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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिन्दी साहित्य

भाई का पैगाम।

Kmsraj51 की कलम से…..

Brother’s message | भाई का पैगाम।

The brother explains to his sister that she should not depend on anyone for her protection, but should make herself strong and self-reliant.

रक्षाबंधन पर,
भाई का पैगाम,
सभी बहनों के नाम।

ओ मेरी बहना,
राखी तू जरूर बांधना,
रक्षा का मैं वचन भी दूंगा।

मगर,
इस कलयुगी युग में,
राक्षसी प्रवृत मानवों में।

आस पास के,
गैर तो गैर अपने लोगों में,
कौन कैसा है पहचानने में।

खा जायेगी तू धोखा,
गिरगिट जैसी रंग बदलती दुनिया में,
गुम हो जाएगी तुम्हारी पहचान।

सुन री बहना,
साये की तरह मेरा साथ नहीं,
इस बात का तूझे ख्याल है रखना।

मुझ पर निर्भर,
मत रह ये बहना,
तुम ही हो घर का गहना।

सुन तू,
नाजों से पली,
तू कोमल सी कली।

हैवानों की नजर,
इसीलिए तुझ पर गरी,
तू लगती हो सुंदर परी।

रुक,
इस मिथ्या को तोड़,
रिश्तों के बंधन छोड़।

नियत अब,
तू पहचाना सीख,
न मांग तू किसी से भीख।

समाज में छवि,
दया कोमलता की प्रतिमूर्ति,
ममता की जो करती है पूर्ति।

समय आने पर,
तू ही चंडी तू काली है,
जग की करती रखवाली है।

निर्भया बनो,
उठो जागो और याद कर,
अपनी शक्ति का संचार कर।

सृष्टि की,
जननी तू पालक तू,
जीवन का आधार हो तू।

फिर,
चंद वहशी से मत डर,
उठ, कर उनका प्रतिकार।

वचन,
आज रक्षाबंधन पर दो,
अन्मविश्वास खुद में ला दो।

तू,
अबला नहीं,तू सबला है,
कोमल नहीं तू कठोर है।

अब,
ना डर प्रतिकार कर,
खुद की रक्षा स्वयं कर।

लोगों की सोंच,
बदलेगी आएगी वो सुबह,
हाथ लगाते होंगे वो तबाह।

सनक ऐसी पाल,
अच्छे के लिए अच्छा,
बुरे के लिए काल बन।

फिर कोई तुझे,
छूने से भी घबड़ाएगा,
सपना मेरा साकार हो जायेगा।

अब,
भाई की न करना फरियाद,
तू ही है मेरी बहना फौलाद।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता में एक भाई अपनी बहन को रक्षाबंधन के अवसर पर संदेश भेजता है, जिसमें वह उसे अपनी सुरक्षा के लिए जागरूक और आत्मनिर्भर बनने की सलाह देता है। भाई बहन से कहता है कि वह राखी जरूर बांधे, और वह उसकी रक्षा का वचन भी देता है। लेकिन साथ ही वह इस कलयुगी युग में चारों ओर फैले खतरों और मानवों की राक्षसी प्रवृत्तियों से सतर्क रहने के लिए भी कहता है। भाई अपनी बहन को यह समझाता है कि उसे खुद की रक्षा के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि खुद को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना चाहिए। वह उसे याद दिलाता है कि समाज में उसे कोमल और दयालु समझा जाता है, लेकिन समय आने पर उसे अपनी शक्ति को पहचानना होगा और चंडी व काली जैसी शक्तिशाली रूप धारण कर समाज की रक्षा करनी होगी। भाई यह भी कहता है कि उसे किसी भी बुराई का डटकर मुकाबला करना चाहिए और खुद की सुरक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए। अंत में, वह बहन से वादा लेता है कि वह शक्ति रूप बनेगी, अपनी शक्ति को पहचानेगी और खुद को सबला मानेगी। भाई बहन से कहता है कि अब वह किसी पर निर्भर न रहे और खुद ही अपनी रक्षा करे, जिससे समाज में बदलाव आए और बुरे लोग उससे डरने लगें।

—————

यह कविता (भाई का पैगाम।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। भोला सिंह हाई स्कूल पुरुषोत्तम, कुरहानी में अभी एक शिक्षक के रूप में कार्यरत हूँ। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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राखी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Rakhi | राखी।

The love between brother and sister is amazing. Perhaps there is no relationship like this in the world.

रक्षाबंधन का त्यौहार जब है आता।
भाई बहन का प्यार और खिल जाता॥

बहन भाई को राखी है पहनाती।
उससे रक्षा की इच्छा है जताती॥

कभी नहीं मांगती पैसा, दौलत व उपहार।
हमेशा मांगती है अपने भाई का प्यार॥

जब भी बहन को कोई मुसीबत है आती।
भाई से सहायता भी जरुर है मांगती॥

भाई भी कभी बहन को नजर अंदाज नहीं करता।
जब जब बहन याद करती हाजरी जरूर है भरता॥

भाई बहन का प्यार भी गज़ब का है होता।
शायद इस रिश्ते जैसा कोई रिश्ता दुनिया में नहीं होता॥

आज भाई की कलाई सुनी सी नजर है आती।
क्योंकि बहन जन्म ही नहीं ले पाती॥

गर भाई की कलाई को चाहते हो हरा भरा।
तो बहन से भी सजनी चाहिए यह धरा॥

♦ विनोद वर्मा जी / जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता रक्षाबंधन के त्यौहार और भाई-बहन के अटूट प्रेम को दर्शाती है। इसमें बहन के स्नेह और सुरक्षा की भावना को रेखांकित किया गया है, जो वह अपने भाई से अपेक्षित करती है। बहन अपने भाई से दौलत या उपहार नहीं मांगती, बल्कि उसके प्यार की ही इच्छा रखती है। जब भी बहन को किसी परेशानी का सामना करना पड़ता है, वह अपने भाई की सहायता लेती है, और भाई भी हमेशा उसकी मदद के लिए तैयार रहता है। भाई-बहन का रिश्ता अत्यंत अनमोल और दुनिया में सबसे खास होता है। कविता के अंत में यह भी बताया गया है कि अगर भाई की कलाई को राखी से सजाना चाहते हैं, तो समाज में बेटियों का जन्म होना आवश्यक है।

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यह कविता (राखी।) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विनोद कुमार है, रचनाकार के रुप में विनोद वर्मा। माता का नाम श्री मती सत्या देवी और पिता का नाम श्री माघु राम है। पत्नी श्री मती प्रवीना कुमारी, बेटे सुशांत वर्मा, आयुष वर्मा। शिक्षा – बी. एस. सी., बी.एड., एम.काम., व्यवसाय – प्राध्यापक वाणिज्य, लेखन भाषाएँ – हिंदी, पहाड़ी तथा अंग्रेजी। लिखित रचनाएँ – कविता 20, लेख 08, पदभार – सहायक सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल प्रवक्ता संघ मंडी हिमाचल प्रदेश।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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संस्कार और विनम्रता।

Kmsraj51 की कलम से…..

Sanskaar Aur Vinamrata | संस्कार और विनम्रता।

Humility is the quality of being humble. Manners are the proper or polite way to behave in public. kmsraj51संस्कार और विनम्रता का अटूट संबंध है, संस्कार ही विनम्रता की जननी है। संस्कार के बिना जीवन मरूस्थल की तरह है, जहाँ संस्कार नहीं वहाँ अहंकार ही उत्पन्न होता है। संस्कार के भूलते ही अहंकार की उत्पत्ति हो जाती है, नदी कभी सूख जाती है, कभी विकराल रूप धारण कर लेती है, गाँव के गाँव नदी में समा जाती है। नदी को अपने प्रचंड प्रवाह पर घमंड हो जाना स्वाभाविक है, नदी मर्यादा भूल जाती है, यह भी भूल जाती है कि कभी उसकी सुखी रेत पर बच्चे गेंद खेलते हैं। नदी को अपने ताकत का अहंकार हो गया, वह सोचने लगा मैं पहाड़, मकान, पेड़, पशु और मानव को बहा कर कहीं भी ले जा सकता हूँ। बर्बाद करने की ताकत है मुझमे, एक दिन समुद से उसकी बहस हो गई क्योंकि अहंकार के कारण विनम्रता जा चुकी थी। गर्वीले अंदाज में मुस्कराते हुए समुद से कहा, बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या-क्या लाऊँ, मैं सर्व शक्तिमान हूं, मैं मकान, पेड़, पशु. मानव – जो तुम्हारी इच्छा हो, उसे लाकर तुम्हें समर्पित कर दूंगी।

संस्कार और विनम्रता समुद्र में कूट-कूट कर भरा था….. वह समझ गया, अहंकार के नशे में चूर है नदी, समुद ने बड़ी विनम्रता से बोला- अगर कुछ लाना ही चाहते हो तो थोड़ी सी घास उखाड़ कर ले आओ… मैं भी तो देखूँ – नदी ने हाँ कह दी। नदी पूरा जोर (शक्ति) लगाया पर छोटे-छोटे घास को उखाड़ न पाया, उसकी सारी जल शक्ति विफल हो गई। अंत में नदी मायूस होकर समुद्र के पास गया और बोला – मैं सब कुछ ला सकता, लेकिन घास नहीं क्योंकि घास झुक जाती है और मैं ऊपर से गुजर जाती हूँ। समुद्र ने मुस्कुराते हुए कहा- पहाड़, पेड़, कठोर होते हैं, आसानी से उखड़ जाते हैं लेकिन घास विनम्र होता है, वह झुकना जानता है, उसे प्रचंड आँधी, तूफान या जल का प्रचंड वेग कुछ नहीं बिगाड़ सकते। जिह्वा अंत तक साथ रहती है लेकिन दांत टूट जाते हैं, अभिमान फरिश्तों को भी शैतान बना देती है और विनम्रता इंसान को फरिश्ता बना देती है।

बीज़ की यात्रा पेड़ तक है, नदी की यात्रा सागर तक और मनुष्य की यात्रा परमात्मा तक, अहंकार एवं अभिमान विनाश की जननी है। प्रभु भक्ति से संस्कार जागृत होती है, जो लोग धर्म को मज़ाक समझते हैं उन्हें क्या मालूम प्रभु भक्ति कितना कठिन है। प्रभु चित्रगुप्त की नज़र से न कोई बचा है न कोई बच सकता है। उचित फल उचित समय पर अवश्य मिलता है, सदा वासना में लीन रहने वाले, दूसरों का अहित करने वाले और भगवान को न मानने वाले, दुष्कर्म में लिप्त रहने वाले, भले कुछ समय के लिए (पिछले जन्म के) कर्म के कारण सुखमय जीवन व्यतित कर लें, लेकिन उनके पापों का परिणाम अवश्य भोगना पड़ेगा।

सच्चे मन से भगवान का नाम लेने का कोई मुल्य नहीं होता, कलयुग में नाम ही जप लेना मोक्ष का द्वार खोल देता है। इंसान को विनम्र एवं संस्कारी बना देता है। एक बालक बड़ा ही जिद्दी स्वभाव का था, भगवान का नाम लेने में कोई दिलचस्पी नहीं। एक बार उसके पिताजी ने यज्ञ किया, वह बालक अपने को एक कमरे में बंद कर लिया, सभी पुजारी एवं अन्य विद्वान जन प्रयास करके थक गए, सभी असफल रहे। जब बालक स्वयं घर के बाहर निकला तो पुजारी जी ने कस कर उसकी कलाई पकड़ ली, असहनीय दर्द के कारण अनायास ही बालक के मुख से निकला- हे राम मुझे बचाओ, ये कैसी जबरदस्ती…….

