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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिंदी कविता

शिक्षक दिवस।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शिक्षक दिवस। ♦

प्रथम माँ होती शिक्षक जो हमें सिखाती संस्कार है,
पिता और गुरु से मिलता बालक को विद्या अपार है।

शिक्षक जीवन का आधार अंधकार में दीपक का प्रकाश है,
मावन जीवन का मानसिक विकास का होता गुरु आधार है।

ऋषि, मुनि ने भी शिक्षक की महिमा का गुणगान किया है,
उच्च शिक्षक का जीवन में होना, ईश्वर का वरदान है।

गुरु विद्या और गुणों का सागर, करते जीवन प्रकाशवान है,
व्यक्तित्व को निखारें संस्कारित जीवन का शिक्षक आधार है।

आचरण, सही, गलत, नैतिकता का पाठ पढ़ाते है,
कर्तव्य, संयम और धैर्य से सही पथ पर चलना सिखाते है।

अंतर्मन का तम हरने को ज्ञान का दीप जलाते है,
भले बुरे का भेद बताकर सबका मार्ग प्रशस्त करते है।

संस्कृति, इतिहास विग्रह साहित्य का देते सबको ज्ञान है,
सत्य, धर्म, सदाचार का पाठ पढ़ाते सच्चाई की राह पर चलना सिखाते है।

जीवन में सफलता हासिल होती देते ऐसे मूल मंत्र है,
देशभक्ति की भावना का करते विकास, जिससे बनता राष्ट्र खुशहाल है।

शिक्षक का जीवन में विशेष महत्व देते वो सभी को ज्ञान है,
शिक्षक की महिमा का हम गुणगान करते है।

शिक्षक ही मजबूत नींव की आधारशिला है,
शिक्षक के चरणों में करते नमन बारम्बार है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — एक शिक्षक ही होते है जो हमे अच्छी और बुरी आदतों का पहचान करवाते है और वो हमारी बुरी आदतों को छोड़वाने का दिल से पूर्ण प्रयास भी करते हैं। हमें अच्छी आदतों को अपनाने के लिए प्रेरित करते है, सदैव ही आगे बढ़ने का सही ज्ञान देते है। वो शिक्षक ही होते है जो हमें ईर्ष्या, हिंसा, अधर्म, चोरी जैसी बुरी आदतों से दूर रखते है। शिक्षक ही, सही आचरण, नैतिकता का पाठ पढ़ाते है, कर्तव्य, संयम और धैर्य से सही पथ पर चलना सिखाते है। भारत में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण के जन्म दिवस अर्थात 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। उन्होंने अपने छात्रों से अपने जन्म दिवस पर शिक्षक दिवस मनाने की इच्छा जताई थी। पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ राधाकृष्‍णन का जन्म 5 सितंबर, 1888 को तमिलनाडु के तिरुमनी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

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यह कविता (शिक्षक दिवस।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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अब डटकर लड़ना होगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अब डटकर लड़ना होगा। ♦

गदा तीर तलवार उठा लो,
अब डटकर लड़ना होगा।
बहुत पढ़े हम पाठ प्रेम का,
अब प्रतिशोध पढ़ना होगा।

बहन बेटियों की आबरू,
कब तक हम गंवाएंगे।
हाथ सिरहाने रख कर यूं ही,
कब तक सोते जाएंगे।

उठो चलो संग्राम करो,
अब प्रहार करना होगा।
गदा तीर तलवार उठा लो,
अब डटकर लड़ना होगा।

नीच निराधम असुरों की,
ऐसे मन बढ़ते जाएगी।
कभी बेटियां तेरी तो,
बहनें बली चढ़ती जाएगी।

कर दो नाश निशाचर का,
दूजा न कोई पैदा होगा।
गदा तीर तलवार उठा लो,
अब डटकर लड़ना होगा।

दरबार यहां अंधों का है,
क्या? रक्त हमारा देखेगा!
प्रलय ला दो प्रचंड बनकर,
कि रोष वक्त भी देखेगा।

खाल खींच ले क़ातिल का,
ये बल सब में भरना होगा।
गदा तीर तलवार उठा लो,
अब डटकर लड़ना होगा।

