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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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Sukhmangal Singh

अयोध्या।

Kmsraj51 की कलम से…..

Ayodhya | अयोध्या।

कण-कण वासी, अवध निवासी,
मानवता के त्राता, जगत के सुखदाता।
दानव – दुष्ट – दलन अवतारी,
श्रृष्टि सृजन सद्धर्म प्रभारी।
सहज शेष शारदा संग में,
भव – भय भन्जन जग हितकारी।

सरयू अमिय प्रदाता, श्रृष्टि जगत विख्याता,
मानवता के त्राता, जगत के सुख दाता।

बंदर संग मदारी भेषा,
दरस-परस शिव अति लवलेशा।
बाल सुलभ श्री राम दरस पा,
अति सुख पावे नर हरि भेषा।

समता मूलक ध्ताया त्रिपुर विनाशक ज्ञाता,
मानवता की त्राता, जगत के सुख दाता।

जल निधि वक्षस्थल पर धाये,
राम सेतु निर्माण कराये।
मर्कट बंदर भालू के संग,
लांघि समंदर लंका आये।

‘मंगल’ भाष्य विधाता, जीवन ज्योति प्रदाता,
मानवता के त्राता, जगती के सुख दाता।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — जिस भूमि पर प्राचीन समय से ही महापुरुष तपस्या करते आये है, निष्काम उपासकों की पुण्य गाथा से कण – कण सुशोभित है प्राचीन पुरी अयोध्या धाम। महाबली हनुमान जी के आराध्य की नगरी अयोध्या धाम। सरयू नदी के तट पर प्राचीन पुरी अयोध्या धाम जहां जगत पिता श्री हरि खुद आये श्री राम रूप में, पूरी मानव जाती को मर्यादा व धर्म का सीख देने। दुष्टों का संहार कर, जगत में शांति की पुनः स्थापना कर, प्रेम, पवित्रता व त्याग के साक्षात रूप श्री राम। अयोध्या धाम पुनः विश्व में “वसुधैव कुटुम्बकम्” सनातन धर्म के मूल संस्कार को मानवों में भरने का कार्य करेगा।

—————

यह कविता (अयोध्या।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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काशी कहां चली।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kashi Kahan Chali | काशी कहां चली।

काशी संसार सागर से पार उतारने वाली भक्ति भावन नगरी है। काशी समीचीन यथार्थ सुदृढ़ शोत्रसम्मत् सर्वसिद्धि तपोभूमि है। काशी में जहां मरणोपरांत भक्ति मुक्ति मिलती है वही काशी में किये पुण्य अथवा पाप कर्म भी अक्षुण्ण होते हैं। मानव यूं तो बुद्धिजीवी है, फिर काशी की गरिमा पर कहीं प्रश्नचिन्ह न लगे, आंच न आवे ऐसे कार्यो से भावुक हो लोग तमाम अनैतिक कार्यों में लिप्त नजर जाने क्यों लोग दिखते हैं। इससे साफ जाहिर है जन – जन में वैभव, पराक्रम मनस्विता और जीवट, ओजस् तेजस् की कमी कहीं न कहीं हमारे अंदर अवश्य ही प्रभावित कर रही है। फाल्गुन मास में बरसाने वृंदावन – मथुरा होली के माहौल में जब रंग विरंगे रंगों से सरावोर रहती है वहीं काशी, काशी में बाबा भोले भी इस सुअवसर से अछूते क्यों रह जायेंगे।

आमल एकादशी 

आमल एकादशी को भोले भी भाव विह्वल हो स्नान करते हैं, सप्रेम भरी होली-रंगभरी के रंग से सराबोर होते हैं साथ ही अतिविशिष्ट शृंगार भी कराते हैं। इन्हीं दिनों सिद्धि चक विधानानुसार धर्म के अष्ट चिन्ह के पूजा विधान में भी लिखा गया है—

कार्तिक फाल्गुन अषाढ़ के अंत अठ दिन माहि।
नन्दीश्वर श्वर जात है, हम पूजे इह ठाहिं॥

अर्थात् — जैन श्रावक उक्त मास के अंतम आठ दिन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक काल्पनिक रूप में इन्द्र इन्द्राणी देवता का विधानपूर्वक पूजन, भजन भी होता है। जब काशी का वर्णन हम कर रहे हों, वहां शिवलिंग का वर्णन न हो तो काशी का वर्णन संभवतः अधूरा प्रतीत होता है। वैगे तो मनुष्यों द्वारा कुछ भी पूर्ण कर पाना समीचीन नहीं हैं।

निराकार पार ब्रह्म परमेश्वर

पूर्ण तो मात्र ब्रह्म है जो निराकार पार ब्रह्म है जो निराकार पार ब्रह्मपरमेश्वर ही है। हम जिस ज्योतिर्लिंग का वर्णन यहां करने जा रहे हैं वह वही है जो आपकी आत्मा का स्वरूप है। जब बच्चा मां के गर्भ में आता है तो वही अंडाकार रूप धारण करता है जिस आकार में शिवलिंग होता है। मरणोपरांत अग्नि दहन के समय भी शनैः शनैः पुनः उन्हीं स्वरूप में ही, यह मानवीय रूपाकाया पंच भूतात्मा पंचतत्व में विलीन हो जाता है। शिव आनन्ददाता हैं। जिस दिन आप शिव में लीन होंगे और गंगा के पावन जल से परिपूर्ण हो जायेंगे उस दिन से कुछ शेष नहीं बचा। द्वंद नहीं निर्द्वद हो जायेंगे। विलक्षणता की अनुभूति होनी स्वभावतः हो जायेगी।

