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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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You are here: Home / Archives for विवेक कुमार की कविताएं

विवेक कुमार की कविताएं

हर घर तिरंगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हर घर तिरंगा। ♦

गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा,
पड़ा था हमारा हिन्दुस्तान।
भारतमाता तड़प रही थी,
जंजीरों में जकड़ पड़ी थी।

पराधीनता ने दिया चादर तान,
उबल पड़ा स्वतंत्रता की उड़ान।
गांधी बन आया एक ही नाम,
संग हुए संगी साथी जो थे महान।

लाल बाल और पाल की तिकड़ी,
बड़ी थी कमाल।
खुदीराम बोस, तिलक, राजगुरु ने,
आजादी का, बिगुल दिया था फूंक।

अंग्रेजों भारत छोड़ो,
सविनय अवज्ञा आन्दोलन ने किया।
फिरंगियों को देश छोड़ने पर मजबूर,
सन 47 ने समझाया आजादी का मर्म।

पराधीनता से मिली निजात,
अमन, चैन की हुए शुरुआत।

आज आया जश्न ए आजादी का 75 वां साल,
इस पावन अवसर पर हमसब,
आजादी का अमृत महोत्सव मनाएंगे।
हर हाथ तिरंगा फहराएंगे।
हर घर तिरंगा लहराएंगे।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — तिरंगा है यह खिलौना नहीं, हर रंग का लहदा भाव निराला है । शौर्य, वीरता, शान्ति, समृद्धि, मध्य चक्र प्रतीक समय का डाला है। यहां के बच्चों के अंदर जन्म से ही वीर रस भरा होता है, जिसे बस निखारने की जरूरत होती हैं। भारत का शौर्य अद्भुत व बहुत ही अनुपम हैं, दुश्मन का संस्कार भी करें अदब से गर तोड़े दम। पीठ पर कभी भी न करें वार यहाँ के वीर जवान। यह धरती है उन वीरों की जो देश पर होते है सदैव ही कुर्बान। तहे दिल से नमन है माँ भारती के हर उन शूरवीर सपूतों को जिनके बलिदान के बदले हमे आज़ादी मिली। जो आये थे यहां व्यापार करने, व्यापार के बहाने हमे अपना गुलाम बनाकर खूब मनमानी किया। उन्होंने हम पर बहुत ही निर्दयता पूर्वक अत्याचार किया, और हमें खूब लुटा। हमें कभी भी नहीं भूलना चाहिए उन शूरवीर सपूतों के बलिदान को, जिनके बलिदान के बदले हमे आज़ादी मिली। शत-शत नमन है उन वीर सपूतों की जननी को जिन्होंने अपने लाल को माँ भारती की रक्षा के लिए ख़ुशी – ख़ुशी समर्पित किया। जय हिन्द – जय भारत।

—————

यह कविता (हर घर तिरंगा।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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रेशम की डोर बेजोड़।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ रेशम की डोर बेजोड़। ♦

अटूट प्रेम की पक्की डोर,
टूटे कभी न इसका जोड़।
इस रिश्ते का न कोई तोड़,
माथे तिलक, रोरी और चंदन,
बहन ने किया भाई का वंदन।

रक्षासूत्र बांध बहना ने,
लिया भाई से एक वचन।
रक्षक नहीं रक्षा का गुर,
गुरु बन ऐसी शिक्षा दो,
डर का मन में न हो डेरा।

मजबूत और फौलाद बनूं,
खुद की रक्षा सहज कर सकूं।
हमारी मनोदशा ऐसी बने,
न कभी डिगू न कभी झुकूं,
हर बहना का हो यह कहना।

भाई तुम हो मेरा गहना,
भाई बहन का प्यार अनूठा।
इस रिश्ते से न कोई रूठा,
दिल के रिश्तों का यह जोड़,
रेशम की डोर, न होगी कमजोर।