नोट: झारखण्ड, दुमका की बेटी अंकिता सिंह हत्याकांड पर अमित प्रेमशंकर की एक कविता।

♦ अमित प्रेमशंकर जी — एदला-सिमरिया, जिला–चतरा, झारखण्ड ♦

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Conclusion

  • “अमित प्रेमशंकर“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — प्राचीन काल से ही नारी बहुत शक्तिशाली है, नारी हर एक विद्या में माहिर होती थी, अपनी रक्षा स्वयं करने में पूर्ण सक्षम थी। फिर आज की नारी अपने आपको इतना लाचार क्यों समझती है? अब नारी को अपनी शक्ति को पहचान कर अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी। ब्रह्माण्ड के निर्माण के समय से ही नारी के अंदर सहनशीलता, प्रेम, धैर्य, स्नेह, करुणा व ममता और मधुर वाणी जैसे बहुत से गुण विद्यमान है जो कि नारी की असली शक्ति है। यदि कोई नारी कुछ भी करने का निश्चय कर ले (दिल से ठान ले) तो वह उस कार्य को करे बिना पीछे नहीं हटती है और वह बहुत से क्षेत्रों में पुरूषों से बेहतरीन कर अपनी शक्ति का परिचय देती भी है।

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यह कविता (अब डटकर लड़ना होगा।) “अमित प्रेमशंकर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। आपकी ज्यादातर कविताएं युवा पीढ़ी को जागृत करने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

नाम: अमित प्रेमशंकर
पिता: श्री द्वारिका प्रजापति

माता: श्रीमती रेखा देवी
पत्नी: श्रीमती संजू प्रेमशंकर

जन्मतिथि: १० मार्च १९९३
पता: ग्राम+पोस्ट – एदला
प्रखण्ड: सिमरिया
जिला: चतरा (झारखण्ड)
पिन: ८२५१०३

शिक्षा: स्नातक (हिंदी) विनोबा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग
सम्प्रति: कवि, गीतकार व ढोलक वादक।

प्रकाशित पुस्तकें: मन की धारा(एकल),आत्म सृजन, काव्य श्री, एक नई मधुशाला १, एक नई मधुशाला २, भावों के मोती, हमारी शान तिरंगा है व अक्षर पुरूष
प्रकाशित रचनाएं: देश के अलग-अलग पत्र पत्रिकाओं में लगभग दो सौ रचनाएं प्रकाशित व समय समय पर सामाचार पत्रों के माध्यम से पत्राचार।
विशेष: कविता “सीता माता सी कोई नहीं” तथा “आज राम जी आएंगे” महाराष्ट्र के वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओ. सी. पटले द्वारा पोवारी भाषा में अनुवाद व दर्जनों हिन्दी, भोजपुरी गीत यूट्यूब पर मौजूद हैं जिसे अलग अलग गायक और गायिकाओं ने अपने स्वर से सजाया है।

प्राप्त सम्मान: काव्य श्री साहित्य सम्मान, आत्म सृजन साहित्य सम्मान, भावोन्नती साहित्य सम्मान, सरदार भगतसिंह काव्य लेखन सम्मान, सुमित्रानंदन पंत स्मृति सम्मान, साहित्य कर्नल सम्मान दो बार, रैदास साहित्य सम्मान,द फेस ऑफ इंडिया साहित्य सम्मान, राष्ट्र प्रेमी साहित्य सम्मान तथा दिल्ली साहित्य रत्न सहित अनेकों आनलाईन काव्य पाठ द्वारा ई-सम्मान पत्र शामिल है।

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पर्वत है कहता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पर्वत है कहता। ♦

मैं क्यों न ढहूँ? मुझे बताओ, सब कुछ कुरेदा मुझसे तुमने।
अंधा विकास कर चले हो तुम, सुरंग भी छेदा मुझसे तुमने।

मैं रोया या हंसा, तुम्हे क्या?, तुम्हे तो विकास करवाना था।
मैं कमजोर होऊं, तुम्हे क्या?, तुम्हे तो मुझे बस कटवाना था।

बड़ी बड़ी मशीनें, प्रोजेक्ट व सड़के, काट के मुझे बनवाए हैं।
दोहन करके मेरा ही तुमने, ये ईंट- गैरों के महल बनवाए हैं।

आज मैं ढहा हूं, बादल फट बहा हूं, यह मेरी भी मजबूरी है।
प्रहार बरसात का झेलने खातिर, मुझमें मजबूती जरुरी है।

मुझसे तुमने, बहुत कुछ लुटा, मेरे लिए कुछ किया है क्या?
मैंने तुमको सदियों से दिया, मुझे तुमने कुछ दिया है क्या?

