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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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सतीश शेखर श्रीवास्तव - परिमल

खट्टी मिट्ठी अतरंग।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ खट्टी मिट्ठी अतरंग। ♦

पंच वर्षों की अथक परिश्रम,
शब्दों इरादों मजबूत दीवारें।
कुछ मजबूती कुछ ढहती मीनारें,
ले चलती, फिर सत्ता के गलियारे।

कौन कहाँ कैसे रह पायेगा,
आने वाले आज में जी पायेगा।
सुदृढ़ नींव संग ऊंचा उठ पायेगा,
अस्तित्व की लड़ाई में बच पायेगा।

धर्म की ध्वजा फहराने के लिए,
कर्म कर्तव्य की सतह बनाने में।
सिर पर मुकुट रखने के लिए,
इस सत्ता समर गलियारे में।

अनबूझ व्यक्तित्व बन छा जाने में,
देखो – देखो आँखों के चारों को।
सर्वाधार संकल्प दोहरानें को,
फिर बन बवंडर छा जानें को।

लाल पीला भगवा नीला,
या रंगीन बहारों को सजाने में।
हरियाली की सम्मत लाने में,
खट्टी-मिट्ठी बंधा अतरंगी सपने में।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — सच्ची प्रीति और प्रेम अपने देश की माटी से हम भी रखते हैं, जब भी जरूरत हो देश को हमारी, माँ भारती की सेवा के लिए सदैव तैयार हम भी रहते है। माँ भारती की सेवा के लिए हो तो अपेक्षा अर्पित होने की तो वो साहस हम भी रखते हैं। धर्म की ध्वजा फिर से फहराने के लिए,कर्म कर्तव्य की सतह बनाने में, सिर पर मुकुट रखने के लिए, इस सत्ता समर गलियारे में।

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यह कविता (खट्टी मिट्ठी अतरंग।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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पीड़ा अंतः मन की।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पीड़ा अंतः मन की। ♦

अर्दित की स्मृति करे लहूलुहान मुझे,
पल-पल की यादें करती छलनी मुझे।

उर-वेदना की पीड़ा दृश्य पुराना दिखलाती,
छटपटाती काया जिसमें मृत तुल्य बतलाती।

हृदि-माला के घट में विजन सहन तक ले जाती,
खालीपन का बोध करा तन-निभृत कर ले आती।

द्रवित मन मेरा कसक हिय का ही बतलाये,
निशदिन खुद का दमन करूं अंतस् ये समझाये।

तेरा कुछ नहीं जग में विकल हो क्यूं तू फिरता,
अतिशय का रख बोध तन-मठ ही तेरा ही रहता।

इक दिन भस्मीभूत हो चिरयुवा तू हो जायेगा,
दारुण रुदन करता पुंगल तेरा चिरशान्त हो जायेगा।

आवेश न कर जग से तू तुझे जितना निसर्ग ने दिया,
अपने स्‍वप्‍न को अन्तर्घट में रख भव ने भार ले लिया।

सब सम्भाला हिय में अपने अधर तक न आने देना,
क्षण-क्षण जो बीते तुझपर होंठों को तुम सिल लेना।

पल-पल की पीड़ा से नम कारक दारुण हो ले,
शैल-शिखा की गति अपने खचित-उर तू कर ले।

अंतः मन की अर्दित सुध को प्रेत-पट समझ ओढ़ ले,
इक दिन उदधिमेखला के तन पर अर्घट बन उड़ ले।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — जब अंतः मन में पीड़ा होती है उस समय मन में चलने वाले विचारों और भावनावों को बताया है। जब भी अंतः मन में पीड़ा होती है मन के अंदर किस-किस तरह से संकल्पो का उथल पुथल चलता है इसे समझाने की कोशिश की है। अतीत के पीड़ादाई दृश्य को मन का दर्पण बार-बार दिखलाता है, जिसमें तन व मन को बहुत ही ज्यादा पीड़ा दिखलाती, जैसे की मृत तुल्य हो ये काया। अंतः मन में पीड़ा को हृदय की अंतः गहराई तक ले जाती व खालीपन का बोध करा तन-निभृत कर ले आती वापस। मेरा द्रवित मन बार-बार मुझें ये बतलाये, निशदिन मैं खुद का दमन कर रहा हूँ आंतरिक मन यही समझाए। अंतः मन सदैव ही यही समझाए इस संसार में कुछ भी नही है तेरा फिर इस मोह पास में क्यों फस कर रोता है तू। एक दिन ये तन आग के हवाले होकर भस्मीभूत हो जायेगा। ये रोता हुआ तेरा मन चिरशान्त होकर सो जायेगा। आवेश में आकर दुनिया से तू बैर न कर, तुझें जितना ये प्रकृति ने दिया उसे सही से उपयोग कर। अपने स्‍वप्‍न को अंतः मन में रख कर अंतः आत्मा ने भार ले लिया।