……. पुजारी जी ने मुस्कुराते हुए कहा आज जो नाम लिए हो, इसकी कभी कीमत मत लगाना। कुछ समय बाद बालक की मृत्यु हो गई, यमराज ने भगवान चित्रगुप्त से पूछा… इसका पाप – पुण्य क्या है? प्रभु चित्रगुप्त ने कहा, यह कभी प्रभु का नाम नहीं लिया, किन्तु विपत्ति में एक बार राम का नाम लिया है। इसे क्या फल दिया जाए? बालक से ही पूछा गया,..वह मौन रहा। अब यमराज और प्रभु चित्रगुप्त व्याकुल हो कर उस बालक को ब्रह्मा जी के पास ले गए, ब्रह्मा जी भी कुछ नहीं बोले, फिर यमराज और भगवान चित्रगुप्त उस बालक को भगवान शिव के पास ले गए, वह भी कुछ नहीं बोले, फिर सभी विष्णु जी के पास गए… विष्णुजी मुस्करा दिए। एक बार नाम लेने का फल इस बालक को मिल गया, ब्रह्मा, विष्णु, महेश- तीनों का दर्शन हो गया।

झूठे आडंबर में न फंसकर केवल अपने इष्टदेव का नाम लेना ही सच्ची भक्ति है। पापकर्म से दूर रहना, किसी का अहित न करना, सदा दूसरों की मदद करना, नारी सम्मान करना, झूठ न बोलना, सत्कर्म करना ही सच्ची भक्ति है। ईर्ष्या, जलन, द्वेष से मुक्त रखना, विनम्र होना, संस्कार नहीं भूलना, पाखंड से दूर रहना ही मोक्ष का द्वार खोलता है। हर आदमी विद्वान नहीं हो सकता लेकिन विद्वान की संगत में रहकर, सत्य की राह पर चल कर, प्रभु को प्राप्त कर सकता है “मैं” से मुक्त होना ही मोक्ष है।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस Article के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह लेख संस्कार और विनम्रता के महत्व पर ध्यान केंद्रित करता है। संस्कार को विनम्रता की जननी माना गया है। बिना संस्कार के जीवन की तुलना मरुस्थल की होती है, जहां अहंकार ही उभरता है। अहंकार संस्कार भूलने के परिणाम से उत्पन्न होता है। यह लेख एक कहानी के माध्यम से इस विषय को प्रकट करता है, जिसमें नदी और समुद्र के बीच की बहस दर्शाई गई है। समुद्र ने विनम्रता की महत्वता को समझाया और अहंकार का त्याग किया। इससे पाठक को समझाया गया है कि विनम्रता और संस्कार की महत्वपूर्ण भूमिका है। लेखक ने भगवान के नाम लेने के महत्व को भी उजागर किया है, जो अहंकार को दूर करके विनम्रता को विकसित करता है। लेखक द्वारा बताए गए सिद्धांतों के माध्यम से पाठक को सच्ची भक्ति और मोक्ष की ओर प्रेरित किया जाता है।

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यह Article (संस्कार और विनम्रता।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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मेरे राम आए हैं।

Kmsraj51 की कलम से…..

Mere Ram Aae Hain | मेरे राम आए हैं।

He is the seventh and one of the most popular avatars of Vishnu. In Rama-centric traditions of Hinduism, he is considered the Supreme Being. Rama.

कण –कण में देखो,
भगवान श्री राम समाए हैं।
सबके मन देखो,
दर्शन के लिए ललचाए हैं।
बहुत वर्षों बाद देखो ,
आई है आज शुभ घड़ी,
देखो देखो अयोध्या में ,
आज फिर मेरे राम आए हैं।

गली गली सजी है,
आज फूलों से,
महक उठा है,
चमन – चमन,
दूर-दूर से दर्शन करने,
श्री राम लला के,
देखो आज ,
हम भी अयोध्या आए हैं।

जन-जन के मन में ,
राम बसते आए हैं।
सबके बिगड़े कामों को,
श्री राम बनाते आए हैं।
धन्य हो गया आज हर,
एक जनमानस,
देखो-देखो अयोध्या में,
आज फिर मेरे राम आए हैं।

दुल्हन जैसे सज गई है,
आज अयोध्या नगरी।
खुशियों से भरी हुई जैसे,
छलक गई है गगरी।
रोम रोम पुलकित ,
हो उठा है आज,
देखो – देखो अयोध्या में,
आज फिर मेरे राम आए हैं।

♦ लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी  – बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “श्री लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता में कवि भगवान श्री राम के आगमन का जो दृश्य चित्रित कर रहे हैं, उसे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं से भरा हुआ है। वे कह रहे हैं कि भगवान श्री राम सभी के हृदय में हैं और उनके दर्शन के लिए सभी लोग बेहद उत्कृष्ट भावनाओं से प्रेरित हैं। कवि आगे बढ़ते हैं और बताते हैं कि बहुत वर्षों के बाद फिर से एक शुभ घड़ी आई है, और आज अयोध्या में भगवान राम फिर से अपने भक्तों के बीच आए हैं। उनके आगमन से पूरा नगर सज गया है, हर गली-मोहल्ले में फूलों से भरा हुआ है। लोग दूर-दूर से आकर श्री राम लला के दर्शन करने के लिए उत्कृष्ट भावनाओं में लिपटे हैं और खुशी से भरे हुए हैं। कवि ने इस कविता के माध्यम से भक्ति, सांस्कृतिक समृद्धि, और समर्पण की भावनाएं सुंदरता से चित्रित की हैं, और व्यक्ति को अपने आत्मा की शुद्धि और धार्मिक अनुष्ठान की दिशा में प्रेरित करती हैं।

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यह कविता (मेरे राम आए हैं।) “श्री लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, लघु कथा, सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल है। साहित्यिक नाम — डॉ• जय अनजान है। माता का नाम — श्रीमती कमला देवी महलवाल और पिता का नाम — श्री सुंदर राम महलवाल है। शिक्षा — पी• एच• डी•(गणित), एम• फिल•, बी• एड•। व्यवसाय — सहायक प्रोफेसर। धर्म पत्नी — श्रीमती संतोष महलवाल और संतान – शानवी एवम् रिशित।

  • रुचियां — लेखक, समीक्षक, आलोचक, लघुकथा, फीचर डेस्क, भ्रमण, कथाकार, व्यंग्यात्मक लेख।
  • लेखन भाषाएं — हिंदी, पहाड़ी (कहलूरी, कांगड़ी, मंडयाली) अंग्रेजी।
  • लिखित रचनाएं — हिंदी(50), पहाड़ी(50), अंग्रेजी(10)।
  • प्रेरणा स्त्रोत — माता एवम हालात।
  • पदभार निर्वहन — कार्यकारिणी सदस्य कल्याण कला मंच बिलासपुर, लेखक संघ बिलासपुर, सह सचिव राष्ट्रीय कवि संगम बिलासपुर इकाई, ज्वाइंट फाइनेंस सेक्रेटरी हिमाचल मलखंभ एसोसिएशन, सदस्य मंजूषा सहायता केंद्र।
  • सम्मान प्राप्त — श्रेष्ठ रचनाकार(देवभूमि हिम साहित्य मंच) — 2022
  • कल्याण शरद शिरोमणि सम्मान(कल्याण कला मंच) — 2022
  • काले बाबा उत्कृष्ट लेखक सम्मान — 2022
  • व्यास गौरव सम्मान — 2022
  • रक्त सेवा सम्मान (नेहा मानव सोसायटी)।
  • शारदा साहित्य संगम सम्मान — 2022
  • विशेष — 17 बार रक्तदान।
  • देश, प्रदेश के अग्रणी समाचार पत्रों एवम पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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पं. महामना मदन मोहन मालवीय जी एक युगपुरुष।

Kmsraj51 की कलम से…..

Pt. Mahamana Madan Mohan Malviya Ji a Man of the Era | पं. महामना मदन मोहन मालवीय जी एक युगपुरुष।

Madan Mohan Malaviya was an Indian scholar, educational reformer and politician notable for his role in the Indian independence movement. He was president of the Indian National Congress four times and the founder of Akhil Bharat Hindu Mahasabha.भारत विचारवान महापुरूषों की जन्म भूमि है। यहां समय-समय पर महापुरूषों की भूमिका निभाने वालों का जन्म धरती माँ की गोंद में होता रहा हैं जिससे धरती धन्य होती रही है। उन्हीं महापुरूषों में मदन मोहन मालवीय जी का नाम भी प्रमुख रूप में लिया जाता हैं उन्होंने हिन्दू संगठनों का शक्तिशाली आन्दोलन चलाया जबकि इसके लिए उन्हें सहधर्मियों की उलाहना सहन करना पड़ा उलाहना का परवाह किए बिना कलकत्ता, काशी, प्रयाग नासिक आदि प्रमुख जगहों पर उन्होंने भंगियों को उपदेश दिया और मन्त्र दीक्षा भी दिया।

मालवीय जी व्यायाम और त्याग में अद्वितीय पुरूष थे। उन दिनों जब वाइस चांसलर का० हिं० विश्वविद्यालय के थे, तो भी वे सबेरे नियमित रूप से शरीर की मालिश कराया करते थे। वह सत्य ब्रह्मचर्य और देश भक्त उत्तम गुणों वाले महा मानव थें उनके कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं होता था। जो वे कहते उनको जीवन में पालन भी करते थे।

वह मृदृ भाषा पुरूष थे उनमें रोष तो मानों लेशमास भी छू न सका था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक पं0 मदन मोहन मालवीय जी की शताब्दी के अवसर पर दिसम्बर 25, सन 1961 को पन्दह पैसे का डाक टिकट जारी हुआ। वहीं आयरिश महिला एनीवेसेंट जो भारतीय सवतंत्रता आन्दोलन की समर्थक, सेनानी सामाजिक कार्यकर्ता शिक्षाविद् कोल रूल लीग की संस्थापक सन् 1917 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष के ऊपर अक्टूबर 01, सन् 1963 को डाक विभाग 15 पैसे का टिकट जारी किया। मालवीय जी की 150 वीं जयन्ती पर 05 रू0 का डाक टिकट दिसम्बर 27 सन् 2011 में जारी हुआ।

का० हि० वि० विद्यालय के प्रथम वाइस चांसलर पं० मालवीय जी

का० हि०वि० विद्यालय के प्रथम वाइस चांसलर पं० मालवीय जी बनाए गये। उन्होंने वि० विo के लिए शिक्षाभियान चलाया। जिसमें पं० जी सफल रहे। धर्म संस्कृति की उन्होंने रक्षा की, संस्कृति को संजोया। वह सादा जीवन उच्च विचारवान महामानव पुरूष थे। का० हि०वि० विद्यालय में मिलने देश-विदेश के लोग और मेहमान भी आते रहते थे। मेहमान नवाजी में विद्यालय पीछे नहीं हटता था।

कहा जाता है कि मालवीय जी का आदेश था कि “विश्वविद्यालय के धन का उनके (स्वयं) ऊपर एक पैसा भी व्यय न किया जायं” उनकी यात्रा आदि का खर्च कुछ धनी मित्र अपनी स्वेच्छा से श्रद्धा से करते थे। माना जाता है कि संस्कृत-संस्कृति के संवाहक मालवीय जी पुत्री के रूप में विद्यालय को माना होगा कारण पुत्री का धन खाना हिंदू धर्म शास्त्र में महा पातक कर्म माना गया है। वहीं उन दिनों वि0 वि0 के पास मोटर वाहन नहीं था जबकि रेलवे स्टेशन, बस अड्डा 8–9 किमी0 लगभग पर था। मालवीय जी प्रायः ‘इक्के’ से आते-जाते रहते थे।

एक बार लम्बी यात्रा के बाद …

एक बार लम्बी यात्रा के बाद इक्के की सवारी से आते लत-पथ हालत में देखकर कुंअर सुरेश सिंह एवं सुदरम् जो कि विद्यालय के ही छात्र थे ने वयोबृद्ध तपस्वी वाइसचांसलर की सेवा और वि० विद्यालय के लिए उनके समर्पण भाव को देखकर ‘व्यूक’ गाड़ी भेंट करने की जिज्ञासा संजोकर संकल्प कर होस्टलों में जाकर विद्यार्थियों से चंदा मांगा। मध्यम एवं निम्न मध्यम वर्गी छात्रों द्वारा चंदा सायं काल तक मात्र दो हजार रूपया ही मिल सका।

