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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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प्रकृति की सुंदरता पर कविता

विधात्रि की माया।

Kmsraj51 की कलम से…..

Vidhatri Ki Maya | विधात्रि की माया।

रे मन तुझे रोकता हूँ,
क्षण-प्रतिक्षण तू क्युँ खिंचा जाता है।
मनःशक्ति जिसे समझता तू नारी,
इस जग में कब से उसका नाता है।

कुछ-कुछ यादों सा परिचित है,
सुध से बढ़ता अनुराग बड़ा।
रग-रग में कौन छिपा अपना,
रहता जिससे विराग बड़ा।

कैसी सुंदर यह नगरी,
कैसी इसकी सुलक्षण काया।
स्तुत्य है पावन यह धरती,
धन्य-धन्य है भरत भूमि की माया।

पहन-पहनावा शशिप्रभा का,
श्रृंगारित करती पिण्ड ग्रहों को।
निसर्ग हर्षोल्लातित हो खोली आँखें,
निहारती अपने स्वर्णिम संसार को।

झिलमिलाते विटपों पर जगमग पुष्प घनेरे,
गुच्छों – गुच्छों से भर जाते आम्र रसीले।
आलिंगन में लेकर नील गगन को,
कभी दृश्य कभी दर्पण बन जाते निराले।

कलरव करती कहीं कोकिला सारी,
उड़-उड़कर बैठती डाली-डाली।
चितचोर चंचल-सी तितलियाँ उड़ बैठती,
यह फूल डाली उस फूल डाली।

हरित वनों के उन्मुक्त कंठों से,
निर्झरी बन जाते झरने नाले।
घुल-घुलकर वादियों में चंद्रभूति-सी,
निर्मल गंगा की झिलमिल आले।

उतरती खेतों में स्वर्णिम आभा,
सींचकर साँझ सुनहली गाथा।
अनन्त की नील उपवन के बीच,
विहँस पड़ती प्रकृति दे अपना साथा।

बनैले शस्य भी तो पुलकित हर्षित,
समीरण में झूम रहे स्वच्छंद।
महामाया के अंग – अंग में भरा,
किरणित हो फूटता महा आनन्द।

मदमस्त हो देखती सृष्टि की ओर,
झंकृत करती उर के हर तार।
उमड़ पड़ते हृदय के उच्छवास,
अभिनंदित हे सृजक! तेरा व्यापार।

हे मातु तू धन्य;
नाना कुसुमों से सिंगारित कर उपवन,
निहारती वासा-व-लोक इसकी छवि न्यारी।
विविध सारंगों से सजी-धजी यह,
रंग-बिरंगी-सी सजी यह क्यारी।

बाँस है बबूल है कहीं-कहीं पर धूल है,
चहुँ ओर बिराजती बस हरियाली है।
कहीं कास है कहीं दूब है कहीं फूल से,
श्रृंगारित नदी नाल वरुणवास है।

नारी = मन की शक्ति

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (विधात्रि की माया।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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अनुरागी लालिमा कपोलों पर।

Kmsraj51 की कलम से…..

Anuragi Lalima Kapolon Par | अनुरागी लालिमा कपोलों पर।

अनुरागी लालिमा कपोलों पर,
छटा इंद्रधनुषी-सी खिल गई।
प्रफुल्लित तरुणी की शायद,
कुमारत्व से नयन मिल गई।

दिन हो गये स्वप्निल-स्वप्निल,
आकुल बाट जोहती क्षुब्ध रजनी।
अंग-प्रत्यंगों में धूप बासंती,
नयन पटों पर खिली चाँदनी।
निंद्रित उर के धड़कन में,
मनभावन नवज्योति जल गई।

जगी मृदुल-मृदुल मादक वेदना,
अकेलेपन के आलिंगन में।
मधुर – मधुर मुग्धित कल्पना,
अरुनारा कमसिन नयन में।
हो गई निंदिया वैरागन-सी,
चेतना खोई निशा ढल गई।

परवाना पतंगे जैसी अभिलाषाएं,
श्वेत-श्याम विहंगों-सी घिरती।
अंतहीन अनंत महाशून्य में,
पंख फैलाये फिर बिचरती।
सशक्त शोभित भुजपाशों की,
बाँहों में आस लिये पल गई।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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प्रकृति के रंग।

Kmsraj51 की कलम से…..

