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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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2017-Kmsraj51 की कलम से…..

सबसे बड़ा कर्तव्य क्या है?

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ सबसे बड़ा कर्तव्य क्या है? ϒ

प्यारे दोस्तों – बहुत समय पहले की बात है। एक राजा पंडितों, विद्वानों से प्रय: प्रश्न किया करते थे कि संसार में सबसे बड़ा कर्तव्य क्या है? इस प्रश्न के उत्तर में विद्वानों ने उन्हें विभिन्न उत्तर दिए, पर किसी के भी उत्तर से राजा संतुष्ट नहीं हो पाए। एक दिन वह शिकार खेलने जंगल में गए। एक जानवर का पीछा करते-करते वे रास्ता भटक गए। भीषण गर्मी के कारण उन्हें चक्कर आने लगा।वह(राजा) एक आश्रय की खोज करने लगे – खोजते-खोजते उन्हें एक आश्रम दिखाई पड़ा, जहां एक संत ध्यान में बैठे थे। राजा इतना ज्यादा थक गए थे कि – उन्हें(संत) पुकारते हुए बेहोश हो गए।

होश में आने पर उन्होंने देखा कि – संत उनके मुख पर पानी के छींटे मार रहे हैं। राजा ने विनम्रता से कहा, `महात्मन ! आप तो समाधि में लीन थे। आपने मेरे लिए समाधि क्यों भंग की? संत ने राजा से कहा – `राजन ! आपके प्राण संकट में थे। ऐसे समय में मेरे लिए ध्यान की अपेक्षा आपकी सहायता के लिए तत्पर होना ज्यादा महत्वपूर्ण कार्य था। समय और परिस्थिति को देखते हुए ही कर्तव्य का निर्धारण करना चाहिये।

उनके इस कथन से राजा की जिज्ञासा भी शांत हो गई कि इंसान का “सबसे बड़ा कर्तव्य क्या है?” उन्होंने समाज लिया कि सबसे बड़े कर्तव्य का निर्णय परिस्थिति को देख कर ही किया जा सकता हैं।

सीख – जीवन में सदैव ही कर्तव्य का निर्णय परिस्थिति को देख कर ही ले। समय के अनुसार क्या उचित हैं और क्या अनुचित हैं को समझकर सही कदम उठाये। मानव सेवा को सदैव ही प्रथम स्थान पर रखे।

© KMSRAJ51®™

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© आप सभी का प्रिय दोस्त ®

Krishna Mohan Singh(KMS)
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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।~Kmsraj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~Kmsraj51

 

 

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सफलता के लिए – ब्लूप्रिंट जरूर बनाये।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ सफलता के लिए – ब्लूप्रिंट जरूर बनाये। ϒ

Blueprint of your career

प्यारे दोस्तों – काम करियर और जीवन में सफलता के लिए – ब्लू प्रिंट जरूर बनाये। अगर चाहते है निश्चित सफलता तो – step by step अनुसरण करें… If you want to be sure of success then follow – step by step.

ब्लू प्रिंट क्या है?

ब्लू प्रिंट – (ब्लू प्रिंट का अर्थ) –

किसी काम को करने से पहले अपने mind में एक blueprint (खाका) जरूर बनाये। अब इस ब्लूप्रिंट को एक चार्ट व् पर्सनल डायरी पर भी बनाये। ब्लूप्रिंट का मतलब है की जो भी काम आप करने जा रहे है – उस काम का step by step map बनाना। जिससे आप उस काम को एक सिमित समय में step by step सही तरह से करते जाये।

आपका VIW और IW ही वह २० प्रतिशत कार्य है जो ८० प्रतिशत परिणाम देगा।

अगर सफल होना है तो – अपने पैशन को अपना करियर बना ले।
अर्थात – अपने पैशन को न मारे – वर्ना पूरा जीवन सिर्फ खाने-जीने में ही बीत जायेगा॥

सफलता के लिए २०/८० सिद्धांत (20/80 theory) के अनुसार कार्य करे।

“२०/८० सिद्धांत – का मतलब है आपके २० प्रतिशत महत्वपूर्ण कार्य ८० प्रतिशत परिणाम देते है।” आप किसी भी क्षेत्र में हो, अर्थात – आपका कार्य किसी भी field का हो, यह २०/८० का सिद्धांत हर जगह कारगर है।

  • एक चार्ट बनाये और अपनी Personal diary में भी यही चार्ट बना ले –

blueprint-for-success-kmsraj51.png

 

  • चार्ट में तीन कालम बनाये ! पहले कालम में लिखे VIW, दूसरे कालम में लिखे IW और तीसरे कालम में लिखे Skip Work .
  • अपने दिन की शुरुआत VIW को करने से सुरु करे। जब VIW हो जाये। फिर उसके बाद IW को करें, और जब समय बचे तो ही SW को करे ! समय नहीं बचे तो Skip Work को Skip ही कर दे।
  • आपका VIW और IW ही वह २० प्रतिशत कार्य है जो ८० प्रतिशत परिणाम देगा।

∗ VIW = Very Important Work (बहुत महत्वपूर्ण कार्य)

∗ IW = Important Work (महत्वपूर्ण कार्य)

∗ SW = Skip work (छोड़ने योग्य कार्य)

  • असफलता का मुख्य कारण – ज्यादातर लोगों के असफल होने का मुख्य कारण है कि वह अपने दिन की शुरुआत Skip Work से शुरू करते है और Skip Work में ही अपना कीमती समय व्यर्थ गवा देते है। जिस वजह से VIW और IW को करने के लिए पूरा समय ही नही मिल पाता – या तो वह VIW और IW को आधा-अधूरा करते है, या फिर SKIP (छोड़) कर देते है। इसी कारण परिणाम सदैव ही कम मिलता है, और वह अपने कार्य में असफल हो जाते है।

“अच्छा ज्ञान और अच्छे विचार से हमें प्रेरणा (कार्य करने की ऊर्जा) मिलता है, और अच्छे प्रेरणा से हम अच्छे कार्य करते है।“

