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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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kmsra

ट्रेन का इंतजार।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-KMS

ϒ ट्रेन का इंतजार। ϒ

कितना बुरा होता है।
इस ट्रेन का इंतज़ार।

पहले तो घर से निकलने कि जल्दी।
ऊपर से ट्रेन के छूट जाने का डर।

पहुच जाता हूँ जल्दी-जल्दी में।
मै वक़्त से पहले।

और गहरी साँस लेता हूँ।
अपनी घड़ी को तकता हूँ।

अभी कुछ वक़्त है बाकी।
नहीं निकला मेरा साथी।

फिर होती है पूछताछ।
कहाँ पे है मेरा संगी, कहाँ पे है मेरा साथी।

पता चलता है फिर मुझको।
उसे तो देर है बहुत।

मै अपने वक़्त से पहले।
वो अपने वक़्त से देर है बहुत।

किस तरहं होता है मेरे वक़्त का तिरस्कार।
और कितना बुरा होता है इस ट्रेन का इंतज़ार।

फिर होती है वहां से…
वक़्त बिताने कि शुरुआत।

और दिखते है मुझको।
चलते फिरते नये-नये किरदार।

किसी को जल्दी है बहुत।
तो कोई लेट हो गया।

कोई खिलखिला रहा है यहाँ।
कोई मायूस हो गया।

किसी का आने वाला है कोई।
किसी का जाने वाला है।

मै देखता हूँ हर चेहरा।
मुझे अपना सा लगता है।

मेरी ज़िन्दगी के हर पहलू मुझे आते है नज़र।

मै खुद को याद करता हूँ।
फिर उनको देखता हूँ मै।

कभी मुझे भी जल्दी थी।
कभी तो मै भी लेट था।

कभी मायूस भी था मै।
कभी खिलखिला भी रहा था मै।

मेरा भी कोई आया था कभी।
कोई गया भी था।

ये चेहरे है अलग-अलग।
मुझे अपने से लगते है।

ये चलते-फिरते…
मुझे मेरे ही किरदार लगते है॥

©- मनीष किन्द्रा। – गाज़ियाबाद, यू॰ पी॰ ∇

Manish Kindra-kmsraj51

हम दिल से आभारी हैं “मनीष किन्द्रा” जी के प्रेरणादायक हिन्दी कविता साझा करने के लिए।

पढ़ें – विमल गांधी जी कि शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह।

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Krishna Mohan Singh(KMS)
Head Editor, Founder & CEO
of,,  http://kmsraj51.com/

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

 ~Kmsraj51

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

∗ निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

kmsraj51- C Y M T

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

~KMSRAJ51

 

____Copyright © 2013 – 2016 Kmsraj51.com  All Rights Reserved.____

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शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-KMS

ϒ शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार। ϒ

प्रिय मित्रों,

यह Story महाकवि कालिदास जी के जीवन से संबधित हैं।

Kalidas-kmsraj51
महाकवि कालिदास जी।

महाकवि कालिदास जी के कंठ में साक्षात सरस्वती जी का वास था। शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था। अपार यश, प्रतिष्ठा और मान सम्मान पाकर एक बार कालिदास जी को अपनी विद्वत्ता का बहुत घमंड हो गया।

उन्हें लगा कि उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है और अब सीखने को कुछ भी बाकी नहीं बचा। उनसे बड़ा ज्ञानी संसार में कोई दूसरा नहीं। एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ का निमंत्रण पाकर कालिदास जी विक्रमादित्य से अनुमति लेकर अपने घोड़े पर रवाना हुए।

गर्मी का मौसम था, धूप काफी तेज़ और लगातार यात्रा से कालिदास जी को प्यास लग आई। थोङी तलाश करने पर उन्हें एक टूटी-फूटी झोपड़ी दिखाई दी। पानी की आशा में वह उस ओर बढ चले। झोपड़ी के सामने एक कुआं भी था।

कालिदास जी ने सोचा कि अगर कोई झोपड़ी में हो तो उससे पानी देने का अनुरोध किया जाए। उसी समय झोपड़ी से एक छोटी बच्ची मटका लेकर निकली। बच्ची ने कुएं से पानी भरा और वहां से जाने लगी।

तभी कालिदास जी उसके पास जाकर बोले – बालिके बहुत प्यास लगी है ज़रा पानी पिला दे ….. बच्ची ने पूछा – आप कौन हैं? मैं आपको जानती भी नहीं, पहले अपना परिचय दीजिए। कालिदास जी को लगा कि मुझे कौन नहीं जानता भला, मुझे परिचय देने की क्या आवश्यकता?

