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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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2017-Kmsraj51 की कलम से…..

जानते तो बहुत है…।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ जानते तो बहुत है…। ϒ

हम जानते तो बहुत कुछ है लेकिन मायने यह रखता है की हम मानते कितना है और अपने जीवन में utilize(उपयोग) – कितना करते है। जो हम सब जानते है उसे अगर अपने जीवन में उपयोग नही करते तो फिर जानने का क्या फायदा – जरा गंभीरता से सोचे(Think seriously).

जब भी कोई कुछ बताता है – उसकी पूरी बात सुनते भी नहीं बीच में ही टोक देते है -‘मुझे पता है”, भाई जब तुझे पता ही है तो फिर उस ज्ञान या जानकारी को अपने जीवन में उपयोग क्यों नही करते। इंसान जानने को तो बहुत कुछ जानता है – लेकिन जानना तब तक फायदेमंद नही होगा जब तक आप उसे अपने जीवन में उपयोग नही करते। सिर्फ जानने मात्र से कुछ नहीं होगा – उपयोग करना जरूरी है।

Stop Living In The Past, Spend Time In Future.
“अतीत में रहना बंद करो, भविष्य में समय व्यतीत करें।”

Out of your comfort zone

अगर आप वाकई में अपने जीवन में सफल होना चाहते है तो – अपने Comfort zone से बाहर निकल कर, सही track पर चलना start कर दे, अर्थात: आपके पास जो भी है, जितना भी है उसी से शुरूआत कर दे। आपके सोच में सिर्फ व सिर्फ आपका लक्ष्य ही हो।

एक बात सदैव ही याद रखे … आपके दिमाग में असीमित शक्तियां निहित है – बस जरूरत है इन शक्तियों को जागृत कर उसे उचित तरीके से उपयोग करने की। आपके सोच से भी कही अत्यधिक। आपको वह सब कुछ मिलेगा जो आपके सोच से भी ऊपर है, लेकिन यह तब होगा – जब आप अपने माइंड की शक्तियों को उपयोग करना शुरू करेंगे। दिमाग में ‘अनन्त शक्तियां’ (infinitive powers) भरी है, लेकिन सभी की Problem – क्या है इन शक्तियों को उपयोग नहीं करते। जब तक आप इन शक्तियों का उपयोग नहीं करेंगे – तब तक आप सफल नहीं होंगे। चाहे जितने भी हाथ-पैर मार ले आप, वही के वही रह जायेंगे।

♥ उछलकर वापस आना।….. जरूर पढ़े।

अब यह कहना छोड़ दे मुझे पता है – अब जो सही पता है उसे अपने जीवन में उपयोग करना शुरू कर दे। जीवन के खेल में हारता वही है – जो खेल छोड़ कर भाग जाता है, आप तब तक नहीं हारते जब तक की आप खुद मैदान छोड़कर भागते नहीं। जो भी कार्य शुरू करे सोच समझकर करें, और एक बार जो कार्य शुरू करे उसे पूरा करने तक न रुके। आप जरूर सफल होंगे।

इस संसार में आज तक ऐसा कोई भी नहीं हुआ जो – अपने माइंड की शक्तियों का उपयोग किये बगैर सफल हुआ हो। अब समय आ गया है की … ‘मैं जानता हु … मैं जानता हु,’ का रट लगाना बंद करें। अच्छे कार्यों को करने में देर न करें – तुरंत शुरू कर दे, और तब तक न रुके जब तक उस कार्य को पूर्ण न कर दे। आप अच्छे कार्य के लिए एक कदम आगे तो बढ़ाये ….. प्रकृति के पांचो तत्व आपकी मदद करने लगेंगी, आपके रास्ते खुद ब खुद बनते चले जायेंगे: जो आपको आपके लक्ष्य तक पहुचाएंगे।

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Krishna Mohan Singh(KMS)
Editor in Chief, Founder & CEO
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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।~Kmsraj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought to life by. By doing this you Recognize hidden within the buraiya ensolar radiation and encourage good solar radiation to become themselves.

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

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मन के रोग निकालें…।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ मन के रोग निकालें…। ϒ

मन के रोग निकालें… Remove the disease from the mind…

एक सेठ के घर में चोर घुस गया। कमरे में कुछ खड़खड़ की आवाज हुई तो सेठानी चौक उठी। उसने अपने पति को जगाकर कहा: ‘मुझे लगता है कि अपने घर में कोई चोर घुस आया है।’ सेठ ने कहा: ‘हाँ-हाँ ज़रुर आया होगा, रात के समय और कौन आ सकता है।’ यह कहकर उसने चादर सिर तक तान ली। सेठानी ने दरवाज़े के छिद्र में से देखा – चोर ने तिजोरी खोल ली है और रुपये व जेवर आदि कपड़े में बांध रहा है। सेठानी ने पति से कहा: ‘जल्दी उठो, उसने सारी संपत्ति कपड़े में बांध ली है।’

सेठ बोला – ‘मैं जानता हूँ, वह आया है, तो कुछ लेकर ही जाएगा। सेठानी बोली: ‘हम लुट गए हैं।’ सेठ ने कहा – ‘मैं जानता हूँ, मगर अब कोई उपाय भी तो नहीं है।’ इस बार सेठानी को आवेश आ गया। बोली – ‘तुम बस जानते ही रहो। अब मुझे ही कुछ करना पड़ेगा।’ वह दाैड़कर घर के मुख्य द्वार पर पहुंचकर ज़ोरों से चिल्लाई: ‘बचाओ ! चोर-चोर !’ चोर डरकर गठरी को वहीं फेंक कर भाग खड़ा हुआ। सेठानी ने गठरी अंदर लेकर पति से कहा: ‘मैंने चोर को भगा दिया है।’ सेठ उठकर बोला: ‘मैं जानता था, तुम कमरे से बाहर गई हो तो बचाव का कुछ न कुछ उपाय करके ही आओगी।’ सेठानी ने अपना सिर थाम कर कहा: ‘जानते थे तो फिर साथ क्यों नही दिया ?’

इसी तरह आज हम सब जानते है, लेकिन ज्ञान को आचरण में उतार नहीं पाते। ज्ञान केवल जान लेने मात्र से कुछ भी लाभ होने वाला नहीं है। उदाहरण के तौर पर, हम सर्प को भी जानते है, इसलिए उसके मुँह को तो क्या पूंछ को भी हाथ नहीं लगाते। बिच्छू के स्वभाव से परिचित होने के कारण हम उसे अपनी जेब में रखकर नहीं घूमते, क्योंकि हमें यह ज्ञान है कि ये विषैले जीव हैं। हम स्वप्न में भी इन्हें पकड़ने की भूल नहीं करते।

सीख – आज हमारे तन में जितने रोग नहीं हैं, उससे कहीं अधिक रोग हमने अपने मन में पाल रखे हैं। हमारा चिंतन सकारात्मक कम और नकारात्मक अधिक हो गया है। जीवन की यह मस्ती ही जीवन की कश्ती को डुबो देगी। अभी हमारे पास समय है। हम जागें, अंधकार से बाहर निकलें और जीवन को जागृति और सत्यता के साथ जियें।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

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अभी समय नहीं…।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ अभी समय नहीं…। ϒ

अभी समय नहीं…

एक बार कबीरदास जी परमात्मा का भजन करते हुए गली से निकल रहे थे। उनके आगे कुछ स्त्रियां जा रही थी। उनमे से एक स्री की शादी कहीं तय हुई होगी तो उसके ससुराल वालों ने शगुन में एक नथुनी भेजी थी। वह लड़की अपनी सहेलियों को बार-बार नथनी के बारे में बता रही थी कि नथनी ऐसी है वैसी है…। ये ख़ास उन्होंने मेरे लिए भेजी है… बार-बार बस नथनी की ही बात…।

उनके पीछे चल रहे कबीरदास जी के कान में सारी बातें पड़ रही थी।

तेजी से कदम बढ़ाते हुए कबीरदास जी उनके पास से निकले और कहा –
‘नथनी देनी यार ने,
तो चिंतन बारम्बार, और
नाक दीनी जिस करतार ने,
उनको तो दिया बिसार… ।

सोचो यदि नाक ही न होती तो नथनी कहाँ पहनती।’

