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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिन्दी साहित्य

नए साल के लिए नई आदतें।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

♦ नए साल के लिए नई आदतें। ♦

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जैसे ही नव वर्ष शुरू होता है सभी अपनी-अपनी आदतों में बदलाव करने के लिए अपने आप से वादा, संकल्प करने लगते है जैसे:

  • इस वर्ष मैं अपना वजन कम करूँगा / करुँगी।
  • मैं अपना कार्य और अच्छे से करूँगा / करुँगी।
  • मैं किसी पर गुस्सा नहीं करूँगा / करुँगी।
  • मैं तली-भुनी चीजे नही खाऊंगा / खाउंगी।
  • मैं अच्छे से अपनी पढाई करूँगा / करुँगी।
  • मैं बड़े और गुरुजनों का सम्मान करूँगा / करुँगी।
  • अच्छे स्वास्थ्य के लिए मैं प्रतिदिन व्यायाम करूँगा / करुँगी।
  • मैं पूर्ण मन से अपना हर एक कार्य करूँगा / करुँगी।
  • मैं अपने फिजूल खर्चों पर कंट्रोल कर बचत करूँगा / करुँगी।
  • मैं अपने सहकर्मियों से अच्छा व्यवहार करूँगा / करुँगी।
  • मैं जरूरतमंदों की मदद जरूर करूँगा / करुँगी।
  • मैं पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर जरूर बनूँगा / बनूँगी।
  • मैं स्वच्छता पर ध्यान दूंगा / दूंगी।

आपका वादा या संकल्प अपने आप से ऊपर दिए गए किसी भी बिंदु से मिलते जुलते हो सकते है। वह कौन सा कारण है या कमी है जिस वजह से आप अपने आप से संकल्प और वादे तो करते है लेकिन ये वादे या संकल्प १० से १५ दिन के बाद नही कर पाते। आइये जानते है वह कमी कहाँ रह जाती है:

  • एक साथ सब कुछ ना करे।
  • कोई भी कार्य छोटे-छोटे स्टेप में करें।
  • अपने दिन की शुरुआत महत्वपूर्ण कार्य से करें।
  • समय की कीमत को समझे, व्यर्थ ना गवाए।
  • नियमित रूप से बचत जरूर करे, बुरे वक्त के लिए।
  • सीखना जारी रखें, किसी भी मुसीबत से बाहर निकलने के लिए।
  • मन और बुद्धि की इनर इंजीनियरिंग को समझे।
  • नियमित रूप से ध्यान जरूर करें, मन और बुद्धि को शांत और एक्टिव रखने के लिए।

एक बात सदैव ही याद रखें: शांत मन से ही संकल्पो को फ़िल्टर कर पाएंगे। जब मन शांत होगा तभी आपकी बुद्धि को कोई भी निर्णय करना आसान होगा। आपकी बुद्धि सही समय पर सही और गलत का निर्णय कर पायेगी। जब आपका निर्णय सही होगा तो आपका कार्य सफल होगा। अपनी मन और बुद्धि की इनर शक्तियों को जागृत कर उपयोग करना सीखे। तभी आप सफल होंगे।

“आपको ना रुकना है, ना भागना है, बस चलते रहना है। अर्थात: आपको अपने कार्य को ना ही धीरे-धीरे करना है, ना ही तेज गति से करना है, ना ही कार्य को बीच में छोड़ना है, आपको पूर्ण तन, मन व धन से नियमित मध्यम गति से कार्य को करते रहना है। तब आपको सफलता जरूर मिलेगी।“

मुझे पूर्ण विश्वास है ये आर्टिकल आपके सफलता में जरूर सहयोगी बनेगी। अगर आप भी अपनी तरफ से कुछ जोड़ना चाहते है तो कमेंट के कर जरूर बताये। आप सभी के लिए ये नया वर्ष खुशियों भरा हो, आपकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो।

Must Read:

  • दिल और दिमाग को सक्रिय रखें।
  • अच्छी आदतें कैसे डालें।
  • 2020 से आपने क्या सीखा?

