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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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सुशीला देवी जी की कविताएं

आओ खेले पुरानी होली।

Kmsraj51 की कलम से…..

Aao Khele Purani Holi | आओ खेले पुरानी होली।

आप सभी को तहे दिल से सपरिवार महापर्व होली की शुभकामनाएं!

जब न शिकवा था न थी कोई शिकायत,
बस प्यार ही प्यार ही था रिश्तों में बेजोड़।

वो पुरानी होली हुआ करती थी ऐसी,
रंग दिखाती थी ऐसा जिसका न कोई तोड़।

सूखे मेवे और फल बिस्कुट से भरी पहनकर माला,
जब लगाते थे बच्चें होली – पूजन की दौड़।

फिर रंग भरी बाल्टी, गुलाल भरी थाल, कोलड़ो की मार,
देवर – भाभी के प्यार को बनाती थी बेजोड़।

कोलड़ो की मार से बचने के लिए हर गली के,
हर मोहल्ले के मापे जाते मोड़।

एक डंडा ही बनता उनका सुरक्षा कवच,
भाभियों के आते ही भागे सब कुछ छोड़।

थकान को दूर करने बीच-बीच में आकर करें आराम,
सब चाय संग पकौड़े खाते नही देते छोड़।

वो पूरे गाँव, मोहल्ले के लोग इकठ्ठा होकर मनाते पर्व,
जो हर रिश्ते को देता था प्रेम से जोड़।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — होली अर्थात – प्रेम, स्नेह व स्वार्थ से मुक्त आत्मिक रिश्ता, जहां अपने विकारों को त्याग कर, सभी के प्रति करुणा का भाव मन में रख सबका भला करना। सभी गीले शिकवे भुला कर प्रेम से सबका सम्मान करना व गले लगाना, सबकी मदद करने का भाव मन में प्रकट हो। रंगो की तरह सदैव ही जीवन खुशहाल हो सभी का यही संदेश देता ये महापर्व होली।

—————

यह कविता (आओ खेले पुरानी होली।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता Tagged With: holi par kavita, sushila devi, sushila devi poems, आओ खेले पुरानी होली, आओ खेले पुरानी होली - सुशीला देवी, सुशीला देवी, सुशीला देवी जी की कविताएं, हिंदी कविता, होली पर कविता इन हिंदी, होली पर गीत हिंदी, होली पर लिखी बेहतरीन कविताओं से चुनिंदा अंश, होली पोयम्स इन हिन्दी

खोता जा रहा बचपन।

Kmsraj51 की कलम से…..

Khota Ja Raha Bachpan | खोता जा रहा बचपन।

बच्चों की जिंदगी में अब आराम कहाँ,
बस्ता लादे फिरते दिखते जब देखो जहाँ।

हम एक बात पर सहज करते है विचार,
क्यों डाल रहे बच्चों पर पढ़ाई की मार।

तीन वर्ष की आयु में स्कूल क्या कम था,
अब तो चेहरे पर ट्यूशन का भी गम था।

जो उम्र थी उनके खिलखिलाने की,
छोटी ~ छोटी बातों पर मचल जाने की।

वो तो गिरवी रख दिया हमने उनका बचपन,
फिर कहां से आएगा उसमें वो अपनापन।

मासूम बच्चों को क्यों इसकी है जरूरत,
मां~बाप को बदलना होगा अपना मत।

बच्चों की झुंझलाहट साफ देती है दिखाई,
जब उनकी आँखें आंसुओं से होती नहाई।

चलो स्कूल जाने तक तो ठीक थी बात,
स्कूल में दिन बीता ट्यूशन में बीती रात।

इन मासूम बच्चों का खिलौनों से कोई सरोकार नही,
माता~पिता को क्या खुद पर ऐतबार नही।

इन नन्हें बच्चों के कंधो से ट्यूशन का बोझ उतारे,
खुद भी हम इनका कुछ तो भविष्य संवारे।

माता~पिता से बड़ा कभी कोई बना महान नही,
नन्हें बालकों को ट्यूशन भेजे कोई शान नही।