बहन का प्यार, भाई का विश्वास,
इस पर्व को बनाता खास।
सावन पूर्णिमा के दिन है आता,
स्नेह और विश्वास है लाता।
रक्षाबंधन है कहलाता,
रेशम की डोर है बेजोड़।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — रक्षाबंधन का त्योहार भाई बहन के पवित्र प्यार का प्रतिक है, जिसे राखी का त्योहार भी कहा जाता है। रक्षा बंधन पर बहन, भाई की कलाई पर राखी बांधती है और उसके दीर्घायु व सुखी जीवन की प्रार्थना करती है। इसके साथ ही बहन अपने भाई से अपनी सुरक्षा का वचन लेती है, की जीवन में जब भी उस पर कोई मुसीबत आएगा उसका भाई उसकी मदद के ली आ जायेगा। एक दूजे के चेहरे को देख मुसीबतें भाप लेते हैं, ऐसा होता है भाई बहन का रिश्ता। रक्षाबंधन हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार है, जिसे पूरे भारत समेत अन्य देशों में भी मनाया जाता है।

—————

यह कविता (रेशम की डोर बेजोड़।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है। ♦

ऊपर वाले ने कुछ सोच कर, हमें बनाया होगा,
नाक नक्श संग संस्कारों का, साज सजाया होगा।
मिट्टी के पुतलो में रंगों की, छटा बिखेरा होगा,
बड़े अरमानों से अपने दिल में, सपने संजोया होगा।
हसरतें तो बहुत थी, परवान चढ़ाना बाकी है,
कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।

दिया होगा, सत्य पर चलने की सनक खास,
बनाकर एक बेहतर इंसान, पुतले में डाला होगा जान।
प्रकृति की रक्षा करेगा, बनाकर एक अपना मुकाम,
रंगमंच का भावी वजीर, करेगा भावनाओं का सम्मान।
दिन फिर बहुरेंगे, फिर बदलेंगी फिजाएं धरा की,
हसरतें तो बहुत थी, परवान चढ़ाना बाकी है।
कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।

इतनी आशाएं, आकांक्षाओं से लदा आया हूं इस कर्मधाम में,
लेकर एक विश्वास प्यार की, बंधी थी एक डोर।
इतनी बड़ी जवाबदेही थी मिली, सोंचा कैसे चुका पाऊंगा,
था अपना रोल जो मिला, खुद कैसे निभा पाऊंगा।
असत्य के सागर में अपना, सत्य के गोते लगा पाऊंगा,
प्रकृति के भक्षकगण से, रक्षा कैसे कर पाऊंगा।
हसरतें तो बहुत थी, परवान चढ़ाना बाकी है,
कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।

पूछा जब अंतरात्मा से अपने, पाया एक ही ज्ञान,
सबको न मिल पाता है, इस रंगभूमि की शान।
कर्म पथ पर पग तो बढ़ाओ, मिलेगा जग में मान,
संस्कारों की बात कहां, रग-रग में सबके बसता है।
ढूंढ पाए वो शख्स खड़ा है, लिए जान में जान,
कमर कस मैं खड़ा हो गया, लेकर प्रभु का नाम।
हसरतें तो बहुत थी, परवान चढ़ाना बाकी है।
कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।

मिले ज्ञान से सीख ले, लिया कर्म को साथ,
ठान लिया जब मैने तो, पाऊंगा अब मंजिल तमाम।
मिले जीवन को सरस बनाकर, दूंगा एक संदेश,
कर्तव्य से न कभी डिगूंगा, देता हूं विश्वास।
बड़ों के आशीष को पाकर, फूला न समा पाऊंगा,
हसरतें तो बहुत थी, परवान चढ़ाना बाकी है,
कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।

रंगमंच से जो सीखा मैंने, आज ये साझा करता हूं,
कर्म करता हूं करूंगा, भटकूंगा न पथ से अपने।
सहयोग की भावना दिल में भरी हो, भाव ऐसी ही रखता हूं,
सीखा जिनसे सबकुछ, उन गुरुओं का आभार करता हूं।
हसरतें तो बहुत थी, परवान चढ़ाना बाकी है,
कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।

