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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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hemraj thakur

दो बातें।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दो बातें। ♦

आंखे प्यासी है आज भी प्रिये,
तेरे उस सादे सहज दीदार की।
जमाना बीत गया है किए हुए,
दो बातें तुमसे शालीन प्यार की।

किससे कहूं और क्या कहूं, कि सब कुछ?
नहीं होता है प्यार में किसी को पा जाना?
प्रेम अन्त है, वासनाएं अतृप्त है, चाहत है,
नाम बस एक दूसरे की याद में खो जाना।

जाती हैं दूर तलक वो यादें और वादे,
मुश्किल होता है जिन्हे करके निभाना।
छुप – छुप कर मिलना और फिर बिछुड़ना,
सदियों से प्यार का दुश्मन रहा है जमाना।

वे अन्दर ही अन्दर कई बातों को छुपाना,
बड़ा मुश्किल होता था उन्हे जुबां पर लाना।
वे आंखों ही आंखों की बेबाक सी बातें,
मुश्किल होता था जिन्हे इशारों में समझना।

आज भी हसरत है सीने में, है वही मुहब्बत,
मुश्किल होता है इश्क मुश्क को दफनाना।
जाने क्या रखा है लिव इन रिलेशनशिप में?
क्यों नहीं समझाता है आज इन्हे यह जमाना?

हमने किया नहीं इजहार – ए – इश्क कभी भी था,
रह गया होकर भी प्यार भीतर ही भीतर बेगाना।
तुम हो गए थे उनके पल भर में देखते ही देखते,
हमने सहर्ष देखा था सब, तनिक भी बुरा न माना।

होता कुछ इस कदर का नई पीढ़ी के साथ तो शायद,
खैर ! छोड़िए, सब्र करें, हो गया प्रेम प्रलाप है बहुतेरा,
हो न सका किस्मत से गर दैहिक मिलन तो क्या हुआ?
बस होता रहे रूहों से रूहों का मिलन यूं ही तेरा मेरा।

जालिम जमाने की भीड़ में मुश्किल है जी ढूंढ पाना,
एक दूसरे को, यहां छाया है जी बस अंधेरा ही अंधेरा।
यहां होती नहीं है कभी भी सुबह रात गुजर जाने पर,
यहां का दस्तूर है कि जब जाग जाए तो समझो सवेरा।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

Must Read : क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है?

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सच्चा प्रेम क्या है? क्या जिस्मानी भूख ही सच्चा प्रेम है? सच्चा प्रेम – सच्चे प्रेम में जिस्म की भूख नहीं होती है। सच्चे प्रेम में दो दिलों का आत्मिक प्रेम होता है यह प्रेम ज़िस्म के प्रेम से बिलकुल ही अलग होता है। जहां पर जिस्मानी भूख हो वह प्रेम कभी भी नहीं हो सकता, उसे प्रेम की संज्ञा नहीं दे सकते। क्योंकि हमारी सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था इतनी मजबूत और पवित्र है कि उसमें दम्पति से ले कर बच्चे और बूढ़े तक सुरक्षित है। यदि लिव इन रिलेशनशिप का कानून भारत में स्थान प्राप्त करता है तो भारतीय समाज हवस का शिकार हो जाएगा। न ही तो रिश्तों नातों की अहमियत रहेगी और न ही नारी जाति का सम्मान रहेगा।भविष्य की नई पीढ़ी और वृद्ध लोग असहज और असुरक्षित होंगे। आखिर क्या जरूरत है बिना शादी के लड़का – लड़की को सांसारिक व्यवहार में रहने की? हमारी भारतीय संस्कृति की व्यवस्था के मुताबिक 25 वर्ष तक का समय पढ़ने – लिखने का है और उस बीच दो लड़का – लड़की में प्रेम भी हो जाता है तो कोई गुनाह नहीं है। शर्त यह है कि वह प्रेमी जोड़ा विवाह पूर्व शारीरिक संबंध स्थापित न करें। हमारी संस्कृति के नौजवान अधिकांश भले ही सामाजिक लाज लपेट के चलते ही सही; इस नियम का पालन भी करते आए हैं। उसके पश्चात विवाह घर वालों की सहमति से करते हैं और सांसारिक जीवन का आनंद लेते हैं।

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यह कविता (दो बातें।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है? ♦

समाज की युवा पीढ़ी यह जरूर पढ़े: —

प्रिय मित्रो हिंदुस्तान के माथे पर आज एक और कलंक आफताब और श्रद्धा की लिव इन रिलेशनशिप की कहानी के दर्दनाक अन्त से लगा है। साथियों आज के इस अंध आधुनिकता के दौर में हमारी युवा पीढ़ी पश्चिम की अति स्वतंत्रय प्रिय सभ्यता को अपनाने में उतारू है और उसी पागलपन के नशे में हमारे बच्चे विपरीत लैंगिक होते हुए भी लीव इन रिलेशनशिप के नाम पर बिना विवाह किए ही पति – पत्नी की तरह इकट्ठा रहने लगे हैं। एक तो यह परम्परा भारतीय परिवारवाद और समाजवाद की दृष्टि में पहले ही भद्दा एवम भुंडा कर्म है। ऐसी वृति को हमारे यहां पशु वृति की संज्ञा शास्त्रों में दी गई है।

उसके बावजूद भी यदि पश्चिमी सभ्यता के अंधा अनुकरण में नई पीढ़ी इस व्यवस्था में दैहिक विपासा के कारण रहना ही चाहती है और यह पीढ़ी इस व्यवहार को कोई पाश्विकता नहीं मानती बल्कि पश्चिमी देशों के कानून की तर्ज पर इसे अपना कानूनी अधिकार समझती है तो इसमें समाज उनकी दुर्दशा के लिए कहां तक जिम्मेदार है? खैर यह घटना आज जिरह की नहीं है बल्कि दिल को दहला देने वाली है। इस पर हर किसी को आफताब की करतूत पर गुस्सा आ रहा है और आना भी चाहिए। यह श्रद्धा की विकट मौत का ही वाक्य नहीं है बल्कि हिंदुस्तान की हर जाति, धर्म और सम्प्रदाय की नौजवान बहु – बेटियों की सुरक्षा का सवाल है।

पर बड़े दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि आखिर क्या जरूरत है बिना शादी के लड़का – लड़की को सांसारिक व्यवहार में रहने की? हमारी भारतीय संस्कृति की व्यवस्था के मुताबिक 25 वर्ष तक का समय पढ़ने – लिखने का है और उस बीच दो लड़का – लड़की में प्रेम भी हो जाता है तो कोई गुनाह नहीं है। शर्त यह है कि वह प्रेमी जोड़ा विवाह पूर्व शारीरिक संबंध स्थापित न करें। हमारी संस्कृति के नौजवान अधिकांश भले ही सामाजिक लाज लपेट के चलते ही सही; इस नियम का पालन भी करते आए हैं। उसके पश्चात विवाह घर वालों की सहमति से करते हैं और सांसारिक जीवन का आनंद लेते हैं।

हमारी संस्कृति में बेटी जब एक बार ससुराल जाती थी तो उसे शिक्षा दी जाती थी कि कभी ससुराल को छोड़ कर वापिस पीहर मत आना। वह बेटी भी उसी शिक्षा का पालन करती थी। युग बदला परिस्थितियां बदली। अंग्रेज भारत में आए, उन्होंने भारतीय सामाजिक और वैवाहिक जीवन के ढर्रे को बदलने में अहम भूमिका निभाई। लोग दैहिक सुख को व्यक्तिक अधिकार समझने लगे। बड़े – बड़े घरानों के लोग इस बात को कोई बेगैरत नहीं बल्कि रईसी रसूख समझने लगे।

हमारी माताएं बहनें औरत/देवी से मैडम के पद पर पदच्युत हुई। उसी बीच बेदवा यानी डाइवर्स ने भी भारत में प्रवेश किया। हां तलाख तो मुगल काल में ही आ गया था पर भारत में डाइवर्स अंग्रेजों की देन हैं। क्योंकि यह पश्चिम की रीत थी। “वहां अत्यधिक स्वातंत्र्य के चलते शादी ज्यादा दिनों तक टिकती ही नहीं थी। यदि किसी की साल भर टिक गई तो सालगिरह मनाई जाती थी और 25 साल टिकी तो सिलवर जुबली मनाई जाती थी। यूं ही गोल्डन जुबली आदि। पर यह मौका पश्चिम में बहुत कम लोगों को मिलता था। भारत में ये कोई भी प्रक्रम मौजूद नहीं थे। यहां शादी का नाम एक वचन था, जिसे एक पवित्र रिश्ता एवम जीवन यज्ञ समझा जाता था। हम इसे जीवनपर्यंत हर हाल में निभाते थे। बाहरी संस्कृतियों के संक्रमण ने हमारी संस्कृति और समाज का तरीका बदला। हम पश्चिम का अनुकरण करने लगे और आज तलाक, डाइवर्स, सालगिरह आदि रस्मे हमारे समाज में आम प्रक्रियाएं हो गई है।”