फिर भी प्यास से बेहाल थे तो बोले – बालिके अभी तुम छोटी हो, इसलिए मुझे नहीं जानती। घर में कोई बड़ा हो तो उसको भेजो। वह मुझे देखते ही पहचान लेगा। मेरा बहुत नाम और सम्मान है दूर – दूर तक। मैं बहुत विद्वान व्यक्ति हूँ।

कालिदास जी के बड़बोलेपन और घमंड भरे वचनों से अप्रभावित बालिका बोली – आप असत्य कह रहे हैं। संसार में सिर्फ दो ही बलवान हैं और उन दोनों को मैं जानती हूं। अपनी प्यास बुझाना चाहते हैं तो उन दोनों का नाम बाताएं?

थोङा सोचकर कालिदास जी बोले – मुझे नहीं पता, तुम ही बता दो मगर मुझे पानी पिला दो। मेरा गला सूख रहा है। बालिका बोली – दो बलवान हैं ‘अन्न’ और ‘जल’। भूख और प्यास में इतनी शक्ति है कि बड़े से बड़े बलवान को भी झुका दें। देखिए प्यास ने आपकी क्या हालत बना दी है।

कलिदास जी चकित रह गए। लड़की का तर्क अकाट्य था। बड़े – बड़े विद्वानों को पराजित कर चुके कालिदास जी एक बच्ची के सामने निरुत्तर खङे थे। बालिका ने पुन: पूछा – सत्य बताएं, कौन हैं आप? वह चलने की तैयारी में थी।

कालिदास जी थोड़ा नम्र होकर बोले – बालिके, मैं बटोही हूँ….. मुस्कुराते हुए बच्ची बोली – आप अभी भी झूठ बोल रहे हैं। संसार में दो ही बटोही हैं। उन दोनों को मैं जानती हूं, बताइए वे दोनों कौन हैं? तेज़ प्यास ने पहले ही कालिदास जी की बुद्धि क्षीण कर दी थी पर लाचार होकर उन्होंने फिर से अनभिज्ञता व्यक्त कर दी।

बच्ची बोली – आप स्वयं को बङा विद्वान बता रहे हैं जी और ये भी नहीं जानते? एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना थके जाने वाला बटोही कहलाता है। बटोही दो ही हैं, एक चंद्रमा और दूसरा सूर्य जो बिना थके चलते रहते हैं। आप तो थक गए हैं। भूख प्यास से बेदम हैं। आप कैसे बटोही हो सकते हैं?

इतना कहकर बालिका ने पानी से भरा मटका उठाया और झोपड़ी के भीतर चली गई। अब तो कालिदास जी और भी दुखी हो गए। इतने अपमानित वे जीवन में कभी नहीं हुए। प्यास से शरीर की शक्ति घट रही थी। दिमाग़ चकरा रहा था। उन्होंने आशा से झोपड़ी की तरफ़ देखा…. तभी अंदर से एक वृद्ध स्त्री निकली…..

उसके हाथ में खाली मटका था। वह कुएं से पानी भरने लगी। अब तक काफी विनम्र हो चुके कालिदास जी बोले – माते पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा।

वृद्ध स्त्री बोली – बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं। अपना परिचय दो। मैं अवश्य पानी पिला दूंगी। कालिदास जी ने कहा – मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें माते। स्त्री बोली – तुम मेहमान कैसे हो सकते हो? संसार में दो ही मेहमान हैं। पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ कौन हो तुम?