अंत में यह प्रण लेता हूं, करूंगा दायित्वों का निर्वहन,
सत्य को दिल से सजदा करूंगा, दूंगा उसका साथ।
गुरुओं का सम्मान करूंगा, नमाऊंगा अपना शीश,
ऊपर वाले की आस भरूंगा, चाहे मांगनी पड़े भीख।
हसरतें तो बहुत थी, परवान चढ़ाना बाकी है,
कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — भगवान ने सुंदर प्रकृति बनाया अनगिनत पेड़ पौधे बनाये, लेकिन इंसानो ने अपने स्वार्थ सिद्धि (इच्छा पूर्ति) के लिए प्रकृति को तहस नहस कर दिया। जिसका परिणाम मौसम का ख़राब होना, प्राकृतिक आपदा, और भी अनगिनत आपदा का अम्बार लग गया है, अगर ऐसे ही चलता (प्रकृति को तहस नहस करते रहेंगे) रहा तो पृथ्वी इंसान के रहने लायक नहीं रहेगी, फिर भाग कर जाओगे कहाँ ये कभी सोचा है? अब भी समय है सुधर जाओ इंसान, और प्रकृति से खिलवाड़ करना बंद करो, अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए जो तुम कर रहे हो। आओ हमसब मिलकर ये संकल्प ले आज की हम ऐसा कोई भी कर्म नहीं करेंगे जिससे प्रकृति के पांचो तत्वों को नुकसान हो। हम सभी प्रत्येक वर्ष एक पेड़ जरूर लगाएंगे और तब तक उसका देखभाल करेंगे जब तक वह पेड़ अपना ख़ुराक ज़मीन खुद न लेने लगे।

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यह कविता (कुछ कर गुजरने की हसरत अभी बाकी है।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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योग भगाए रोग।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ योग भगाए रोग। ♦

व्यस्त दिनचर्या से आज जूझ रहा इंसान,
धन की लालच में न रहा, स्वास्थ्य का है भान।
न दिन को चैन है, न रात को मिलता रैन,
दिन भर चल रही रस्साकस्सी से,
बिगड़ा शरीर का हुलिया, छूटा उसका मैल।

तनाव भरे जीवन से मिला, रोग का है साथ,
डायबिटीज, बीपी, गैस का मुफ्त में मिला ईनाम।
पैसे की खातिर जिस शरीर को, करता है बर्बाद,
उसी पैसे से फिर लगता करने, उसे है आबाद,
अपने शरीर के लिए वक्त भी न निकाल पाता।

जब समय आता कमाई का अंश भी काम न आता,
न माया मिलती है न मिलता है राम।
इस अजीब विडंबना की क्या की जाए बात,
जिसे खोजा गली गली, मिला वो अपने पास,
स्वस्थ तन में स्वस्थ मन का होता है वास।

स्वस्थ रहना ही असल पूंजी है, यही रहता पास,
21 जून योग दिवस मनाते, आता सबको रास।
वर्ष का लंबा दिन होता, दीर्घायु का देता आभास,
योग प्राचीन परंपरा का, अमूल्य उपहार है खास,
इससे मिलती स्फूर्ति, रक्त का होता खूब प्रवाह।

तनाव से मुक्त कर, करता आलस्य का है नाश,
नित्य करो तुम योग, दूर भागेगी रोग।
अनूलोम विलोम प्राणायाम का, जीवन में करो वास,
शरीर होगा निरोग, पास न फटकेगी रोग।
आओ मिलकर संकल्प करें, योग दिवस पर आज,
नित्य तीस मिनट हमसब करें व्यायाम।

जीवन से मिटाए बीमारी का नामो निशान।
योग दिवस पर संदेश देंगे खुलेआम॥
रोग भगाए योग रे भईया।
रोग भगाए योग………॥
धन्यवाद॥

