं तो हम सब अगर ध्यानपूर्वक देखे तो अगर सौ पेड़ लगे हो तो उसमें कम से कम पांच या दस पेड़ लगभग इस प्रकार होते है जो या तो पूरी तरह से दीमक लगने से या अन्य किसी कारण से सूख चुके होते हैं कि हल्की हवा से ही वो गिर कर सड़क के रास्ते अवरोधक बन जाते हैं।

कई बार तो आँधी आने पर इतने बड़े हादसे को अंजाम दे देते है कि इनका गिरना इंसान की जान पर जोखिम बन सकता है। तो मानसून के आने से पहले या समय-समय पर इनकी कटाई को सुनिश्चित करना होगा ताकि इनके गिरने से कोई भी जान-माल की हानि न हो।

अगर इन सूखे और खोखले पेड़ों को समय पर हटा दिया जाए तो एक तो बड़े हादसों से बचा जा सकता है और दूसरा उनके स्थान पर नया पौधा रोपण किया जा सके।

सूखे और खोखले पेड़ न बने हादसे का कारण कोई।
समयानुसार कटाई कर उनकी जगह नई पौध बोई।

मानसून के बाद तो इनकी जड़ो की मिट्टी स्वतः ही जगह छोड़ देती है, और कहीं सड़क पर अवरोधक के रूप में कहीं पर बिजली की तारों को तोड़ते दिखाई देते हैं। इसलिए समय रहते ही इनके प्रति जागरूकता प्रशासन और आम व्यक्ति को भी दिखानी होगी, ताकि इनसे होने वाली अनहोनी को टाला जा सके।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — वर्षा ऋतू के समय सड़क के किनारे पेड़ लगाए जरूर, लेकिन पेड़ लगाना ही काफी नहीं है। उसका अच्छे से देखरेख व कटाई-छटाई मानसून आने से पहले हो जाये तो कोई भी अनहोनी न हो, किसी तरह का कोई हादसा (दुर्घटना) न हो। इस कार्य के लिए इससे जुड़े सरकारी विभाग व समाज के लोगों को जागरूक रहना होगा, और जिससे जितना हो सके सभी को मदद भी करना चाहिए। हम सभी भलीभांति जानते है की पेड़ भी धरती माता के बेटे हैं और हम इंसानो के सच्चे व अच्छे मित्र भी हैं। वृक्षों से हमें फल, सब्जियां, बीज, लकड़ियां, इत्यादि प्राप्त होते है। लकड़ी से हमे फर्नीचर, कागज़, गोंद, इत्यादि वस्तुएँ प्राप्त हो जाती हैं। इसके अलावा अनेको पेड़ों व पौधों से बहुत सारी औषधियां तैयार की जाती है, जो हमारे शरीर से संबंधित कई प्रकार के हानिकारक रोगों का उपचार करने में हमारी मदद करती है।

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यह लेख (एक नजर इन पर भी।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बारिश के नए – नए रूप।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बारिश के नए – नए रूप। ♦

बारिश के नए नए रूप … बारिश का नाम लेते ही उन ठंडी फुहारों की अकस्मात याद आ जाती है तो टप-टप करके काले आसमान से गिरना प्रारंभ करती है और कुछ देर में ही सब जगह पानी से वातावरण को इस कदर खुशनुमा बना देती है; जैसे अभी-अभी प्रकृति नहा कर आई हो।

लेकिन आजकल तो कुछ अलग ही नजारा होता है बारिश का।

थोड़ी सी बारिश ने अपना रंग दिखाया नही की सब तरफ पानी ही पानी हो जाता है। स्वच्छता और सफाई में अव्वल आने वाले शहरों का गलियों और सड़कों पर भी पानी इस कदर जमा हो जाता है जैसे ये कोई जगह नही बल्कि गंदे नाले या जोहड़ हैं।

फिर बारिश की उन प्यारी बूंदों को ही हम कोसने लगते है जिनके बगैर इस धरा पर जीवन का कोई भी अस्तित्व नही है।

जब बारिश से प्राकृतिक आपदा आती है तो, वो तो अपने हाथ नही। लेकिन जब नगरों और महानगरों में थोड़ी सी बारिश पर सब लबालब हो जाता है, तो इसमें बारिश का कोई कुसूर नही। बल्कि हम सबका ही कुसूर है कि इस पानी की निकासी का समुचित प्रबंध नही किया जाता और जो वर्षा-जल-संचय के लिए प्रबंध होते है वो सब खानापूर्ति करते ही नजर आते है।

इन सभी छोटी-छोटी बातों की ओर हम सभी नागरिकों का सहयोग प्रशासन के साथ हो और प्रशासन को भी इन सभी बातों के लिए मानसून आने से पहले ही उचित कदम उठाने होंगे; ताकि बारिश के आते ही उसका ये रूप कहीं भी न दिखाई दे और प्रकृति के इस अनमोल उपहार का पूरा आनंद ले सके।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जब बारिश के पानी का निकासी सही तरीके से व सही जगह पर हो तब जाकर जल जमाव की समस्या समाप्त हो। मात्र बोलने भर से ही कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं होता हैं, इसलिए जो इसके लिए जिम्मेवार है वर्षा से पहले ही पानी के निकासी का सही प्रबंध करें। जब बारिश से प्राकृतिक आपदा आती है तो, वो तो अपने हाथ नही। लेकिन जब नगरों और महानगरों में थोड़ी सी बारिश पर सब लबालब हो जाता है, तो इसमें बारिश का कोई कुसूर नही। बल्कि हम सबका ही कुसूर है कि इस पानी की निकासी का समुचित प्रबंध नही किया जाता और जो वर्षा-जल-संचय के लिए प्रबंध होते है वो सब खानापूर्ति करते ही नजर आते है।

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यह लेख (बारिश के नए – नए रूप।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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श्रीलंका की स्थिति से सबक लेना जरूरी है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ श्रीलंका की स्थिति से सबक लेना जरूरी है। ♦

यूं तो आज विश्व के समस्त देशों में कहीं ना कहीं घमासान छिड़ा है। कोई अपनी राजनैतिक शक्ति को बढ़ाने की होड़ में लगा है तो कोई अपनी आर्थिक शक्ति को सब पर हावी करने पर लगा है। जहां एक ओर चीन और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश अन्य शक्तिशाली देशों को आपसी कलह में डलवा कर आर्थिक और सामरिक सुरक्षा की दृष्टि से कमजोर करने के लिए प्रयास कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ छोटे और कमजोर देश स्वयं ही अपनी राजनैतिक ताकतों की मनमानियों के बोझ तले आर्थिक रूप से इतने कमजोर हो चुके हैं कि उनका दिवाला निकलने वाला है।