अब तक के सारे तर्क से पराजित और हताश कालिदास जी बोले – मैं सहनशील हूँ। अब आप पानी पिला दें। स्त्री ने कहा – नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी – पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है।

दूसरे, पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी ओ मीठे फल ही देते हैं। तुम सहनशील नहीं हाे, सच बताओ तुम कौन हो? कालिदास जी लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क – वितर्क से झल्लाकर बोले – मैं हठी हूँ।

वृद्ध स्त्री बोली – फिर असत्य, हठी तो दो ही हैं – पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार – बार निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप? पूरी तरह से अपमानित और पराजित हो चुके कालिदास जी ने कहा ….. फिर तो मैं मूर्ख ही हूँ।

नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो, मूर्ख दो ही हैं। पहला अयोग्य राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है।

कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास जी ….. वृद्ध स्त्री के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे। वृद्ध स्त्री ने कहा – उठो वत्स… आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती जी वहां खड़ी थी। कालिदास जी पुन: नतमस्तक हो गए।

माता ने कहा – शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार। तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग(लीळा) करना पड़ा।

कालिदास जी को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।

दोस्तों,

ज़िन्दगी में कभी भी किसी भी बात का अहंकार न करें। सदैव विनम्रता व धैर्य के साथ हर कार्य करें।

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बच्चों में अच्छे संस्कार का बीज रोपण।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ बच्चों में अच्छे संस्कार का बीज रोपण। ϒ

shantivan-KMSRAJ51

बच्चो में अच्छे संस्कार 16 वर्ष की आयु तक ही डाले जा सकते है। बचपन से ही बच्चो में जो संस्कार माता पिता के द्वारा दिये जाते है, वे ही आगे जाकर उनके भावी जीवन की उन्नती अथवा अवनीति के कारण बनते है।

हमारे बड़े-बुजुर्ग, संत-महात्मा कहते है की जैसा बीज होगा, वैसा ही वृक्ष होगा, तथा वैसा ही उसका फल होगा।

बचपन से ही अच्छे संस्कारो से संस्कारीत बालक युवावस्था में शुभ कार्यो मेें प्रवृत होकर माता-पिता की प्रतिष्ठा एवं स्वयं के सुख का कारण बनता है।

परंतु यदि बचपन से कुसंगत में रहकर कुसंस्कारो का बीजारोपण यदि बालक के जीवन में हो गया तो अपने माता-पिता के साथ ही वह स्वयं अपमानित जीवन जीकर अपने को पतन एवं दुःख की आग में झोक देगा।

श्रीमद्भागवत कथा में गौकर्ण और धुंनकारी की कथा आती है जिसके अनुसार गौकर्ण बचपन से अच्छे संस्कारो में पला था जिसके फलस्वरूप उसमें अपने उद्धार के साथ ही दूसरो की मुक्ती का मार्ग प्रशस्त किया जबकि धुंधुकारी बचपन से ही कुसंगत के कारण अधोगति को प्राप्त हुआ जिसका उद्धार भी गौकर्ण ने किया।

हमारी प्राचीन शिक्षा अधिक मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर निर्भर थी। बच्चों को गुरु, माता-पिता, बड़े व्यक्तियों, धर्म, धार्मिक कार्यों में रुचि उत्पन्न की जाती थी। उनके प्रति पूजनीय भाव प्रारम्भ से ही जोड़ दिये जाते थे, धार्मिक अंत:वृत्ति होने से बड़ा होने पर भी भारतीय भोगवाद की ओर प्रवृत्त न होते थे।

ब्रह्मचर्य का संयम सदैव उन्हें संयमित किया करते थे, पवित्र भाेजन, पवित्र भजन, पूजा, यज्ञ, चिंतन, अध्ययन, मनन आदि से जो गुप्त मन निर्मित होता था, वह ….. पवित्रतम भावनाओं का प्रतीक होता था।

घर का वातावरण भी उच्च नैतिकता से परिपूर्ण होता था, जिससे एक पीढ़ी के पश्चात् दूसरी पीढ़ी उन्हीं संस्कारों को निरन्तर विकसित करती चली आती थी।

जब हमारी भावनाओं में नैतिकता, श्रेष्ठता, पवित्रता का बीज नहीं डाला जायगा, तो किस प्रकार उत्तम चरित्र वाले मानव तथा समाज की या देश की सृष्टि हो सकती है?