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।~KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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अपना अधिकार।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ अपना अधिकार। ♦

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ये करो, वो नहीं।
ऐसे करो, वैसे नहीं।
इससे बात करो, उससे नहीं।
ऐसे बैठो, ऐसे हँसो।
दिन भर खी-खी मत करो।
काम सुघड़ता से किया करो।
अपने घर जा के बेइज़्ज़त करोगी हमें॥

ये नही करने आता।
वो नही करने आता।
ठीक से कैसे बैठते हैं।
सबको खुश कैसे रखते हैं।
क्या सीखा है जीवन भर।
यही सीख के आयी हो।
मोहल्ले भर में बेइज्जती कराती फिरती हो।
ये सब करना है तो अपने घर जाओ वापस॥

कच्ची उम्र में ब्याह दी गयी।
उस नन्ही सी जान ने।
जीवन भर दूसरों का कहना ही सीखा था।
अपने मुँह में ज़बान होती है।
या दाँत भी होते हैं, ये जानती भी न थी।
कच्ची उम्र में खानदान की इज़्ज़त संभालना।
पड़ता था उसे, जब कि जानती भी नहीं कि,
हंसने बोलने से इज़्ज़त कैसे निकल जाती है॥

सीखते, संभालते उम्र निकल जाती है।
लेकिन अपना घर नही मिलता।
औरतों को खुल कर हंसने बोलने मुस्कुराने,
का अधिकार नही मिलता॥

♦–  प्राप्ति सिंह –♦

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वक्त कहाँ रह पाया सदा सिकन्दर का।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ वक्त कहाँ रह पाया सदा सिकन्दर का। ♦

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वक्त कहाँ रह पाया सदा सिकन्दर का।
शाम ढले-ढल जाता तेज प्रभाकर का॥

ये भी साल चला जाएगा कल परसों।
फिर से स्वागत होगा नए कलेंडर का॥

उघड़े तन को भी कोई कम्बल दे दो।
कानों में कह जाता मास दिसम्बर का॥

बुरे समय की आँधी जब भी चलती है।
तिनका-तिनका उड़ जाता है छप्पर का॥

जिम्मेदारी पूरी और आधी तनख़्वाह।
कहाँ रिटायर होगा मुखिया इस घर का॥

चलते-चलते वक्त ज़रा थम जाएगा।
आएगा जब नाम ज़ुबाँ पर अलवर का॥

पल बदले, मौसम बदला, तिथियाँ बदलीं।
रंग बदल जाएगा तन की चादर का॥

♦– डॉ• सीमा विजयवर्गीय, अलवर (राजस्थान) –♦

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ढाई अक्षर।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ ढाई अक्षर। ♦

शिवम् शरणम् गच्छामि॥
शिवो वेदा वेदो शिवम्॥

अक्षर ढाई – जिसमें बहुत कुछ बन्धु मेरे भाई॥

ज्ञान मार्ग जब खोजने निकला।
मार्ग मिला – अलबेला जहां भी जाऊं।
जिधर भी देखूं – मिले ढाई अक्षर का मेला॥

सोचा इक पल – ध्यान लगा कर।
क्या होता है – अक्षर ढाई।
आया मेरी समझ में जो।
बतलाता हूं मैं वो बन्धु / भाई॥

रह जाता सब ज्ञान अधूरा।
जो ना मिलता – उत्तर बन्धु / भाई॥

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ढाई अक्षर का वक्र और ढाई अक्षर का तुण्ड।
ढाई अक्षर की रिद्धि और ढाई अक्षर की सिद्धि॥

ढाई अक्षर का शंभु और ढाई अक्षर की अम्बा।
ढाई अक्षर का ब्रम्हा और ढाई अक्षर की सृष्टि॥

ढाई अक्षर का विष्णु और ढाई अक्षर की लक्ष्मी।
ढाई अक्षर का कृष्ण और ढाई अक्षर की कांता॥
(* कांता – राधा रानी का दूसरा नाम)

ढाई अक्षर की दुर्गा और ढाई अक्षर की शक्ति।
ढाई अक्षर की श्रद्धा और ढाई अक्षर की भक्ति॥

ढाई अक्षर का त्याग और ढाई अक्षर का ध्यान।
ढाई अक्षर की तृप्ति और ढाई अक्षर की तृष्णा॥

ढाई अक्षर का धर्म और ढाई अक्षर का कर्म।
ढाई अक्षर का भाग्य और ढाई अक्षर की व्यथा॥