  • किसी भी कंपनी के २० प्रतिशत Product ८० प्रतिशत आमदनी के लिए जिम्मेदार होते है। पहले ८० प्रतिशत आमदनी के बारे में सोचने के बजाय, उन २० प्रतिशत Product के बारे में सोचना ज्यादा उपयोगी होगा ! जो ८० प्रतिशत आमदनी देंगे।
  • २०/८० सिद्धांत के कारण आपको अपने कार्यों में छोटे – छोटे परिवर्तनों की तलाश करनी चाहिए ! जो आपके परिणामों में बड़े परिवर्तन उत्पन्न कर दे।

♥ उछलकर वापस आना।….. जरूर पढ़े।

∗ बड़े सपने (Big dreams) ∗

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“अगर आप अविश्वसनीय कार्य करना चाहते है, तो आपको असंभव का सपना देखना होगा। सफलता की कुंजी बड़े सपने देखना, उनका पूरी क्षमता से पीछा करना और यह एहसास करना है की यदि आपका सपना बड़ा है, तो समस्याओं से फर्क नही पड़ता।”

∗ विकल्प (Option) ∗

“आपके साथ क्या होता है? यह महत्वपूर्ण नहीं है; महत्वपूर्ण तो वह है – जो आपके भीतर होता है। जीवन में आपके पास विकल्प होते हैं। आप सुखी, स्वस्थ और संपन्न होने का विकल्प चुन सकते हैं। सफलता किस्मत से नहीं, सही विकल्प चुनने से मिलती है।”

∗ समय का सही उपयोग (Correct use of time) ∗

“हर इंसान को एक दिन में १४४० मिनट मिलते है। महत्वपूर्ण यह है कि आप इन १४४० मिनट को कहा Use करते है। अपने समय का सही उपयोग करें। समय के कीमत को समझे और समय को यु ही व्यर्थ न गवाए।”

∗ जुनून / लगन (Passion) ∗

“जीवन कहेगा नहीं! लोग कहेंगे – नहीं! परन्तु अगर आप लगन से कार्य में जुटे रहेंगे, तो जीवन को अंततः कहना होगा हाँ !! लगन सभी अवरोधों को तोड़ देती हैं। लोग हार के बाद ख़त्म नहीं होते, वे तब ख़त्म होते हैं जब वे मैदान छोड़ देते है। इसलिए कभी हार न माने। दृढ़ता से जुटे रहे, और अपने स्वप्नों को हकीकत में बदलते देखें।”

∗ आदत डालना (Habituate / Enure) ∗

“किसी नई चीज का आदि होने और नए संयोजन बनाने में आपके मस्तिष्क को कम से कम २१ दिन का समय लगता हैं। (अर्थात – किसी नई आदत को डालने में २१ दिन लगता हैं)। अर्थात – लगातार २१ दिन तक आप कोई कार्य करते है तो वह आपकी आदत बन जाती हैं, आपका माइंड उस कार्य को automatically करने लगता है। आपको बार – बार अपने माइंड को याद दिलाना नहीं पड़ता।”

∗ कार्य में सुधार (Performance improvements) ∗

“अगर आप कोई कार्य कभी – कभी करते है तो आप उस कार्य में Expert नहीं होंगे। लेकिन उस कार्य का अभ्यास जब आप थोड़ा-थोड़ा प्रतिदिन करते है तो उसी कार्य में आप पहले से बेहतर Performance देते हैं! और आपके लगातार अभ्यास से आपके Performance में दिन प्रतिदिन – सप्ताह दर सप्ताह – और – महीने दर महीने … आप उस कार्य को बहुत ही बेहतर तरीके से करने लगते है। एक दिन ऐसा आ जाता है – जब आप उस कार्य में Expert कि श्रेणी में पहुंच जाते हैं।” अर्थात – लगातार छोटे-छोटे सुधारो से आप असंभव कार्य को भी सरलता पूर्वक कर सकते है। बस जरूरत है अपने अंदर सुधार की प्रक्रिया को जारी रखा जाये।

∗ बुरी आदतों को हटा दें (Remove bad habits) ∗

“अपने माइंड से एक-एक कर बुरी आदतों को हटाते जाये, और उसकी जगह एक-एक कर नई आदतों को डालते जाए। शुरुआत में आपको थोड़ा कठिन लगेगा, लेकिन जब आप लगातार ऐसा करते जाएंगे तो यह आपके आदत में परिवर्तित हो जायेगा, और सरल महसूस होने लगेगा।”

∗ तुलना (Comparison) ∗

“अपनी तुलना खुद से करना ज्यादा उपयोगी होता है। सबसे ज्यादा मायने यही रखता है कि आप अपने वर्तमान स्वरूप से लगातार १ प्रतिशत बेहतर करते जाए। लगातार १ प्रतिशत का सुधार आपको सर्वश्रेष्ठ बना देगा।”

निरंतर १ प्रतिशत सुधार को आप इस तरह से समझ सकते है… जब आप किसी तालाब के बीच में एक पत्थर फेकते है, तो इससे लहरें उठकर बाहर की ओर फैलती है – और तालाब पर असर डालती है। यही १ प्रतिशत फार्मूले के साथ होता है। एक बार जब आप अपने कार्य के तरीके में सही परिवर्तन शुरू कर देते है, तो प्रभाव बाहर की ओर फैलता है और प्रवेश के शुरुआती बिंदु के आसपास सभी सम्बन्धों को प्रभावित करता हैं।

∗ हिम्मत मत हारो (Don’t give up) ∗

“याद रखो दोस्तों – यही वह समय हैं जब आपको धैर्य बनाये रखना हैं – अर्थात – धैर्य न छोड़े। अपने लक्ष्य को पाने के लिए अपनी पूरी ताकत(तन, मन और धन) को अपने कार्य में झोक दे। अपने आप पर और अपने कार्य पर पूर्ण विश्वास रखे। तब जाकर आपको सम्पूर्ण सफलता मिलेगी जीवन में।”

Post लम्बा होने कि वजह से अगर आप पूरी पोस्ट एक बार में न पढ़ पाए तो पेज को bookmark कर ले – बाद में पढ़ने के लिए।

“हममें से हर व्यक्ति में दरअसल संसार को हिलाने की ताकत है, एक बार में सिर्फ १ प्रतिशत।“

