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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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सुशीला देवी

एक दूजे के संग।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ एक दूजे के संग। ♦

तेरे बिना हम नहीं रह पाएंगे।
तेरे न रहने का दर्द किसे सुनाएंगे॥

तेरे बिना ये जिंदगी है मुहाल।
तेरी जुदाई से होता बुरा हाल॥

साँसों की मध्यम हुई रफ्तार।
तेरे बिन जीवन हुआ बेकार॥

तुम तो जान हो जहान हमारा।
हमारे लिए तू स्वयं से प्यारा॥

अब नींद नहीं आती चैन की।
शांति खो गयी दिन-रैन की॥

जो जीव-जगत को खुशहाल बनाती।
बिन इनके सूनी ये जीवन-बाती॥

ये पेड़ ही तो हमारे जीवन-दाता।
जिनके बिन कुछ नही भाता॥

चाहना है इसको जान से ज्यादा।
नहीं तो जीवन हो जाएगा आधा॥

हमारी जिंदगी की बनती ढाल।
वृक्ष संग प्रकृति की बजती ताल॥

जहाँ जगह मिले वही पेड़ है उगाने।
हरे-भरे पौधों के जीवन भी बचाने॥

वृक्ष ही बनते जीवन का सूत्रधार।
जश्न जीत की होती जीवन में भरमार॥

बिना तुम्हारे ये जीवन जीना दुश्वार।
मानव-जीवन को इनसे करना प्यार॥

हर वर्ष इन वृक्षों की तादाद बढ़ाएंगे।
प्रकृति संग अति सुंदर जीवन पाएंगे॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जैसे हम खाने के बिना नहीं रह सकते। वैसे ही पेड़-पौधे के बिना भी हमारा जीवन अधूरा है। जैसे हमें जीवित रहने के लिए भोजन-पानी की आवश्यकता है वैसे ही प्रकृति को जिंदा रखने के लिए पेड़-पौधे, साफ-सफाई, प्रदूषण रहित धरा बनाने की आवश्यकता है। जलवायु प्रदूषण को रोकना होगा और वृक्षों की कटाई रोकनी होगी। कटाई की जगह वृक्षों को लगाना होगा जिससे कि प्राकृतिक आपदा से हम बच सकें। पर्यावरण को बचाना, प्रकृति को बचाना हमारे हाथ में है। कब तक अपने ऐशो आराम के लिए यूँ ही पेड़ काटते रहोगे इंसान। अगर अब भी न सुधरे तुम तो पृथ्वी का वातावरण बिलकुल ही गर्म हो जाएगा, तुम्हारे जीने के लाले पड़ जायेंगे; फिर रोते रहना। प्रत्येक वर्ष बहुत सारे पेड़ आग लगने से जल जाते है, और इंसान कम थोड़े ही है ये भी अपने ऐशो आराम के लिए यूँ ही पेड़ काटते रहते है। अभी जब गर्मी पड़ रही है तो इन्हें पेड़ की कमी खल रही हैं। जब हरे भरे पेड़ और पौधे होते है तो कितना खूबसूरत मौसम व वातावरण होता है, सभी ऋतुएँ अपने चक्र के अनुसार चलती है, और सभी फसल समय पर होते हैं। अब भी समय हैं सुधर जा तू इंसान। आओ हमसब मिलकर ये संकल्प ले की प्रत्येक वर्ष दो पेड़ जरूर लगाएंगे, और उनका अच्छे से देख रेख करेंगे तब तक; जब तक वो पेड़ अपना खुराक खुद न लेने लगे पृथ्वी से।

—————

यह कविता (एक दूजे के संग।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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हाय — वो मंजर।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हाय — वो मंजर। ♦

पक्की सड़क के दोनों तरफ वो लहलहाते हरे-भरे खेत।
बीच-बीच में कहीं ईंटे बिछी तो कहीं उड़ती रेत॥

आँखें आनंद से देख रही थी प्रकृति का सुंदर नजारा।
वो लहलहाती फसल वो खुशी से झूमता पेड़ प्यारा॥

खेतों की मेड़ के छोटे-बड़े पेड़ सभी मदमस्त हो मस्ता रहे।
पर वो दो पेड़ कुछ विचित्र ही कहानी दर्शा रहें थे॥

पर एक जगह का दृश्य देख आँखों में आँसू आए।
दिल को झकझोर देने वाला क्यूँ मानवता खो जाए॥