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — योग आकाश के नीचे लगभग किसी भी बीमारी को ठीक कर सकता है। वास्तव में यह कहना उचित होगा कि यदि आप प्रतिदिन योग का अभ्यास करते हैं तो आप सभी रोगों से मुक्त रह सकते हैं। योग एक कला है जो हमारे शरीर, मन और आत्मा को एक साथ जोड़ता है और हमें मजबूत और शांतिपूर्ण बनाता है। योग आवश्यक है क्योंकि यह हमें फिट रखता है, तनाव को कम करने में मदद करता है और समग्र स्वास्थ्य को बनाए रखता है और एक स्वस्थ मन ही अच्छी तरह से ध्यान केंद्रित करने में सहायता कर सकता है। योग के अभ्यास की कला व्यक्ति के मन, शरीर और आत्मा को नियंत्रित करने में मदद करती हैं। यह भौतिक और मानसिक संतुलन कर के शान्त शरीर और मन प्राप्त करवाता हैं। तनाव और चिंता का प्रबंधन करके आपको राहत देता हैं। यह शरीर में लचीलापन, मांसपेशियों को मजबूत करने और शारीरिक स्वास्थ्य को बढ़ाने में भी मदद करता हैं।

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यह कविता (योग भगाए रोग।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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मेरे पापा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मेरे पापा। ♦

मेरे पापा,
मेरे है पालकदाता।
अंदर से कोमल,
मेरी खुशी के लिए कुछ भी कर जाते।
सबसे प्यारे, सबसे न्यारे,
ऐसे है पापा हमारे।

अंगुली पकड़ चलना सिखाया,
कंधे पर बिठा प्यार जताया।
हर स्थिति से लडने का हुनर सिखाया,
सीने से लगाकर प्यार जताया।

मेरे सभी नाज नखरे, वो हंसकर उठाते,
वृक्ष की भांति संरक्षण देते।
त्याग समर्पण की वो पराकाष्ठा,
मेरे संवारने हेतु उनकी निष्ठा,
जीवन भर न भूल पाऊंगा।

उनका कर्ज न कभी उतार पाऊंगा,
मगर बुढ़ापे की लाठी बन,
अपना फर्ज जरूर निभाऊंगा।
उनके आशीष को दिल से लगाकर,
चरणों में उनके मस्तक सदा नमाऊंगा,
उनके सपनों को सच करके दिखलाऊंगा।

सबसे प्यारे, सबसे न्यारे,
मेरे पापा, मेरे भगवान हमारे।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — पापा का प्यार निराला है, पापा के साथ रिश्ता न्यारा है, इस रिश्ते जैसा कोई और नहीं यही रिश्ता दुनिया में सबसे प्यारा है। मेरे होठों की हँसी मेरे पापा की बदौलत है, मेरी आँखों में खुशी मेरे पापा की बदौलत है, पापा किसी भगवान से कम नही क्योकि मेरी ज़िन्दगी की सारी खुशी पापा की बदौलत है। ये बाप तुझे अपना सब कुछ दे जाएगा, और तेरे कंधे पर दुनिया से चला जाएगा। पिता हैं तो हमेशा बच्चो का दिल शेर होता हैं। वो इस छोटी सी दुनिया में मेरा अनंत संसार है। एक पापा की बदौलत ही मेरा जीवन खुबसूरत बन पाया।

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यह कविता (मेरे पापा।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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शुभागमन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शुभागमन। ♦

निश्छल चंचल मन,
आंखों में संजोएं, सपनों की उमंग।
फंख फैलाए भरने को गगन की उड़ान,
नव आगंतुकों हेतु सज चुका है, शिक्षा का दरबार।
आइए पधारिए हमारे भविष्य के कर्णधार,
शिक्षा की दहलीज पर है आपका वंदन अभिनंदन,
शुभागमन, शुभागमन…।

चली बयार,
आ गई नामांकन की बहार।
नन्हें – मुन्हें की उड़ी फुहार,
मनमोहक, मनभावन लगता जैसे त्योहार।
आमंत्रित करता सूबे सह मुजफ्फरपुर का हर विद्यालय परिवार,
शिक्षा की दहलीज पर है वंदन अभिनंदन,
शुभागमन, शुभागमन…।