काशी में स्त्रैण और नगरी पुरुष को खोजते फिरते रहते हैं शायद उन्हें ज्ञात नहीं शिव अर्धनारीश्वर है। बांवले से सड़कों गलियों ऐसे में देखते ही होगें। आप में भी द्वंद्व होना स्वाभाविक है ही, क्योकि यह जगत ही द्वंद्व से निर्मित है। तो आप भी दो होंगे ही। इतना तो अवश्य ही है। द्वैत से अद्वैत में पहुंचने के मार्ग की आकांक्षा में आपको उस शिवलिंग की अपने घर में उपासना करनी होगी। जिसके द्वारा आप निर्द्वद्व हो जाय। वह तभी संभव होगी जब मेक्सिमम ६ अंगुल की ही मूर्ति विधान सहित स्थापित करने परांत आप के अन्दर ध्यान योग प्राणायाम अथवा अन्यान्य विधाओं से विह्वल विकल अति आतुरता आनन्द हो, जिस समय उस अलौकिक बोध गुदगुदाहट आलिंगन सा परम आनंद मिल जाये आप अनुभूति करें, काशी की एक रेखा तक पहुंच रहा हूँ।

प्रथम पूज्य देवाधिदेव – भोले के सुपुत्र गौरी के लाल गणेश जी

हमें काशी का वर्णन करते समय प्रथम पूज्य देवाधिदेव भोले के सुपुत्र गौरी के लाल गणेश जी को नहीं भूलना होगा जिसकी प्रतिमूर्ति बड़ा गणेश में प्रतिष्ठापित है। बड़ा गणेश जी को भी हमें हर शुभ कार्य में प्रथम सादर याद करना चाहिए। यहां गणेश चतुर्थी के दिन सैलानियों की भीड़ स्वाभाविक हर्षानुभूति कराता है। गणेश जी के लिए यह भी कहना अतिशयोक्ति न होगी—

सुख समृद्धि का जब आयेगा नया दौर।
गणपति गजबदना को पूजेंगे लोग॥

यहीं; मंगल ने कहा है—

  • मांगो न और काहू से याचक बन काशी में चातुर्मास बिताय रहतु ना एकै द्वार लेत न हाय वहां सव तीरथराज देवगण चरवन लेत चबाय चहु और महिमा काशी में।
  • पंचाक्षरी मंत्र पढ़ महिमा तन की काशी त्रिलोचन लोचन कर्णघंटा घंटा बजत गिरजानन्दन शिवयाचक वनि हो काशी में।

आज हम अध्यात्म, नैतिकता, संस्कृति पश्चिम से लेते जा रहे हैं। हमें याद करना होगा स्वामी विवेकानन्द जी के मुख, मुखार परमार्थ तप, सेवा को भी, हमें याद करना होगा, स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के उपदेशों को, कबीरदास के कर्मयोग, राजर्षि विश्वामित्र के ‘तप’ को, मीरा का प्रेम, राजा मान्धाता के ‘त्याग’ और राजा हरिश्चंद्र का ‘सत्य’, लक्ष्मीबाई के शौर्य को भी हमें नहीं भूलना होगा। आज काशी में ही क्या सारी पृथ्वी बोझ से दबी जा रही है। हमें मिटाना है काशी के साथ सारी धरती के क्लेश को?

गंगा में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है—

सद्भावना पूर्ण वातावरण का हम सब जन मिल निर्माण करें। काशी के हाथीघाट, शिवाला घाट वह स्थान है जहां राजा विजयानगरम् का हाथी आता था। इस घाट की बनावट ऐसी थी कि जो लोग तैरना नहीं जानते थे वे इस घाट पर कमर भर पानी में नहा सकते थे परंतु आज यहां कीचड़ का अम्बार रहता है इसलिए नहीं कि गंगा का बालू एकत्र हो गया है। बलात गंगा में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। चूंकि अंग्रेजों के समय में कस्साई बाड़ा के जो जानवरों का खून पहले गंगा जी में नहीं आता था आज खून शाम होते ही रंग बिरंगे रंगों में कभी लाल, कभी हरा, कभी बैगनी, कभी काला एवं मटमैले कलर की धार बन कर सम्वत् २०४६ से गंगा में अनवरत आ रहा है।

यही नहीं रंगाई के कारखानों का रंग एवं हजारों लीटर केमिकल तथा लगभग सौ लीटर खून डायरेक्ट गंगा में प्रतिदिन अनवरत बहाया जाता है। प्रतिदिन लोहता भिटारी के बीच बने नाले से भी केमिकल निरर्थक वरुणा नाले से होकर अनवरत वरुणा नदी में बहाया जा रहा है। वरुणा नदी भी उसे बेहिचक गंगा को अर्पित कर देती है। आज गंगा जी के दंडी घाट से गुलेरी घाट तक मनुष्य क्या बन्दर व गाय भी पानी पीने से दूर नहा सकने में भी हिचकिचाहट कर रहे हैं। इन घाटों को भैंसा घाट कहा जाय तो भी अतिशयोक्ति न होगी।

इस प्रकार वाराणसी के छः घाट उक्त प्रदूषण से जहां प्रभावित हैं वही राजेंद्र प्रसाद घाट, मर्णिकर्णिका घाट भी प्रदूषण से क्यों अछूता रह जाय। अस्सी घाट का पूछना ही क्या है। नाला द्वारा हजारों लीटर गन्दा पानी गंगा में बहाने से नगर निगम आखिर क्यों नहीं बाज आता। इससे साफ जाहिर होता है कि केंद्र अथवा राज्य द्वारा चलाई गई सफाई निर्मलीकरण योजना सफेद हाथी का सा रूप धारण कर रखा है। मणिकर्णिका, हरिश्चंद्र घाट से आज भी अधजले शव गंगा में बहाकर ही नहीं अपितु पशुओं के शव को गंगा में प्रवाह कर गंगा में हम सड़ान्ध क्यों पैदा कर रहे हैं? पुलिस प्रशासन भी मूक दर्शक आखिर क्यों बनी रहती है? ऐसे में अधिक अपराध के युग का श्रीगणेश भी इस दशक को कहने से लेखक नहीं चुकेगा। बशर्ते नाबालिग बच्चों का शव धार्मिक परम्परानुसार जल प्रवाह की अवधारणा जब तक नहीं बदलेगी। हम धार्मिक परम्परा का जिक्र कर रहे हैं तो धर्माचार्य का जो सत्य निष्ठा से आज का मानव जीव कल्यार्णाथ यज्ञ, हवन, पूजन, प्रवचन, हरिभजन, शिवअर्चन, चण्डी जाप, नाम जपन, भजन पर भी हमें जिक्र करना मुनासिब होगा। आप काशी में कम नहीं पायेंगे।