उपरोक्त सभी संदर्भों के उदाहरण यदि हम ढूंढना चाहे तो यूक्रेन और रशिया अन्तर कलह और इधर भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका की विकट आर्थिक स्थिति इसके ज्वलंत उदाहरण है।

⇒ जनता का आक्रोश

यह बात किसी से छुपी नहीं है कि हाल ही में श्रीलंका के राष्ट्रपति ने अपने देश को छोड़कर मालदीव को पलायन किया है। उनकी गैरमौजूदगी में श्रीलंका के प्रधानमंत्री श्रीलंका के अंतरिम राष्ट्रपति घोषित होकर श्रीलंका की शासन व्यवस्था को चलाने की हरकत में आए हैं। परंतु जब यह खबर श्रीलंका की आम जनता को प्राप्त हुई तो समस्त जनता श्रीलंका की सड़कों पर इस पूरे घटनाक्रम का विरोध करने के लिए उतर आई। इतना ही नहीं श्रीलंका के अंतरिम राष्ट्रपति ने इस पूरी मुहिम को रोकने के लिए श्रीलंका की सेना को पूर्ण रूप से अधिकृत किया। उसके पश्चात भी गुस्साई जनता को प्रधानमंत्री भवन पर कब्जा करने से कोई नहीं रोक पाया। अर्थात इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि जनता का आक्रोश जब अपने चरम पर होता है तो बड़ी से बड़ी ताकत भी उसे रोकने में नाकाम रहती है।

⇒ कौन जिम्मेदार

सवाल ये उठता है कि श्रीलंका में ये परिस्थितियां पैदा क्यों हुई ? आर्थिक विशेषज्ञों की माने तो श्रीलंका की आर्थिक स्थिति वर्तमान में इतनी खराब है कि उसका कुछ करके भी कुछ नहीं बन सकता। ना ही तो गाड़ियों को चलाने के लिए ईंधन प्राप्त हो रहा है और ना ही आम जनता की खानपान के लिए उचित रूप से राशन पानी की व्यवस्था हो पा रही है। इस पूरी व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने के लिए श्रीलंका की जनता राजपक्षे परिवार को जिम्मेवार ठहराए या फिर श्रीलंका के राष्ट्रपति की सनक को जिम्मेदार ठहराए। दोनों स्थितियों में बात एक ही है। यदि इस बात का विश्लेषण राजनीतिक विशेषज्ञों की दृष्टि से किया जाए तो यह दुर्दशा शासन व्यवस्था को परिवारवाद की पूंजी बनाने के कारण हुई है।

खैर कुछ भी हो। श्रीलंका की इस भयानक स्थिति से सभी राजनैतिक दलों को और सभी राष्ट्र अध्यक्षों को तथा राज्य प्रमुखों को गंभीरता से गौर करना चाहिए।राजनीतिक लोगों को राष्ट्र संचालित करने के लिए या फिर राज्य को संचालित करने के लिए जो शक्तियां जनता के द्वारा प्रदान की जाती है। सभी राजनीतिक लोग उन शक्तियों को अपना विशेषाधिकार ना माने बल्कि राज्य या राष्ट्र की सेवा करने के लिए जनता के द्वारा दिया गया आशीर्वाद समझे।

राज्य या राष्ट्र के खजाने को इस भाव से खर्च ना करें कि राष्ट्र की स्थिति ही कमजोर हो जाए। पूर्व में इतिहास के पन्नों में हमें उपनिवेशवाद की कई झांकियां देखने को प्राप्त होती है और उन झांकियों में उस राष्ट्र की असली जनता के साथ किस तरह का व्यवहार उपनिवेश वादियों के द्वारा किया जाता था; वह चित्र किसी के मन-मस्तिष्क से बाहर नहीं है। हम देख रहे हैं कि यह दशा जो आज श्रीलंका की हुई है; वह बहुत ही जल्द भारत के कई अन्य पड़ोसी देशों के साथ-साथ विश्व पटल पर कई छोटे देशों की भी होने वाली है। वे सभी छोटे देश जो अपने देश को संचालित करने के लिए निरंतर विश्व बैंक से या अंतरराष्ट्रीय स्तर के बड़े-बड़े पूंजीपति देशों से ऋण पर ऋण लिए जा रहे हैं। वे सभी ऐसी स्थिति में आने वाले हैं।

⇒ अर्थविदों की माने तो…

अर्थविदों की माने तो बांग्लादेश, भूटान, पाकिस्तान जैसे भारत के पड़ोसी देशों में से भी कई देश इस आर्थिक संकट की दलदल में फंसने की कगार पर खड़े हैं।अमेरिका एवं चीन जैसे बड़े-बड़े देश इन छोटे देशों को ऋण दे-दे कर बिल्कुल कमजोर करने पर तुले हैं और शायद यह पुनः उपनिवेशवाद की ओर बढ़ता हुआ एक कदम है।

खैर यह तो अंतरराष्ट्रीय धरातल पर आर्थिक रूप से दिवालिये के कगार पर खड़े राष्ट्रों की बात हुई। परंतु हम अपने ही राष्ट्र भारत की बात करें तो यहां भी कई राज्यों की स्थिति आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार इतनी कमजोर है कि यदि स्वयं वे स्वतंत्र राष्ट्र होते तो आज श्रीलंका से पहले उनका दिवाला निकल गया होता।

⇒ आर बी आई के आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट

यह मैं अपनी मर्जी से नहीं कह रहा हूं। आर बी आई के आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट को यदि ध्यान में रखा जाए तो आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार पंजाब, राजस्थान, गुजरात, पश्चिम बंगाल तथा बिहार जैसे राज्य की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। ये सभी राज्य, राज्य को प्राप्त ऋण लेने की अधिकृत सीमा से दो तीन गुना ऋण ले चुके हैं जो अब चुकता करना बहुत मुश्किल लग रहा है। ऐसे में यदि केंद्र सरकार इन राज्यों की आर्थिक मदद विशेष पैकेज देकर के करती है तो बात अलग है। वरना ये सभी राज्य गंभीर आर्थिक संकट में आने वाले हैं।

