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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिन्दी-कविता

क्या-क्या देखें।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ क्या-क्या देखें। ♦

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आपकी सूरत के बाद और क्या देखें।
नजर हटे तब तो कुछ और नया देखें।
खुदा की ऐसी भी जब खुदाई है यहाँ।
फिर क्यूँ कुछ ऐसा वैसा खामख्वाह देखें॥

तसव्वुर का भी मिजाज़ आज बदला है।
लबों की शर्मो-हया, पलकों की अदा देखें।
जफ़ा, वफ़ा, कसमें, वादे, सब बकवास।
आज तो बस लरजे हुस्न का जलवा देखें॥

मन को कुछ भी समझ नहीं आ रहा।
दफ्तर देखें, घर देखें, कि रास्ता देखें।
चाँद आंगन में ना आज उतर ही आये।
छत, सीढ़ी, आइना देखें कि चेहरा देखें॥

काजल, सुरमा, मेंहदी, महावर को।
कब तक खफ़ा, बिखरा, तन्हा देखें।
कुछ ख्वाहिशें, कुछ गिले भी हैं इनके।
मेरी किस्मत से जुड़ा है ये मामला देखें॥

हर बार दुवा पढ़ते आसमां की तरफ।
क्यूँ बार – बार हाथ की मोटी रेखा देखें।
आके सारी उलझन ही खत्म कर दो ना।
जँचता नहीं है, रेखाओं को जुदा देखें॥

♦ शैलेश कुमार मिश्र (शैल) – मधुबनी, बिहार ♦

  • “शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी” ने इस कविता के माध्यम से नारी के सच्चे सौंदर्य का बहुत ही मनोरम, सौम्य व मृदुल वर्णन किया है।

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यह कविता “शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपने सच्चे मन से देश की सेवा के साथ-साथ एक कवि हृदय को भी बनाये रखा। आपने अपने कवि हृदय को दबाया नहीं। यही तो खासियत है हमारे देश के वीर जवानों की। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

About Yourself – आपके ही शब्दों में —

  • नाम: शैलेश कुमार मिश्र (शैल)
  • शिक्षा: स्नातकोत्तर (PG Diploma)
  • व्यवसाय: केन्द्रीय पुलिस बल में 2001 से राजपत्रित अधिकारी के रूप में कार्यरत।
  • रुचि: साहित्य-पठन एवं लेखन, खेलकूद, वाद-विवाद, पर्यटन, मंच संचालन इत्यादि।
  • पूर्व प्रकाशन: कविता संग्रह – 4, विभागीय पुस्तक – 2
  • अनुभव: 5 साल प्रशिक्षण का अनुभव, संयुक्त राष्ट्रसंघ में अफ्रीका में शांति सेना का 1 साल का अनुभव।
  • पता: आप ग्राम-चिकना, मधुबनी, बिहार से है।

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आपकी लेखनी यूँ ही चलती रहे, जनमानस के कल्याण के लिए। उस अनंत शक्ति की कृपा आप पर बनी रहे। इन्ही शुभकामनाओं के साथ इस लेख को विराम देता हूँ। तहे दिल से KMSRAJ51.COM — के ऑथर फैमिली में आपका स्वागत है। आपका अनुज – कृष्ण मोहन सिंह।

  • जरूर पढ़े: स्वाद बदलना होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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स्वाद बदलना होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ स्वाद बदलना होगा। ♦

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माहौल बदलने के लिए मिजाज बदलना होगा।
मुकद्दर के लिये नजरिया, अंदाज बदलना होगा।
आसमां की दूरी अगर वाकई कम करनी है।
घायल परिंदों को भी परवाज़ बदलना होगा॥

रोने धोने से रात के घंटे कब कम होते हैं।
कल बदलने के लिए आज बदलना होगा।
मर्ज पता है सबको लेकिन दर्द कौन सहे।
मीठी गोली, वैद्य, दाई, इलाज बदलना होगा॥

सिर्फ बातें और चिंता से समाज नहीं बदलता।
घर की संस्कृति, रीति – रिवाज बदलना होगा।
मंदिर मस्जिद राम रहीम बहुत बदल के देखे।
समरसता के लिए भजन, नमाज़ बदलना होगा॥

एक-एक कदम बढ़ाने से ही फराज़ कम होगा।
बेटे – बेटी का फर्क, जमीं, सिराज बदलना होगा।
अपने खून पसीने का नमक चख के तो देखो।
मुस्तकबिल बदलेगा, स्वाद, अनाज बदलना होगा॥