खैर यह एक चर्चा का विषय था। पर मेन मुद्दा श्रद्धा की लाश को 35 टुकड़ों में काट कर अलग – अलग स्थलों में ले जा कर सबूतों को जड़ से मिटाने का तथा उस नव युवती की बेरहमी से की गई हत्या का है। प्रिय मित्रो आज भले ही हमारे देश के कई विद्वान और व्यक्तिक स्वातंत्र्य के प्रेमी लिव इन रिलेशनशिप के मुद्दे पर कड़ा कानून बनाने की बात कर रहे हो। पर मेरे विचार से लिव इन रिलेशनशिप जैसे कानून को भारत में कोई जगह नहीं दी जानी चाहिए।

क्योंकि हमारी सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था इतनी मजबूत और पवित्र है कि उसमें दम्पति से ले कर बच्चे और बूढ़े तक सुरक्षित है। यदि लिव इन रिलेशनशिप का कानून भारत में स्थान प्राप्त करता है तो भारतीय समाज हवस का शिकार हो जाएगा। न ही तो रिश्तों नातों की अहमियत रहेगी और न ही नारी जाति का सम्मान रहेगा।भविष्य की नई पीढ़ी और वृद्ध लोग असहज और असुरक्षित होंगे तथा इस प्रकार की श्रद्धा की कहानी जैसी कई घटनाएं सामने आएगी। इसमें मात्र लड़कियां ही घटना की शिकार नहीं होगी बल्कि लड़के भी इस लिव इन रिलेशनशिप के चंगुल में फंस कर शिकार होंगे।

यह हम सभी जानते हैं कि एक वक्त के बाद अक्सर हम स्त्री – पुरुष, पति- पत्नी व्यवहार में रह कर एक दूसरे से ऊब ही जाते हैं। वह तो हम लोक लाज और बच्चों की वजह से ताउम्र पति – पत्नी हो कर जिन्दगी भर साथ रह लेते हैं और रहना भी चाहिए। यदि लिव इन रिलेशनशिप हमारे समाज पर हावी हुआ तो महिलाओं का और बच्चों का घणा शोषण होगा। वह कैसे और क्यों? इसका जबाव समाज स्वयं जानता है। अधिकतर लोग विवाह से पूर्व ही दैहिक भोग को भोग कर एक दूसरे से ऊब कर किनारा कर लेंगे और यह सिलसिला समाज में आम हो जाएगा। नए – नए साथी के साथ रहने का शौक स्त्री पुरुष दोनों में जन्मेगा और सामाजिक ढांचा विकृत हो जाएगा। चरित्र नाम की बात बेईमानी हो जाएगी। बाकी सभी की अपनी – अपनी सोच है।

अब सवाल उठाते हैं कि :—

  1. क्या भारत में संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की शिक्षा स्कूलों में शुरू नहीं करनी चाहिए?
  2. क्या यह भारत की अति सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता का परिणाम है?
  3. क्या यह घटना लव जिहाद का मामला है?
  4. क्या भारत में डेटिंग एप जैसे समाज विरोधी सोशल मीडिया पर बैन लगाना चाहिए?
  5. क्या यह घटना हिन्दू – मुस्लिम भाईचारे और प्यार पर कलंक नहीं है?
  6. क्या लव जेहाद और धर्म परिवर्तन भारतीय समाज में राष्ट्र द्रोह के समक्ष जुर्म नहीं है?
  7. क्या एक देश एक विधान जरूरी नहीं है?
  8. क्या स्कूली पाठ्यक्रम में धार्मिक और सांस्कृतिक विषयवस्तु के साथ – साथ सभी धर्मों के सार तत्व मानवीय मूल्यों की शिक्षण सामग्री डलवाना जरूरी नहीं है?
  9. क्या इस्लामिक शिक्षा पद्धति के संस्थानों “मदरसों” को औपचारिक शिक्षा व्यवस्था से बाहर करके उन सभी मुस्लिम बच्चों को भी सामान्य भारतीय शिक्षा व्यवस्था के आम संस्थानों यानी सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाना चाहिए? आखिर मदरसों की क्या जरूरत है?
  10. क्या निजी शिक्षण संस्थानों को बन्द करके सरकारी शिक्षण संस्थानों को और उन्नत कर के, उनमें संस्कारवान अध्यापक, अध्यापिकाओं की भर्ती कर एक देश एक शिक्षा व्यवस्था और एक ही पाठ्यक्रम की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?
  11. क्या अध्यापक भर्ती का पैरामीटर लिखित, मौखिक परीक्षाओं से हट कर उसकी जगह चारित्रिक आंकलन पर आधारित नहीं होना चाहिए? अध्यापक बनने वाले प्रार्थी का खानपान, रहन सहन, पहनावा, बातचीत, सेवा, सत्कार, संयम, साधना,
    त्याग, समाज और राष्ट्र के प्रति सोच और निस्वर्थता, ईमानदारी, शालीनता, गुरुत्व व गंभीरतव आदि पहलू चैक नहीं होने चाहिए क्या? मात्र सैलरी के लिए शिक्षक का कार्य करने वाला शिक्षक शिक्षिका क्या उचित शिक्षक हो सकते हैं क्या?
  12. स्कूली बच्चों को स्कूलों में अध्यापक द्वारा संस्कार स्थापित करने के लिए आंशिक डांट – फटकार और सजा देने का कानूनन प्रावधान नहीं होना चाहिए क्या?
  13. अत्यधिक स्वातंत्र्य शिक्षार्थी जीवन में ठीक है क्या?
  14. माता – पिता और अभिभावकों को भी कमाई से ज्यादा फिक्र अपने बच्चों के संस्कारों की नहीं करनी चाहिए क्या? जो हम उन्हे आवारा छोड़ देते हैं और सारा ठीकरा अध्यापक के सिर पर फोड़ते है, वह ठीक है क्या?
  15. क्या एक अध्यापक को भी अपने छात्र और छात्राओं के प्रति उतने ही चिन्तित और संवेदनशील नहीं होना चाहिए, जितना कि वह अपने बच्चों के प्रति होता है?
  16. क्या महिलाओं की निर्मम हत्या सिर्फ मुस्लिम समुदाय के पुरुष ही करते हैं या बाकी धर्मों ( हिन्दू धर्म, सिख धर्म और ईसाई आदि) के पुरुष भी करते हैं? और भी बहुत कुछ। पर कितना लिखे?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — “वहां अत्यधिक स्वातंत्र्य के चलते शादी ज्यादा दिनों तक टिकती ही नहीं थी। यदि किसी की साल भर टिक गई तो सालगिरह मनाई जाती थी और 25 साल टिकी तो सिलवर जुबली मनाई जाती थी। यूं ही गोल्डन जुबली आदि। पर यह मौका पश्चिम में बहुत कम लोगों को मिलता था। भारत में ये कोई भी प्रक्रम मौजूद नहीं थे। यहां शादी का नाम एक वचन था, जिसे एक पवित्र रिश्ता एवम जीवन यज्ञ समझा जाता था। हम इसे जीवनपर्यंत हर हाल में निभाते थे। बाहरी संस्कृतियों के संक्रमण ने हमारी संस्कृति और समाज का तरीका बदला। हम पश्चिम का अनुकरण करने लगे और आज तलाक, डाइवर्स, सालगिरह आदि रस्मे हमारे समाज में आम प्रक्रियाएं हो गई है।”

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यह कविता (क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बलिदानी क्या सोचेंगे?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बलिदानी क्या सोचेंगे? ♦

ओ पदवी के सब चाहवानों! अब तो पदवी का मोह छोड़ो।
अपनी गलती का ठीकरा प्यारो, दूसरों के सर पर न फोड़ों।

देश हमारा, हम सब हैं इसके, ध्रुवीकरण से इसे मत तोड़ो।
खैर जो चाहते हैं गर अपनी तो, जर्रा – जर्रा देश का जोड़ो।

रोप के पौधा आजादी का, पल्वित पुष्पित कर जो चले गए।
क्या बीतेगी दिल पर उनके? देखे सपने जो उनके छले गए।

जाति धर्म की बाट कहां जोही? समता ही जिनका स्वप्न रहा।
विषमता विश्व से मिटाने के खातिर, निरंतर कड़ा संघर्ष सहा।

वे बलिदानी क्या सोचेंगे? जब हमको लड़ता भिड़ता देखेंगे।
“बेकार हुई सब मेहनत हमारी,” हम पर तो लानत ही फेंकेंगे।