अब इस आर्थिक संकट में इन राज्यों को धकेलने की बात का कारण पूछा जाए तो सभी अर्थविदों का एक मत होता है कि यह पूरी स्थिति राजनैतिक दलों के लोकलुभावन घोषणा पत्रों की वजह से पैदा हुई है। कहीं बिजली फ्री, कहीं पानी फ्री, कहीं बस किराए में छूट तो कहीं राशन और अन्य सुविधाओं पर सब्सिडी प्रदान करके ये सभी राजनैतिक दल हर राज्य को निरंतर कर्ज के बोझ तले दबाते चले जा रहे हैं।

सत्ता पक्ष से अगर पूछा जाए तो वह पूर्व की सरकारों को इसके लिए दोषी ठहराता है और अगर विपक्ष से पूछा जाए तो वह सत्ता पक्ष को दोषी ठहराता है। इस पूरी विकट स्थिति की जिम्मेवारी लेने के लिए कोई भी तैयार नहीं है। इस तरह की ही वोट की राजनीति अगर होती रही तो वह दिन दूर नहीं कि हमारे राष्ट्र में भी यह गंभीर परिस्थिति पैदा हो जाए। जब तक यह थोपाथापी का खेल खत्म नहीं होगा। तब तक इस मामले पर पूर्ण विराम लगाना दूर की कौड़ी है।

⇒ जनता को मुफ्त की आदत डालने की कोशिश

देश की जनता को मुफ्त की आदत डालने की कोशिश किसी भी राजनैतिक दल को नहीं करनी चाहिए। मुफ्त खोरी से जनता निकम्मी होती है और वह देश की अर्थव्यवस्था को बिगाड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती। यहां अगर दूसरा कारण इसके पीछे बताया जाता है तो वह राष्ट्रव्यापी भ्रष्टाचार कहा जाता है। भ्रष्टाचार तो आज चंद लोगों को छोड़ कर, छोटे से लेकर के बड़े कर्मचारियों में इस तरह से घर कर गया है मानो वह उनका संवैधानिक अधिकार है।

कोई छोटे से छोटा कार्य भी किसी सरकारी कर्मचारी / अधिकारी से या फिर किसी गैर सरकारी क्षेत्र के अधिकारी से करवाना हो तो उसके लिए रिश्वत लिए बिना उनकी नियत काम करने की नहीं होती। जब उन्हें तनख्वाह की या कानून की दुहाई देते हैं तो अधिकतर लोगों का यही कहना होता है कि यह तो यहां की रीत है जी। यदि काम जल्दी करवाना चाहते हो तो ले दे करके निपट लो। वरना काटते रहो दफ्तरों के चक्कर।

⇒ भ्रष्ट व्यवस्था के चंगुल में

यूं तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध बड़े से बड़े कानून बने हैं। परंतु जब कोई इस भ्रष्ट व्यवस्था के चंगुल में फंसता है तो कोई भी कानून उसकी किसी भी तरह की मदद नहीं कर पाता। देश को भ्रष्टाचार ने पूर्ण रूप से खोखला कर दिया है। यह मात्र एक देश की ही कहानी नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय बीमारी है। इसका इलाज करना बहुत कठिन लग रहा है।

यदि जनता एकता दिखाए और स्वार्थ से ऊपर उठकर के सर्व हित की बात करेगी तो इस लाइलाज बीमारी का इलाज करना भी संभव है। परंतु जनता है कि वह भी मुफ्त खोरी की आदत से पूरी तरह से मदहोश है और अपना उल्लू सीधा करने में हमेशा लगी रहती है। वह खुद घूंस खिला कर अपना हित साधने में मस्त है और इसे अपनी बुद्धिमानी और चालाकी समझती है।

उसे ना समाज की चिंता है और ना ही तो राष्ट्र की चिंता है। 100 में से दो चार लोग इस भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ जाते भी है तो उन्हें भी भ्रष्ट लोगों की फौज झूठे इल्जाम लगाकर धराशाई कर देती है। ना जाने क्यों हम लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि जब राष्ट्र है तो, तभी ही हमारी संपत्ति का महत्व है। वरना हमारे पास संपत्ति होकर के भी उसका कोई मोल नहीं है। इसलिए श्रीलंका की स्थिति को हम सभी को गंभीरता से लेना चाहिए और अपने राष्ट्र की आर्थिक मजबूती के लिए मिलकर प्रयास करना चाहिए।

⇒ राष्ट्र के प्रति समर्पित सरकार हो

मेरा मानना है आज हमारे राष्ट्र में एक ऐसी सरकार की आवश्यकता है जो राष्ट्र के प्रति समर्पित हो और राष्ट्र के आर्थिक कर्ज को दूर करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहे। वोट की राजनीति ना करें। सभी राज्यों को वह सरकार दो टूक निर्देश दे सके कि अपने कर्मचारियों, अधिकारियों तथा व्यापारियों की कमाई का 10% हर मास अपने राज्य के कर्ज को उतारने के लिए साल-दो साल के लिए उनके खाते से काटकर इकट्ठा किया जाए और राष्ट्रीय स्तर पर तथा राज्य स्तर पर इस 10% अंशदान के लिए एक विशेष खाता राज्य स्तर पर और राष्ट्रीय स्तर पर खोला जाए।उन खातों को ऑनलाइन किया जाए। जिनमें पूरी तरह से पारदर्शिता हो। 7% हिस्सा राज्य के कर्ज को चुकाने के लिए लगाया जाए और 3% हिस्सा सभी राज्य राष्ट्रीय स्तर के कर्ज मुक्ति खाते में डालें ताकि राष्ट्रीय स्तर का कर्जा भी चुकाया जा सके।

भविष्य में तब तक राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर तक कोई विकास कार्य ना किया जाए जब तक राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर के कर्जे पूर्ण रूप से खत्म ना हो जाए। कर्ज मुक्त होने के बाद भी सभी राज्य एवं राष्ट्रीय सत्ता को इस तरह की कार्य योजना को प्रारूपित करना होगा कि फिर कभी हमें कर्ज के बोझ तले डूबने की नौबत ना आ सके।

⇒ सारे लेन देन डिजिटल माध्यम से हो

सभी का धन बैंकों में जमा होना चाहिए और सारे लेन देन डिजिटल माध्यम से ही होने चाहिए। नगद भुगतान पाई का भी मान्य न हो। फिर कोई भी न ही टैक्स चोरी करेगा और न ही भ्रष्टाचार करेगा। व्यक्तिगत धन संचय की भी एक सीमा तय होनी चाहिए और अचल संपत्ति की भी राजा से लेकर रंक तक एक सीमा तय हो। तय सीमा से ऊपर की सम्पत्ति सरकारी घोषित होनी चाहिए।