♦ शैलेश कुमार मिश्र (शैल) – मधुबनी, बिहार ♦

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यह कविता “शैलेश कुमार मिश्र (शैल) जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपने सच्चे मन से देश की सेवा के साथ-साथ एक कवि हृदय को भी बनाये रखा। आपने अपने कवि हृदय को दबाया नहीं। यही तो खासियत है हमारे देश के वीर जवानों की। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

About Yourself – आपके ही शब्दों में —

  • नाम: शैलेश कुमार मिश्र (शैल)
  • शिक्षा: स्नातकोत्तर (PG Diploma)
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  • रुचि: साहित्य-पठन एवं लेखन, खेलकूद, वाद-विवाद, पर्यटन, मंच संचालन इत्यादि।
  • पूर्व प्रकाशन: कविता संग्रह – 4, विभागीय पुस्तक – 2
  • अनुभव: 5 साल प्रशिक्षण का अनुभव, संयुक्त राष्ट्रसंघ में अफ्रीका में शांति सेना का 1 साल का अनुभव।
  • पता: आप ग्राम-चिकना, मधुबनी, बिहार से है।

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  • जरूर पढ़े: क्या-क्या देखें।
  • जरूर पढ़े: लेखक का ख्वाब।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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इक जख्म सा सीने में।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ इक जख्म सा सीने में। ♦

इक जख्म सा सीने में था रात भर रिसता रहा।
जिंदगी की दौड़ में, ‘मैं’ ही सदा पिसता रहा॥

आज जाकर ये लगा कुछ सोच लूँ अपने लिए।
हाथ में था अब तलक जो हाथ से गिरता रहा॥

हर कसौटी पर जमाने की खरा उतरा हूँ मैं।
क्योंकि अब तक सब लकीरें हाथ की घिसता रहा॥

दौर कितने गम ख़ुशी के संग लायी जिन्दगी।
ले हंसी मुस्कान लब पर मैं यूँ ही हँसता रहा॥

उमर सारी ही लगा दी कर ली सबकी बंदगी।
निज ख़ुशी का स्वप्न मेरी आँख में बसता रहा॥

बेरुखी सबसे मिली टूटा सदा विश्वास था।
प्यार सबमें बाँट मन में हौसला भरता रहा॥

मैं हूँ क्या, क्या चाहतें हैं, जान ले कोई जरा।
बस यही एक ख्वाब मेरी आँख में पलता रहा॥

♦– अनामिका लेखिका –♦

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कभी खुद से मिलकर तो देखो।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ कभी खुद से मिलकर तो देखो। ♦

कभी खुद से मिलकर तो देखो।
अचरज न हो तो कहना।
खुद से प्रश्न पूछकर तो देखो।
सब राज खुल न जाएं तो कहना॥

हर अच्छाई को निखारने और बुराई को,
सुधारने का प्रण न हो जाए तो कहना।
अपने गुणों, अवगुणों का विश्लेषण करके,
तो देखो – जीवन लक्ष्य न मिल जाए तो कहना॥

कभी खुद से मिलकर तो देखो।
अति व्यस्त न हो जाओ तो कहना।
मायावी दुनिया में रहकर।
अंत:करण में झांक कर तो देखो,
हरिदर्शन कर स्वयं से प्रेम न हो जाए तो कहना॥

अपनी प्रतिभा को पहचान कर तो देखो।
खुद से मित्रता न हो जाए तो कहना।
आत्म-विश्लेषण करके तो देखो।
हीरे की तरह तराशे न जाओ तो कहना॥
कभी खुद से मिलकर तो देखो॥
कभी खुद से मिलकर तो देखो॥

♦– डॉ• संगीता पाहुजा – दिल्ली –♦

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यह कविता “डॉ• संगीता पाहुजा” जी की रचना है। आपके द्वारा लिखी कविता ह्रदय को छूने वाली होती है। हर उम्र के लोग आपकी कविताओं को पसंद करते है। आपकी कविताओं से हर उम्र के लोगो को फायदा मिलता है। आपकी लेखनी यु ही चलती रहे। आपके उज्जवल भविष्य और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूँ। “डॉ• संगीता पाहुजा” जी KMSRAJ51.COM के ऑथर टीम पैनल में आपका तहे दिल से स्वागत है।

जरूर पढ़े: एक खत तुम्हारे राजा को।

जरूर पढ़े: दिल से कागज में उतर ही जाती है।

जरूर पढ़े: हम दोनों की दो-दो आंखें।

♥⇔♥

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बुझने से पहले।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ बुझने से पहले। ♦