ज्ञान, भक्ति, अध्यात्म तीर्थों का भी तीर्थस्थल काशी है।

ज्ञान, भक्ति, अध्यात्म और सर्व प्रेम का प्रतीक यह तीर्थों का भी तीर्थ है। आध्यात्मिक, धार्मिक तथा भक्तिभाव प्रेरक धार्मिक सांस्कृतक लोक उन्नायक आयोजनों का यह तीर्थस्थल काशी है। काशी में नास्तिक विचारधारा से युक्त जो प्राणी आता है रमण भ्रमण करने, वह भी शिवमय हो रम जाता है। भोला भूदेवी, भवानी, भगवती, जगदम्बा में कारण शास्त्रों में वर्णित है।

भोला काशी परिक्षेत्र चौदह कोश में आने वाले प्राणी को रमणीय कर देते हैं। कारण स्पष्ट है। यहां प्रतिदिन गंगा में मणिकर्णिका घाट पर दो घड़ी उपरान्त दोपहर में समस्त देव गण देवलोक से स्नान करने आते ही रहते हैं। काशी में देवताओं का आना अनवरत समस्त युगों से रहा है तो क्या हिंदू/सिक्ख/इसाई अथवा मुसलमान जिनमें एक सा पंच तत्वों से बनी बुद्धि विवेक प्रभु ने दे रखी है, हम उस गंगा मां को जिसने देवलोक से हाहाकार कर हमारे पूर्वजों का तारंतार किया, कर रही है, हम पवित्र क्यों नहीं रख सकते हैं?

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — काशी जहां स्वयंभू भोलेनाथ माता पार्वती व गणपति सहित अनंत काल से विराजमान है। पतित पावनि माँ गंगा को अपनी जटाओ से धीरे-धीरे मध्यम जल धारा के रूप में मानव कल्याण के लिए छोड़ा है, लेकिन आज का मानव पतित पावनि माँ गंगा को बहुत ज्यादा प्रदूषित कर रखा है। अब भी सुधर जाओ और पतित पावनि माँ गंगा को स्वच्छ करो, इसे प्रदूषित करना बंद करो। ज्ञान, भक्ति, अध्यात्म और सर्व प्रेम का प्रतीक यह तीर्थों का भी तीर्थ है। आध्यात्मिक, धार्मिक तथा भक्तिभाव प्रेरक धार्मिक सांस्कृतक लोक उन्नायक आयोजनों का यह तीर्थस्थल काशी है। काशी में नास्तिक विचारधारा से युक्त जो प्राणी आता है रमण भ्रमण करने, वह भी शिवमय हो रम जाता है। भोला भूदेवी, भवानी, भगवती, जगदम्बा में कारण शास्त्रों में वर्णित है।

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यह लेख (काशी कहां चली।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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भ्रमर गुंजार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Bhramar Gunjar | भ्रमर गुंजार।

भ्रमर तुम्हारे गुंजारों पर,
फूल-फूल हंसे कलियां मुस्कायी।
पंकज के पंखुड़ियों में तुम,
बंद हुये रजनी जब आई।

रजनी भर दुःख झेला तुमने,
रश्मि रथी जब नभ में छाई।
छिप गये तारे नभ में सारे,
उषा लली चिड़ियां चहकायी।

मुंह धोकर जल-पान कि ये सब,
उठ गये बाल युवा नर – नारी।
बांध पीठ पर बस्ता बालक,
पढ़ने की सब की तैयारी।

भौंरे सहगामी बन मधु-रस,
चूस सुमन से छत्ता भरते।
शहद बना जीवन हित ‘मंगल’,
दिनभर दौड़ लगाते रहते।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — भ्रमर(भौरे) दिन – रात एक करके जी-तोड़ मेहनत करती है, एक फूल से दूसरे फूल पर, फिर तीसरे फूल पर जाती है, इस तरह से वह अनगिनत फूलों पर जाती है और उन फूलों से थोड़ा – थोड़ा रस लेकर अपने छत्ते में इकट्ठा करती है। इतनी कड़ी मेहनत के बाद तब कही जाकर मधु बनता है, जो हम सभी को बहुत पसंद हैं। भ्रमर(भौरे) से हमें यह सीख मिलती है की कठिन से कठिन मेहनत करने से कतराना व घबराना नहीं चाहिए। हम सभी को हर परिस्थिति से डटकर सामना करना चाहिए।

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यह कविता (भ्रमर गुंजार।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जागृत का एक दिन।

Kmsraj51 की कलम से…..