वेतनमान की सीमा कम की जानी चाहिए। दो तीन – तीन लाख तनख्वाह लेने वाले का वेतनमान यदि 50 हजार अधिकतम किया जाए तो उसी पैसे में उसके पूरे परिवार को रोजगार मिलेगा तथा देश का उत्पादन दर भी बढ़ेगा। इतना ही नहीं सभी के व्यस्त रहने से उत्पात भी घटेगा। वरना खाली दिमाग शैतान का घर।

जब चल और अचल सम्पत्ति के संग्रह की एक सीमा तय होगी तो कोई भी फिर उससे अधिक संचित नहीं करेगा। उसे खर्च करना ही होगा। ऐसे में सम्पति का समान वितरण होगा। पर इसके लिए सर्व प्रथम राजनेताओं और धनाढ्य वर्ग को अपना अहम छोड़ना पड़ेगा। वरना श्रीलंका के राष्ट्रपति की तरह न हो जाए।

यह ठीक है कि पेंशन का प्रावधान सभी को हो। फिर मैं देखता हूं कि कैसे नहीं मिलेगा हर हाथ को काम ? खैर मुझे मालूम है कि बहुत सारे कर्मचारी, अधिकारी एवं व्यापारी मेरी बात से बिल्कुल विपरीत होंगे। परंतु एक सच्चा नागरिक होने के नाते यह जिम्मेवारी हम सब लोगों को सामूहिक रूप से उठानी ही होगी।

इस अंशदान में मात्र कर्मचारी और अधिकारी तथा व्यापारी ही नहीं बल्कि आम जनता के साथ – साथ राजनेताओं को भी बढ़-चढ़कर के अपना योगदान देना चाहिए ताकि हमारी भविष्य की पीढ़ियां आर्थिक रूप से मजबूत हो और सामरिक रूप से सुरक्षित हो।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आप और आपका मकान, परिवार, संपत्ति तभी तक सुरक्षित है, जब तक आपका राष्ट्र मज़बूत और सुरक्षित हैं। सभी का धन बैंकों में जमा होना चाहिए और सारे लेन देन डिजिटल माध्यम से ही होने चाहिए। नगद भुगतान पाई का भी मान्य न हो। फिर कोई भी न ही टैक्स चोरी करेगा और न ही भ्रष्टाचार करेगा। व्यक्तिगत धन संचय की भी एक सीमा तय होनी चाहिए और अचल संपत्ति की भी राजा से लेकर रंक तक एक सीमा तय हो। तय सीमा से ऊपर की सम्पत्ति सरकारी घोषित होनी चाहिए। यह ठीक है कि पेंशन का प्रावधान सभी को हो। फिर मैं देखता हूं कि कैसे नहीं मिलेगा हर हाथ को काम ? खैर मुझे मालूम है कि बहुत सारे कर्मचारी, अधिकारी एवं व्यापारी मेरी बात से बिल्कुल विपरीत होंगे। परंतु एक सच्चा नागरिक होने के नाते यह जिम्मेवारी हम सब लोगों को सामूहिक रूप से उठानी ही होगी।

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यह लेख (श्रीलंका की स्थिति से सबक लेना जरूरी है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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शास्त्र सम्मत गुरु महिमा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शास्त्र सम्मत गुरु महिमा। ♦

श्री सद्गुरु देवं, परमानंद, अमर भक्ति अविनाशी।
निर्गुण निर्मूल, स्थूल जगत, काटत शूल भाव भारी॥

हिंदू धर्म एक जगत रहस्यों से परिपूर्ण धर्म है। इस धर्म नें सभी परंपराएं, रीति- रिवाज, सिद्धांत, दर्शन और ज्ञान-विज्ञान के रहस्य को अपने आप में समाहित है। हजारों हजार बरसो की परंपराओं में वैदिक, वैष्णव, शैव, शक्ति, नाथ, संत, स्मार्त, आदि अनेक संप्रदाय के मठ – मंदिर, सिद्धपीठ, ज्योतिर्लिंग और गुफाएं हैं। यह सभी स्थान पुनीत हैं। इन्ही पुनीत स्थानों में ध्यान, तप, भक्ति और क्रिया योग को मत दिया जाता है।

‘विश्वं तद् भद्रं यदवंति देवा:’ (१८.३.२४ अथर्व वेद)
अर्थात देवता जो करते हैं वह हमारे लिए शुभ है।

‘अजं जीवता ब्रहणे देयमाहु:!’ (९.५.७ वही)
जीवित मनुष्य को अपनी आत्मा विश्वास ईश्वरार्पण करनी चाहिए।

‘यदा मागन‌ प्रथमजा ऋतुष्य।’ (९.१०.१५ अथर्ववेद)
सत्य का प्रथम प्रवर्तक परमात्मा भक्त को प्राप्त होता है।

भारत आध्यात्म की राजधानी प्राचीन काल से जी है।
चमत्कारी स्थानों में कुछ नाम इस प्रकार दिए गए हैं।

चमत्कारी स्थानों में कुछ नाम

अमरनाथ का शिवलिंग, अमरनाथ में बाबा की अमर कथा, बाबा अमरनाथ की कहानी, माता ज्वाला देवी, मध्य प्रदेश का काल भैरव, पुरी का चमत्कार मंदिर, मध्य प्रदेश में मैहर माता का मंदिर, केदारनाथ मंदिर, रामेश्वर का मंदिर, श्री राम सेतु के पत्थर, तटोत माता का मंदिर जहां बम का प्रभाव अक्षम हो गया आदि।

गुरु शब्द का अर्थ – गुरु शब्द का अर्थ प्रथम अक्षर गु का अर्थ है अंधकार। और दूसरे अक्षर रु का अर्थ है उसे हटाने वाला अर्थात प्रकाश। इस प्रकार जो अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर प्रेरित करें वह गुरु कहा जाता है। गुरु सच्चा मार्ग दिखाता है। यथार्थ गीता में श्री सद्गुरु देव भगवान की वंदना करते हुए कहा गया है कि —

भवसागर तारण कारण हे, रविनंदन बंधन खंडन से।
शरणागत किंकर मित मने, गुरुदेव दया कर दीन जने॥

—•—

जय सद्गुरु ईश्वर पापक से, भव रोग विकार विनाशक हे।
मन लीन रहे तव श्रीचरणे, गुरुदेव दया कर दीन जने॥

