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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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You are here: Home / Archives for हेमराज ठाकुर की कविताएं

हेमराज ठाकुर की कविताएं

सागर और सरिता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सागर और सरिता। ♦

“सुनो सरिते रौद्र रूप धर,
क्यों तांडव तुम यूं करती हो?
है सहज सरल तुम शांत स्वभावी,
फिर दहशत क्यों तुम भरती हो?

आकंठ डुबाकर जनजीवन जल में,
क्यों त्राहि – त्राहि तुम मचाती हो?
रो उठते हैं प्राणी मात्र सब तब,
जब नीड़ उनका तुम बहाती हो।”

“मैं भूली बिसरी पावन सरिता,
हिमगिरी के शिखर से बहती हूं।
मैं कहां से निकली, कहां को जाती?
कभी, किसी से कुछ न कहती हूं।

गांव के पावन गलियारों में बहती,
पवनों में, शीतलता मैं ही देती हूं।
संचित कर के कृषित भूमि को,
मैं घट – घट को नवजीवन देती हूं।”

घाट – घाट पर तृप्ताती हूं सब को,
सब कूड़ा – कचरा जब मैं ढोती हूं।
सच कहती हूं मैं कुदरत की बेटी,
मानुषी करणी पर तब मैं रोती हूं।

क्यों भूल जाते हैं लोग मुझको?
तृषा नाशिनी मैं उनकी रोटी हूं।
निर्मल – पावन मैं आई गिरी से,
पिया तक पहुंचते मटमैली होती हूं।

जो जिसका किया वह उसे लौटाती,
मैं बदला कहां कब किसी से लेती हूं?
निज करणी का फल भोग रहे हैं सब,
तुम कहते हो मैं यह सब दंड देती हूं?

जिन जनी नहीं कोई जान जिस्म से,
प्रसव पीड़ा को वे भला क्या जाने?
मैं जननी हूं जलचर – थलचर की,
मेरी पीड़ा को भला वे क्यों माने?

मैं सज – धज – पावन निकली थी प्रियतम,
मटमैली गंदली होकर तुमसे मिलती हूं।
निर्दोष हूं मैं सनातनी परंपरा प्रवाहित,
निज प्रहारों से देहे कई की छीलती हूं।

“होती है मुझे भी पीड़ा तब प्रियतम
यह सब सुनकर सागर अकुलाता है।”
“मदहोश मानुष की यह जरूरत?” सागर,
सुनामी लहरों से आगबबूला हो जाता है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — प्रकृति के पांच तत्व सलीके से अपना-अपना चक्र पूर्ण करते है, अर्थात प्रकृति के पांच तत्व तब तक मानव या जीव जंतु का नुकसान नहीं करते जब तक मनुष्य उनके प्राकृतिक रूप व पथ को अवरुद्ध न करें। मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति के पांच तत्व के साथ खिलवाड़ करता आ रहा जिसका परिणाम कहीं भूकंप, तो कहीं बाढ़, कहीं सुनामी, तो कहीं बर्फबारी और भी अनेकानेक रूप देखने को मिल रहे है, क्या नदी हो क्या समुद्र मनुष्य ने सभी के साथ खिलवाड़ किया हैं। हे मानव अब भी समय हैं सुधर जा वर्ना ये धरा तेरे रहने के लायक बिलकुल भी नहीं बचेगी। फिर कहां जायेगा तू रहने सोच जरा।

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यह कविता (सागर और सरिता।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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मेरा गांव।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मेरा गांव। ♦

सुदूर जो दिखती सुन्दर बस्ती, और घने पेड़ों की छांव है।
हवा के बहते जहां मंद पावन झोंके, यही तो मेरा गांव है।

इस बस्ती के बीचो बीच हरी – हरी, छोटी सी मेरी ठांव है।
लहलाती फसले जौ और गेहूं की, यही तो मेरा गांव है।