आवश्यकता इस बात की है कि पहले माता-पिता स्वयं भावनाओं की शिक्षा की उपयोगिता समझें; स्वयं आदर की भावनाओं को संस्कार रूप में शिशु मन पर स्थापित करें।

वातावरण का भारी महत्व है, वातावरण का अर्थ व्यापक है। घर, तथा संगति तो यह महत्वपूर्ण है हीं, घर की पुस्तकें, दीवारों के चित्र, हमारे गाने, भजन, इत्यादि भी बड़े महत्व के हैं। यदि इन्हीं से उन्नति तथा सुधार की भावना में चलाई जायँ, तो आचार व्यवहार के क्षेत्र में क्रान्ति हो सकती है।

अच्छे-अच्छे भजन, पवित्र कर्त्तव्य की शिक्षा देने वाली कहानियाँ, उत्तमोत्तम व्यवहार द्वारा नये राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण हो सकता है।

बचपन से ही शिशु के मन पर बड़ों के प्रति आदर प्रतिष्ठा सम्मान, छोटों के प्रति स्नेह, दया, सहानुभूति, सहकारिता, बराबर वालों से मैत्री, प्रेम, संगठन सहयोग की भावनाएं बच्चों के गुप्त मन में उत्पन्न करनी चाहिये।

आचरण, आदर्श, तथा उचित निर्देशन से यह कार्य माता-पिता, अध्यापक सभी कर सकते हैं।

मान लीजिये, एक बच्चा सिनेमा का एक भद्दा गाना अनजाने ही कुसंगति से सुनकर याद कर लेता है। वह उसका अर्थ नहीं समझता, किन्तु उसे पुन: पुन: दोहराता है, बड़ा होकर वह उसका अर्थ समझने लगता है और जीवन भर उससे प्रभावित हुये बिना नहीं रहता।

यही बच्चा यदि कोई राष्ट्रप्रेम का गीत, उत्तम भजन, पवित्र विचार वाली उक्ति अनजाने में सीख ले, (जो माता-पिता सतत् अभ्यास, पुनरावृत्ति से सिखा सकते हैं,) तो वह बड़ा होकर निरन्तर उच्च मार्ग की ओर ही अग्रसर होगा।

Note : Post inspired by – Pujya Jaya Kishori Ji.

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शाश्वत साथी।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ शाश्वत साथी। ϒ

यात्रियों से खचाखच भरी ट्रेन में टी.टी.ई. को एक पुराना फटा सा पर्स मिला। उसने पर्स को खोलकर यह पता लगाने की कोशिश की कि वह किसका है। लेकिन पर्स में ऐसा कुछ नहीं था जिससे कोई सुराग मिल सके। पर्स में कुछ पैसे और भगवान श्रीकृष्ण की फोटो थी। फिर उस
टी.टी.ई. ने हवा में पर्स हिलाते हुए पूछा – यह किसका पर्स है?

एक बूढ़ा यात्री बोला – यह मेरा पर्स है। इसे कृपया मुझे दे दें।

टी.टी.ई. ने कहा – तुम्हें यह साबित करना होगा कि यह पर्स तुम्हारा ही है।

केवल तभी मैं यह पर्स तुम्हें लौटा सकता हूं।

उस बूढ़े व्यक्ति ने दंतविहीन मुस्कान के साथ उत्तर दिया – इसमें भगवान श्रीकृष्ण की फोटो है।

टी.टी.ई. ने कहा – यह कोई ठोस सबूत नहीं है। किसी भी व्यक्ति के पर्स में भगवान श्रीकृष्ण की फोटो हो सकती है।

इसमें क्या खास बात है? पर्स में तुम्हारी फोटो क्यों नहीं है?

बूढ़ा व्यक्ति ठंडी गहरी सांस भरते हुए बोला – मैं तुम्हें बताता हूँ कि मेरा फोटो इस पर्स में क्यों नहीं है। जब मैं स्कूल में पढ़ रहा था, तब ये पर्स मेरे पिता ने मुझे दिया था। उस समय मुझे जेबखर्च के रूप में कुछ पैसे मिलते थे। उस समय मैंने पर्स में अपने माता – पिता की फोटो रखी हुयी थी।

जब मैं किशोर अवस्था में पहुंचा, मै अपनी कद – काठी पर मोहित था। मैंने पर्स में से माता – पिता की फोटो हटाकर अपनी फोटो लगा ली। मैं अपने सुंदर चेहरे और काले घने बालों को देखकर खुश हुआ करता था।

कुछ साल बाद मेरी शादी हो गयी। मेरी पत्नी बहुत सुंदर थी और मैं उससे बहुत प्रेम करता था। मैंने पर्स में से अपनी फोटो हटाकर उसकी लगा ली। मैं घंटों उसके सुंदर चेहरे को निहारा करता।