ईश्वर सभी भूत प्राणियों के हृदय में रहता है। वह अनन्य भक्ति के द्वारा प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सुलभ है। जो महापुरुष परम तत्व को प्राप्त कर लेता है वह स्वयं में ही धर्म ग्रंथ है। भारत में जितने शास्त्र पुराण हैं उनके कुछ नियम बताएं गए हैं। हम सभी का धर्म है कि उन नियमों को पालन करें। गुरु का कार्य है आध्यात्मिक सामाजिक राजनीतिक समस्याओं का निराकरण करना और कराना।

विदुर कहता है कि —

राजन! ये दो प्रकार के पुरुष स्वर्ग से ऊपर स्थान पाते हैं। शक्तिशाली होने पर भी क्षमा करने वाला और निर्धन होने पर भी दान देने वाला। आगे कहता है कि जो बहुत धन विद्या तथा ऐश्वर्य को पाकर इठलाता नहीं, वह पंडित कहलाता है। (पृष्ठ ६,२० विदुर नीति)

गुरु ब्रहमा गुरु विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:।
गुरु साक्षात परम‌् ब्रह्म तस्मै गुरवे नमः॥

ऐसी श्लोक में गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा पदवी दी गई। जबकि गुरु ईश्वर के विभिन्न रुपों जैसे – ब्रह्मा, विष्णु, एवं महेश्वर के रूप में स्वीकार्य है।

यही बनाने वाले हैं, यही पालन करता है, और यही संहार भी करते हैं।

जबकि लोक प्रचलन में है कि —

राम कृष्ण सबसे बड़ा
उनहूं तो गुरु कींन्ह।
तीन लोक के वे धनीं
गुरु आज्ञा अधीन॥

गुरु गुढ तत्व जानता है। सभी शास्त्र गुरु तत्व की प्रशंसा करते हैं। संपूर्ण जगत में गुरु के गुणों की व्याख्या विद्यमान है।

संत कबीर लिखते हैं कि —

हरि रुठे गुरु ठौर है,
गुरु रुठे नहीं ठौर।

कहने का तात्पर्य है कि एक बार गुरु रुठ जाए तो कहीं जगह नहीं मिल सकती है। परंतु ईश्वर के रुठ जाने पर सद्गुरु रास्ता बना देता है और धर्म मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।

‘सज्जन अंगीकृत कियो,
ताकों जेहिं निबाहि।
राखि कलंकी कुटिल ससि,
त उ सिव तजत न ताहि॥
(पृष्ठ १७, सुबोध दोहे 47कवि वृंद)

सज्जन पुरुष जिसे अपना लेता है, उसे वह सदा निभाता है।
चंद्रमा को शिव जी कभी त्यागते नहीं, यद्यपि वह कलंकित हैं।

गुरु का कर्तव्य है कि वह अपने भक्तों को सभी शिक्षा में पारंगत करें। यद्यपि गुरु ज्ञान को विकसित करता है। वह धर्म शास्त्रों के अनुसार अस्त्र शास्त्र विद्या में पारंगत करता है। योग साधना और यज्ञ से वातावरण को शुद्ध करने का उपाय करता है।

‘अयं यज्ञो गातुविद् नाथविद् प्रजावित‌्’
(अथर्व वेद ११.१.१५ )
यह यज्ञ मार्गदर्शक, शरणदाता और सुसन्तति दाता है।
यह यज्ञ सारे संसार का केंद्र है तथा –
‘अयं यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभि:’!
और आचार्य स्वयं संगम से रहकर शिष्यों को चाहता है।
यथा – आचार्यों ब्रम्हचर्येण ब्रह्मचारिण मिच्छते। (वेदा अमत पृष्ठ 324)
संगृह‌्याभि भूत आ भर। (वही 325)
तेजस्वी शिक्षक ज्ञान संग्रह करके शिशु में भर देता है।

प्राचीन काल में शिक्षक को ही आचार्य अथवा गुरु कहा जाता रहा है। उस काल के लोग 8 वर्ष से 25 वर्ष तक गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे। शिक्षा प्राप्ति के समय ब्रह्मचर्य का पालन करते थे। सभी वर्गों को शिक्षा का अधिकार होता था।

एक रचना प्रस्तुत है —

ध्वज आरोहण कर रहा,
वाणी में अमृत भर रहा।
ढाढस देता शिशिर सिंधु,
कण कण सिंचित ईश इंदु।
देवर्षि आकर स्वर दिया,
वेदोक्त में ऐसा लिखा।
क्षण विलंब अनर्थ न हो,
पूर्णिमा यह व्यर्थ ना हो।

जिस प्रकार विश्व विष्णु से व्याप्त है। वैसे ही सर्व शास्त्र पुराण आदि 10 अक्षरों से व्याप्त है। यथा —

मन भय जर संत गल,
सहित दश अक्षर इन्हीं सोहिं।
सर्व शास्त्र व्यापित लखौं,
देश्व विष्णु से ज्योंहि॥
(काव्य प्रभाकर, जगन्नाथ प्रसाद जगन्नाथ प्रसाद भानु कवि पृष्ठ 14)

शास्त्रों में माता-पिता गुरु आचार्य और अतिथि, इसको देव तुल्य माना गया है। उपनिषदों में कहा गया है कि—

मातृ देवोभाव:
पितृ देवो भव:
आचार्य देवो भव:
अतिथि देवो भव:

यानी माता पिता तथा गुरु और आचार्य इस संसार में प्रत्यक्ष चार देव रूप हैं। इनका स्थान क्रमानुसार बताया गया है।

कथन में कदाचित आता है कि शास्त्र अध्ययन में नारी को वंचित किया गया है तो यहां वाल्मीकि आश्रम में लव कुश के साथ आत्रेयी नामक स्त्री ने भी शिक्षा ग्रहण की तो कैसे कहा जा सकता है कि स्त्रियों को शास्त्र पढ़ने से वंचित किया गया था।

पुराणों में स्त्रियों के बारे में कहा गया — पुराणों में सुजाता, प्रमद्वरा, रहु, कद्योत, आदि की कथाएं भी वर्णित हैं।

कहा गया है कि आश्रमों में बालक और बालिका एक साथ पढ़ते थे। उनका विवाह उचित समय पर होता था। गुरुकुल में शास्त्र और शस्त्र की शिक्षा भी दी जाती थी, साथ ही साथ वेदों का भी अध्ययन कराया जाता था।

सद्गुरु की खोज में कवि अखा — अहमदाबाद के जेतलपुर गांव का विक्रम संवत 1604 या 1653 में पैदा हुए इनके बारे में लिखा गया है। ‘ज्ञाति से सुनार, कुल धर्म से वैष्णव, विद्या व्यासंग से वेदांती, और नयसर्गिक रसिका के कवि था।’ ( पृ० ४, अखा की हिंदी कविता)