जहां पाण्डव शीला के पास थिरकते, स्कूली बच्चों के पांव है।
वह पहाड़ियों के बीच में घरों का टोला, यही तो मेरा गांव है।

किनारे से बहती कलकल खड्ड है, पेड़ों पर कौवों की कांव है।
नील आसमां से शुभ्र सूरज है चमके, यही तो मेरा गांव है।

घने वन जहां बने पड़े हैं, जंगली जीव – जंतुओं की ठांव है।
जहां वे बाग – बगीचे फुले – खिले हैं, यही तो मेरा गांव है।

जहां रहती है शांति बनी हमेशा, शोर – शराबे का न झांव है।
जहां मिलजुल कर रहता है हर आदमी, यही तो मेरा गांव है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — अपने गांव के प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन किया है, जहां पर है घने पेड़ों की छांव, शुद्ध हवा के बहते जहां मंद पावन झोंके, यही तो मेरा गांव है।
    इसी बस्ती के बीचो बीच हरी – हरी, छोटी सी मेरी भी ठांव है, जहां लहलाती फसले जौ और गेहूं की। जहां प्राचीन पाण्डव शीला है जिसके पास थिरकते मेरे गांव के स्कूली बच्चों के पांव है। वह पहाड़ियों के बीच में घरों का जो टोला दिख रहा है, यही तो मेरा गांव है। घने वन जहां खड़े हैं, जंगली जीव – जंतुओं की ठांव जहां है। जहां वे बाग – बगीचे फुले – खिले हैं, यही तो मेरा गांव है। जहां सभी शांति व प्रेम से मिल जुलकर रहते है, ऐसा प्यारा मेरा गांव है।

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यह कविता (मेरा गांव।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बचपन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बचपन। ♦

काश! लौट आते वे बचपन के दिन आज,
जिसमें, दादी चूमती भालों को।

माता, लोरी गा कर सहज सुलाती,
बहना, चटकारी देती गालों को।

वह बाबुल की बाहों का झूला होता,
सागर समझता नदी और नलों को।

कोरे कागज की वह कश्ती होती,
खेलता, काठ के कृपाण और भालों को।

माँ डांटती, मैं रुस कर छुप जाता,
आँगन में बाबुल की पीठ के पीछे।

माँ खंगालती, घर का कोना – कोना,
दादी देखती, हर पलंग के नीचे।

बाबा, मौन रह देते, साथ मेरा तब,
गमछे से ढांपते, ताकि तनिक न दिखे।

बहना खोलती, भ्रातृ भेद सारा तब,
माँ झुंझलाती, अच्छा! तो ये तुम्हारी सीखें?