सजेगी बगिया चमन होगा गुलजार,
नव कोंपल के आगमन से खिल उठेगा,
शिक्षा का बाग, होगा नया आगाज।
भंवरे गुनगुनाएंगे सुनकर,
प्यारी मीठी मंद मंद मुस्कान।
पधारों हे राष्ट्र के कर्णधार,
शिक्षा की दहलीज पर है वंदन अभिनंदन,
शुभागमन, शुभागमन…।

प्रथम अप्रैल से आपकी राह निहारे,
नामांकन की बांट जोहते।
पाठशाला ही है जिसकी शान,
जो दिलाएगा उन्हें मान और सम्मान।
तभी बढ़ेगा राष्ट्र का अभिमान,
शिक्षा की दहलीज पर है वंदन अभिनंदन,
शुभागमन, शुभागमन…।

सभी अभिभावकों से विवेक की विनती है हरबार,
चल रही नामांकन की बयार।
कराइए छह वर्ष के नन्हें मुन्ने का दाखिला इसबार,
खुद आइए, संग लाइए।
बगिया के फूलों का चहकता मेहमान,
शिक्षा की दहलीज पर करते वंदन अभिनंदन,
शुभागमन, शुभागमन…।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — शिक्षा हमें विभिन्न प्रकार का ज्ञान व कौशल प्रदान करता है। यह सीखने की निरंतर, धीमी और सुरक्षित प्रक्रिया है, जो हमें ज्ञान प्राप्त करने में मदद करती है। यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जो हमारे जन्म के साथ ही शुरु हो जाती है और हमारे जीवन के साथ ही खत्म होती है। सजेगी बगिया चमन होगा गुलजार, नव कोंपल के आगमन से खिल उठेगा, शिक्षा का बाग, होगा नया आगाज। भंवरे गुनगुनाएंगे सुनकर, प्यारी मीठी मंद मंद मुस्कान। पधारों हे राष्ट्र के कर्णधार, शिक्षा की दहलीज पर है वंदन अभिनंदन, शुभागमन, शुभागमन…।

—————

यह कविता (शुभागमन।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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खाली समय।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ खाली समय। ♦

जब भी बैठिए खाली,
बजाइए जरूर ताली।
शरीर की करती रखवाली,
जैसे हो बाहर वाली।

जब मिले फुर्सत के क्षण,
ईश्वर का कर लो भजन।
मिलेगी मन को शांति,
ना रहेगा कोई भ्रांति।

जब मिले खाली के दो पल,
ऐसा कर जो सोचा हो बिता कल।
खुद से करें बात,
करें कुछ नया करामात।

आंखों को घुमाएं गोल गोल,
जैसे सूरज और चंदा गोल मटोल।
कोयल की निकाले बोली,
जैसे दे रहा हो कोई गाली।

हरकतें करें ऐसी,
दिल खुश हो जाए वैसी।
कभी उठक, कभी बैठक,
साथ में दीजिए आंखों को थोड़ी ठंडक।

आंखों में लगाइए काली,
जैसे हो सुरमा भोपाली।
एक मिनट के लिए हो जाओ मौन,
मिल जायेगा कुछ चैन।

चाय की चुस्की प्याली में,
नयन मटकाईये खाली में।
सिर खुजलाईए बाल खींचिए,
दाएं देखिए, बाएं देखिए।

अजब वाक्या याद कर,
मुस्कान बिखेरिए खुलकर।
खाली समय में भी काफी काम है,
नसीब में कहां लिखा आराम है।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जब हो फुरसत का समय प्रभु का भजन भी कर लिया करो। खाली समय में दोस्तों और परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर चाय पीते हुए कुछ फुरसत के पल बिता भी लिया करो, ना जाने कब ये शरीर साथ छोड़ दे, इसलिए प्रेम से दो शब्द बोल लिया करो सभी से। जब भी मिलो किसी से मुस्कुराते हुए मिलो और समय-समय पर ख़ुशी होने पर ताली भी बजा लिया करो मेरे यार। चार दिन की ज़िन्दगी है सभी से हँस बोलकर प्रेम से बिताया करो मेरे यार।