यही जीवन में हम भी करते हैं। भौतिक वस्तुओं का ज्ञान तो हमे रहता है, परंतु जिस परमात्मा ने यह दुर्लभ मनुष्य देह दी और इस देह से सम्बंधित सारी वस्तुएं, सभी रिश्ते-नाते दिए, उसी को याद करने के लिए हमारे पास समय नहीं होता। इसलिए सदा उन अनगिनत अमूल्य देन के लिए पारब्रह्मा परमात्मा के आभारी रहें जो उन्होंने हमें दी है।

मन को अचल-अडोल स्थिती मैं स्थित करने के लिए सर्वप्रथम अपने मन को फालतू विचारों से मुक्त करना होगा अर्थात: अपने मन से फालतू विचारों का कचरा हटाना होगा, तभी आप अपने मन के अंदर अच्छे विचारों को स्थित कर पाएंगे।

♥ – एक बात सदैव ही – याद रखें ….. समय का प्रबंधन वास्तव में जीवन का प्रबंधन है। यह दरअसल घटनाओं के क्रम को नियंत्रित करना है। समय का प्रबंधन का अर्थ है, इस बात पर नियंत्रण करना कि आप अगला कार्य कौन सा करेंगे, और आप हमेशा अपना कार्य चुनने के लिए स्वतंत्र होते हैं। महत्वपूर्ण और महत्वहीन के बीच विकल्प चुनने कि आपकी काबिलियत, जिंदगी और काम-धंधे में आपकी सफलता तय करने वाली अहम कुंजी हैं। असरदार और उत्पादक लोग खुद को इस बात के लिए अनुशासित कर लेते हैं कि वे सबसे महत्वपूर्ण कार्य से ही दिन कि शुरुआत करें।

“किसी महत्वपूर्ण कार्य को शुरू और पूरा करने के बारे में सोचने भर से ही आप प्रेरित हो जाते हैं। इससे आपको टालमटोल छोड़ने में मदद मिलती हैं।”

सच तो यह हैं कि किसी महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के लिए भी अक्सर उतने ही समय की जरूरत होती हैं, जितनी कि महत्वहीन कार्य को करने के लिए। फर्क यह है कि महत्वपूर्ण कार्य पूरा करने के बाद आपको गर्व और संतुष्टि का जबरदस्त एहसास होता हैं। बहरहाल जब आप उतना ही समय और ऊर्जा खर्च करके कोई मूल्यहीन या महत्वहीन कार्य पूरा करते हैं, तो आपको बहुत कम संतुष्टि मिलती हैं या जरा भी नही मिलती। उत्पादक लोग(productive people) या सफल लोग – महत्वपूर्ण कार्य को ही सबसे पहले करते हैं, भले ही वह कठिन हो, चाहे वह जो भी हो। नतीजा यह होता हैं – कि वे आम आदमी से कहीं ज्यादा हासिल करते हैं और ज्यादा खुश भी रहते हैं।

“कार्य करने का ये तरीका आपको भी अपनाना चाहिए।”

महत्वपूर्ण कार्य का जर्नल(नाेटबुक या डायरी) रखें – और उसमें रात में सोते समय ही अगले दिन के कार्य का डिटेल्स लिख ले – सबसे पहले अपनी डायरी में तीन कालम बना ले, पहले वाले कालम में हेडिंग्स डाले – अत्याधिक महत्वपूर्ण कार्य, दूसरे वाले कालम में हेडिंग्स डाले – महत्वपूर्ण कार्य, और तीसरे वाले कालम में हेडिंग्स डाले – कम महत्वपूर्ण कार्य।

सीख – क्योंकि प्रभु स्मृति और निराभिमानी स्थिति ही उन चीजों या देन को अविनाशी और सदैव खूबसूरत बनाये रख सकती है। इसलिए मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।

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हमेशा सीखते रहना।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ हमेशा सीखते रहना। ϒ

अगर है लक्ष्य काे पाना ⇒ हमेशा सीखते रहना – “किसी व्यक्ति की शिक्षा तब तक ख़त्म नहीं होती – जब तक की वो खुद ही सीखना छोड़ दे।”
_ अगर आप वाकई अपने लक्ष्य काे पाना चाहते हैं ताे _ “अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकले।” कम्फर्ट जोन से बाहर निकले बिना आपको कुछ भी नहीं मिलेगा।

♥ – “जिस व्यक्ति का निश्चित प्रमुख लक्ष्य(The major goal) बहुत बड़ा है, उसे हमेशा सीखते रहना चाहिए। उसे हर संभव स्रोत से सीखना चाहिए, ख़ासकर उन स्रोताें से जिनसे उसे अपने प्रमुख लक्ष्य से संबंधित ज्ञान और अनुभव हासिल हो सकता हो।”

♥ – “सार्वजनिक पुस्तकालय ज्ञान का भंडार है। वहाँ हर विषय पर बहुत सा ज्ञान मुफ़्त मिलता है, वहाँ हर भाषा में हर विषय पर सम्पूर्ण मानवीय ज्ञान उपलब्ध है। निश्चित प्रमुख लक्ष्य वाला सफल व्यक्ति दृढ़ निश्चय करके अपने लक्ष्य से संबंधित पुस्तकें पढ़ता है। इस प्रकार उसे अपने से पहले सफल हुए लोगों के अनुभव से महत्वपूर्ण ज्ञान मिलता है।”

♥ – “पढ़ने की योजना भी उतनी ही सावधानी से बनाना चाहिए, जितनी सावधानी से दैनिक आहार की योजना बनाई जाती है। इसका कारण यह है कि ज्ञान भी मस्तिष्क का भोजन है, जिसके बिना हमारा मानसिक विकास नहीं हो सकता।”

♥ – “यही उन लोगों के बारे में कहा जा सकता है, जो नियमित रूप से ऐसी कोई सामग्री नहीं पढ़ते हैं, जिससे उन्हें अपने प्रमुख लक्ष्य को पाने में मदद मिल सके। बिना योजना के पढ़ना मजेदार तो हो सकता है, लेकिन इससे व्यक्ति को अपने काम के सम्बन्ध में मदद नहीं मिलती है।”

‘बहरहाल, पुस्तक ही सीखने का एकमात्र स्रोत नहीं हैं।’

♥ – “व्यावसायिक क्लबाें द्वारा भी शैंक्षणिक लाभ के गठबंधन बनाए जा सकते हैं, बशर्ते क्लबाें और उनके सदस्यों को निश्चित मानसिक लक्ष्य के साथ चुना जाए। ऐसा करके कई लोगों ने महत्वपूर्ण व्यावसायिक और सामाजिक संपर्क बनाए हैं, जिनके माध्यम से उन्हें उनके प्रमुख लक्ष्य तक पहुँचने में बहुत मदद मिली है।”

♥ – “दोस्त बनाने कि आदत न हो तो कोई जिंदगी में सफल नहीं हो सकता हैं। ‘संपर्क’ एक महत्वपूर्ण शब्द है, जिसका इस्तेमाल व्यक्तिगत संबंध बनाने में किया जाता है। अगर कोई व्यक्ति हर दिन अपनी व्यक्तिगत संपर्क सूची बढ़ाने की आदत डालता है, तो उसे बहुत लाभ होगा। परिचय क्षेत्र बढ़ने के कारण उसे इतने तरीको से लाभ होगा कि उनका उल्लेख (Mention) नहीं किया जा सकता। अगर संपर्क अच्छी तरह से बनाए गए है, तो वक्त जरुरत के समय उसके परिचित और मित्र उसकी मदद करने के लिए तैयार व इच्छुक होंगे।”

“मंदिर, गुरुद्वारा, चर्च और मस्जिद, संपर्क बनाने या परिचय बढ़ाने के सबसे अच्छे स्रोताें में से एक है, क्योकि यहाँ पर लोग साहचर्य की भावना से एकत्रित होते हैं।”

♥ – “हर व्यक्ति को अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे संपर्क बनाने की जरुरत होती है। उनमे आपसी समझ होना चाहिए और विचारों का मित्रतापूर्ण आदान-प्रदान होना चाहिए। यह जरूरी नहीं है कि इसके पीछे आर्थिक लाभ का लक्ष्य हो। जो व्यक्ति अपने ही खोल में सिमटकर रहता है, वह निश्चित रूप से अंतर्मुखी बन जाता है। जल्दी ही वह स्वार्थी हो जाता है और जिंदगी के बारे में उसके विचार संकीर्ण बन जाते है।”

याद रखें – हर एक सफल व्यक्ति पहले एक अच्छा पाठक (Reader) होता है, उसके पास सदैव पुस्तकें जरूर होंगे, वह पुस्तक प्रेमी होता है। उसे जहाँ से भी सीखने को मिलता है वह निरअहंकारी (Egoless person) स्वभाव से सीखता है।

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ब्रज के प्रसिद्ध १२ वनों के नाम।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ ब्रज के प्रसिद्ध १२ वनों के नाम। ϒ

ब्रज के प्रसिद्ध १२ वनों के नाम… 12 famous forest of Braj…..