दोनों संकल्पित छात्र भूखे प्यासे हताशा की हालत में अंत में दानबीर बाबू शिव प्रसाद गुप्त जी के शरण में पहुंचे। उन्होंने इस सर्त पर किसी से मेरे रूपये देने की बात नहीं कहोगे! और वे शेष गाड़ी ‘व्यूक’ खरीदने के लिए पाँच हजार का चेक काट कर दे दिया। उन दिनों व्यूक सात हजार में मिलती थी। दोनों छात्र खुशी – ख़ुशी छात्रावास चले गये। उधर मालवीय जी दोनों विद्यार्थियों को पास आने का बुलावा छात्रावास भेजते रहे, उधर छात्र चंदा इकट्ठा करने में लगे रहे। उन तक सूचना नहीं पहुच सकी।

सायंकाल छात्र सुन्दरम् हास्टल पहुचा तो वह मालवीय जी से जा मिला। जो बातें हुई मोबाइल उन दिनों न होने से कु० सुरेश सिंह से नहीं बता सका। उधर कु० सुरेश सिंह सुबह वाइसचांसलर जी से मिलने पहुँचे। मालवीय जी नित्य की तरह नितकर्मानुसार मालिस करवा रहे थें कुवर सुरेश सिंह को देख कर मालवीय जी बोल- ‘कल-तुम दिन भर मेरे लिए एक मोटर खरीदने को चंदा इकट्ठा करते रहे । विश्वविद्यालय में सारे देश से गरीब लोगों के लड़के पढ़ने आते हैं । वे जब लौट कर अपने-अपने गाँव में जायेंगे और कहेंगे कि वहां तो मेरे सुख सुविधा के लिए उन गरीब विद्यार्थियों से पैसा वसूल किया जाता है। तब देशवासी मेरे बारे में क्या सोचेंगे?

कलंक नहीं लगा रहे …

और आगे सुरेश सिंह से कहा- “तुम तो ताल्लुकेदार के लड़के हो! ताल्लुके दारों को जब मोटर खरीदनी होती है तो वे अपनी रैयत से मोहरवारन वसूल करते हैं। प्रजा इससे कितनी त्रस्त होती होगी। और देश में इस प्रथा से उनकी कितनी भर्त्सना होती है? क्या तुम मेरे लिए भी ‘मोहरवारन’ की प्रथा यहाँ चलाकर मेरे नाम पर भी कलंक नहीं लगा रहे मेरे लिए अपयश से बढ़कर कौन सा दण्ड है? तुमने यह सब क्यों किया?”

हिंदी – अंग्रेजी दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ का सम्पादन

मालवीय जी ने हिंदी अंग्रेजी दैनिक’ हिन्दुस्तान’ का सम्पादन सन् 1887 में शुरू किया, उन्होंने देश भक्त राजा रामपाल सिंह जी के अनुरोध को आत्मसात कर लगभग तीस माह तक जनता को हिन्दुस्तान के माध्यम से जगाया। महामोपाध्याय पं० आदित्य राम भट्टाचार्य के साथ जो म्यामार कालेज (वर्तमान इलाहाबाद वि०वि०) के मनस्वी गुरू थे, के द्वारा 1880 ई0 में स्थापित ‘हिंदू समाज’ में मालवीय जी भाग ले रहे थे। मदन जी पं० अयाध्यानाथ जो कि कांग्रेस नेता थे उनके भी इंडियन ओपीनियन के सम्पादन में भी कार्य किया। और उन्होंने दैनिक लीडर को निकाल कर महान कार्य किया। वह लीडर सरकार समर्थक ‘पायोनियर’ के समकक्ष का था। जो सन् 1909 ई0 में सम्पादित हो रहा था। हिन्दुस्तान टाइम्स को सन् 1924 ई0 में सुव्यवस्थित किया और लाहौर से ‘विश्वबंध’ काशी से ‘सनातन धर्म’ के प्रचारार्थ प्रकाशित कराया। मालवीय जी खुद एक अच्छे सम्पादक थे।

मैं अन्न-जल न ग्रहण करूंगा

उधर वि० विद्यालय के छात्र सुरेश सिंह मालवीय जी के चंदे को लेकर हुई बात सुनकर हतप्रध हो बोले- “महाराज, लम्बी यात्रा से थके थकाये इक्के पर स्टेशन से आपको इस वृद्धावस्था में आते देख हमें दुःख हुआ। हमने सोचा वि०वि० के वाइस चांसलर के पास भी गाड़ी होनी चाहिए।” सो हमने ऐसा निर्णय किया। सादगी पूर्ण जीवन यापन करने वाले महात्मा जी ने यह सुनकर कहा- “कल तुमने चंदा पूरा होने तक उपवास रखा था अब तुम जाकर जिस-जिस से जितना पैसा लाये हो उसे लौटा दो और जब तक तुम आकर मुझे सूचित नहीं करते हो मैं अन्न-जल न ग्रहण करूंगा।

“यह सुनकर गुरू आज्ञा को शिरोधार्य कर दोनों विद्यालय के छात्र लोगों का पैसा लौटाने में लग गये। और जब पैसा लौटा कर दोनों छात्र मालवीय जी से फिर मिले तो कुंअर सुरेश सिंह व सुन्दरम् को वाइसचांसलर जी ने शाबाशी दी तथा अपना किया गया व्रत तोड़ा। लोगों द्वारा प्रायः नरमदल का कार्य कांग्रेस में छोड़ते रहने के वावजूद म० मो० मालवीय जी उसमे डटकर कार्य करते रहे। अतएव कांग्रेस ने उन्हें चार बार सभापति निर्वाचित किया। क्रम से सन् 1909 में लाहौर सन् 1918, 1931 ई0 में दिल्ली एवं सन् 1933 में कलकत्ता में उन्हें सम्मान मिला। दो बार वे सत्याग्रह के कारण गिरफ्तार भी हुए। मालवीय जी आज हमारे बीच न रह कर भी हमेशा-हमेशा अमर रहेंगे उनकी बीरगाथा, देश प्रेम, साहस, शौर्य, धर्मप्रचार एवं बलिदान का संदेश देश को नई ऊर्जा प्रदान करने में सहायक सिद्ध होगी।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — मदन मोहन मालवीय शिक्षा को मानव मात्र का अधिकार मानते थे तथा इसका समुचित प्रबन्ध करना राज्य का कर्त्तव्य मानते थे। वे शिक्षा की एक ऐसी राष्ट्रीय प्रणाली विकसित होते देखना चाहते थे जिसमें प्रारम्भिक और माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षा निःशुल्क हो। अध्यापकों एवं छात्रों के कर्तव्य, व्यायाम करके शरीर को बलशाली बनायें। पहले स्वास्थ्य सुधारें फिर विद्या पढ़ें। शाम को खेलें, मैदान में विचरें। पंडित मदन मोहन मालवीय ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेकर 35 साल तक कांग्रेस की सेवा की। उन्हें सन्‌ 1909, 1918, 1930 और 1932 में कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। मालवीयजी एक प्रख्यात वकील भी थे। एक वकील के रूप में उनकी सबसे बड़ी सफलता चौरीचौरा कांड के अभियुक्तों को फांसी से बचा लेने की थी। मदन मोहन मालवीय एक भारतीय विद्वान, शिक्षा सुधारक और राजनीतिज्ञ थे जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी भूमिका के लिए उल्लेखनीय थे। वह चार बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष और अखिल भारत हिंदू महासभा के संस्थापक थे।

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यह लेख (पं. महामना मदन मोहन मालवीय जी एक युगपुरुष।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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शक्तिशाली बनना है तुझे मेरी लाडो।

Kmsraj51 की कलम से…..

Shaktishali Banna Hai Tujhe Meri Laado | शक्तिशाली बनना है तुझे मेरी लाडो।

Women empowerment refers to making women powerful to make them capable of deciding for themselves.हम अपनी बेटियों को फूल की तरह, तितली की तरह नाजुक बनाते जा रहे हैं। क्योंकि हम सब अपनी लाड-दुलारी से बेहद प्यार करते हैं और चाहते हैं कि उसे हमारे सामने रहते हुए एक भी कष्ट ना सहन करना पड़े। अच्छी बात है परंतु आज के समाज को देखते हुए सही नहीं है। कुछ समय पीछे चले जाए तो पहले की मां बेटी को तमाम काम सिखा देती थी। ऐसा नहीं कि बेटियां पढ़ती नहीं थी। पढ़ाई के साथ-साथ घर का काम करना भी उन्हें बचपन से सिखाया जाता था।

गांव की बेटियां

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि लड़कियां अपने घर का सारा काम करके पढ़ने जाती थी। गांव में तो यह अब भी जारी है, कुछ घरों को छोड़कर। क्योंकि उनकी मां को पशुओं के साथ घर की जिम्मेदारी निभानी होती है। गांव में तो ज्यादातर को दूसरे गांव में पढ़ने जाना पड़ता है। सुबह जल्दी उठना घर के काम में मां का हाथ बंटाना उन्हें शुरू से सिखाया जाता है।

ऐसा नहीं है सिर्फ बेटियों से काम करवाया जाता है लड़कों को भी बहुत सारे काम करवाए जाते हैं। समय के साथ-साथ लोगों की सोच भी बदलती जा रही है। अब अगर कोई मां कुछ करवाना भी चाहती है तो पिताजी आकर बोलेंगे नहीं मेरी बेटी काम नहीं करेगी। तुम किस लिए हो। जिसे तुम यह सब कह रहे हो क्या वह किसी की बेटी नहीं है। बोलते हैं यह तो सिर्फ पढ़ेंगी, अच्छी बात है पढ़ना बहुत जरूरी है। परन्तु कुछ काम सीखने में भला क्या बुराई है।

मेरे पापा अक्सर कहते थे बेटा चाहे कुछ भी काम मत सीखना पर खाना बनाना जरूर सीखना, और उन्होंने हमें सिखाया भी। ऐसा नहीं कि सिर्फ हम बहनों को बल्कि भाईयों को भी खाना बनाना सिखाया है। और उनका कहना बिल्कुल सही था जब हम बाहर पढ़ने गए तो खाना बनाने में कोई दिक्कत भी नहीं आई। घर पर आराम से खाना बनाकर खाते थे उससे पैसे तो बचते थे साथ में शुद्ध खाना मिल जाता था। कई मां लड़की को कुछ भी नहीं करने देती। टेबल पर चाय, नाश्ता सब कुछ दे देती है सोचती है कि पढ़ लिखकर नौकरी लग जाएगी।

पढ़ाई के साथ-साथ…

पर ये सही नहीं है पढ़ाई के साथ-साथ उसकी योग क्लास, कराटे क्लास भी लगाएं। उसे मजबूत बनाएं। ताकि आवश्यकता पड़ने पर सब काम आए। क्योंकि उसे आगे भविष्य में जाकर अकेले भी रहना पड़ेगा और देर रात को भी घर आना पड़ेगा तो उसका पढ़ाई के साथ-साथ अपने शरीर को मजबूत करना बेहद जरूरी है।

चाहकर भी मां-बाप उसके साथ नहीं रह सकते। कभी ना कभी तो उसे अकेला रहना ही पड़ेगा। अगर आप सोच रहे हैं बाहर खा सकती हैं तो रोज-रोज बाहर का खाना नहीं खा सकते। सोचते हो कि कोई भी खाना बनाने वाली मिल जाएगी, आप सभी ने कोरोना काल में देख लिया होगा। वक्त का भला किसे पता है। दुनिया बड़ी तेजी से बदलती जा रही है सिर्फ पढाई से काम नहीं चलेगा। अपनी बिटिया को स्वावलंबी बनाना होगा। उसे समाजिक बनाना भी होगा ताकि बाहर निकल कर उसे समझ आ जाए दुनिया में क्या चल रहा है।

सभी प्यारी मां और बेटियों को समर्पित मेरी चंद पंक्तियां…

मेरी लाडो तू हमारी जान है,
मेरी घर की शान है।
तू मेरे घर की रौनक है,
तुझसे महकता संसार है।
बेटी खुश है तो घर के
सभी सदस्य खुश हैं।
उसे ताकतवर बनाना,
हमारा फर्ज है,
और हम पढ़ाई के साथ साथ
जुड़े-कराटे और अपने
पैरों पर खड़ा भी करेंगे।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस लेख में लिखा गया है कि बेटियों को सिर्फ नाजुक और पढ़ाई में ही ध्यान देने की बजाय, उन्हें विभिन्न कौशल भी सीखाना चाहिए। लेखिका के पापा ने उन्हें खाना बनाने की कौशल सिखाया और उन्हें समझाया कि स्वावलंबी बनना महत्वपूर्ण है। उनका मत है कि बेटियों को पढ़ाई के साथ-साथ अपने शारीरिक और सामाजिक कौशल भी विकसित करना चाहिए, ताकि वे आगे जाकर समस्याओं का समाधान कर सकें और स्वतंत्र रूप से जीवन जी सकें।

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यह लेख (शक्तिशाली बनना है तुझे मेरी लाडो।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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एकमात्र हिंदी ही हमारी भाषा हो।

Kmsraj51 की कलम से…..