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यह कविता (पीड़ा अंतः मन की।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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उन्मुक्त जिंदगी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ उन्मुक्त जिंदगी। ♦

याद इन्हें भी कर लें आज।

दे दी हमें उन्मुक्त सी जिन्दगी।
आज़ादी में साँस लेने के लिये।
रो रही थी माँ भारती।
बेड़ियों में पड़ी गुलामी में,
हुंकार उठी नव खूनों में।

दासता की बेड़ियां तोड़ने के,
सन् सत्तावन में लगी आग बरसने।
अंग्रेजों के सीनों पर,
नाना तात्या मंगल बहादुर,
रानी लक्ष्मी कुंवर के हाथों से।

ह्यूज कार्नेल और डलहौजी जैसे,
कितने भागे अपने सिवरों में।

मेरठ कानपुर सतारा झांसी,
दिल्ली बिठूर लेते जाते वीरों ने।
फड़नवीश के तलवारों से,
क्रांतिवीर के हुंकारों से।

बेड़ियां लगी टूटने जब,
हाय! कैसी बिडंबना आई।
रानी गई काल-कवलित हो,
दे अगली पीढ़ी को,
हम न सके पूरे तोड़ने बेड़ी को,
माँ रो रही है बेड़ी में।

भुवन के नन्हें कामों से,
फिर जोश-उल्लास भर गया।
नौजवानों में।
हुंकार उठे कूका-बिरसा,
ले आदिवासी वीरों ने।

नीलांबर-पीताम्बर बंधुओं ने,
बरसा तीर-कमानों से।
छुड़ा दिये पसीने अंग्रेजों के,
लेकिन ये भी लड़े भिड़े,
तोड़ न पाये जंजोरों को।

पुनः नई आवाज उठी,
बेटों-बेटियों के हुंकारों से।
किशोर युवा चले मिटाने।
गुलामी की जंजीरों को।

कूद पड़े लाला लाजपत राय,
तिलक चापेकर बंधु पटेल खान।
ये सब बातों से,
कहां सुनने वाले थे।

बहरे थे कानों के,
इन्हें धमाके सुनने थे।
असफाक विस्मित दीनबन्धु,
खुदीराम बोस के गानों के।
पंजाब से उठे शोले फैले।

उत्तर प्रदेश बंगाल गुजरात,
मध्यभारत ओड़ीसा कर्नाटक,
आन्द्रा के हुंकारों से,
डोल गया एलिजाबेथ का,
सिंहासन लंदन के गलियारों में।
थर-थर कांपने लगे कागज के वीर,
जो उन्मुक्त हो करते,
अत्याचार भारत के गलियों में।

सुभाष बोस की सेना जब रंगून गई,
भागे अंग्रेज अपने घरों में।
लक्ष्मी सहगल बनी लेफ्टीनेंट,
मुजिबुर्रहमान बने कमाण्डर।
कर दिये बेड़ागर्क अंग्रेजों के,
उपनिवेश की आँधी ले चलते थे,
उड़ गए फिर तूफानों में।

भगत सिंह राजगुरू सुखदेव,
भाभी दुर्गा के चण्डों से।
फणीश्वर जैसे बच्चे गरजे,
भरी अदालत में बंदूकों से।
रक्त जब गिरने लगा अंग्रेजों के,
नाच उठी मौत की छाया।
जब इनके सीनों में।

भाग पड़े अंग्रेज अपने बिलों में,
दिल कांपा मन बिचलित हो भागा।
फिर लंदन की गलियों में।
मिली स्वतंत्रता जब भारत को,
माउण्टबेटन ने तभी चली चाल।

माँ भारती के सीने में,
कर दिये दो टुकड़े।
हिन्दुओं के वृहद को खंडित कर,
यवन को पाकिस्तान दे।
भारत को खंडों में विभक्त कर दिया।

आजाद भगतसिंह खुदीराम सुभाष,
असफाक विस्मिल राजगुरू जैसे,
कितने वीरों के सपनों को तोड़,
कर दिया टुकड़े में अंग्रेजों ने।