  • मधुवन
  • तालवन
  • कुमुदवन
  • बहुलावन
  • कामवन
  • खदिरवन
  • वृन्दावन
  • भद्रवन
  • भांडीरवन
  • बेलवन
  • लोहवन
  • महावन

इनमें से आरंभ के ७ वन यमुना नदी के पश्चिम में हैं और अन्त के ५ वन उसके पूर्व में हैं। इनका संक्षिप्त वृतांत इस प्रकार है…..

मधुवन – यह ब्रज का सर्वाधिक प्राचीन वनखंड है। इसका नामोल्लेख प्रागैतिहासिक काल से ही मिलता है। राजकुमार ध्रुव ने इसी वन में तपस्या की थी। शत्रुघ्न ने यहां के अत्याचारी राजा लवणासुर को मारकर इसी वन के एक भाग में मथुरापुरी की स्थापना की थी। वर्तमान काल में उक्त विशाल वन के स्थान पर एक छोटी सी कदमखंडी शेष रह गई है और प्राचीन मथुरा के स्थान पर महोली नामक ब्रज ग्राम वसा हुआ है, जो कि मथुरा तहसील में पड़ता है।

तालवन – प्राचीन काल में यह ताल के वृक्षों का एक बड़ा वन था, और इसमें जंगली गधों का बड़ा उपद्रव रहता था। भागवत में वर्णित है, बलराम ने उन गधों का संहार कर उनके उत्पात को शांत किया था। कालान्तर में उक्त वन उजड़ गया और शताब्दियों के पश्चात् वहां तारसी नामक एक गाँव बस गया। जो इस समय मथुरा तहसील के अंतर्गत है।

कुमुदवन – प्राचीन काल में इस वन में कुमुद पुष्पों की बहुलता थी। जिसके कारण इस वन का नाम ‘कुमुदवन’ पड़ गया था। वर्तमान काल में उसके समीप एक पुरानी कदम खड़ी है, जो इस वन की प्राचीन पुष्प समृद्धि का स्मरण दिलाती है।

बहुलावन – इस वन का नामकरण यहाँ की एक बहुला गाय के नाम पर हुआ है। इस गाय की कथा ‘पद्म पुराण’ में मिलती है। वर्तमान काल में इस स्थान पर झाड़ियों से घिरी हुई एक कदम खंड़ी है, जो यहां के प्राचीन वन-वैभव की सूचक है। इस वन का अधिकांश भाग कट चुका है और आजकल यहां बाटी नामक ग्राम बसा हुआ है।

कामवन – यह ब्रज का अत्यन्त प्राचीन और रमणीक वन था। जो पुरातन वृन्दावन का एक भाग था। कालांतर में वहां बस्ती बस गई थी। इस समय यह राजस्थान के भरतपुर जिला की ड़ीग तहसील का एक बड़ा कस्बा है। इसके पथरीले भाग में दो ‘चरण पहाड़िया’ हैं, जो धार्मिक स्थली मानी जाती हैं।

खदिरवन – यह प्राचीन वन भी अब समाप्त हो चुका है और इसके स्थान पर अब खाचरा नामक ग्राम बसा हुआ है। यहां पर एक पक्का कुंड और एक मंदिर है।

वृन्दावन – प्राचीन काल में यह एक विस्तृत वन था, जो अपने प्राकृतिक सौंदर्य और रमणीक वन के लिये विख्यात था। जब मथुरा के अत्याचारी राजा कंस के आतंक से नंद आदि गोपों को वृद्धवन (महावन) स्थित गोप-बस्ती (गोकुल) में रहना असंभव हो गया, तब वे सामुहिक रुप से वहां से हटकर अपने गो-समूह के साथ वृन्दावन में जाकर रहे थे।

भागवत आदि पुराणों से और उनके आधार पर सूरदास आदि ब्रज-भाषा कवियों की रचनाओं से ज्ञात होता है कि उस वृन्दावन में गोवर्धन पहाड़ी थी और उसके निकट ही यमुना प्रवाहित होती थी। यमुना के तटवर्ती सघन कुंजों और विस्तृत चारागाहों में तथा हरी-भरी गोवर्धन पहाड़ी पर वे अपनी गायें चराया करते थे।

वह वृन्दावन पंचयोज अर्थात बीस कोस परधि का तथा ॠषि मुनियों के आश्रमों से युक्त और सघन सुविशाल वन था।
 
वहाँ गोप समाज के सुरक्षित रुप से निवास करने की तथा उनकी गायों के लिये चारे घास की पर्याप्त सुविधा थी।
 
उस वन में गोपों-गोपियों ने दूर-दूर तक अनेक बस्तियां बसाई थी। उस काल का वृन्दावन गोवर्धन-राधाकुंड से लेकर नंदगांव-बरसाना और कामवन तक विस्तृत था।

संस्कृत साहित्य में प्राचीन वृंदावन के पर्याप्त उल्लेख मिलते हैं। जिसमें उसके धार्मिक महत्व के साथ ही उसकी प्राकृतिक शोभा का भी वर्णन किया गया है। महाकवि कालिदास ने उसके वन-वैभव और वहाँ के सुन्दर फूलों से लदे लता-वृक्षों की प्रशंसा की है। उन्होंने वृन्दावन को कुबेर के चैत्ररथ नामक दिव्य उद्यान के सदृश बतलाया है।

वृन्दावन का महत्व सदा से श्रीकृष्ण के प्रमुख लीला स्थल तथा ब्रज के रमणीक वन और एकान्त तपोभूमि होने के कारण रहा है। मुसलमानी शासन के समय प्राचीन काल का वह सुरम्य वृन्दावन उपेक्षित और अरक्षित होकर एक बीहड़ वन हो गया था। पुराणों में वर्णित श्री कृष्ण-लीला के विविध स्थल उस विशाल वन में कहाँ थे, इसका ज्ञान बहुत कम था।

भद्रवन, भांडीरवन, बेलवन – ये तीनों वन यमुना की बांयी ओर ब्रज की उत्तरी सीमा से लेकर वर्तमान वृन्दावन के सामने तक थे। वर्तमान काल में उनका अधिकांश भाग कट गया है और वहाँ पर छोटे-बड़े गाँव बस गये हैं। उन गाँवों में टप्पल, खैर, बाजना, नौहझील, सुरीर, भाँट पानी गाँव उल्लेखनीय है।

लोहवन – यह प्राचीन वन वर्तमान मथुरा नगर के सामने यमुना के उस पार था। वर्तमान काल में वहाँ इसी नाम का एक गांव बसा है।

महावन – प्राचीन काल में इसी वन में भगवान की परम पावन रास लीला का प्रादुर्भाव हुआ था व आज भी भक्तों को इसकी अनुभूति होती है यह एक विशाल सघन वन था।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiya ensolar radiation, and encourage good solar radiation to become tthemselves

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

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चेहरे मुस्कुराते हैं।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ चेहरे मुस्कुराते हैं। ϒ

आजकल…
दूर से देखो तो दीवाने से लोग है।
देखो करीब से तो अंजाने से लोग हैं।
चेहरे पर उनके है हर पल मुस्कुराहट॥
मगर…
दिल में झाकोगे तो बस तन्हाईयाँ ही है _
हर पल।
महफ़िल सजी है फिर भी वीराने से लोग हैं॥

♦—♦

कुछ लोग अंदर से कुछ और _
और बाहर से कुछ और दिखते है।
बातें हमेशा करते रहते है सत्संग की।
मगर बुराई भी सभी की किया करते है॥