Let Hindi Be Our Only Language | एकमात्र हिंदी ही हमारी भाषा हो।

The national language empowers the soul of the entire nation. Let Hindi be our only language.हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जो हमारे पूरे भारत में बोली और समझी जाती है। चाहे हमारे बच्चे कितनी भी अंग्रेजी या किसी और भाषा को सीख ले परंतु वार्तालाप तो हिंदी में ही करते हैं। क्योंकि हमारी जड़े तो हिंदी में ही हैं, जो बात हमारी मातृभाषा में है वह बात किसी और भाषा में कहां? हमारे सिनेमा जगत को ही देख लीजिए हिंदी भाषा में अलग-अलग राज्यों में हजारों फिल्में बनती है। क्योंकि सिनेमा जगत को यह बात अच्छे से पता है कि अगर फिल्म को सुपरहिट करना है तो हिंदी एकमात्र ऐसी भाषा है जो उनकी फिल्म को आगे ले जाएगी। जिसे परिवार के सभी सदस्य सुन सकते हैं, बोल सकते हैं, लिख सकते हैं। फिर दूसरी भाषा क्यों?

मेरा मकसद किसी दूसरी भाषा को गलत बताना नहीं है। बस अपनी भाषा के बारे में अवगत कराना है। विदेशों में हिंदी को पढ़ाने-लिखाने की कक्षाएं लगती हैं। बहुत सारे विदेशी लोग भारत में सिर्फ और सिर्फ हिंदी सीखने के लिए ही आते हैं और भारतीय संस्कृति को अपना रहे हैं। जब अमेरिका से डोनाल्ड ट्रंप भारत आए थे तो उन्होंने नमस्ते! बोल कर सबके दिलों में अलग पहचान बना ली थी।

हिंदी भाषा का रुतबा है…

यह हमारी हिंदी भाषा का रुतबा है कि अमेरिका के लोग भी इसे सम्मान के साथ बोलते हैं। वह किसी और भाषा में कहां है। अखबार हो या टीवी जगत हो हर स्थान पर हिंदी छाई रहती है। हमारे देश माननीय प्रधानमंत्री जी भी हमेशा अपने भाषण हिंदी भाषा में देते हैं। उसी का नतीजा है कि उनका इतना रूतबा है। हिंदी आम बोलचाल की भाषा है, जिसे पढ़ें लिखे लोग तो समझते हैं। आम नागरिक भी आसानी से समझ जाता है।

यह ऐसी भाषा है जो सभी भाषाओं के शब्दों को आसानी से अपने अंदर समा लेती है जैसे टी वी, रेल हजारों ऐसे हैं विदेशी शब्द है जो हिंदी में आए हुए हैं। हमारी हिंदी भाषा भी माँ की तरह जो सबका मान-सम्मान कर देती है और हमेशा करती रहेगी।

मां की ममता की प्यारी है,
प्राचीन से भी प्राचीन है।
समाया जिसने प्यार सबके लिए,
वह हमारी हिंदी भाषा,
विदेशों तक जिसका डंका बाजे।

हमें गर्व है हिंदी भाषा पर…

अगर हर जगह हिंदी भाषा का प्रयोग होने लगा तो इससे आम नागरिक को बहुत फायदा होगा। ग्रामीण क्षेत्रों के लोग भी आसानी से अपनी बात को हर क्षेत्र तक पहुंचा सकतें हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में हिंदी भाषा का ही प्रयोग होता है। उनकी पहुंच भी हर जगह हो जाएगी। इसलिए हिंदी भाषा की प्रसिद्धि दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। भारत देश में ही नहीं अपितु विदेशों में भी हिंदी का परचम लहरा रहा है। हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भी हर जगह पर हिंदी भाषा का ही प्रयोग करते हैं। हमें गर्व है कि दुनिया का बड़ा हिस्सा हिंदी भाषा का प्रयोग करता है।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस लेख में हिंदी भाषा के महत्व को बताया गया है। लेखिका के अनुसार, हिंदी हमारे देश भारत में एकमात्र भाषा है जो पूरे देश में बोली और समझी जाती है। हिंदी भाषा का महत्व यहाँ पर उजागर किया गया है कि चाहे कोई भी अन्य भाषा सीख ले, लेकिन वार्तालाप को हम हिंदी में ही करते हैं क्योंकि हमारी मातृभाषा हिंदी है। हिंदी के माध्यम से हमारा संवाद हमारी संस्कृति और भाषा के साथ जुड़ा रहता है। हिंदी भाषा विश्वभर में अपना महत्व साबित कर चुकी है, खासकर सिनेमा जगत में। हिंदी में बनी फिल्में विभिन्न राज्यों में प्रसिद्ध होती हैं और हिंदी भाषा का प्रयोग किया जाता है। हिंदी भाषा का प्रचार और प्रसार बढ़ाने से हमारे देश का संवाद और सम्पूर्ण समाज में समृद्धि हो सकती है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने इसलिए हिंदी के महत्व को स्थापित किया और यह संदेश दिया कि हमें अपनी भाषा का सम्मान करना चाहिए।

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यह लेख (एकमात्र हिंदी ही हमारी भाषा हो।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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वाराणसी से चंडीगढ़ की साहित्यिक यात्रा अगस्त – 2023

Kmsraj51 की कलम से…..

Literary trip from Varanasi to Chandigarh August – 2023 | वाराणसी से चंडीगढ़ की साहित्यिक यात्रा अगस्त – 2023

यात्रा वृत्तांत के क्रम में अनेक साहित्यकारों ने समय-समय पर यात्रा की। यात्रा होती है। दो भौगोलिक स्थान के रह रहे लोग आपस में एक दूसरे की बोली- भाषा, संस्कृति- सभ्यता का आदान – प्रदान किया करते हैं। यात्रा विविध वाहन से की जाती है। जैसे – विमान, बस, नाव, जलयान, और पैदल भी यात्रा होती है।

अनहद कृति से बुलावा आया – अनहद कृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका की साहित्य आश्रय स्ट्रीट 2023, हेतु बुलावा 2 जुलाई 2023 को मेरे मेल पर आया मैं किताब की बात, पुस्तक प्रदर्शनी, “परिवार के सदस्यों के लिए हिंदी शब्द यज्ञ का अनूठा अवसर साहित्य शेयर, एक बार पुनः दस्तक दे रहा है लिखा।”

अनहद कृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के इस कार्यक्रम को ढाई दिन के लिए विविध सांस्कृतिक साहित्यिक गतिविधियों और आगे बढ़कर मिलन बर्तन आपस में होगा। दो दिन का पुस्तक प्रदर्शनी में, आप कर पाएंगे अपनी किताब की बात। इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए साहित्य आश्रय 2023 में पंजीकरण कर के अपने बारे में जानकारी देनी थी।

अपनी प्रतिक्रिया एवं प्रश्न काम के जीमेल पर भेजने को आदेशित हुआ था। अनहद कृति अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक ई. पत्रिका का दिनांक 2 जुलाई 2023 का मेल आया। जिसमें हमने पंजीकरण कर लिया था। मन मस्तिष्क पर उसके बारे में चिंतन भी चल रहा था। मन में आया कि भारत शांति का संदेश देने वाला देश है तो एक चार लाइन की रचना प्रस्तुत करते हैं –

शांति का संदेश लेकर चल दिया,
सद्भाव और प्रेम परोसते चल दिया।
संस्कृति संस्कारों में पला यह देश,
बंधुत्व की कामना लिए चल दिया।
ॐ शांति: शांति:

सरयू का पावन किनारा, सरयू में गोता लगाने की ललक, धर्मशास्त्र के अनुसार ‘सरयू में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं, साथ ही मनुष्य को मुक्ति भी मिलती है।’ सरजू तट से तीन किलोमीटर पहले स्थित मेरा आदर्श गांव, ग्राम महिरौली रानी मऊ, जनपद अम्बेडकर नगर मुझे जाना था। गांव में कुछ मकान का कार्य करना था तीन कमरों की दीवार प्लास्टर होनी बाकी थी। स पत्नी उर्मिला सिंह के साथ मैं गांव पर पहुंच गया आवश्यकता है कारीगर, मजदूर की। पड़ोसी प्रताप सिंह की मदद से मजदूर और मिस्त्री भी मिल गये। काम शुरू हो गया। प्लास्टर का काम पूरा हो गया होता सीमेंट कम थी पैसे भी चूक गये। काम बंद करना है। उसके बाद हमने अपने मित्र जो बालीपुर में रहते हैं उनका कुछ सामान जिसे लाया था, जैसे- बेलचा, रसियां, लोहे की कढ़ाई, लोहे का सब्बल आदि को लेकर अपनी अल्टो गाड़ी से पहुंचने गया था। समान पहुंचा कर जब वापस आ रहा था कि तभी ग्राम अहिरौली रानी मऊ जनपद अंबेडकर नगर के दक्षिणी छोर पर हरिजन बस्ती के पास अपनी गाड़ी को रोकना पड़ा, और बात होने लगी, विभा चसवाल जी से, आपने बताया कि- 4,5,6 अगस्त को अनहद कृति का साहित्याश्रय रिट्रीट 2023 होगा, में आपको बुलावा है। हम दोनों में लगभग आधा घंटा की बात चलीं, विभा जी ने दो रचनाएं और भेजने के लिए मुझे कहा। दूसरे दिन हमें बनारस जाना था इसलिए मैंने कहा ठीक है कल रचना भेज दी जाएगी। रात्रि से ही दूसरे दिन भोर से तैयारियां जोर- शोर से होने लगी।

यात्राएं क्यों आवश्यक है —

यात्रा की महत्व बताती हुई नोबेल पुरस्कार प्राप्त ब्राजील की कवियित्री मार्था मेरिडोस की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूं —

रचना का शीर्षक रचना पढ़ने से लगा, यात्रा क्यों आवश्यक है? —

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:
करते नहीं कोई यात्रा।
पढ़ते नहीं कोई किताब,
सुनते नहीं जीवन की दुनियां,
करते नहीं किसी की तारीफ।

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, जब आप:
मार डालते हैं अपना स्वाभिमान।
नहीं करने देते मदद अपनी और,
ना ही करते हैं दूसरों की।
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, और अगर आप:
बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के।

चलते हैं रोज उन्हीं रोज वाले रास्तों पे,
नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार।
नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग या,
आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं अगर आप:,
नहीं बदल सकते हो अपनी जिंदगी को जब,
हों, आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से।

अगर आप अ निश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हो निश्चित को,
अगर आप नहीं करते हो पीछा किसी स्वप्न का।
अगर आप नहीं देते हों इजाजत खुद को,
अपने जीवन में कम से कम एक बार किसी,
समझदार सलाह से दूर भाग जाने की,
तब आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