सद्गुरु की खोज में जमीन जागीर बेचकर एक कमरा सुरक्षित छोड़कर सतगुरु की खोज में निकल पड़ा। (वही पृष्ठ 5)

अखा पर एक रचना प्रस्तुत करता हूं —

पर्याप्त द्रव्य लेकर, आस पास खोजा।
मन नहीं माना, दूर यात्रा धामों में चला।
साधुओं की जमात की, तीर्थों में घूम रहा।
भजन कीर्तन करता, मन भजन में रमाते।

घुमा गोकुल, गोकुलनाथ शरण पहुंचा।
संप्रदाय में करूं साधना, सिद्धि की आस लिए वेदना।
श्री गोकुलनाथजी वैष्णवी दीक्षा, ब्रह्म संबंध की मिली भिक्षा।
भांति – भांति परिचित हुआ, मिली भक्ति में मस्ती।

तत्व ज्ञान की जिज्ञासा, शांति की मन में लिए आशा।
शांति फिर भी नहीं मिली, काशी जाने की उपजी जिज्ञासा।
मणिकर्णिका घाट पर पहुंचा, छोटे आश्रम में क्षमता देखा।
संत देव देख मन में जिज्ञासा, यही ब्रह्म ज्ञानी मीटावेंगे निराशा।

मधुर वाणी का रसपान हुआ, झंकृत वाणी गुण गान किया।
दीवार की ओट में रात्रि बिताया, यही मेरे गुरु हैं कहकर आया।
मानसी दीक्षा लिया और चला, ब्रह्मानंद को जपता रहा।
निज गुरु फिर मान लिया, ब्रह्मानंद सरस्वती से ज्ञान लिया।

स्पष्ट नाम निर्देशित नहीं किया, गुरु के कृपा ने जीवन जिया।
(स्वरचित रचना साभार पृष्ठ 5 से 10 तक अखा की हिंदी कविता)

——♦——

गुरु रूप गोस्वामी तुलसीदास ग्रंथावली में वर्णित कुछ पंक्तियां —

भवानी शंकरौ वंदे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।

—♥—

वंदे बोधगम्यं नित्यं गुरुं शंकर रुपिणं।

—♥—

वंदे विशुद्ध विज्ञानौ कवीश्वर कपीश्वरौ।

—♥—

वंदेहं तमशेषकारण, परं रामाख्यमीशं हरि।

——♦——

भक्तवर सूरदास के सुबोध पद से वंदना प्रस्तुत है —

चरण कमल बंदौं हरि राई।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै,
आंध र कों सब कुछ दरसाई।
बहिरो सुनै मूक पुनि बोलैं,
रंक चले सिर छत्र धराई।

सूरदास स्वामी करुणामय, बार बार बंदौं तेहि पाई।।

गुरु ज्ञान को देने वाला है गुरु सम्मान को दिलाने वाला है गुरु महान है। गुरु ज्ञाता होता है। गुरु सर्वदाता होता है। गुरु देवताओं से साक्षात्कार कराता है। गुरु समाज में उन्नति दिलाता है। गुरु उन्नति के मार्ग पर ले जाता है। इसलिए मनुष्य जाति को सद्गुरु की शरण में रहना चाहिए। सद्गुरु सर्व ज्ञाता होता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — प्राचीन काल में शिक्षक को ही आचार्य अथवा गुरु कहा जाता रहा है। उस काल के लोग 8 वर्ष से 25 वर्ष तक गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे। शिक्षा प्राप्ति के समय ब्रह्मचर्य का पालन करते थे। सभी वर्गों को शिक्षा का अधिकार होता था। इस संसार में प्रथम गुरु तो माँ ही हैं। गुरु हमें जिंदगी में एक जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनाने में हमारी सहायता करते हैं। वही हमें जीवन जीने का असली तरीका सिखाते हैं; और वही हमें जीवन के राह पर ता-उम्र सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। गुरु हमें अंधकार भरे जीवन से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाते हैं। गुरु एक दीपक की भांति होता है जो अपने शिष्यों के जीवन को प्रकार से भर देते हैं। विद्यार्थी जीवन में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

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यह लेख (शास्त्र सम्मत गुरु महिमा।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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गुरु पूर्णिमा।

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♦ गुरु पूर्णिमा। ♦

हिंदू मान्यताओं के अनुसार गुरु पूर्णिमा का त्यौहार आषाढ़ माह में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। भारतीय संस्कृति में गुरु को भगवान से भी बढ़कर माना जाता है। संस्कृति में “गु” का अर्थ होता है अंधकार (अज्ञान) एवं “रु” का अर्थ होता है प्रकाश, ज्ञान गुरु हमें अज्ञान रूपी अंधकार से (ज्ञान) रूपी प्रकाश की ओर ले जाते हैं।

गुरु को महत्व देने के लिए महान गुरु वेदव्यास जी की जयंती पर गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। इसी दिन भगवान शिव द्वारा अपने शिष्यों को ज्ञान दिया गया।

इस दिन कई महान गुरुओं का जन्म भी हुआ था, लोगों को ज्ञान की प्राप्ति हुई। इसी दिन गौतम बुद्ध ने धर्म चक्र का परिवर्तन किया था। इस दिन गुरु पूजन का विशेष महत्व होता है। हिंदू धर्म के अनुसार यह तिथि वेदव्यास की जयंती भी मनाई जाती है और विधिवत पूजन भी किया जाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार महर्षि वेद व्यास जी का भी जन्म हुआ था और इन्हें प्रथम गुरु का स्थान भी मिला है।

सारनाथ में गौतम बुद्ध अपने पहले 5 शिष्यो को पहला उपदेश देने के लिए गुरु पूर्णिमा मनाई जाती रही है। हिंदू और जैन धर्म में भी अपने शिक्षकों का सम्मान करने के लिए मनाया जाता है। हिंदू धर्म का प्रमुख त्यौहार है गुरु ही शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं और वही जीवन को पूर्ण बनाते हैं। भारतीय संस्कृति में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका मानी गई है। जीवन के विकास के लिए गुरु की अत्यधिक की आवश्यकता होती है।

गुरु के साथ रहकर प्रवचन आशीर्वाद अनुग्रह जैसे; गुरु जो मिल जाए तो उसका कृतार्थ जीवन भर रहता है। क्योंकि बिना गुरु के न आत्म दर्शन होता है न ही परमात्मा दर्शन इस दिन गुरु दीक्षा भी लेने का अवसर होता है।

