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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिन्दी-कविता

शक्ति विहीन पंख।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

♦ शक्ति विहीन पंख। ♦

शक्तिहीन पंख लगा न बढ़ाइए।
उड़ने की कोशिश न बनाइए।
विपरीत पवन के न जाइए।
ध्यान – ज्ञान अपना बढ़ाइए।

बेवजह बात कही में नहीं आइए।
घमंड की दुनिया कॉल लगाइए।
स्वार्थ से सनी सबंध पहचानिए।
अपने मान और सम्मान बढ़ाइए।

कौन क्या कर रहा इस पर न जाइए।
विज्ञापन की दुनिया मन निकालिए।
भविष्य के चिंतन में खुद को लगाइए।
सत्य की खोज में अपने को लगाइए।

समदर्शी बनने की सोच बढ़ाइए।
संतोष करके नित मंगल पाइए।
क्षमा जाप समाज पूजा बढ़ाइए।
परोपकार उपकार ध्यान लगाइए।

राष्ट्र भक्ति में डूब कर दिखाइए।
भक्ति रस में खुद को भी डुबाइए।
दरिद्र कलह लोभ मोह दूर भगाए।
बेवजह पंख शक्ति हीन न खिलाइए।

शुभ धरातल का रौनक बढ़ाइए।
प्रकृति के करीब धीरे-धीरे आइए।
देश भक्ति का मधुर गीत सुनाइए।
खुशहाल चिंतन में रमते जाइए।

आंगन में अपने ही रौनक लाइए।
हंसी ठिठोली से दिल न भार्माइए।
सीख एक धरा से अपनी बढ़ाइए।
जीवन में सहनशील बन जाइए।

गरीबी का दुखड़ा दूसरे से न सुनाइए।
हृदय को आकाश अंबर सा बढ़ाइए।
बादल की छांव में बैठकर न बताइए।
मंगल मनोहर एक कहानी सुनाइए।

काव्य साहित्य संकलन में लग जाइए।
दुनिया में हिंदुस्तान का नाम बढ़ाइए।
संयम साहस शील हृदय में लाइए।
बेवजह में पंख को ना फडफड़ाइए।

ईमानदारी से काम करते जाइए।
विरोधी बातों में अपनी न लाइए।
राष्ट्र की रक्षा में खुद भी लग जाइए।
सत्य अहिंसा के बूते आशा जगाइए।

यश कीर्ति जगत में अपनी फैलाइए।
मोहब्बत की दुनिया में नाम कमाइए।
हिंदी हिन्दू हिंदुस्तान करते जाइए।
सुर सुंदर अपना जीवन में लगाइए।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – बेवजह यूँ ही किसी बात में ना आइए, समय बर्बाद ना करें। स्वार्थ से सनी सबंध को पहचान कर घमंड को त्यागकर सत्य की खोज में अपने को लगाइए। बेवजह में पंख को ना फडफड़ाइए। भविष्य के चिंतन में खुद को लगाइए, भक्ति रस में खुद को डुबोकर काव्य साहित्य संकलन में लग जाइए, संयम, साहस व शील हृदय में लाइए, और दुनिया में हिंदुस्तान का नाम बढ़ाइए।

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यह कविता (शक्ति विहीन पंख।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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भाव पुराना नहीं होता।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ भाव पुराना नहीं होता। ♦

कवि का निरव होना स्वाभाविक नहीं।
वह अपने लिए लिखे यह भाता नहीं।
नए आविष्कार पुराने को दबाते हैं सही।
हृदय शब्द भाव पुरानी कभी होते नहीं।

ज्ञान से उपजे भाव का प्रचार करना पड़ता है।
ज्ञान में सदा परिवर्तन आता जाता रहता है।
साहित्य सामाजिक आवश्यकता की पूर्ति करता है।
सर्व कालीन साहित्य सदा अक्षुण्ण रहता है।

जो उच्च प्रकाश दे साहित्य कहलाता है।
अपने लिए लिखें भाव निरर्थक कहा जाता है।
हृदय की भाषा अपनी रचना कहलाती है।
विस्तृत सीमा तक वह फाइल दी जाती है।

दुनिया को अधिक अनुभव कविता कराती है।
भाओं के भीतर वह छुपी प्रेरणा जगाती है।
अनंत काल तक अनंत हृदय को छू जाती है।
विविध चित्रण के लिए कविता कलम चलाती है।