♥⇔♥

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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आँखों से आंसू बहते है।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ आँखों से आंसू बहते है। ϒ

दिल टूट जाता है तो –
आवाज नहीं होती।

आँखों से आंसू बहते है।
मगर फ़रियाद नही होती।

किसी को मोहब्बत मिलती है।
तो किसी को रास नहीं आती।

ये तो अपने-अपने नसीब की –
बात है कि कोई किसी को…
भूलता नही।

तो किसी को किसी –
की याद भी नही आती।

∗ ⇔ ∗ ♥ ∗ ⇔ ∗

जो उड़ते है अहंकार के आसमान पर –
उन्हें जमीन पर आने मे वक्त नही लगता।

हर तरह का समय आता है जिंदगी मे –
अच्छा या बुरा।
समय के गुज़रने मे समय नही लगता॥

©- विमल गांधी जी। ∇

Vimal Gandhi-kmsraj51
विमल गांधी जी।

हम दिल से आभारी हैं विमल गांधी जी के प्रेरणादायक हिन्दी कविता साझा करने के लिए।

विमल गांधी जी के लिए मेरे विचार:

♣ “विमल गांधी जी” की कविताआे के हर एक शब्द में अलाैकिक सार भरा हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। कविताऐं छोटी और सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान इन कविताओं काे गहराई(हर शब्दाे का सार) से समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।

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मुस्कुराती आँखों में आंसुओं के सैलाब होते है।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ मुस्कुराती आँखों में आंसुओं के सैलाब होते है। ϒ

हर किसी की आँखों में –
ख्वाब होते है।

हर किसी के दिल मे –
कुछ राज होते है।

ज़रूरी नही कि –
ज़माने को बताये।

मगर सपने तो –
सपने हाेते है।

ज़रूरी नही कि –
सपने सारे पूरे हो।

चेहरे से चाहे –
हँस कर बताये।

मगर, मुस्कुराती आँखों में –
आंसुओं के सैलाब होते है।

∗ ⇔ ∗ ♥ ∗ ⇔ ∗

कोई अगर आप को अच्छा लगता है तो –
अच्छा वो नही आप हो क्योंकि –
उसमें अच्छाई देखने वाली नज़र आपके पास है।

इंसान अगर ख़ुद अच्छा है तो –
उसका मन अच्छा है तो –
उसे सब अच्छे ही लगते है –
बुरे इंसान को सब बुरे ही लगते है॥

©- विमल गांधी जी। ∇

Vimal Gandhi-kmsraj51
विमल गांधी जी।

हम दिल से आभारी हैं विमल गांधी जी के प्रेरणादायक हिन्दी कविता साझा करने के लिए।

विमल गांधी जी के लिए मेरे विचार:

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स्व का पहचान सर्व ज्ञान का स्रोत।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ स्व का पहचान सर्व ज्ञान का स्रोत। ϒ

प्यारे दोस्तों – आज मैं आप सभी को बहुत समय पहले की एक सत्य से अवगत करवाता हूँ।

महर्षि उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु अत्यंत प्रतिभाशाली थे। गुरुकुल में निरंतर १२ वर्षो तक शास्त्रों का अध्ययन करने के पश्चात् – जब वे महर्षि के पास लौटे तो उन्होंने उनसे प्रश्न किया – “वत्स ! वह क्या है, जिसका ज्ञान होने से सृष्टि के समस्त पहलुओं का ज्ञान हो जाता है।”

इस प्रश्न का उत्तर श्वेतकेतु से न देते बना तो – उसकी जिज्ञासा का समाधान करते हुए महर्षि उद्दालक बोले – “पुत्र जिस प्रकार स्वर्ण का ज्ञान हो जाने से स्वर्ण से बनी सभी वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है, कृषि का ज्ञान हो जाने से सभी अन्य वनस्पतियो को उगाने का ज्ञान हो जाता है।”

“वैसे ही आत्मा का ज्ञान हो जाने से सृष्टि के समस्त पहलुओं का ज्ञान हो जाता है। तुम अब अपना जीवन उसी आत्मज्ञान को प्राप्त करने में लगाओं।”

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आज के समय में शिक्षक का महत्व।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आज के समय में शिक्षक का महत्व। ♦

सभी जानते हैं कि बच्चे किसी भी देश का भविष्य होते हैं। और इस भविष्य का निर्माण करने वाला अध्यापक होता है। अतः वही भविष्य का निर्माता है।

शिक्षक ईश्वर का दिया हुआ वह उपहार है जो हमेशा से ही बिना किसी स्वार्थ और भेद-भाव रहित व्यवहार से बच्चों को सही-गलत और अच्छे-बुरे का ज्ञान कराता है। प्रत्येक समाज में अध्यापक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है क्योंकि समाज उन्हीं बच्चों से मिलकर बनता है जिनको परिपक़्व कर समाज में श्रेष्ठ इंसान बनाने की ज़िम्मेदारी अध्यापक की ही मानी जाती है। अतः शिक्षक बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

अध्यापक के कार्य — Teacher’s duties

एक अध्यापक ही बच्चों को अपनी ज्ञान रुपी गंगा में स्नान करा कर अच्छा नागरिक बनाने की दिशा में प्रयास करता है। वह उसे अच्छा नागरिक तो बनाता ही है साथ ही में जीवन-उपयोगी बातें भी समझाता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि सफल व्यक्तित्व के पीछे गुरु का महान हाथ होना अनिवार्य है। महाभारत के अर्जुन इस बात का उदाहरण है जिन्होंने गुरु के सहयोग और आशीर्वाद से से ही सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर की उपाधि प्राप्त की। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो गुरु की महिमा का गुणगान करते हैं। यह गुरु ही हैं जो बच्चों का मार्गदर्शन कर उन्हें उनके व्यक्तित्व से परिचित कराकर, उनमे छिपे अवगुणों को दूर करते हुए उनके समस्त गुणों को पहचान कर बाहर निकालते है और उन्हें प्रोत्साहित कर सर्वहित की दिशा में मोड़ने का महान कार्य करते हैं।