क्यों कोस रहे हैं सरकारों को? बादल फटने और बाढ़ों को?
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे, सुधारों अपने व्यवहारों को।

पर्वत है कहता, “मैं कुदरत का बेटा’, मेरी किसने मानी है?
नुकसान पहुंचा कर मुझको पगलो, तुम्हारी ही तो हानि है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — प्राचीन काल से ही पर्वत का हम सभी के जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है, पर्वत ताज़ा पानी, स्वच्छ ऊर्जा, भोजन और मनोरंजन के साधन मुहैया कराते हैं। दुनिया भर में पहाड़ी इलाक़ों में रहने वाले समुदायों की युवा आबादी का भविष्य उज्ज्वल बनाने के लिए शिक्षा के प्रसार, प्रशिक्षण, रोज़गार और आधुनिकतम तकनीक मुहैया कराने से बड़ी मदद मिल सकती है। पहाड़ कैसे उपयोगी होते हैं? इस बात को बारीकी से समझने की जरूरत है हम सभी को, पर्वत जल के भण्डार हैं । पहाड़ों के पानी का उपयोग सिंचाई और पनबिजली उत्पादन के लिए भी किया जाता है। नदी घाटियाँ और पर्वत छतें फसलों की खेती के लिए आदर्श हैं। पहाड़ों में वनस्पतियों और जीवों की एक समृद्ध विविधता है। इनके साथ खिलवाड़ करना, इंसान को प्राकृतिक आपदा के रूप में झेलना पड़ता हैं। अब भी समय है संभल जायें और इनका अंधाधुन गलत तरीके से दोहन करना छोड़ दे, वर्ना परिणाम और भी भयानक होगा।

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यह कविता (पर्वत है कहता।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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शिक्षक की महिमा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शिक्षक की महिमा। ♦

कांटों में उलझा हुआ है,
मेरे दिल का ख्वाब।
बच्चा है हर आंगन का,
खिलता हुआ गुलाब।

कभी न भूलो अपना काम,
जग में तुझे करना है नाम।
जब भी आए संकट तुझको,
लेना तुम प्रभु का नाम।

मैं रोता हुआ गया,
विद्यालय के प्रांगण में।
बहुत बच्चे बिलख रहे थे,
मैंडम, सर दौड़े आए,
लेलिया अपने आलिंगन में।

घुटनों से रेंगते-रेंगते,
कब पैरों पर खड़ा हुआ।
शिक्षक-शिक्षिका के,
ममता की छांव में,
न जाने कब बड़ा हुआ।

कोई अभियन्ता, कोई नेता,
कोई बना अधिकारी।
कोई डाक्टर कोई सैनिक,
तो कोई बना कर्मचारी।

जो लोहे को कनक बनाया,
वो सम्मान कभी न पाया।
जिसकी दानिशमंदी ने,
सबको अब्बल बना दिया।

आज विवश हो कर सर झुकाता है,
जिसकी शिक्षा ने सबको मानव बना दिया।
बार-बार नमन है गुरु चरणों में,
मुझे काबिल बनाने के लिए।

मैं तो राह में पड़ा कंकड़ था,
कोटी-कोटी नमन,
मुझको हीरा बनाने के लिए।
मैं सीधा-साधा “भोला” – भाला,
सबकी नजरों में अच्छा हूँ।

चाहे मैं कुछ भी बन जाऊँ,
मैं आज भी आपका बच्चा हूँ।
गुरु – शिष्य का नाता देखो,
पिता – पुत्र से कहीं महान।

कली को आपने फूल बनाया,
महक उठा सारा हिन्दुस्तान।
गुरु बिन ज्ञान कोई न पाया,
अनुभव की आप हो खान।

शिष्य देखता प्यासी नजरों से,
गुरु होते अमृत की खान।
माँ शारदा, भगवान चित्रगुप्त से,
पहले वंदन, करता हूँ गुरु चरणों में।