भविष्य तो तभी सुंदर होगा गौर करेगे जब वर्तमान पर,
बचपन थिरेकेगा जब परिवार के संस्कारों की तान पर।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — 2/5 वर्ष से 3 वर्ष के बच्चों के कंधे पर पढ़ाई का बैग लादकर स्कूल भेजना फिर उन्हें टूशन भेजना इस चक्कर में बेचारे बच्चे ऐसा चक्कर खा जाते है की बचपन क्या होता है वो समझ ही नहीं पाते। जो पढ़ाई के लिए होड़ मची है, इस होड़ की चक्की में बच्चे पीसकर रह गए है। बच्चों को बचपन का पूर्ण आनंद देने के लिए माता-पिता और टीचर्स को भी अपने पढ़ाने पर ध्यान देना होगा, जब टीचर्स स्कूल में अच्छे से पढ़ाएंगे तो बच्चों को अलग से टूशन की जरुरत ही नहीं होगी। टीचर्स को अपनी जिम्मेवारी ईमानदारी पूर्वक निभानी चाहिए, और इस कार्य में माता-पिता का सहयोग भी होना चाहिए। एक बात याद रखें – “ये बच्चे ही भविष्य के निर्माणकर्ता बनेगे, ये मन से जितने शांत व मज़बूत होंगे, उतना ही शांति पूर्वक अच्छे से कार्य करेंगे।” अगर ये बच्चे बचपन से ही अशांत व तनाव से भरे होंगे तो अपने अशांत व चिड़चिड़े मन से कोई भी अच्छा कार्य नहीं करेंगे, अपने व समाज के लिए हानिकारक साबित होंगे।

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यह कविता (खोता जा रहा बचपन।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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बिखरे पत्तों सी जिन्दगी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बिखरे पत्तों सी जिन्दगी। ♦

ये जिंदगी ताश के बिखरे पत्तों जैसी,
खेल की तरह ही जीतती हारती है वैसी।

कभी बादशाह जैसी अपनी हुकूमत दिखाती,
कभी रानी बन सुंदरता का आईना दर्शाती।

कभी जोकर बन सभी को हंसाए, रुलाए,
आंखों में आंसू, होठों पर कभी मुस्कान लाए।

बावन पत्तों सा रिश्तों का बना संसार,
एक भी गुम हो जाए तो जीवन लगे निराधार।

सभी भावनाऐं इस कदर इन पत्तों में समाई,
कभी ईंट, कभी हुकुम का इक्का ले आई।

कभी पान के पत्ते सी, कभी चिड़ी जैसे पंख लगाए,
भावनाएं ले ऐसी, ये जिंदगी सरसाये।

जो रंगीन पत्तों की बात करें, उल्टे या सीधे एक समान,
बावन के ढेर में छुपे जो, रंगीन ताश दिखाए रंगीन जहान।

अलग-अलग करीने से लगाने पर, ये खेल में खूब रंग लगाए,
इसमें ही खोने पर, ताश के पत्तों जैसी जिंदगी बिखर जाए।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जिंदगी के उतार-चढ़ाव उस दिमागी खेल की तरह हैं जिसमें कभी हार होती है तो कभी जीत। यदि हम खेल को कुशलतापूर्वक और ध्यान से खेलते हैं तो विजय मिलती है और ध्यान चूकने पर हार का सामना करना पड़ता है। जिंदगी में परेशानियों व विपत्तियों का आगमन व्यक्ति को हताश कर देता है और उसके जीवन में अंधकार भर देता है। लेकिन मानव जीवन का यही वो समय होता है जब उसे पूर्ण धैर्य से कार्य करना चाहिए और शांत मन से उचित निर्णय लेकर आगे बढ़ना चाहिए। मानव जीवन में परेशानियों व विपत्तियों का आगमन मनुष्य को मानसिक रूप से मज़बूत बनाने के लिए आते है।

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यह कविता (बिखरे पत्तों सी जिन्दगी।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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वो आ गया।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ वो आ गया। ♦

