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हिन्दी-कविता

कृष्ण लीला।

Kmsraj51 की कलम से…..

Krishna Leela | कृष्ण लीला।

कैसे – कैसे लीला रचाता है,
नटखट कान्हा देखो कैसे मुस्कुराता है।
पैरों में घुंघरू बांध देखो कैसे इतराता है,
गोपियों को देखो कैसे,
प्यारी – प्यारी मुरली सुनाता है।

मुरली की धुन पर देखो,
गोपियों को कैसे-कैसे नचाता है।
सिर पर देखो कैसे,
प्यारा सा मोर पंख लगाता है।
दूध दही का इतना दीवाना,
देखो कैसे-कैसे मटकी फोड़ने आता है।

वृंदावन की गलियां देखो,
कैसे – कैसे अपने भक्तों का मन बहलाता है।
अपने मैया से करता है इतना प्यार,
उसकी डांट खाने से देखो,
बिल्कुल भी नहीं घबराता है।
नटखट कान्हा देखो,
कैसे – कैसे अपनी लीला रचाता है।

गोवर्धन पर्वत को देखो कैसे,
अपनी उंगली पर उठाता है।
अपनी बाल लीला से देखो,
कैसे पूतना को हराता है।
देखो इस संसार में कैसे
अपनी लीला रचाता है।

कंस मामा का वध करके,
देखो सारे लोगों को कैसे,
उसके अत्याचारों से बचाता है।
अर्जुन का सारथी बन के,
देखो कैसे महाभारत के,
युद्ध में कौरवों को हराता है।

कैसे-कैसे देखो दुनिया को,
गीता का उपदेश पढाता है।
कृष्ण कन्हैया देखो,
कैसे-कैसे अपनी लीला रचाता है।
आज सारा जग देखो कैसे,
जन्माष्टमी धूमधाम से मानता है।

♦ लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी  – बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “श्री लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता में कान्हा (श्रीकृष्ण) की बाल लीलाओं के वर्णन के साथ, उनके भक्ति और लोगों के प्रति उनकी अनुराग भावना को प्रकट करते हुए लिखा गया है। कान्हा के अद्भुत और मनमोहक व्यवहार का चित्रण किया गया है, जो उनके भक्तों को खुशी और प्रेम में लिपटा देता है। काव्य में उनकी आलोकिक शक्तियों और लीलाओं का अद्वितीय चित्रण किया गया है, जिससे उनका दिव्य और भगवान के रूप में अवतरण का महत्व प्रकट होता है। इसके अलावा, काव्य में भक्ति, प्रेम, और धार्मिक संदेश को भी दर्शाया गया है, जिससे यह कविता भगवान के जन्म दिन (जन्माष्टमी) के उपलक्ष्य में धूमधाम से मनाने की भावना को प्रकट करती है।

—————

यह कविता (कृष्ण लीला।) “श्री लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, लघु कथा, सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल है। साहित्यिक नाम — डॉ• जय अनजान है। माता का नाम — श्रीमती कमला देवी महलवाल और पिता का नाम — श्री सुंदर राम महलवाल है। शिक्षा — पी• एच• डी•(गणित), एम• फिल•, बी• एड•। व्यवसाय — सहायक प्रोफेसर। धर्म पत्नी — श्रीमती संतोष महलवाल और संतान – शानवी एवम् रिशित।