Prakriti Ke Rang | प्रकृति के रंग।

फिर से वही मौसम आया,
जिसने प्रकृति को खुशनुमा बनाया।

सतरंगी रंगों की छटा बिखेरी है इस कदर,
जिसे देख नई नवेली दुल्हन भी शर्माए।

कहीं पर खेतों में गेहूं की दुधिया बाली,
पवन संग इठलाती झूम~झूम जाए।

कहीं पर दिखाई दे पत्तों से ज्यादा फूल,
अपनी खुशबू की बाहें फैलाए।

आम के पेड़ तो हरे~हरे बौर से,
धरती को गले मिलने आए।

कोयल भी अब तैयार होकर,
मस्त कुहू ~कुहू के स्वर सुनाए।

चिड़िया भी भोर होने से पहले ही,
ची~ची करती मधुर सुर सजाए।

जिधर देखो उधर ही इस बसंत ने,
अपने खूबसूरत पांव है फैलाए।

हर पेड़ की डाली पर नई कोपलें,
पेड़ से निकल दुनिया देखना चाहे।

धरा भी वही आसमां भी वही है,
प्रकृति भी बसंत में अपना रूप दिखाए।

इस प्रकृति में छिपे हैं वो रंग हजार,
जिसे अपनाकर इंसान हर पल मुस्कराए।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — वसंत ऋतु फूलों और त्योहारों का मौसम है, इस प्रकार यह बहुत सी खुशियाँ और आनंद लाता है। रंग-बिरंगे और सुन्दर फूल पूरी तरह से दिल जीत लेते हैं और हरी घास हमें टहलने के लिए अच्छा मैदान देती है। सुबह या शाम को सुन्दर तितलियाँ प्रायः हमारे ध्यान को खिंचती है। दिन और रात दोनों ही बहुत सुहावने और ठंडे होते हैं। ऐसा लगता है आम के पेड़ तो हरे~हरे बौर से, धरती को गले मिलने आए। कोयल भी अब तैयार होकर, मस्त कुहू ~कुहू के स्वर सुनाए।चिड़िया भी भोर होने से पहले ही, ची~ची करती मधुर सुर सजाए। जैसे पेड़ों पर पतझड़ आता है उसी तरह इंसान के जीवन में भी बहुत उतार – चढ़ाव आता है, अगर दुःख है तो, बहुत जल्द ही सुखी समय भी आएगा।

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यह कविता (प्रकृति के रंग।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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प्रकृति और खिलवाड़।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ प्रकृति और खिलवाड़। ♦

पावन प्रकृति के आंचल में जब, मानव ने खोली आंखे थी।
कितना निश्छल रहा मानव होगा? खिलती उसकी बांछे थी।

वक्त गुजरा तो होड़ बढ़ी, उसने कुदरत से खिलवाड़ किया।
हरे भरे और खिलते चमन को, नादान मानुष ने उजाड़ दिया।

अब रोगी काया और भोगी मानस, बाँछों में पड गई झाईं है।
धन वैभव तो है बहुत बड़ा पर, सुख सन्तोष पास में नाही है।

प्रकृति महतारी जग सब जीवों की, मानव ने उसको लूटा है।
भूल गया वह मरना है इक दिन, मोह इस जग का झूठा है।

जंगल काटे, भूमि खोदी, हवा, पानी व व्योम को दूषित किया।
जोशीमठ की दरारें आज डराती, प्रकृति से खिलवाड़ किया।

काश ! यूं न रौंदता कुदरत को, खुद खुदा मान के भूल करी।
नतीजन सांसे उखड़ रही है, जवां फेफड़ों में है अब धूल भरी।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस धरा पर इंसान से भी काफी समय पहले से ही प्रकृति अतिसुन्दर और मनोरम रूप में उपस्थित है। मनुष्य ने अपनी नाशवान भौतिक सुख सुविधा के लिए प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जिसके परिणाम स्वरूप आज अब रोगी काया और भोगी मानस हो गया है। धन वैभव तो है बहुत बड़ा पर, सुख सन्तोष उसके पास में नाही है। प्रकृति माँ है सभी जीवों की, मानव ने उसको इस क़दर लूटा है की भूल गया, वह मरना है इक दिन, मोह इस जग का सब झूठा है, सब कुछ यही रह जाना है। मानव ने जंगल काटे, भूमि खोदी, हवा, पानी व व्योम को भी दूषित किया, इसी कारण जोशीमठ की दरारें आज डराती, प्रकृति से खिलवाड़ किया बढ़चढ़ कर क्यों? काश ! यूं न रौंदता कुदरत को, मनुष्य ने खुद भगवान् मान के भूल करी। नतीजन सांसे उखड़ रही है, जवां फेफड़ों में है अब धूल भरी। अगर अब भी नहीं सुधरे तो, आने वाला समय और भी भयावह होगा।

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यह कविता (प्रकृति और खिलवाड़।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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