जब मेरी पहली संतान का जन्म हुआ, तब मेरे जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ। मैं अपने बच्चे के साथ खेलने के लिए काम पर कम समय खर्च करने लगा, और मैं देर से काम पर जाता और जल्दी लौट आता। कहने की बात नहीं, अब मेरे पर्स में मेरे बच्चे की फोटो आ गयी थी।

बूढ़े व्यक्ति ने डबडबाती आँखों के साथ बोलना जारी रखा – कई वर्ष पहले मेरे माता – पिता का स्वर्गवास हो गया। पिछले वर्ष मेरी पत्नी भी मेरा साथ छोड़ गयी।

मेरा इकलौता पुत्र अपने परिवार में व्यस्त है। उसके पास मेरी देखभाल का वक्त नहीं है। जिसे मैंने अपने जिगर के टुकड़े की तरह पाला था, वह अब मुझसे बहुत दूर हो चुका है। अब मैंने भगवान कृष्ण की फोटो पर्स में लगा ली है। अब जाकर मुझे एहसास हुआ है कि श्रीकृष्ण ही मेरे शाश्वत साथी हैं। वे हमेशा मेरे साथ रहेंगे। काश मुझे पहले ही यह एहसास हो गया होता। 

जैसा प्रेम मैंने अपने परिवार से किया, वैसा प्रेम यदि मैंने ईश्वर के साथ किया होता तो आज मैं इतना अकेला नहीं होता।

टी.टी.ई. ने उस बूढ़े व्यक्ति को पर्स लौटा दिया। अगले स्टेशन पर ट्रेन के रुकते ही वह टी.टी.ई. प्लेटफार्म पर बने बुकस्टाल पर पहुंचा और विक्रेता से बोला – क्या तुम्हारे पास भगवान की कोई फोटो है? मुझे अपने पर्स में रखने के लिए चाहिए।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

∗ निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

~KMSRAJ51

 

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भाई से भाई का सच्चा स्नेह।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ भाई से भाई का सच्चा स्नेह। ϒ

BTA-KMSRAJ51

सेठ धर्मदास को फल खाने का बहुत शौक था। वो रोज तरह – तरह के फल खरीदते थे। एक दिन वो संतरे खरीद रहे थे कि अचानक खरीदते -खरीदते, उनका मन किया और उन्होंने एक फांक खायी, खाते ही वो दंग रह गये और उन्होंने विक्रेता से पूछा;???

क्या ये संतर विदेश से आये हैं? इतने स्वादिष्ट संतरे मैने कभी नहीं खाये।

विक्रेता ने बताया कि ये संतरे इसी शहर के हैं, और आज एक बूढा आदमी उसे बेच कर गया है।

सेठ जी, स्वाद का रहस्य जानने के लिए बूढ़े के पास गये और उनसे पूछा कि आपके संतरे के स्वाद का रहस्य क्या हैं?

बूढ़े व्यक्ति ने कहा: “भाई के प्रति भाई का प्यार।”

सेठ जी ने कहा वो कैसे मैं समझा नहीं।

तब बूढ़े व्यक्ति ने कहा कि ये पेड़ उसकी माँ ने लगाया था। उसके जन्म से पहले। जब माँ इस पेड़ में रोज पानी डालती थी तब मैं माँ से पूछता था।

“माँ तुम इस पेड़ में रोज पानी लगाती हो, इसका कितना ध्यान रखती हो, ये कौन है? इससे हमको क्या फायदा होगा?

तब माँ ने कहा बेटा – ये तेरा बड़ा भाई है। तू हमेशा इसका ख्याल रखना, इसको कभी ना काटना, ये तेरा साथ तब भी देगा जब तुझे अपने ठुकरा देंगे।”

तब से मुझे भी इस से प्यार हो गया और मैने इसे अपना बड़ा भाई माना और अपनी हर खुशी, हर गम इसके साथ साझा किया। समय बीतता चला गया, मैं अमेरिका चला गया और बहुत पैसा वाला बन गया, माँ और अपने इस भाई को भूल गया ।

मेरे दो बच्चे हुए, धीरे – धीरे समय ने चक्र चलाया, मुझे बिजनेस में घाटा हुआ, मेरे सब मित्र, पत्नी, बच्चे मेरा साथ छोड़ गये।