जतिन दास के भूखों में भी,
देखे थे सपने उन्मुक्त वृहद भारत के।
आज़ादी के सपने,
सब शहीदों ने मिलकर दें दिया हमको,
आज़ादी से उन्मुक्त जीने को।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — कड़वा है मगर सत्य है — जिन सूरमाओं ने अपने रक्तिम रंग से खेली क्रांति की होली थी। भारत की स्वतंत्रता खातिर, खाई वक्ष स्थल में गोली थी। सदैव ही इंकलाब की जिनके मुंह में, रहती सदा एक ही बोली थी। वह नर के वेश में नारायण की, अवतरी भारत में टोली थी। इतिहास छुपाया सच न बताया, इज्ज़त, माटी में रोली थी? यह राष्ट्रीय पर्व हमें देश की एकता और गौरव को बनाये रखने की प्रेरणा देता है। हम सभी को संविधान के सभी नियमों का पालन करना चाहिए। 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान पूर्ण रूप से लागू हो गया था। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। 26 जनवरी के दिन ही भारत को गणराज्य का सर्वोत्तम दर्जा प्राप्त हुआ। 26 जनवरी के दिन दिल्ली में इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक परेड निकाली जाती है। जिस वतन ने हमें प्यार, मां का आंचल, समरसता, रंग रूप भेष भाषा सभी को मिलता मान दिया उस वतन पे हमें नाज है। जिस वतन का सबसे बड़ा संविधान लोकतंत्र जिसकी शान वो भारत देश महान वो भारत देश महान। वतन हमारी आन हमारा सम्मान है उस मां को हमारा सलाम वंदे मातरम् वंदे मातरम् वंदे मातरम्॥

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यह कविता (उन्मुक्त जिंदगी।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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नववर्ष वंदन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नववर्ष वंदन। ♦

“ब्रम्हध्वज नमस्तेऽस्तु सर्वाभीष्ट फलप्रद।
प्राप्तेऽस्मिन वत्सरे नित्यं मग्द्ऋहे मंगलं कुरु॥”

वसुधा सिहरती है शीतों से, नभ में धुंध गहरी है।
निकुंज उद्यानों की सीमाओं पर, शीतल पवनों का पहरा है।
सूना निसर्ग का प्रांगण, न रंग न ही उल्लासों का मेला है।

धरती से गगन तक छाई, लालिमा विहान लिये आई।
उड़ते झोंकों में पतंग सतरंगी, ले आई प्राचीर से उजोरा आई।
उत्सु ने राग भैरवी गाई, लालिमा विहान लिये आई।
मधुर मयूखें पूरब से आई, इंदुजा के अमृत में घोल लाई।

चैन भरी रात मंगल प्रभात लाई, लालिमा विहान लिये आई।
स्कन्धों पर सारंग नये सुनहरी पातें।
वितरित करती स्नेहिल आदित्य किरणों की सौगातें।
थकित धूप खिली मनभायी, लालिमा विहान लिये आई।

यह नीहार-कुहासे को छंटने दो, यामिनी का प्रांत संकुचित होने दो।
निसर्ग का मुखड़ा निखरने दो, हृषिकेश का ज़रा रंग चढ़ने दो।
महामाया को दुल्हन का सौन्दर्य लेने दो, ये नेह – पीयूष बरसायेगी।
शस्य – श्यामल धरती माता, केतन-निकेतन सबमें उल्लास लाने दो।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — मन में किस तरह के विचारों व भावनाओ के तरंग उड़ते है ये बताने की कोशिश की है। प्रकृति के मनोरम सौंदर्य का वर्णन करते हुए नव वर्ष का आगमन किया है। इस समय वसुधा सिहरती है शीतों से व नभ में धुंध गहरी है। निकुंज उद्यानों की सीमाओं पर, शीतल पवनों का पहरा है। सूना निसर्ग का प्रांगण, न रंग न ही उल्लासों का मेला है। धरती से गगन तक छाई, लालिमा विहान लिये आई। उड़ते झोंकों में पतंग सतरंगी, ले आई प्राचीर से उजोरा आई। उत्सु ने राग भैरवी गाई, लालिमा विहान लिये आई। मधुर मयूखें पूरब से आई, इंदुजा के अमृत में घोल लाई।

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यह कविता (नववर्ष वंदन।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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ओ साजन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ ओ साजन। ♦