A Day Of Awakening | जागृत का एक दिन।

सम्मुख तेरे प्राण वान हूं,
या निष्प्राण हूं क्या बतलाऊं।
जागृति दर्पण के सम्मुख मैं,
क्या देखूं क्या देख न पाऊं।

फिर भी देखो उस महात्मा को,
नीरव में रसना – अर्पण है।
स्वर से स्वर का सम्मेलन ही,
प्राणवान जागृत दर्पण है।

जहां अनुत्तरित प्रश्न वहीं पर,
मिथ्या जगत का स्वप्न बड़ा है।
एक दिवस उठकर दौडूंगा,
नापूंगा जो जहां जड़ा है।

कलम उठा लिखने बैठूंगा,
अपनी गौरव गाथा को।
सबको दिखा सकूं दर्पण में,
संस्कृति और सभ्यता को।

धरती से नवम मंडल तक मैं,
दीपक ज्योति जलाऊंगा।
ज्ञान ध्यान से कबीर जैसा,
‘मंगल’ दरश कराऊंगा।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — हम सब जानते है की इस मिथ्या जगत की सभी चीजें नाशवान है सब नष्ट हो जायेगा एक दिन, फिर क्यों इन नाशवान चीजों के लिए कभी किसी को तकलीफ़ दे। अपने कर्म ऐसे करते चले की सभी को प्रेरणा मिले अच्छा-अच्छा कर्म करने का। कभी भी कोई ऐसा कार्य न करें की आपके कार्य से किसी को दुःख पहुंचे। एक लेखक अपनी कलम से अपने देश की महान संस्कृति और सभ्यता को दिखाने की कोशिश करता है। धरती से नवम मंडल तक का दर्शन कराता है अपनी लेख से लेखक। अपना जन्म, अपने जननी, व जन्मभूमि राष्ट्र के लिए सच्चे मन से समर्पित करें।

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यह कविता (जागृत का एक दिन।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।

Kmsraj51 की कलम से…..

Coordinating Nature Of Kashi | काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।

काशी विश्व की प्राचीन नगरी है। बुद्ध की उपदेश स्थली, जैन तीर्थंकर महावीर की धर्म देशना स्थली तथा सुपार्श्वनाथ और जैन पार्श्वनाथ तीर्थंकरो की जन्मस्थली होने के साथ ही काशी रामानन्द, आदि शंकराचार्य, कबीर, रैदास, तुलसीदास विवेकानन्द जैसे महान धर्माचार्यों एवं चिंतकों की कर्म भूमि भी रही है।

विभिन्न पुराणों से विदित होता है कि काशी पहले विष्णुतीर्थ था जो बाद में शिवतीर्थ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यह प्रधानतः शिव की नगरी रही है। यहाँ के 17वीं से 20वीं शताब्दी ई० के लगभग सभी मंदिर भोलेनाथ शिव को समर्पित हैं। इन मंदिरों में गर्भगृह में शिवलिंग और चारो ओर की भित्तियों पर शक्ति, विष्णु, सूर्य एवं गणेश मूर्तियाँ हैं जो समन्वयात्मक धार्मिक आस्था की साक्षात साक्षी है। इतना ही नहीं काशी में लोक धर्म से सम्बन्धित पक्ष, नाग, वृक्षपूजन की परम्परा रही है। इसे न केवल शिव वरन् काशी में जन्में सुपार्श्वनाथ और पार्श्वनाथ के मस्तकों पर दिखाये जाने वाले सर्वफलों के रूप में भी देखे जा सकते हैं।

17वीं से 19वीं शताब्दी ई0 के बीच काशी की धार्मिक एवं सांस्कृति समन्वय की भंगिकी आदि केशव से अस्सी तक फैले हुए घाटों की अनवरत श्रृंखला में देखी जा सकती है। घाटों के मंदिरों, मठों और अन्य अवशेषों में पूरे भारतवर्ष का धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप मूर्तिमान हो उठा है।

यदि कहा जाय कि काशी में सम्पूर्ण विश्व सूक्ष्म रूप से विद्यमान है तो अतिश्योक्ति नहीं। मान्यता के अनुसार देश की सभी नदिया, पवित्र स्थल और देवता काशी में निवास करते हैं। मत्स्यपुराण में काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है जिसे शिव कभी नहीं छोड़ते। इसे महाश्मसान, आनन्दकानन और मोक्षदा अर्थात् मोक्ष देने वाली सप्तपुरियों में एक माना गया है। काशी का महात्म्य कुछ ज्यादा ही है तभी तो जब कभी ग्रहण लगता है तो काशी में बहुत भीड़ उमड़ पड़ती है। यद्यपि सूर्यग्रहण में सबसे बड़ा मेला कुरुक्षेत्र का होता है पर चन्द्रग्रहण में काशी में ही यात्रीगण देश के विभिन्न भागों से आने हैं। भविष्यपुराण में लिखा है :

कुरुक्षेत्रसमा गंगा यत्र कुत्रावगाहिता।
कुरुक्षेत्राहशगुणा यत्र विन्धेन संगता॥

काशी प्रधान तीर्थं स्थान है। यह शुद्ध रूप से तपोभूमि है। देवदर्शनल, मंदिरों की रचना और यहाँ के घाटों की छटा ही मुख्य दर्शनीय हैं। यहाँ गंगास्नान की महिमा अवर्णनीय मानी गई है। सर्वत्र गंगा स्नान पूण्यजनक है। वाराणसी (काशी) में गंगा स्नान बारहो मास नेमी लोग करते हैं। काशी की उत्तरवाहिनी गंगा की महिमा काशी यात्रा में सप्तभाग उल्लिखित है। पंचगंगा और परिसर के घाटों, मर्णिकर्णिका घाट एवं दशाश्वमेघ घाट पर प्रातः 3 बजे से ही स्नानार्थी आने लगते हैं। बाबा विश्वनाथ की नगरी में मरने का कोई डर नहीं होता क्योंकि यहाँ तो सभी मृत्यु को अपने पाहुन (अतिथि) की तरह जोहते ही रहते हैं।