  • रुचियां — लेखक, समीक्षक, आलोचक, लघुकथा, फीचर डेस्क, भ्रमण, कथाकार, व्यंग्यात्मक लेख।
  • लेखन भाषाएं — हिंदी, पहाड़ी (कहलूरी, कांगड़ी, मंडयाली) अंग्रेजी।
  • लिखित रचनाएं — हिंदी(50), पहाड़ी(50), अंग्रेजी(10)।
  • प्रेरणा स्त्रोत — माता एवम हालात।
  • पदभार निर्वहन — कार्यकारिणी सदस्य कल्याण कला मंच बिलासपुर, लेखक संघ बिलासपुर, सह सचिव राष्ट्रीय कवि संगम बिलासपुर इकाई, ज्वाइंट फाइनेंस सेक्रेटरी हिमाचल मलखंभ एसोसिएशन, सदस्य मंजूषा सहायता केंद्र।
  • सम्मान प्राप्त — श्रेष्ठ रचनाकार(देवभूमि हिम साहित्य मंच) — 2022
  • कल्याण शरद शिरोमणि सम्मान(कल्याण कला मंच) — 2022
  • काले बाबा उत्कृष्ट लेखक सम्मान — 2022
  • व्यास गौरव सम्मान — 2022
  • रक्त सेवा सम्मान (नेहा मानव सोसायटी)।
  • शारदा साहित्य संगम सम्मान — 2022
  • विशेष — 17 बार रक्तदान।
  • देश, प्रदेश के अग्रणी समाचार पत्रों एवम पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता Tagged With: Dr. Jai Mahalwal, poem on krishna janmashtami in hindi, कान्हा पर कविता, कान्हा पर शायरी, कृष्ण जन्म पर कविता, कृष्ण लीला, कृष्ण लीला - डॉ• जय महलवाल, कृष्ण सौंदर्य पर कविता, डॉ• जय महलवाल, नटखट कृष्ण शायरी, बाल कृष्ण पर कविता

हे मुरलीधर!

Kmsraj51 की कलम से…..

Hey Murlidhar | हे मुरलीधर!

हे मुरलीधर! तेरे आगमन की पावन बेला आई।
सज गया ये जगत, खुशियों की बौछार छाई॥

तेरी अतिप्रिय मुरली की धुन में होकर मगन।
तेरे नाम के दीवानों को लागी लगन॥

तेरे मुकुट के मयूर-पंख को ही निहारेंगे, आज सब।
हे लीलाधर! तुम अपनी लीला दिखाने आ जाओ अब॥

तेरे इस जन्माष्टमी पर्व पर……..

छोटे ~ छोटे प्यारे बच्चों का रूप बहुत सलोना।
छोटी ~ छोटी राधा, छोटे-छोटे कान्हा मनमोहना॥

देखो! आज इन्होने क्या सुंदर रूप बनाया।
इनकी छवि ने मन को बहुत लुभाया॥

बालमन अनोखी, अदभुत छवि ले मुस्काय।
नज़र उतारे इनकी कहीं नजर न लग जाय॥

हे मुरलीधर, जन्माष्टमी पर सब रूप ही तुम्हारे भाये।
लगे आज यूँ हर बाल रूप में तुम्हीं समाये॥

आज काली रात्रि का अंधकार भी, तेरे जन्म के उजाले से भर जाएगा।
तेरा जन्म, इस भारत-भू पर परमानंद ले आएगा॥

अपनी श्रद्धा, आस्था के सब पुष्प ही, तुझको कर दूँ अर्पण।
तेरे भक्तों को तेरी ही छवि दिखेगी, ऐसा बना मन-दर्पण॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता में कवयित्री हे मुरलीधर के सागर प्रेम और श्रद्धा की भावना को व्यक्त करती हैं, और वो भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के पावन अवसर की उपलक्ष्य में बोल रहे हैं। कविता में व्यक्त की जाने वाली भक्ति और उम्मीद की भावना के साथ ही बच्चों के छवि का सुंदर वर्णन भी होता है, जो भगवान के जन्म के अवसर पर दिखाया जाता है। इसके अलावा, कविता में भगवान के जन्म के पावन अवसर का महत्व और उसके प्रभाव के बारे में भी बताया गया है।

—————

यह कविता (हे मुरलीधर!) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी (राष्ट्रीय नवाचारी शिक्षिका व अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार) है। शिक्षा — डी•एड, बी•एड, एम•ए•। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