ढाई अक्षर का ग्रन्थ और ढाई अक्षर का संत।
ढाई अक्षर का शब्द और ढाई अक्षर का अर्थ॥

ढाई अक्षर का सत्य और ढाई अक्षर का मिथ्या।
ढाई अक्षर की श्रुति और ढाई अक्षर की ध्वनि॥

ढाई अक्षर की अग्नि और ढाई अक्षर का कुण्ड।
ढाई अक्षर का मंत्र और ढाई अक्षर का यंत्र॥

ढाई अक्षर का प्यार और ढाई अक्षर का स्वार्थ।
ढाई अक्षर की सांस और ढाई अक्षर के प्राण॥

ढाई अक्षर का मित्र और ढाई अक्षर का शत्रु।
ढाई अक्षर का प्रेम और ढाई अक्षर की घृणा॥

ढाई अक्षर का जन्म ढाई अक्षर की मृत्यु।
ढाई अक्षर की अस्थि और ढाई अक्षर की अर्थी॥

जन्म से लेकर मृत्यु तक, हम बंधे हैं ढाई अक्षर में।
हैं ढाई अक्षर ही वक़्त में और ढाई अक्षर ही अंत में।
समझ ना पाया कोई भी है रहस्य क्या ढाई अक्षर में॥॥

♦ डॉ• विदुषी शर्मा – नई दिल्ली ♦
_____
हम दिल से आभारी हैं डॉ• विदुषी शर्मा जी के प्रेरणादायक लेख (ढाई अक्षर) हिन्दी में Share करने के लिए।
About – डॉ• विदुषी शर्मा जी,
आप अभी कार्यरत हैं – दिल्ली स्टेट की जनरल सेक्रेटरी इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स आर्गेनाईजेशन. (You are currently working – Delhi State General Secretary International Human Rights Organization.)
Email ID: neerjasharma98@gmail.com & Blog: http://educationalvidushi.blogspot.com/
 —™—

विदुषी शर्मा जी के लिए मेरे विचार:

♣ 🙂 “विदुषी शर्मा जी” ने बहुत ही सरल शब्दों में “ढाई अक्षर” के गुणों का प्यार भरा संयोजित मनोरम वर्णन किया है। हर एक शब्द में अलाैकिक सार भरा हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। “ढाई अक्षर” के गुण और प्यार, सागर के गहराई से भी ज्यादा हैं। सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान गहराई से हर शब्दाे का सार समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें। ढाई अक्षर के शब्दों को एक ही लय में कविता के रूप में पीरो दिया, जनमानस के लिए। बहुत ही अच्छा आपकी लेखनी का कमाल है ये। आपकी लेखनी यूं ही चलती रहे, लोगों के कल्याण के लिए।

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सबसे बड़ा रोग – क्या कहेंगे लोग।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ सबसे बड़ा रोग – क्या कहेंगे लोग। ♦

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यह दुनिया का सबसे बड़ा रोग है, “क्या कहेंगे लोग।” अगर आप भी यह सोच (क्या कहेंगे लोग) कर कोई कार्य करने से रूक जाते है तो – आपको अपने जीवन में कभी भी सुख और शांति नही मिलेगी । आप बस उसी Comfort Zone में चक्कर काटते रह जायेंगे। आपका पूरा जीवन ऐसे ही बीत जायेगा। फिर अंतिम समय में पता चलेगा की कोई कुछ सोच ही नही रहा था। बस एक डर था मन के किसी कोने में, जो आपको कोई भी आपका मन पसंद कार्य करने से सदैव रोकता था।

आज संसार में जितने भी महान लोग हुए है या जितने भी महान कार्य हुए है। वह सभी कार्य इस सोच (सबसे बड़ा रोग – क्या कहेंगे लोग) के दायरे से बाहर निकल कर कार्य करने से ही हुआ है। अगर वह भी यह सोच कर रूक जाते की “क्या कहेंगे लोग”, ना ही वह महान होते, ना ही कोई महान कार्य होता। जिस कार्य को ओ दिल से पसंद करते थे, उन्होंने वही कार्य किया और सफल हुए।

आपको भी डरने की जरूरत नहीं है, यह सोच कर की क्या कहेंगे लोग। आप वही कार्य करे, जो आप दिल से करना चाहते है। अपने पैशन को कभी भी ना मारे। वर्ना पूरा जीवन खाने-पीने में ही बीत जायेगा। फिर अंतिम समय में यही सोच कर पछतायेंगे की, कोई कुछ सोच ही नहीं रहा था।