यह सत्य है कि काशी वास करने में जो सुख यहाँ पर होता है वह समस्त ब्रह्मांड मंडप में कहीं भी उपलब्ध नहीं है। काशी में धर्म अपने चारो पैरों पर खड़ा है। अर्थ भी काशी में अनेक प्रकार से वर्तमान है। यही कारण है कि पाप-विनाशिनी देवगणों को भी दुर्लभ सतत गंगा-संगता, संसार पाशच्छेदिनी शिव-पार्वती से अविमुक्त, त्रिभुवन से अतीत मोक्षजननी काशी पुरी को मुक्त पुरुषगण कभी परित्याग नहीं करते। तभी तो जगत प्रसिद्ध जाबालि ऋषि ने कहा है। हे आरुणे ! असी नदी इड़ा नाड़ी और वरुणा नदी पिंगलानाड़ी कही गई है इन्हीं दोनों के मध्य में वह अविमुक्त क्षेत्र काशी है। यही काशी सुषुम्ना नाड़ी है। इन्हीं तीनों नदियों की यह वाराणसी है।

हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — यह सत्य है कि काशी वास करने में जो सुख यहाँ पर होता है वह समस्त ब्रह्मांड मंडप में कहीं भी उपलब्ध नहीं है। काशी में धर्म अपने चारो पैरों पर खड़ा है। अर्थ भी काशी में अनेक प्रकार से वर्तमान है। यही कारण है कि पाप-विनाशिनी देवगणों को भी दुर्लभ सतत गंगा-संगता, संसार पाशच्छेदिनी शिव-पार्वती से अविमुक्त, त्रिभुवन से अतीत मोक्षजननी काशी पुरी को मुक्त पुरुषगण कभी परित्याग नहीं करते। तभी तो जगत प्रसिद्ध जाबालि ऋषि ने कहा है। हे आरुणे ! असी नदी इड़ा नाड़ी और वरुणा नदी पिंगलानाड़ी कही गई है इन्हीं दोनों के मध्य में वह अविमुक्त क्षेत्र काशी है। यही काशी सुषुम्ना नाड़ी है। इन्हीं तीनों नदियों की यह वाराणसी है। काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

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यह लेख (काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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सत्यों की सत्य संजीवनी काशी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Satya Sanjivani Kashi of Truths | सत्यों की सत्य संजीवनी काशी।

काशी, गंगा और महादेव संपूर्ण भू भाग पर यदि कहीं अवस्थित हैं तो वह मात्र काशी पुण्य परिक्षेत्र में ही, अन्यत्र अविज्ञात है। काशीपुरी में धर्म-अधर्म अक्षुण्ण होता है। यह आनंदकानन अविमुक्त महाक्षेत्र है। काशी का माहात्म्य वैदिक एवं स्मार्त है। अतएव काशी में —

अब पुनि पुनि कलम उठायेंगे।
काशी ! रहि रहि गुन गायेंगे॥
लाख लताड़त शिव आयेंगे।
काशी करवटऽ सुनायेंगे॥

  • हिमालय पुत्री मां गंगा काशी में उत्तराभिमुख अविरल बहती है, जिसे ‘मुदिता’ कहा गया है। गंगा पितृ मुख होने से मुदित रहती है और शिव (पति) का सान्निध्य पाकर आह्लादित होती है शायद यही कारण है कि शिव ब्रह्म को काशी बड़ी प्रिय लगती है। शास्त्रों में वर्णन है कि नारायण की आराधना से प्रसन्न होकर परम शिव द्रवीभूत हो गये। वह ब्रह्माद्रव्य युक्तिकाशी भू पर स्थित होकर भी भू से पृथक है। जहाँ शंकरपूजन और शिव के मधुर गान से शिव ब्रह्म प्रसन्न होकर इच्छित वर प्रदान करते हैं, वहीं शैलपुत्री देवी सौभाग्य सुख प्रदान करती हैं।
  • काशी में भक्तों की मनोरथदात्री भवानी ही स्थिर वास करने देती है और भवानी ही काशीवासियों का सदा योगक्षेम करती हैं। भिक्षुक को काशी में मोक्षा काशी भिक्षा प्रदान करने वाली विश्वेश्वर की कुटुम्बिनी काशीवासियों को मोक्ष की भिक्षा प्रदान करती हैं, ओंकार का उच्चारण कराती है। ऊं शांतिः शान्तिः शान्तिः हृदयस्थ कराती है। अतएव इनकी सेवा करनी चाहिए, सेवा से प्रभु मुदित होते हैं। काशीवासियों को यदि कभी कुछ भी दुर्लभ हो तो पूजा पाठ करने से ही भवानी उसे सुलभ करा देती हैं। मानव को चैत्र की अष्टमी में रात्रिजागरण, गंगा स्नान और भव पूजन वांछित फल प्रदान करता है।

काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

जल, जीवन का प्रमुख रसायन तत्व है। काशी में गंगाजल का स्पर्श होते ही महापातुकावली का तुरंत क्षय हो जाता है। यही नहीं यहां वास करने वाले को पद-पद पर, धर्म की ढेर, मिलती है जिसे करोड़ों यत्न करने से भी वैसी धनराशि एकत्र नहीं की जा सकती, सो काशी की गलियों में घूमने (भ्रमण) से पद पर आपसे आप प्राप्त हो जाती है। धर्मपरायण मनुष्य! धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष पाने की अभिलाषा जनित त्रैलोक्य पावनी अविमुक्त क्षेत्र काशीपुरी की पदयात्रा करें। भारतीय धार्मिक संप्रदाय चाहे वैदिक हो या स्मार्त उन सबों का आदर विद्वानों महापुरुषों ने किया है।

वृहस्पति देव ने “काशी को मुक्तिपुरी कहा है। इन्द्र से तो यहां तक कह दिया कि काशी सदृश तुम्हारी देवपुरी भी नहीं है। वहीं जाकर मुक्ति हेतु तुम भी विश्वाराध्य विश्वेश्वर की आराधना करो। ऐसे में भला मुक्तिपुरी का दर्शन-वर्णन मेरे जैसे अल्पज्ञ क्यों नहीं करेगा।” यथा—

गंगा में खूब नहायेंगे,
भव भावन गीत सुनायेंगे।
भर भाँग धतूरा खायेंगे,
मेवा संग मिश्री मिलायेंगे।