कैसे लिखूं महिमा उनकी,
अभिलाषा है मेरी,
हाथ हो गुरु का,
जब शीश हो गुरु चरणों में।

कलम में वो ताकत है,
जो तलवार में नहीं होती।
कई सिकन्दर डूब गये,
वक्त के चक्कर में।
झोपड़ी जैसी रौनक,
दरबार में नहीं होती।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — “गुरु समान दाता नहीं, याचक शीष समान। तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान॥” भावार्थ:- “गुरु के समान कोई दाता नहीं और शिष्य के सदृश याचक नहीं। त्रिलोक की सम्पत्ति से भी बढ़कर ज्ञान-दान गुरु ने दे दिया।” गुरु और पारस – पत्थर में अन्तर है, यह सब सन्त जानते हैं। पारस तो लोहे को सोना बनाता है, परन्तु गुरु शिष्य को अपने समान महान बना लेता है। गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा है। गुरु ही हैं जो भीतर से हाथ का सहारा देकर, बाहर से चोट मार-मारकर और गढ़-गढ़ कर शिष्य की बुराई को निकालते हैं।

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यह कविता (शिक्षक की महिमा।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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कातिल बरसात।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कातिल बरसात। ♦

सूरज डूबा फिर शाम ढली, अंधेरा छाया और हो गई थी रात।
रोजमर्रा के माफिक खाना खा कर, सो गए सारे थे उस रात।

घना अंधेरा था, कोहरा घनेरा था, घने थे बादल और बरसात।
सुबह आई थी खबर कि आठ को, लील गई कातिल बरसात।

मां से लिपटे बच्चे मिले थे, मलबे में दबे पड़े थे सब मां बाप।
चार थे बच्चे तीन बड़े थे, मेहमान ससुर भी दब गए थे साथ।

वह नव प्रधान था काशन का, थी पंचायत भी नव सौगात।
बूढ़े मां, बाप, भाई घर में न थे, खा गई कुल कातिल बरसात।

उल्टी गंगा बहती यह होती है, मां – बाप हुए हैं आज अनाथ।
छाती पीट रोते हैं बेचारे, देख आठ अर्थियां उठाती एक साथ।

दरक उठी थी पहाड़ी ही सारी, नींद में लेटे थे सारे अर्ध रात।
ढह गया था घर ही सारा तो, करता ही कौन बचाने की बात?

दबे पांव मौत ही थी आई, कर गई बरसात में हाथ थी साफ।
जिन्दा बचा एक बेटा था घर का, बस दो बचे बूढ़े मां – बाप।

वह भयानक मंजर जिसने भी देखा, रह गया था वह बेबाक।
चेहरों पर थे आंसू ही आंसू , भूल न पाएंगे वह कातिल रात।

नोट: यह कविता सत्य घटना पर आधारित है और बहुत ही दुःखद घटना है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — दिल दहला देने वाली बहुत ही दुःखद घटना है ये। उन मासूम बेचारो को तो भागने का भी समय नहीं मिला। अत्यंत ही दुःखद अचानक से काल का रूप लिए ये कातिल बरसात आई और पुरे कुल को अपने में समा ले गई। बूढ़े माता-पिता और भाई को परमात्मा शक्ति दे इस विपदा की घड़ी में संभलने की और काल के गाल में गए हुए आत्मा को शांति देना प्रभु। ॐ शांति ! ॐ शांति ! ॐ शांति ! ॐ शांति ! ॐ शांति !

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यह कविता (कातिल बरसात।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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आतंकवाद।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आतंकवाद। ♦

आओ साथ मनाऐं ईद और होली,
क्यूं चलाते हो अपनों पर गोली।
गोली का जवाब सदभाव नहीं हो सकता,
हत्या करने वालों के लिए,
अहिंसा का प्रस्ताव हो नहीं सकता।

नाग कभी शांति का बीज बो, नहीं हो सकता,
लाख दूध पिलाओं भेड़िया शाकाहारी हो नहीं सकता।
इतिहास गवाह है हत्यारी बन्दूको ने,
कभी तर्पण नहीं किया,
आतंकवाद ने आज तक समर्पण नहीं किया।