जिस तरह रात सरकते-सरकते।
सीने में जलता कोयला।
धीरे-धीरे से राख़ बनते हुए।
बुझकर ठंडी पड़ रही हूँ।
धुआंकश की नली में इस वक्त।
धुआं की बारीक बेल तक नहीं॥

तुमने गौर नहीं किया था उस दिन।
तुमने आग में जो धकेल दिये।
उस कुंदे में जान अभी बाकी थी।
कच्चे लट्ठे से उठते धुआं के बादल।
जलन से चढ़ती जा रही।
तुम्हारी आँखों की लाली॥

और तुम फ़िर से इंधन छिड़क कर,
आग लगा देते थे।
और मैं भड़क कर धक्-धक् दहकने लगती थी।
वो किस तरह की तेज़ ज्वालाएँ थीं मेरी।
वो किस तरह की जलती अंगारे आंखें थी मेरी।
वो किस तरस की लौ की जीभ थी मेरी॥

उन दिनों तुम्हारी,
अक्खड़ और दुष्टता से भरी।
घमंड के महल को जलाकर।
भस्म करने के हठ से ही।
दहड़-दहड़ दहक रही थी मैं भी॥

तुम तो चूल्हे की सीमा के अंदर ही।
मुझे जलाकर उसकी आंच पर,
अपनी दाल पकाने वाले चालाक हो।
मुझे जला-जलाकर ही,
अपनी भूख मिटाने में माहिर हो॥

सच कहूँ तो एक भूख मुझमें भी थी।
इस घोर अंधकार की रातों में।
तुम्हारी आँखों में चिराग बनकर।
जल जाने की भूख।
और एक प्यास भी मुझमें थी।
इस बर्फीली रातों की कड़ाके की ठंड में॥

तुम्हारे पत्थर दिल को।
अपनी गरम होंठों से चूमकर।
जान डाल देने की प्यास।
मगर अफ़सोस…
आग लगाने वाले हाथ ही।
रोशनी न समझने पर॥

बाज़ार खत्म हो जाने के बाद भी।
तोल मोल खत्म न होने पर,
क्षय होने लगती हूँ।
क्षमा करने लगती हूँ।
लेकिन तुम जैसे थे, वैसे ही हो आज भी।
पिघली नहीं है रत्तीभर भी।
आग लगाने वाली तुम्हारी ताकत॥

उंडेल देते हो इंधन, फ़िर भी।
मिटती नहीं है तुम्हारी वो भूख भी।
तुम्हारे अंगारों के कुंड में जलते-जलते।
खुद को ही जलाते-जलाते।
अंत में राख़ के अंदर ही अंदर बुझते-बुझते।
इस बर्फीली रातों में, ठंडी पड़ती जा रही हूँ॥

उतने में कहीं ओर से,
इस शीतल रात की आखरी प्रहर।
किसी पंछी की मीठी पुकार।
तेल घटे दिल के दीये में।
प्रेम बहाती किसी की नर्म उंगलियां॥

सोच रही हूँ।
बुझने से पहले फ़िर एक बार।
नयापन से, नये सिरे से।
लाख दीपक के तरह।
मैं क्यूं न जल उठूँ?

♦– मीरा मेघमाला –♦

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यह कविता “मीरा मेघमाला” जी की रचना है। आपके द्वारा लिखी कविता ह्रदय को छूने वाली होती है। हर उम्र के लोग आपकी कविताओं को पसंद करते है। आपकी कविताओं से हर उम्र के लोगो को फायदा मिलता है। आपकी लेखनी यु ही चलती रहे। आपके उज्जवल भविष्य और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूँ। “मीरा मेघमाला” जी KMSRAJ51.COM के ऑथर टीम पैनल में आपका तहे दिल से स्वागत है।

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अकाल की भारी बरसात।

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♦ अकाल की भारी बरसात। ♦

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अकाल से तपते बंजर खेतों में।
संज्ञहीन बैठे किसान के सामने।
कैमरा और माइक के साथ।
अचानक प्रकट हुआ।
टीवी चैनल का एक संवाददाता और
एक ही सांस में बरसाने लगा कईं सवाल॥

‘ये अकाल है, या क्या है?
इसका जिम्मेदार कौन है?
इससे आपको क्या तकलीफ़ है?
नज़दीक ही सिंचाई बांध है और
पास में ही भरी बहती नहर।
फ़िर भी पानी की कमी का आरोप।
बताइए ये कितना सही है॥’