  • अनेक मंचों से राष्ट्रीय सम्मान।
  • इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज।
  • काव्य श्री सम्मान — 2023
  • “Most Inspiring Women Of The Earth“ – Award 2023
    {International Internship University and Swarn Bharat Parivar}
  • Teacher’s Icon Award — 2023
  • राष्ट्रीय शिक्षा शिल्पी सम्मान — 2021
  • सावित्रीबाई फुले ग्लोबल अचीवर्स अवार्ड — 2022
  • राष्ट्र गौरव सम्मान — 2022
  • गुरु चाणक्य सम्मान 2022 {International Best Global Educator Award 2022, Educator of the Year 2022}
  • राष्ट्रीय गौरव शिक्षक सम्मान 2022 से सम्मानित।
  • अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ लेखिका व सर्वश्रेष्ठ कवयित्री – By — KMSRAJ51.COM
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शिक्षक गौरव सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय स्त्री शक्ति सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शक्ति संचेतना अवार्ड — 2022
  • साउथ एशिया टीचर एक्सीलेंस अवार्ड — 2022
  • 50 सांझा काव्य-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित (राष्ट्रीय स्तर पर)।
  • 70 रचनाएँ व 11+ लेख और 1 लघु कथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित (KMSRAJ51.COM)। इनकी 6 कविताएं अब तक विश्व स्तर पर प्रथम और द्वितीय स्थान पा चुकी है, जिनके आधार पर इनको सर्वश्रेष्ठ कवयित्री व पर्यावरण प्रेमी का खिताब व वरिष्ठ लेखिका का खिताब की प्राप्ति हो चुकी है।
  • इनकी अनेक कविताएं व शिक्षाप्रद लेख विभिन्न प्रकार के पटल व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं।
  • 3 महीने में तीन पुस्तकें प्रकाशित हुए। जिसमें दो काव्य संग्रह “समर्पण भावों का” और “भाव मेरे सतरंगी” और एक लेख संग्रह “एक नजर इन पर भी” प्रकाशित हुए। एक शोध पत्र “आओं, लौट चले पुराने संस्कारों की ओर” प्रकाशित हुआ। इनके लेख और रचनाएं जन-मानस के पटल पर गहरी छाप छोड़ रहे हैं।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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शिल्प-धर्म।

Kmsraj51 की कलम से…..

Shilp-Dharm | शिल्प-धर्म।

अनुकर्ष निर्जन वन पूनम,
पृथुल भूधर प्रदेश विशाल थे।
स्निग्ध हरीरी अमृता भूषित-पथ,
आरण्य सारंग-अमंद बिखरे थे।

लपेट दिव्य भूषण कौन्तेय के,
प्रदर्श-सहस लावण्य लहर से।
मुक्त-कुंतल लहरा रही थी,
रत्नगर्भा को उतुङ्ग महाविल से।

शिल्प-धर्म पर मैं जाता था,
निःसंग वन-वाटिका तमस् में।
यकायक दृष्टिगत हुई अभ्र को,
मराल कंधर संक्षिप्त कपाल में।

कामदग्धा अपूर्व सुंदरी,
उस पर मुरली लिये कर कमल में।
चीर रही थी नितांत निर्जन वन को,
भर रही सरगम के मधुर-स्वर में।

किल्लोल रही तरंगें रश्मियों से,
ढुलक रहे घनरस कमलिनी में।
अगुरु युवता थिरक रही थी,
निहार-कणों-सा सुर पवन में।

पुकार कहा मैनें; कौन? बंसी बजा रहा,
कहा प्रकृति ने सौंदर्य चिर हमी-से।
घनेरी स्वयं दमक-भास मैं करती,
प्रकाशित अधिलोक मैं तुम्हीं-से।

अनखिली यौवन का मधु मैं,
मदहोश रसीली नई-नवेली।
सरस तरुणी का नयन-मद,
दृष्टि लेखन की अलबेली।

कोमल मंजरी किसलय कली हूँ मैं,
मैं फुनगियों पर पड़ी मिहिका रज।
सुमन-सारंग पर थिरकती फिरती हूँ,
प्रेममय भृंगी-पतंगा बन समज।