गर शांति चाहिए कश्मीर की वैली में,
कलेजा ठोक कर उत्तर देना सिखो।
इजरायल की शैली में आतंकवाद तो,
कुचला जाता है, पत्थर दिल बनकर,
देखलिया अंजाम रहम दिल बनकर।

निर्दोष का खून बहाना छोड़े,
ना किसी का आशियाना तोड़े।
भटके हुए नौजवानों को राह पर लाना होगा
उजड़े हुए चमन को, फिर से जन्नत बनाना होगा।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

—————

  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — शांति चाहिए कश्मीर की वैली में, कलेजा ठोक कर उत्तर देना सिखो। इजरायल की शैली में आतंकवाद तो, कुचला जाता है, पत्थर दिल बनकर, देखलिया अंजाम रहम दिल बनकर। ये कड़वा है मगर सत्य है आतंकवाद का कोई भी नियम व कानून नहीं होता है वो केवल अपनी माँगों को ही पूरा करने के लिये सरकार के ऊपर दबाव बनाने के साथ ही आतंक को हर जगह फैलाने के लिये निर्दोष लोगों के समूह या समाज पर हमला करते रहते हैं। उनकी माँगे बेहद खास व खतरनाक होती है, जो वो चाहते हैं केवल उसी को पूरा कराते हैं किसी भी कीमत पर। ये आतंकवाद मानव जाति के लिये बहुत ही बड़ा खतरा है।

—————

यह कविता (आतंकवाद।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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कृष्ण जन्माष्टमी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कृष्ण जन्माष्टमी। ♦

सौ जन्मों के पापों से छुटकारा मिलता है,
कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव सबसे उपयुक्त पर्व है।
हजारों एकादशी का व्रत करने से जो पुण्य मिलता है,
जन्माष्टमी पर्व पर व्रत करने से ही मनुष्य तर जाता है।

ब्रह्म वैवर्त पुराण आदि में भी चित्रण किया गया है,
भविष्य पुराण में श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर वर्णन है।
पुत्र जन्म का समाचार सुन दयानंद से हृदय भरे आया,
ब्राह्मणों को दान दिया स्वस्तिवाचन जात कर्मों को कराया।

देवता की विधि पूर्वक पूजा – पाठ मंत्रोचार करवाया,
गौ और तिल के साथ पहाड़ सुनहरे वस्त्र भूषण दान दिया।
ब्रह्मण सूत माधव और बंदी जन आशीर्वाद देने लगे,
गाने लगे गायक, दुंदुभी और भेरियां भी बजने लगीं।

बृज के सभी हाल बागवानी और आंगनबाड़ी सजने लगी,
इत्र और जल का छिड़काव चारों तरफ किया जाने लगा।
रंग बिरंगी वस्त्र पुष्प और पल्लवों में वंदन द्वार सजाया गया,
गाय बैल और बछड़ों के अंगो में हल्दी तेल लेप किया गया।

गेरू से पीठ पर हाथ के पंजों से रंगीन संस्कृतिक निशान लगे,
मोर पंख और फूलों के हार से जानवरों को पहनाया गया।
ग्वाल वाल सब मिलकर हाथों में भेट लिए नंद बाबा के घर चले,
सुनकर यशोदा को पुत्र हुआ है गोपियों को भी आनंद मिला।

विशेष तरह से ही सुंदर वस्त्र आभूषण अंजन से श्रृंगार किया,
भेंट की सामग्री के संग गोपिकाएं मिलनें यशोदा जी के पास चलीं।
झल फल झल फल चलते समय कानों का सुंदर कुंडल डोल रहा,
गले पड़े हुमेल और मणियों के कुण्डल सुशोभित हो रहे थे।

जिस मार्ग में आगे बढ़ती थीं उसमें चोटियों के गुथे पुष्प बरसते,
हाथों की जड़ाऊ कंगन रुक रुक कर चमकने लगता।
नंद बाबा के घर जाकर सभी लोग नवजात को आशीर्वाद देतीं,
हल्दी मिला हुआ पानी छिड़क कर मंगल गान करती थीं।

जब नंद बाबा की ब्रृज में प्रकट हुए भगवान श्री कृष्णा
उस समय उनकी जन्म का महान उत्सव मनाया गया।
नंद बाबा के व्रज में रिद्धि -सिद्धियां अठखेलियां खेलने लगी,
लक्ष्मीनिया का क्रिडास्थल श्रीकृष्ण का निवास स्थान बन गया।