अध्यापक का स्थान — Teacher’s position

वास्तव में देखा जाये तो गुरु को ईश्वर के समान ही दर्ज़ा प्राप्त है। उनका स्थान सदैव सम्माननीय ही रहेगा। भारतीय धर्म में तीन प्रकार के ऋणों का उल्लेख पाया गया है- प्रथम पितृ ऋण, ऋषि ऋण और देव ऋण। इनमे से पितृ ऋण से मुक्ति माता-पिता की सेवा करके तथा ऋषि ऋण शिक्षा अध्ययन कर अपने माता-पिता और अध्यापक को सम्मान देकर ही चुकाया जा सकता है।

प्राचीन काल में विद्यार्थी गुरुकुल से शिक्षा प्राप्त करके, सभी प्रकार से सफल और परिपक्व होने के पश्चात गुरु दक्षिणा देकर गुरुकुल से लौटते थे। यह वही समय था जब इन विद्यार्थियों को वेद, शास्त्र, पुराण, मानव-मूल्य, सामजिक जीवन का ज्ञान सिखाया जाता था। लेकिन समय के बदलने के साथ-साथ स्थिति में भी बदलाव आते गए। आज स्थिति बिलकुल अलग है। आज विद्यार्थी को केवल कुछ पाठ्यक्रम पर आधारित ज्ञान देकर परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात परिपक्व मान लिया जाता है। बाकी के कुछ नैतिक जीवन से सम्बंधित मूल्य वे अपने परिवार से भी सीखते हैं। इस प्रकार माता-पिता भी तो उनके शिक्षक ही तो हैं।

अध्यापक के कर्तव्य — Duties of Teacher

शिक्षक की भूमिका विद्यार्थी जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है। इसी बात को समझते हुए अध्यापक के कुछ उत्तरदायित्व हैं जिन्हे निभाना उनकी एक आवश्यक ज़िम्मेदारी है।

जैसे — बच्चों का हृदय बहुत कोमल और नाज़ुक होता है। वे न केवल शिक्षक बल्कि अपने आस-पास के वातावरण से भी काफी कुछ सीखतें हैं।

वे इस बात का ध्यान देते हैं कि शिक्षक के हाव-भाव किस प्रकार के होते हैं। उनके बोलने का लहज़ा भी उन्हें प्रभावित करता है। उनका भाषा प्रयोग अपने आप में बच्चों पर अमिट छाप छोड़ने वाला होता है। उनकी मृदु वाणी उन्हें सदैव आकर्षित करती है। अतः अध्यापक को अपने क्रौध,अहंकार,और लोभ को बच्चों के समक्ष कभी प्रदर्शित नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये मानव के सबसे बड़े शत्रु कहलाते हैं।

न केवल इतना ही अध्यापक को चाहिए कि वह बच्चों को उनके उत्तम स्वास्थय का ज्ञान कराये, उनसे खेल-कूद, व्यायाम आदि से सम्बंधित बाते करें। अध्यापक को चाहिए कि वह बच्चों को अपने अंदर-बाहर तथा आस-पास की सफाई के प्रति जागरूक बनाये। साफ़ कपडे पहनना, साफ़ जूते पहनना, नाख़ून काटना, आदि छोटी-छोटी बातें बताकर एक परिपक्व व्यक्ति का निर्माण करना उसका आवश्यक दायित्व है।

इन सबके अतिरिक्त अपने देश, धर्म, संस्कृति, संगीत, संध्या, हवन, राष्ट्रिय-धार्मिक त्योहारों का ज्ञान देकर ही उन्हें अच्छा नागरिक बनाना भी अध्यापक का कार्य ही है। उन्हें भाषाओं का सम्मान करना सिखाना भी आवश्यक है। उनके अंदर हिंदी के प्रति लगाव की भावना जागृत करना भी एक ज़रूरी कार्य है।

आदर्श अध्यापक के गुण — Qualities of an ideal Teacher

आज हमारे समक्ष ऐसे अनेक उदाहरण है जो अध्यापक की परिभाषा को पूर्ण करने में भूमिका अदा करते हैं। इन अध्यापकों में अच्छे और श्रेष्ठ गुणों का भण्डार होता है। यह समय का सदुपयोग करते हैं। इनके लिए समय अमूल्य होता है और इसलिए ये समय का पालन करते हुए अपना प्रत्येक कार्य योजनानुसार करते हैं। ये समय की उपयोगिता को ध्यान में रखकर अपना ज्ञान प्रदान करते हैं। इनमें नम्रता और श्रद्धा के भाव भरे होते है। क्रौध और घृणा इनके लिए उचित नहीं है। यह सहनशीलता, सही व्यवहार को अपनाकर बच्चों को सही शिक्षा प्रदान कर उनका मार्गदर्शन करते हैं। ये उनके भविष्य को उज्ज्वल बनाते हुए उन्हें बेहतर इंसान बनाते हैं। ये अनुशासन प्रिय बनते हुए बच्चे को अनुशासन का महत्व सिखाते हैं।

अच्छे शिक्षक की आवश्यक शर्तें — Good Teacher prerequisites

शिक्षक का पद अपने आप में महत्वपूर्ण तो है ही, इसके साथ-साथ चुनौतीपूर्ण और कठिन भी है परन्तु किसी भी स्थिति में असंभव कदापि नहीं है। अच्छा शिक्षक बनने के लिए कुछ आवश्यक शर्ते होती हैं जिनको पूरा करके ही अच्छा शिक्षक बना जा सकता है।

जैसे- संयम, सदाचार, विवेक, सहनशीलता, सृजनशीलता, शुद्ध उच्चारण, शोध वृत्ति, प्रभावशाली वक्ता एवं सुन्दर लेखन आदि अनेक ऐसी बातें हैं जो किसी भी शिक्षक को अच्छा शिक्षक बना सकती हैं। शिक्षक ज्ञान का वह पुंज होता है

जो बच्चों का सच्चा दोस्त बनकर उनकी समृद्धि के लिए प्रयासरत है। वह ज्ञान और प्रकाश का अद्भुत स्त्रोत है। उसका सकारत्मक व्यवहार, रवैया और स्पष्ट दृष्टिकोण उसके व्यक्तित्व की आवश्यक शर्त है।