प्रणय-वेदना के सिवा न दुःख,
यहाँ पुरातन क्षेम की लालिमा है।
इस वापिका में नित राजहंस के,
आसङ्ग टहलती आनंदित हँसनी है।

जोड़ पंख अभिलाषा अभिराम,
आई इस आनन्द भुवन माया में।
पी लो आज अधर-रस जी-भर,
कल दहन होगी तेरी पिण्ड-काया में।

युवता तश्नगी आकर्षण प्रेम,
सत्यतः नवयौवना मधुमय है।
इन चक्षुओं में विवुध-मधु भरा,
रसीले रदों में मद – संचय है।

देखा है मैनें इन दिनों में,
मादकता भरी है हिमकणों में।
सारंगों की मुस्कान प्रगट थी,
निर्मल शून्य सुनहला पुष्करणों में।

आनंदित हिलोर लेती कनक किरणें,
झिलमिल-झिलमिल झलक रही सर में।
शिल्प-धर्म पर मैं जाता था,
निःसंग वन-वाटिका तमस् में।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (शिल्प-धर्म।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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गुरु की महिमा।

Kmsraj51 की कलम से…..

Guru Ki Mahima | गुरु की महिमा।

गुरु ही ले जाये, अंधकार से प्रकाश की ओर।
गुरु की महिमा का न पाया, किसी ने छोर।

प्रथम गुरु जन्मदाता मात-पिता को नमन।
खिलाया जिन्होंने संसार में जीवन का चमन।

द्वितीय स्थान गुरु का, जीवन मे शिक्षक ही पाता।
जो सुप्त भाग्य जगा दे, जीवन निर्मल दे जाता।

गुरु ही बोयें, शिष्यों में संस्कारों के बीज।
नैतिकता, समाजिकता और सिखाएं तहजीब।

आध्यात्मिक गुरु ने ईश्वर से भी उच्च दर्जा पाया।
गुणगान इसकी महिमा का, शास्त्रों ने भी सुनाया।

प्रशस्त करता सन्मार्ग, गुरु ही इस जीवन में।
शिष्य को ये लाकर खड़ा कर दे, खुशियों के उपवन में।

गुरु की महिमा से गुंजायमान है, ये ब्रह्मांड।
शीश झुका करें हम, प्रणाम साष्टांग।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका को महत्वपूर्णता के साथ दर्शाया गया है। गुरु जी को त्रिविध रूपों में प्रस्तुत किया गया है: प्रथम गुरु (मात-पिता), द्वितीय गुरु (शिक्षक), और आध्यात्मिक गुरु (आध्यात्मिक गुरु)। कविता में यह बताया गया है कि गुरु के बिना हमारा जीवन अधूरा होता है और गुरु के माध्यम से हमें नैतिकता, समाजिकता, और ज्ञान प्राप्त होता है। गुरु की महिमा को सराहा गया है और उनके प्रति प्रणाम और श्रद्धा की भावना व्यक्त की गई है।

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यह कविता (गुरु की महिमा।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी (राष्ट्रीय नवाचारी शिक्षिका व अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार) है। शिक्षा — डी•एड, बी•एड, एम•ए•। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