♦—♦

भगवान हमारे निर्माता है।
उन्हीं ने हमारे मष्तिष्क और व्यक्तित्व _
में असीमित शक्तियां और क्षमताएं दी है।
ईश्वर की प्रार्थना हमें इन शक्तियों को _
विकसित करने में हमारी मदद करती है॥

♦—♦

बहते दरिया काे कोई मोड़ नहीं सकता।
टूटे शीशे को कोई जोड नहीं सकता।
एक बार विश्वास किसी से टूट गया _
ताे वाे बार-बार कोशिश करने पर भी-
वापस उस इंसान पर हो नहीं सकता॥

♦—♦

रस्सी जल जाती है।
लेकिन अकड़ नहीं जाती।
जिंदगी भर कोई-कोई इंसान की-
बुद्धि काम नहीं आती।
अकड़ में ही वो जीता है और…
अकड़ में ही मर जाता है॥

♦—♦

जीवन में प्रेम दोगे तो प्रेम ही मिलेगा।
दूसरों को नफरत दोगे तो नफरत ही मिलेगी॥
फूल दोगे तो फूल मिलेगा।
काँटे दोगे तो मिलेंगे काँटे ही।
जो कर्म करोगे वही लौट के ही आयेगा॥

♦—♦

रिश्तों के चक्रव्यूह में जो फंसता है।
वह कभी भी खुश नहीं रह पाता।
क्योंकि रिश्ते बदल गये है।
ज़माना बदल गया है।

बहुत अधिक नम्रता…
सहनशीलता चाहिए…
रिश्तों को निभाने के लिये।
वो आजकल बहुत कम है…
हर किसी के पास में।

♦—♦

कुछ लोग अकेले और…
एकान्त में काफ़ी खुश-
और शांत दिखाई देते है।

उन्हें किसी चीज़ की…
जरूरत महसूस नहीं होती।
वो अपने में ही मस्त रहते है।

वो अपने ही काम में…
हमेशा व्यस्त रहते है।
उनका किसी से _
झगड़ा लड़ाई नहीं होती।

♦—♦

अच्छा व्यवहार, सुंदर हृदय_
एक दूसरे पर…
ना टूटने वाला विश्वास हो।

वही जीवन में रिश्तों को_
पक्का करते है।
वही रिश्ते टिकते है।

वरना सुंदर चेहरा हो।
मीठा-मीठा बोलने का अंदाज हो।

लेकिन…
दिल साफ ना हो तो
रिश्ते नहीं टिकते।

♦—♦

कुछ लोगों में एहसास नाम की_
चीज ही नहीं होती।
उन लोगो से शिकायत करने का_
कुछ फायदा भी नहीं होता।

♦—♦

आजकल तो जिसे देखो वो_
दर्द देने के लिये तैयार बैठा है।
बया करे तो दर्द अपना किससे_
सब तमाशबीन बैठे है॥

इसलिए अच्छा यही होगा कि_
हम ही किसी के दर्द की दवा बने।
किसी को दर्द ना दे।
वरना दर्द देने के लिये हजार बैठे है॥

♦—♦

दुनिया चलती है दुनिया चलती रहेगी।
लोग आते है दुनिया में फिर चले जाते है।
कोई भी इंसान अधूरा नहीं रहता।
किसी के चले जाने से वक्त निकल ही जाता है।
कुछ नया पाकर और कुछ पुराना भुलाकर॥

©- विमल गांधी जी। ∇

Vimal Gandhi-kmsraj51
विमल गांधी जी।

हम दिल से आभारी हैं विमल गांधी जी के प्रेरणादायक हिन्दी Quotes & Poems साझा करने के लिए।

विमल गांधी जी के लिए मेरे विचार:

♣ “विमल गांधी जी” की कविताआे और Quotes के हर एक शब्द में अलाैकिक सार भरा हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। कविताऐं और Quotes छोटी और सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान इन कविताओं और Quotes काे गहराई(हर शब्दाे का सार) से समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।

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आप सभी का प्रिय दोस्त

Krishna Mohan Singh(KMS)
Editor in Chief, Founder & CEO
of,,  https://kmsraj51.com/

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।~Kmsraj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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गौमूत्र चिकित्सा – गौ मूत्र लाभ और दुष्प्रभाव।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ गौमूत्र चिकित्सा – गौ मूत्र लाभ और दुष्प्रभाव। ϒ

गोमूत्र के लाभ, गौमूत्र चिकित्सा, गौ मूत्र लाभ और दुष्प्रभाव, गाय का उपयोग, गोमूत्र स्वास्थ्य लाभ।

शास्‍त्रों में ऋषियों-महर्षियों ने गौ की अनंत महिमा लिखी है। उनके दूध, दही़, मक्खन, घी, छाछ, मूत्र आदि से अनेक रोग दूर होते हैं। गोमूत्र एक महौषधि है। इसमें पोटैशियम, मैग्नीशियम क्लोराइड, फॉस्‍फेट, अमोनिया, कैरोटिन, स्वर्ण क्षार आदि पोषक तत्व विद्यमान रहते हैं इसलिए इसे औषधीय गुणों की दृष्टि से महौषधि माना गया है।

गौ-माता से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण जानकारी।

गौ एवं गौ विज्ञान से जुड़े प्रश्नोत्तर एवं आयुर्वेदिक दृष्टी से गौमाता का महत्व।

»»» Q & A ⇒

गौ एवं गौ विज्ञान से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले कुछ प्रश्नोत्तर यहाँ दिये गए है। अगर आपके मन में इन प्रश्नों के अलावा भी कोई प्रश्न आए तो आप इस पेज पर कमेंट के रूप में हम से पूछ सकते है। आपके द्वारा पूछे गए अच्छे प्रश्नों को हम यहाँ जोड़ कर सभी के लिए उसका उत्तर उपलब्ध करवाएँगे।

प्रश्न 1. गौ क्या है?

उत्तर 1. गौ ब्रह्मांड के संचालक सूर्य नारायण की सीधी प्रतिनिधि है।इसका अवतरण पृथ्वी पर इसलिए हुआ है ताकि पृथ्वी की प्रकृति का संतुलन बना रहे। पृथ्वी पर जितनी भी योनियाँ है सबका पालन-पोषण होता रहे। इसे विस्तृत में समझने के लिए ऋगवेद के 28वें अध्याय को पढ़ा जा सकता है।

प्रश्न 2. गौमाता और विदेशी गौ में अंतर कैसे पहचाने?

उत्तर 2. गौमाता एवं विदेशी गौ में अंतर पहचानना बहुत ही सरल है| सबसे पहला अंतर होता है गौमाता का कंधा (अर्थात गौमाता की पीठ पर ऊपर की और उठा हुआ कुबड़ जिसमें सूर्यकेतु नाड़ी होती है), विदेशी गाय में यह नहीं होता है एवं उसकी पीठ सपाट होती है।दूसरा अंतर होता है गौमाता के गले के नीचे की त्वचा जो बहुत ही झूलती हुई होती है जबकि विदेशी काऊ के गले के नीचे की त्वचा झूलती हुई ना होकर सामान्य एवं कसीली होती है। तीसरा अंतर होता है गौमाता के सिंग जो कि सामान्य से लेकर काफी बड़े आकार के होते है जबकि विदेशी काऊ के सिंग होते ही नहीं है या फिर बहुत छोटे होते है। चौथा अंतर होता है गौमाता कि त्वचा का अर्थात गौमाता कि त्वचा फैली हुई, ढीली एवं अतिसंवेदनशील होती है जबकि विदेशी काऊ की त्वचा काफी संकुचित एवं कम संवेदनशील होती है।

प्रश्न 3. अगर थोड़ा सा भी दही नहीं हो तब दूध से दही कैसे बनाएँ?

उत्तर 3. हल्के गुन-गुने दूध में नींबू निचोड़ कर दही जमाया जा सकता है। इमली डाल कर भी दही जमाया जाता है। गुड़ की सहायता से भी दही जमाया जाता है। शुद्ध चाँदी के सिक्के को गुन-गुने दूध में डालकर भी दही जमाया जा सकता है।

प्रश्न 4. किस समय पर दूध से दही बनाने की प्रक्रिया शुरू करें?