काश! मिट्टी के वे घरौंदे होते,
बनाता, मिटाता, फिर से बनाता।

किशोर पड़ोसिन कमला की चुगली,
तोतली आवाज में दादा से लगाता।

डांट पड़ती देख दादा से उसको,
मेरा रूआंसा सा चेहरा, फिर से खिलखिलाता।

काश! लौट आते वे बचपन के दिन आज,
जिंदगी जीने का बड़ा मजा आता।

आज न जाने क्या हो गया ये?
आलीशान बंगलों का सुख भी न भाता।

आंगन में लगे हुए झूले पर झूल कर भी,
वह बाबुल की बाहों सा चैन न आता।

काश! हुआ न होता बड़ा अगर मैं,
तो आज ये बचपन का भाव न सताता।

आज है भार सब अपने ही कंधों पर,
जो उठाया करते थे, तब मेरे पिता और माता।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — बचपन किसी भी इंसान के जीवन का बहुत ही महत्वपूर्ण समय होता है। बचपन में इतनी चंचलता और मिठास भरी होती है कि हर कोई फिर से उस बचपन को जीना चाहता है। बचपन में वह धीरे-धीरे चलना, गिर पड़ना कुछ देर के लिए रोना और फिर से उठकर दौड़ लगाना बहुत याद आता है। बचपन में दादी द्वारा प्यार से यूँ माथा को चूमना बहुत याद आता है। बचपन में पिताजी के कंधे पर बैठकर मेला देखने जाने का जो मजा होता था वह अब नहीं आता है। मां से डाट पड़ने पर पापा के पीछे यूँ छिप जाना, शरारत करने पर पिटाई के लिए खोजा जाना और दादा जी के पास छिप जाने का जो आनंद था उसका क्या कहना, बहन द्वारा पकड़वाना, फिर तो पिटाई होती थी। लेकिन आजकल के बच्चों का वह प्यारा सा बचपन तो कहीं खो ही गया। भावनात्मक या मन के स्तर पर मासूमों के पोषण की स्थिति दुनिया भर में बहुत ही बुरी है। भारत में हर दूसरा बच्चा वयस्कों की भावनात्मक प्रताड़ना का शिकार हो रहा है। खास बात यह है कि 83 फीसदी से ज्यादा मामलों में तो शोषण करने वाले खुद अपने मां-बाप होते हैं। बच्चों से उनका बचपन ना छीने, उन्हें उनका बचपन खुलकर जीने दे, तभी उनका सर्वांगीण विकास होगा।

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यह कविता (बचपन।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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मेरे वतन की मिट्टी की खुशबू।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मेरे वतन की मिट्टी की खुशबू। ♦

मेरे वतन की माटी की खुशबू, सुबह – शाम जिसे जब आती है।
मन हो उठता है बाग – बाग सा, रूह होती तब मदमाती है।

यह भक्ति – मुक्ति की पावन धरा है, राम -कृष्ण को जनाती है।
गंगा – यमुनी तहजीबों को, यह भूमि खुद पर ही तो बहाती है।

धर्म अनेक यहां नाना भाषाएं, कई कुल कुनबे, कई जाति है।
सीधा सादा मानुष यहां का, विश्व पटल पर जिसकी ख्याति है।

दादुर, म्यूर, पपिहरा के शोर और कोयल काली मीठा जब गाती है।
भारत देश की धरती सचमुच, हर्षित हो फूली न तब समाती है।

शीतल पवन जब हवा के झोंको से, धूल धारा से अम्बर में उड़ाती है।
यूं लगता है मानो भारत की भूमि, मस्ती में होली का पर्व मनाती है।

रिमझिम बारिश की शीतल बूंदें, सिंचित करती यहां की जब माटी है।
उग आती है तब नाना फसलें, भारत की जनता उन्हें तब खाती है।

छा जाए कभी संकट के बादल तो, वीर बिरादरी सर अपना जब चढ़ाती है।
बुंदेले हर बोलों की भांति फिर गौरव गाथा, जनता उनकी तब गाती है।

प्रेम करुणा की प्रवाहक यह भूमि, हमेशा विश्व में शान्ति ही चाहती है।
नाहक इसको छेड़े जो कोई, फिर तो दुश्मन की ईंट से ईंट बजाती है।

जय बोलो भाई जय बोलो सब, मां भारती के पावन आंचल की।
जय बोलो भाई जय बोलो सब, उतर, दक्षिण, पश्चिम और पूर्वांचल की।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — मेरे वतन की मिट्टी की खुशबू का क्या कहना, सुबह – शाम जिसे जब भी आती है, मन हो उठता है बाग – बाग सा, रूह होती तब मदमाती है। यह वही पवित्र भूमि है जहाँ पर भक्ति – मुक्ति की पावन धारा सदैव ही बहती है, राम – कृष्ण को जनाती है यह भूमि। यही पर माँ गंगा, यमुना सरस्वती नदियों को यह भूमि खुद पर ही तो बहाती है। यहां पर धर्म अनेक यहां नाना भाषाएं, कई कुल कुनबे, कई जाति है, सीधा सादा मानुष यहां का, विश्व पटल पर जिसकी ख्याति है। रिमझिम बारिश की शीतल बूंदें जब सिंचित करती यहां की माटी को तब उग आती है तब नाना फसलें, भारत की जनता उन्हें तब खाती है। प्रेम व करुणा की प्रवाहक रही है सदैव से ही यह भूमि, हमेशा विश्व में शान्ति ही चाहती है, नाहक इसको छेड़े जो कोई भी, फिर तो दुश्मन की ईंट से ईंट बजाती है। जय बोलो भाई जय बोलो सब, मां भारती के पावन आंचल की। जय बोलो भाई जय बोलो सब, उतर, दक्षिण, पश्चिम और पूर्वांचल की।