ये समाज कभी न छोड़े आपको। आप कुछ भी करने की सोचते है, बहुत सारे लोग आपको यही कहेंगे की तुमसे ये कार्य नही हो पायेगा, तुम नही कर पाओगे। तुम्हे इस कार्य का कोई भी अनुभव नहीं है। तुम अभी बच्चे हो, तुम्हें समझ नहीं है। ये मत करो, वो मत करो। क्या है यह सब। आप सभी को इस सोच के दायरे से बाहर निकलना ही होगा।

“ना ही आपको रूकना है, ना ही कार्य को बीच में छोड़ना है।
बस नियमित रूप से यूं ही चलते रहना है अर्थात – कार्य करते रहना है।
आपके द्वारा किया गया थोड़ा-थोड़ा नियमित कार्य आपको सफलता तक जरूर पहुंचाता है।“

यह समाज के लोग ऐसे ही है, जब भी आप कुछ नया करने की सोचते है ये आपको रोकने लगते है। वह कभी नहीं चाहते की आप उनसे आगे निकल जाये जीवन में। आपकी तरक्की से उन्हें जलन होती है। इसलिए सभी आपकी टांग खींचते रहते है। यह टांग खींचना तब तक नहीं बंद होता है, जब तक आप अपने उस हटकर किये गए कार्य के शिखर पर नहीं पहुंच जाते।

  • जब आप शिखर पर पहुंच जाते है, तब सभी की राय बदल जाती है।
  • जो आपका टांग खींचते थे, अब वही आपका बहबाई करते नहीं थकते।
  • वही कहने लगते है, मैं तो जानता था यह सफल जरूर होगा।
  • इसमें इस हद तक जूनून है की इसको सफल होना ही था।

“जब इंसान इतिहास रचता है तब वह बिलकुल अकेला होता है।
जब उसे सफलता मिल जाती है तो पूरी दुनिया उसके साथ होती है।
सफलता मिलने के बाद ही लोग उसके साथ होते है।“

इसलिए दुनिया के लोग क्या कहते है इस बात की कभी भी परवाह न करते हुए वही कार्य करे।

  • जिसमे आप माहीर है।
  • जिस कार्य को आप दिल से करना चाहते है।
  • जिस कार्य को करने से आप कभी थकते नहीं।
  • दिन हो, या रात हो, आप कभी रूकते नहीं।
  • शुरुआत में जिस कार्य को करने के पैसे भी न मिले, तो भी आप करने के लिए तैयार हो।
  • आपको बहुत ज्यादा नींद भी आ रही हो, तो भी करने के लिए तैयार हो।

याद रखें – आप वही कार्य करें, जो आप दिल से करना चाहते है। यह सोचकर कभी भी न रुके की – क्या कहेंगे लोग। आपको इस सोच से बाहर निकलना ही होगा। जब तक आप इस सोच (सबसे बड़ा रोग – क्या कहेंगे लोग) से बाहर निकल कर कार्य नहीं करेंगे तब तक आप कभी भी जीवन में सफल नहीं होंगे। आपको हर हाल में इस सोच से बाहर निकल कर कार्य करना ही होगा-तभी आप वह सबकुछ प्राप्त कर पाएंगे। अपने जीवन में जिसकी आपने लम्बे वक्त से कामना की थी। जिसके लिए दिन रात एक कर मेहनत किया था। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको सफलता तक पहुंचाने में ये आर्टिकल जरूर मदद करेगी।

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एक खत तुम्हारे राजा को।

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♦ एक खत तुम्हारे राजा को। ♦

सारंगी बजाते।
अपनी धुन में।
मस्त रहने वाले।
राजा को तुम।
यदि अपनी भूख के बारे मे।
एक खत लिखना चाहते हो।
तो लिख दो॥

लेकिन उस खत को।
तुम अपने पसीने की बूंदों से।
मत लिखना।
वो उसे नहीं दिखेगा॥

लेकिन उस खत को।
तुम अपने पसीने की बूंदों से।
मत लिखना।
वो उसे नहीं दिखेगा॥

और तुम आंसुओं की।
बूंदों से भी मत लिखना।
उसे भी वो पढ़ नहीं पाएगा॥

अगर लिखना ही है।
एक खत तुम्हें राजा को।
अपनी भूख के बारे में।
तो तुम लहू की बूंदों से लिख दो।
तब दोनों में से एक तय होगा॥