(इसी रचना पर नोबेल पुरस्कार मिला)

सनातन धर्म मंदिर जो इंदिरा गांधी हालीडे होम के पास ही था दर्शन पूजन करने के उपरांत कैंटीन में आकर चाय – पानी करके अपने रूम में चला गया जो हालीडे होम में मिला था कि आकर आराम कर रहा था तभी हाल के सामने समोसा जलेबी और काफी का काउंटर लग चुका था। बावरा जी से मैं बोला कि चलिए सभा स्थल! वहां पहुंचा तो देखा कि हालीडे होम सेक्टर 24 का सजा हुआ था। नजारा देखने में बहुत बढ़िया सजावट। दोनों लोग साथ में हाल के पास पहुंचे थे। हाल के गेट पर काउंटर लगे थे पर ताजी सजी हुई जलेबी, समोसा, चाय, चाय की चाह, पीने की इच्छा अंदर से जाहिर हुई। समय भी दिन में 12:00 बज चुके थे। समोसा को जैसे ही तोड़ा उसमें हरी मटर भिगोकर डाली गई थी बहुत आनंद आया खाने के बाद वह बहुत ही लाजवाब लगा। पहले जलेबी खाई फिर समोसे और अंत में कॉफी पी।

हाल में सभा स्थल पर लोग बैठना शुरू हो चुके थे हम दोनों लोग भी वहां जाकर उपस्थित हुए साहित्यकारों का परिचय होने लगा जगह-जगह से आए हुए थे साहित्यकार अपना – 2 नाम पता संपूर्ण विवरण के साथ बता रहे थे। एक दूसरे के विचारों का आदान-प्रदान हो रहा था। जब साहित्यकारों के परिचय का कार्यक्रम समाप्त हुआ उसके बगल में ही भोजन का काउंटर लगा हुआ था जब वहां पहुंचा, पहुंचने पर देखा की विविध तरह के व्यंजन काउंटर पर लगाए गए हैं उसमें पापड़, छोले, पुरी, बेसन और मैदे की रोटी, चावल ,दाल, सलाद, रायता, मीठा और काफी का स्टाल लगा था। साहित्याश्रय रिट्रीट का यह कार्यक्रम ढाई दिनों तक चला जिसमें अलग-अलग समय में अलग-अलग तरह का भोजन परोसा जाता था। कभी-कभी फल का भी काउंटर लगा हुआ मिला। मनभावन व्यंजनों को देखकर ऐसा लगता था कि मानों शादी का कोई बड़ा फंक्शन हो।

लोग छक कर भोजन खाते,
कार्यक्रम में खो जाते।
ऐसा कार्यक्रम फिर हो,
सब लोग मानते रहते।
चंडीगढ़ की पावन धरा पे,
चंडी का गुणगान सुनाते।
अनहद कृति की शुभ बेला,
यादों को अपने घर ले जाते।

भोजन करने के उपरांत दूसरी मीटिंग में शामिल रचनाकारों की रचनाएं सुनीं गयी जिसको रचनाकार स्वयं अपनी भागीदारी सुनिश्चित किया करते थे। अपनी-2 रचना वाईफाई लगे हुए अनहद कृति के पोर्टल पर लोग पढ़ते थे। अच्छी रचनाओं पर तालियों की गड़गड़ाहट से सभा स्थल गूंज उठा करता था सभा में शामिल लोग आनंदित हो जाते थे।

सुबह सवेरा होता, लोग नृत्य क्रिया से निवृत होकर एक-एक करके बाहर निकलते कि इस समय विभा चसवाल जी बाहर निकलीं और मैं भी बाहर निकल आया, बात चली चौपाल की, कुर्सियां लान में लगाया जाय, कुर्सियां हम लोग रखने लगे लान में लाइन में। एक कमरे के सामने चाय बिस्कुट रखा हुआ था। लोग बारी-बारी से बिस्कुट खाते चाय पीते। तभी वहां पर राजेंद्र प्रसाद गुप्त बावरा जो चंदौली जनपद से थे डेड पैकेट नमकीन लाकर रख वहां रख दिया उसे भी लोग चखे, नमकीन बड़ा चटपटा था। लोगों को बहुत अच्छा लगा।

रचनाओं का दौरा चला उपस्थित रचनाकारों की अध्यक्षता संपादक द्वय आदरणीय पुष्पराज चसवाल, डॉ प्रेमलता चसवाल ‘पुष्प’ ने की। संचालन का काम अमेरिका से पधारी प्रवासी भारतीय मूल की डॉक्टर विभा चसवाल ने किया। इस कार्यक्रम में रिकॉर्डिंग भी की गई साथ ही साथ यू एस ए से भारतीय मूल की ललिता बत्रा ने ड्रोन से भी फोटोग्राफी की।

दिन में सभा स्थल पर कार्यक्रम चलाया गया चलता रहा यहां संगीत भी प्रस्तुत हुई सरस्वती पूजा अर्चना, पुष्प अर्पित किए सरस्वती जी को। शाम 5:00 बजे टूर पर जाने का कार्यक्रम था लोग बस में सवार हुए और पहुंच गए सुखना झील पर। झील का सैर बहुत अच्छा था।

यात्रा के दौरान आवश्यकता —

काम हो जाने पर लौट आने की नियत। तीन जोड़ी कपड़े। मंजन, तौलिया, साबुन, चंदन, पूजा की सामग्री। जाने और घर आने की तारीख। जिसके पास जाना है उसका नाम पूरा पता शहर का नाम मोबाइल नंबर शहर का पिन कोड आदि। थोड़ा पैसा, आधार कार्ड, पैन कार्ड व डेबिट कार्ड। जहां जाना है उस जगह की जानकारी शहर के किस हिस्से में है, जाना पहचाना लैंड मार्क, व्हाट्सएप पर लोकेशन व्यस्त है, यात्रा की अनुमति पत्र (टिकट), कागज पर छपा हुआ, अथवा यस एम यस प्रारूप में।

यात्रा में क्या न ले जाएं —

  • अरे हो जाएगा वाली आस।
  • उसने बुलाया है तो जा रे वाली सोच।
  • देख लेंगे वाला दृष्टिकोण!
  • अकड़।

पुस्तक को भेंट स्वरुप एक दूसरे रचनाकार को दे दी —

साहित्यकारों में अलग-अलग तरह से, शहरों से जुड़े हुए लोगों में, आदान-प्रदान करना शुरु कर दिया। अनेक साहित्यकारों ने अपनी पुस्तक को भेंट स्वरुप एक दूसरे रचनाकार को दे दी।

प्रभात शर्मा, हिमाचल प्रदेश सेवानिवृत्त सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड धर्मशाला जनपद कांगणा, की अपनी पुस्तक ‘शीशम का पेड़’ मुझे दिये। पुस्तक में सद् भाव, संस्कृति, संस्कार, आदर सत्कार, वृद्धों के संग व्यवहार, पारिवारिक एकाकीपन जीवन जीना, सुदूर नौकरी करने से लाभ-हानि, जमीन-जायदाद के झगड़े का निपटारा करने का सुझाव, शर्मा जी ने सादो उर्फ शुभ राम शरण भारद्वाज को केंद्र में रखकर पुस्तक ‘शीशम का पेड़’ प्रकाशित किया, जो पढ़ने योग्य है और ज्ञान बढाने वाली है।

भारतीय कवियों को प्रकृति की गोंद में क्रीड़ा करने का सौभाग्य प्राप्त है। यह हरे-भरे उपवनों में, सुन्दर जलाशय के तट पर, नदियों के किनारे, पहाड़ों की वादियों में, विचरण करते और प्रकृति के नाना प्रकार के मनोंहारी रुपों से परिचित होकर सजीव चित्रण करने में सफलता हासिल करते हैं। भारतीय कवियों का प्रकृति वर्णन सौंदर्य ज्ञान उच्च कोटि का होता है। कवि बुद्धि बाद के चक्कर में पड़ कर व्यक्त प्रकृति के नाना रूपों में एक अव्यक्ति किंतु सजीव सत्ता का साक्षात्कार करता है। उन छवियों से भावमग्न होते हैं।

सामूहिक पुस्तक विमोचन —

अनहद कृत के सामूहिक पुस्तक विमोचन में जो 6 अगस्त को सभागार में आयोजित कार्यक्रम चंडीगढ़ में संपन्न हुआ था। इस कार्यक्रम में स्नेही चौबे कवियित्री व सीनियर साफ्टवेयर इंजीनियर, बंगलोर कर्नाटका की, मेरी अविरल अभिव्यक्ति जिसका आमुख-अविरल अभिव्यक्ति के विविध आयामों में डॉ प्रेमलता चसवाल ‘पुष्प’ ने किया है। आप अनहद कृत ई. पत्रिका की संपादक हैं। फिर मेरे जैसी अदना रचनाकार को क्या लिखना शेष है। राजेंद्र प्रसाद गुप्ता बावरा की पुस्तक ‘चित्र-रेखा’ आप उत्तर प्रदेश के चंदौली जनपद से सोगाई गांव से हैं जहां कर्म नासा नदी की धार कल-कल करती अविरल बहती है।

यह पुस्तक पौराणिक कथा पर आधारित है खंड काव्य इसे कहा जा सकता है। इस पुस्तक की एक रचना प्रस्तुत है—

प्रज्ज्वलित ज्योति भू पर अगर,
प्रसरित है कण-कण धवल धार।
ऊषा ले आई रश्मि-हार,
त्रृण – त्रृण पर छाई मुक्तावलि,
उस छवि – धर का नतमस्तक वंदन।

—♦—

वसा कर बस्ती एक विचित्र,
चित्रपट पर अंकित कर रूप।
जला देना न स्वर्ग – संसार,
कि, हो मर्माहत मेरा रूप।

चित्र – रेखा गूढ़ रहस्यों से भरी शोणित पुर नरेश वाणासुर की पुत्री, वाणासुर का मंत्री, कुम्भाट की पुत्री, द्वारिका पुर नरेश, श्री कृष्ण के पुत्र, प्रदुम्न के पुत्र, देवाधिदेव की अर्धांगिनी, ऊषा की शिक्षिका को आधार मानकर अपनी रचनाओं को स्वरूप प्रदान किया।

दो संस्कृति का मिलन के अंतिम बंद प्रस्तुत में —

कैसी सुंदर घटा छटा का,
ऊंच अटा पर छायी।
मानो उभय बिंदु पर रजनई,
ऊंचा ली अंग ड़ायी।

उक्त रचना से इस चित्रलेखा का राजेंद्र प्रसाद गुप्त बावरा ने समापन किया।

रमेश चंद्र ‘मस्ताना’ की पुस्तक कागज के फूलों में…’

मस्ताना जी के ऊपर सरस्वती की अनुपम कृपा झलकती है आपने इस पुस्तक में लोक संस्कृति, संस्कार आदि पर आधारित छप्पन रचनाओं को संकलित करने का उत्तम प्रयास किया है।

मस्ताना जी की रचना –
भोर की पहली किरण
दूर पहाड़ों की ओट से
स्वर्ण मुकुट पहन
धरती की ओर सरकती
पूछती है मेरी घर आंगन तक!