उत्तर 4. रात्री में दूध को दही बनने के लिए रखना सर्वश्रेष्ठ होता है। ताकि दही एवं उससे बना मट्ठा, तक्र एवं छाछ सुबह सही समय पर मिल सके।

प्रश्न 5. गौमूत्र किस समय पर लें?

उत्तर 5. गौमूत्र लेने का श्रेष्ठ समय प्रातःकाल का होता है और इसे पेट साफ करने के बाद खाली पेट लेना चाहिए। गौमूत्र सेवन के 1 घंटे पश्चात ही भोजन करना चाहिए।

प्रश्न 6. गौमूत्र किस समय नहीं लें?

उत्तर 6. मांसाहारी व्यक्ति को गौमूत्र नहीं लेना चाहिए। गौमूत्र लेने के 15 दिन पहले मांसाहार का त्याग कर देना चाहिए। पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति को सीधे गौमूत्र नहीं लेना चाहिए, गौमूत्र को पानी में मिलाकर लेना चाहिए। पीलिया के रोगी को गौमूत्र नहीं लेना चाहिए। देर रात्रि में गौमूत्र नहीं लेना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में गौमूत्र कम मात्र में लेना चाहिए।

प्रश्न 7. क्या गौमूत्र पानी के साथ लें?

उत्तर 7. अगर शरीर में पित्त बढ़ा हुआ है तो गौमूत्र पानी के साथ लें अथवा बिना पानी के लें।

प्रश्न 8. अन्य पदार्थों के साथ मिलकर गौमूत्र की क्या विशेषता है? (जैसे की गुड़ और गौमूत्र आदि संयोग)

उत्तर 8. गौमूत्र किसी भी प्रकृतिक औषधी के साथ मिलकर उसके गुण-धर्म को बीस गुणा बढ़ा देता है। गौमूत्र का कई खाद्य पदार्थों के साथ अच्छा संबंध है जैसे गौमूत्र के साथ गुड़, गौमूत्र शहद के साथ आदि।

प्रश्न 9. गाय का गौमूत्र किस-किस तिथि एवं स्थिति में वर्जित है? (जैसे अमावस्या आदि)

उत्तर 9. अमावस्या एवं एकादशी तिथि तथा सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण वाले दिन गौमूत्र का सेवन एवं एकत्रीकरण दोनों वर्जित है।

प्रश्न 10. वैज्ञानिक दृष्टि से गाय की परिक्रमा करने पर मानव शरीर एवं मस्तिष्क पर क्या प्रभाव एवं लाभ है?

उत्तर 10. सृष्टि के निर्माण में जो 32 मूल तत्व घटक के रूप में है वे सारे के सारे गाय के शरीर में विध्यमान है। अतः गाय की परिक्रमा करना अर्थात पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करना है। गाय जो श्वास छोड़ती है वह वायु एंटी-वाइरस है। गाय द्वारा छोड़ी गयी श्वास से सभी अदृश्य एवं हानिकारक बैक्टेरिया मर जाते है। गाय के शरीर से सतत एक दैवीय ऊर्जा निकलती रहती है जो मनुष्य शरीर के लिए बहुत लाभकारी है। यही कारण है कि गाय की परिक्रमा करने को अति शुभ माना गया है।

प्रश्न 11. गाय के कूबड़ की क्या विशेषता है?

उत्तर 11. गाय के कूबड़ में ब्रह्मा का निवास है। ब्रह्मा अर्थात सृष्टि के निर्माता। कूबड़ हमारी आकाश गंगा से उन सभी ऊर्जाओं को ग्रहण करती है जिनसे इस सृष्टि का निर्माण हुआ है, और इस ऊर्जा को अपने पेट में संग्रहीत भोजन के साथ मिलाकर भोजन को ऊर्जावान कर देती है। उसी भोजन का पचा हुआ अंश जिससे गोबर, गौमूत्र और दूध गव्य के रूप में बाहर निकलता है वह अमृत होता है।

प्रश्न 12. गौमाता के खाने के लिए क्या-क्या सही भोजन है? (सूची)

उत्तर 12. हरी घास, अनाज के पौधे के सूखे तने, सप्ताह में कम से कम एक बार 100 ग्राम देसी गुड़, सप्ताह में कम से कम एक बार 50 ग्राम सेंधा या काला नमक, दाल के छिलके, कुछ पेड़ के पत्ते जो गाय स्वयं जानती है की उसके खाने के लिए सही है, गाय को गुड़ एवं रोटी अत्यंत प्रिय है।

प्रश्न 13. गौमाता को खाने में क्या-क्या नहीं देना है जिससे गौमाता को बीमारी ना हो? (सूची)

उत्तर 13. देसी गाय जहरीले पौधे स्वयं नहीं खाती है। गाय को बासी एवं जूठा भोजन, सड़े हुए फल नहीं देना चाहिए। गाय को रात्रि में चारा या अन्य भोजन नहीं देना चाहिए। गाय को साबुत अनाज नहीं देना चाहिए। हमेशा अनाज का दलिया करके ही देना चाहिए।

प्रश्न 14. गौमाता की पूजा करने की विधि? (कुछ लोग बोलते है कि गाय के मुख कि नहीं अपितु गाय कि पूंछ कि पूजा करनी चाहिए और अनेक भ्रांतियाँ है।)

उत्तर 14. गौमाता की पूजा करने की विधि सभी जगह भिन्न-भिन्न है और इसके बारे में कहीं भी आसानी से जाना जा सकता है। लक्ष्मी, धन, वैभव आदि कि प्राप्ति के लिए गाय के शरीर के उस भाग कि पूजा की जाती है जहां से गोबर एवं गौमूत्र प्राप्त होता है। क्योंकि वेदों में कहा गया है की “गोमय वसते लक्ष्मी” अर्थात गोबर में लक्ष्मी का वास है और “गौमूत्र धन्वन्तरी” अर्थात गौमूत्र में भगवान धन्वन्तरी का निवास है।

प्रश्न 15. क्या गाय पालने वालों को रात में गाय को कुछ खाने देना चाहिए या नहीं?

उत्तर 15. नहीं, गाय दिन में ही अपनी आवश्यकता के अनुरूप भोजन कर लेती है। रात्रि में उसे भोजन देना स्वास्थ्य के अनुसार ठीक नहीं है।

प्रश्न 16. दूध से दही, घी, छाछ एवं अन्य पदार्थ बनाने के आयुर्वेद अनुसार प्रक्रियाएं विस्तार से बताईए।

उत्तर 16. सर्वप्रथमड दूध को छान लेना चाहिए, इसके बाद दूध को मिट्टी की हांडी, लोहे के बर्तन या स्टील के बर्तन (ध्यान रखे की दूध को कभी भी तांबे या बिना कलाई वाले पीतल के बर्तन में गरम नहीं करें) में धीमी आंच पर गरम करना चाहिए। धीमी आंच गोबर के कंडे का हो तो बहुत ही अच्छा है। पाँच-छः घंटे तक दूध गरम होने के बाद गुन-गुना रहने पर 1 से 2 प्रतिशत छाछ या दही मिला देना चाहिए। दूध से दही जम जाने के बाद सूर्योदय के पहले दही को मथ देना चाहिए। दही मथने के बाद उसमें स्वतः मक्खन ऊपर आ जाता है। इस मक्खन को निकाल कर धीमी आंच पर पकाने से शुद्ध घी बनता है। बचे हुए मक्खन रहित दही में बिना पानी मिलाये मथने पर मट्ठा बनता है। चार गुना पानी मिलने पर तक्र बनता है और दो गुना पानी मिलने पर छाछ बनता है।

प्रश्न 17. दूध के गुणधर्म, औषधीय उपयोग| किन-किन चीजों में दूध वर्जित है?