राष्ट्र बड़ा है स्वार्थ से पगलो, कभी कुछ तो खुद पे शर्म करो।
सत्ता के महल की नीव में यारो, ईमान – धर्म की कंक्रीट भरो।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — ओ पदवी के सब चाहने वालो, अब तो अपने पदवी का मोह छोड़ो और अपनी गलती का ठीकरा प्यारो, दूसरों के सर पर न फोड़ों। ये देश हमारा व हम सब हैं इसके, ध्रुवीकरण से इसे मत तोड़ो, अपनी सलामत अगर चाहते हैं तो, जर्रा – जर्रा देश का जोड़ो। रोप के पौधा आजादी का, पल्वित पुष्पित करके जो महानायक देशभक्त चले गए, जरा सोचों क्या बीतेगी दिल पर उनके? देखे सपने जो उनके छले गए तुम्हारे अपने निजी स्वार्थ के कारण। जाति धर्म से ऊपर उठकर सदैव समता ही जिनका स्वप्न रहा। नफ़रत को विश्व से मिटाने व आज़ादी के खातिर, निरंतर कड़ा संघर्ष सहा। कभी सोचा है की वे बलिदानी क्या सोचेंगे? जब हमको लड़ता भिड़ता देखेंगे। “बेकार हुई सब मेहनत हमारी,” हम पर तो लानत ही फेंकेंगे। एक बात याद रखना राष्ट्र बड़ा है स्वार्थ से पगलो, कभी कुछ तो खुद पे शर्म करो। अब तो सत्ता के महल की नीव में यारो, ईमान – धर्म की कंक्रीट भरो।

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यह कविता (बलिदानी क्या सोचेंगे।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी। ♦

गुलामी की जंजीरों से मुक्ति का संघर्ष लगभग विश्व के अधिकतर देश समय – समय पर अपने – अपने ढंग से करते आए हैं और उसी कड़ी में एक नाम हमारे भारत देश का भी है। भारत वर्ष के इतिहास की एक समृद्ध कहानी है। जहां यह देश विभिन्न आतताइयों से अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा के लिए निरन्तर कडा संघर्ष करता रहा, वहीं इसे एक लम्बे दौर तक व्यापार के बहाने हिन्दुस्तान के शासक बन बैठे अंग्रेजों की गुलामी का भी शिकार होना पड़ा।

भारतीय जातिवाद, धर्मवाद और साम्राज्यवाद को उकसा – उकसा कर अंग्रेजों ने सत्ताधीशों के साथ – साथ आम जनता को भी आपस में लड़वा – भिड़वा कर फूट डालो और शासन करो की नीति का सहारा लेकर पूरे भारत वर्ष पर धीरे – धीरे अधिकार प्राप्त किया।

अब वे व्यापारी से यहां के सरकारी हुक्काम बन बैठे। जब भारत के रियासती शासक वर्ग के साथ – साथ आम जनता को भी अंग्रेजी चाल का पता चला कि ये तो हमे उकसाने का और लड़ाने का काम कर रहे हैं और अपना सम्राज्य स्थापित कर रहे हैं, तो तब अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति पाने के लिए भारतीय शासक वर्ग के साथ – साथ आम जनता के जागरूक तबके ने भी आजादी की जंग मिलकर अंग्रेजी शासन व्यवस्था के खिलाफ छेड़ दी।

फिर वह चाहे 1857के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की बात हो या फिर असेंबली हाल के बम्ब विस्फोट की घटना। चाहे फिर आजाद हिन्द फौज की स्थापना की बात हो या फिर भारत छोड़ो आंदोलन की मुहिम। इन सभी प्रक्रियाओं में एक लम्बा वक्त जरूर लगा पर यह भी सत्य है कि यही वे घटनाक्रम थे, जिनकी बदौलत आज हम स्वतंत्र भारत में जी रहे हैं और “आजादी का अमृत महोत्सव” उत्सव मना रहे हैं।

यह भी सच है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इस महा अभियान में गर्म दल और नर्म दल दोनों ने अपनी – अपनी भूमिकाएं अपने – अपने तरीके से निभाई। पर न जाने आज “आजादी के 75साल” बीत जाने के बाद हम क्यों उन तमाम वीर शहीद बहादुरों को भूल से जा रहे हैं, जिन्होंने हमे यह आजादी की सौगात दिलाने में अंग्रेजी हुकूमत की कड़ी यातनाओं के साथ – साथ अपने प्राणों की आहुति भी खुशी – खुशी दी। यदि आज हम औपचारिकता के तौर पर विशेष अवसरों के मौकों पर चन्द स्वतंत्रता सेनानियों को और आजादी के प्रमुख नेताओं को याद करते भी हैं तो उसमें भी एक अधूरा सा पन मुझे नजर आता है।

मैं सोचता हूं कि क्या मात्र इन चन्द कद्दावर नेताओं या स्वतंत्रता सेनानियों ने ही भारत को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाई? यदि ऐसा ही था तो फिर भारत इतने लम्बे दौर तक गुलाम क्यों रहा? क्यों फिर रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व वाले आंदोलन के दौरान ही भारत आजाद नहीं हुआ? ऐसे अनगिनत सवाल बुद्धि के विवेक कक्ष में उठते हैं और दौड़ते रहते हैं।

यह सभी जानते हैं कि अकेला चना भाड़(पहाड़) नहीं फोड़ता। पर फिर भी पूरी मुहिम का अधिकाश श्रेय उस मुहिम के मुख्य पत्र को जाता है और जाना भी चाहिए, क्योंकि उसने उस मुहिम को शुरू किया होता है तथा बाकियों को चेतना दे कर उस मुहिम में शामिल किया होता है। परन्तु मेरे मन में फिर से एक प्रश्न कौंधता है कि ठीक है, मुख्य पत्र को श्रेय दो। परन्तु उस मुहिम को सफल बनाने में अपना योगदान देने वाले अनेकों साथियों को भी तो उस सन्दर्भ में याद किया जाना चाहिए, जिन्होंने उस मुहिम को कामयाब बनाया होता है। पर नहीं, यह एक परिपाटी सी बन गई है और निरन्तर चली आ रही है कि मुख्य पात्र को ही याद किया जाता है और बाकियों को समय के गहवर में बिसार दिया जाता है।

कुछ ऐसा ही आजादी के आंदोलन की घटना में भी देखने को मिलता है। जो लोग इस मुहिम के नायक थे या यूं कहो कि रसूखदार व्यक्तित्व थे, उन्हे तो आज भी हम याद करते हैं और उनके नाम के कसीदे गढ़ते हैं। पर जिन्होंने जमीनी स्तर पर इस पूरे घटनाक्रम को गति दी और अंजाम दिया, उन्हे इतिहास के पन्नों में स्थान तक नहीं दिया गया।

यह बात ठीक है कि प्रभावशाली व्यक्तित्वों का जिक्र विशेष रूप से होना चाहिए।परन्तु इसका मतलब यह कतई नहीं है कि फिर बाकियों को बिल्कुल भूल ही जाएं।यह तो उनके साथ न्याय नहीं है और इसके साथ – साथ यह रवैया नई पीढ़ी में भी नकारात्मकता भरता है कि “करता कोई और है और वाहवाही किसी और को ही मिलती है।” मेरा मानना है कि जिसका जो मान – सम्मान बनता है, वह उसे मिलना चाहिए। तभी किसी कार्य या बात का उत्कर्ष बना रहता है। वरना नकारात्मकता स्वभाविक है।

आज आजादी के अमृत महोत्सव के सुअवसर पर यह बात मैं इसलिए कर रहा हूं कि हम सब मिलकर इस बात का मन्थन करे कि इस आजादी को दिलाने में अपना योगदान और बलिदान देने वाले ऐसे कितने स्वतंत्रता सेनानी थे, जो हमारे क्षेत्र या जिले के थे पर इतिहास के पन्नों में उनका नाम न होने के कारण आज समाज उन्हें और उनके बलिदानों को थोड़ा सा भी नहीं जानता। यदि थोड़ा बहुत कुछ कोई जानता भी है तो वह भी गौण है।

मेरे जिला मण्डी हिमाचल प्रदेश से ऐसे कई नाम हैं, जिन्होंने इस लड़ाई में अपना योगदान तो दिया पर उन्हें इतिहास में या लोक साहित्य में वह स्थान नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिए था। हां कृष्ण कुमार नूतन और डा गंगा राम राजी ने अपने साहित्य में कुछ – कुछ जिक्र इन स्वतंत्रता सेनानियों का जरूर किया है पर उससे शायद इन्हें वह सम्मान मिला हो, जिसके ये हकदार हैं। इन स्वतंत्रता सेनानियों में कुछ की जानकारी जो मैं जुटा पाया हूं, कुछ यूं है :—