गोकुल के नन्द बाबा मथुरा चले कंस को वार्षिक कर चुकाने,
बात जान कर वसुदेव भाई नन्द जी से मिलने मथुरा चले गए।
आपस में दोनों लोग मिलकर प्रेम से विह्वल हो रहे थे,
वासुदेव नें नंद जी से कुशल मंगल पूछकर कहने लगे।

बड़े ही सौभाग्य की बात है कि तुम्हें संतान प्राप्त हुआ,
आनंद का विषय है कि आज हम लोग का मिलना हुआ।
सगे प्रेमियों का मिलना कामनाएं पूर्ण होना बड़ा दुर्लभ है,
सगे संबंधी और प्रेमियों का एक स्थान पर रहना संभव नहीं है नहीं।

यद्यपि सबको प्रिय लगता पर सबके प्रारब्ध अलग-अलग होते हैं,
मेरा लड़का अपनी मां रोहणी के साथ ब्रज में भाई रहता है!
जिसका पालन पोषण तुम और यशोदा ही करतीं हैं,
तुम्हीं को वह सम्मान के साथ माता – पिता मानता है।

धर्म अर्थ और काम मनुष्य के लिए स्वजनों को सुख देने वाला हो,
अपने स्वजनों को दुख देने वाला कार्य हितकारी नहीं होता है।
नंद जी और वसु देव ने सुख और दुख की बातें आपस में की,
वसुदेव ने नंद जी से मथुरा में अधिक दिन नहीं ठहरें कहीं।

हम दोनों मिल चुके गोकुल में बड़े – बड़े उत्पात हो रहे हैं,
तब गोपो के साथ नंद छकड़ों पे सवार होकर गोकुल की यात्रा की।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — इतिहास इस बात का साक्षी है, दुष्ट कभी सुधरते नहीं, दुष्टों का संहार करना ही पड़ता है दुनिया व समाज में शांति और खुशहाली के लिए, फिर चाहे युग (समय) कोई भी हो। कृष्ण का जन्म मथुरा के कारागार में हुआ था। वे माता देवकी और पिता वासुदेव की ८वीं संतान थे। श्रीमद भागवत के वर्णन अनुसार द्वापरयुग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज करते थे। उनका एक आततायी पुत्र कंस था और उनकी एक बहन देवकी थी। श्रीकृष्ण के आगमन से ब्रज भूमि तथा गोकुल में बचपन की अठखेलियों से गोकुलवासी अत्यंत खुश थे। क्या गोप क्या गोपिया, उनकी क्रीड़ाओं और लीला से अत्यंत हैरान व प्रसन्न थे। हैरान इसलिए क्योंकि इससे पहले अद्भुत लीला उन्होंने अपने जीवन काल में कभी नही देखीं थी, और खुश इसलिए क्योंकि श्रीकृष्ण की लीलाओं से सभी को आनंद आता था। माता यशोदा श्रीकृष्ण का लालन पालन कर अत्यंत ही हर्षित थी। नन्द व माता यशोदा श्रीकृष्ण के पालक माता-पिता थे। श्रीकृष्ण ने इंसान के जीवन में धर्म, अर्थ, कर्म व काम का क्या महत्व हैं इसे बहुत ही सरल रूप से समझाया है। इस कविता में कवि सुखमंगल सिंह जी ने श्रीकृष्ण के जीवन व उनके द्वारा की गई लीलाओं का बहुत ही मनोरम व सुन्दर वर्णन किया है।

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यह कविता (कृष्ण जन्माष्टमी।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें — प्रातः उठ हरि हर को भज।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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क्यों कन्हैया?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ क्यों कन्हैया? ♦

त्रिलोकी नाथ तुम, सकल अधिष्ठाता,
चराचर जगत के बस तुम ही रचयिया।
जन्म से निर्वाण पर्यन्त कष्ट ही कष्ट,
अपने भाग्य में क्यों लिखे कन्हैया?

जन्म कारागार में, यमुना की जलधारा में
आकंठ पिता को क्यों था डुबाया?
कागासुर कभी शकटासुर गोकुल में,
पूतना जैसा हर संकट क्यों आया?