वर्तमान समय में शिक्षक — Teachers at the present time

वैसे तो शिक्षक हमेशा से ही सर्वोपरि रहे हैं। आज भी वे सभी के लिए आदर्श और माननीय हैं। उनका महत्व इसी बात से पता चलता है कि वे बच्चों के ऐसे पथ प्रदर्शक हैं जो अपने परिश्रम और तप से बच्चों के चरित्र निर्माण की क्षमता रखते हैं। वे बच्चों के प्रेरक हैं जो उन्हें कुछ कर दिखाने की प्रेरणा देते हैं। उनमें श्रद्धा और विवेक की अखंड ज्योति होती है जो चारों ओर अपने प्रकाश से उजियारा फैलाती है। ये ही बच्चों को राम, लक्ष्मण, जीसस आदि महापुरुषों के गुणों से अवगत कराकर उनमें ज्ञान का संचार करते हैं। ये अपने छात्रों को अपमानित न करके बल्कि उचित-अनुचित का निर्णय करना सिखाते हैं।

शिक्षक के लिए महापुरुषों के विचार — Thoughts of great men for teacher

आज हमारे समक्ष काफी उदाहरण हैं जिन्होंने गुरु को सबसे महान बताया है। उनके अनुसार केवल शिक्षक ही अपने राष्ट्र के लिए एक बेहतरीन और सबसे सफल भविष्य की पीढ़ी उपलब्ध कराने की क्षमता रखते हैं। उनकी उचित शिक्षा ही इस कार्य को सफल बनाती है।

कबीर जी का प्रसिद्ध दोहा —

”गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय॥”

गुरु के महत्व को और शक्तिशाली बना देता है क्योंकि इनके अनुसार गुरु और भगवान (गोविन्द) यदि एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए ? गुरु या गोविन्द को ?

ऐसी स्थिति में इन्होने कहा है कि हमें गुरु के चरण स्पर्श करने चाहिए क्योंकि इन्हीं की कृपा से हमें भगवान् गोविन्द जी के दर्शन करने का सौभाग्य मिल पाया है।

इसी प्रकार आचार्य चाणक्य ने भी कहा है —

“शिक्षक कभी साधारण नहीं होता, प्रलय और निर्माण उसकी गोद में खेलते हैं।”

आदि ऐसे अनेक विचार हैं जो विभिन्न महापुरुषों ने शिक्षकों के लिए दिए हैं। इनसे सिद्ध होता है कि शिक्षक वास्तव में सभी के लिए पूजनीय है।

शिक्षक और बच्चे — Teachers and children

देखा जाए तो बच्चे संसार रुपी बगिया के फूल हैं जो अपनी सुगंध से सबकुछ सुगन्धित कर डालते हैं। और शिक्षक उस माली के समान है जो अपनी देख-रेख में पौधे लगाकर उन फूलों के सर्वागीण विकास की दिशा में कार्य करते हैं। अतः शिक्षक को ऐसा पथ प्रदर्शक बनकर रहना होगा जो केवल किताबी ज्ञान ही न देकर बल्कि इन बच्चों को जीवन जीने की कला सीखा दे। और अपने आप में हमेशा के लिए एक उदाहरण बन जाए।

♦ नंदिता शर्मा जी। – नोएडा, उत्तर प्रदेश ♦

♦ अध्यापिका – बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, नोएडा, उत्तर प्रदेश ♦

लेखिका नंदिता शर्मा जी अभी अध्यापिका के पद पर कार्यरत है — बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, नोएडा, उत्तर प्रदेश में। नंदिता शर्मा जी KMSRAJ51.COM की सीनियर लेखक टीम पैनल की सदस्य भी है। (Nandita Sharma Ji, is also a member of the Senior Writers Team Panel of KMSRAJ51.COM.)

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  • “नंदिता शर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कारगर लेख में बताया है की — शिक्षक को ऐसा पथ प्रदर्शक बनकर रहना होगा जो केवल किताबी ज्ञान ही न देकर बल्कि इन बच्चों को जीवन जीने की कला सीखा दे। और अपने आप में हमेशा के लिए एक उदाहरण बन जाए। आचार्य चाणक्य ने भी कहा है – “शिक्षक कभी साधारण नहीं होता, प्रलय और निर्माण उसकी गोद में खेलते हैं।”

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यह लेख (आज के समय में शिक्षक का महत्व।) “नंदिता शर्मा जी।“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे। हम दिल से आभारी हैं नंदिता शर्मा जी के “आज के समय में शिक्षक का महत्व।” विषय पर हिन्दी में Article साझा करने के लिए।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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वर्तमान समय में एक शिक्षक की भूमिका।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ वर्तमान समय में एक शिक्षक की भूमिका। ♦

(विद्यार्थियों के संदर्भ में)

वर्तमान युग है आधुनिकता का, वैज्ञानिकता का, व्यस्तता का, अस्थिरता का, जल्दबाजी का। आज का विद्यार्थी जीवन भी इन्ही समस्याओं से ग्रसित है। आज का विद्यार्थी जीवन पहले की तरह सहज, शांत और धैर्यवान नहीं ही रह गया है। क्योंकि आगे बढ़ना और तेजी से बढ़ना उसकी नियति, मजबूरी बन गई है। वह इसलिए कि यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो ज़िंदगी की दौड़ में वह पीछे रह जायगा। तो यह वक्त का तकाजा है। ऐसे समय में विद्यार्थी जीवन को एक सही, उचित, कल्याणकारी एवं दूरदर्शी दिशा निर्देश देना एक शिक्षक का पावन कर्तव्य है। वैसे तो शिक्षक की भूमिका सदैव ही अग्रगण्य रही है क्योंकि —

“राष्ट्र निर्माता है वह जो, सबसे बड़ा इंसान है, किसमें कितना ज्ञान है, बस इसको ही पहचान है”।

एक राष्ट्र को बनाने में एक शिक्षक का जितना सहयोग है, योगदान है, उतना शायद किसी और का हो ही नहीं सकता। क्योंकि एक राष्ट्र को उन्नति के चरम शिखर पर ले जाते हैं उसके राजनेता, डॉक्टर, इंजीनियर, उद्योगपति, लेखक, अभिनेता, खिलाड़ी आदि और परोक्ष रूप से इन सबको बनाने वाला कौन है ? एक शिक्षक।