पाता जगा यदि जीवन इन्हीं तरंगों पर,
गीत तुम्हारे ओ साजन।

स्वप्न सारे रात के ये मोह-बन्धन तोड़ जाते,
घिर आती तुम्हारी छवि फिर अश्रुजल के किनारे।
बजते जिगर में तार गति के चरण निर्झर किरणों में,
लेता साध ही तुम्हें मैं वीणा मरण अधर में।
जो यह व्याप्त है चारों ओर मर्म के विरह-सा पथ में,
एक सुख से कांप उठता अमावस के पर्व में।
अवसाद श्यामल मेघ-सा साजन॥

कितने स्निग्ध शिशिर से सब्ज आते स्नेह से,
शेष संवाद किस अतल की सजाते किरणों से।
उठती चीख मर्म वाणी की अकथित भाषाहीन से,
कहानी उन प्रभातों की पाता भूल न पलभर।
घूमा निरंतर मैं रिक्तकर द्वार पर तुम्हारे जब से,
किस लिये चेतना का शून्य मन अशांत उमंगों से।
प्रचंड कुहराम है साजन॥

कितना विवश मैं आज पर जन्म-जन्मांतर से परिचित,
अन्तर की उमस से दग्ध पिपासा ही आज नीरव।
विराट-विप्लव यह लोहित कर्म का समर्पण आज,
किसी की सांस का दो कण खींच लाया निर्माल्य तक।
किसी दिन असफलता में साधना में लीन होगी मगर,
तुम्हारे इन्हीं जीवन तरंगों पर जगा पाया यदि अगर।
गा उठुंगा गान साजन॥

सदायें दिल की किसी को टूटते सुना पाता यदि,
ये रातें मरणवाहन जिसकी पनपती इक जिंदगी।
खोल पाता यदि अंतःस्थली की अमावस जिंदगी की,
पिपासाओं के प्रलय को अगर पी पाता समझ चेतन पावस।
यदि लेता सोख उभरती वांछा अपनी निदारुण,
फिर कभी बुझ न पाती मेरी लगाई।
शीतल-सी पावक साजन॥

मेरे जख्मों पर हँस सके वह दर्द का दौर आये,
रजनी सावित्री हो उठे मेरा दीप निहार बहाये।
बीती बहारें बींधती चमन में आये शिशिर को संग लाये,
मेरे मौन सूलों की गुहारें रुक न पाये ये विकल।
यदि न हो पाये मुखर भी नयन आकुल अन्तरों के,
रह ही जायेगा चिर-शून्य सच कह दूं मैं हूं शून्य।
दहक अंगार-सा जाऊंगा साजन॥

यह बसेरा इस वीरान में रात भर का मानता हूं,
कब उछाहों ने न घेरा बस विष बरसता ही मिला।
कौन सी आरज़ू लाऊं फूलों के महल में आज,
जीवन की निधियां लुटाऊं कौन संचित रह सकी जो।
जलती रहे रात भर मेरी चिरुकी भरपूर इतनी,
यह जीवन में रहे सर्वत्र क्या यही कम जलन विद्रुप रुदन के,
पाता जगा यदि जीवन इन्हीं तरंगों पर।
गीत तुम्हारे ओ साजन॥

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली , मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — अपने साजन की याद में एक सजनी की क्या मनोदशा होती है? उसके मन में किस तरह के विचारों व भावनाओ के तरंग उड़ते है ये बताने की कोशिश की है। उमड़ घुमड़ कर बहुत सारी भावनाएं चलती है उअके मन पटल पर, वो कही खो सी गई है। उसकी भावनाएं कुछ इस तरह चलती है…… मेरे जख्मों पर हँस सके वह दर्द का दौर आये, रजनी सावित्री हो उठे मेरा दीप निहार बहाये। बीती बहारें बींधती चमन में आये शिशिर को संग लाये, मेरे मौन सूलों की गुहारें रुक न पाये ये विकल। यदि न हो पाये मुखर भी नयन आकुल अन्तरों के, रह ही जायेगा चिर-शून्य सच कह दूं मैं हूं शून्य। दहक अंगार-सा जाऊंगा साजन।

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यह कविता (ओ साजन।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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सृजनहार माँ और गुरु।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सृजनहार माँ और गुरु। ♦

ब्रह्मांड की दो अनुपम कृति,
इक जननी तो इक गुरू दोनों हैं सृजनहार।

श्रद्धा विश्वास भक्ति और समर्पण की मिसाल,
आकार संस्कार से बांधे धर्म-कर्म के सृजनहार।