शब्द जो भी आते हैं असंख्य साथ आते हैं।
पर समय के साथ वे भी शब्द मिट जाते हैं।
शब्द संधान के लिए आते – जाते रहते हैं।
भाव दुनिया में अपना बिखेरते जाते रहते हैं।

बुद्धि और भावना इस संसार में रह जाते हैं।
अनंत काल तक वह अपना प्रभाव दिखाते हैं।
ह्रदय भाव कभी दुनिया में पुराना नहीं होता है।
समकालीन साहित्य सभा अक्षुण रहता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – कवी व लेखक के गुणों को बताया है, इस संसार में सबकुछ पुराना होता है लेकिन “हृदय शब्द व भाव पुरानी कभी होते नहीं।” जो उच्च प्रकाश दे साहित्य कहलाता है, साहित्य सामाजिक आवश्यकता की पूर्ति करता हैं। इंसान के किये गए कर्म लोगों के मन में भावनाओं के रूप में सदैव ही जीवित
    रहते हैं।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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अप्रैल फूल दिवस।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

♦ अप्रैल फूल दिवस। ♦

भारत का माह अप्रैल चैत्र में जो प्रायःआता है।
चैत्र मास दुनिया में पवित्र महीना कहलाता है।
इसे बदनाम करने के लिए अप्रैल फूल आता है।
पहली-पहली पश्चिमी देश में यह मनाया जाता था।

आजकल भारत में भी कुछ लोगों द्वारा मनाया जाता है।
इसे समझने के लिए यह कहानी सामने आती है।
इंग्लैंड की महारानी की सगाई कम उम्र में हो जाती है।
जिसके विरोध में वहां हो हल्ला काटा जाता है।

कुछ पक्ष में तो कुछ विपक्ष में उठ खड़ा हो जाते हैं।
एक दूसरे को वे सब लोग मूर्ख बतलाते हैं।
अफ्रीकी कैलेंडर भी इस में रोड़ा अटका ता है।
भारतीय कैलेंडर को नीचा दिखाने के लिए आगे आता है।

फिर भारतीय कैलेंडर का कई देशों में विरोध हो जाता है।
भारत के कैलेंडर को मिशनरी मूर्ख कह जाता है।
विक्रम संवत पर हिजरी सन चढ़ जाता है।
हिंदुस्तान की सभ्यता को पिछड़ा हुआ बताता है।

जनवरी से दिसंबर तक का कैलेंडर चलाता है।
चैत्र से फागुन भूल जाने का प्रयास करता है।
भारतीयों को भी अप्रैल फूल बनाने को उकसाता है।
हमारे देश में भी इसी कारण अप्रैल फूल बनाया जाता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – अप्रैल फूल दिवस हमारे भारत देश का मूर्ख दिवस नहीं है। ये हमारी संस्कृति और सभ्यता को भुलवाना चाहते है। हमें अप्रैल फूल दिवस नहीं मनाना चाहिए। किसी को भी इस दिन मूर्ख नहीं बनाना चाहिए।

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यह कविता (अप्रैल फूल दिवस।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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भाऊजी खड़ा हो जा परधानी।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ भाऊजी खड़ा हो जा परधानी। ♦

अबकी सीट भईल महिला बा खड़ा हो जा परधानी।
नारी देश की आजादी दिलाने में बनी थीं दीवानी।

भारी भरकम रकम मिली पगार भी होगा शानी।
सौचालय का जलवा दिखाते करिहा ना मनमानी।

आगे पीछे कुछ लोग बुढ़ापे में भी होंगे दानी।
प्रदूषण नियंत्रण खातिर पेड़-पौधों मिलेंगे दानी।

अपने घर के आस पास उसको लगाया मनमानी।
चौंका विछावे के मिली रुपया बाट खाया रानी।

अबकी सीट भईल महिला की भौजी उठा पराधानी।
गांव में दारू पीने वाले मिल जैहै जानी पहचानी।

गली मोहल्ला दारू बेचवाकर उगाही होगी मनमानी।
सुपर मिली एक गांव में उस पर रखिहा निगरानी।

अपने घर को सजा के राखिहा भाड़ जाय परेशानी।
आधा पैसा कमा लिहा छोड़ दिहा ओका मनमानी।

राशन बांटे के जब आई हो जैहा तब सयानी।
कोटे दारों पर अंकुश लगाया उसमें भी मनमानी।

स्कूल में मिड डे मील खाने से निकली खर्चा खुरानी।
जितनी सुविधा मुहैया होगी उतनी करबू मनमानी।

