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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिन्दी-कविता

वक्त कहाँ रह पाया सदा सिकन्दर का।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

♦ वक्त कहाँ रह पाया सदा सिकन्दर का। ♦

vakt-kahaan-rah-paaya-sada-sikandar-ka-kmsraj51.png

वक्त कहाँ रह पाया सदा सिकन्दर का।
शाम ढले-ढल जाता तेज प्रभाकर का॥

ये भी साल चला जाएगा कल परसों।
फिर से स्वागत होगा नए कलेंडर का॥

उघड़े तन को भी कोई कम्बल दे दो।
कानों में कह जाता मास दिसम्बर का॥

बुरे समय की आँधी जब भी चलती है।
तिनका-तिनका उड़ जाता है छप्पर का॥

जिम्मेदारी पूरी और आधी तनख़्वाह।
कहाँ रिटायर होगा मुखिया इस घर का॥

चलते-चलते वक्त ज़रा थम जाएगा।
आएगा जब नाम ज़ुबाँ पर अलवर का॥

पल बदले, मौसम बदला, तिथियाँ बदलीं।
रंग बदल जाएगा तन की चादर का॥

♦– डॉ• सीमा विजयवर्गीय, अलवर (राजस्थान) –♦

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।~Kmsraj51

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cymt-kmsraj51

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

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एक खत तुम्हारे राजा को।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

♦ एक खत तुम्हारे राजा को। ♦

सारंगी बजाते।
अपनी धुन में।
मस्त रहने वाले।
राजा को तुम।
यदि अपनी भूख के बारे मे।
एक खत लिखना चाहते हो।
तो लिख दो॥

लेकिन उस खत को।
तुम अपने पसीने की बूंदों से।
मत लिखना।
वो उसे नहीं दिखेगा॥

लेकिन उस खत को।
तुम अपने पसीने की बूंदों से।
मत लिखना।
वो उसे नहीं दिखेगा॥

और तुम आंसुओं की।
बूंदों से भी मत लिखना।
उसे भी वो पढ़ नहीं पाएगा॥

अगर लिखना ही है।
एक खत तुम्हें राजा को।
अपनी भूख के बारे में।
तो तुम लहू की बूंदों से लिख दो।
तब दोनों में से एक तय होगा॥

अगर ऐसा ही हुआ तो।
तुम्हारा खत पढ़ने के लिए।
वो ही नहीं रहेगा।
या फिर इसका जवाब पढ़ने तक।
तुम ही नहीं रहोगे॥
♦– मीरा मेघमाला –♦

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यह कविता “मीरा मेघमाला” जी की रचना है। आपके द्वारा लिखी कविता ह्रदय को छूने वाली होती है। हर उम्र के लोग आपकी कविताओं को पसंद करते है। आपकी कविताओं से हर उम्र के लोगो को फायदा मिलता है। आपकी लेखनी यु ही चलती रहे। आपके उज्जवल भविष्य और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूँ। “मीरा मेघमाला” जी KMSRAJ51.COM के ऑथर टीम पैनल में आपका तहे दिल से स्वागत है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

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बंदे को एकतरफा प्यार ने मार डाला।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

♦ बंदे को एकतरफा प्यार ने मार डाला। ♦

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रूप से बचा तो, श्रृंगार ने मार डाला।
थोड़ा संभले तो, रूखसार ने मार डाला।
उम्मीद था कि आप पलट के देखेंगे।
गलतफहमी थी, ऐतबार ने मार डाला॥

यूँ भी कोई दिल तोड़ के जाता है क्या?
यकीन को अहदे-इंतजार ने मार डाला।
कम से कम नाम पता तो छोड़ के जाते।
शायर को तल्खी, व्यवहार ने मार डाला॥

कभी मैंने अपने खुदी, जमीर मार दी।
कभी मुझको मेरे किरदार ने मार डाला।
इश्क फिर भी कहीं न कहीं रहा जिंदा।
इश्क की हुंकार ने, धिक्कार ने मार डाला॥

चाक सा नये-नये खिलौने गढ़ता रहा।
खिलौने की आत्मा कुम्हार ने मार डाला।
कभी मिट्टी को कभी हाथों को दोष दी।
मुहब्बत की अदा ने, उभार ने मार डाला॥