शक्ति सामर्थ्य सदृश्य संसार,
साकार पारब्रह्म के समान।

ज्ञान विद्या जीवंतता कल्याण,
परम पद आलंभ के चर-सर्वशक्तिमान।

ज्योति सद्वृत्ति नीरद गान,
अनन्य अद्भुत माधुर्य का मिश्रित वरदान।

अध्येता सम-जड़ता अविदित दर्प कुसुम समान,
गुरू सूक्तद्रष्टा धात्री जगदम्बिका समान।

प्रदीप्त आत्मज्ञान की कान्ति-सौरभ गान,
गुरू और मातु हैं दृग उर्वी पुष्कर समान।

हम थे निर्बुद्धि मुर्च्छित मृण प्रस्तर समान,
परस प्राप्ति जब मिली हम हुये आकृति समान।

मातु और गुरू हैं उदधि उर्मि अमर्त्य वसुंधरा समान,
शत-शत नमन है इन्हें, जो हैं रत्नगर्भा अंबुनिधि व्योम समान।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली , मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — इस संसार में माँ और गुरु की जगह कोई भी नही ले सकता। जहां माँ जन्म देने के साथ साथ प्रथम गुरु है और सदैव ही अपने बच्चे के सर्वागीण विकास के लिए तत्पर रहती है। वही एक सच्चा गुरु उसे सदैव ही सन्मार्ग पर चलकर मर्यादा पुरुषोत्तम ज्ञान व ध्यान से भरपूर जीवन जीने की कला सीखाता है। माँ और गुरु सदैव ही जीवन के हर क्षेत्र में वृद्धि चाहते है, उन्नत और प्रगतिशील जीवन के सूत्रधार है दोनों।

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यह कविता (सृजनहार माँ और गुरु।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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तनया।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ तनया। ♦

तनया (बेटी)

निकाय का आधार है तनया,
आत्मज की पहचान है तनया।
जगत जननी की जान है तनया,
बेटियों का सर्वनाम है तनया।

धर्म की रूपरेखा है तनया,
संस्कृति की प्रथम जान है तनया।
सृष्टि का आधार है तनया,
माँ की अनुपम कृति है तनया।

समाज की डोर है तनया,
संस्कृति की धरोहर है तनया।
नंदिनी उपनाम है तनया,
ब्रहाण्ड की गति है तनया।

उत्पत्ति की आधार है तनया,
परिवार का जीवन है तनया।
गेह की रीति-रिवाज है तनया,
माता-पिता की दुलार है तनया।

भाई का अभिमान है तनया,
हर हंसी-खुशी के सरगम का,
रूप है तनया।
मातृभूमि की छाप है तनया,
परिवार का दंभ है तनया।

कलम कागज और दवात है तनया,
हर लेखक का आधार है तनया।
लेखन का लेख है तनया,
संसार का प्यार है तनया।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली , मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — बेटियां शक्ति, प्रेम, करुणा, ममता की वह चुलबुली चिड़िया सी चहकती, फूल सी महकती मुस्कुराती, राजकुमारी सबकी प्यारी लाड़ली – दुलारी, सबका सदैव ही ध्यान रखने वाली। ईश्वर द्वारा मानव जाती के लिए प्रदान की गई अनमोल शक्तिपुंज हैं। जो हर रूप में प्रेम और सहयोग के लिए तैयार रहती है।

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यह कविता (तनया।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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आज तन्हा हूं।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आज तन्हा हूं। ♦

मन की आस उनकी प्यास,
हर घड़ी आस होती है।
हर जगह पास होती है।
जब दर्द हो तो इस कदर,
बार – बार पूंछरी नजर।

आईना लेकर अपने अन्दर,
तलाश करता हूं उस समय का।
कोई खूबी हो मुझमें उसे देखूं ,
मगर कुछ ऐसा नहीं पाता।

बस इक बार मिला था,
ना जाने उसने क्या देखा था।
ख्यालों में खोजता रहा,
सवालों में ढूंढता रहा।

आज तन्हा हूं,
अकेला हूं फिर भी,
बीते पल को याद करता हूं,
जो यादों में भी करीब है।

उसे नजरों से देखने का,
अपने करीब लाने का।
फिर से दिल में बसाने का,
प्रयास करता रहता हूं।