पहले ही तू सोचत रहलू चुनाव कब परधानी?
पेपर पढ़ कर लिया खबर आई गइल बा सनसनी।

भौजी अबकी सीट भईल महिला की, का बा परेशानी।
उठा खड़ा हो जा, हाली होली में रंग चढ़ी जवानी।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – “महिला सीट परधानी हो गयल बा” भौजी खड़ा हो जा परधानी। क्या-क्या करना चाहिए और क्या-क्या नहीं, लेकिन न करिया तू मनमानी, परधानी पर अच्छी सीख़ देने वाली कविता लिखी हैं। प्रधानी के समय होने वाले उथल पुथल को भी समझाया है।

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यह कविता (भाऊजी खड़ा हो जा परधानी।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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सूरत दिल में जगह बनाई।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ सूरत दिल में जगह बनाई। ♦

तेरी सूरत मेरे दिल में आई।
दिल कहता तू दिल में समाई।
झलक से मेरा दिल बहला ई।
काया उमंगी तो होती दिखाई।

अफसोस उफ करने की तनिक न दी दिखाई।
प्यारी चितवन और नशीली आंखें लेकर आई।
आंखों – आंखों से जब उसने अपने मिलाई।
जीवन जीने का अंदाज, साथ लेकर आई।

बेचैनी में दिन – रात हमने जब तलक बिताई।
खूबसूरत ख्वाब देखने झील में लेकर आई।
तेरी सूरत दिल के मेरे जब से दरवाजा खट-खटाई।
जीवन जीने का मजा होलिया तब से मेरे भाई।

मेरी आंख से आंख तूने अपनी है लड़ाई।
लगी दाग दिल में कभी भी मिट नहीं पाई।
आंखों में आंखें डाल कर जानम क्यों नहीं आई।
उम्मीदों की फायदे जाने क्यों दुख में गंवाईं।

प्यारी चितवन नशीली आंखों में समुद्र दिखाईं।
वादों की सुखद समुंदर में जाकर गोते लगाई।
मेरा दिल कहता है तू दिल में उतर है आई।
तेरी सूरत खूबसूरत मेरे दिल में आकर समाई।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – प्यार के दौरान मन के अंदर चलने वाले उथल – पुथल को “सूरत, चीत्त, दिल, व आँख से आँख मिलाना” का उदाहरण देकर बहुत ही सटीक वर्णन किया हैं।

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पायल।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ पायल। ♦

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मैं पायल मेरा बजना काम।
कभी इस पग कभी उस पग।
राम राम धाम बैजनाथ धाम।
चाहे 11 मंजिला हो मकान।
जहां हम मिलें बजना है काम।

चाहे मंदिर हो गुरुद्वारा गुरुद्वारा।
धर्म क्षेत्र वा अधर्म कर्म का झाम।
नन्द बाबा दरबार वा अन्य मुकाम।
सभी सुधी सुनते लगाकर कान।
जहां रहूं मेरा पैर में ही है मुकाम।

श्याम संग राधा बनी रहती।
सीता स्वयंवर में भी संग देती।
मीरा – गीत मीरा का स्वागत।
वीणा वाणी नित नूतन करती।
यात्रा जहां पैरों में ही बजती।

छम छम लहरें उठने वाली।
रुन झुन मधुर मुखर मतवाली।
धुन गुनगुनाएंगे बप्पी लहरी।
मंगल ले आया सुबह भोरहरी।
मै अपनी धुनि सुर में रहती।

इंद्र परी की रचना बन जाती।
उत्पत्ति समय में साथ निभाती।
हरी घर गीत बन सामने आती।
जहां जाते रुन झुन गीत गाते।
समर्पण भाव नारी प्रति लाती।

देवलोक में जब – जब जाती,
परियों की पायल बन जाती।
सभा मध्य में संगीत सुनाती।
देवताओं को खूब रिझाती।
पैरों की पायल बन कर आती।

श्याम सुंदर की मंजूरी पाती।
मंदिर – मंदिर धूम मचा दी।
राधा बनकर, वह रास रचाती।
ऋषियों के मन में बस जाती।
पैरों की पायल बन कर आती।

पायल की धुनि घायल कर देती।
विद्वानों को भी बस में कर लेती।
लोग धर्म में रहती पालन सहती।
लोक लोक सुमधुर भजन सुनाती।
पर पैरों से पायल बन कर गाती।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – पायल व पायल की धुनि के गुणों और खूबियों को बहुत सारे उदहारण देकर समझाया हैं। एक ही कविता में बहुत कुछ समझाया हैं।