हर शह उसके आने की खबर सुनाए अब,
सिर्फ महसूस किया न जाने देखा कब।

बड़े जोश से होती उसके आने की तैयारी,
सबसे ज्यादा चीजों की लोग करे खरीददारी।

हल्की-हल्की मीठी ठंड से होता आगाज,
धीरे~धीरे धूप और छाया का सजे साज।

छोटे~छोटे पैरों से चलता हुआ आता ये अब,
क्यों इसे देख घरों में छुपने लगे है सब।

गली से शहर तक के नुक्कड़ हुए है खाली,
इसने चादर ओढ़ी एक श्वेत परत वाली।

बचपन से निकलकर यौवन इस पर आया,
इस पर कोहरा~धुंध का खुमार भी छाया।

बड़े~बूढ़े सबके हाथ~पैर कर दिए इसने सुन्न,
जब बजाए ये शीत लहर की बर्फीली धुन।

अरे! हां मैंने तो लिखी है सर्दी के मौसम की बात,
जिसको केवल सूर्य की गर्मी ही दे सकती मात।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — उत्तर भारत में सर्दी से मुख ऐसा मोड़ा सुनहरी धूप ने की अब ठंडक में ढल गया है पूरा दिन और रात सिर्फ एक ही रूप में महसूस हो रहा। अभी बस कुछ ही दिन से ही ठंडक ने अपना अहसास कराया व आसमां से लेकर धरा तक सफेद धुंध की चादर को फैलाया है। किट-किट करके बजते दांत सर्दी में जम जाते हाथ; ऊनी स्वेटर भाये तन को गरम चाय … सर्दी आई, सर्दी आई, ठिठुरन अपने संग लाई, तापमान गिरता झर-झर, ठंडी हवाएं चलती सर-सर, … इस ठिठुरन से केवल सूर्य की गर्मी ही कम कर सकती है। शरद ऋतु के दौरान सभी जगहों पर बहुत अधिक ठंड लगती है। शरद ऋतु के चरम सीमा के महीनों में वातावरण का तापमान बहुत कम हो जाता है। पहाड़ी क्षेत्र (घरों, पेड़ों, और घासों सहित) बर्फ की सफेद मोटी चादर से ढक जाते हैं और बहुत ही सुन्दर लगते हैं। इस मौसम में, पहाड़ी क्षेत्र बहुत ही सुन्दर दृश्य की तरह लगते हैं। शीत ऋतु का महत्व​​ सर्दी के मौसम स्वास्थ्य का निर्माण करने का मौसम होता है हालाँकि पेड़-पौधों के लिए बुरा होता है, क्योंकि वे बढना छोड़ देते हैं।

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रंग बदलता इंसान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ रंग बदलता इंसान। ♦

समय देख न जाने कितने रंग बदले इंसान,
फिर इस जहान में गिरगिट ही क्यों बदनाम।

कभी इश्क कभी विरह कभी प्रेम कभी नफरत में डूब जाए,
कुछ भी नजर न आए जब अहम के रंग में ये रंग जाए।

कभी साहिल बनता तो कभी खुद ही किश्ती को डुबोए,
अपनी खुशी की खातिर किसी को आसुओं के सैलाब में भिगोए।

एक उंगली के सहारे से देता कभी किसी का साथ,
जब मंजिल करीब हो तो छिटक देता अपनों का हाथ।

पर्दे के पीछे के उन कलाकारों को क्यूं भूल जाए,
जिनकी मेहनत से वो मंच पर सिर ऊंचा उठाए।

इंसान कदम-कदम पर इस कदर बदले रंग हजार,
कुदरत के रंग बदलना भी कर देता बिल्कुल पार।

भांति-भांति के रंग चढ़ा कर असली रंग की खो दी पहचान,
मस्तक ऊंचा कर बैठा इतना भर लिया अभिमान।

इस जमीं से जुड़े रहने को ही सार्थक रहने दे इंसान,
गुणों को ही समाहित कर केवल रख इंसानियत का मान।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जब आप किसी से नाराज हो जाते हैं तो उसे कोसते हुए बोलते है कि ये गिरगिट की तरह रंग बदलता है। आखिर आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है। अचानक से गिरगिट हरा रंग से लाल और पीला से सफेद हो जाता है। लेकिन आजकल का इंसान गिरगिट से भी ज्यादा रंग बदलता है, स्वार्थी हो गया है आज का इंसान, हर कर्म उसका स्वार्थ से भरा है। अपने स्वार्थ के लिए किसी को भी हानि पहुंचने से हिचकिचाता नहीं आज का इंसान। अपने सनातन भारतीय संस्कृति, संस्कार और सभ्यता को क्यों भूलता जा रहा है इंसान?