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यह कविता (मेरे वतन की मिट्टी की खुशबू।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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कानूनी दांवपेच।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कानूनी दांवपेच। ♦

सजा – ए – मौत सुनाकर भरी अदालत में,
फिर से अपील कर होती जहां पर माफी है।
वह अदालत की है शहर – ए – आम तौहीन,
या फिर, न्याय के चाहवानो से बेइंसाफी है।

जहां दशकों लग जाते हैं हे राम! तुझे ही,
अदालत में अपना ही नियत न्याय पाने में।
सोचो जरा क्या हालत होती होगी ऐसे में,
कमजोर, सर्वहारा, मजलूमों की जमाने में ?

अदालत भली है उस परवरदिगार की,
जहां न कोई वकालत है, न ही सुनवाई है।
माफी का तो कोई भी सवाल ही न उठाता,
जिसे एक बार सजा साहेब ने जो सुनाई है।

इस दुनियाँ में वकालत और सुनवाई के,
एक से बढ़ कर एक नए – नए लफड़े हैं।
कानूनी दांव पेच के बीच में ही मुकदमें,
सालों दर सालों अदालत में जकड़े हैं।

मिलता किसे है वक्त पर ही न्याय यहां?
मुकम्मल न्याय की तो उम्मीद ही बेकार है।
मुड़ जाती है अधिकतर न्याय की तासीर वहां,
जिधर को खड़ी दिखती खुद ही सरकार है।

दफ़न हो जाती है कई फाइलें यहां,
कई सालों दर सालों धूल फाक रही है।
इस महंगी होती हुई न्याय व्यवस्था में,
गरीबों ने हमेशा ही बेइंसाफी सही है।

रिमांड – शिनाख्त के नाम पर है धांधली यहां,
तो कभी जांच, पड़ताल, सबूतों में घोटाला है।
फिर भी मिल जाए न्याय सालों बाद किसी को,
तो क्या मजा? न ही तो अंधेरा न ही उजाला है।

अपनी बात कहने को अदालत में भला,
वकीलों की वकालत की क्या दरकार है?
कौन दोषी है इस लूट की व्यवस्था का?
स्वयं अदालत है या कि फिर सरकार है?

मुकदमा मेरा है तो मैं खुद बात रखूं,
भला जरूरत ही क्या है वकीलों की?
जरूरी कर दी जाए कानून की पढ़ाई तो,
दरकार कहां रहेगी वकीली दलीलों की?

चश्मदीद गवाहों की गवाहियां ही जहां,
वक्त पल भर में ही बदल दी जाती है।
उस दुनियां की न्याय व्यवस्था पर तो,
मुझे अजीबो गरीब सी घिन आती है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — एक बेहतर कानून व्यवस्था जनमानस के लिए और अच्छे समाज और अच्छा माहौल का निर्माण करती है। मुजरिम जो भी हो उसे किसी कीमत पर न छोड़ा जाए, पर क्या ऐसा हो रहा हैं? पैसे वाले आखिर बच कैसे जा रहे है? क्यों कानून व्यवस्था के नाम पर आर्थिक और मानसिक रूप से गरीबों का शोषण हो रहा हैं? क्यों लम्बे इन्तजार के बाद भी उन्हें उचित न्याय नही मिल रहा है? आखिर अपनी बात कहने को अदालत में भला, वकीलों की वकालत की क्या दरकार है? कौन दोषी है इस लूट की व्यवस्था का? स्वयं अदालत है या कि फिर सरकार है? यह सोचने का विषय है।