  • अनेक मंचों से राष्ट्रीय सम्मान।
  • इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज।
  • काव्य श्री सम्मान — 2023
  • “Most Inspiring Women Of The Earth“ – Award 2023
    {International Internship University and Swarn Bharat Parivar}
  • Teacher’s Icon Award — 2023
  • राष्ट्रीय शिक्षा शिल्पी सम्मान — 2021
  • सावित्रीबाई फुले ग्लोबल अचीवर्स अवार्ड — 2022
  • राष्ट्र गौरव सम्मान — 2022
  • गुरु चाणक्य सम्मान 2022 {International Best Global Educator Award 2022, Educator of the Year 2022}
  • राष्ट्रीय गौरव शिक्षक सम्मान 2022 से सम्मानित।
  • अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ लेखिका व सर्वश्रेष्ठ कवयित्री – By — KMSRAJ51.COM
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शिक्षक गौरव सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय स्त्री शक्ति सम्मान — 2022
  • राष्ट्रीय शक्ति संचेतना अवार्ड — 2022
  • साउथ एशिया टीचर एक्सीलेंस अवार्ड — 2022
  • 50 सांझा काव्य-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित (राष्ट्रीय स्तर पर)।
  • 70 रचनाएँ व 11+ लेख और 1 लघु कथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित (KMSRAJ51.COM)। इनकी 6 कविताएं अब तक विश्व स्तर पर प्रथम और द्वितीय स्थान पा चुकी है, जिनके आधार पर इनको सर्वश्रेष्ठ कवयित्री व पर्यावरण प्रेमी का खिताब व वरिष्ठ लेखिका का खिताब की प्राप्ति हो चुकी है।
  • इनकी अनेक कविताएं व शिक्षाप्रद लेख विभिन्न प्रकार के पटल व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं।
  • 3 महीने में तीन पुस्तकें प्रकाशित हुए। जिसमें दो काव्य संग्रह “समर्पण भावों का” और “भाव मेरे सतरंगी” और एक लेख संग्रह “एक नजर इन पर भी” प्रकाशित हुए। एक शोध पत्र “आओं, लौट चले पुराने संस्कारों की ओर” प्रकाशित हुआ। इनके लेख और रचनाएं जन-मानस के पटल पर गहरी छाप छोड़ रहे हैं।

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हां मैं शिक्षक हूं।

Kmsraj51 की कलम से…..

Haan Main Shikshak Hoon | हां मैं शिक्षक हूं।

हां मैं ही वह शिक्षक हूं, जिसने,
चपरासी से राष्ट्रपति तक को है ज्ञान दिया।
करता रहता हूं अपना काम सदा,
किसी ने अधिमान दिया या अपमान किया।

इन्होंने सब कुछ सीख के मुझसे,
मुझे ही भला बुरा कह कर है परेशान किया।
मैने नजर अंदाज कर के फिर से,
नई पीढ़ी को उसी तन्मयता से ज्ञान दिया।

तू उभरे ओ शिष्य मेरे! मैने हर छात्र को,
इसी ही भाव से है वरदान दिया।
वह छात्र पढ़ लिख कर बड़े ओहदे पर,
बैठा तो, उसने मुझे बदनाम किया।

तू लांघ ले भले ही सारी हदें,
मुझे गर्व है कि मैंने तुझे बनाने का काम किया।
मैं खुश हूं तेरी तारकी से पगले,
तूने चाहे मेरी फजीहत की या फिर नाम किया।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता एक शिक्षक के दृष्टिकोण से लिखी गई है जो अपने काम में पूरी ईमानदारी से लगे रहते हैं। वह शिक्षक हमेशा अपने छात्रों को ज्ञान और सिखाने का काम करते हैं, चाहे वो किसी भी स्तर के हों। इस कविता में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका को महत्वपूर्णता के साथ दर्शाया गया है, और वे छात्रों के जीवन में गहरा प्रभाव डालते हैं। शिक्षक यहाँ पर अपमान और प्रशंसा के बावजूद अपने काम पर पूरी तरह समर्पित हैं और छात्रों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

—————

यह कविता (हां मैं शिक्षक हूं।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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शिक्षक को सम्मान चाहिए।

Kmsraj51 की कलम से…..

Teacher Needs Respect | शिक्षक को सम्मान चाहिए।

राही को जो राह दिखाए,
गिरते को ऊपर उठाए।
कच्ची मिट्टी से घड़े बनाए,
धार उनकी कुंद बनाए।
अपनी बिना परवाह किए,
छात्रों का भविष्य बनाए।

मुसीबत आने पर भी,
डिगते नही पथ से कभी।
पथ प्रदर्शक, ज्ञान के दाता,
परखुशी इन्हें खूब है भाता।
सच्चाई की राह दिखाते,
घुलमिल वो सभी से जाते।