उत्तर 17. गाय का दूध प्राणप्रद, रक्तपित्तनाशक, पौष्टिक और रसायन है। उनमें भी काली गाय का दूध त्रिदोषनाशक, परमशक्तिवर्धक और सर्वोत्तम होता है। गाय अन्य पशुओं की अपेक्षा सत्वगुणयुक्त है और दैवी-शक्ति का केंद्रस्थान है। दैवी-शक्ति के योग से गोदुग्ध में सात्विक बल होता है। शरीर आदि की पुष्टि के साथ भोजन का पाचन भी विधिवत अर्थात सही तरीके से हो जाता है। यह कभी रोग नहीं उत्पन्न होने देता है। आयुर्वेद में विभिन्न रंग वाली गायों के दूध आदि का पृथक-पृथक गुण बताया गया है। गाय के दूध को सर्वथा छान कर ही पीना चाहिए, क्योंकि गाय के स्तन से दूध निकालते समय स्तनों पर रोम होने के कारण दुहने में घर्षण से प्रायः रोम टूट कर दूध में गिर जाते हैं। गाय के रोम के पेट में जाने पर बड़ा पाप होता है। आयुर्वेद के अनुसार किसी भी पशु का बाल पेट में चले जाने से हानि ही होती है। गाय के रोम से तो राजयक्ष्मा आदि रोग भी संभव हो सकते हैं इसलिए गाय का दूध छानकर ही पीना चाहिए। वास्तव में दूध इस मृत्युलोक का अमृत ही है।

“अमृतं क्षीरभोजनम्”

प्रश्न 18. श्रीखंड के गुणधर्म, औषधीय उपयोग। किन-किन चीजों में श्रीखंड वर्जित है?

उत्तर 18. श्रीखंड में मुख्यरूप से जलरहित दही, जायफल एवं देसी मिश्री होते है। जायफल कुपित हुए कफ को संतुलित करता है एवं मस्तिष्क को शीत एवं ताप दोनों से बचाता है। चूंकि श्रीखंड में जायफल के साथ जलरहित दही की घुटाई होती है इसलिए इस प्रक्रिया में जायफल का गुण 20 गुना बढ़ जाता है। इस कारण श्रीखंड मेघाशक्ति को बढ़ाता है, कफ को संतुलित रखता है एवं मस्तिष्क को शीत एवं ताप दोनों से बचाता है। अत्यधिक शीत ऋतु, अत्यधित वर्षा ऋतु में श्रीखंड का सेवन वर्जित माना गया है। ग्रीष्म ऋतु में श्रीखंड का सेवन मस्तिष्क के लिए अमृततुल्य है। श्रीखंड निर्माण के बाद 6 घंटे के अंदर सेवन कर लिया जाना चाहिए। फ्रीज़ में रखे श्रीखंड का सेवन करने से उसके गुण-धर्म बदल कर हानी उत्पन्न कर सकते है अर्थात इसे सामान्य तापमान पर रख कर ताज़ा ही सेवन करें।

♦—♥—♦

  • सनातन धर्म
    सनातन धर्म में प्रकृत्ति की पूजा की जाती है। पेड़-पौधों से लेकर, जल, वायु, अग्नि, बादल, सागर, आदि सभी को धार्मिक रूप में देखा जाता है। यहां तक कि मनुष्य को ही स्वयं भगवान मानकर उसकी सेवा करने की सीख दी गई है।
  • अलौकिक पशु
    ऐसा ही कुछ जानवरों के साथ भी है क्योंकि गाय को हिन्दू धर्म में अलौकिक पशु का दर्जा देकर पूजा जाता है। गाय को प्रकृत्ति का ही एक रूप मानकर पूजा जाता है।
  • दैवीय गुणों वाला
    शायद यही वजह है कि गाय के दूध से लेकर उसके मूत्र तक को दैवीय गुणों वाला माना जाता है।
  • गाय के दूध
    गाय के दूध के फायदे तो आप कई बार सुन चुके हैं, साथ ही गोबर का प्रयोग खाद के तौर पर किया जाता है, इस बात से भी हम सभी परिचित हैं।
  • गौ मूत्र के फायदे
    आज हम आपको इन सबसे हटकर गो-मूत्र के फायदों से परिचित करवाएंगे जिन पर शायद आप विश्वास भी ना कर पाएं।
  • दवाईयां
    गौमूत्र का नाम सुनकर आप लोग अपनी नाक-भौं सिकोड़ लिए होंगे लेकिन सच यह है कि गौ मूत्र का प्रयोग कई दवाइयों में भी किया जाता है।
  • 108 प्रकार की बीमारियां
    इसके साथ ही यह करीब 108 प्रकार की बीमारियों के इलाज में भी फायदेमंद होता है क्योंकि इसमें विशेष हार्मोन और खनिज मिले होते हैं।
  • पेट की समस्या
    पेट की समस्या, त्वचा रोग, कोई पुराना दर्द, सांस का रोग, नेत्र की समस्या, मुख रोग, कृमिरोग आदि रोगों का इलाज संभव होता है। जानकारों का कहना है कि इसमें नाइट्रोजन, कॉपर, फॉस्फेोट, यूरिक एसिड, पोटैशियम, यूरिक एसिड, क्लोिराइड और सोडियम पाया जाता है।
  • दिल की बीमारी
    इतना ही नहीं गौमूत्र मधुमेह, दिल की बीमारी, कैंसर, मिर्जी, एड्स और माइग्रेन जैसी बीमारियों को भी ठीक करता है।
  • किन बातों का ध्यान
    आइए जानते हैं इन सबके बावजूद गौमूत्र का सेवन करने से दौरान किन बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए।
  • बूढ़ी या अस्वस्थ गाय
    कभी भी बूढ़ी या अस्वस्थ गाय का मूत्र नहीं पीना चाहिए। इसे लेने से पहले एक मिट्टी या कांच के बर्तन में सूती कपड़े से आठ तहों से छानकर पीना चाहिए।
  • एनीमिया
    अगर त्रिफला और गाय के दूध का सेवन एक साथ किया जाए तो यह शरीर में एनीमिया की बीमारी को दूर करता है और साथ ही यह खून को भी साफ करता है।
  • आयुर्वेद
    आयुर्वेद के अनुसार शरीर में तीन दोषों (वात, पित्त और कफ) के कारण समस्याएं उत्पन्न होती हैं और गाय के मूत्र का सेवन करने से दूर होती हैं।
  • रक्त
    गाय का मूत्र पीने से रक्त शुद्ध होता है जिसकी वजह से मनुष्य उन बीमारियों से बच सकता है जो रक्त की अशुद्धि की वजह से होती हैं।
  • तनाव का नाश
    वे लोग जो हर समय तनाव ग्रस्त रहते हैं, उन्हें दिल की समस्याओं का भी खतरा होता है। गौमूत्र का सेवन इस तनाव का भी नाश कर एक स्वस्थ शरीर देता है।
  • पापों का काट
    शास्त्रों का कहना है कि वर्तमान जन्म में हम जो भोग रहे हैं वह पिछले जन्म से संबंधित होते हैं। गौमूत्र के भीतर गंगा का वास माना जाता है इसलिए इसका सेवन आपके पिछले जन्म के पापों का काट साबित होता है।
  • गौ मूत्र से सिकाई
    जोड़ों के दर्द पर अगर गौ मूत्र से सिकाई की जाए तो यह काफी फायदा पहुंचाता है। आपको राहत का अनुभव होगा।
  • पेट की गैस
    रोजाना सुबह गौमूत्र के साथ आधा ग्लास नींबू पानी पीने से पेट की गैस दूर होती है।
  • पेट की चर्बी
    एक गिलास पानी में शहद और गौमूत्र मिलाकर पीने से पेट की चर्बी कम होती है और अन्य लाभ भी प्राप्त होते हैं।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता
    नियमित तौर पर इसका सेवन करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और विभिन्न बीमारियों से शरीर का बचाव होता है।
  • अस्पृश्य
    वे लोग जो गौमूत्र को अस्पृश्य मानते हैं, इस लेख को पढ़कर उन्हें भी समझ आएगा कि इसकी खूबियों का कोई सानी नहीं है।
  • जोड़ों का दर्द
    जोड़ों में दर्द होने पर गोमूत्र का प्रयोग दो तरीकों से किया जा सकता है। इनमें से पहला तरीका है, दर्द वाले स्थान पर गोमूत्र से सेंक करें। और सर्दी में जोड़ों का दर्द होने पर 1 ग्राम सोंठ के चूर्ण के साथ गोमूत्र का सेवन करें।
  • दंत रोग
    दांत दर्द एवं पायरिया में गोमूत्र से कुल्ला करने से लाभ होता है। इसके अलावा पुराना जुकाम, नजला, श्वास- गोमूत्र एक चौथाई में एक चौथाई चम्मच फूली हुई फिटकरी मिलाकर सेवन करें।
  • मोटापा
    गोमूत्र के माध्यम से आप मोटापे पर आसानी से नियं‍त्रण पा सकते हैं। आधे गिलास ताजे पानी में 4 चम्मच गोमूत्र, 2 चम्मच शहद तथा 1 चम्मच नींबू का रस मिलाकर नित्य सेवन करें।
  • हृदयरोग
    4 चम्मच गोमूत्र का सुबह-शाम सेवन करना हृदय रोगियों के लिए लाभकारी होता है। इसके साथ ही मधुमेह रोगियों के लिए भी यह लाभकारी है। मधुमेह के रोगियों को बिना ब्यायी गाय का गोमूत्र प्रतिदिन डेढ़ तोला सेवन करना चाहिए।
  • पीलिया
    200-250 मिली गोमूत्र 15 दिन तक पिएं, उच्च रक्तचाप होने पर एक चौथाई प्याले गोमूत्र में एक चौथाई चम्मच फूली हुई फिटकरी डालकर सेवन करें और दमा के रोगी को छोटी बछड़ी का 1 तोला गोमूत्र नियमित पीना लाभकारी होता है।
  • यकृत, प्लीहा बढ़ना
    5 तोला गोमूत्र में 1 चुटकी नमक मिलाकर पि‍एं या पुनर्नवा के क्वाथ को समान भाग गोमूत्र मिलाकर लें। आप यह भी कर सकते हैं कि गर्म ईंट पर उससे गोमूत्र में कपड़ा भिगोकर लपेटें तथा प्रभावित स्थान पर हल्की-हल्की सिंकाई करें।
  • कब्ज या पेट फूलने पर
    A. 3 तोला ताजा गोमूत्र छानकर उसमें आधा चम्मच नमक मिलाकर पिलाएं।
    B. बच्चे का पेट फूल जाए तो 1 चम्मच गोमूत्र पिलाएं। और गैस की समस्या में प्रात:काल आधे कप गोमूत्र में नमक तथा नींबू का रस मिलाकर पिलाएं या फिर पुराने गैस के रोग के लिए गोमूत्र को पकाकर प्राप्त किया गया क्षार भी गुणकारी है।
  • गले का कैंसर
    100 मिली गोमूत्र तथा सुपारी के बराबर गाय का गोबर दोनों को मिलाकर स्वच्छ बर्तन में छान लें। सुबह नित्य कर्म से निवृत्त होकर निराहार 6 माह तक प्रयोग करें।
  • चर्मरोग
    नीम गिलोय क्वाथ के साथ सुबह-शाम गोमूत्र का सेवन करने से रक्तदोषजन्य चर्मरोग नष्ट हो जाता है। इसके अलावा चर्मरोग पर जीरे को महीन पीसकर गोमूत्र मिलाकर लेप करना भी लाभकारी है।
  • आंख के रोग
    आंख के धुंधलेपन एवं रतौंधी में काली बछिया के मूत्र को तांबे के बर्तन में गर्म करें। चौथाई भाग बचने पर छान लें और उसे कांच की शीशी में भर लें। उससे सुबह-शाम आंख धोएं।
  • पेट में कृमि
    आधा चम्मच अजवाइन के चूर्ण के साथ 4 चम्मच गोमूत्र 1 सप्ताह सेवन करें। और कब्ज की समस्या होने पर हरड़ के चूर्ण के साथ गोमूत्र सेवन करें।