• रानी खैरागढ़ी उर्फ रानी ललिता कुमारी •

रानी खैरागढ़ी का नाम जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानियों में अग्रगण्य है। असल में इनका नाम रानी ललिता कुमारी था। परन्तु इनका पैतृक घर खैरागढ़ उत्तर प्रदेश में था, जहां से इनका विवाह जिला मण्डी के प्रथम पढ़े लिखे राजा भवानी सेन से हुआ था। शायद तत्कालीन पहाड़ी रिवायत के चलते मण्डी जनपद के लोगों ने रानी का नाम उनके मायके के नाम के आधार पर खैरीगढ़ी रख दिया हो। क्योंकि पहाड़ों में उस दौर औरतों को उनके असली नाम से हट कर उनके पैतृक गांव के आधार पर रखे नाम से ही पुकारा जाता था। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि रानी के राष्ट्र प्रेम से प्रभावित होकर जनता उन्हे प्यार से रानी खैरीगढी कहते और यही नाम मशूहर हो गया। जबकि रानी के पिता के गांव का नाम खैरागढ़ था तो उस आधार से नाम तो खैरागढी बनता था। पर जनता ने खैरीगढ़ी रख दिया तो वही प्रसिद्ध हुआ।

जानकारों की माने तो राजा भवानी सेन मण्डी का पहला पढ़ा लिखा राजा हुआ। इस कारण उनके लिए एक पढ़ी लिखी रानी के रिश्ते की तलाश की गई। चारों ओर जब खोजबीन शुरू हुई तो एक उचित रिश्ता खैरागढ़ उत्तर प्रदेश में जा कर रानी ललिता कुमारी का मिला। राजा की रानी से शादी हो गई। उत्तर प्रदेश में उन दिनों अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावतें चर्म पर थी। तो जाहिर है कि कुमारी ललिता भी पढ़ी लिखी सजग नारी होने के नाते उन बगावती सुरों में ताल देने में अहम किरदार रही होगी। रानी का यह चस्का विवाह के बाद भी कम नहीं हुआ। जब उसने देखा की मण्डी रियासत की जनता के साथ न्याय नहीं हो रहा है। वे अंग्रेजी शासन व्यवस्था के चंगुल में कोल्हू के बैल की तरह परेशान है और राजा तथा राजा के मंत्री भी जनता का शोषण ही कर रहे हैं।

उन्हे जनता के सुख – दुःख की चिन्ता ही नहीं है और राजा जनता से कट कर अपने ही रसूख में जी रहा है। तब रानी ने जनकल्याण और देश प्रेम की भावना राज्य की जनता में भरना शुरू की। यह खबर राजा को अंग्रेजों ने और राजा के चाटुकार मंत्रियों ने गुप्त रूप से देना शुरू कर दी थी और राजा को रानी के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया था। राजा मंत्रियों और अंग्रेजों की बातों में आ कर रानी से विमुख होता रहा। नौबत यहां तक आ गई कि रानी को राजा के प्रेम से वंचित रहना पड़ा। परन्तु रानी ने हार नहीं मानी। वह जनता की सेवा में लगी रही और उनमें राष्ट्र प्रेम की आग जलाती रही। जब रानी को लगा कि राजा उसकी बाते नहीं मानेगा तो वह स्वयं राज्य का कामकाज देखने लगी। परन्तु वहां भी मंत्रियों ने रानी के आदेशों की पालना को नकारना शुरू किया।

तब रानी को लगा कि व्यक्तिगत सुखों से कहीं ज्यादा बड़ा सुख जन सामूहिक सुख है। एक राज घराने का प्रमुख कर्तव्य भी वही होता है। रानी की यह सोच उसके अविवाहित जीवन के बगावती तेवरों को और ताव देती है तथा रानी इस पहाड़ी रियासत में आजादी के आंदोलन की प्रमुख पैरोकार बनी। अब उसे अपने जैसे कुछ और ऐसे सरफीरों की तलाश थी, जिनके भीतर भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ रानी की ही तरह बगावती आग जल रही थी। इतना ही नहीं, कुछ जानकारों का तो कहना है कि परिस्थितियां तो यहां तक बिगड़ गई थी कि रानी को इस सन्दर्भ में राजा भवानी सेन से भी दो – दो हाथ करने पड़े थे। यानी पहाड़ी रियासतों में रानी खैरागड़ी ने झांसी की रानी की भूमिका निभाई।

• भाई हिरदा राम •

इनका नाम मण्डी रियासत के क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों में प्रमुखता से लिया जाता है। इनका जन्म 28 नवम्बर 1885 को मण्डी शहर में श्री गज्जन सिंह जी के घर हुआ था। लोगों में इनको भाई के नाम से प्रसिद्धी मिली थी। स्वामी कृष्णानंद जी से प्रेरणा ले कर ये क्रांति पथ पर चल पड़े थे। सन 1914 में ये अमृतसर में रासबिहारी बोस, डा• मथरा सिंह, भाई परमानंद तथा पिंगले आदि क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आए। धीरे – धीरे ये रासबिहारी बोस के विश्वास पात्र बने।

31 दिसम्बर 1914 की विरपाली धर्मशाला में हुई क्रांतिकारियों की गुप्त बैठक में इन्हें बंब बनाने का काम दिया गया। यह बात भी खासी चर्चा में है कि भगत सिंह जी ने जो बंब असैम्बली हाल में फैंका था, वह भाई हिरदा राम ने बनाया था। इन्हे इस संघर्ष में अंग्रेजी सरकार द्वारा असैम्बली बंब धमाके की साजिश में पकड़े जाने पर फांसी की सजा सुनाई गई, परन्तु बाद में वह सजा आजीवन कारावास की सजा में बदली गई। आजीवन कारावास की सजा पाने के लिए इन्हें काला पानी यानी अंडोमान की जेल में भेजा गया। वहां पर वीर सावरकर और भाई हिरदा राम एक ही कोठरी में रखे गए थे।

सन 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो भाई जी को जेल से मुक्ति मिली। इस तरह अपने जीवन को राष्ट्र सेवा में समर्पित करते हुए 21अगस्त 1965 ई० को भाई जी पंच तत्त्व में विलीन हो गए। इनकी यादगार में आज मण्डी शहर के बीचो बीच बनी इन्दिरा मार्केट में एक प्रतिमा बनाई गई है, जिसका अनावरण 21अगस्त 2002 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल जी ने तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री भारत सरकार एवम पूर्व मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश श्री शांता कुमार जी के साथ मिल कर किया था। इस अवसर पर सांसद सुरेश चंदेल, महेश्वर सिंह और अनिल शर्मा जी भी मौजूद रहे।

• कृष्णा नन्द स्वामी •

स्वामी जी मण्डी शहर के निवासी थे। इनके स्वतंत्रता आन्दोलन का क्षेत्र सिंध प्रांत रहा। इनकी सारी गतिविधियां सिंध से ही चलती थी। स्वामी जी ने 35 वर्षों के अपने स्वतंत्रता संघर्ष में कई बार जेल की सजा भुगती। यही वे कारण थे, जिनके चलते सरदार पटेल ने इन्हे सिंध के गांधी की उपाधि दी थी। इन्होंने दो लाख से भी अधिक हिंदुओं को समुद्र के रास्ते सिंध से मुम्बई और अहमदाबाद पहुंचाया था।

इनकी जेल यातनाओं में 1921-22 में पिकेटिंग के लिए धारा 132 के अधीन एक वर्ष का कारावास, खुलेआम भाषण के लिए धारा 108 सी.पी. सी. के अधीन अक्टूबर 1922 से सितम्बर 1923 तक एक वर्ष का कारावास, सी. पी. सी.की धारा 177 के तहत 1930 से 1931 तक एक वर्ष का कारावास, 1932 से 1934 तक दो साल का कारावास तथा भारत छोड़ो आन्दोलन में 1942 से1945 तक तीन साल का कारावास गिना जाता है। भाई हिरदा राम जी ने भी स्वामी जी से ही क्रान्ति की प्रेरणा पाई थी।

• अर्जुन सिंह राणा •

अर्जुन सिंह राणा जी का जन्म 30 मई 1920 को जिला मंडी के नेरचौक नामक स्थान में हुआ। राणा जी एक पढ़े – लिखे व्यक्ति थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में बढ़-चढ़कर के भाग लिया। 1942 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज की स्थापना की थी, उस फौज में राणा जी ने कैप्टन के पद पर अपनी सेवाएं दी थी। राणा जी ने एक वर्ष तक का कारावास भी भोगा। इनका संबंध हिमाचल प्रदेश स्वतंत्रता सेनानी संगठन से भी रहा।

• केशव चंद्र शर्मा •

केशव चन्द्र शर्मा जी जिला मण्डी के रिवालसर नामक स्थान में रियूर नामक ग्राम के निवासी थे। 1944 में शर्मा जी प्रजामंडल की गतिविधियों में शामिल हुए थे। इतना ही नहीं ये नौकरी करते थे परंतु आंदोलन का सहयोग करने के लिए इन्होंने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। रियासती विलय आंदोलन में शर्मा जी ने भी भरपूर संघर्ष किया था। शर्मा जी ने 4 माह 10 दिन तक मंडी जेल में सजा भी काटी थी।