त्याग और बलिदान की मूरत,
इनका है राष्ट्र को जरूरत।
देते सेवा हरपल हरदम,
फिर भी जोश न होता कम।
अपने सारे दुख दर्द सहते,
मुंह से कभी उफ न करते।

इतने सारे जतन है करते,
फिर क्यूं इन्हें अपमान है मिलते।
दिल में छुपी एक कसक है,
शिक्षक दिवस पर बयां करते है।
जब गुरु होते है राष्ट्र निर्माता,
प्रताड़ित क्यूं इन्हें किया जाता।

छात्र हित हेतु सर्वस्व करते कुर्बान,
इनपे होना चाहिए राष्ट्र को अभिमान।
स्वाभिमान का इन्हें दान चाहिए,
शिक्षक को सम्मान चाहिए।
शिक्षक को सम्मान चाहिए।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता में गुरु या शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका को बड़ी उच्चता और सम्मान के साथ दर्शाया गया है। यह कविता गुरु या शिक्षक के योगदान को गर्व और सम्मान से देखती है और उनके शिक्षा देने के कार्य की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करती है। इसके अलावा, छात्रों को भविष्य के लिए तैयार करने का महत्व भी बताया गया है और उन्हें सच्चाई की ओर मोड़ने के लिए उत्साहित किया गया है। इसके साथ ही, शिक्षकों को पूर्ण सम्मान और आदर देने की आवश्यकता की भी अपील की गई है।

—————

यह कविता (शिक्षक को सम्मान चाहिए।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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शिक्षक दिवस एवं गुरु वंदना।

Kmsraj51 की कलम से…..

Teacher’s Day and Guru Vandana | शिक्षक दिवस एवं गुरु वंदना।

गुरुवर जैसा नहीं कोई पुज्य,
नहीं है कोई दूजा महान।
गोविंद से पहले करता हूं,
शिक्षक का गुणगान।
गुरु की नजरों में होता है,
कृष्ण – सुदामा एक समान।

आप सा ना कोई इस धरती पर,
आपके पास है ज्ञान का खान।
देकर गुरुवर प्रकाश आपने,
अंधकार से बचा लिया।
धन्य हो गया जीवन,
स्वागत करने का जो मौका दे दिया।

शिक्षक दिवस का दिन है बड़ा महान,
आपके आशीष से, उज्जवल हुआ सारा जहान।
गुरु की चरणों में है चारो धाम,
आपकी चरणों में ” भोला ” का कोटि कोटि प्रणाम।
गुरु-शिष्य का नाता देखो, पिता-पुत्र से कहीं महान,
गुरु ही देते सबको अनुपम वो सकल ज्ञान।

गुरु ही पथ प्रदर्शक,
गुरु से है सबका स्वाभिमान।
अभियंता, नायक, अधिकारी,
डाक्टर हो या हो फिर कर्मचारी।
शिक्षक हैं सबका निर्माता,
ये कैसी बिडम्बना है,
सबके आगे शिक्षक अपना सिर झुकाता।

गुरु कृपा से विकसित हुआ संसार,
राम- कृष्ण भी गए शरण में,
वो भी समझे, गुरु बिना जीवन न संसार।
माँ सरस्वती, भगवान चित्रगुप्त से पहले,
नमन करता हूँ गुरु चरणों में।
मैं अज्ञानी कुछ न मांगू, कुछ न जानूँ,
हाथ रख दो गुरुवर अपना,
जब शीश झुकाएं तेरी चरणों में।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

—————

  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता में गुरु के महत्व को महत्वपूर्ण रूप से प्रकट किया गया है। गुरु को ज्ञान का स्रोत और जीवन का मार्गदर्शक माना गया है। यह कविता गुरु पूर्णिमा और शिक्षक दिवस के अवसर पर गुरुजी के प्रति श्रद्धाभाव और आभार व्यक्त करने का प्रयास है। गुरु-शिष्य के रिश्ते को पिता-पुत्र के समान महत्वपूर्ण माना गया है और शिक्षक को समाज के निर्माता के रूप में दर्शाया गया है। कविता के अंत में कवि अपने गुरु के चरणों में अपना सिर झुकाते हुए गुरुजी के प्रति अपनी आभार व्यक्त करते हैं।

—————

यह कविता (शिक्षक दिवस एवं गुरु वंदना।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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शब्द-माला।

Kmsraj51 की कलम से…..