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यह कविता (कानूनी दांवपेच।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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नारी की कहानी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नारी की कहानी। ♦

ओ नारी तेरे जीवन की भी क्या अजीबो गरीब कहानी है?
दमन में बीता बचपन है तेरा और जुर्म में बीती जवानी है।

किशोर हुई मासिक धर्म को झेला, सब झेल हुई सयानी है।
यौवन में कर शादी, पड़ती गृह त्याग की रसम निभानी है।

गर्भ का पालन, प्रसव पीड़ादि भी तो जुर्म की ही निशानी है।
जो कुदरत ने किए सिर्फ तेरे ही साथ, बातें किसे बतानी है?

बड़ा सहज है कहना नर समाज को, यह तो रीत पुरानी है।
अपने घर लगी आग दुख देती है, सेंकने को आग बेगानी है।

तारीफ की मारी नारी बेचारी, निज शोषण स्वयं करवाती है।
कुरूप हुई नकारी है जाती, सुरूप चापलूसी में आ जाती है।

कुत्ते का बैरी कुत्ता फिर, एक दूसरी को ही नीचा दिखाती है।
श्रृष्टि रचयिता होकर भी, पुरुष के आगे खुद को नचाती है।

करे श्रृंगार जो घना बेचारी, तो लूटपाट की बात बन जाती है।
कुरूप तो शोषित, सुरुप अवशोषित, जाती बेचारी बलाती है।

जाए तो जाए-जाए किधर को? आगे कुआं खाई पीछे आती है।
जहाज का पंछी फिर वहीं लौटेगा, जानती यह नर की जाती है।

सास-बहू के झगड़े में भी, नारी ही नारी का शोषण करवाती है।
घर-संसार है तुझ से ओ देवी! अपने आप को ही क्यों लड़ाती है?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सबने कहा नारी आज की शिक्षित है, फ़िर भी क्यों आज भी नारी सब दर्द को चु्पचाप है सहती, चाहे बात बचपन की हो या किशोर हुई मासिक धर्म को झेला, सब झेल हुई सयानी है। यौवन में कर शादी, पड़ती गृह त्याग की रसम निभानी है उसको। माना की नारी का मातृत्व दर्द होना प्रकृति का नियम है, गर्भ का पालन, प्रसव पीड़ादि भी तो जुर्म की ही निशानी है। जो कुदरत ने किए सिर्फ तेरे ही साथ, बातें किसे बतानी है?

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यह कविता (नारी की कहानी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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पिता।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पिता। ♦

मां की महिमा तो सबने गाई,
बाप बेचारा क्यों भूल दिया?
जिसने हमेशा से नव राहें दी,
नई तालीम, नया उसूल दिया।

मां तो रो लेती है तंगी में उनके कंधों पर,
बाप बेचारे ने अपना सब दुख है पिया।
हम बच्चों के लालन – पालन में खोकर,
अपना जीवन भी उसने कहां है जीया?

रोजी रोटी की चिन्ता में रहकर कभी,
कभी बच्चों के सपनों में ही वह जीया।
हो जाए मेरे बच्चे सफल कैसे न कैसे,
इस होड़ में ही अपना सर्वस्व है दिया।

कौन कुचलता है अपने अरमानों को इस कदर?
दूसरों के खातिर, जैसे पुत्र हेतु है पिता ने किया।
फिर भी न जाने इस निष्ठुर समाज ने आखिर,
क्यों पिता के बलिदान को है दरकिनार किया?