दिखाते है तुम सबको वो चित्रण जिसे देख ऐसा हुआ आभास।
खेत की आग ने हरे-भरे पेड़ो की छीन ली थी जीने की आस॥

पेड़ की विशाल शाखाएँ हरी पर उसका तना बुरी तरह गया जल।
ऐसे लगे जैसे पूछ रही उसकी टहनियां क्या ये मंजर नही जाता टल॥

मानों वो पेड़ कह रहा कि सुनो कभी मेरे दिल की करुण पुकार।
तुम्हें जीवन देने वाले तुम्हीं से लगाये एक रूदन भरी गुहार॥

रोपण ही काफी नही हमें बचाने के लिए कोई तो उठाओ कदम।
जीवनदान देने वालों की ही आज स्वार्थ ने कर दी आँखें इतनी नम॥

मन में उठे सवाल पूछें क्यूँ हमारे काम मानवता को करते शर्मसार।
आधुनिकता के नाम पर हर वर्ष लाखों पेड़ चढ़ते बलि बारम्बार॥

सुंदर जीवन के लिए खूब पेड़ लगाओ पर इनकी सुरक्षा में न पीछे रहो।
जिसके लिए ह्रदय तड़पे उस बात को सबसे बेबाक होकर कहो॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कब तक अपने ऐशो आराम के लिए यूँ ही पेड़ काटते रहोगे इंसान। अगर अब भी न सुधरे तुम तो पृथ्वी का वातावरण बिलकुल ही गर्म हो जाएगा, तुम्हारे जीने के लाले पड़ जायेंगे; फिर रोते रहना। प्रत्येक वर्ष बहुत सारे पेड़ आग लगने से जल जाते है, और इंसान कम थोड़े ही है ये भी अपने ऐशो आराम के लिए यूँ ही पेड़ काटते रहते है। अभी जब गर्मी पड़ रही है तो इन्हें पेड़ की कमी खल रही हैं। जब हरे भरे पेड़ और पौधे होते है तो कितना खूबसूरत मौसम व वातावरण होता है, सभी ऋतुएँ अपने चक्र के अनुसार चलती है, और सभी फसल समय पर होते हैं। अब भी समय हैं सुधर जा तू इंसान। आओ हमसब मिलकर ये संकल्प ले की प्रत्येक वर्ष दो पेड़ जरूर लगाएंगे, और उनका अच्छे से देख रेख करेंगे तब तक; जब तक वो पेड़ अपना खुराक खुद न लेने लगे पृथ्वी से।

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यह कविता (हाय — वो मंजर।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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परिवर्तन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ परिवर्तन। ♦

संसार में बच्चों से लेकर बूढों तक सब बदलाव चाहे।
परिवर्तन प्रकृति का मूल जो जीव-जगत सबको भाये॥

एक ही कार्य करते रहने से नीरसता आती।
मन चंचल है इसको सरसता ही भाती॥

तभी हमारी संस्कृति भी विविधता लिए होती।
मौसम परिवर्तन में त्यौहारों की रंगत होती॥

पतझड़ के बाद का बसंत जीवन-राग सुनाए।
बेजान हुई प्रकृति को वो सजीव कर जाए॥

अब तो कोयल ने भी ये परिवर्तन सहर्ष लिया अपना।
कोयल को अब आम का बाग दिखता एक सपना॥

किसी भी पेड़ की टहनी पर कोयल बैठकर कुहू-कुहू गाये।
लगने लगा उसको ऐसा कि हर पेड़ ही संग गुनगुनाये॥

गर्मी की रुत में रेत भरा आँधी-तूफान सबको डराए।
फिर तेज बारिश की बौछारें दिल हर्षित कर जाए॥

समय-परिवर्तन के संग खेतों में अलग-अलग फसल लहलहाए।
ये परिवर्तन ही इंसान को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता जाए॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — परिवर्तन प्रकृति का नियम है। जो परिवर्तन को और अनित्यता को समझता है, वस्तुत: वही ज्ञानी है। जीव, जगत और ब्रह्म को सही तरीके से परिभाषित करने की क्षमता भी ज्ञानी-ध्यानी, ऋषि-मुनियों में ही होती है। इस संसार में कुछ भी अपरिवर्तनशील नहीं है। जीव जंतुओं से लेकर मानव जाति तक सभी का परिवर्तन होता रहता है।