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माँ जब तू हो जाए मेहरबान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ जब तू हो जाए मेहरबान। ♦

माँं जिस पर तू मेहरबान हो जाए,
उसका हर काम आसान हो जाए।

पहुंचाया है तूने उसको फर्श से अर्श तक,
बस निगाह रहे तेरे चरण से दर्श तक।
माँ जिस पर तू मेहरबान हो जाए,
उसका हर काम आसान हो जाए।

उस राहगीर की मंजिल,
खुद उस तक चल कर आए।
जिसकी राहें तेरे रहमो,
करम से इख्तियार हो जाए।
माँ जिस पर तू मेहरबान हो जाए,
उसका हर काम आसान हो जाए।

जिसने भी किया खुद को तेरे हवाले,
उसकी किश्ती हर तूफान से तू निकाले।
माँ जिस पर तू मेहरबान हो जाए,
उसका हर काम आसान हो जाए।

तेरी रहमतों का बरसे सुरूर इस कदर,
कुछ न बिगाड़ पाए दुनिया की बुरी नजर।
माँ जिस पर तू मेहरबान हो जाए,
उसका हर काम आसान हो जाए।

दाती तेरा देने का,
हर अंदाज होता निराला।
पाए वही जो तेरी,
धुन में खोकर बना मतवाला।
माँ जिस पर तू मेहरबान हो जाए,
उसका हर काम आसान हो जाए।

कुछ कहना सुनना,
क्यूं इस बेदर्द जमाने से।
हर खुशी मिल जाती,
एक तुझे अपनाने से।
माँ जिस पर तू मेहरबान हो जाए,
उसका हर काम आसान हो जाए।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — मातारानी के चरणों में जो अपने आपको सम्पूर्ण समर्पण कर दे, उसके जीवन की सभी बाधाएं स्वतः ही हट जाती है। मातारानी की कृपा से उसके सर्व कार्य सिद्ध होने लगते है। माँ बहुत ही कृपालु है, ममता की मूर्ति माँ सदैव ही अपने बच्चों का ख़्याल रखती है। मातारानी आपकी सर्व मनोकामना पूर्ण करे। प्रेम से बोलो – जय माता दी!

—————

यह कविता (माँ जब तू हो जाए मेहरबान।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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पावन बेला।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पावन बेला। ♦

सोमवार की आज ये अति शुभ बेला आई।
हर्षित हो आई आज सूरज की तरुणाई॥

जल-दूध अभिषेक ने शिवलिंग की गाथा सुनाई।
श्रावण माह के सोमवार को हर-हर महादेव की गूंज आई॥

यंत्र और मंत्र दोनो ने मिलकर भोलेबाबा को पुकार लगाई।
सब मंगलमय कर दो जन-जन के ह्रदय ने आवाज लगाई॥

इस श्रावण माह में सबकी झोली खुशियों से भर देना।
अवगुणों का विष पी अमृतमयी गुणों का वर देना॥

हे शम्भू, पधारों इस धरा पर स्वागत करें हम तेरा।
इस माह में तेरी ही धुन में बीतेगा तेरे भक्तों का साँझ-सवेरा॥

रहें हमेशा गले में तेरे सर्पों की माला।
सावन में तेरा पूजन करें जीवन में उजाला॥

हर दिशा में गूंजेंगे बम-बम भोले के जयकारे।
सच्चे ह्रदय से तुझें याद करने वाले सबकाज संवारे॥

भोलेनाथ तू तो है दया, करुणा का सागर।
असुर भी तेरी पूजा करें तो उसको भी दे वर॥

इंद्रदेव भी नतमस्तक होकर जो जल बरसाए।
तेरी जटाओं में बसी गंगा मैया उसको शीतलता दे जाए॥