गोमूत्र सेवन में कुछ सावधानियां रखना भी बेहद आवश्यक है। जानिए ऐसी ही 6 जरूरी सावधानियां –

  • देशी गाय का गोमूत्र ही सेवन करें। गाय गर्भवती या रोगी न हो।
  • जंगल में चरने वाली गाय का मूत्र सर्वोत्तम है।
  • 1 वर्ष से कम की बछिया का मूत्र सर्वोत्तम है।
  • मालिश के लिए 2 से 7 दिन पुराना गोमूत्र अच्‍छा रहता है।
  • पीने हेतु गोमूत्र को 4 से 8 बार कपड़े से छानकर प्रयोग करना चाहिए।
  • बच्चों को 5-5 ग्राम और बड़ों को 10 से 20 ग्राम की मात्रा में गोमूत्र सेवन करना चाहिए।

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आप सभी का प्रिय दोस्त

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।~Kmsraj51

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Note:-

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiya ensolar radiation, and encourage good solar radiation to become tthemselves

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

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कुछ ना कुछ बात रहती है।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ कुछ ना कुछ बात रहती है। ϒ

हर इंसान में कुछ ना कुछ ख़ासियत रहती है।
हर कोई हर किसी से अलग तो है ही।

दिखने में भी और बुद्धि से भी।
लेकिन किसी को किसी से कम समझो नहीं।
क्योंकि हर किसी में कुछ ना कुछ बात होती है॥

♦—♦

आस रहती है, हर किसी को किसी से।
लेकिन हर आस, जीवन में पूरी नहीं होती।

कुछ फैसले होते है, सिर्फ रब के हाथ में।
जिसमें इंसान की इच्छा, बिलकुल नहीं चलती।

बहुत कोशिश करने पर भी मन की इच्छा-
पूरी नहीं हो पाती जीवन मे।

♦—♦

उस व्यक्ति के लिए सभी परिस्थितियां अच्छी रहती है।
जो अपने अन्दर ख़ुशी महसूस करता है।

♦—♦

जाने वाले चले जाते है।
यादे पीछे रह जाती है।

उनके चले जाने से-
इतनी सी कमी रहती है।

चाहे लाख मुस्कुरा लो-
आँखों में नमी तो होती ही है।

♦—♦

दिल से उपजाऊ जगह – कोई हो नहीं सकती।
इसमे जो भी बोया जाये – वह काफ़ी फलता और फूलता है।
जैसे कि नफ़रत हो या प्यार॥

कभी-कभी प्यार बहुत पनपता है।
और कभी-कभी नफरत बहुत पनपती है।
मन में जो ठान लो वो ही जीवन भर चलता है॥

♦—♦

जीवन में कभी किसी को दुःख मत देना।
क्योंकि –
दी गयी चीज़ इक दिन हज़ार हो कर लौटती है॥

♦—♦

इस रंग बिरंगी दुनिया में – हर इंसान अकेला है।
अपने हिस्से का दुःख दर्द – उसे ख़ुद ही उठाना पड़ता है।
अपने ही कर्मो का हिसाब किताब – उसे ख़ुद ही चुकाना पड़ता है॥

♦—♦

दूसरों के बारे में बहुत कुछ –
जानने का प्रयास करते है लोग।

लेकिन अपने बारे में –
जानने का प्रयास नहीं करते।

♦—♦

कटु वचन उस पत्थर के समान है।
जो आकाश की तरफ़ फैंका गया हो॥

जो लौट के वापस उधर ही गिरता है।
जिसने उसे आकाश की तरफ़ फैंका हो॥

♦—♦

इंसान तब बुरा बनता है, जब वो खुद को दूसरो से…
ज्यादा समझदार –
और अच्छा समझने लगता है। उसमे अहंकार आ जाता है।

♦—♦

घृणा करना शैतान का काम है।
क्षमा करना मनुष्य का काम है।
प्रेम करना देवताओं का गुण है॥

©- विमल गांधी जी। ∇

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विमल गांधी जी।

हम दिल से आभारी हैं विमल गांधी जी के प्रेरणादायक हिन्दी Quotes साझा करने के लिए।

विमल गांधी जी के लिए मेरे विचार:

♣ “विमल गांधी जी” की कविताआे और Quotes के हर एक शब्द में अलाैकिक सार भरा हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। कविताऐं और Quotes छोटी और सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान इन कविताओं और Quotes काे गहराई(हर शब्दाे का सार) से समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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हौसला लगता है बुलन्दियों को पाने में।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ हौसला लगता है बुलन्दियों को पाने में। ϒ

मेहनत लगती है सपनो को हकीकत बनाने में।
हौसला लगता है बुलन्दियों को पाने में॥

अरसा लगता है एक जिंदगी को बनाने में।
जिंदगी भी कम पड़ जाती है एक सच्चा दोस्त पाने मे॥

♦—♦

स्वास्थ्य सबसे बड़ी दौलत है।
संतोष सबसे बड़ा खजाना है –
और आत्मविश्वास सबसे बड़ा मित्र है॥

♦—♦

गलतियां तो हर इंसान करता है।
एक गलती माफ़ हो जाती है।

दूसरी भी माफ की जा सकती है।
लेकिन इतनी ज्यादा गलतियाँ –
भी मत करो कि…
पेंसिल से पहले रबड़ खत्म हो जाये।

और गलतियों के कारण दूसरों का…
और अपना नुकसान, होना शुरू हो जाये।
और सब आप से दूर हो जाये।

♦—♦

कोई प्रशंसा करे या ना करे।
इसकी चिन्ता छोड़ो सिर्फ एक ही-
बात ध्यान में रखनी चाहिये कि हम…
अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाये॥

♦—♦

किसी की चाहत पर दिल से अमल करना।
दिल टूटे ना उनकी इतनी फिक्र करना।

यह जिंदगी है ख़ास सबके लिये।
पर आप जिनके लिये खास है…
उनकी कद्र करना।

♦—♦

??? माँ ???