वह दफ्तर से लौटा थका हारा मांदा सा,
तलाश सकून की, मां ने परेशान किया।
लहू तक सुखा देता है वह बच्चों के लिए,
फिर भी कहते हैं कि तुमने क्या किया?

वाह री ओ ! इन्सानी फितरत, क्या गजब?
बे एहसानों सा पल में उसे भुला है दिया।
मुंह का निवाला तक अपने तुझको दिया,
जिसने, तेरे खातिर अपना जीवन जिया।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — पापा का प्यार निराला है, पापा के साथ रिश्ता न्यारा है, इस रिश्ते जैसा कोई और नहीं यही रिश्ता दुनिया में सबसे प्यारा है। मेरे होठों की हँसी मेरे पापा की बदौलत है, मेरी आँखों में खुशी मेरे पापा की बदौलत है, पापा किसी भगवान से कम नही क्योकि मेरी ज़िन्दगी की सारी खुशी पापा की बदौलत है। ये बाप तुझे अपना सब कुछ दे जाएगा, और तेरे कंधे पर दुनिया से चला जाएगा। पिता हैं तो हमेशा बच्चो का दिल शेर होता हैं। वो इस छोटी सी दुनिया में मेरा अनंत संसार है। एक पापा की बदौलत ही मेरा जीवन खुबसूरत बन पाया।

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यह कविता (पिता।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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पेड़ों का महत्व।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ पेड़ों का महत्व। ♦

‘या’  पेड़ो की महता।

दूषित धारा को करने वालो, कुदरत का कहर तो बरपे गा।
दूसरों के दर्द से दर्द न होगा, निज पीड़ा से आंसू ढरके गा।

इन मौन गगन को चूमने वाले, पेड़ों की महता कुछ तो जानो।
जल – प्राण रगों में बहने वाले, इनकी देन है यह तो पहचानो।

माना कि लकड़ी जरूरत है, बेवजह से तो न इनको काटो।
काट काट कर इनको यारो, जीवन के बीच में खाई न पाटो।

इस धरती के सौंदर्य के खातिर, पेड़ – पौधे तुम खूब लगाओ।
मानव -मानव में चेतना भर दो, जल वायु का संकट हटाओ।

अवैध खनन और अंधा विकास भी, कहां खतरे से खाली है?
चुन – चुनकर लेगा बदला हमसे, बैठा अम्बर में वह माली है।

उसकी लाठी आवाज न करती, पर पीड़ा बहुत ही भरी है।
कई बार झेली ये पीड़ा सबने, हमको भूलने की बीमारी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — जैसे हम खाने के बिना नहीं रह सकते। वैसे ही पेड़-पौधे के बिना भी हमारा जीवन अधूरा है। जैसे हमें जीवित रहने के लिए भोजन-पानी की आवश्यकता है वैसे ही प्रकृति को जिंदा रखने के लिए पेड़-पौधे, साफ-सफाई, प्रदूषण रहित धरा बनाने की आवश्यकता है। जलवायु प्रदूषण को रोकना होगा और वृक्षों की कटाई रोकनी होगी। कटाई की जगह वृक्षों को लगाना होगा जिससे कि प्राकृतिक आपदा से हम बच सकें। पर्यावरण को बचाना, प्रकृति को बचाना हमारे हाथ में है। आओ हमसब मिलकर ये संकल्प ले की हमसब खुद प्रत्येक दिन पेड़-पौधे लगाएंगे और सभी को पेड़-पौधे लगाने के लिए जागरूक करेंगे।

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यह कविता (पेड़ों का महत्व।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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हालात ए दौर।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हालात ए दौर। ♦

लोग लगे हैं छीनने, आजकल एक दूसरे का निवाला।
फिर कर रहे हैं उम्मीद कि, हो जाए अंधेरे में उज्जला॥

इंसाफियों के नाम पर, कर रहे हैं हम ही बेइंसाफियां।
फिर मांग रहे हैं खुदा के द्वार पर, जाकर के माफियां॥