और आगे का दृश्य-

भाँग धतूरा पीवत साथी,
पथिक पहलुआ पंडित पापी।
अबे तबे अरु चोखा – बाटी,
डंड बैठकी खुला सपाटी।

सौम्य तप जप को समय सीमा में न बांधकर बुद्धिमानजन काशी स्त्रोत की महिमा का वर्णन करता है। गाता-गुनगुनाता है। उसे हृदयस्थ करता है। स्तोता ब्रह्ममुहूर्त में उठकर ‘काशी’ मंत्र के जप – तप की युक्ति करता है। जप – तप की सामर्थ्य जिस महापुरुष में है, वह मुनि रूप पृथ्वी पर क्रोधी भी हो सकता है अन्यथा असमर्थ पुरुष, प्राणी क्षीणवृत्ति की तरह क्या कर सकता है। जो उद्गीथ है यानी गाने योग्य है वही प्रणव या ऊँकार है। ॐ की उपासना से ही देवता अमृत प्राप्त किये और मृत्यु को जीतकर अमरत्व पाए।

इतना याद रखें — अधम का भोग भोगने के उपरांत ही धर्म का फल प्राणी प्राप्त (भोगता) करता है। पुण्यशाली लोग इस लौकिक जगत में सदैव एकरूपता को नहीं छोड़ते यानी हर्ष और विषाद दोनों ही निष्फल है। आनंद कानन अविमुक्त महाक्षेत्र में सद्विचारयुक्त धर्म परायण धर्म, कर्म पालक और ध्यान ज्ञान युक्त तपी जपी मनुष्य तत्व अन्वेषण करता है और वेदशास्त्रों के स्वाध्याय, उसके अभ्यास से चित्त शुद्धि इंद्रियों पर विजय दम, दान और दया से परिपूर्ण घोर तपस्या की मदद से ही परमविज्ञ वर पा जाता है।

काशी में क्रोध से बचना चाहिए। काशी क्षेत्र ही क्या कहीं भी कभी भी क्रोधयुक्त होने से बड़े-बड़े कष्ट संचय, संचित तपस्या का वैसे ही क्षय हो जाता है – जैसे मानो बादल के आच्छादन से चंद्रमा और सूर्य का तेजपुंज प्रकाश प्रायः विलुप्त हो जाता है। मुनि, ज्ञानी अपने विवेकरूपी बांध से क्रोधरूपी नदी के वेग को स्वेच्छानुसार स्वयं प्रवाहित करता रहता है।

ज्ञान का महान प्रताप कोई विरल ही जानता है। जब आत्मा स्व स्वरूप में स्थित होती है तब उच्चारण करने वाला अन्य कोई नहीं होता अर्थात् वक्ता श्रोता का द्वैत मिट जाता है। मनुष्य में ईश्वरीय प्रेरणा से अचानक ब्रह्म चैतन्य का स्फुरण होता है और वह जिज्ञासु की नई स्थिति में आ जाता है। परंतु संसारी जीव में जिज्ञासा का उदय भी परमात्मा की कृपा से होता है। जब तक मनुष्य में माया से विरक्ति, ईश्वर से अनुरक्ति और सद्गुरु की कृपा नहीं होती, जीव में जिज्ञासा का उदय नहीं होता, गूढ़तत्व चैतन्य शक्ति का उदय नहीं होता। परम सत्य की उपलब्धि के बिना अज्ञान का नशा बार – बार मनुष्य पर छा जाता है।

जो मनुष्य इंद्रियों से विषय वासनाओं का त्याग करके तिमिराच्छन्न रजनी में जागृत अवस्था को प्राप्त कर लेता है काशी में भगवान भोले उसे तारक मंत्र देकर मोक्ष प्रदान करते हैं। तारकेश्वर मंदिर कोलकाता में है। काशी में विश्वनाथ मंदिर के पास स्थापित है। काशी में वर्तमान तारकेश्वर महादेव का जीर्णोद्धार हो रहा है। जिस प्रकार योग में प्रवेश पाने के लिए सद्गुरु कृपा प्रसाद ही सहायक होता है, कर्म से क्षत्रिय विप्र हो जाता है और गीता का सार त्याग है, ईश्वर की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ज्ञान है, उसी प्रकार काशी-काशी जपते-जपते रहने से प्रत्यक्ष मोक्ष है। काशी में मुक्तिमण्डप में मात्र बैठकर भव स्मरण यथा शक्ति धनदान एवं पवित्र कथाओं का श्रवण करने से करोड़ों गोदान का पुण्य प्राप्त होता है।

यहाँ मुनियों ने असंख्य शिवलिंग अनादिकाल से स्थापित किये हैं। जहां पर एक भी शिवलिंग की स्थापना करने से अखिल ब्रह्मांड की प्रतिष्ठा करने का फल प्राप्त होता है, भला उस पुण्य क्षेत्र काशी को कौन मानव जीव छोड़ सकता है। जबकि शास्त्र में कहा गया है काशी की प्राप्ति में पग-पग पर विघ्न आ पड़ते हैं। काशी में वास उन्हीं को मिलता है जो कठोर तपस्या बड़े से बड़े व्रत एवं महादानों के करने वाले होते हैं। काशी गुरु श्रेष्ठ है।

धर्मेश्वर ने मंदराचल पर जगदम्बा से कहा था — काशी की निर्वाण की भूमि है। लोमेश और व्यास जी का भी यही मत रहा। याज्ञवल्क्य मुनिराज ने तो कहा कि — काशी में मरण से परम पद प्राप्त होता है। त्रयमयी काशी समस्त विधाओं की आश्रयस्थली है, महालक्ष्मी की परालय एवं मुक्ति क्षेत्र है। ब्रह्माजी ने कहा — काशी में मरने वालों को मुक्ति मिलती है, यही कारण है कि यहाँ विविध धर्मशाला परिसर मुक्ति क्षेत्र में ठहरने हेतु आज कलिकाल में भी उपलब्ध है काशी ? काशन प्रकाशन करने वाली आत्मज्ञानवती बुद्धि का नाम काशी है।