—♦—

मेरे हिस्से की धूप
मुझे हर पल नई ताजगी
नई उमंग,
नया जोश दे जाती है- २

और नारी संसार नामक शीर्षक से नारी जगत की विशेषताओं को अपनी रचना मेरा है। जो एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य कहा जा सकता है।

यात्रा प्रायः विविध चरण में होती है। यात्रा में जगह-जगह ठहराव होता है। कुछ यात्रा एक दिशा में होती है। एक दिशा में होने वाली यात्रा की मूल एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच जाना और वहां सम्पन्न होने वाले कार्यक्रम में भाग लेना होता है इसके बाद यात्रा जिस जगह से शुरू होती है वहीं आकर यात्रा स्थगित हो जाती है। यात्रा में अनुसंधान, मनोविनोद, तीर्थ दर्शन व विचारों का आदान-प्रदान होता है।

किसी बड़ी संस्था में प्रकाशित रचना को फेसबुक ट्विटर व्हाट्सएप इंस्टाग्राम ब्लॉग पर पोस्ट कर देते हैं हम तो उन रचनाओं को कॉपी करके अखिल भारतीय सद्भावना संगठन, आलो पोयट्री, अभी पोस्ट कर देते हैं। साहित्य काव्य संकलन पर मेरी 145 रचनाएं प्रकाशित है। शब्द इन, वेबली काम, हिंदी साहित्य शिल्पी आदि।

चंडीगढ़ की यात्रा करने के लिए उसे मेल में हमें यह रचना लिखने को मजबूर किया—

आपने पुकार दिया,
मेरे विचार को,
आपका आशीर्वाद हो,
मेरी मनोबल को
शुभ आशीर्वाद देकर
चिंतन को
निखार दिया।

मौका दिया मौका,
लेकर विचार किया।
सर्जन के सुख को
मोतियों में ढाल लिया।

ट्राई के फैसले से फेसबुक के सीईओ “मार्क जुकरबर्ग जी” को जब निराशा हुई तो हमने वेब दुनिया पर लिखा की “जुकरबर्ग जी को अपने उद्देश्यों पर कायम रहकर कार्य रूप देने में धीरज पूर्वक कार्य करने होंगे।” धन्यवाद!

तेरे दामन में जितने सितारे हैं,
होंगे ए फलक।
मुझको अपनी मां की,
मैली ओढ़नी अच्छी लगी।

साहित्य आश्रम रिट्रीट समारोह का समापन 6 अगस्त 2023 को दोपहर में हो गया। सभा स्थल से राजेंद्र प्रसाद गुप्त बावरा और मैं अपना – अपना बैग आदि लेकर सनातन धर्म मंदिर चंडीगढ़ आ कर टेंपो का इंतजार कर रहे थे, परंतु कोई ना मिलने से थोड़ा आगे बढ़े वहां से बीस-बीस रुपए में चंडीगढ़ बस स्टेशन पहुंचे। पहुंचे ही एयर कंडीशन बस मिल गई। ₹440 / प्रति, व्यक्ति चंडीगढ से दिल्ली का किराया लगा। बस आगे बढ़ी आ गया करनाल, बस रूकी। वहां चाय पीना चाहा तो देखा ₹50 की एक काफी दुकानदार दे रहा था। सह चर बावरा जी के मना करने के बाद हम दोनों वापस बस में सवार हो गये।

हमारी बस दिल्ली के काफी करीब आ गई थी।
सूर्य ढलने लगे, अंधेरा होने लगा।
विद्युत प्रकाश फैलने लगा, बड़ी – बड़ी बिल्डिंग दिखने लगीं।
अगल – बगल मंदिर, सड़क पूरी जाम।

बस अब रेंगने लगी, उतर गया कश्मीरी गेट पे। इधर-उधर देखा, किसी-किसी से पूछा। पहुंच गया बाथरूम के, गेट पर बैग रखा। बारी-बारी, दोनों ने बाथरूम किया। फिर पूछना शुरू किया, ही ई एल सेक्टर 15 अशोकनगर। स्टेशन से बाहर निकला, चाय की चुस्की ली। टेंपो वालों से बात की, एक तैयार हुआ।

रुपया लिया उसने, 200 दोनों का। टैंपू आगे बढ़ा, लाल किला गीता कॉलोनी।
होते यमुना ब्रिज, दाहिनी तरफ अक्षर-धाम। ललिता पार्क बाय तरफ, और फिर आई टी ओ। मयूर विहार फेस वन, के बाद औवर ब्रिज से दाहिने। चिल्ला गांव बायें और त्रिलोकपुरी बायें। स्टोक रेडी हॉस्पिटल, अगले चौराहा पर जिज्ञासु जी। जिन्हें देखकर हम लोग आये थे, फिर उसी टेंपो में सवार हो, पहुंच गए सी ई एल गेट। रात में विश्राम किया, भोजन ले आराम मिला।

सुबह सवेरे नित्य क्रिया किया, आगे सेक्टर 52 के लिए चल पड़े। अशोकनगर मेट्रो स्टेशन से, तीस – तीस रुपया दे सेक्टर 52 पहुंचे। वहां से टेंपो मिला, एक मूर्ति के पास अवतार दिया। मेट्रो ट्रेन सेक्टर 52 से गुजरी, बोला दरवाजा बाय खुलेगा। जब सेक्टर सोरह से गुजरी, आवाज मिली दरवाजा बाय खुलेगा। सेक्टर 17 पर आने वाली, दरवाजा बायें खुलेगा। बाट निकल गार्डन, दरवाजा बायें खुलेगा। नोएडा सिटी सेंटर, दरवाजा बायें खुलेगा।

एक मूर्ति से मेरा छोटा लड़का आकर हमें और राजेंद्र प्रसाद को दुबारा अपने फ्लैट पर ले गया वहां भोजनालय किया। दो घंटे हाल चाल भी इसके बाद टिफिन में लंच आ गया। चल दिए फिर अशोकनगर की तरफ, और बाहर निकला। पुलिस वालों ने टैंपू किधर करवा दिया, आगे बढ़ा टेंपो मिला। वह ले जाकर कहीं और छोड़ दिया, दूसरा टेंपो मिला, गंतव्य स्थान से पहले ही छोड़ दिया। घर दृढ़ता आगे बढ़ा। जल्दी-जल्दी बैग उठाया, अशोकनगर मेट्रो स्टेशन जिज्ञासु जी ने पहुंचाया। ₹20 के टिकट पर, नई दिल्ली मेट्रो रेल ले आई। प्रयागराज एक्सप्रेस ट्रेन में सवार हुआ, पहुंच गया 7 तारीख को प्रयागराज।

प्रयागराज रेलवे स्टेशन पर गुप्त जी का बड़ा लड़का जो एस पी ओ है लेने आया। उसने हम दोनों को घर ले जाकर भोजन कराया। नमकीन – चाय पिलाई स्वादिस्त भोजन था। कुछ देर के बाद हम लोग राजेन्द्र गुप्त बावरा जी के समधी से मिलने गए, साथ में वह गुप्त जी का सुपुत्र – बहू भी गयी। फिर प्रयाग सिटी स्टेशन से बस से बनारस पहुंच गया।

—♦—

चंडीगढ़ यात्रा – सुखद अनुभूति, की तैयारी — व विशेष 

यात्रा में साहस की आवश्यकता होती है। यात्रा मनुष्य के बुद्धि को उन्मुक्त करती है। लेखको में वैचारिक आग्रह और दूराग्रह भी होते है, जिसे साहित्य में आपत्तिजनक माना जाता है। देखना है हम लोग विविध भाषायी एकाकार जहां करेंगे वहां का नजारा कैसा होगा।

चंडीगढ़ में पुस्तक प्रदर्शनी लगेगी! यह सुनकर मैं और राजेंद्र प्रसाद गुप्त “बावरा” उत्साहित हो उठे? बावरा ने इच्छा जाहिर किया कि मेरी प्रकाशित पुस्तक ‘चित्र-रेखा और जनतंत्र-महिमा’ पुस्तक मेले में लग सकती है क्या! हमने कहा जरुर आप अपनी पुस्तक लगाइए मैं फॉर्म भर देता हूँ पुस्तक प्रदर्शनी में स्टाल लगेंगे उसके पेपर फिलअप कर देता हूँ परन्तु याद रहे 10-10 पुस्तकें प्रदर्शनी में लगाने के लिए ले जाना है, साथ में एक स्थानीय पत्रिका भी ले जानी है।

बावरा जी यत्र-तत्र जहाँ भी उनकी पुस्तके थीं वहां से 12-12 पुस्तकों को इकठ्ठा करके बैग में रखना शुरू कर दिये। इसे सुनकर मुझे अच्छा लगा की उन्होंने अपनी पुस्तकें ले जाने वाले बैग में रख ली है।

हमनें बावरा जी को साहित्य काव्य संकलन में 19-12-2014 को प्रकाशित काव्य रचना सुनाई —

मुझे देखो मैं भी प्यार करता हूँ,
एहसास के ठाव – गाँव में ही रहता हूँ।
ज्ञान की गंगा में गोता खा रहा हूँ,
नदी बहुत गहरी उसी में नहा रहा हूँ।
कई बरसो से डूबता उतर रहा हूँ,
मुझे देखो मैं भी प्यार करता हूँ।

दिखे दिखता दिलदार दिलवर दिलेर दिखाई,
लिख-लिख-लिख लिखते लरिकन लरिकाई।
लड़ते-लड़ते लाखो लालित्य लाल लाई,
सज-सुघर सुहृद सजल साहित्य पाई।
विश्व के साहित्य प्रेम को साकार करता हूँ,
मुझे देखो मैं भी प्यार करता हूँ।

मेरा भी मन हिलोरे भरने लगा पुस्तक प्रदर्शनी में पुस्तक लगाने के लिए, फिर मैंने कंप्यूटर के जानकार, को पुस्तकों को छापने हेतु मित्र रतन को बुलाया उन्हें ढेंकानाल उड़ीसा यात्रा (तृतीय खण्ड ई बुक), ओडिशा साहित्यिक धर्मयात्रा क्रमशः 2015 और 2018 में प्रकाशित, सु पाथेय षट्दर्शन (चतुर्थ खण्ड) स्वर्ग विभा अवतरण ई-बुक सूरज की रौशनी को आने तो दो, काव्य साधना (प्रथम खण्ड ई-बुक) की प्रतियाँ प्रकाशन करने वाले को दे दी। साथ ही दिया “कवि हूँ मैं सरयू तट का” (काव्य संग्रह)।

काम लम्बा था उसने ऊपर से चार पुस्तकों को दे दी, दिन में ‘रतन’ ने तैयार कर दिया। हमने भी उन पुस्तकों को पुस्तक मेले में बावरा जी के पुस्तक के बगल में लगा दिया था। मैंने सारी पुस्तकें इंटरनेट पर काम करने वाले साहित्यकारों को आखिरी दिन भेंट कर दिया। अनहद कृत के वयोवृद्ध सम्पादक, साहित्यकार पुष्पराज चसवाल जी को स्वर्ग विभा अवतरण की एक पुस्तक भेंट की।

भारतीय साहित्य में मनुष्य को सर्वोपरि स्थान प्राप्त है और उसे साहित्य रचना देश-समाज हित में ही करनी चाहिए।

देश हित में बात जो करता नहीं,
वह धरा पर पिशाच बन रहता कही।
ज़िंदगी पाया मूल्यवान आदमी का,
माँ- ममता रखता नहीं तू ही ?
उऋण जब होगा नही इस जन्म में,
अगले जन्म में क्या बनेगा सोच ले।

—♦—

03 अगस्त 2023 के पूर्व संध्या पर रतन के किराए के रूम चौकाघाट में मैं पंहुचा। वहां उनके माता-पिता और बहन भी उपस्थित थी उनके घर चाय-पान किया, सुपाथेय षट्दर्शन की प्रतियां ली और काली मंदिर के पास बाइंडिंग करने वाले को दे दिया। कुछ घंटों में बाइंडिंग हो गई में घर से आकर उन पुस्तकों को ले लिया।

उसके बाद – पं.दीनदयाल उपाध्याय नगर, जनपद चंदौली तक जाने की थी रतन जी ने वहां तक पहुचाने का पक्का वादा कर ली, और सुबह-सुबह पांडेयपुर मेरे आवास पर पहुँच गए थे वादा का पक्का, मन के धनी, ईमानदार नेक इंसान हैं रतन जी।