शुन्य में गढ़ी नज़र।
जरा भी न हटाते हुए।
विषण्ण हंसी के साथ।
किसान का एकालाप।
‘पैसे वालों ने खोदा गड्ढा बड़ा है।
और पानी तो हमेशा।
नीचे की ओर ही बहता है॥’

अकाल से दहकते धूप के गाँव में।
एक दिन एक ही घंटे भर।
एकाएक भारी बारिश।
खड़कती बिजलियां।
और तेज़ आंधी की भयावह दौड़।
धराशायी पेड़-पौधों को देखकर।
ढह कर बेहोश गिर पड़ा किसान।
और उसके सामने।
संवाददाता फ़िर से हुआ हाज़िर॥

‘बारिश की कमी को कोसते हो।
जब बारिश हुई तो फूट-फूट कर रोते हो।
गिर पड़े पेड़-पौधों पर ही यूं लेटे हो।
बताओ अब तुम कैसा महसूस कर रहे हो?’
घबराहट से पल भर आंखें खोलते।
हालात को देखकर फ़िर से होश खोते॥

कमज़ोर आवाज़ में बड़बड़ाने लगा।
कंगाल किसान।
“क्या करें भाई।
पैसे वालों के महलों के जितने मज़बूत नहीं है।
अपने खेतों की केले के पौधों की कमर।
कैसे सह पाएँगे आंधी-तूफ़ानों का असर॥”

♦– मीरा मेघमाला –♦

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यह कविता “मीरा मेघमाला” जी की रचना है। आपके द्वारा लिखी कविता ह्रदय को छूने वाली होती है। हर उम्र के लोग आपकी कविताओं को पसंद करते है। आपकी कविताओं से हर उम्र के लोगो को फायदा मिलता है। आपकी लेखनी यु ही चलती रहे। आपके उज्जवल भविष्य और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूँ। “मीरा मेघमाला” जी KMSRAJ51.COM के ऑथर टीम पैनल में आपका तहे दिल से स्वागत है।

जरूर पढ़े: एक खत तुम्हारे राजा को।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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तुम्हारी अंतिम यात्रा पर।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

♦ तुम्हारी अंतिम यात्रा पर। ♦

जब नसीब अच्छा हो।
कंकड़ को कागज़ के टुकड़े में।
लपेट कर भी दे-दें।
उसकी भी अहमियत बढ़ जाएगी॥

जनाज़े पर सजा फूल।
अज़ीब तरीके से हंसने लगा।
वजह ढूंढने की मेरी भी आदत पुरानी है।
आख़िर उसने राज़ खोल ही दिया॥

‘जीते जी हाथ छोडकर चला हर शख़्स।
इस अंतिम यात्रा के चरम गीत में,
सुर मिला रहा है।
ज़रा इसे ग़ौर से देख लेना।
तुम्हारी अंतिम यात्रा में भी, ठीक ऐसा ही होगा॥

रात भर नींद की ग़ैरहाज़िरी।
और आख़िरी प्रहर में।
आँख लगने लगती है तो,
जितनी भी सुरीली हो, अलार्म की धुन।
लगती है बेहद क्रूर और कर्ण-कटु॥

मोहल्ले में मछली वाला।
जब से मछलियां तोलने में लगा है।
तब से गहरी सोच में डूबी हूँ।
कि, इन मछलियों के क़त्ल में।
मेरे पाप का हिस्सा कितना है॥

कोई हाथ छोडकर दूर चला जाता है।
उसके लौट आने के भरोसे को ही, जी लेने को।
अमर प्रेम कहते है लोग।
जिस अमर प्रेम का कारण बने।
उस बेवफाई को, क्या नज़राना दिया जाये॥

खुशी हुई ये सुनकर कि,
‘जो बीच सड़क पर छोडकर जाएगा।
वो भी मेरी अंतिम यात्रा पर,
उस चरम गीत में अपना सुर मिलाएगा।’
इसे अगर मैं देख पाती।
तो और भी बड़ी खुशी होती॥

♦– मीरा मेघमाला –♦

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यह कविता “मीरा मेघमाला” जी की रचना है। आपके द्वारा लिखी कविता ह्रदय को छूने वाली होती है। हर उम्र के लोग आपकी कविताओं को पसंद करते है। आपकी कविताओं से हर उम्र के लोगो को फायदा मिलता है। आपकी लेखनी यु ही चलती रहे। आपके उज्जवल भविष्य और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूँ। “मीरा मेघमाला” जी KMSRAJ51.COM के ऑथर टीम पैनल में आपका तहे दिल से स्वागत है।