अब दुनियाँ से मुँह छुपाये फिरते हैं।
दुनियाँ के रंग-ढंग, रफ्तार ने मार डाला।
कई बार ये सुनके फिर मरना पड़ता है।
“बंदे को एकतरफा प्यार ने मार डाला॥”

♦– शैल – द्वारा, स्वरचित ♦

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

 

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मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

♦ मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं। ♦

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सारे ग़म भूलकर खिलखिलाओ प्रिये।
मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं॥

कभी इनके लिए कभी उनके लिए।
हरदम जीतीं व पीड़ाएं पीतीं रहीं।
जब लड़कपन था वे सब हमारे रहे।
व्याह बंधन में बंध सब बिछड़ने लगे॥

अब निराशा की चादर झटक दो प्रिये।
मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं॥

पंख तुमने दिए, फिर परिंदे बने।
पंख फैला गगन में वे उड़ने लगे।
अपनी दुनिया बनाने की आशा लिए।
नीड़ खुदके बड़े हो बनाने लगे॥

उनको उड़ने दो खुद मुस्कराओ प्रिये।
मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं॥

अपनी खुशियों को रौंदा न आहें भरा।
उनकी खुशियों के हित, सब लुटाते रहे।
जब सांसें हमारी सिमटने लगीं।
कौन जाने वे क्यों कतराने लगे॥

बोझ मनका उतारो हंसो तुम प्रिये।
मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं॥

यह जीवन प्रकृति ने हमें है दिया।
एक उपहार ले बस इसे तुम जियो।
हास परिहास से जिंदगी काट लो।
दग्ध दिल पर न अब चोट आगे लगे॥

तुम प्रकृति की तरह मुस्कराओ प्रिये।
मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं॥

एक वो था समय मखमली रातें थीं।
सब तरफ खुशियां थी और सौगातें थीं।
आज आशा निराशा की नौका लिए।
बीच मझधार में डगमगाने लगे॥

ये हैं कमजोर सांसें संभालो प्रिये।
मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं॥

हम भले आज कमजोर थोड़ा हुए।
पर हमारा नहीं यह प्रकृति दोष है।
ढल रही इस उमर का असर देखिए।
नाते रिश्ते सभी दूर होने लगे॥

हाथ में हाथ ले मुस्कुराओ प्रिये।
मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं॥
♦– आर.जी.कुरील – सिविल लाइन, उन्नाव ♦

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अपनी नज़रों पे बे-वज़ह ना इतना बल दो।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ अपनी नज़रों पे बे-वज़ह ना इतना बल दो। ♦

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अपनी नज़रों पे बे-वज़ह ना इतना बल दो।
हो सके तो अपने घर का आईना बदल दो॥

ना काटो मुझे मैं शज़र हूँ परिन्दों का घर हूँ।
दूंगा मैं बादल बहुत तुम मुझे थोड़ा जल दो॥

माना कि फूलों के शौक़ीन हैं चमन में बहुत।
लेकिन ये शौक़ कैसा जी भरे और मसल दो॥

लो हम हैं गुस्ताख़, हर सज़ा है कबूल हमको।
मगर इन बे-कुसूरों पे लगी तोहमतें बदल दो॥

उफ़ान सवालों का बना दिल में सैलाब “शशि”।
ऐ मेरी आँखों, इन्हें हल दो या मुझे ग़ज़ल दो॥
♦– डाॅ सच्चितानन्द चौधरी “शशि”♦

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दर्पण।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ दर्पण। ♦

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अपने प्रतिबिंब का अवलोकन करता हूँ।
जब भी दर्पण सामने संयम का होता है॥

बिम्बित-प्रतिबिंबित होती मन की तरंगें।
अदृश्य अस्तित्व की होती साथ परछाई।
परिचय दिगम्बरी दिशाओं का है ये मन।
ललित भाव सरल दर्पण मैं निहारता हूँ॥

उदास मन की बढ़ती गहरी व्याकुलता।
तब शब्दों का स्वयं दर्पण बन जाता है।
विचार एकाकी मन ज्यों छीन जाता है।
आभार मन दर्पण का तब कर पाता हूँ॥

आकर्षण सुंदर संपुट आशा का दर्पण।
नर- देही का सत्य दिखलाता है दर्पण।
स्मृतियों की भीगी अनुभूति – चित्रण।
मन के भीतर मैं दर्पण में देख पाता हूँ॥