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यह कविता (परिवर्तन।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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मेरे जज्बात।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मेरे जज्बात। ♦

जो किसी की उन्नति में रुकावट लाये।
उस राह पर न कभी चले॥

वो लफ्ज़ न निकले जुबां से।
जो किसी को भी खले॥

ए दिल!
ले चल उस जगह मुझें तू।
जहाँ बस खुशियाँ ही पलें॥

जहाँ मेरी मेहनत के आगे।
मेरा हर गम स्वतः ही पिघले॥

मेरे हुनर उस ऊँचाई पर ले चल।
रहना नही मायूसियों के अम्बर तले॥

दिल को न रख कभी मासूम इतना।
कि हर कोई इसको ही छलें॥

ए दिल!
उस जहां में आ चलते हैं।
तेरी मुस्कान ही फूले-फले॥

तेरी मेहनत के आगे बस।
रोशनी के दीये ही जले॥

तेरे बेख़ौफ हौसलों के सामने।
हर चिंता स्वयं ही टले॥

जज्बा रख अपने कर्म का इतना।
चंचल मन व्यथित करे भले॥

तेरे सपनों की उड़ान दूर तलक जाए।
सफलता के गगन तले॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हर इंसान के कर्म ऐसे होने चाहिए की उसके कर्म की वजह से कभी भी किसी को कोई परेशानी न हो, किसी को कोई दुख ना पहुंचे। जहां तक हो सके तो हर किसी का भला ही करे, अगर किसी का भला ना कर सके तो बुरा बिलकुल भी ना करे। एक बात याद रखे — “Karma Always Return”, जैसा करेंगे वैसा ही आपको वापस मिलेगा। इसलिए सदैव ही अच्छा कर्म करे, सबका भला करते चले।

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यह कविता (मेरे जज्बात।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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उसका आशियाना।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ उसका आशियाना। ♦

आज उसके जमीन पर पांव नही वो खुशी से बहक रही थी।
अपने बच्चों की आवाज़ से खुशबू जैसी महक रही थी॥

खुश भी क्यों न हो कुछ समय पहले मातृत्व का सुख उसने पाया।
उसको लगे ऐसे जैसे सारा संसार उसका हो आया॥

सारा दिन दोनो अपने बच्चों का पेट भरने के लिए भटकते।
दिन भर मेहनत की चक्की में वो पिसते॥

तब कही जाकर वो अपने नन्हें – मुन्नों का पेट भरते।
फिर मुँह में निवाला दे अपने बच्चों के संग प्रेम करते॥

पर ये सच ही कहा गया है कि …..

इस जमाने से दूसरों की खुशियाँ बर्दाश्त नही होती।
फूलों को कुचल कर क्यूँ राह में शूल बोती॥

एक दिन किसी जालिम ने अपने लिए उनका घर उजाड़ा था।
बेघर किया उनको उन नन्हें मासूमों ने किसका क्या बिगाड़ा था॥

जिन बच्चों का पेट भरने के लिए सामान वो लाये थे।
वो तो अब इस दुनिया को छोड़ कर हो गए पराये थे॥

उनके बड़े होने पर न जाने कितने अरमान सजाये थे।
पर उन्हीं आँखों में अथाह सागर जितने आँसू भर आये थे॥

चीत्कार कर उठा ह्रदय देख कर दृश्य ऐसा।
मातम फैल गया था उनके परिवार में एक ऐसा॥

अब वो फिर गिनती में चार से हो गए दो।
आँसू भी सूख गए थक गए उनके नैन रो॥

एक शून्य भाव से दोनों ही एक दूसरे को धीरज बंधा रहे थे।
फिर ऐसा लगे जैसे आसमान फिर पानी लेने जा रहे थे॥

उस घोसलें के तिनके उनके बच्चों की तरह ही इधर – उधर बिखरे थे।
पेड़ की सभी टहनियां और पत्ते अपनी बदहाली की कहानी कह रहे थे॥

क्योंकि किसी ने पेड़ों की कटाई कर बनाना अपना आशियाना।
पर पूछे उनसे क्यूँ – उजाड़ दिया तुमने हमारा घराना॥

तुम ही हमें बताओं कि हम परिन्दें कहाँ पर जाए।
अपना दुखड़ा हम किसको जाकर इस कदर सुनाए॥