महिमा मंडन या दुख संसार की परिणति,
उद्देश्य जनार्दन था तुमने क्या ठाना?
या कुछ न था तुम्हारे भी हाथों में,
पर लोगों ने तो आपको ही प्रभु है माना।

वे रास लीला फिर विरह की पीड़ा,
राज पाया पर सुख कहां भोगा?
कंस, जरासंध फिर काल्यावन चढ़ाई,
कदम कदम का कौतुक, अब क्या होगा?

महाभारत फिर निज कुल का खात्मा,
अंत समाधि में बहेलिए के हाथों हुआ निर्वाण।
कुल की स्त्रियां जब भिलों ने सताई,
तब क्यों बचाने न आए तुम ओ भगवान?

क्यों न जीता अर्जुन तब भीलों से,
महाभारत विजयी धनुर्धर सखा महान?
अर्जुन वही था, वही गांडीव था,
फिर क्यों न चले, तब वे धनुष – बाण?

सवाल कई हैं जहन में आज भी,
होनी बड़ी है कि आप प्रभु, या फिर इंसान?
विधि का लेखा ही सबसे बड़ा है क्या?
या तुम सबसे बड़ा भी, है कोई और ही भगवान?

यह निश्चित है कि सृष्टि संचालक,
नियंता रचयिता है कोई न कोई जरूर।
जो हम ही होते स्वयंभू स्वयं तो,
क्यों होते फिर प्रकृति के हाथों यूं मजबूर?

याद करो प्रभु सहस्र विवाह अपने,
फिर भी प्रेम को तुमने क्यों न पाया?
राधा चाह कर भी क्यों एक न हो सकी?
यह सारा खेल तो हमारी समझ में न आया।

रामावतार में आकाश – पाताल खंगाले,
रावण से भिड़ कर भी सीता को पाया।
यहां तो हजारों विवाह कारा कर भी अपने,
आखिर, राधा रानी को क्यों था सताया?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कृष्ण कन्हैया से पूछा है की आखिर क्यों कन्हैया? तुमने अपने जीवन में जन्म से लेकर अंतिम समधी तक दुःख ही दुःख लिखे ? जन्म हुआ कारागार में, उसी समय तुम्हारे कारण पिता को यमुना में उतरना पड़ा, यमुना पार कर वृन्दावन तुम्हें नन्द व यशोदा जी के घर पर छोड़ना पड़ा। कागासुर तो कभी शकटासुर गोकुल में, पूतना जैसी राक्षसी और भी अनेकानेक का सामना करना पड़ा। मैं इसे क्या समझू ये भी तुम्हारी लीला थी या फिर कुछ न था तुम्हारे भी हाथों में, पर लोगों ने तो आपको ही प्रभु है माना। राज्यपाट भी मिला तो उसका भी सुख अच्छे से भोग न पाए अंतिम समय में तक कंस, जरासंध फिर काल्यावन चढ़ाई, कदम कदम का कौतुक, की अब क्या होगा? इस तरह के सवाल कई हैं जहन में आज भी, “होनी बड़ी है कि आप प्रभु, या फिर इंसान?”

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यह कविता (क्यों कन्हैया?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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यह कैसी टीस।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ यह कैसी टीस। ♦

बिन शोलों के चुभन सी होती है,
बिन जख्मों के ही होती है पीड़ा।
क्षण – क्षण दायित्व का बोझ झकझोडे,
बिन उठाए कोई दायित्व का बीड़ा।

तमाम उम्र के सिलसिले में, अब क्यों,
हर भाव गरियाने से लगते हैं?
कदम – कदम पर मृग तृष्णा से,
क्यों, हर सपने ठगाने से लगते हैं?

जब था न कुछ पास इस जिंदगी के,
तब हम कितने बेखबर, मालामाल थे?
आज होकर पास भी अपने सब कुछ,
क्यों लग रहे हैं, आप हम कंगाल से?

कुछ नहीं है यह जीवन उमंग भरा,
जहां कभी अपनों की ही तरक्की की रीस है।
जीवन की इस संध्या में आज अब,
छूटती हर शय की यह कैसी टीस है?