सब अपने – अपने शेयर बेच कर अलग हो गए।

मैंने अपनी सारी संपत्ति बेच कर कर्ज पटाया।

मैं अपनों के बेगानेपन, अकेलेपन, निराशा, हताशा से टूट गया।

फिर मुझे बचपन में माता की बात याद आई, मेरे पास यहाँ Return आने लायक पैसे बचे थे।

फिर मैं अपने इस टूटे – फूटे घर वापस आया, आते ही मैं अपने इस भाई से मिलकर खूब रोया। फिर मैंने इसकी देखरेख की और आज ये अपने छोटे, बूढ़े भाई को सहारा दे रहा है।

मेरे प्रति जो इसके अंदर प्यार है, वो इसके फलों में स्वाद बनकर आता है। मेरा ये भाई आज भी मेरे साथ खड़ा है।

सेठ जी ने मुड़कर देखा तो पेड़ स्वीकृति में हिल रहा था ।

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काैन दोस्त व काैन दुश्मन।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ काैन दोस्त व काैन दुश्मन। ϒ

एक बार एक छोटी चिड़िया सर्दी में खाने की तलाश में उड़ कर जा रही थी, ठंड इतनी ज्यादा थी कि उससे ठंड सहन नही हुई और खून जम जाने से वो वहीं पर एक मैदान में गिर गयी…..

वहां पर एक गाय ने आकर उसके ऊपर गोबर कर दिया। गोबर के नीचे दबने के बाद उस चिड़िया को एहसास हुआ की उसे दरअसल उस गोबर के ढेर में गर्मी मिल रही थी। लगातार गर्माहट के एहसास ने उस छोटी चिड़िया को सुकून से भर दिया और उसने गाना गाना शुरू कर दिया।

वहां से निकल रही एक बिल्ली ने उस गाने की आवाज़ सुनी और देखने लगी की ये आवाज़ कहाँ से आ रही है। ….. थोड़ी देर बाद उसे एहसास हुआ की ये आवाज़ गोबर के ढेर के अंदर से आ रही है, उसने गोबर का ढेर खोदा और उस चिड़िया को बाहर निकाला और उसे खा गयी।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि…..

“आपके ऊपर गंदगी फेंकने वाला हर इंसान आपका दुश्मन नहीं होता।
और
आपको उस गंदगी में से बाहर निकालने वाला हर इंसान आपका दोस्त नहीं होता।“

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

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समान बल का प्रयोग।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-KMS

ϒ समान बल का प्रयोग। ϒ

UTSF-KMSRAJ51

गंगा तट पर एक संत अपने शिष्याें काे शिक्षा दे रहे थे, तभी एक शिष्य ने पूछा, “गुरुजी, यदि हम कुछ नया, कुछ अच्छा करना चाहते है, लेकिन समाज उसका विराेध करता है ताे हमे क्या करना चाहिए?

गुरुजी ने कुछ साेचा और बाेले “इस प्रश्न का उत्तर मैं कल दूंगा।”

अगले दिन जब सभी शिष्य नदी के तट पर एकत्रित हुए ताे गुरुजी बाेले, ताे आज हम एक प्रयोग करेंगे….. इन तीन मछली पकड़ने वाली डंडियाें काे देखाे, ये एक ही लकड़ी से बनी हैं और बिल्कुल एक समान हैं।”

उसके बाद गुरुजी ने उस शिष्य काे आगे बुलाया जिसने कल प्रश्न किया था। “पुत्र, ये लाे इस डंडी से मछली पकड़ाे।” ,गुरुजी ने निर्देश दिया। शिष्य ने डंडी से बंधे कांटे मे आंटा लगाया और पानी में डाल दिया। फाैरन ही एक बड़ी मछली कांटे में आ फंसी। जल्दी पूरी ताकत लगाकर बाहर की ओर खींचाे” गुरुजी बाेले।

शिष्य ने ऐसा ही किया, उधर मछली ने भी पूरी ताकत से भागने की काेशिश की। फलतः डंडी टूट गयी। “काेई बात नहीं; ये दूसरी डंडी लाे और पुनः प्रयास कराे।” गुरुजी बाेले। शिष्य ने फिर से मछली पकड़ने के लिए कांटा पानी में डाला।