मन पाखी उन्मुक्त विचरण भूलकर।
मुक्त मुक्तांगन में भी जब सिमटकर।
अव्यक्त प्रज्ञा प्रतिबिंब स्व हृदय की।
देव दर्पण में आभास निज मैं पाता हूँ॥
♦– देवेन्द्र हिरवानी, राजनांदगांव(छ.ग.) ♦

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हम दोनों की दो-दो आंखें।

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♦ हम दोनों की दो-दो आंखें। ♦

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हम दोनों की दो दो आंखें, इस दुनिया को ताके झांके।
तू कुछ देखे मैं कुछ देखूं , सोनी कुड़ियां मुन्डे बांके॥

आ इक दूजे में खो जाएं, खुद ही दो आंखें हो जाएं।
तू तू ना रहे, ना मैं ही मैं, दोनों मिलकर हम हो जाएं॥

जो ख्वाब अगर तू देखे तो, मेरी पलकों से निकलें वो।
इक सफ़र सुहाना हो जिस पर, जीवन की बग्गी को हांके।
हम दोनों की दो दो आंखें, इस दुनिया को ताके झांके॥॥

दोनों की खुशी या हों दुखड़े, दीखें इक दूजे के मुखड़े।
प्यार जताएं और मनाएं, गर जो रहें उखड़े-उखड़े॥

अरमानों को ले सो जाएं, आ इक दूजे में खो जाएं।
इस बगिया के मीठे फल की, हम यार लगे सुन दो फ़ाँकें।
हम दोनों की दो दो आंखें, इस दुनिया को ताके झांके॥॥
♦– रामकुमार भारद्वाज ♦

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अन्नदाता – किसान…।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ अन्नदाता – किसान…। ϒ

अन्नदाता

Farmer poetry in hindi

खून पसीने की फिर वही कहानी…..

झुलस रहा है बदन धूप में,
आखों में आशाएं भी है,
सर पर है मटियाला साफा,
पैरों में गरीबी साये भी है।

दूर तलक दिखते खेत है,
सूरज उनको तपाये भी है,
सूखे से भयभीत है किसान,
जो कर्ज में खुद को दबाए भी है।

जब बादल घिरते आसमान में,
लेती अँगड़ाई जब पुरवाई भी है,
मिट्टी में रहती नमी उस पल,
तब दिखती खेतों में हरियाली भी है।

प्याज से सूखी रोटी खाते है,
गीत वो सावन के गाते है,
श्रम से सींचे खेत है उन्होंने,
अनाज दूसरे छीन ले जाते है।

भूखे परिवार का पेट है भरते,
बेटी ब्याहने की चिंताएं भी है,
दो रोज का आराम मयस्सर नहीं,
खुद को पसीने में नहलाये भी है।

रक्षक सरकारी प्रताड़ित है करते,
साहूकार खूब धमकाते भी है,
चुनावों में जब बात है होती,
तब मन में जगती अभिलाषाएं भी है।

फिर छा जाता है वही अंधेरा,
होती फिर वही निराशा भी है,
खून पसीने की फिर वही कहानी,
वही किसान की पीड़ा भी है।

मौसम आते रूप बदल- बदल,
कुछ कुछ होती बरसाते भी है,
बच्चों की पढ़ाई दिन-रात सताती,
जीवन में काली घटाएं भी है।

जिम्मेदारियों का बोझ है सर पर,
दम तोड़ती सुख की लालसाएं भी है,
वह लाचार किसान है भारत का,
खादी और खाकी उनको सताए भी है।

आलस जरा न उसमें रहता ,
कष्टों के बीच वह मुस्कुराए भी है,
फिर क्यों बेबस है किसान आज ,
जो फाँसी को गले लगाये भी हैं।

©- डॉ मुकेश कुमार, – दिल्ली। ∇

♥ शिक्षक (हिंदी विषय) और मेंटोर शिक्षक रा. रा.क्षेत्र दिल्ली ♥

dr-mukesh-kumar-kmsraj51

हम दिल से आभारी हैं ♥ डॉ मुकेश कुमार – जी के प्रेरणादायक हिन्दी कविता “किसान” साझा करने के लिए।