हमने कब रोका तुम्हें, तुम अपना घर शौक से बनाओ।
पर हम बेजुबान के, आशियाने कहीं पर तो दे जाओ॥

हमारी इस दुखभरी पीड़ा को समझ लेना तुम सब।
हमारा सुंदर कलरव होगा तभी तुम्हारे बच्चों की खुशियाँ होगी सब॥

आओं हम इंसान समझे इन बेजुबान पक्षियों की पीड़ को।
जहाँ कहीं पर जगह मिले बनाये इनके नीड़ को॥

एक प्रेम अपने ह्रदय में इन परिंदों के प्रति भी जगाये।
दाना, पानी, घोंसला देकर इन्हें भी जीवन-दान दे पाए॥

अधिक से अधिक पौधों को इस धरा के गर्भ में रोप दे।
बचाये इस प्रकृति की सुंदरता को प्राकृतिक आपदाओं के प्रकोप से॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इंसान आधुनिकता और अपने ऐशो आराम के लिए इस कदर अंधा हो गया की उसने पक्षियों के लिए उनका आशियाना पेड़ तक को नहीं छोड़ा। अपने ऐशो आराम के लिए पक्षियों का घर उजाड़ता गया, एक बार भी उसने नहीं सोचा की इन बेजुबानों का भी इस प्रकृति व पृथ्वी पर पूरा हक़ हैं । ये प्रकृति व पृथ्वी केवल इंसानो का नहीं है, इन पक्षियों का भी हैं। अब भी समय हैं संभल जाओ और जितना ज्यादा हो सके प्रत्येक वर्ष पेड़ लगावो और उस पेड़ की तब तक देखभाल करो जब तक वह पेड़ अपना ख़ुराक पृथ्वी से खुद न लेने लगे। जब पेड़ होंगे तब पक्षियों उनका आशियाना मिल सकेगा और वो अपना घोसला बना सकेंगे पुनः, तब कही जाकर इन पक्षियों के मधुर आवाज फिर से सुनाने को मिलेंगे हम सभी को। आवो हम सब मिलकर ये संकल्प ले कि प्रत्येक वर्ष जरूर पेड़ लगाएंगे।

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यह कविता (उसका आशियाना।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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लो जी अब तपतपाती गर्मी आ गई।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ लो जी अब तपतपाती गर्मी आ गई। ♦

लो जी अब तपतपाती गर्मी आ गई।

बाजारों में कोल्ड ड्रिंक्स की हुई भरमार।
विज्ञापनों में भी दिखें बस इनसे ही प्यार॥

लो जी अब तपतपाती गर्मी आ गई।

बाजारों में देसी शीतल पेय दिखता नहीं।
क्योंकि वो अब धड़ल्ले से बिकता नहीं॥

लो जी अब तपतपाती गर्मी आ गई।

ठंडे विदेशी पेय की बाजारों में धूम मची।
जगह-जगह बोतलों की दुकान सजी है॥

लो जी अब तपतपाती गर्मी आ गई।

क्यों अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रहें?
क्यों हमें बोतल बंद शीतल पेय से प्यार रहें?

लो जी अब तपतपाती गर्मी आ गई।

आओं कुछ स्वदेशी ठंडक वाला पीते है।
गन्ने का जूस पीकर पहले की जिंदगी जीते है॥

लो जी अब तपतपाती गर्मी आ गई।

ठंडे पेय के असली देसी गुणों पर आए।
क्यों बाहरी चमक पर हम जी ललचाये?

लो जी अब तपतपाती गर्मी आ गई।

होता गुणों का भंडार मटके का ठंडा पानी।
सुनी है इसकी कहानी बड़ों की जुबानी॥

लो जी अब तपतपाती गर्मी आ गई।

चलों गर्मी में जल – जीरे का स्वाद भी चखते है।
धूप में सुबह से खड़े उस रेहड़ी का मान रखते है॥

लो जी अब तपतपाती गर्मी आ गई।

नींबू वाले मटके के पेय का स्वाद कुछ निराला है।
बाजार का मसाले वाला सलाद भी मतवाला है॥