आठवीं सदी में शंकराचार्य जी को भी बनारस (काशी) आकर अपने मत की विद्वानों द्वारा पुष्टि करानी पड़ी और संभवतः ब्रह्मसूत्र की रचना बनारस में गंगातट पर ही की थी। भागवत में – नदियों में गंगाजी, देवताओं में विष्णु भगवान, वैष्णवों में शंकरजी सर्वश्रेष्ठ है, पुराणों में- श्रीमद्भागवत, ऋषियों में शौनकादि उसी प्रकार श्रेष्ठ हैं जैसे- तीर्थों में काशी सर्वश्रेष्ठ है। इस लोक में बुद्धिमान सज्जनों की ही वह बुद्धि सब कुछ निश्चय करती है जिस नगरी में पुण्यजला स्वयं स्वर्गतरंगिणी गंगा बह रही हैं। वे ही चरण इस भू लोक पर विचरण करना जानते हैं यानी धन्य हैं जिन पुण्य प्राणियों के चरण विश्वनाथ जी के नगर ‘काशी’ में भूमि पर विचरण करते हैं। यद्यपि माघ – मास में सभी तीर्थ, तीर्थराज प्रयाग चले जाते हैं परन्तु अविमुक्त क्षेत्र के तीर्थ काशी में ही रहते हैं। लेखक की कलम से —

कैसा चरित रच्यों मेरो भाई।
बूझत अनबुझ मन जन खिसियाई॥
हलाहल गंगाजल अमरित साँईं।
अगणित कला को मंगल री गाई॥

पुण्य क्षेत्र में संन्यास लेकर रहने, भ्रमण करने वालों की जीवमुक्त और रुद्र स्वरूप मानना चाहिए। इस पुण्य अक्षुण्ण क्षेत्र में यदि प्राण संकट में पड़ा हो तो भी असत्य (मिथ्या) भाषण नहीं करना चाहिए। हां, किसी जीव के प्राण रक्षार्थ झूठ मजबूरी में बोला जा सकता है। काशी शिव को अति प्रिय है। शिव जी के मुख से- मैं ममता रहित हूँ। योगिनियाँ ब्रह्मा और रुद्रगण इसी कारण यहां बसे, काशी के ही हो गये। वे सब वाराणसी के प्रति शिव का प्रेम जानते थे।

जहां जय द्वारा ज्ञानी बटुक ब्रह्मवाद का निनाद करते हों, गुरुचरण विश्वनाथ साक्षात् विराजमान वर्तमानरूप से हों, महर्षि व्यास सदृश पुण्यात्मा वास करते हों, वैद्यराज, दान, ध्यान, तप, ज्ञान कलिकाल में भी हों साथ ही सर्वधर्म की मर्यादा मर्यादित पूर्वक अधिधार्मिक लोगों द्वारा पालन किया जा रहा हो उस मुक्तिदायिनी धर्मपरायण, विराटरूपा काशी को सत् सत् नमन, धरती पर कौन नहीं करेगा।

मुक्ति जन्म महि जानि, ज्ञान खानि, अध हानिकरि।
जहँ बसिं शंभु भवानि, सो काशी, सेइय कस न॥

हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — अधम का भोग भोगने के उपरांत ही धर्म का फल प्राणी प्राप्त (भोगता) करता है। पुण्यशाली लोग इस लौकिक जगत में सदैव एकरूपता को नहीं छोड़ते यानी हर्ष और विषाद दोनों ही निष्फल है। आनंद कानन अविमुक्त महाक्षेत्र में सद्विचारयुक्त धर्म परायण धर्म, कर्म पालक और ध्यान ज्ञान युक्त तपी जपी मनुष्य तत्व अन्वेषण करता है और वेदशास्त्रों के स्वाध्याय, उसके अभ्यास से चित्त शुद्धि इंद्रियों पर विजय दम, दान और दया से परिपूर्ण घोर तपस्या की मदद से ही परमविज्ञ वर पा जाता है। काशी में क्रोध से बचना चाहिए। काशी क्षेत्र ही क्या कहीं भी कभी भी क्रोधयुक्त होने से बड़े-बड़े कष्ट संचय, संचित तपस्या का वैसे ही क्षय हो जाता है – जैसे मानो बादल के आच्छादन से चंद्रमा और सूर्य का तेजपुंज प्रकाश प्रायः विलुप्त हो जाता है। मुनि, ज्ञानी अपने विवेकरूपी बांध से क्रोधरूपी नदी के वेग को स्वेच्छानुसार स्वयं प्रवाहित करता रहता है। काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

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नारी शक्ति।

Kmsraj51 की कलम से…..

Nari Shakti | नारी शक्ति।

हे शक्ति स्वरूपा नारी,
तुम हो जग- जन हितकारी।

हो क्षीर – नीर की दानी,
वात्सल्यमयी कल्याणी।
हो सका उश्रृण ना कोई,
आंखों में लहरें पानी।

तेरे इस त्याग तपोमय,
आचरण का जग आभारी।
हे शक्ति स्वरुपा नारी,
तुम हो जग-जन हितकारी।

अधरों से अमन्द पिलाती,
लज्जा का भूषण धारी।
करती सतीत्व का पालन,
बन व्रती एक पति-नारी।

ध्रुव हुये अमर नमः मण्डल,
उग जननी – जीवन -क्यारी।
हे शक्ति स्वरुपा नारी,
तुम हो जग-जन हितकारी।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — वह संघर्ष नहीं, त्याग और ममता की एक प्रतिमा है। वह शक्ति भी है, जो समय आने पर दानवों का विनाश भी करती है। भारतीय नारी ने अपने महत्वपूर्ण भूमिका का पालन हर एक युग में किया है। भारतीय नारी अपने विशेष गुणों के कारण आज के आधुनिक युग में भी पुरुषों से कंधे से कंधा मिला कर हर क्षेत्र में कार्य कर रही है।