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यह कविता “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

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किसान ब्याज।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ किसान ब्याज। ♦

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आज आ गया जब घर में,
भारी भरकम अनाज।
ताक लगाए बनिया बैठा,
पैसा लगाने को आज।

दे रखा था पहले से ही,
रुपया कुछ पर ब्याज।
अड़ा खड़ा बनिया घर पर,
लेने को सस्ता अनाज।

देख रहा था तिरछी आंखें,
वह किसान का अनाज।
खैनी फांक रहा वह,
किसान के द्वार।

बोला इसी फसल में चुकता।
कर दो मेरा पूरा ब्याज।
अभी मूल की बातें होती।
तुम पर गिरेगी गाज।

घूमर घूमर बादल छाए।
ख्यालों में आकाश दिखाएं।
बेचारा किसान क्या करता ?
आधा अनाज ब्याज का देता ?

गुजरे दिन सदियों किसान के,
कोई सुध नहीं लेता।
बरसों से थोड़ी आशावत,
एमएसपी पर अनाज बिकता।

बिचौलियों ने चक्कर डाला।
आंदोलन का हवाला।
अनाज गोदाम जो जाए।
मुझे भी मिले निवाला।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – किसान, ब्याज और एमएसपी को कविता के माध्यम से।

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यह कविता “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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होली आई गाया जाए।

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♦ होली आई गाया जाए। ♦

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होली पर मधुमास गाया जाए।
सर र र होली में सुनाया जाए।
परदेसी जींस फारवाया जाय।
चैता चनैनी का गीत गाया जाए।

परदेशी कंपनी लगवाई जाय।
उसमें जींस फटी निकाली जाय।
आगे पीछे ढक्कन बनाया जाय।
होली में सर र र गाया जाए।

बाकी दुनिया खुली किताब।
ऐसा वस्त्र उद्योग लगाया जाय।
होली आई भाई गाया जाय।
मघुमास जलवा दिखाया जाय।

मुख पर गमछा अंग अंहिन्या।
जींस ग्लेशियर बनवाया जाए।
खिड़की ऊपर से नीचे उतार।
होली आई सर र र गाया जाए।

जींस पहन कर छोरा-छोरी मस्त।
जंगल बाले कपड़े खोजने में पस्त।
देश को और आगे बढ़ाया जाए।
कपड़ों की शॉपिंग सगाई जाए।

बहकल बाजार बहुत बबुआ।
मौगी – मौगा सभी अड़े – पड़े।
छोरी – छोरा मस्त, चले खड़े।
बुढ़वा मंगल तक दौरौले जाए।

होली आई सर से पांव रंगौले जाए।
खुल्ला जींस पहनकर सुनाउले जाय।
खिड़की ऊपर से कह दे खौले जाय।
रंग भरी होली भर गरियौले जाय।

गुझिया जामुन खाया जाए।
लाल गुलाल लगाया जाए।
केसर मिलाकर लगाया जाए।
होली है कुछ लाया जाए।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – आजकल के होली में क्या-क्या हो रहा है लोग कैसे-कैसे होली खेल रहे हैं, और क्या-क्या पहन रहे है आज समाज में। खानपान व किसका किसके प्रति कैसा व्यवहार हैं।

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होली गांव-गांव घुमावत।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♦ होली गांव-गांव घुमावत। ♦

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होली गांव-गांव घुमावत।
मऊगी लॉ ठी लेकर धावत।
होली में क्या-क्या सुनावत।
घर की घर नहीं पता बतावत।

पास पड़ोसी बोलने नहीं आवत।
घर में ही मऊगी आग लगावत।
सुबह सुबह उठ कर नहलावत।
पाउडर इत्र से शरीर महकावत।

काम आदमी ना कर पावत।
कुकुर से काम कर आवत?
माल पुरुष फेंकने जावत।
आदमी औरत रार मचावत।

पाप लगती जो कुकुरु छुहात।
घर अपनी वही कुत्ता पालन।
कुत्ता समाज में एक दिन बोला।
बिस्तर पर रात भर हमने खेला।

रात भर मुझको नींद नहीं आई।
कुत्ते ने समाज में गुहार लगाई।
समाजी बोले सुन कुत्ते मेरे भाई।
तू छोटे धतूरे की ले लो दवाई।