समय की ऐसी मार पड़ी,
आंधियों ने उसे उड़ा ले गई।
आज बीराने में बस,
उसे खोजता रहता हूं।

कसम अपनी दे गई,
रसम निभाने का वादा लें गई।
खुद तो ओढ़ ली कफ़न,
मुझे जलने के लिये छोड़ गई।

आंखों में बसी है,
मन में रची है।
इस दिल से कैसे उतार दूं,
कैसे दूसरे को अपना बना लूं।

इस जख्मी दिल की,
दवा बता दो यारों।
मेरी तड़प का कोई,
इलाज बता दो यारों।

हर चेहरे में उन्हें बस,
उन्हीं को खोजता रहता हूं।
वो जब नहीं दिखायी देते,
जार – जार रोता रहता हूं।

वो बस एहसास होकर रह गये,
हम क्या के क्या हो के रह गये।
इस फानी दुनियां में,
बस इक बुझा चिराग रह गये।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली , मध्य प्रदेश ♦

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ज़रूर पढ़ें — शिक्षक की महानता।

  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — जब भी इंसान किसी से बेइंतहा प्यार करता है, उससे जब भी बिछड़ता है, उसे बहुत दर्द महसूस होता है। उसकी यादों वाली भावनाएँ दूर नहीं जातीं, उससे। अब महसूस होता है – आज तन्हा हूं, अकेला हूं फिर भी बीते पल को याद करता हूं, जो यादों में भी करीब है। इस बिछड़ने के दर्द को वही महसूस कर सकता है जो किसी से बेइंतहा प्यार करता है।

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यह कविता (आज तन्हा हूं।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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राष्ट्रभाषा हिन्दी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ राष्ट्रभाषा हिन्दी। ♦

ऊसर होती जमीन को, पुनः जीवन देना चाहिये;
जाती हुई भाषा को, पुनः स्थापित करना चाहिये।

आज के परिवेश में, हिन्दी का होता अपमान;
अंग्रेजियत का हो रहा बोलबाला, हिंदी को कर दरकिनार।

मिठास भरी जिसमें, जहर का नाम दे रहे;
मधुरता जिसके शब्दों में, कड़वाहट उसमें घोल रहे।

पृष्ठिभूमि जिसने बनाई, उसकी नींव हिला रहे;
सम्पूर्ण जगत में, सभ्यता संस्कृति को रखा है।

आज तक जन – जन तक, हृदय की गहराई तक बसी;
पर निगाहों से उतारी गई, भाषा हिन्दुस्तान की।

हिन्दी सम्मान है, हिन्दी अभिमान है;
हिन्दी स्वाभिमान है, भारत की जान है।

भरतखण्ड की संस्कृति है, संस्कारों की जननी है;
आत्मा जग की, विश्व भाषा की माँ है।

विश्वास जगत जनार्दन की, एक डोर में सबको है बांधती;
हर भाषा को सगी बहन समझे, भरी-पूरी हों सभी बोलियां।

यही कामना हिंदी है, यही साधना हिंदी है;
सौतन विदेशी भाषा न बने, महारानी हमारी हिन्दी ही रहे।

आन हमारी है, शान हमारी है हिन्दी;
चेतना हमारी है हिन्दी, वाणी का शुभ वरदान है हिन्दी।

वर्तनी हमारी है हिंदी, व्याकरण हमारी है हिन्दी;
संस्कृति हमारी है हिंदी, आचरण हमारी है हिन्दी।

वेदना हमारी है हिंदी, गान हमारी है हिन्दी;
आत्मा हमारी है हिन्दी, भावना का साज़ है हिन्दी।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली , मध्य प्रदेश ♦

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ज़रूर पढ़ें — शिक्षक की महानता।

  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — अंग्रेजो से आजादी के इतने वर्षों बाद भी हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा की मान्यता आधिकारिक रूप से क्यों दर्ज नही हुआ, हिंदी को उसका सम्मान क्यों नहीं मिला? हिन्दी राष्ट्रभाषा के महत्व, गुणों और प्रभाव को बताया है। हिन्दी हर भारतीय के दिल से निकलने वाली भाषा हैं। हिन्दी भाषा दिल को दिल से जोड़ने का कार्य करती है। एकलौती हिन्दी भाषा ही है जिसमे अपनापन है दुनिया की किसी भी अन्य भाषा अपनापन का स्थान नहीं।

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यह कविता (राष्ट्रभाषा हिन्दी।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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