गुरु हमें जिंदगी में एक जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनाने में हमारी सहायता करते हैं। वही हमें जीवन जीने का असली तरीका सिखाते हैं; और वही हमें जीवन के राह पर ता-उम्र सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। जिस तरह से शिक्षक हमें शिक्षा और ज्ञान के जरिए बेहतर इंसान बनाने के लिए जो मेहनत करता है। वही स्थान गुरु का होता है।

गुरु हमें अंधकार भरे जीवन से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाते हैं। गुरु एक दीपक की भांति होता है जो अपने शिष्यों के जीवन को प्रकार से भर देते हैं। विद्यार्थी जीवन में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। गुरु विद्यार्थी को हर प्रकार के विषय से संबंधित ज्ञान देते हैं; और जीवन के अलग-अलग पड़ाव पर मुसीबतों से लड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। गुरु के बिना किसी का कोई जीवन नहीं होता है गुरु ही शिष्य के व्यक्तित्व का विकास करने में अत्यधिक सहायक होते हैं।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — गुरु हमें जिंदगी में एक जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनाने में हमारी सहायता करते हैं। वही हमें जीवन जीने का असली तरीका सिखाते हैं; और वही हमें जीवन के राह पर ता-उम्र सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। गुरु हमें अंधकार भरे जीवन से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाते हैं। गुरु एक दीपक की भांति होता है जो अपने शिष्यों के जीवन को प्रकार से भर देते हैं। विद्यार्थी जीवन में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

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यह लेख (गुरु पूर्णिमा।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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अमृतमयी जीवन देता गुरु।

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♦ अमृतमयी जीवन देता गुरु ♦

ये तो हम सभी जानते हैं कि गुरु शब्द ही अपने आप में इतना सार्थकता लिए हुए है कि इस शब्द के मानव-जीवन में आगमन से ही उजाला सर्वत्र फैलता दिखाई देता है।

गुरु शब्द स्वयं में ही अज्ञानता से ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करता है। गुरु स्वयं ही शिष्य के मार्ग को अमृतमयी बनाकर उसका नाम इस संसार में रोशन करता है। गुरु के अस्तित्व में ही त्रिदेवों को समाहित माना गया है और इस पूरे ब्रह्मांड में गुरु के नाम का सदैव ही शंखनाद हुआ है जिन्होंने सदैव सत्य के दिये से अपने शिष्यों के पथ को प्रकाशवान किया है।

ये पंक्तियां कुछ अपने शब्दों से गुरु की महिमा व्यक्त करती है:

गुरु के प्रति मनुष्य की आस्था के शून्य हो गए भाव।
तभी से मानव-जीवन में शांति-सुख का हो गया अभाव॥

मनुष्य के जीवन में जीवन-पर्यन्त न जाने कितनी ऐसी बाधायें आई है जब इंसान को कोई रास्ता नही दिखाई देता। तब गुरु ही वो मांझी बनता है जो मानव की नैया को पार लगाता है। उसके जीवन में ज्ञान का उजाला कर देता है।

अब वो समय आ गया है जब गुरु को केवल फल-फूल, दान-दक्षिणा की ही जरूरत नही बल्कि गुरुओं की दी गयी शिक्षाओं और उपदेशों को जीवन में धारण करें और इस अनमोल मानव-जीवन का मिलना इस संसार में सार्थक बनायें।

गुरु-पूर्णिमा की सभी को हार्दिक बधाई! क्योंकि गुरु-पूर्णिमा का विशेष दिन भी इस संसार को ज्ञान के उजाले से प्रकाशवान करता है।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — गुरु शब्द स्वयं में ही अज्ञानता से ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करता है। गुरु स्वयं ही शिष्य के मार्ग को अमृतमयी बनाकर उसका नाम इस संसार में रोशन करता है। 2,500 साल से भी अधिक पहले, बुद्ध ने बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया और बोधगया से सारनाथ, उत्तर प्रदेश गए। वहां उन्होंने पूर्णिमा के दिन उपदेश दिया, जिसे आज गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा वह दिन भी है जो महान भारतीय महाकाव्य महाभारत के लेखक महर्षि वेद व्यास की जयंती का प्रतीक है । इस दिन को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। गुरु पूर्णिमा छात्रों और शिक्षकों के बीच संबंधों का प्रतीक है।

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यह लेख (अमृतमयी जीवन देता गुरु।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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आषाढ़ – गुरु पूर्णिमा का महत्व।

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♦ आषाढ़ – गुरु पूर्णिमा का महत्व। ♦

‘पूर्णिमा’ शब्द सुनते ही मनाकाश पर रात्रि का अंधकार पूर्ण आकाश और उसमें अपनी समस्त कलाओं के साथ खिला हुआ पूर्ण चन्द्र की कल्पना साकार हो जाती है। रात्रि और सम्पूर्ण धरा पर धवल प्रकाश बिखेरती पूर्ण चाँद की चंद्रिकाएँ, पूर्णिमा का यही अर्थ है।

तो फिर आषाढ़ की पूर्णिमा का इतना महत्त्व क्यों ? इस माह की पूर्णिमा को देश भर में गुरु-पूर्णिमा के रूप में क्यों मनाते हैं ? आषाढ़ से तो आकाश में बादल घिरने शुरु हो जाते हैं। आषाढ़, सावन, भादों ये सब ऐसे महीने हैं जिनके आते ही लोग मेघ, वर्षा, मिलन-विरह इत्यादि के गीत गाते हैं या बातें करते हैं। फिर आषाढ़ की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा क्यों कहा जाता है ? जबकि इस पूर्णिमा को चन्द्र – दर्शन होंगे भी या नहीं ये भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता।

इस गूढ़ रहस्य को समझने का प्रयास करें तो एक अर्थ ये स्पष्ट होता है …
‘गुरु’ स्वयं प्रकाशमान पूर्ण चन्द्र के समान हैं और शिष्य – गण आकाश में घिरे उन बादलों के समान हैं जो चन्द्रमा के प्रकाश से श्याम – वर्ण से श्वेत – वर्ण में परिवर्तित हो जाते हैं। ठीक इसी प्रकार गुरु रूपी चन्द्र के प्रकाश से शिष्यों के अज्ञान रुपी काले बादल ज्ञान के प्रकाश से जगमगा उठते हैं। इस तरह प्रतीकात्मक रूप से अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा का आभास होता है। गुरु शब्द का अर्थ ही है अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाना।