वर्तमान समय में विद्यार्थियों के संदर्भ में एक शिक्षक की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है। उसके अनेक कारण हो सकते हैं। जैसे आज-कल विद्यार्थी बहुत ही सजग, कुशल, अद्यतन (Updated) होने के साथ-साथ बहुत अस्थिर और अविश्वासी भी होते जा रहे हैं। इसके कारण चाहे जो कुछ भी हो परंतु एक शिक्षक को आज के ऐसे ही विद्यार्थियों को उचित प्रशिक्षण, सदुपयोगी शिक्षण और सटीक कल्याणकारी, दूरगामी मार्गदर्शन प्रदान करते हुए उन्हें भावी देश के कर्णधार, जिम्मेदार देशभक्त नागरिकों में परिणित करना है। एक शिक्षक की जिम्मेदारी बहुत अधिक होती है। क्योंकि उसे ना केवल बच्चों का बौद्धिक, नैतिक, मनोवैज्ञानिक ,शारीरिक विकास करना है अपितु सामाजिक, चारित्रिक, एवं सांवेगिक विकास करना भी आज शिक्षक का ही कर्तव्य है।

आज उसे अपने आदर्शों के द्वारा, अपने चरित्र के द्वारा बच्चों के मानस पटल पर अपनी ऐसी छाप छोड़नी पड़ेगी कि जिससे भविष्य में यह बच्चे जब —

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः।
गुरु साक्षात्‌ परब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नमः॥

…का उच्चारण करें तो बंद आंखों के सामने हमारा चेहरा यानि एक शिक्षक का चेहरा उन्हें दिखाई दे। यह एक चुनौती भरा कार्य है। परंतु सच्चा शिक्षक वही है जिसे उसके विद्यार्थी जीवन भर अपना गुरु मानते रहें न कि सिर्फ विद्यालय प्रांगण के अंदर तक यह सीमा शेष रह जाए। ऐसा करने के लिए सबसे पहले एक शिक्षक को स्वयं को अनुशासित करते हुए चारित्रिक, नैतिक ,धार्मिक आदि गुणों का विकास करना होगा। क्योंकि इन सब के बिना हमारी आंतरिक भावनाओं का उदय नहीं हो सकता।

शिक्षक को अधिक से अधिक बच्चों के साथ इंटरेक्शन (Interaction) यानि वार्तालाप करना चाहिए ताकि उनके व्यक्तित्व पर यथासंभव अपना प्रभाव डाल सके। अपने अनुभव, अपनी शिक्षा, अपने प्रेम, समर्पण अपनी सृजन शक्ति, अपने त्याग, अपने धैर्य आदि का पूर्ण प्रदर्शन करते हुए बच्चों के भी अनुभव, उनके मूल विचार, उनकी भावनाओं आदि को जानने का प्रयास करें और यथासंभव उन्हें अभिप्रेरित करने का प्रयास करें। क्योंकि इन्ही सब विद्यार्थियों में से ही भविष्य में हमारे देश का नाम रोशन करने वाले कई नागरिक पैदा होंगे।

आदर्श शिक्षक का कार्य बहुत ही महत्वपूर्ण है। एक बात और कि जिस प्रकार शिक्षा एक अंतहीन प्रक्रिया है Education is an Endless Process. उसी प्रकार शिक्षण भी अंतहीन प्रक्रिया है।

ऐसा मैं मानती हूं। Teaching and Learning Both are Endless क्योंकि कोई भी इंसान जैसे पूरी जिंदगी सीखता रहता है, सिखाता रहता है। उसी प्रकार एक शिक्षक का कार्य भी शिक्षा देना है जो कि वह निरंतर देता रहता है। इसलिए उसे किसी विशेष प्रांगण (Campus) किसी विषय, किसी विशेष समय अंतराल, किसी विशेष सहायक सामग्री की आवश्यकता नहीं होती। यह मेरे मूल विचार हैं।

क्योंकि एक अध्यापक जब अध्यापकीय अहर्ताओं, योग्यताओं से पूर्ण हो जाता है, तब वह शिक्षा देना प्रारंभ करता है। मैं यहां यह पूछना चाहती हूं कि जिन शिक्षको को नौकरी नहीं मिल पाती तो क्या वह शिक्षा प्रदान नहीं करते? और जो शिक्षक रिटायर हो जाते हैं तो क्या वे रिटायरमेंट के बाद शिक्षा प्रदान नहीं करते? क्या वह कहते कि अब हम रिटायर हो चुके हैं अब हम शिक्षा प्रदान नहीं करेंगे, शिक्षण प्रदान नहीं करेंगे? ऐसा करने में हम सक्षम नहीं है।

नहीं, ऐसा कदापि नहीं है। इसके विपरीत एक शिक्षक तो बिना किसी मांग के, बिना कहे अपना सर्वस्व ज्ञान अनुभव में डुबोकर प्रदान करने के लिए सदैव समाज के सामने तत्पर रहता है। वास्तव में एक शिक्षक की वर्तमान संदर्भ में भूमिका यह है कि जो एक विद्यार्थी के लिए उचित हो, कल्याणकारी हो, दूरगामी हो, प्रायोगिक ( Practical) हो, धनोपार्जन में सहायक हो ऐसी शिक्षा को निरंतर प्रदान करते रहना।
अंत में मैं यही कहना चाहती हूँ कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए एक सजग, उदात्त चरित्र, धार्मिक नैतिकता परिपूर्ण शिक्षक की आवश्यकता है ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी को हम ऐसे भारतीय नागरिक बनाने में सफल हो सकें जो विश्व में भारत का नाम रोशन कर सकें और पुनः भारत को ‘जगतगुरु’ की उपाधि प्राप्त करवा सके। हम सब की भी यही अभिलाषा है।

हमारा साहित्य समाज को न केवल ज्ञान, बोध और मूल्य प्रदान करता है अपितु एक चिंतन की दिशा भी प्रदान करता है ताकि हम सभी यथासंभव प्रयास कर सके जिससे कि भारतीय मूल्य, भारतीय सभ्यता एवम संस्कृति, भारतीय साहित्य का विश्व में सदैव उच्चस्थ स्थान बना रहे तथा भारत पुन: “जगदगुरु” (विश्वगुरु) की उपाधि ग्रहण करे वो भी अपने अक्षय साहित्य, विशुद्ध सभ्यता एवं अलौकिक संस्कृति के बल पर।