• खेम चंद •

खेम चंद जी का जन्म लगभग 1904 ई० के आस पास हुआ माना जाता है। इनके पिता का नाम श्री बृज लाल था। इनका जन्म स्थान जिला मंडी के मंडी शहर में भूतनाथ नामक स्थान पर हुआ था। इन्होंने अपने पिता के साथ जलावतन रहने से देशभक्ति की भावना प्राप्त की थी। मंडी राज्य में प्रजामंडल आंदोलन में खेम चंद जी ने अपनी सक्रिय भूमिका अदा की थी। इस दौरान इन्हें मुंशी की नौकरी से भी निष्कासित कर दिया गया था। सन 1936 – 37 में खेम चंद जी ने मंडी सत्याग्रह में भी अपनी भागीदारी प्रदान करके आजादी के संघर्ष में अपना योगदान दिया था।खेम चंद जी का स्वर्गवास 3 जुलाई 1982 ई० को हुआ।

• गुलजारी राम •

गुलजारी राम जी का जन्म 10 अगस्त 1915 ई० में जिला मंडी के सरका घाट इलाके में भदरोट नामक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री टोडर था। आजाद हिंद फौज में इन्होंने बतौर सैनिक काम किया। गुलजारी राम जी दिसंबर 1940 से मई 1946 तक सिंगापुर, रंगून और मलाया आदि स्थानों में लंबे कारावास में भी रहे। इन्हें बिना वेतन के निष्कासित कर दिया गया था और पांच वर्ष तक युद्ध बंदी बनाकर इन्हें कठिन से भी कठिन यातनाएं दी गई थी।

• गौरी प्रसाद •

गौरी प्रसाद जी का जन्म 18 अक्टूबर 1918 ई० को जिला मंडी के नेरचौक नामक स्थान पर हुआ था। प्रसाद जी लाहौर से मेडिसिन में डिग्री लेकर आए थे। उन दिनों लाहौर स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन चुका था इसलिए प्रसाद जी ने वहीं से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने की प्रेरणा प्राप्त की थी।

इस आंदोलन में कूदकर गौरी प्रसाद जी ने अपना बढ़-चढ़कर योगदान दिया। जब वहां से लौटकर वे मंडी आए तो उन्होंने 1940 में मंडी प्रजामंडल में प्रवेश किया। 1940 से लेकर 1947 ई॰ तक प्रजामंडल के प्रधान रहे। इसी दौरान उन्हें 6 मार्च की जेल की सजा भी खानी पड़ी थी। सन 1951 में प्रसाद जी को विधानसभा का सदस्य चुना गया था। प्रसाद जी का योगदान अनेक संस्थानों एवं गतिविधियों में निरंतर रहता था।

• जे पी बागी •

बागी जी का जन्म 15 जुलाई 1908 ई० को स्कूल बाजार जिला मंडी में हुआ माना जाता है। अंग्रेजो के खिलाफ हमेशा बगावती तेवर रखने वाले जे पी बागी को यह बागी नाम इसी कारण प्राप्त हुआ था। 1928 से 1934 तक लाहौर जेल में लाहौर षड्यंत्र के जुर्म में उन्हे 6 साल तक के कारावास की सजा भी हुई थी। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और 1947 तक 2 वर्ष 6 माह कारावास में रहे। कुल साढ़े ग्यारह वर्ष तक जेल यात्रा में रहे। भारत सरकार ने इन्हें ताम्रपत्र से सम्मानित किया था।

• नरेंद्र पाल जोशी •

नरेंद्र जी जिला मंडी के लूनापानी के निवासी थे। 15 मई 1892 में उनका जन्म हुआ था। इन्होंने 1912 में एक अंग्रेज की हत्या की थी। यही इनका स्वाधीनता संग्राम में प्रवेश होने का प्रथम सोपान था। इन्होंने शादी नहीं की थी। 1918 में सूरत के जंगलों में पुलिस मुठभेड़ में इन्हें गोली लगी थी। जलियावाला बाग कांड के बाद अंग्रेजों का विरोध करते हुए पकड़े गए और पांच साल तक जेल में ही रहे। 1942 में जब जेल से रिहाई हुई तो पुनः संघर्ष में जुट गए। रावलपिंडी बम विस्फोट में 3 वर्ष का कारावास हुआ। 1928 में अंग्रेजों ने इन्हे पुनः गिरफ्तार कर लिया। 1932 में हिसार में 1 वर्ष का कारावास और काटा। सन 1934 में पुनः 3 वर्ष की सजा हुई। 1936 के बाद आर्य प्रतिनिधि सभा में कार्य कियाl इसके बाद वे लूनापानी में स्थाई रूप से रहने लगे थे।

• बुद्ध भाट •

भाट जी जिला मंडी की तत्कालीन सुकेत रियासत के सुंदर नगर पुराना बाजार में रहते थे। इनकी भागीदारी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से रही। इन्होंने कई वर्षों तक कठिन सजा भी काटी। सुकेत रियासत के विरुद्ध क्रांति तथा षड्यंत्र के झूठे आरोप में अभियोग तथा लंबे समय के लिए कारावास की यातनाएं भाट जी ने सही। सुकेत रियासत की जेल तथा पंजाब जेल में ग्यारह मास, जालन्धर में छः मास, रायपुर में दस मास, मुल्तान में आठ मास, रावलपिंडी में दस मास तथा शिमला में एक मास तक कारावास काटा।

• सन्त सिंह आजाद •

सन्त सिंह जी का जन्म 1914 में कटोह नामक गांव में समराला में हुआ था। जब नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज खड़ी की तो सन्त सिंह आजाद जी भी नेता जी के आवाह्न पर उनकी फौज में लेफ्टिनेंट के पद पर शामिल हुए। आजाद हिन्द फौज का हिस्सा होने के नाते ही इन्होंने अपने नाम के साथ आजाद शब्द जोड़ दिया था।

सन्त सिंह आजाद ने नवम्बर 1943 में मांडला में “दिल्ली चलो” का नारा बुलन्द किया था तथा 1944 में दलेल नामक स्थान पर अंग्रेजों पर हमला किया था। इसी साल वे दीमापुर चले गए थे और वहां पर एक हमले के दौरान जख्मी हो गए थे।इसके बाद अंग्रेज सेना द्वारा गिरफ्तार किए गए।

17 अप्रैल 1946 को मण्डी पहुंच कर प्रजामंडल के सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य किया। सन 1947 में पुनः तीन मास के लिए मण्डी की जेल में कारावास काटा। सत्याग्रह आन्दोलन में शामिल होने के कारण बिलासपुर के राजा द्वारा बन्दी बना लिए गए तथा जेल में भारी मार पीट उनके साथ की गई थी। वहां से छूटने पर पुनः सत्याग्रह आन्दोलन में सक्रियता से जुट गए। भारत सरकार ने इन्हे 1972 में ताम्रपत्र से सम्मानित किया।

• कुछ नायक ऐसे भी •

कुछ नायक ऐसे भी थे जिन्होंने अपने परिवार की कोई परवाह न करते हुए देश से अंग्रेजों को खदेड़ने के कार्य में रात दिन एक कर दिया। मण्डी एक ऐसा जिला रहा है, जहां से बहुतेरे स्वतंत्रता सेनानी हुए हैं। इतना ही नहीं इन स्वतंत्रता प्रेमियों को राष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता था और मण्डी का नाम राष्ट्रीय फलक पर अंकित कर राष्ट्र की आजादी में अपना अहम योगदान दिया। इसी प्रकार के अनेकों रणबांकुरों ने अपने घर परिवार की परवाह छोड़ कर देश की आजादी के लिए अपना बलिदान दिया। परंतु उन्हें समय के प्रवाह में जमाने ने भूला दिया। वे सब उनके योगदान के अनुसार न ही तो आज याद किए जाते हैं और न ही उन्हें इतिहास के पन्नों में जगह मिली। यह दशा अपने आप में एक गम्भीर विडम्बना है। यही वे कारण है, जिनके चलते समाज में कोई भी किसी कुव्यवस्था के खिलाफ खड़ा हो कर अपना बलिदान नहीं देना चाहता। क्योंकि हमें समाज की काम निकल जाने के बाद भूल जाने की आदत पता है। इसलिए हम भी अपनी सुख सुविधा का उपभोग करते हुए व्यवस्था के साथ हो जाते हैं। जबकि हम सब जानते हैं कि यहां बहुत गलत हो रहा है।