लो जी अब तपतपाती गर्मी आ गई।

स्वदेशी पेय की महक भी दिल पर छा गयी।
इनके आगे तो सब कोल्ड ड्रिंक्स शरमा गयी॥

लो जी अब तपतपाती गर्मी आ गई।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — नींबू पानी और काले नमक का कॉम्बिनेशन पाचन से जुड़ी समस्याओं को दूर करता है। इसका सेवन करने से अपच की समस्या नहीं होती है। नींबू पानी के साथ काले नमक का सेवन करने से एसिडिटी, स्किन रोग और अर्थराइटिस की समस्या नहीं होती है। काला नमक भोजन से अधिक मात्रा में पोषक तत्वों को अवशोषित करता है। गन्ने में कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन, फास्फोरस और पोटेशियम जैसे पोषक तत्व होते हैं, ऐसे में ये हमारी इम्यूनिटी को भी मजबूत करता है। गन्ने में अल्कलाइन की अच्छी खासी मात्रा होने की वजह से यह शरीर को कैंसर जैसी घातक बीमारी से भी बचाता है। गन्ने का जूस पीने से स्तन, पेट और फेफड़ों के कैंसर का खतरा कम हो सकता है।

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यह कविता (लो जी अब तपतपाती गर्मी आ गई।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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बाबा साहेब को नमन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बाबा साहेब को नमन। ♦

बाबा साहेब को नमन जो सविंधान निर्माता कहलाये।
अप्रैल 14 को भारत रत्न भीमराव की अम्बेडकर जयंती मनाये॥

एक ऐसे समाज में कोहिनूर हीरा चमका।
जिसके तेज से फिर पूरा देश ही दमका॥

शिक्षा की एक सच्ची राह दिखाई जिसने।
सबमें मानव-धर्म की अलख जगाई उसने॥

दिव्य आकाश का जो चमकता सितारा बना।
बस ऐसा ही डॉ भीमराव शिक्षा का प्यारा बना॥

जिन्होंने अपने ह्रदय में केवल एक ही बात ठानी।
शिक्षा को सर्वोपरि मान सुप्त जन-चेतना जगानी॥

उम्रभर किताबों को ही रखा सच्चा दोस्त बनाये।
दिखा दिया दुनिया को शिक्षा में ही सर्वगुण समाये॥

शिक्षा-ज्ञान ही मानवता के सब गुण भर जाए।
भेदभाव के अवगुण का तिमिर हर ले जाये॥

धन्य थे इनके मात-पिता जो शिक्षा को माने वरदान।
सिखलाया जिन्होंने पढ़-लिख कर बनो देश की शान॥

शिक्षित बन संगठित रहकर करो संघर्ष यही उनका प्रिय ये नारा।
शिक्षा से ही देश-विदेश में पूजनीय भीमराव प्यारा॥

शिक्षा के इस आलौकिक मन्त्र से अपने दिलों को जगमगाये।
कोटिशः वन्दन से श्रद्धा-पुष्प अर्पित कर आज ये दिवस मनाये॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — भीमराव रामजी आम्बेडकर (14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956), डॉ॰ बाबासाहब आम्बेडकर नाम से लोकप्रिय, भारतीय बहुज्ञ, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, और समाजसुधारक थे। उन्होंने दलित बौद्ध आन्दोलन को प्रेरित किया और अछूतों (दलितों) से सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया था। श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन भी किया था। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि एवं न्याय मन्त्री, भारतीय संविधान के जनक एवं भारत गणराज्य के निर्माताओं में से एक थे। बाबासाहब आम्बेडकर जी ने शिक्षा को ही सदैव सर्वोपरि माना और शिक्षा के दम पर सब कुछ करके दिखाया।

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मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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नवरात्रि की पावन बेला आई।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नवरात्रि की पावन बेला आई। ♦

बधाई हो! बधाई हो!

मंगल गीत गाओं, शुभ मंगल घड़ी आई।
सुख बरसाने नवरात्रि की पावन बेला आई॥

भक्तों, चैत्र माह में प्रतिपदा से सब माँ की पावन जोत जगा लो।
जगजननी माँ से फिर तुम मुहमांगी मुरादें पा लो॥

खूब तेरे नाम की मस्ती में हम झूमेंगे।
तेरी पावन चरण-रज को ही हम चूमेंगे॥

माँ, तेरा ये पावन पर्व सबकी झोली भर जायेगा।
इस जग के सारे संकटों को हर जायेगा॥

माँ, बस तेरे ही नाम की प्रेम – धुन हमें लगी रहें।
दिन – रात भक्तों के दिल में ये नवरात्रि सजी रहें॥