अगर ऐसा ही हुआ तो।
तुम्हारा खत पढ़ने के लिए।
वो ही नहीं रहेगा।
या फिर इसका जवाब पढ़ने तक।
तुम ही नहीं रहोगे॥
♦– मीरा मेघमाला –♦

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यह कविता “मीरा मेघमाला” जी की रचना है। आपके द्वारा लिखी कविता ह्रदय को छूने वाली होती है। हर उम्र के लोग आपकी कविताओं को पसंद करते है। आपकी कविताओं से हर उम्र के लोगो को फायदा मिलता है। आपकी लेखनी यु ही चलती रहे। आपके उज्जवल भविष्य और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूँ। “मीरा मेघमाला” जी KMSRAJ51.COM के ऑथर टीम पैनल में आपका तहे दिल से स्वागत है।

जरूर पढ़े: तुम्हारी एक मुस्कुराहट।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

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समस्या दुखी होने में नहीं।

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♦ समस्या दुखी होने में नहीं। ♦

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समस्या दुखी होने में नही, बल्कि दुख से चिपके रहने में है। अमूमन हमको ये लगने लगता है कि एक दुख को अपनाकर हमने जीवन की संपूर्णता प्राप्त कर ली है और जीवन जीना सीख गए हैं जबकि ऐसा बिल्कुल भी नही है। कोई भी दुख निवारण के लिए होता है ना कि अपनाने के लिए।

ऐसे समय में हम लोगों की नज़रों में एक प्रौढ़ और सुलझे हुए व्यक्ति के रूप में बने रहने के परम इछुक होते हैं। इसलिए जब-तब अपने चेहरे की भंगिमाओं से उन्हें ऐसा दर्शाते रहते हैं। जैसे दुनियाभर का दुख हमारे ही ऊपर आ पड़ा हो। याद रखें – दुनिया में ऐसे अनगिनत लोग हैं जिनके दुख के आगे हमारा दुख, कुछ भी नही है।

दरअसल, असल बात तो यह रहती है कि ऐसे समय में हम एक दुखी और बनावटी प्रौढ़ बनकर अपने लिए कार्यमुक्ति का मार्ग ढूँढने लगते हैं। जिसमें हम अपने अंदर से उठने वाली कर्मठता की हर आवाज़ को अपने कथित दुख और दिखावटी अनुभव के पीछे दबाने की कोशिश करने लगते हैं।

दरअसल, सत्य तो यह रहता है कि जीवन के प्रति, जो हमारा आलसी रवैया होता है। वही इस भावना को सहारा देता रहता है। ऐसे में हम अपने अंदर मौजूद आलस्य को छिपाने के लिए अपने तथाकथित दुख और अनुभव का सहारा लेना शुरू कर देते हैं।

याद रखें – दुख हमें मेहनत करके फिर से उभरने की सीख देता है ना कि मेहनत न करने के लिए आलस्य।

हो सकता है कि हम सचमुच दुखी हों, और स्वयं को उस दुख में अकेला पाते हों। मगर, ऐसे समय में हमारा ये परम कर्तव्य बन जाता है कि हम अपने दुख को अपनी कर्मठता के नीचे दबा लें। अन्यथा ये हमारी कर्मठता को दबा देगा और हम निरंतर और ज़्यादा दुखी होते जायेंगे और जीवन के अंतिम पड़ाव पर, अनुभव के नाम पर, हमारे पास केवल दुख रहेंगे जो दूसरों को जीवन जीना सीखने के लिए भले ही सार्थक हों। मगर हमारे लिए उनका कोई अर्थ नही रह जाएगा।

आशा करता हूँ की आप सभी को इस आर्टिकल से जरूर फायदा मिलेगा, और आप सभी अपने जीवन में आने वाली समस्याओं से बाहर निकल पाएंगे।

♦– This article written by – शुभम –♦

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बंदे को एकतरफा प्यार ने मार डाला।

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♦ बंदे को एकतरफा प्यार ने मार डाला। ♦

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रूप से बचा तो, श्रृंगार ने मार डाला।
थोड़ा संभले तो, रूखसार ने मार डाला।
उम्मीद था कि आप पलट के देखेंगे।
गलतफहमी थी, ऐतबार ने मार डाला॥