अतः आज समाज को जरूरत है उन आजादी के रणबांकुरों के इतिहास को खोजने की और उस इतिहास को सबके सामने लाने की तथा युवा पीढ़ी को पढ़ाने की। ताकि युवा पीढ़ी को प्रेरणा और उन आजादी के परवानों को सम्मान मिल सके जो वक्त के गहर में कहीं खो से गए हैं।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आज समाज को जरूरत है उन आजादी के रणबांकुरों के इतिहास को खोजने की और उस इतिहास को सबके सामने लाने की तथा युवा पीढ़ी को पढ़ाने की। ताकि युवा पीढ़ी को प्रेरणा और उन आजादी के परवानों को सम्मान मिल सके जो वक्त के गहर में कहीं खो से गए हैं। गुलामी की जंजीरों से मुक्ति का संघर्ष लगभग विश्व के अधिकतर देश समय – समय पर अपने – अपने ढंग से करते आए हैं और उसी कड़ी में एक नाम हमारे भारत देश का भी है। भारत वर्ष के इतिहास की एक समृद्ध कहानी है। जहां यह देश विभिन्न आतताइयों से अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा के लिए निरन्तर कडा संघर्ष करता रहा, वहीं इसे एक लम्बे दौर तक व्यापार के बहाने हिन्दुस्तान के शासक बन बैठे अंग्रेजों की गुलामी का भी शिकार होना पड़ा। भारतीय जातिवाद, धर्मवाद और साम्राज्यवाद को उकसा – उकसा कर अंग्रेजों ने सत्ताधीशों के साथ – साथ आम जनता को भी आपस में लड़वा – भिड़वा कर फूट डालो और शासन करो की नीति का सहारा लेकर पूरे भारत वर्ष पर धीरे – धीरे अधिकार प्राप्त किया।

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यह लेख (आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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हिन्दी का हित चाहने वालों को।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हिन्दी का हित चाहने वालों को। ♦

राष्ट्र का गौरव शोभित करने को,
फिर से हमको क्या लड़ना होगा?
राष्ट्र भाषा के सम्मानित पद पर,
शासित हिन्दी को करना होगा।

अमृत महोत्सव आजादी का भी,
मनाकर क्यों हम बस शर्मिंदा हैं?
दिला न सके जो न्याय मां को तो,
फिर हम बेटे भी काहे को जिन्दा है?

जुर्म हुए हैं और जलालत सही है,
दशकों से भारत में मां हिन्दी ने।
कभी अफगानी अंग्रेजी ने कुचला,
कभी अपमानित किया है सिंधी ने।

जापान में जापानी, चीन में चीनी,
तो भारत में हिन्दी राष्ट्र की भाषा हो।
भारत बने फिर विश्वगुरु, जो सोचा है,
हिन्दी ही पूर्ण करेगी इस आशा को।

मशाल जलाते हैं मिलकर के आओ,
हिन्दी के सम्मान, प्रचार – प्रसार की।
राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के खातिर,
आओ कुछ मदद लेते है सरकार की।

हिन्दी का हित चाहने वालों को अब,
मिलकर एक तो यारों होना ही होगा।
नहीं तो विदेशी भाषाओं का भार हमें,
सदियों तक यूं ही निरंतर ढोना होगा।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कवि हम सभी से पूछते हैं: राष्ट्र का गौरव शोभित करने को, फिर से हमको क्या लड़ना होगा? राष्ट्र भाषा के सम्मानित पद पर, शासित हिन्दी को करना होगा। अमृत महोत्सव आजादी का भी, मनाकर क्यों हम बस शर्मिंदा हैं? दिला न सके जो न्याय मां को तो, फिर हम बेटे भी काहे को जिन्दा है? जापान में जापानी, चीन में चीनी, तो भारत में हिन्दी राष्ट्र की भाषा हो। तब भारत बने फिर विश्वगुरु, जो सोचा है, हिन्दी ही पूर्ण करेगी इस आशा को। हिन्दी का हित चाहने वाले सभी उम्र के साथियों से आग्रह है की “मशाल जलाते हैं मिलकर के आओ, हिन्दी के सम्मान, प्रचार – प्रसार की। राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के खातिर, आओ कुछ मदद लेते है सरकार की। विशेषताओं से भरे भाषा का, प्रसार जो होना चाहिए हुआ नहीं। आओ हमसब मिलकर करें प्रचार, हिंदी का करें खूब विस्तार। तब मिलेगा इसे वाजिब हक और सम्मान, हिंदी मेरी जान, हम इस पर कुर्बान।

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यह कविता (हिन्दी का हित चाहने वालों को।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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गुरु गुण और शिक्षा प्रणाली।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गुरु, गुण और शिक्षा प्रणाली। ♦

गुरु बिन गुण असम्भव।

गुरु शब्द अपने आप में एक पूर्ण शब्द है जो मानवता के कल्याण एवं उत्थान के लिए एक सर्वोपरि दायित्व है। भारतीय शिक्षा जगत में जहां गुरु पद की महिमा को विभिन्न उपाधियों से अलंकृत किया है वहीं अंतरराष्ट्रीय फलक पर भी गुरु के महत्व को नकारा नहीं जा सकता।

प्राचीनतम इतिहास में यदि हम देखें तो गुरु अध्यात्म विद्या से संबंधित ज्ञान को देने वाले एक विशिष्ट धर्मात्मा को कहा जाता था। लेकिन कालांतर में व्यवस्था बदलती गई और गुरु का वह स्थान वर्तमान शिक्षा प्रणाली में शिक्षक ने दे दिया है। जिसे आमतौर पर अध्यापक भी कहा जाता है।

• गुरुकुल शिक्षा प्रणाली •

यह भी एक पूर्ण सत्य है कि पुरातन समय में गुरु गुरुकुल व्यवस्था को संचालित करता था और वह उस कार्य के लिए किसी राज्य सरकार से कोई वेतन विशेष नहीं बल्कि अनुग्रहित अंशदान प्राप्त जरूर करता था।

गुरुकुल शिक्षा प्रणाली जहां सामाजिक निर्माण के साथ-साथ मानसिक निर्माण का बीड़ा उठाती थी वही वह अध्यात्म विद्या के साथ – साथ चरित्र निर्माण का बोध कराने वाली शिक्षा का भी प्रावधान करती थी। मानसिक, बौद्धिक, काल्पनिक, आध्यात्मिक, चारित्रिक और राष्ट्र निर्माण के साथ-साथ आत्मा सुरक्षा और राष्ट्र सुरक्षा के भावों से ओतप्रोत शिक्षा प्रणाली में निरंतर भारतवर्ष में दी जाती रही।

यहां इस बात को स्पष्ट करना अति आवश्यक हो जाता है कि इस प्रणाली में गुरु का जो मनोवैज्ञानिक प्रभाव था, वह अपने आप में महत्वपूर्ण था। मानव के भीतर मानवता, इंसान के भीतर इंसानियत, हुकमाराम के भीतर हुकूमत और आवाम के भीतर राज भक्ति और राष्ट्रभक्ति की भावना अगर कोई भरता था तो वह गुरु ही होता था।

इन सभी गुणों के साथ – साथ अध्यात्म का परम लक्ष्य युक्त भावबोध अपने शिष्यों के अंदर जागृत करना इन गुरुओं का परम कर्तव्य और दायित्व होता था। इस दायित्व का निर्वहन करने के लिए ये गुरु लोग किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते थे। शायद यही वह कारण था जिस कारण से वे गुरु के पद पर विराजमान थे और समाज इन्हें आदर की दृष्टि से पूर्ण सम्मान के साथ देखता था।

• वर्तमान समाज में भारतीय शिक्षा प्रणाली •

वर्तमान समाज में भारतीय शिक्षा प्रणाली में जो मैकाले शिक्षा पद्धति चली। उसमें गुरुकुल व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया तथा उसके स्थान पर स्कूल शिक्षा प्रणाली को लागू किया गया। स्कूलों में अध्यापक प्रतिनियुक्त किए गए। इससे धीरे-धीरे गुरु पद की मर्यादा और गरिमा हीन होती गई। इसके पीछे अध्यापकों का वेतन भोगी होना भी एक कारण हो सकता है और उसके साथ – साथ समाज का पाश्चात्य शैक्षिक रवैया भी एक कारण हो सकता है।

• भारतीय संस्कृति में मां को प्रथम गुरु का दर्जा •

परंतु इस सत्य को किसी भी तरह से नहीं चलाया जा सकता कि मनुष्य के जीवन में गुरु के बिना गुणों का प्रादुर्भाव संभव ही नहीं है। यही वह कारण है जिसके चलते भारतीय संस्कृति में मां को प्रथम गुरु का दर्जा दिया गया और उसके पश्चात तो निरंतर हमारे जीवन में कई गुरु विभिन्न क्षेत्रों में हमारा मार्गदर्शन करते हैं।

इस बात का स्पष्ट उदाहरण भारतीय पौराणिक आख्यानों में दत्तात्रेय के जीवन चरित्र से हमारे सामने आता है। गुरु के प्रति श्रद्धा, विनम्रता और सहजता ही इन गुणों को ग्रहण करने का एक मुख्य माध्यम होता है।