माँ तेरे सच्चे दरबार से सबकों हार्दिक बधाई।
तेरे आगमन से ही नववर्ष की बेला आई॥

कुमकुम के पगों से, हर भक्त के घर तू आएगी।
आओ माँ, तेरे आगमन का हर शह मंगल – गीत गायेगी॥

मंगल – गान से अम्बे माँ तेरा आगमन होगा।
तेरे वरहस्त से जीवन का सुंदर चमन होगा॥

माँ, तेरे जैसा अनुपम, अद्वितीय सौंदर्य और कहाँ।
तेरे रूप की ज्योति से होता है रोशन ये जहां॥

हे अष्ट भुजा दात्री, तेरी अनेक कलाएं इन हस्तों में रची।
तेरे हार श्रृंगार से ही ये दुनिया आज अनुपम सजी॥

तेरी लाल चुनरी लाल चोला सदैव ही करता कमाल दाती।
तू इस रूप में जब देने पर आती, दे जाती बेमिसाल तू दाती॥

सिंहासन पर विराजमान जो आज अनोखा रूप तेरा।
हे विश्व विनोदिनी माँ! सारा ब्रह्माण्ड झुकें तुझकों कोटिशः वन्दन मेरा॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — नवरात्र के प्रथम दिन छोटी देवकाली मंदिर में मां भगवती की आराधना और पूजन की जाती है। मां भगवती के आशीर्वाद से ही सभी मनोकामना पूर्ण होती है। पहले दिन छोटी देवकाली मंदिर में माता के शैलपुत्री स्वरूप का दर्शन किया जाता है। माता के 9 रूपों को देवताओं ने अपने-अपने शस्त्र देकर महिषासुर को वध करने का निवेदन किया। शस्त्र धारण करके माता शक्ति संपन्न हो गई। कहते हैं कि नौ रूपों को प्रकट करने का क्रम चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होकर नवमी तक चला। इसीलिए इन 9 दिनों को चैत्र नवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। हे विश्व विनोदिनी माँ! सारा ब्रह्माण्ड झुकें तुझकों कोटिशः वन्दन मेरा।

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यह कविता (नवरात्रि की पावन बेला आई।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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सबको बाँटो नववर्ष की बधाई।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सबको बाँटो नववर्ष की बधाई। ♦

आई जो नूतन वर्ष की ये पावन बेला।
समय बना जाए बस सबका अलबेला।
सबको बाँटो नववर्ष की बधाई॥

आज कितनी शुभघड़ी है ये आई।
सब ओर फैलेगी अब तो बस रोशनाई।
सबको बाँटो नववर्ष की बधाई॥

सतयुग में इसी दिन से सृष्टि का हुआ आगाज।
पावन ग्रंथ खोलते है इसका राज।
सबको बाँटो नववर्ष की बधाई॥

हिन्दू नववर्ष चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा को आये।
सनातन धर्म सदैव अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाये।
सबको बाँटो नववर्ष की बधाई॥

वैष्णों के आगमन पर नवरात्रि की धूम मचेगी।
धरा भी माँ से मिलने दुल्हन सी सजेगी।
सबको बाँटो नववर्ष की बधाई॥

सब नए बही-खातों का आज होगा शुभारम्भ।
विवाह, समारोह के दिनों का भी होगा आरंभ।
सबको बाँटो नववर्ष की बधाई॥

प्रकृति भी कहती रंगीन फूलों से भरकर हाथ अपने।
हे सर्वस्व तू पूरे करना इंसानों के सुंदर सपने।
सबको बाँटो नववर्ष की बधाई॥

हे सर्वशक्तिमान, तू ही सब जगह विध्यमान।
इस धरा को दे जाना खुशियों का वरदान।
सबको बाँटो नववर्ष की बधाई॥

अपनी भारतीय संस्कृति में लीन होकर गुनगुनाये।
नवपीढ़ी को इस नूतन वर्ष का गुण बताये।
सबको बाँटो नववर्ष की बधाई॥

हे मेरे आराध्य!
सुन लेना अबकी बार भी ये करुण पुकार।
बरसा देना बस अपनी ममता का प्यार।
सबको बाँटो नववर्ष की बधाई॥