इसीलिए मैं कहता हुं कि मेरा मित्र वही होता है जो वादा खिलाफी कभी नहीं करता।
हमनें अपनी पुस्तकें एक बड़े बैग में रख ली और एक अरेस्टोकेट अटेची में यात्रा से सम्बंधित आवश्यक सामानों को रख लिया और एक बोतल पानी, अपना बैग लेकर रतन के मोटरसाइकल पर बैठकर ज्यों ही घर के सामने कंडेल पुष्प के पास पंहुचा ही था की धरती माँ पुस्तकों को चूमना चाहती थीं कि बैग धरती पर आ गया।

उसे उठाकर मैंने माथे से लगाया और फिर मोटरसाइकिल के पीछे बैग और उसके उपर अटेची बाँध लिया। आगे बढे रतन ने अपने चौकाघाट रूम पर जाकर हेलमेट लिया। सुरक्षा के दृष्टिकोण से हेलमइट आवश्यक है।

आगे बढे पीली कोठी सिटी रेलवे स्टेशन के समीप पंहुचा ही था कि इन्द्र भगवान खुश होकर रिमझिम-रिमझिम बारिश करने लगे इसीलिए कहा है कि —

प्रकृति हमें जीवन जीने की कला सिखाती,
हमें प्रकृति अपने आँगन में सदा बिठाती।
अम्बर ऊपर भूतल निचे फिर जल बरसाती,
सतयुग से कलयुग तक वह सफ़र कराती।
ऋषिमुनियों से भाँति-भांति संसार बसाती,
निर्मल जल गगन बिच मयंक धरा सजाती।

राजघाट पुल पर चढने के पहले बसंत महिला कालेज के पास जोरदार बारिश होने लगी रतन तो चलते चल रहे थे, आगे बढ़ रहे थे, जहाँ-तहां पेड़ के छाँव में रुक जाते। मैं अपने जेब से रुमाल निकाल कर बेग के दोनों तरफ बारिश के पानी को बैग के ऊपर से सुखा कर उसे निचोड़ते हुए आगे बढ़ते रहते बढ़ते-बढ़ते रेलवे स्टेशन के द्वार पर पहुच गया।

रतन ने बैग व अटेची को बरामदे में रख दिया हमने कपडे बदले भीगा हुवा कपडा स्टील की बनी हुई मुसाफिर खाने के कुर्सियों पर फैला दिया, बैग को खोला तो उसमें अपनी पुस्तक सही सलामत थी।

हर हर महादेव!

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस यात्रा वृतांत में समझाने की कोशिश की है — यसाहित्यिक यात्रा के दौरान क्या-क्या तैयारी करना जरुरी होता है और क्या-क्या नहीं करना चाहिए, व किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। यात्रा के समय आपका व्यवहार लोगों से कैसा होना चाहिए? जब सभी से मिले तो, एक दूसरे से बात-चित कैसे करें व सभी का सम्मान अच्छे से करे, सभी की बातों को ध्यानपूर्वक सुने और सभी का मनोबल बढ़ाये, तथा अच्छे साहित्यिक कार्य को आगे बढ़ाने में एक दूसरे की मदद करे। एक – एक करके सभी की रचनाओं को सुनकर उनका उत्साह बढ़ाये दिल से। यात्रा के दौरान अपने मन व बुद्धि को शांत व स्थिर रखें, सभी से शालीनता पूर्वक अच्छा व्यवहार करे। “आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप: करते नहीं कोई यात्रा। पढ़ते नहीं कोई किताब, सुनते नहीं जीवन की दुनियां, करते नहीं किसी की तारीफ।”

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यह यात्रा वृतांत (वाराणसी से चंडीगढ़ की साहित्यिक यात्रा अगस्त – 2023) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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पूर्व जन्मों के पुण्य का फल है काशी दर्शन।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kashi Darshan | पूर्व जन्मों के पुण्य का फल है काशी दर्शन।

Kashi Darshan is The Result of Virtues of Previous Births

काशी की सरजमीं निराली है, काशी का हर कंकर शंकर है, प्रत्येक घर गर्भगृह है, हर एक चौराहा किसी न किसी देवी देवता का चौराहा है। संस्कृत शिक्षा का एक प्रधान केन्द्र रहा है। विविध रीति-रिवाज, धर्म एवं विविध भाषाओं के जानने वाले वेष-भूषा को धारण करने वाले वाराणसी में रहते हैं, आते जाते रहते हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि काशी वैदिक काल से पूर्व की नगरी है।

यहाँ शिवोपासना को पूर्व वैदिककालीन माना जाता है। यद्यपि हरिवंशपुराण में राजा ‘काश’ का नाम काशी को बसाने में आया है जो भरतवंशी रहे। यह मुक्त तथा मुक्तिधाम है। यहाँ गुप्त काल के पूर्व यक्ष पूजा, नागपूजा के साथ-साथ शिवपूजा अवश्य होती थी। गुप्तकाल से शिव उपासना में काफी वृद्धि हुई, जो उत्तरोत्तर बढ़ती गई। बनारस महादेव का महानगर है। यह एक नगर ही नहीं एक संस्कृति है।

प्राचीनकाल से ही संस्कृत का केन्द्र है — काशी

बनारस ईंट-पत्थरों का नगर ही नहीं अपितु इतिहास है जो ऐतिहासिक नगर के रूप में जाना जाता है। यह संसार प्रसिद्ध विद्वानों का गढ़ है। प्राचीनकाल से ही आर्य धर्म और संस्कृत का केन्द्र है। यहाँ की संस्कृति और धर्म प्राचीन काल से ही विद्वानों के कारण सुरक्षित संजमित है। काशी भारत का एक अंग है। भारत आध्यात्मिक संस्कृति की उदय भूमि है।

मनुष्य के अंदर अपनी जाति के प्रति जब से मोह उत्पन्न हुआ तभी से वह पूर्ण जानकारी हासिल करने का प्रयत्न करना चाहा और चेतन अचेतन मन से जाने-अनजाने अनगिनत क्रियाएँ जानकारी करने के लिए करता आ रहा है। वह वैदिक काल से ही इस कार्य में तत्परता पूर्वक लगा हुआ है।

मानवशास्त्र, इतिहास, समाजशास्त्र, पुराण एवं साहित्य को टटोलने से लगता है कि वह ठीक ही कर रहा है, कारण समाज और सामाजिक गतिविधियों का यह भी दर्पण है। इसी के बल पर भविष्य की पीढ़ी भविष्य का सांस्कृतिक और सामाजिक निर्माण करेगी। प्रांतीयता के भेद-भाव से रहित काशी प्रत्येक व्यक्ति को संस्कृत भाषा का अध्ययन अध्यापन कराता है।

भाषा विज्ञान के आचार्यों की माने तो हिंदी साहित्य का मूल स्थान काशी ही है। पुराणादि जातकों द्वारा गंगा के तट की बस्ती प्राचीन प्रमाणित है आज तो पड़ाव क्षेत्र से सामने घाट काशी हिंदू विश्वविद्यालय तक बस्ती अगाध रूप से बढ़कर बसी है परन्तु डॉ. मोतीचंद ने लिखा है कि 500-600 वर्ष पहले गंगा के किनारे आज के समान निवास स्थान नहीं थे।

किनारे के भवनों में सबसे प्राचीन मानमंदिर, बूँदी के महल तथा कुमार स्वामी के मठ आते हैं। इसकी पुष्टि जेन्स प्रिसप नामक अंग्रेज के लेखों के आधार पर की गई है। आठवीं शताब्दी में अस्सी घाट पर शंकराचार्य द्वारा ‘दक्षिणामुखी’ शंकरमूर्ति तथा देवस्थान थे। यहाँ यात्रियों के रहने का प्रमाण मिलते हैं।

कुछ अभिलेखों में काशी की गलियों ‘वाररामाभिरामा’ बताया गया है। गंगा का सामीप्य और धर्म साधना में शांति थी। मुगलों के समय आक्रमणों से बचने हेतु हिंदू वन एवं पानी का सहारा पाकर गंगा के किनारे बसते थे। भारतीय मनीषियों ने माना कि धर्म ही मानव जाति को पशु से ऊपर उठाने में, सक्षम सिद्ध होता है यथा —

धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः

धर्मपालन का तात्पर्य सत्य, अहिंसा, परोपकार, क्षमा और अमूल्य मूल्यों का जीवन में पालन करना है। मिथ्या भाषण, हिंसा, लोलुपता, आलस्य का शिकार न होना। सही अर्थों में पुरुषार्थ (पुरुष वा स्त्री) मोक्ष है। भारतीय मानव की मेधा शक्ति दोलायमान नहीं रही वह निर्धारित लक्ष्य की तरफ अविचल अविरल निष्ठापूर्वक अग्रसर होती रही है। जीवन को टुकड़ों में बाँटने के बजाय चारों तरफ से घेरना ही भारतीय संस्कृति रही है। काशी की गणना अंगुत्तर निकाय में 16 महाजनपदों में की गई है। भारती की प्राचीनतम् सांस्कृतिक राजधानी का गौरव आज भी काशी को ही प्राप्त है। शंकराचार्य ने काशी में अनुभव किया कि ‘अन्नमयदेह शूद्र है चैतन्य आत्मा ब्रह्मभाव है।

काशी का ऐतिहासिक व्यक्तित्व विराट

यहाँ की मिट्टी में गौतम बुद्ध का राम से विराग मिलेगा तो वहीं शंकर का वेदांत निनाद, कबीर का अलमस्त फक्कड़पन तो तुलसीदास जी का सगुणी रामधुन प्रसाद और मुंशी प्रेमचन्द की साहित्यिक आराधना का संसार तो भारतेंदु की साहित्य सर्जना का विपुल विश्व। काशी में ठुमरी, ध्रुपद, धमार और खयाल अलौकिक आलाप और दूसरी तरफ सितार, सरोद, शहनाई, तबला, पखावज और सारंगी, बासुरी का स्वर संतुलन भी, नर्तन लहरियाँ बनारस के परंपरा में परिवकर्तन भी यहाँ देखे जा सकते हैं। काशी का ऐतिहासिक व्यक्तित्व विराट है।

यह लौकिक और पारलौकिक भी है, भौतिक और आध्यात्मिक भी है, शृंगारी, श्मशानी, पतितपावनी, पतित पालिनी भोगी, परमयोगी, अनुरागी और विरागी है। भूमि का प्रभाव मस्तिष्क पर वैज्ञानिक मान्यता है। यहाँ का औसतन तापमान 65 डिग्री से 75 डिग्री फारेनहाइट। 85 से 95 डिग्री फा० जनवरी से मई तक रहता है। हिंदू मध्ययुग की सभ्यता आज भी यहाँ विद्यमान दिखती है। लकड़ी के खिलौने, पत्थरों पर नक्काशी के मकान, मंदिर तोरण द्वार, पीतल के बर्तन, सोने व चाँदी के विविध आकार-प्रकार के गहने, रेशमी वस्त्र, कीम खाना आदि प्रमुख हैं।

धरना प्रथा — गृहकर के विरोध में धरने

बनारस में 1781 में अदालत कायम हुई इसके पूर्व में धरना प्रथा चरम पर थी। ब्राह्मण छूरा व विष लेकर किसी के भी दरवाजे पर बैठ जाते थे। हिंदुओं का उस समय तक पूर्ण विश्वास था कि ब्रह्महत्या से बढ़कर कोई पाप न था। यद्यपि आज भी मान्यता है फिर भी हत्याएँ हो रही हैं जो खेद का विषय बना हुआ है। एक बार तीन लाख लोग मुँह लटकाकर गृहकर के विरोध में धरने पर बैठ गये। खेती का कार्य प्रभावित होने, दुर्भिक्ष पड़ने के डर से बरसात की कमी से मुसीबत आ गई अंत में गृहकर नहीं लगा, प्रशासन को अपने आदेश से पीछे हटना पड़ा था। यह घटना 1810 की है जब अंग्रेज शासन का उस वक्त गवर्नर जनरल कलकत्ते में बैठता था। काशी की 20-30 हजार जनता सामानों से सजकर कलकत्ता जाने लगी, बीच में ही गृहकर खत्म होने से वापस आ गई थी।