पहली रोटी गाय को खिलाया जाता।
जूठी रोटी कुकुर फिर बाद में पाता।
कुकुर जबकि बिस्तर पर है सोता।
आओ रे आदमी चौकी पर होता।

गलती मंच से कवियों की हो जाए।
तो उन्हें माफ करना बहन और भाई।
कवि मंडली मौसम हिसाब से आई।
बन ठन कर अपनी कविता है लाई।

दूल्हा दुल्हन की हो रही है लड़ाई।
दुल्हन दूल्हा छोड़ स्टेशन से पराई।
पुलिस दुल्हन के गांव में जब धाई।
पड़ोसी निकला फेरारी सुना भाई।

मुल्तानी हीरोइन सुल्तानपुर आई।
भारतीय परिधान में थी वह छाई।
बोला खुशीराम आपने पेट दिखाई।
थाना में फरियाद को लेकर धाईं।

हीरोइन अपने पर उतर आई।
फिल्मों में अर्धांगिनी बनी दिखाइ।
अंग प्रदर्शन की ना पूछो भाई।
माझी शरीर कपड़े से ढकी लाई।

होली गांव गांव घुमावत।
कुछ अपनी बात सुनावत।
औरो की मिलती दावत।
आवत हुड़दंग माचावत।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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रचनाएं भर रात जगाती।

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♦ रचनाएं भर रात जगाती। ♦

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भर रात जगाती रचनाएं,
नींद ना आती।
रात गुनगुना कर कह जाती,
कही कहानी अपनी।

चार दिसंबर दो हजार सत्तरह,
लहुरावीर की बात बताती।
लोगों में भरा कितना कलियुगी,
जीवन इतिहास दोहराती।

इठलाते-बलखाती व्यंग बराबर,
कसते उपहास उड़ाती।
इसे विडम्बना ही मानो ,
सच्चाई सपने में कह जाती।

वह दिन भी सूना ही होगा।
वस्तु लोग खोई लौटाते…
पर देशों की परम्परा को,
राष्ट्र हम नहीं ला पाते।

दक्षिण भारत की सभ्यता को,
भी हम नहीं अपनाते।
भूलें अपनी या प्रवंचना,
औरों को भी बतलाऊं।

उस गाथा को कैसे गाऊं,
अंधियारी की रात सुनाऊं।
नहीं-नहीं खिलखिली धुप में घुप,
हंसता हुआ मित्र एक आता।

अपनी वह पाथेय एक सौ छत्तीस,
साथ लेकर रचना जाता।
सुनकर क्या कर सकते हो ?
मेरी अमृत बीती गाथा।

अभी समय है सोई नहीं मेरे,
परीश्रम की मौन व्यथा।
साइट पर मेरे विद्यमान है,
लेकर एक सुनहरी आभा।

उसने व्यसन में अपने साथियों के,
साथ छका – गांठा।
कुतूहल थी जिन आँखों में,
उस दिन पानी भर आया।

स्वच्छंद सुमन जो खिले थे कल तक,
प्रतिभा छाया गुनगुना उठी।
कहती ! ठहरो कुछ सोचो -विचार करो,
अपने भी घातक होते लहरी।

हो चकित निकल आई सहसा।
कोमल पंखुड़ियां आँखों में गहरी।
‘मंगल’ सौन्दर्य जिसे कहते हैं।
अनंत अभिलाषा के सपने तुझमें।

सुन्दरता मेरी आँखों को रह-रहकर,
समझा जाती है, और बताती।
हलकी सुशान की भाषा में,
मित्रों की दुर्बलता को भी गाती है।

तुम्हें स्मित रेखा खींच कर एक अभी,
संधिपत्र लिखना ही होगा।
उस अंचल मन पर उन्हीं मित्रों से,
कुछ – कुछ सीखना होगा।

नित्य विरुद्ध संघर्ष सदा,
विश्वास, संकल्प अश्रु जल से।
आसमान में पक्षी उड़ती,
समंदर में तुझे उतरना होगा।

‘मंगल’ कह दो अपनी यादों को,
मुझे जलाना छोड़ दे।
उस पर आंसूं बहाना व्यर्थ है।
रक्त बहाना छोड़ दें।

बहुत पहेलियाँ सुलझाया होगा,
अपने इस जीवन पल में।
सद्भाव – प्रेम की पोथी पढाओ।
अपने विछुरे साथियों में।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – रियलिटी को समझो, अपने आप में सुधार करो, मायाजाल में न फसो।

—•—•—•—

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