String of Words | शब्द-माला।

अभिनव रस परिरंभ से,
थरथराते बाला के वेश।
कंपकंपाते अधर पुट,
उड़ते मदहोश से केश।

चूमकर अचानक अभ्र को,
भाग जाना अति दूर।
अनुपम है अणुभा का रूप,
मंजुलता मोहकता से चूर।

अविनीश के हाथों का परस,
पाकर व्याकुल कुछ-कुछ ऊब।
मृणालिनी का जल में जाना,
आकंठ तक डूब।

पुष्करिणी के तन किन्तु,
मन रात-भर शशि में लीन।
शशिकांत की आँखों में,
अलस-हीन निद्रा-विहीन।

स्वप्न का योग सारा,
प्राणों से सबको प्यार।
धन-दौलत है पास मगर,
निछावर कर दूँगा साकार।

विवस्त्र कर कुण्डल से,
देखे विस्मित चरणों का देश।
रहता जहाँ है बसा,
अगुण मानक उज्जवल वेश।

इस पावन पवित्र नीलिमा के,
धरा पर करुँगा तुझको मैं आसीन।
उपवन में भी तुम रहोगी,
अलि कटंक कुसुम विहीन।

अपने लहू के चंड से,
सुलगने न दूँगा अंग।
साथ रहोगी तुम पर,
आँच न आने दूँगा नि:संग।

शब्दों की माला में पिरोकर,
लिखता रहुँगा भाग्य अपना मान।
तुम रहोगी इस अधिलोक में,
बन सरगम की सुरीली तान।

मधुर मुरली की तान वह,
जिसके प्राणवंत विभोर।
डोलती काया तुम्हारी,
मोहक मोहनी होगी तस्वीर।

लोहित की दुर्जय क्षुधा,
दुःसह चाम की प्यास।
छा रही होगी सुर-सरगम,
घर-घर अवनी आकाश।

सुर तुम्हारे जब बजेगें,
ताल-तरंग चूमने की चाह।
आह निकलेगी फिज़ाओं से,
झूमने लगेंगे सब बाग।

करतल जब बजेगी,
चलने लगेंगे आँसुओं के तार।
बज उठेगी विश्व में जब,
निश दिन बोलों की झंकार।

जग तुम्हें घेरकर,
करेगा कलरव चहुँ ओर।
फूलों का उपहार होगा,
मनके-मनके में भरा प्यार।

कुछ दीवानगी में भर कर,
भित्ति हृदय पर उकेर लेंगे।
गीतों के भीतर घुसकर,
तुम्हारी छवि आँखों में उतार लेंगे।

कंठों में जाकर बसोगी,
बिन सरगम गुनगुना लेंगे।
प्राणों में आकर हँसोगी,
हँसकर होंठों पर छा लेंगे।

मैं मुदित हूँगा देखकर,
इन गीतों को वाक्य दूँगा।
रचित शब्द-माला में पिरोये,
अपने सृजन को आकार दूँगा।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (शब्द-माला।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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गीतों का हार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Geeton Ka Haar | गीतों का हार।

सप्त रंगों से सजी धरती के,
कण-कण में गीतों का हार।
सात सुरों के तानों में बजता,
विहंगिणी विक्षोभ का तार।

सप्त दिवसों की सजी चौक पर,
चंद्र रजनी का सुंदर गात।
साँझ सकारी सज कर खोली,
स्वप्न सुनहली गुलाबों की प्रात।

चरण-पाद धरने को पथ पर,
फैला दिये हैं पुष्प-किरण के हार।
विहान की सिंदूरी लालिमा ने,
बिछा दिये हैं मेघ अपार।

कंठों की कोकिल में सजी,
सुर लहरी की मधुर तान।
धवल जूही की पहन चादर,
मृदुल चाँदनी आई सान।