About Dr. Mukesh Kumar – डॉ मुकेश कुमार जी के शब्दाें में –

लेखन – विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में।
रुचि: – कविता, कहानी, समीक्षा, शैक्षिक मुद्दों और समसामयिक मुद्दों आदि पर लिखना।
पिछले 19 वर्षों से साहित्य सेवा में अपनी भागीदार।
हिंदी साहित्य से जुड़े लेखकों एवं उनकी रचनाओं को पढ़ना।

योग्यता – पी. एच. डी. ♦ एम. एड. ♦ जे.आर. एफ.
शोध विषय – (पी. एच. डी.) विद्यासागर नोटियाल : व्यक्तित्व एवं कृतित्व,

शोध विषय : एम. एड
(बहुभाषिकता एवं अधिगम : नई युक्तियाँ सामग्रियां और संभावनाएं)

डॉ मुकेश कुमार जी के लिए मेरे विचार: 

♣ “डॉ मुकेश कुमार जी” ने कविता के माध्यम से खून पसीने की फिर वही कहानी, अन्नदाता किसान के मेहनती जीवन की कड़वी सच्चाई – “किसान”, का सुंदर वर्णन किया है। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। कविताऐं छोटी और सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान इन कविताओं काे गहराई(हर शब्दाे का सार) से समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।

♥••—••♥

ϒ यह कविता जरूर पढ़े – मजदूर…। ϒ

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।~Kmsraj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought to life by. By doing this you Recognize hidden within the buraiya ensolar radiation, and encourage good solar radiation to become themselves.

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

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Filed Under: डॉ मुकेश कुमार कि कवितायें, हिन्दी-कविता Tagged With: farmer poetry in hindi, hindi poetry, Poetry by Dr. Mukesh Kumar, poetry in hindi, अन्नदाता, खून पसीने की फिर वही कहानी, डॉ मुकेश कुमार कि कवितायें

मैं क्या मेरी आरज़ू क्या।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ मैं क्या मेरी आरज़ू क्या। ϒ

मैं क्या मेरी आरज़ू क्या लाखों टूट गए यहाँ।
तू क्या तेरी जुस्तजू क्या लाखों छूट गए यहाँ।

चश्म-ए-हैराँ देख हाल पूँछ लेते हैं लोग मिरा।
क़रीबी मालूम थे हमें हम-नशीं लूट गए यहाँ।

फूलों की बस्ती में काँटों से तो न डरते थे हम।
सालों से हो रखे थे इकट्ठे ग़ुबार फूट गए यहाँ।

वक़्त के साथ बदल जाने दो ये मज़हबी रिश्ते।
बे-ख़लिश हो जियो जाने कितने रूठ गए यहाँ।

क़ाबिल-ए-इम्तिहाँ जान सब्र परखते हैं मिरा।
सख़्त मिज़ाज है ‘राहत’ वर्ना लाखों टूट गए यहाँ।

डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ – हैदराबाद, तेलंगाना ®

हम दिलसे आभारी है – डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ जी के, हिंदी में ग़ज़ल शेयर करने के लिए।

डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ जी के लिए मेरे विचार:

♣ “डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ जी” ने “मैं क्या मेरी आरज़ू क्या।…“ काे ग़ज़ल के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इक – इक शब्द दिल की गहराइयों तक उतरते है। आपके लेखन की खासियत है की बिलकुल खुले मन से लिखते है, आपके लेख के हर एक शब्द दिल को छूने वाले होते है। हर एक शब्द अपने आप में एक पूर्ण सुझाव देता है, फिर चाहे वो नज़्म, गज़ल हो या कवितायें हो या अन्य लेख। जो भी इंसान इनके लेख को दिल से समझकर आत्मसात करेगा उसका जीवन धन्य हो जायेगा।

♥••—••♥

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In English

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ग़ाफ़िल दीवाना इतना।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ ग़ाफ़िल दीवाना इतना। ϒ

ग़म में ग़ाफ़िल दीवाना इतना, कि
ग़म की अंधेरी रात में।
ग़म ही चिराग़ हो गया।
जलती रही उसकी चिता रात भर…

बिना किसी के आग दिए ही।
अपने ग़म कि गर्मी से राख हो गया।
सहर की हवाओं ने उड़ा दी।
उसकी चिता की राख।

फ़िज़ा में दूर कही वो खो गया।
सर्द हवाओं ने हमें बताया।
बदनसीब दीवानों का…
क़िस्सा और एक ख़ाक हो गया।

डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ – हैदराबाद, तेलंगाना ®

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