हे! शिवशंभु हे! शंकर हे! जटाधारी, हे त्रिनेत्रधारी।
श्रावण मास में सुन लेना अपने भक्तों की पुकार सारी॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सावन के महीने में अत्यधिक वर्षा होती है, इसीलिए यह समय भगवान शंकर का प्रिय महीना होता है। ऐसा कहा जाता है कि इस महीने में जो भी भक्त सच्चे मन से व पूरी लगन के साथ भगवान शंकर की पूजा करता है, उनकी सभी मनोकामना पूर्ण होती है। इस महीने में सबसे अधिक त्यौहार आते हैं और हिंदुओं के हिसाब से उन त्योहारों को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। जावालोप निषद में उल्लिखित है कि रुद्राक्ष शिव के आंसू हैं। इनका तृतीय उ‌र्ध्व नेत्र व बाईं आंखों की संयुक्त शक्ति का प्रतीक है। डमरू ज्ञान का उद्गाता है। शिव का एक नाम त्रिलोचन भी है। शिवजी मृत्युन्जय हैं। इनकी पूजा मृत्यु और काल को पराजित करती है। अयोध्या में सरयूतट पर नागेश्वरनाथ मंदिर सावन मास में भक्तों से परिपूर्ण रहता है। सोमवार के दिन शिव आराधना करने पर चंद्रमा से आने वाली तरंगें मन को शांत बनाती हैं। कांवड़ शिव पूजा का एक स्वरूप है। गंगा या पवित्र नदियों सरयू आदि से जल भरकर शिव पर अभिषेक करने से परात्पर शिव के साथ विहार होता है। कांवड़ से ज्ञान की उच्चता का प्रतिपादन होता है।

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पिता एक गहरी शख्सियत।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पिता एक गहरी शख्सियत। ♦

पिता पर क्या-क्या आज लिख डालूँ।
उसके गहरे जज़्बातों को तो संभालू॥

ये वो वटवृक्ष का होता वो तना।
जो हर समस्या में छत्रछाया बना॥

नही दर्शा पाते इसके त्याग की मिसाल।
बच्चों के सुख-चैन के लिए न देखे खुद का हाल॥

क्या हुआ जो ये अपने भाव दिखाता नहीं।
मौन रह अपने आँसुओं को पी जाता यही॥

इसके पास बैठ इसके दिल की भी सुनो।
इसके संग भी खुलकर हँसने को चुनो॥

देखो बालों की सुनहरी सफेदी एक बार।
तुम्हारे अरमान पूरा करने में दिखाए प्यार॥

तुम्हारी एक मुस्कराहट पर जिसने की थकान दूर।
उसके चेहरे पर हँसी का कारण बनना जरूर॥

शख्सियत है ऐसी जिसके स्नेह से परिवार पले।
खुलकर जीये तुम इसके आसमाँ से हाथों तले॥

वाह रे पिता! तेरे लिए प्रभु के आगे हाथ जोड़ूँ।
मुझें सामर्थ्य दे हर जज्बात को हँसी की ओर मोडूँ॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — पापा का प्यार निराला है, पापा के साथ रिश्ता न्यारा है, इस रिश्ते जैसा कोई और नहीं यही रिश्ता दुनिया में सबसे प्यारा है। मेरे होठों की हँसी मेरे पापा की बदौलत है, मेरी आँखों में खुशी मेरे पापा की बदौलत है, पापा किसी भगवान से कम नही क्योकि मेरी ज़िन्दगी की सारी खुशी पापा की बदौलत है। ये बाप तुझे अपना सब कुछ दे जाएगा, और तेरे कंधे पर दुनिया से चला जाएगा। पिता हैं तो हमेशा बच्चो का दिल शेर होता हैं। वो इस छोटी सी दुनिया में मेरा अनंत संसार है। एक पापा की बदौलत ही मेरा जीवन खुबसूरत बन पाया।

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यह कविता (पिता एक गहरी शख्सियत।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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एक दूजे के संग।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ एक दूजे के संग। ♦