मान्यता ये भी है की आदि गुरु वेद व्यास जी का जन्म इसी आषाढ़ी पूर्णिमा को हुआ था अतः उनके सम्मान में इस पूर्णिमा को गुरु – पर्व के रूप में मनाया जाता है और इसी कारण इसे ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहा जाता है।

माता – पिता और गुरु का आशीर्वाद सदा कल्याणकारी तथा पथ – प्रदर्शक होता है। जीवन में गुरु और शिष्य की परम्परा के महत्त्व को अगली पीढ़ी समझे, इस दृष्टि से भी इस पर्व को मनाये जाने की स्वस्थ परम्परा भारत में है। इसमें अंध – विश्वास जैसी कोई बात नहीं है।

यदि गहराई से चिंतन करके देखेंगे और किसी भी परंपरा की जड़ों तक जाने के लिए हम अध्ययन करेंगे तो हम पाएंगे कि भारत की कोई भी परंपरा और कोई भी पर्व अंधविश्वास नहीं है; हर पर्व का कोई ना कोई वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। इसे श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया जाना चाहिए।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

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  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — गुरु ही अपने शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं और वे ही जीवन को ऊर्जामय बनाते हैं। जीवन विकास के लिए हमारे भारतीय संस्कृति में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका मानी गई है। गुरु की सन्निधि, प्रवचन, आशीर्वाद और अनुग्रह जिसे भी भाग्य से मिल जाए उसका तो जीवन कृतार्थता से भर उठता है। क्योंकि गुरु बिना न तो आत्म-दर्शन होता और न परमात्म-दर्शन। माता – पिता और गुरु का आशीर्वाद सदा कल्याणकारी तथा पथ – प्रदर्शक होता है। जीवन में गुरु और शिष्य की परम्परा के महत्त्व को अगली पीढ़ी समझे, इस दृष्टि से भी इस पर्व को मनाये जाने की स्वस्थ परम्परा भारत में है। इसमें अंध – विश्वास जैसी कोई बात नहीं है। भारत की कोई भी परंपरा और कोई भी पर्व अंधविश्वास नहीं है; हर पर्व का कोई ना कोई वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। इसे श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया जाना चाहिए। गुरु रूपी चन्द्र के प्रकाश से शिष्यों के अज्ञान रुपी काले बादल ज्ञान के प्रकाश से जगमगा उठते हैं। इस तरह प्रतीकात्मक रूप से अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा का आभास होता है। गुरु शब्द का अर्थ ही है अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाना।

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यह लेख (आषाढ़ – गुरु पूर्णिमा का महत्व।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी मुक्तक/कवितायें/गीत/दोहे/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई आई टी . शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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डॉक्टर दिवस।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ डॉक्टर दिवस। ♦

भारत में हर साल 1 जुलाई को डॉक्टर दिवस मनाया जाता है। चिकित्सा के क्षेत्र में डॉ बिधान चंद्र राय द्वारा दिए गए योगदान के लिए हम इस दिन को उनके जन्म दिवस और पुण्यतिथि के रूप में उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए सम्मान पूर्वक मनाते हैं। वह एक स्वतंत्रता सेनानी और चिकित्सक थे, उन्हें सन 1961 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। उन्होंने भारत में शिक्षा के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी इनका जन्मदिन और पुण्यतिथि दोनों 1 जुलाई को थे।

इस महत्वपूर्ण तिथि को मनाने के बहुत सारे कारण भी हैं, सभी डॉक्टर मानवता की सेवा करने और उन लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने महान आदर्श के साथ अपने पेशे से जीवन शुरू करते हैं। कुछ डॉक्टर इन विचारों की दृष्टि से खरे नहीं उतरते हैं और भ्रष्ट और नैतिकता का रास्ता अपना लेते हैं।

लेकिन कोरोना महामारी के समय डॉक्टरों ने जो अपना समय मानवता की सेवा के लिए अपनी जान की परवाह न करते हुए जो जनता सेवा की है। वह एक प्रशंसनीय कार्य है अपनी जान जोखिम में डालकर डॉक्टरों ने लाखों लोगों को इस बीमारी से मुक्त कराया। हम इस बात को नहीं नकार सकते कि डॉक्टर भी भगवान के रूप में कार्य करते हैं।

डॉक्टर का जीवन निस्वार्थ सेवा से भरा हुआ होता है। बहुत ही कुछ ऐसे डॉक्टर होते हैं; जो अनैतिकता के कार्य करते हैं, जिन्हें पैसे का लालच होता है। डॉक्टर को भगवान का दर्जा दिया गया है जो डॉक्टर मानव की सेवा करने के लिए अपनी जान की परवाह न करते हुए सेवा करते हैं। वह भगवान के समान होते हैं। इस दिन को हम शांत और गंभीर तरीके से मनाते हैं। आमतौर पर देश के अनेक हिस्सों में डॉक्टरों के योगदान के लिए उन्हें फूलों के गुलदस्ते या ग्रीटिंग कार्ड्स भी दिए जाते हैं।

इसके अलावा जहां अच्छे डॉक्टरों को उनके अनुभवों को साझा करने के लिए आमंत्रित किया जाता है। अनेक सेमिनार आयोजित किए जाते हैं और कुशल डॉक्टरों को सम्मानित किया जाता है।

डॉक्टर दिवस का लाल रंग जो साहस का प्रतीक है, फूलों के रंग से जो प्रेम धर्मार्थ बलिदान, बहादुरी, मानवता की सेवा और साहस को दर्शाते है। यह मेडिकल प्रोफेशनल और उनके द्वारा किए गए योगदान के लिए सम्मान है। डॉक्टर अपनी हर सम्भव किसी भी मनुष्य को ठीक करने लिए प्रयासरत रहते है उनका कर्म ही उनकी पूजा है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — एक अच्छे डॉक्टर का जीवन निस्वार्थ सेवा से भरा हुआ होता है। डॉक्टर को भगवान का दर्जा दिया गया है जो डॉक्टर मानव की सेवा करने के लिए अपनी जान की परवाह न करते हुए सेवा करते हैं। भारत में हर साल 1 जुलाई को डॉक्टर दिवस मनाया जाता है डॉ बिधान चंद्र रॉय द्वारा दिए गए योगदान के लिए हम इस दिन उनके सम्मान के रूप में उन्हें श्रद्धांजलि देते है। वह चिकित्सक तथा स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्हे वर्ष 1961 में भारत रत्न से सम्मनित किया गया।

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यह लेख (डॉक्टर दिवस।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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