—————

यह कविता (खाली समय।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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मेरी मां का प्यार।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मेरी मां का प्यार। ♦

प्रेम वात्सल्य की मिशाल,
मेरी मां है सबसे कमाल।
मुझे गर्व है कि मैं हूं उनका लाल,
ममता की प्रतिमूर्ति है वो बेमिशाल।

करुणा बरसाती, अपने ही लाल,
नाजों से पाला, सीने से लगाकर।
सारे गम सहती, रखती दर्द संभाल,
कभी गुस्साती, कभी प्यार की मेहर बरसाती।

धूप छांव से हमें बचाती,
सूरत देखकर सब समझ जाती।
आज तक ये बात मुझे समझ न आती,
खुद भूखे रह, बड़े चाव से मुझे खिलाती।

मैं पूछता मां, तुमने किया है भोजन,
बड़े प्यार से मुझे समझाती जैसे करती भजन।
मेरे हल्के जख्म पर, आंसू छलकाती,
उसपर अपने प्यार का मरहम लगाती।

लगा सीने से मर्म बताती,
सजगता का पाठ पढ़ाती।
अपना सर्वस्व मुझ पर लुटाती,
ऐसी मां का करता हूं चरण वंदन,
मेरी मां का प्यार, सबसे कुंदन।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — किसी भी बच्चे को माँ की गोद में जो सुख मिलता है – वो संसार में कही और नहीं मिल सकता, तथा जो निडरता और ज्ञान पिता से मिलता है वो किसी भी विश्वविद्यालय से नही मिल सकता। घुटनों से रेंगते-रेंगते, कब पैरों पर खड़ा हुआ, तेरी ममता की छाँव में, जाने कब बड़ा हुआ.. काला टीका दूध मलाई आज भी सब कुछ वैसा है, मैं ही मैं हूँ हर जगह, माँ प्यार ये तेरा कैसा है? सीधा-साधा, भोला-भाला, मैं ही सबसे अच्छा हूँ, कितना भी हो जाऊ बड़ा, “माँ!” मैं आज भी तेरा बच्चा हूँ। काँटो भरी इस मुश्किल राह पर चलना सिखाता कौन… माँ अगर तुम न होती तो मुझे लोरी सुनाता कौन… खुद जागकर सारी रात चैन की नींद सुलाता कौन… माँ अगर तुम न होती तो मुझे चलना सिखलाता कौन..?

—————

यह कविता (मेरी मां का प्यार।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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मेरी दुनिया मेरे पापा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मेरी दुनिया मेरे पापा। ♦

मां की ममता का कोई जोड़ नहीं,
पापा के प्यार का कोई तोड़ नहीं।
मां के आंचल में ममता, पसारता पांव,
पेड़ रूपी पिता के नीचे है, निर्मल छांव।
मां होती ईश्वर का रूप,
पिता होते उन्हीं के दूत।
सबसे न्यारे, सबसे प्यारे,
मेरी दुनिया, मेरे पापा संवारे।

मां हमारी जीवनदायिनी,
पिता हमारे संरक्षण दाता।
मां ममता की होती मूरत,
पिता में दिखता, पालक की सूरत।
मां हमपर करुणा बरसाती,
पिता करते, सर्वस्व न्यौछावर।
सबसे प्यारे, सबसे न्यारे,
मेरी दुनिया, मेरे पापा संवारे।

पिता वृक्ष की, देते हरदम आभास,
जीवन में उनसे पूरा है, आस।
मां में बसता है, मेरी जान,
मगर पिता से ही है, मेरी पहचान।
बिन सिकन सब दुख सहकर,
करते मेरे सपने साकार।
सबसे प्यारे, सबसे न्यारे,
मेरी दुनिया, मेरे पापा संवारे।

मां की गोद संग, पिता के कंधे का सहारा,
है दोनों मेरी आंखों के तारा।
ऊपर से सख्त, भीतर से नरम,
ऐसे पिता है, मेरे लिए परम।
मेरे संघर्ष में, हौसले की है दीवार,
इनका कर्ज है, मुझपर अपार।
सबसे प्यारे, सबसे न्यारे,
मेरी दुनिया, मेरे पापा संवारे।