इस बार जैसे ही मछली फंसी, गुरुजी बाेले, “आराम से एकदम हल्के हाथ से डंडी काे खींचाे।” शिष्य ने ऐसा ही किया, पर मछली ने इतनी ज़ाेर से झटका दिया कि डंडी हाथ से छूट गयी। गुरुजी ने कहा, “ओहहाे लगता है मछली बच निकली, चलाे इस आखिरी डंडी से एक बार फिर से प्रयत्न कराें।”

शिष्य ने फिर वही किया। पर इस बार जैसे ही मछली फंसी गुरुजी बाेले, “सावधान इस बार न अधिक ज़ाेर लगाओ न कम बस जितनी शक्ति से मछली खुद काे अंदर की ओर खींचे उतनी ही शक्ति से तुम डंडी काे बाहर की ओर खींचाे। कुछ ही देर में मछली थक जायेगी और तब तुम आसानी से उसे बाहर निकाल सकते हाे।” शिष्य ने ऐसा ही किया और इस बार मछली पकड़ मेें आ गयी।

“क्या समझे आप लाेग?” शिष्य गुरुजी ने बाेलना शुरु किया….. ये मछलियाँ उस समाज के समान हैं जाे आपके कुछ करने पर विराेध करता है। यदि आप इनके खिलाफ अधिक शक्ति का प्रयाेग करेंगे ताे आप टूट जायेंगे। यदि आप कम शक्ति का प्रयाेग करेंगे ताे भी वे आपकाे या आपकी याेजनाओं काे नष्ट कर देंगे। ….. लेकिन यदि आप उतने ही बल का प्रयाेग करेंगे जितने बल से वे आप का विराेध करते हैं ताे धीरे-धीरे वे थक जायेंगे….. हार मान लेंगे और तब आप जीत जायेंगे।

ताे प्रिय मित्रों,

इसलिए कुछ उचित करने में जब ये समाज आपका विराेध करे ताे समान बल प्रयाेग का सिद्धांत अपनाइये और अपने लक्ष्य काे प्राप्त कीजिये।

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हनुमान चालीसा में पहले से ही पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी घोषित हैं।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ हनुमान चालीसा में पहले से ही पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी घोषित हैं। ϒ

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित हनुमान चालीसा में सैकड़ों साल पहले ही सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी स्पष्ट हैं। इसमें तुलसीदासजी ने उस समय में ही बता दिया था कि सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी कितनी है।

♦ हनुमान चालीसा के इस दोहे में है सूर्य से पृथ्वी के बीच की दूरी। ♦

जुग (युग) सहस्त्र जोजन (योजन) पर भानु।

लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

इस दोहे का सरल अर्थ यह है कि हनुमानजी ने एक युग सहस्त्र योजन की दूरी पर स्थित भानु यानी सूर्य को मीठा फल समझकर खा लिया था।

ये गणित छिपा है हनुमान चालीसा के दोहे में।

हनुमानजी ने एक युग सहस्त्र योजन की दूरी पर स्थित भानु यानी सूर्य को मीठा फल समझकर खा लिया था।
एक युग = 12000 वर्ष
एक सहस्त्र = 1000
एक योजन = 8 मील
युग x सहस्त्र x योजन = पर भानु
12000 x 1000 x 8 मील = 96000000 मील
एक मील = 1.6 किमी
96000000 x 1.6 = 153600000 किमी
इस गणित के आधार गोस्वामी तुलसीदास जी ने प्राचीन समय में ही बता दिया था कि सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी लगभग 15 करोड़ किलोमीटर है।
हिंदू धर्म का प्राचीन नाम आदि सनातन देवी-देवता धर्म हैं। हिंदू धर्म(आदि सनातन देवी-देवता धर्म) के संस्थापक स्वयं ईश्वर हैं। हम सभी हिंदू आदि सनातन देवी-देवता धर्म के वंशज हैं। जब हममें दैवी गुण नही रहे तब अपने आपकाे हिंदू कहने लगे।
हमारे ग्रंथाें में हजारों साल पहले ही सभी ज्ञान, विज्ञान, विद्या, कौशल व शास्राें के बारे में स्पष्ट बता दिया गया था। जिसे आज का विज्ञान बता रहा हैं। आज का विज्ञान ताे अभी बच्चा हैं। हमारे ग्रंथाें काे चुराना और उसी के आधार पर खाेज करना यही है आज के विज्ञान का काम। आज के विज्ञान का आधार भी हमारे ग्रंथ ही हैं।
दुनिया का पहला धर्म है आदि सनातन देवी-देवता धर्म(हिंदू धर्म)। इस पृथ्वी पर मानव सभ्यता का शुरुआत ही आदि सनातन देवी-देवता धर्म(हिंदू धर्म) से हुआ हैं।
प्रिय मित्रों – आप सभी काे हिंदू धर्म के बारे में विस्तार से परिचय कराऊंगा अपने Next Book में जिसका शीर्षक हाेगा …..