देह की दहलीज अब सूनी सी रहती है,
क्यों आता न अब कोई बुलाने वाला?
शेष रह गया है आज भी भाव क्यों?
हृदय के कोने में वह सताने वाला।

शिथिल श्वास अब हो रही है,
उष्मित भावों की दरकार कहां?
जीवन नदी के कूलों पर खोज रहा हूं,
क्यों, आते न मिलने सरकार यहां?

अनगिनत सवाल है,
घना बवाल है,
यह माया जाल है,
बड़ा कमाल है,
बस जी रहा हूं मृत्यु की प्रतीक्षा में।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आखिर क्यों हर किसी को अपने सगे सम्बन्धी व ज्ञात व्यक्ति की तरक्की देखीं नहीं जाती, सभी एक दूसरे का टांग खींचने में लगे रहते हैं। आखिर कहां खो गया ओ सादगी, प्रेम, विश्वास, सत्यता, प्यार, समर्पण व त्याग जिससे सभी के जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ थी। क्यों आखिर मन में ये किस तरह की टीस हैं जो सुकून से जीने नहीं देती। आखिर क्यों ? सभी एक दूजे के साथ दुश्मनों जैसी व्‍यवहार करते है, वह प्रेम शालीनता कहां खो गया? क्यों एक दूसरे का टांग खींचने में लगे रहते हैं? क्यों इंसान इतना ऊब जाता है की मृत्यु का इंतज़ार करने लगता हैं?

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यह कविता (यह कैसी टीस।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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भारत मेरा देश।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भारत मेरा देश। ♦

देश हमारा हिंदुस्तान,
हमें जान से प्यारा है।
तिंरगा हमारी शान है,
ये हिंदुस्तान हमारा है।

कृष्ण राम तुलसी जैसे,
महापुरुषो की तपोभूमि।
धन्य है माटी हिंदुस्तान की,
ये हिंदुस्तान हमारा है।

सुभाष, भगत, गांधी जैसे,
वीर और निडर सपूत दिए।
सीने पर गोली खाकर,
ये आजादी दिलवायी हमें।
शहीद हुए वीर जहाँ पर,
ये मेरा हिंदुस्तान है।

सरहद पर बैठे सीना ताने,
दुश्मन के आगे सर न झुकाए।
बैठे है देश के रक्षक बनकर,
ऐसे वीरो को सलाम है,
ये मेरा हिंदुस्तान है।

यहां सब रहते मिलजुलकर,
एकता भाई चारे की मिसाल है।
गुरुग्रंथ साहिब गीता और कुरान है,
सारे विश्व मे मेरा भारत महान है।

सत्य अहिसा प्रेम का ये,
विश्व शांति का दूत है।
सबसे प्यारा सबसे निराला,
ये मेरा हिंदुस्तान है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — तिरंगा है यह खिलौना नहीं, हर रंग का लहदा भाव निराला है । शौर्य, वीरता, शान्ति, समृद्धि, मध्य चक्र प्रतीक समय का डाला है। यहां के बच्चों के अंदर जन्म से ही वीर रस भरा होता है, जिसे बस निखारने की जरूरत होती हैं। भारत का शौर्य अद्भुत व बहुत ही अनुपम हैं, दुश्मन का संस्कार भी करें अदब से गर तोड़े दम। पीठ पर कभी भी न करें वार यहाँ के वीर जवान। यह धरती है उन वीरों की जो देश पर होते है सदैव ही कुर्बान। तहे दिल से नमन है माँ भारती के हर उन शूरवीर सपूतों को जिनके बलिदान के बदले हमे आज़ादी मिली। जो आये थे यहां व्यापार करने, व्यापार के बहाने हमे अपना गुलाम बनाकर खूब मनमानी किया। उन्होंने हम पर बहुत ही निर्दयता पूर्वक अत्याचार किया, और हमें खूब लुटा। हमें कभी भी नहीं भूलना चाहिए उन शूरवीर सपूतों के बलिदान को, जिनके बलिदान के बदले हमे आज़ादी मिली। शत-शत नमन है उन वीर सपूतों की जननी को जिन्होंने अपने लाल को माँ भारती की रक्षा के लिए ख़ुशी – ख़ुशी समर्पित किया। जय हिन्द – जय भारत।

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यह कविता (भारत मेरा देश।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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