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

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  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — आज के समय में शिक्षक का क्या कर्तव्य होना चाहिए? उन्हें बच्चों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए, जिससे बच्चों को बुरा भी ना लगे और अच्छे से पढ़े।

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यह लेख (वर्तमान समय में एक शिक्षक की भूमिका।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

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आपसे मिलकर हमें भी मुस्कुराना आ गया।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ आपसे मिलकर हमें भी मुस्कुराना आ गया। ϒ

(सादर समीक्षार्थ प्रस्तुत है आदरणीय गुरुदेव इस्लाह की गुजारिश के साथ)

आपसे मिल कर हमें भी मुस्कुराना आ गया।
मर नहीं सकता था फिर भी जहर खाना आ गया।

प्यार का किस्सा कभी लोगों से सुनता था यहां।
आज करके इश्क खुद को आजमाना आ गया।

गम हमें भी खूब लोगों से मिले हैं आज तक।
गम को सह-सह कर हमे भी दर्द सहना आ गया।

नफरतों के बीज दिल में आज तक बोये नहीं।
गैर को अपना बनाकर दिल लगाना आ गया।

जिंदगी भर खर्च की है बाप की दौलत मगर,
करके मेहनत आज मुझको भी कमाना आ गया।

जुल्म मैंने भी किए हैं जिंदगी में खूब पर-
आज सबके सामने मुझको लजाना आ गया।

पहले दुनिया देखकर खो जाता था मैं भी यहां।
रूप अपना ही निखारा और लुभाना आ गया।

“राज” आगे बढ़ के राहें खुद बनाई जब यहां।
पीछे – पीछे फिर मेरे सारा जमाना आ गया।

©-कृष्ण कुमार सैनी -राज, दौसा (राजस्थान) ∇

हम दिल से आभारी हैं कृष्ण कुमार सैनी जी के प्रेरणादायक हिन्दी ग़ज़ल साझा करने के लिए।

पढ़ें – विमल गांधी जी कि शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह।

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Krishna Mohan Singh(KMS)
Editor in Chief, Founder & CEO
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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।~Kmsraj51

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* अपनी आदतों को कैसे बदलें।

∗ निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

* क्या करें – क्या ना करें।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

kmsraj51- C Y M T

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiya ensolar radiation, and encourage good solar radiation to become them selves. ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

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मृत्यु एक सिलसिला है परिवर्तन का।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ मृत्यु एक सिलसिला है परिवर्तन का। ϒ

परमतत्व परमात्मा ने एक से अनेक होने की इच्छा से सृष्टि का निर्माण किया और जन्म और मृत्यु का विधान भी साथ-साथ बनाया।इसलिये सृष्टि में जो भी आया है उसका जाना भी निश्चित है। जब कोई भी जन्म लेता है तभी उसकी मृत्यु भी तय हो जाती है। मौत का झपट्टा तो कई पहरों के बीच से भी उठा कर ले जाता है। इससे ना राजा बच सका ना रंक, ना देवता ना राक्षस, ना साधु ना सन्यासी।
जिन्होंने हजारों वर्षों की तपस्या करके अजर अमर होने का वरदान पाया था वे भी नहीं, क्योंकि जन्म और मृत्यु तो एक शाश्वत सत्य है।

वैसे मेरा ऐसा मानना है कि मृत्यु एक रूपान्तरण है अर्थात् वस्तु अथवा व्यक्ति का रूप परिवर्तन होना। जब कोई मनुष्य मर जाता है तो उसका शरीर यहीं रह जाता है। जिसका अपने-अपने धर्मो के अनुसार मनुष्य क्रिया-कर्म करता है। कोई जलाकर, कोई बहाकर अथवा कोई दफनाकर, यानि ये शरीर इस संसार के पंच तत्वों में ही विलीन हो जाता है। और इस शरीर में निहित जो परमात्मतत्व है, निकल कर वह पुनः अपने-अपने कर्मो के अनुसार इस संसार में अन्य किसी रूप में जन्म ले लेता है, और समयानुसार पुनः समाप्त हो जाता है इस तरह यह प्रक्रिया अबाध गति से चलती रहती है। श्रीमद्भ गवद्गीता में श्रीकृष्ण जी का इस सम्बन्ध में अर्जुन को दिया उपदेश तो देखिये…

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्य-
न्यानि संयाति नवानि देही (अ.)।।२२।।

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नये शरीरों को प्राप्त होता है। ।।२२।।

इसी तरह संसार की समस्त जड़-चेतन वस्तुयें भी इसी संसार में विलीन होकर रूप परवर्तित करती रहती हैं। जैसे कुछ राख होकर, कुछ भस्म रूप होकर, कुछ मिट्टी रूप होकर, कुछ जल रूप होकर और कुछ ठोस रूप होकर आदि-आदि। रूप परिवर्तन की यह प्रक्रिया निर्बाध गति से निरन्तर चलती रहती है। इस शरीर में निहित जो परमतत्व है वह पुनः अपने कर्मों के अनुसार इसी संसार में अन्य किसी रूप में जन्म लेकर पुनः_पुनः आता है और समयानुसार पुनः समाप्त होकर और फिर पुनः अन्य किसी रूप में जन्म ले लेता है। पर हम सभी इस शरीर की मूल्यवानता को ना पहचानकर यूँ ही इसे गँवा रहे हैं। कहा भी है…

जन्म से लेकर मरण तक, दौड़ता है आदमी
एक रोटी दो लंगोटी, तीन गज कच्ची ज़मीं।
तीन चीजें चार दिन में, जोड़ता है आदमी
है यहाँ विश्वास कितना?
आदमी, की मौत पर
मौत के हाथों सभी कुछ छोड़ता है आदमी।।

तात्पर्य है – मनुष्य जीवन भर खाने कमाने में ही सारा जीवन खपा देता है, और जोड़-जोड़कर रखता जाता है। और जब मौत आ जाती तब सब कुछ मौत के हाथों में छोड़कर यहाँ से विदा हो जाता है।