यूँ भी कोई दिल तोड़ के जाता है क्या?
यकीन को अहदे-इंतजार ने मार डाला।
कम से कम नाम पता तो छोड़ के जाते।
शायर को तल्खी, व्यवहार ने मार डाला॥

कभी मैंने अपने खुदी, जमीर मार दी।
कभी मुझको मेरे किरदार ने मार डाला।
इश्क फिर भी कहीं न कहीं रहा जिंदा।
इश्क की हुंकार ने, धिक्कार ने मार डाला॥

चाक सा नये-नये खिलौने गढ़ता रहा।
खिलौने की आत्मा कुम्हार ने मार डाला।
कभी मिट्टी को कभी हाथों को दोष दी।
मुहब्बत की अदा ने, उभार ने मार डाला॥

अब दुनियाँ से मुँह छुपाये फिरते हैं।
दुनियाँ के रंग-ढंग, रफ्तार ने मार डाला।
कई बार ये सुनके फिर मरना पड़ता है।
“बंदे को एकतरफा प्यार ने मार डाला॥”

♦– शैल – द्वारा, स्वरचित ♦

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मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं।

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♦ मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं। ♦

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सारे ग़म भूलकर खिलखिलाओ प्रिये।
मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं॥

कभी इनके लिए कभी उनके लिए।
हरदम जीतीं व पीड़ाएं पीतीं रहीं।
जब लड़कपन था वे सब हमारे रहे।
व्याह बंधन में बंध सब बिछड़ने लगे॥

अब निराशा की चादर झटक दो प्रिये।
मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं॥

पंख तुमने दिए, फिर परिंदे बने।
पंख फैला गगन में वे उड़ने लगे।
अपनी दुनिया बनाने की आशा लिए।
नीड़ खुदके बड़े हो बनाने लगे॥

उनको उड़ने दो खुद मुस्कराओ प्रिये।
मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं॥

अपनी खुशियों को रौंदा न आहें भरा।
उनकी खुशियों के हित, सब लुटाते रहे।
जब सांसें हमारी सिमटने लगीं।
कौन जाने वे क्यों कतराने लगे॥

बोझ मनका उतारो हंसो तुम प्रिये।
मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं॥

यह जीवन प्रकृति ने हमें है दिया।
एक उपहार ले बस इसे तुम जियो।
हास परिहास से जिंदगी काट लो।
दग्ध दिल पर न अब चोट आगे लगे॥

तुम प्रकृति की तरह मुस्कराओ प्रिये।
मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं॥

एक वो था समय मखमली रातें थीं।
सब तरफ खुशियां थी और सौगातें थीं।
आज आशा निराशा की नौका लिए।
बीच मझधार में डगमगाने लगे॥

ये हैं कमजोर सांसें संभालो प्रिये।
मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं॥

हम भले आज कमजोर थोड़ा हुए।
पर हमारा नहीं यह प्रकृति दोष है।
ढल रही इस उमर का असर देखिए।
नाते रिश्ते सभी दूर होने लगे॥

हाथ में हाथ ले मुस्कुराओ प्रिये।
मै यूं ही प्यार के गीत गाता रहूं॥
♦– आर.जी.कुरील – सिविल लाइन, उन्नाव ♦

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अपनी नज़रों पे बे-वज़ह ना इतना बल दो।

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♦ अपनी नज़रों पे बे-वज़ह ना इतना बल दो। ♦

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अपनी नज़रों पे बे-वज़ह ना इतना बल दो।
हो सके तो अपने घर का आईना बदल दो॥

ना काटो मुझे मैं शज़र हूँ परिन्दों का घर हूँ।
दूंगा मैं बादल बहुत तुम मुझे थोड़ा जल दो॥

माना कि फूलों के शौक़ीन हैं चमन में बहुत।
लेकिन ये शौक़ कैसा जी भरे और मसल दो॥

लो हम हैं गुस्ताख़, हर सज़ा है कबूल हमको।
मगर इन बे-कुसूरों पे लगी तोहमतें बदल दो॥

उफ़ान सवालों का बना दिल में सैलाब “शशि”।
ऐ मेरी आँखों, इन्हें हल दो या मुझे ग़ज़ल दो॥
♦– डाॅ सच्चितानन्द चौधरी “शशि”♦

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