नववर्ष में बरसे तेरी कृपा का इतना नूर।
अन्न, धन, जल के भंडार करना भरपूर।
सबको बाँटो नववर्ष की बधाई॥

घर मे पाँच घी के दिये जलाकर तेरा स्वागत करेगें हम।
नववर्ष तू खुशियाँ बरसाते आना छम-छम।
सबको बाँटो नववर्ष की बधाई॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — Hindu Calendar Vikram Samvat 2079, 2 अप्रैल, शनिवार से चैत्र नवरात्रि शुरू होने जा रहे हैं और इसी के साथ नया हिंदू वर्ष नवसंवत्सर 2079 भी आरंभ हो जाएगा। हर वर्ष चैत्र प्रतिपदा शुक्ल पक्ष को हिंदू नववर्ष प्रारंभ होता है। चैत्र का महीना हिंदू नववर्ष का पहला महीना होता है। इसका प्रारंभ सम्राट विक्रमादित्य ने किया था, जो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरु होता है। इस बार 02 अप्रैल को हिंदू नववर्ष 2079 या विक्रम संवत 2079 का प्रारंभ होगा। हिंदू नववर्ष को विक्रम संवत, नव संवत्सर, गुड़ी पड़वा, उगाड़ी आदि नामों से भी जाना जाता है। विक्रम संवत के प्रथम दिन से ही बसंत नवरात्रि का प्रारंभ होता है, जो चैत्र नवरात्रि के नाम से लो​कप्रिय है।

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यह कविता (सबको बाँटो नववर्ष की बधाई।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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हर्षाती कविता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हर्षाती कविता। ♦

विश्व कविता दिवस पर।

कविता तो होता जीवन का एक प्रवाह है।
होता जिसमें हर भाव ही बस वाह है॥

कविता दिल की एक सच्ची अनुभूति है।
कवि के हृदय से निकली हुई कृति है॥

न तो होती उसमें कोई भी बनावट है।
होती बस दिल के उदगारों की सजावट है॥

केवल शब्दों को लयबद्ध करना ही नही काफी है।
सार्थक अर्थ के बिना तो शब्दों के संग नाइंसाफी है॥

गहरे अर्थ लिए हुए शब्दों का इक आईना है।
जिसमें अति सुंदर होता हर शब्द का मायना है॥

प्रेम का गहरा समुद्र है, दरिया इश्क का भी।
करुणा, जज्बात का अहसास, मरहम होता अश्क का भी॥

इंसान जब इसमें खो जाए हर शह में ही कविता गुनगुनाए।
फिर जज्बातों की कलम से ह्रदय पर भाव अंकित करता जाए॥

थाम कर कलम अपने लफ्ज़ो में किसी बात को कहना चाहे।
सच मानो दोस्तों स्वतः ही तैयार हो जाये लेखन की राहें॥

फिर हर किसी का दुख, सुख अपना लगता है।
लेखन उस मुकाम पर पहुँचा दे जो सपना लगता है॥

सभी कवियों के ह्रदय का करते हैं हम अभिनन्दन।
चेहरों पर खुशी लाने वाली हर कलम को मेरा वन्दन॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता दिल की एक सच्ची अनुभूति है, जो एक कवि के हृदय की गहराई से निकली हुई कृति है। भाव स्वरूप कविता तो होता है जीवन का एक प्रवाह, जो सदैव ही प्रेरित करता है कार्यशील होने के लिए। हृदय की गहराई से निकली हुई कृति में न तो होती उसमें कोई भी बनावट, होती बस दिल के उदगारों की सजावट है। याद रखें – केवल शब्दों को लयबद्ध करना ही नही काफी होता है, सार्थक अर्थ के बिना तो शब्दों के संग नाइंसाफी होता है। गहरे अर्थ लिए हुए शब्दों का इक आईना होती है कविता, जिसमें अति सुंदर भाव के साथ-साथ होता हर शब्द का मायना है। ये कविता प्रेम का गहरा समुद्र है, दरिया इश्क का भी, जिसमें करुणा, जज्बात का अहसास, मरहम होता अश्क का भी। कहते है इंसान जब भी इसमें खो जाए तो हर शह में ही कविता गुनगुनाए, फिर जज्बातों की कलम से सदैव ही ह्रदय पर भाव अंकित करता जाए।

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यह कविता (हर्षाती कविता। – विश्व कविता दिवस पर।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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