जीवन में उनके कर्ज न उतार पाएंगे,
मगर बुढ़ापे की लाठी जरूर बन जायेंगे।
उनके आशीष को दिल से लगाकर,
उनके चरणों में मस्तक सदा नमायेंगे।
अपनी आंखों में उन्होंने जो, देखा सपना,
सच करके दिखलाएंगे।
सबसे प्यारे, सबसे न्यारे,
मेरी दुनिया, मेरे पापा संवारे।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — किसी भी बच्चे को माँ की गोद में जो सुख मिलता है – वो संसार में कही और नहीं मिल सकता, तथा जो निडरता और ज्ञान पिता से मिलता है वो किसी भी विश्वविद्यालय से नही मिल सकता। वैसे – माता और पिता दिवस ताे हर मनुष्य काे अपने अंतिम श्वास तक मनाना चाहिये। एक सच्चा पिता सदैव ही अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिये दिन-रात अनवरत (continuously) कार्य करता हैं। जहा माता अपने बच्चों के स्वास्थ्य का ध्यान रखती हैं ताे वही पिता उन्हे सही ज्ञान और समझ देते हैं। जहा प्रथम गुरु माँ हैं ताे वही पिता गुरु हाेने के साथ-साथ सच्चा संरक्षक भी हाेता हैं। हमे अपने पिता से ये सीख भी मिलती है की – समस्या से बचना ही आवश्यक नहीं है, समझदार वाे हैं जाे समस्या से टकराये, और उसे मिटाकर ही दम ले। इतिहास वही बदलते हैं जाे दिन में सपने देखते हैं।

—————

यह कविता (मेरी दुनिया मेरे पापा।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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बुद्ध एक नाम नहीं भाव है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बुद्ध एक नाम नहीं भाव है। ♦

बुद्ध एक नाम नहीं भाव है,
जगत के लिए सत्य की राह है।

जिनके जीवन से सीख मिलती अपार है,
जहां धन वैभव का था भंडार।

सुख सुविधा का था बहार,
उस घर में भी लेकर जन्म।

न मिला मन की शांति,
छोड़ दिया घरबार।

ज्ञान की प्राप्ति लिए,
निकल पड़े वन की ओर।

जहां सुखाया तन,
रमाया साधना में मन।

पाया बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान,
बन गए महान।

त्याग और बलिदान की प्रतिमूर्ति समान,
सत्य का कराया भान।

आज ही के दिन किया महापरिनिर्वाण,
बुद्ध पूर्णिमा है जिसका नाम।

बुद्ध एक नाम नहीं भाव है,
जिसे अपनाकर मिलता शांति बेहिसाब है।

“बुद्धं शरणं गच्छामि”
“धम्मं शरणं गच्छामि”
“संघं शरणं गच्छामि”

बुद्ध एक नाम नहीं भाव है।
जो जगत को दिखाता मार्ग तमाम है।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — बुद्ध अर्थात प्रेम, करुणा, शील, त्याग की ज्योति, जिन्होंने हर इंसान को आत्मा के सत्य गुणों व शक्तियों से अवगत कराया सरल शब्दों में। सच्चे सुख का अनुभव करवाया सभी को। धन व संपत्ति में सच्चा सुख नही है, सच्चा सुख क्या है इससे भी अवगत कराया सभी को। इस संसार के सुख से भी ऊपर भी ऊपर सच्चा आनंद क्या है इसकी भी अनुभूति गहराई से करवाया। बुद्ध जैसे अवतार का आगमन इस धरा पर 2000 से 3000 वर्षों एकाध ही होते हैं। आओ हम सभी मिलकर महात्मा बुद्ध द्वारा बताये गए मार्ग पर चलकर अपना व इस संसार का उद्धार करें।

—————

यह कविता (बुद्ध एक नाम नहीं भाव है।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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