दुर्वा की तूलिका में बसी,
नील गगन की घनसार।
दो शरासर आँक लूंगा,
भू-धरा पर हैं कितने गद्दार।

सुनने की शक्ति दो मुझको,
देखूँ कितने पीत-कुसुम सुकुमार।
पंखुड़ियों के दो वलय वृन्त मुझे,
खोजूँ कितने श्वेत कलिका के हार।

स्वर्ण शिखा के माथे पर दो,
तिलक कुंकुम चंदन के डाल।
अरुण सारथी से पूँछ लूंगा,
शंभुभूषण मामा के भाल।

छाई अँखियन में घटा काली,
उर में प्रणय की प्यास।
श्वांसों में भर दूंगा मलय समीर,
अधरों पर पूर्ण उच्छवास।

चंद्र पर अब लहरायेगा झंडा,
हृदय पर नागिन डोलेंगे।
जो कहते थे पिछड़ा हमको
छाती पीट-पीटकर रोयेंगे।

बंकिम धन्वा पर चढ़ा दूँगा,
कर कुसुम से तीर खींचूंगा।
मदहोश यौवन की नागों पर,
सुंदरता की जंजीर पहना दूँगा।

करुँगा सृजित कल्पित जग को,
उसे बनाऊँगा तुम्हारा आवास।
थोड़ी-सी धरती होगी,
पूरा – पूरा होगा उसमें आकाश।

विचरता मन छानता रहता,
स्वप्न निखिल संसार।
कुछ-कुछ नया लाते,
जिससे कर सकूँ तेरा श्रृंगार।

कुश के अंकुर कभी,
बौरे सिंधुकेशर के फूल।
कमल के पराग कभी,
थोड़े-थोड़े केतकी के धूल।

उतरते सूरज की वधु,
लाली लाज उपनाम।
सिमटी चंद्रिका के अंकों में,
सखी निशा को मान।

निहारती अपलक अपरिचित को,
उर्वशी वल्लभ की ओर।
दिव्य अप्सरा की अँखियों में,
मादकता निहारे चक्षु कोर।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

—————

यह कविता (गीतों का हार।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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मोहिनी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Mohini | मोहिनी।

क्षम्य हो मेरा अपराध,
देख तुम्हारी अँखियों का सार।
मन को मोहने वाली हिरणी,
मोहित तो है तुमसे सारा संसार।

हार गया मैं तुमसे,
सुनकर बातें बेगानी थारी।
शब्दों के बाण चला-चला कर तुमने,
घायल कर दिया इस मन हारी।

दूर तक जहाँ नहीं कोई,
जीवन के इस निर्जन पानी।
कहां से आकर तुमने,
छेड़ी ये राग अनजानी।

शान्त शिखण्डी का मैं मारा,
ये नयन रण मेरे लिये असमान।
अकेला लड़ा इस आशय से,
जीत सकूँ मैं सारा जीवन विहान।

अगर पराजित हुआ तुमसे मैं,
तो जीत लूँगा सारा आसमान।
मैं तुमसे जो कर रहा तर्क-वितर्क,
इसमें है मेरी वाणी का समाधान।

तुम ही थी हृदय की पीड़ा,
अंतस् की गुंजन थी तुम बाला।
पढ़ा होगा मेरी आँखों में तुम,
एकाकी जीवन की मेरी हाला।

अपनी कृति देकर इन अँखियों को,
खो न जाना इस निदारुण वन में।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

—————

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Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता Tagged With: Hindi Poems, kavi satish shekhar srivastava parimal, Mohini, poem on true love in hindi, Satish Shekhar Srivastava 'Parimal', जान से ज्यादा प्यार करने वाली शायरी, निस्वार्थ प्रेम शायरी, पवित्र प्रेम कविता, मोहिनी, मोहिनी - सतीश शेखर श्रीवास्तव परिमल, सच्चा प्रेम शायरी, सतीश शेखर श्रीवास्तव - परिमल

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