देखादेखी में सीखा है ये, चादर से बाहर पांव पसारना।
बाल की खाल उधड़ जाए, पर मंजूर नहीं है जी हारना॥

छोटी सी इस जिन्दगी में तो, उलझने ही बेशुमार है।
मुसीबत में आता न काम कोई, यूं तो दोस्त हजार है॥

काबिलियत की है कदर कहां, सब पहुंच का कमाल है।
असलियत की है कदर कहां, मिलावट की तो धमाल है॥

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — आजकल तो एक दूसरे का निवाला लोग लगे हैं छीनने, उनको कोई फर्क नही पड़ता की आपको उस वजह से क्या तकलीफ होगा। आजकल स्वार्थ से भरी हुई दुनियादारी हो गई है, इंसानियत के नाते कोई किसी का कार्य नही कर रहा हैं, हर कार्य में उसका स्वार्थ निहित हैं। स्वार्थ पूरा ना होने पर आग बबूला हो जाता, भयानक बावरा रूप धारण कर अपना और दूसरों का भी नुकसान करता है।

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यह कविता (हालात ए दौर।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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दुनियादारी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दुनियादारी। ♦

बेरुख हो चुकी हैं हवाएं, अब मौसम भी शुष्क हुआ है।
महफूज रहे जमाने में सब, बस रब से इतनी सी दुआ है।

लोग लगे हैं स्वार्थ साधने, मतलब की ही दुनियादारी है।
मुंह में राम – राम बगल में छुरी, इस दौर में भी जारी है।

रिश्तों की साख है दाव पे, आज कौन किसका पराया है?
दमड़ी का खेला है, वरना सगे को कहे कहां से आया है?

मरणासनी बाप की है कहां? चिन्ता में पिता की माया है।
सेवा की पड़ी ही है किसको? हाथ तिज़ोरी धन न आया है।

है फुरसत कहां बतियाने की आज? अपनापन ही खोया है।
कांधा देते पुत्र अर्थी को पिता की, पूछो कितना कर रोया है?

बहिर्मुखी जमाने में अब तो, संस्कारों की बात बेईमानी है।
हर रिश्तेे – नाते में रहा भरोसा कहां? मन में भरी शैतानी है।

सनातन से रहा सरोकार कहां? आधुनिकता की खुमारी है।
अपनी सभ्यता से रहा प्यार कहां? पश्चिम की हुई पुजारी है।

नई नसलों को नसीहत दो वरना, खतरे में ये दुनियादारी है।
कैंसर है महज जिस्म लीलता, रूह घाती स्वार्थ की बीमारी है।

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — आजकल स्वार्थ से भरी हुई दुनियादारी हो गई है, इंसानियत के नाते कोई किसी का कार्य नही कर रहा हैं, हर कार्य में उसका स्वार्थ निहित हैं। स्वार्थ पूरा ना होने पर आग बबूला हो जाता, भयानक बावरा रूप धारण कर अपना और दूसरों का भी नुकसान करता है। पश्चिमी संस्कृति का आज की पीढ़ी पर कुछ ऐसा असर हुआ की वह अपने भारत देश के महान प्राचीन सनातन संस्कृति का मजाक बनाता है, और काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार, से भरा हुआ जीवन व्यतीत कर रहा हैं। उसे ना ही अपना फिक्र है और ना ही अपने परिवार का फिक्र है। व्यभिचार में डूबा हुआ, अच्छा व बुरा के भेद को भी नहीं समझ पा रहा हैं। अपने कर्मों से अपना ही विनाश कर रहा हैं आज का मानव। हे मेरे देश के युवा अब भी समय हैं संभल जाओ और अपने प्राचीन महान भारतीय संस्कृति, सभ्यता व संस्कार को धारण कर अपना व अपने परिवार का कल्याण करों। सच्चे मन से देश सेवा का कार्य करों।

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यह कविता (दुनियादारी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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