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यह कविता (नारी शक्ति।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता Tagged With: poem on nari shakti in hindi, Sukhmangal Singh, sukhmangal singh poems, नारी शक्ति, नारी शक्ति - Nari Shakti, नारी शक्ति - सुख मंगल सिंह, नारी शक्ति पर कविता हिंदी में, नारी सशक्तिकरण पर कविता - Poems on Women, भारतीय नारी पर कविता, सुख मंगल सिंह, सुख मंगल सिंह की कविताएं

अपनी अंजुरी में भर-भर।

Kmsraj51 की कलम से…..

Apni Anjuri Mein Bhar Bhar | अपनी अंजुरी में भर-भर।

तीतर के झुंड पर,
फेंकना न कोई पत्थर।
प्रीति का सन्देश भेजा।
हर गली हर गाँव को।

धुप उतरी हो कड़ी तो,
कोशिशों से छाँव दो।
कल ये नव गीत मुखर हो,
हर चौकट आँगन में घर-घर।

तीतरों के झुंड पर,
धैर्य और साहस के बूते।
हर विपत्ति को दूर भगायें,
हो उल्लास भरा मन प्रतिपल।
आलस्य फटकने कभी न पाये।

सब को खातिर खुशियां बाटें,
हम अपनी अंजुरी में भर-भर।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — प्रआलस्य कभी भी आप पर सवार ना हो, सदैव अच्छे कर्म करते रहे अपने जीवन में। सभी जीवों से प्रेम करें, इस धरा व प्रकृति पर सभी जीवों का बराबर का हक़ है, उन्हें भी सुकून से जीने दे। सभी से निस्वार्थ प्रेम व स्नेह बनाये रखे, किसी के भी प्रति मन में बैर ना पाले। सदैव ही अपने कर्म व बोल से खुशिया बांटते चलो।

—————

यह कविता (अपनी अंजुरी में भर-भर।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

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आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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प्रकृति नियंता।

Kmsraj51 की कलम से…..

Prakrti Niyanta | प्रकृति नियंता।

प्रकृति नियंता जग जीवों को,
प्राण वायु जीवन धन देता।
लेता नहीं किसी से कुछ भी,
दूषित वायु स्वयं पी लेता।

नदी – झील – झरना – वन – उपवन,
इनके कोमल अंग हैं प्यारे।
इनसे सृजन जलद का होता,
हारते प्यास धरा – जल – ढारे।

धरा – धाम के आभूषण ये,
‘मंगल’ मोद सदा भरते हैं।
समता के पोशाक हैं सारे,
भौतिक ताप सदा हरते हैं।

नीरव जननी में नभ – आंगन,
उद गण ज्योति जलाते रहते।
हरित गैस के कुप्रभाव से,
छिद्र ओजोन घटाते रहते।

शब्दार्थ: उद – उत्कर्ष, प्रकाश,

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — प्रकृति सभी तरह के जीवों को अपनी गॉड में पलटा है, सदैव ही सभी को प्राण वायु जीवन धन देता। प्रकृति कभी भी कुछ लेता नहीं किसी से कुछ भी, दूषित वायु स्वयं पी लेता। नदी-झील, झरना, वन-उपवन ये इनके कोमल अंग हैं प्यारे। इनसे ही सृजन जल का होता है सभी की प्यास बुझती है। धरा के आभूषण ये सदैव ही ऊर्जा प्रकृति में भरते है, सभी जीवों के लिए। मानव ने जो आधुनिकता के नाम पर प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर तापमान गर्म बना दिया है उसे भी प्रकृति काफी हद तक कम करती हैं। प्रकृति जननी है, सदैव ही प्रकाश व ऊर्जा से सभी जीवों का पोषण करती है। हरित गैस के कुप्रभाव से और छिद्र ओजोन घटाते रहते। इस प्रकृति का हम सबको ख्याल रखना है, तभी वर्तमान और आने वाली पीढ़िया रह पाएंगी इस धरा पर अच्छे से खुशहाल।

—————

यह कविता (प्रकृति नियंता।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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नाचती बसंती।

Kmsraj51 की कलम से…..

Dancing Basanti | नाचती बसंती।

चानी के फूल खिले, चांदनी मंगन,
सुधियों के दीप जले राहों में,
नाचती बसंती रही बाहों में।

रुनुन – झुनुन भनक उठी पायलिया पांव,
महमहायि रजनी गन्धा रजनी के गांव।

चंचल चित्त चहक उठा चाहों में,
नाचती बसन्ति रही बाहों में।

छुवन चाहे अरुणायी अधर को हिलोरे,
खग कुल के कलरव में नाच उठी भोर।

प्रीति पगे द्रम – दल के छाहों में,
नाचती बसन्ति रही बाहों में।

अलसाये नयनों से सुषमा निहार,
भक्त जुटे नवरात्रि माता के द्वार।

‘मंगल’ कुहांस घिरे राहों में,
नाचती बसन्ति रही बाहों में।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — जब प्रकृति खुशनुमा होती है तो इंसानी मन भी प्रसन्न होती है। अपने चारों तरफ सबकुछ अच्छा – अच्छा लगता है। जब भी नवरात्री आती है भक्तों का उमंग उत्साह देखने लायक होता है, जैसे अभी सावन में शिव भक्तों का उमंग उत्साह देखने लायक देखने लायक है। प्रकृति की हरियाली हर एक मन को मोह लेता है और एक अलग ही सुखमय शांति की अनुभूति कराता है प्रकृति।

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यह कविता (नाचती बसंती।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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