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अधूरे किस्से।

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♦ अधूरे किस्से। ♦

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जब भी स्क्रॉल करती हूँ,
देखती हूँ।
मोबाइल के नॉट पैड को।
कितने अधूरे किस्से दिख जाते है।
अनमने से, मुह सिकोड़े हुए॥

अधूरे शब्द, अधूरे किस्से, अधूरी नज्में।
कुछ पुरानी अधूरी यादों के साथ।
पहुँचते ही मेरे…
शब्द फिर से अंगड़ाई ले।
जगने की कोशिश करते हैं॥

स्क्रीन से बाहर झांकते हुए।
जैसे बुलाते हो मुझे।
जैसे आतुर हों मेरे साथ चल।
सफर को पूरा करने को।
जैसे, उकसाते हों मुझे।
उन अधूरे किस्सों को तमाम करने को॥

उलझनों में फंसी, कुछ जिद्दी।
मैं भी कहाँ सुनती हूँ उन्हें?
यूँ ही अधूरे ,अनमने से,
मुह सिकोड़े पड़े रहने देती हूँ।
क्योंकि, हर किस्सा तमाम नहीं हो सकता॥
#सिर्फ तुम्हारे लिए

♦– माधुरी “मुस्कान” शर्मा –♦

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तुम्हारी एक मुस्कुराहट।

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♦ तुम्हारी एक मुस्कुराहट। ♦

tumhaaree-ek-muskuraahat-kmsraj51.png

एक बाहरी दुनिया।
एक भीतरी दुनिया।
और एक मैं बीच,
दरवाज़े के पर्दे की तरह।
झूलती हूँ इधर-उधर॥

भ्रमर उड़ा है आंगन के उस पार।
सुगंध की जड़।
केवल मधु समझ कर।
वह क्यों नहीं समझ पाता कि,
अपरिमित महक से अपनी ओर,
आकर्षित करने वाले।
जानलेवा ‘नेपेंतिस’ भी रहते हैं।
इस अज़ीब से जंगल में॥

मैं भी तो कितनी ना समझ हूँ।
फ़िर वही बेअक़ल काम कर जाती हूँ।
खाली डिब्बे को उल्टा करके हिलाना।
ताड़ते हुए फिर हिलाना।
जब छोटी थी।
ऐसी हरकत पर हंसी छलकती थी।
अब तो बेहद हताशा॥

जब भी मन बेहाल होता है।
मैं तुम्हारी तरफ़ ही देखने लगती हूँ।
तुम्हारे होठों की एक मुस्कुराहट।
तन-मन को पुनर्जीवित करती है॥

♦– मीरा मेघमाला –♦

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यह कविता “मीरा मेघमाला” जी की रचना है। आपके द्वारा लिखी कविता ह्रदय को छूने वाली होती है। हर उम्र के लोग आपकी कविताओं को पसंद करते है। आपकी कविताओं से हर उम्र के लोगो को फायदा मिलता है। आपकी लेखनी यु ही चलती रहे। आपके उज्जवल भविष्य और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूँ। “मीरा मेघमाला” जी KMSRAJ51.COM के ऑथर टीम पैनल में आपका तहे दिल से स्वागत है।

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अपना अधिकार।

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♦ अपना अधिकार। ♦

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ये करो, वो नहीं।
ऐसे करो, वैसे नहीं।
इससे बात करो, उससे नहीं।
ऐसे बैठो, ऐसे हँसो।
दिन भर खी-खी मत करो।
काम सुघड़ता से किया करो।
अपने घर जा के बेइज़्ज़त करोगी हमें॥

ये नही करने आता।
वो नही करने आता।
ठीक से कैसे बैठते हैं।
सबको खुश कैसे रखते हैं।
क्या सीखा है जीवन भर।
यही सीख के आयी हो।
मोहल्ले भर में बेइज्जती कराती फिरती हो।
ये सब करना है तो अपने घर जाओ वापस॥

कच्ची उम्र में ब्याह दी गयी।
उस नन्ही सी जान ने।
जीवन भर दूसरों का कहना ही सीखा था।
अपने मुँह में ज़बान होती है।
या दाँत भी होते हैं, ये जानती भी न थी।
कच्ची उम्र में खानदान की इज़्ज़त संभालना।
पड़ता था उसे, जब कि जानती भी नहीं कि,
हंसने बोलने से इज़्ज़त कैसे निकल जाती है॥

सीखते, संभालते उम्र निकल जाती है।
लेकिन अपना घर नही मिलता।
औरतों को खुल कर हंसने बोलने मुस्कुराने,
का अधिकार नही मिलता॥

♦–  प्राप्ति सिंह –♦

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