Kmsraj51 की कलम से…..

* जल्द ही प्रकाशित पुस्तक *

(Coming soon published book)

“The Real Truth Behind Hindu Dharm” – “या”

“हिंदू धर्म पीछे की असली सच्चाई“

Krishna Mohan Singh(KMS) द्वारा लिखित book “हिंदू धर्म पीछे की असली सच्चाई” (The Real Truth Behind Hindu Dharm).

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Filed Under: 2016-Kmsraj51 की कलम से….., पवित्र 'सकारात्मक सोच' Tagged With: https://kmsraj51.com/, kms, kmsra, KMSRAJ, Kmsraj51, गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित हनुमान चालीसा, जुग (युग) सहस्त्र जोजन (योजन) पर भानु। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।, तुलसीदासजी, हनुमान चालीसा, हनुमान चालीसा - Hanuman Chalisa, हनुमान चालीसा में पहले से ही पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी घोषित हैं।

दिल तो हर पल साथ माँगता है – माता पिता का।

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ϒ दिल तो हर पल साथ माँगता है – माता पिता का। ϒ

माता-पिता से बढ़कर…
जग में कोई भगवान नहीं।

माता-पिता की कमी चीजों से…
कभी पूरी नहीं होती॥

दिल तो हर पल साथ माँगता है।
माता पिता का॥

जिसकी जगह कोई ले नहीं सकता।
उसके जैसा प्यार कोई दे नही सकता॥

क़िस्मत वाले होते है वो लोग जिनके…
सर पर हाथ है माता – पिता का॥

ख़ुशनसीब है वो लोग जिनको…
भगवान मौका देता है।
माता – पिता की सेवा करने का॥

माता पिता को कभी भी दुख देना नही।
अनादर कभी उनका करना नही॥

©- विमल गांधी ∇
Vimal Gandhi-kmsraj51
विमल गांधी जी।

हम दिल से आभारी हैं विमल गांधी जी के प्रेरणादायक हिन्दी कविता साझा करने के लिए।

विमल गांधी जी के लिए मेरे विचार: 

♣ “विमल गांधी जी” की कविताआे के हर एक शब्द में अलाैकिक सार भरा हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। कविताऐं छोटी और सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान इन कविताओं काे गहराई(हर शब्दाे का सार) से समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।

पढ़ें – विमल गांधी जी कि शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह।

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

∗ निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

~KMSRAJ51

 

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डरना है तो अपने आप से डरो।

Kmsraj51 की कलम से…..
Kmsraj51-CYMT-JUNE-15

ϒ डरना है तो अपने आप से डरो। ϒ

डरना है तो अपने आप से डरो।
ईश्वर से नहीं, क्योंकिं जीवन में॥

जो भी हम कर्म करते है।
बुरा करते है, पाप करते है॥

वो हम ही करते है ईश्वर नही।

इसलिए डरना है तो खुद से डरो।
ईश्वर से नहीं और हमेशा सब का भला ही करो॥

©- विमल गांधी ∇
Vimal Gandhi-kmsraj51
विमल गांधी जी।

हम दिल से आभारी हैं विमल गांधी जी के प्रेरणादायक हिन्दी कविता साझा करने के लिए।

विमल गांधी जी के लिए मेरे विचार: 

♣ “विमल गांधी जी” की कविताआे के हर एक शब्द में अलाैकिक सार भरा हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। कविताऐं छोटी और सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान इन कविताओं काे गहराई(हर शब्दाे का सार) से समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।

पढ़ें – विमल गांधी जी कि शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह।

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* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

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 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

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