भक्ति साहित्य का सूत्रपात

भक्ति साहित्य का सूत्रपात काशी से ही हुआ स्वामी रामानन्द के शिष्य कबीर, रैदास (निर्गुण) तता तुलसीदास जी (सगुण) साहित्य यही से पूर्ण किए। मानस की रचना सं. 1631 में अयोध्या से प्रारम्भ हो काशी में पूर्ण हुई। तुलसी की चरण पादुका तुलसी कंठी तुलसी मंदिर काशी में प्रमाण स्वरूप है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में काशी पृथ्वी के सब अंशों से अलग है अतएव काशी तीनों लोकों से न्यारी नगरी है।

गुप्तकाल में यहाँ पाठशाला थी, इस पाठशाला के कुछ अध्यापक वैष्णव थे। यहाँ तीनों वेद पढ़ाये जाने का प्रबंध था। यहाँ धातुओं के चमचमाते चमकते कलश विविध प्रकार की ध्वजा पताका ऊँचे-ऊँचे गुंबदों पर गरिमा को बढ़ाते रहते हैं। काशी कैलाश शिखर का स्वरूप है। काशी के विद्वानों के सहयोग से विविध अवसर पर पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ जो अपने आप में अद्वितीय है।

पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन

1867 ई. में शुभारंभ ‘कविवचन सुधा’ पत्रिका का जिसे साहित्यिक पत्रकारिता युग के रूप में माना गया। 15 अक्टूबर 1873 ई. को हरिश्चंद मैंगजीन मासिक पत्रिका प्रकाशित हुई जो डा. इ.जे. लाजरस के मेडिकल हाल प्रेस में छापी जाती थी। 1875 में काशी पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका काशी के रईस शिक्षक बाबू बालेश्वर प्रसाद द्वारा संपादित की जाती थी। 3 मार्च 1884 ई. को ‘भ्रत जीवन’ नामक समाचार पत्र काशी से प्रकाशित हुआ जो पहले साप्ताहिक पुनः दैनिक कर दिया गया। काशी में आज, संसार, सन्मार्ग, गाण्डीव, रणभेरी आदि का प्रकाशन किया गया था। जो आजादी के आसपास के पत्र-पत्रिकाओं में से आजादी की गाथा बयां करते रहे हैं।

1893 ई. में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना के बाद 1896 ई. में नागरी प्रचारिणी पत्रिका प्रारंभ हुई। यह पहले मासिक बाद में त्रैमासिक हो गई। 1916 ई. तक सरस्वती का संपादन द्विवेदी जी ने किया। 1909 में इंदु का काशी से प्रकाशन हुआ यह सरस्वती पत्रिका के शब्दा नुशासन से अलग हटकर छायावादी कवियों के विकास हेतु प्रकाशित हुआ।

11 फरवरी 1932 में बाबू शिवपूजन सहाय ने पाक्षिक पत्रिका जागरण का प्रारम्भ किया, इसके संपादक साहित्यकार विनोद शंकर व्यास के छोटे भाई प्रमोद शंकर व्यास रहे। यह छः मास तक चली पुनः प्रेमचंद ने ले ली और साप्ताहिक प्रकाशन होने लगा।

1930 में ‘हंस’ नामक कहानी पत्रिका से प्रारम्भ होकर प्रेमचंद ने मासिक बनाया अंत में धनाभाव के कारण प्रख्यात कथाकार के. एस. मुंशी 1935 में संयुक्त रूप से प्रकाशन प्रारंभ किया। उपरोक्त प्रमुख पत्रिका काशी से प्रकाशित होती रही है। बाद में विविध पत्रिकाओं का प्रकाशन काशी से होने लगा है।

काशी अनेकता में एकता का संसार है। कृत पुरुषों विद्वानों का जन्मदाता है, साहित्यिक मनीषियों से भरापूरा भूभाग है। आपत्तिकाल में उग्र क्रांति की लहर का संवाहक है। यहाँ के पूर्व में प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं को युगबोध की कसौटी पर कसने पर पूर्णतया खरा उतरते हैं।

नव साहित्य का जन्मदाता संस्कृति का संवाहक है। विविध रंगमंच का प्रणयन कर सामाजिक उद्देश्यों को मान्यता प्रदान करता है। परिणाम स्वरूप अभिनय योग्य नाटक लिखे गये। काशी दर्शन महान दर्शन है। काशी में चरण, पुण्य के पूर्वजन्म के प्रताप से ही पड़ते हैं। आइये एक बार काशी का दर्शन करें।

मुक्ति जन्म महिं जानि।
ज्ञान खानि अघ हानि करि॥
जहँ बसि शंभु भवानी।
सो काशी सेइय कस न॥

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — यहाँ शिवोपासना को पूर्व वैदिककालीन माना जाता है। यद्यपि हरिवंशपुराण में राजा ‘काश’ का नाम काशी को बसाने में आया है जो भरतवंशी रहे। यह मुक्त तथा मुक्तिधाम है। यहाँ गुप्त काल के पूर्व यक्ष पूजा, नागपूजा के साथ-साथ शिवपूजा अवश्य होती थी। गुप्तकाल से शिव उपासना में काफी वृद्धि हुई, जो उत्तरोत्तर बढ़ती गई। बनारस महादेव का महानगर है। यह एक नगर ही नहीं एक संस्कृति है।

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यह लेख (पूर्व जन्मों के पुण्य का फल है काशी दर्शन।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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फौजी की राखी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Soldier’s Rakhi | फौजी की राखी।

आज रमा पहली बार अकेले पंजाब से अपने भाई को राखी बांधने जा रही है। शादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ है जब रमा अकेली सफर कर रही है, हर बार राखी पर अपने पति अमित के साथ अपने मायके जाती थी। परंतु इस बार अमित को किसी जरूरी कार्य के लिए बाहर जाना पड़ा तो रमा को अकेले ही सफर, करना पड़ा। ट्रेन अपने तय समय 9:00 अमृतसर स्टेशन पर पहुंच गई। अमित ने रमा को बिठा दिया क्योंकि उसे भी उसी दिन निकलना था और जाते-जाते बोल दिया घर पहुंचते ही फोन कर देना रमा डरी सहमी खिड़की के बगल वाली सीट पर बैठी बस अमित को ही देखे जा रही थी और मन में ढेरों, सवाल थे?

उसके साथ में एक नन्ही सी 2 साल की अपनी बेटी स्नेहा भी थी। अमित के पास इतना वक्त नहीं था कि ट्रेन चलने का इंतजार करें। अमित बिठाते ही तुरंत निकल गया कुछ समय के पश्चात ट्रेन ने अपनी रफ्तार पकड़ी और चलते-चलते जब काफी देर हो गई तो रमा तो अमित के ख्यालों में ही खोई हुई थी। एकदम से उसका ध्यान गया कि जिस बोगी में उसकी टिकट है उसमें सिर्फ एक बूढ़ी अम्मा और रमा ही बैठी है और बाकी सारी बोगी में फौजी लोग बैठे हुए थे और सभी फौजी लोग बड़े खुश थे। एक दूसरे के साथ हंसी मजाक कर रहे थे।

रमा को डर लगने लगा उसे लगा जैसे कि वह बहुत अकेली है। अगले स्टेशन पर बूढ़ी अम्मा भी उतर गई अब तो रमा की जैसे जान ही निकल गई। हड़बड़ाहट में जोर-जोर की सांसे ले रही थी बार-बार कभी खिड़की की तरफ कभी अपनी बेटी की तरफ देख रही थी और यह भी देख रही थी कि उसे कौन-कौन देख रहा है। सामने वाले भी बीच-बीच में उसकी तरफ देख रहे थे। फिर उन सभी के बीच में से एक फौजी उठकर रमा की तरफ आया रमा का तो जैसे दिल ही बैठ गया जैसे ही वह फौजी रमा के पास आया उसने रमा के सिर पर हाथ रखा और बोला बहन तुम घबराओ मत। मैं देश का जवान हूं मेरा फर्ज सिर्फ इतना नहीं है कि मैं देश की सरहद की रखवाली करूं।

हम जवान 24 घंटे ड्यूटी पर तैनात रहते हैं आप चिंता ना करें आप यहां पर अपने भाइयों के साथ बिल्कुल सुरक्षित हैं। आराम से बैठे और अगर आपको बेचैनी महसूस हो रही है तो आप मेरे पास फोन है अपने घर वालों से बात भी कर सकती हो। रमा ने हल्के से मुस्कुराते, हुए कहा नहीं भैया कोई बात नहीं बस दो-तीन घंटे की बात है मेरा स्टेशन आ ही जाएगा। रमा को बस थोड़ा सा अच्छा लगा और फौजी भाई ने दूसरे फौजी भाइयों को पता नहीं जाकर क्या बोला कि सभी चुप होकर अपनी-अपनी सीट पर बैठ गए और जैसे ही स्टेशन आया तो उन्होंने रमा को नीचे उतारने में उसकी मदद की और अपने फोन से फोन भी करवाया कि आप अपने भाई से बात करें और बता दे की ट्रेन पहुंचने वाली है रमा उनका धन्यवाद करती और उनकी तरफ भी देखती ही जा रही थी और मन ही मन बहुत मुस्कुरा रही थी और जाते-जाते अपने सभी फौजी भाइयों को उसने बैग में से राखी निकालकर उनके हाथ में थमाते हुए बोली लो मेरी तो आज ही राखी पहले दिन ही बन गई। सभी फौजी भाई बहुत ही भावुक हो गए और उन्होंने बताया बहन हम तो बहुत कम ही रक्षाबंधन पर छुट्टी जा पाते हैं।

अभी हम ड्यूटी के सिलसिले में ही कहीं जा रहे हैं तू हमें हाथ में क्यों थमा रही है।हमारी कलाई पर ही राखी बांध देगी तो हमें बहुत अच्छा लगेगा। रमा ने रोते-रोते सभी भाइयों की कलाई पर राखी बांधी। सभी फौजी भाई बहुत खुश थे क्योंकि सभी को राखी जो मिल गई थी और उसके साथ एक प्यारी बहन भी।

ऐसे हैं मेरे देश के जवान! जय हिंद! जय भारत – जय जवान!

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — रमा को अकेले सफर करते समय डर और अनिश्चितता महसूस होने लगती है। उनकी सारी चिंताएँ और सवाल वो ही होते हैं जो एक व्यक्ति अकेले सफर करते समय महसूस करता है। अगले स्टेशन पर अम्मा भी उतर जाती है और रमा के डर और बेचैनी को महसूस करती है। बोगी में बाकी यात्री फौजी होते हैं और वे सभी खुशी-खुशी अपने दोस्तों के साथ मजाक करते हैं। एक दिन एक फौजी रमा के पास आकर उन्हें साहस देता है कि वह डरने की बजाय आराम से यात्रा करें, क्योंकि उनका फर्ज सिर्फ सीमा की रक्षा ही नहीं होता, बल्कि देश की बहनों की भी रक्षा होती है। आखिरकार, सभी फौजी भाइयों के साथ मिलकर रमा अपने भाइयों के लिए राखी बांधती है और वे सभी एक परिवार की भावना से जुड़ जाते हैं। इस कहानी से स्पष्ट होता है कि देश के जवान की सबसे बड़ी प्राथमिकता देश और सामाजिक हित है और उनकी उपस्थिति हमें सुरक्षित महसूस कराती है।

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यह लेख (फौजी की राखी।) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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  • आखिर क्यों।
  • समय।
  • काले बादल।
  • सुबह का संदेश।

KMSRAJ51: Motivational Speaker

https://www.youtube.com/watch?v=0XYeLGPGmII

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निरर्थक रील्स की आरी – गुमराह होती नारी।

बात वक्त की।

तिरंगा का करें सम्मान।

एक सफर।

बाल विवाह – एक अभिशाप।

क्या बदलाव लायेगा नया साल।

है तो नववर्ष।

मोह।

अपना धर्म सबसे उत्तम।

ठंडी व्यार।

रिश्तों को निभाना सीखो।

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