परंतु बड़े खेद की बात है कि आज के वर्तमान समाज में इन्हीं सब प्रारंभिक भावों का ही मनुष्य में पतन होता जा रहा है। गुरु शब्द का एक अर्थ बड़ा भी होता है। अर्थात अपने घर के, परिवार के और समाज के बड़ों के प्रति आदर, सम्मान, श्रद्धा और विश्वास रखना ही हम सब लोगों का दायित्व बनता है और वही दायित्व एक सद चरित्र व संतुलित – पुष्ट समाज का निर्माण करता है।

• बड़ों के प्रति तो श्रद्धा भाव घटता ही जा रहा है •

विडंबना यह है कि आज अपने बड़ों के प्रति तो श्रद्धा भाव घटता ही जा रहा है परंतु जो शिक्षक हमारी तोतली आवाज को सुधार कर एक पहलवानी का रूप प्रदान करता है और समाज को दशा और दिशा देता है। “छोटे से लेकर बड़े हो दीदार तक की मानस पटल को निखार करो” उसे देश और समाज का संचालन करने के लिए योग्य बनाता है। उसी गुरु के प्रति निरंतर श्रद्धा भाव घटता जा रहा है। शायद यही वह कारण है कि आज समाज में अनायास मानवीय घटनाएं हो रही है। अप्रिय वातावरण बढ़ता जा रहा है। चरित्र हीनता बढ़ती जा रही है। भ्रष्टाचार और लूट घसीट बढ़ती जा रही है।

मैं यह कतई नहीं कहता कि इसके लिए पूरी तरह से समाज ही जिम्मेवार है। मैं यह भी नहीं कहता कि इसके लिए पूरी तरह राजनेता और सरकारें ही जिम्मेवार है। हां इतना जरूर कहना चाहूंगा जो सरकार सत्ता में रह करके शिक्षकों के मान-सम्मान के प्रति इस समाज को जागृत करने का काम करेगी और शिक्षक वर्गों को चरित्रवान समाज के निर्माण के लिए प्रोत्साहित करेगी तथा शिक्षा प्रणाली में वह वातावरण तैयार करेगी। वह सरकार वास्तव में अपने दायित्व का पालन करने वाली राजनीतिक शक्ति कहलाएगी और इतिहास के पन्नों में अपना नया अध्याय अंकित करेगी।

ठीक इसी तरह समाज को भी अपने दायित्व का निर्वहन करने के लिए गुरु की मर्यादा का सम्मान करने वाले भावबोध को पुनः अपने भीतर जागृत करना होगा तथा सेवा, सत्कार और सत्संग जैसी महत्वपूर्ण गुणों को अपने भीतर पुनः समाहित करना होगा।

परंतु इस बात से भी मैं कभी गुरेज नहीं करता इसके लिए एक सद चरित्रवान गुरु का होना भी अनिवार्य है।

“आज के वर्तमान वातावरण में गुरु ने भी अपना चरित्र इस कारण से बिगाड़ दिया है, क्योंकि वह अपने आप को एक शिक्षक मान बैठा है। मैं यहां स्पष्ट शब्दों में कहना चाहूंगा कि मैकाले की जो मंशा थी। आज पूरे शिक्षक वर्ग को उस मंशा से बाहर निकलने की जरूरत है।”

• राष्ट्र निर्माण का दायित्व हमारे हाथों में •

भले ही हम वेतनभोगी हो। परंतु राष्ट्र निर्माण का दायित्व हमारे हाथों में होने के कारण आज हमें अपने दायित्व का भी बोध होना चाहिए। हमे पुनः अपने आप को शिक्षा जगत में कुछ इस तरह से प्रतिस्थापित करना होगा की सत्ता और समाज दोनों ही पूर्व की भांति हमारे पद चिन्हों का अनुसरण करें और हमारे अनुगामी बने।

हमें सेवा, साधना, सत्संग और सद चरित्र को पुनः महत्व देने की जरूरत है। एक शिक्षक के जीवन में यह गुण होना अति अनिवार्य है। यही गुण वह अपने शिष्यों में जब परिवर्तित करता है तो एक समृद्ध समाज का निर्माण होता है।

भारत की यही गुरु शिष्य परंपरा भारत को विश्व गुरु के पद पर जब विराजमान कर सकती है तो क्या वर्तमान समाज में हम सबको भारत को पुनः उस उत्कर्ष तक ले जाने के लिए कटिबद्ध नहीं हो जाना चाहिए ?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — राष्ट्र निर्माण का दायित्व हमारे हाथों में होने के कारण आज हमें अपने दायित्व का भी बोध होना चाहिए। हमे पुनः अपने आप को शिक्षा जगत में कुछ इस तरह से प्रतिस्थापित करना होगा की सत्ता और समाज दोनों ही पूर्व की भांति हमारे पद चिन्हों का अनुसरण करें और हमारे अनुगामी बने। हमें सेवा, साधना, सत्संग और सद चरित्र को पुनः महत्व देने की जरूरत है। एक शिक्षक के जीवन में यह गुण होना अति अनिवार्य है। यही गुण वह अपने शिष्यों में जब परिवर्तित करता है तो एक समृद्ध समाज का निर्माण होता है। भारत की यही गुरु शिष्य परंपरा भारत को विश्व गुरु के पद पर जब विराजमान कर सकती है तो क्या वर्तमान समाज में हम सबको भारत को पुनः उस उत्कर्ष तक ले जाने के लिए कटिबद्ध नहीं हो जाना चाहिए ?

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यह लेख (गुरु, गुण और शिक्षा प्रणाली।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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पर्वत है कहता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पर्वत है कहता। ♦

मैं क्यों न ढहूँ? मुझे बताओ, सब कुछ कुरेदा मुझसे तुमने।
अंधा विकास कर चले हो तुम, सुरंग भी छेदा मुझसे तुमने।

मैं रोया या हंसा, तुम्हे क्या?, तुम्हे तो विकास करवाना था।
मैं कमजोर होऊं, तुम्हे क्या?, तुम्हे तो मुझे बस कटवाना था।

बड़ी बड़ी मशीनें, प्रोजेक्ट व सड़के, काट के मुझे बनवाए हैं।
दोहन करके मेरा ही तुमने, ये ईंट- गैरों के महल बनवाए हैं।

आज मैं ढहा हूं, बादल फट बहा हूं, यह मेरी भी मजबूरी है।
प्रहार बरसात का झेलने खातिर, मुझमें मजबूती जरुरी है।

मुझसे तुमने, बहुत कुछ लुटा, मेरे लिए कुछ किया है क्या?
मैंने तुमको सदियों से दिया, मुझे तुमने कुछ दिया है क्या?

क्यों कोस रहे हैं सरकारों को? बादल फटने और बाढ़ों को?
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे, सुधारों अपने व्यवहारों को।

पर्वत है कहता, “मैं कुदरत का बेटा’, मेरी किसने मानी है?
नुकसान पहुंचा कर मुझको पगलो, तुम्हारी ही तो हानि है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — प्राचीन काल से ही पर्वत का हम सभी के जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है, पर्वत ताज़ा पानी, स्वच्छ ऊर्जा, भोजन और मनोरंजन के साधन मुहैया कराते हैं। दुनिया भर में पहाड़ी इलाक़ों में रहने वाले समुदायों की युवा आबादी का भविष्य उज्ज्वल बनाने के लिए शिक्षा के प्रसार, प्रशिक्षण, रोज़गार और आधुनिकतम तकनीक मुहैया कराने से बड़ी मदद मिल सकती है। पहाड़ कैसे उपयोगी होते हैं? इस बात को बारीकी से समझने की जरूरत है हम सभी को, पर्वत जल के भण्डार हैं । पहाड़ों के पानी का उपयोग सिंचाई और पनबिजली उत्पादन के लिए भी किया जाता है। नदी घाटियाँ और पर्वत छतें फसलों की खेती के लिए आदर्श हैं। पहाड़ों में वनस्पतियों और जीवों की एक समृद्ध विविधता है। इनके साथ खिलवाड़ करना, इंसान को प्राकृतिक आपदा के रूप में झेलना पड़ता हैं। अब भी समय है संभल जायें और इनका अंधाधुन गलत तरीके से दोहन करना छोड़ दे, वर्ना परिणाम और भी भयानक होगा।

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यह कविता (पर्वत है कहता।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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क्यों कन्हैया?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ क्यों कन्हैया? ♦

त्रिलोकी नाथ तुम, सकल अधिष्ठाता,
चराचर जगत के बस तुम ही रचयिया।
जन्म से निर्वाण पर्यन्त कष्ट ही कष्ट,
अपने भाग्य में क्यों लिखे कन्हैया?

जन्म कारागार में, यमुना की जलधारा में
आकंठ पिता को क्यों था डुबाया?
कागासुर कभी शकटासुर गोकुल में,
पूतना जैसा हर संकट क्यों आया?