तेरे बिना हम नहीं रह पाएंगे।
तेरे न रहने का दर्द किसे सुनाएंगे॥

तेरे बिना ये जिंदगी है मुहाल।
तेरी जुदाई से होता बुरा हाल॥

साँसों की मध्यम हुई रफ्तार।
तेरे बिन जीवन हुआ बेकार॥

तुम तो जान हो जहान हमारा।
हमारे लिए तू स्वयं से प्यारा॥

अब नींद नहीं आती चैन की।
शांति खो गयी दिन-रैन की॥

जो जीव-जगत को खुशहाल बनाती।
बिन इनके सूनी ये जीवन-बाती॥

ये पेड़ ही तो हमारे जीवन-दाता।
जिनके बिन कुछ नही भाता॥

चाहना है इसको जान से ज्यादा।
नहीं तो जीवन हो जाएगा आधा॥

हमारी जिंदगी की बनती ढाल।
वृक्ष संग प्रकृति की बजती ताल॥

जहाँ जगह मिले वही पेड़ है उगाने।
हरे-भरे पौधों के जीवन भी बचाने॥

वृक्ष ही बनते जीवन का सूत्रधार।
जश्न जीत की होती जीवन में भरमार॥

बिना तुम्हारे ये जीवन जीना दुश्वार।
मानव-जीवन को इनसे करना प्यार॥

हर वर्ष इन वृक्षों की तादाद बढ़ाएंगे।
प्रकृति संग अति सुंदर जीवन पाएंगे॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जैसे हम खाने के बिना नहीं रह सकते। वैसे ही पेड़-पौधे के बिना भी हमारा जीवन अधूरा है। जैसे हमें जीवित रहने के लिए भोजन-पानी की आवश्यकता है वैसे ही प्रकृति को जिंदा रखने के लिए पेड़-पौधे, साफ-सफाई, प्रदूषण रहित धरा बनाने की आवश्यकता है। जलवायु प्रदूषण को रोकना होगा और वृक्षों की कटाई रोकनी होगी। कटाई की जगह वृक्षों को लगाना होगा जिससे कि प्राकृतिक आपदा से हम बच सकें। पर्यावरण को बचाना, प्रकृति को बचाना हमारे हाथ में है। कब तक अपने ऐशो आराम के लिए यूँ ही पेड़ काटते रहोगे इंसान। अगर अब भी न सुधरे तुम तो पृथ्वी का वातावरण बिलकुल ही गर्म हो जाएगा, तुम्हारे जीने के लाले पड़ जायेंगे; फिर रोते रहना। प्रत्येक वर्ष बहुत सारे पेड़ आग लगने से जल जाते है, और इंसान कम थोड़े ही है ये भी अपने ऐशो आराम के लिए यूँ ही पेड़ काटते रहते है। अभी जब गर्मी पड़ रही है तो इन्हें पेड़ की कमी खल रही हैं। जब हरे भरे पेड़ और पौधे होते है तो कितना खूबसूरत मौसम व वातावरण होता है, सभी ऋतुएँ अपने चक्र के अनुसार चलती है, और सभी फसल समय पर होते हैं। अब भी समय हैं सुधर जा तू इंसान। आओ हमसब मिलकर ये संकल्प ले की प्रत्येक वर्ष दो पेड़ जरूर लगाएंगे, और उनका अच्छे से देख रेख करेंगे तब तक; जब तक वो पेड़ अपना खुराक खुद न लेने लगे पृथ्वी से।

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परिवर्तन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ परिवर्तन। ♦

संसार में बच्चों से लेकर बूढों तक सब बदलाव चाहे।
परिवर्तन प्रकृति का मूल जो जीव-जगत सबको भाये॥

एक ही कार्य करते रहने से नीरसता आती।
मन चंचल है इसको सरसता ही भाती॥

तभी हमारी संस्कृति भी विविधता लिए होती।
मौसम परिवर्तन में त्यौहारों की रंगत होती॥

पतझड़ के बाद का बसंत जीवन-राग सुनाए।
बेजान हुई प्रकृति को वो सजीव कर जाए॥

अब तो कोयल ने भी ये परिवर्तन सहर्ष लिया अपना।
कोयल को अब आम का बाग दिखता एक सपना॥

किसी भी पेड़ की टहनी पर कोयल बैठकर कुहू-कुहू गाये।
लगने लगा उसको ऐसा कि हर पेड़ ही संग गुनगुनाये॥

गर्मी की रुत में रेत भरा आँधी-तूफान सबको डराए।
फिर तेज बारिश की बौछारें दिल हर्षित कर जाए॥

समय-परिवर्तन के संग खेतों में अलग-अलग फसल लहलहाए।
ये परिवर्तन ही इंसान को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता जाए॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — परिवर्तन प्रकृति का नियम है। जो परिवर्तन को और अनित्यता को समझता है, वस्तुत: वही ज्ञानी है। जीव, जगत और ब्रह्म को सही तरीके से परिभाषित करने की क्षमता भी ज्ञानी-ध्यानी, ऋषि-मुनियों में ही होती है। इस संसार में कुछ भी अपरिवर्तनशील नहीं है। जीव जंतुओं से लेकर मानव जाति तक सभी का परिवर्तन होता रहता है।

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