ईश्वर एक रूप अनेक। उनमें माता है एक उसकी ममता में ही मिलता है ईश्वर रूपी प्रेम। रुके तो चाँद जैसी है… चले तो हवाओं जैसी है। वो माँ ही है… जो धूप में भी छाँव जैसी है… संतान चाहे कितनी भी बड़ी हो जाये, लेकिन छोटा नहीं होता मां का आंचल कभी। उसके आशीर्वाद मे ही छिपी है ख़ुशियाँ सभी।

♦—♦

भरोसा बहुत बड़ी पूंजी है।
यूँ ही नही बॉंटा जाता।

यह खुद पर रखो तो ताकत है।
और दूसरे पर रखो तो
“कमजाेरी” बन जाता है।
खुद पर ही भरोसा रखना चाहिए॥

♦—♦

जो रिश्ते गहरे होते है वो …
अपनेपन का शोर नहीं मचाते।

ना ही वो प्रेम का दिखावा करते है।
वो तो दिलों से जुडे होते है।

♦—♦

दुनिया कहती है कि किसी एक के…
जाने से हमारी जिंदगी रूक नही जाती।

लेकिन यह कोई नहीं जानता कि लाखों के…
मिलने से भी उस एक की कमी पूरी नही होती।

♦—♦

जिंदगी में अगर बुरा… वक्त नहीं आता तो-
अपनों में छुपे हुए गैर और…
गैरो में छुपे हुए – अपने कभी नजर नहीं आते।

बुरे समय में ही पता चलता है कि…
कौन अपना और कौन पराया है।

♦—♦

गुणहीन व्यक्ति की सुन्दरता व्यर्थ है।
दुष्ट स्वभाव वाले व्यक्ति का…
अच्छे कुल का होना व्यर्थ है।

यदि लक्ष्य की प्राप्ति ना हो तो शिक्षा व्यर्थ है।
जिस धन का सदुपयाेग ना हो तो वह धन व्यर्थ है।

♦—♦

दिलों में खुंदक, चेहरों पर मुस्कान रखते हैं।
वो नज़रों से छुपा कर, तीर कमान रखते हैं।

मौका मिलते ही उतार देते हैं तीर दिल में।
ग़ज़ब है कि फिर भी, वो मीठी ज़ुबान रखते है।

♦—♦

कभी भी किसी का दिल दुखाना नहीं चाहिए।
कभी किसी का दिल तोड़ना नहीं चाहिए।

कोशिश यही रहनी चाहिये कि किसी का-
दिल ना दुखे दिल ना टूटे हमारी वजह से।

ईश्वर भी रूठ जाता है किसी का दिल दुखाने से।
यह भी हमेशा याद रखना कि ईश्वर हर दिल में रहता है।

♦—♦

कुछ लोग जिंदगी में रिश्तेदार ‘या’
दोस्त बनकर ही नहीं आते।
कुछ लोग सबक़ बन कर भी आते है॥

♦—♦

सबके दिलों का एहसास अलग होता है।
इस दुनिया में सबका व्यवहार अलग-अलग होता है।

आँखें तो सबकी एक जैसी ही होती है।
पर सबका देखने का अंदाज़ अलग-अलग होता है।

♦—♦

झूठा इंसान ‘झूठ-झूठ बोल’ बोलकर।
हमेशा अपना ही नुकसान करता है।

झूठा इंसान अंत में अपने सिवाए…
किसी को धोखा नहीं दे सकता।

©- विमल गांधी जी। ∇

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विमल गांधी जी।

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बिना कष्ट सहे सफलता नहीं मिलता।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ बिना कष्ट सहे सफलता नहीं मिलता। ϒ

बाज लगभग 70 वर्ष जीता है। परन्तु अपने जीवन के ४०-वें वर्ष में आते-आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है। उस अवस्था में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं…

  • पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है व शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं।
  • चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन निकालने में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है।
  • पंख भारी हो जाते हैं, और सीने से चिपकने के कारण पूरे खुल नहीं पाते हैं, उड़ानें सीमित कर देते हैं।

भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना और भोजन खाना। तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं। उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं…..

  • या तो देह त्याग दे।
  • या अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे।
  • या फिर स्वयं को पुनर्स्थापित करे।

आकाश के निर्द्वन्द्व एकाधिपति के रूप में।
जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं।
वहीं तीसरा अत्यन्त पीड़ादायी और लम्बा।

  • हिंदी कहानी – निरंतर प्रयास जरूर पढ़े।

बाज पीड़ा चुनता है और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है। वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, एकान्त में अपना घोंसला बनाता है और तब प्रारम्भ करता है पूरी प्रक्रिया। सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार-मार कर तोड़ देता है। अपनी चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक कुछ भी नहीं पक्षीराज के लिये।

तब वह प्रतीक्षा करता है, चोंच के पुनः उग आने की। उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है और प्रतीक्षा करता है पंजों के पुनः उग आने की। नये चोंच और पंजे आने के बाद, वह अपने भारी पंखों को एक-एक कर नोंच कर निकालता है और प्रतीक्षा करता पंखों के पुनः उग आने की।

150 दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा….. और तब उसे मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान, पहले जैसी नयी। इस पुनर्स्थापना के बाद वह 30 साल और जीता है, ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ।

सीख – प्रकृति हमें सिखाने बैठी है। पंजे पकड़ के प्रतीक हैं। चोंच सक्रियता की और पंख कल्पना को स्थापित करते हैं। इच्छा परिस्थितियों पर नियन्त्रण बनाये रखने की, सक्रियता स्वयं के अस्तित्व की गरिमा बनाये रखने की, कल्पना जीवन में कुछ नयापन बनाये रखने की। इच्छा, सक्रियता और कल्पना…..तीनों के तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं। हममें भी चालीस तक आते-आते।

हमारा व्यक्तित्व ही ढीला पड़ने लगता है। अर्धजीवन में ही जीवन समाप्तप्राय सा लगने लगता है। उत्साह, आकांक्षा, ऊर्जा….. अधोगामी हो जाते हैं। हमारे पास भी कई विकल्प होते हैं…..

  • कुछ सरल और त्वरित।
  • कुछ पीड़ादायी।

हमें भी अपने जीवन के विवशता भरे, अतिलचीलेपन को त्याग कर नियन्त्रण दिखाना होगा। बाज के पंजों की तरह। हमें भी आलस्य उत्पन्न करने वाली वक्र मानसिकता को त्याग कर ऊर्जस्वित सक्रियता दिखानी होगी। “बाज की चोंच की तरह।” हमें भी भूतकाल में जकड़े अस्तित्व के भारीपन को त्याग कर कल्पना की उन्मुक्त उड़ाने भरनी होंगी।

  • हिंदी कहानी – प्यार का return गिफ्ट जरूर पढ़े।

“बाज के पंखों की तरह।” 150 दिन न सही, तो एक माह ही बिताया जाये, स्वयं को पुनर्स्थापित करने में। जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही।

बाज तब उड़ानें भरने को तैयार होंगे। इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी, अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी।

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