महिमा मंडन या दुख संसार की परिणति,
उद्देश्य जनार्दन था तुमने क्या ठाना?
या कुछ न था तुम्हारे भी हाथों में,
पर लोगों ने तो आपको ही प्रभु है माना।

वे रास लीला फिर विरह की पीड़ा,
राज पाया पर सुख कहां भोगा?
कंस, जरासंध फिर काल्यावन चढ़ाई,
कदम कदम का कौतुक, अब क्या होगा?

महाभारत फिर निज कुल का खात्मा,
अंत समाधि में बहेलिए के हाथों हुआ निर्वाण।
कुल की स्त्रियां जब भिलों ने सताई,
तब क्यों बचाने न आए तुम ओ भगवान?

क्यों न जीता अर्जुन तब भीलों से,
महाभारत विजयी धनुर्धर सखा महान?
अर्जुन वही था, वही गांडीव था,
फिर क्यों न चले, तब वे धनुष – बाण?

सवाल कई हैं जहन में आज भी,
होनी बड़ी है कि आप प्रभु, या फिर इंसान?
विधि का लेखा ही सबसे बड़ा है क्या?
या तुम सबसे बड़ा भी, है कोई और ही भगवान?

यह निश्चित है कि सृष्टि संचालक,
नियंता रचयिता है कोई न कोई जरूर।
जो हम ही होते स्वयंभू स्वयं तो,
क्यों होते फिर प्रकृति के हाथों यूं मजबूर?

याद करो प्रभु सहस्र विवाह अपने,
फिर भी प्रेम को तुमने क्यों न पाया?
राधा चाह कर भी क्यों एक न हो सकी?
यह सारा खेल तो हमारी समझ में न आया।

रामावतार में आकाश – पाताल खंगाले,
रावण से भिड़ कर भी सीता को पाया।
यहां तो हजारों विवाह कारा कर भी अपने,
आखिर, राधा रानी को क्यों था सताया?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कृष्ण कन्हैया से पूछा है की आखिर क्यों कन्हैया? तुमने अपने जीवन में जन्म से लेकर अंतिम समधी तक दुःख ही दुःख लिखे ? जन्म हुआ कारागार में, उसी समय तुम्हारे कारण पिता को यमुना में उतरना पड़ा, यमुना पार कर वृन्दावन तुम्हें नन्द व यशोदा जी के घर पर छोड़ना पड़ा। कागासुर तो कभी शकटासुर गोकुल में, पूतना जैसी राक्षसी और भी अनेकानेक का सामना करना पड़ा। मैं इसे क्या समझू ये भी तुम्हारी लीला थी या फिर कुछ न था तुम्हारे भी हाथों में, पर लोगों ने तो आपको ही प्रभु है माना। राज्यपाट भी मिला तो उसका भी सुख अच्छे से भोग न पाए अंतिम समय में तक कंस, जरासंध फिर काल्यावन चढ़ाई, कदम कदम का कौतुक, की अब क्या होगा? इस तरह के सवाल कई हैं जहन में आज भी, “होनी बड़ी है कि आप प्रभु, या फिर इंसान?”

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यह कविता (क्यों कन्हैया?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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यह कैसी टीस।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ यह कैसी टीस। ♦

बिन शोलों के चुभन सी होती है,
बिन जख्मों के ही होती है पीड़ा।
क्षण – क्षण दायित्व का बोझ झकझोडे,
बिन उठाए कोई दायित्व का बीड़ा।

तमाम उम्र के सिलसिले में, अब क्यों,
हर भाव गरियाने से लगते हैं?
कदम – कदम पर मृग तृष्णा से,
क्यों, हर सपने ठगाने से लगते हैं?

जब था न कुछ पास इस जिंदगी के,
तब हम कितने बेखबर, मालामाल थे?
आज होकर पास भी अपने सब कुछ,
क्यों लग रहे हैं, आप हम कंगाल से?

कुछ नहीं है यह जीवन उमंग भरा,
जहां कभी अपनों की ही तरक्की की रीस है।
जीवन की इस संध्या में आज अब,
छूटती हर शय की यह कैसी टीस है?

देह की दहलीज अब सूनी सी रहती है,
क्यों आता न अब कोई बुलाने वाला?
शेष रह गया है आज भी भाव क्यों?
हृदय के कोने में वह सताने वाला।

शिथिल श्वास अब हो रही है,
उष्मित भावों की दरकार कहां?
जीवन नदी के कूलों पर खोज रहा हूं,
क्यों, आते न मिलने सरकार यहां?

अनगिनत सवाल है,
घना बवाल है,
यह माया जाल है,
बड़ा कमाल है,
बस जी रहा हूं मृत्यु की प्रतीक्षा में।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आखिर क्यों हर किसी को अपने सगे सम्बन्धी व ज्ञात व्यक्ति की तरक्की देखीं नहीं जाती, सभी एक दूसरे का टांग खींचने में लगे रहते हैं। आखिर कहां खो गया ओ सादगी, प्रेम, विश्वास, सत्यता, प्यार, समर्पण व त्याग जिससे सभी के जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ थी। क्यों आखिर मन में ये किस तरह की टीस हैं जो सुकून से जीने नहीं देती। आखिर क्यों ? सभी एक दूजे के साथ दुश्मनों जैसी व्‍यवहार करते है, वह प्रेम शालीनता कहां खो गया? क्यों एक दूसरे का टांग खींचने में लगे रहते हैं? क्यों इंसान इतना ऊब जाता है की मृत्यु का इंतज़ार करने लगता हैं?

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यह कविता (यह कैसी टीस।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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आजादी का अमृत महोत्सव।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आजादी का अमृत महोत्सव। ♦

राष्ट्रधर्म का गौरव प्यारा, आज हम हैं देखो बढ़ाने चले।
आजादी का प्रतीक तिरंगा, आज घर-घर में हैं फहराने चले।

उत्तुंग शिखर हिमालय से लेकर, हिन्द महासागर तक फैला है।
अरुणाचल से गुजरात कच्छ तक, यह भारत देश ही छैला है।

दसों दिशाएं आलोकित जिसकी, है वीरता जिसके जर्रे- जर्रे में।
पुरुषार्थ छिपा है राष्ट्रप्रेम का, यहां जीवन याप के हर ढर्रे में।

तिरंगा है यह खिलौना नहीं, हर रंग का लहदा भाव निराला है ।
शौर्य, वीरता, शान्ति, समृद्धि, मध्य चक्र प्रतीक समय का डाला है।

वीर बलिदानियों की कुर्बानी की कहानी, तिरंगा याद दिलाता है।
इतिहास पढ़ा देता है वह बंदा, जो घर – घर तिरंगा फहराता है।

आजादी के दीवानों ने प्रणाहुतियों से, यज्ञ को सफल बनाया था ।
गुलामी की बेडौल जंजीरों से, भारत को आजाद करवाया था।

इसे संभालना, जश्न मनाना, अब तो हमारे ही हिस्से में आया है।
मिलजुल कर देश को बढ़ाने का, गुर पुरखों ने हमें सिखाया है।

आजादी के अमृत महोत्सव की, पावन बेला भारत में आई है।
बच्चे से बूढ़े, अमीर – गरीब ने, यह बेला सबने ही तो मनाई हैं।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — तिरंगा है यह खिलौना नहीं, हर रंग का लहदा भाव निराला है । शौर्य, वीरता, शान्ति, समृद्धि, मध्य चक्र प्रतीक समय का डाला है। यहां के बच्चों के अंदर जन्म से ही वीर रस भरा होता है, जिसे बस निखारने की जरूरत होती हैं। भारत का शौर्य अद्भुत व बहुत ही अनुपम हैं, दुश्मन का संस्कार भी करें अदब से गर तोड़े दम। पीठ पर कभी भी न करें वार यहाँ के वीर जवान। यह धरती है उन वीरों की जो देश पर होते है सदैव ही कुर्बान। तहे दिल से नमन है माँ भारती के हर उन शूरवीर सपूतों को जिनके बलिदान के बदले हमे आज़ादी मिली। जो आये थे यहां व्यापार करने, व्यापार के बहाने हमे अपना गुलाम बनाकर खूब मनमानी किया। उन्होंने हम पर बहुत ही निर्दयता पूर्वक अत्याचार किया, और हमें खूब लुटा। हमें कभी भी नहीं भूलना चाहिए उन शूरवीर सपूतों के बलिदान को, जिनके बलिदान के बदले हमे आज़ादी मिली। शत-शत नमन है उन वीर सपूतों की जननी को जिन्होंने अपने लाल को माँ भारती की रक्षा के लिए ख़ुशी – ख़ुशी समर्पित किया। जय हिन्द – जय भारत।

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यह कविता (आजादी का अमृत महोत्सव।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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