मगर अन्य किसी रूप में पुनः आ जाता है और दुनियाँ में आवागमन का, परिवर्तन का चक्र यूँ ही चलता रहता है। अतः यह सत्य है कि मृत्यु नाम है एक परिवर्तन का चाहे वह वस्तु का हुआ हो अथवा शरीर का…

दुनियाँ में जीना है, तो
मेहमान बनकर जीते रहें,
मालिक बनकर ना जीयें।

सन्त जन अथवा शास्त्रमतानुसार चौरासी लाख योनियों में वह परम तत्व भ्रमण करते-करते अन्त में मनुष्य रूप धारण करता है। जो बड़ा ही अनमोल होता है। क्योंकि मनुष्य रूप के माध्यम से ही, जो परमतत्व हमारे शरीर में आया है उन्हीं में मिलाकर आवागमन के चक्र से मुक्त हुआ जा सकता है। प्रभु नाम स्मरण, अभिमान रहित मन बुध्दि, शुभ कर्म और प्रेम-भक्ति से ही उन परमप्रभु परमात्मा को पाया जा सकता है।

मृत्यु पर आधिपत्य करने के लिये बड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने भी प्रयास किया, मगर वे भी सभी असफल ही रहे। वह परमतत्व शरीर में से कब कहां से बाहर निकल जाता है पता ही नहीं चलता। उन्होंने एक परीक्षण भी किया था।

⇒ एक कांचनुमा बॉक्स में एक मरणासन्न व्यक्ति को रखा लेकिन जब उसके प्राण निकले तो वह तत्व कांच को फोड़ता हुआ बाहर निकल गया और वैज्ञानिक कुछ ना कर पाये।

हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्पु, कंस, रावण आदि-आदि राक्षसों ने तो स्वंय की मृत्यु ना आये इसके लिये बड़े-बड़े तप करके वरदान भी पाये। मगर मृत्यु के पाश से अपने आपको कोई भी ना बचा पाया। वरन् प्रभु ने अवतार ले लेकर उनको उन सभी के वरदानों के अनुसार ही मृत्यु प्रदान की, और उनके आत्मतत्व को अपने में ही समाहित कर लिया। “मृत्यु रूपी अजगर तो अपना मुंह खोले” हमेशा ही खड़ा रहता है वह किसको कब कहां “निगल” जायेगा कुछ पता नहीं। कहा भी है…

क्या भरोसा है इस जिदंगी का।
साथ देती नहीं ये किसी का।
सांस रुक जायेगी चलते-चलते।
शंमा बुझ जायेगी जलते-जलते।
दम निकल जायेगा-दम निकल जायेगा-
दम निकल जायेगा।
दम निकल जायेगा आदमी का।
क्या भरोसा है इस जिंदगी का।

विडम्बना तो देखिये, आदमी ऐसे जीता है कि वह कभी मरेगा ही नहीं और मर जाता है तो लगता है कि वो था ही नहीं। यद्धपि यह भी सत्य है कि वह अन्य रूप में इसी संसार में पुनः आ जाता है और रूपों के परिवर्तन की, भिन्न-भिन्न योंनियों में आवागमन के परिवर्तन की यह प्रकिया सृष्टि में निरन्तर चलती रहती है। श्रीमद्भगवदगीता में कितना सत्य समझाया है, भगवान श्री कृष्ण ने…

जातस्य ही ध्रुवो मृत्यु, ध्रुवम् जन्म मृतस्य च,
तस्माद् अपरिहार्येर्थे, न त्वम् शोचितुमर्हसि”( गीता 2-27 )

“जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु अवश्य होती है। और मृत्यु के बाद जन्म अवश्य होता है। जिसमें कोई परिवर्तन न हो सके ऐसी यह कुदरती व्यवस्था है। इसी लिए शोक करना तेरे लिए उचित नहीं है।”

अतः अपना ये अनमोल जीवन सार्थक हो सके, इसके लिये कर्तव्य और कर्म का निर्वहन करते हुये प्रभु नाम ध्यान भी अवश्य करते रहना चाहिये। किसी ने बहुत अच्छी बात कही –

“जो जाके न आए, वो जवानी भी देखी,
जो आके न जाये, वो बुढापा भी देखा।”

“प्रभु कृपा दृष्टि सभी पर सदा बनी रहे।”

©- सुमित्रा गुप्ता ‘सखी’। – कल्याण (महाराष्ट्र) ∇

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सुमित्रा गुप्ता ‘सखी’ जी के लिए मेरे विचार:

♣ “सुमित्रा गुप्ता ‘सखी’ जी” ने बहुत ही सरल शब्दों में – जन्म और मृत्यु के सत्य से अवगत कराया हैं। हर एक शब्द में अलाैकिक सार भरा हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान इन शब्दों को गहराई(हर शब्दाे का सार) से समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।

पढ़ें – विमल गांधी जी कि शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह।

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* अपनी आदतों को कैसे बदलें।

∗ निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

* क्या करें – क्या ना करें।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

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* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiya ensolar radiation, and encourage good solar radiation to become them selves. ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

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होके मायूस यू ना शाम की तरह ढलिये।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ होके मायूस यू ना शाम की तरह ढलिये। ϒ

होके मायूस यू ना –
शाम की तरह ढलिये।

ज़िन्दगी एक भाैर है –
सूरज की तरह निकलिये।

ठहरोगे एक पाँव पर –
तो थक जाओगे।

धीरे धीरे ही सही –
अपनी राह पर चलते रहिये।

मंजिल मिल ही जायेगी।
अपने आप धीरे – धीरे।

¤~≈~¤

अपने से कमजोर –
को दबाने वाला।

कुछ समय के लिये।
शायद बड़ा बन जाता है।

लेकिन अपने से कमजोर –
को जो बचाता है।

संभालता है सम्मान देता है।
वो तो – बहुत महान बन जाता है।

घृणा करना शैतान का काम है। क्षमा करना मनुष्य का काम है।
प्रेम करना देवताओं का गुण है॥

©- विमल गांधी जी। ∇

Vimal Gandhi-kmsraj51
विमल गांधी जी।

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