Kmsraj51 की कलम से…..

Brother’s message | भाई का पैगाम।

रक्षाबंधन पर,
भाई का पैगाम,
सभी बहनों के नाम।
ओ मेरी बहना,
राखी तू जरूर बांधना,
रक्षा का मैं वचन भी दूंगा।
मगर,
इस कलयुगी युग में,
राक्षसी प्रवृत मानवों में।
आस पास के,
गैर तो गैर अपने लोगों में,
कौन कैसा है पहचानने में।
खा जायेगी तू धोखा,
गिरगिट जैसी रंग बदलती दुनिया में,
गुम हो जाएगी तुम्हारी पहचान।
सुन री बहना,
साये की तरह मेरा साथ नहीं,
इस बात का तूझे ख्याल है रखना।
मुझ पर निर्भर,
मत रह ये बहना,
तुम ही हो घर का गहना।
सुन तू,
नाजों से पली,
तू कोमल सी कली।
हैवानों की नजर,
इसीलिए तुझ पर गरी,
तू लगती हो सुंदर परी।
रुक,
इस मिथ्या को तोड़,
रिश्तों के बंधन छोड़।
नियत अब,
तू पहचाना सीख,
न मांग तू किसी से भीख।
समाज में छवि,
दया कोमलता की प्रतिमूर्ति,
ममता की जो करती है पूर्ति।
समय आने पर,
तू ही चंडी तू काली है,
जग की करती रखवाली है।
निर्भया बनो,
उठो जागो और याद कर,
अपनी शक्ति का संचार कर।
सृष्टि की,
जननी तू पालक तू,
जीवन का आधार हो तू।
फिर,
चंद वहशी से मत डर,
उठ, कर उनका प्रतिकार।
वचन,
आज रक्षाबंधन पर दो,
अन्मविश्वास खुद में ला दो।
तू,
अबला नहीं,तू सबला है,
कोमल नहीं तू कठोर है।
अब,
ना डर प्रतिकार कर,
खुद की रक्षा स्वयं कर।
लोगों की सोंच,
बदलेगी आएगी वो सुबह,
हाथ लगाते होंगे वो तबाह।
सनक ऐसी पाल,
अच्छे के लिए अच्छा,
बुरे के लिए काल बन।
फिर कोई तुझे,
छूने से भी घबड़ाएगा,
सपना मेरा साकार हो जायेगा।
अब,
भाई की न करना फरियाद,
तू ही है मेरी बहना फौलाद।
♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦
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• Conclusion •
- “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता में एक भाई अपनी बहन को रक्षाबंधन के अवसर पर संदेश भेजता है, जिसमें वह उसे अपनी सुरक्षा के लिए जागरूक और आत्मनिर्भर बनने की सलाह देता है। भाई बहन से कहता है कि वह राखी जरूर बांधे, और वह उसकी रक्षा का वचन भी देता है। लेकिन साथ ही वह इस कलयुगी युग में चारों ओर फैले खतरों और मानवों की राक्षसी प्रवृत्तियों से सतर्क रहने के लिए भी कहता है। भाई अपनी बहन को यह समझाता है कि उसे खुद की रक्षा के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि खुद को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना चाहिए। वह उसे याद दिलाता है कि समाज में उसे कोमल और दयालु समझा जाता है, लेकिन समय आने पर उसे अपनी शक्ति को पहचानना होगा और चंडी व काली जैसी शक्तिशाली रूप धारण कर समाज की रक्षा करनी होगी। भाई यह भी कहता है कि उसे किसी भी बुराई का डटकर मुकाबला करना चाहिए और खुद की सुरक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए। अंत में, वह बहन से वादा लेता है कि वह शक्ति रूप बनेगी, अपनी शक्ति को पहचानेगी और खुद को सबला मानेगी। भाई बहन से कहता है कि अब वह किसी पर निर्भर न रहे और खुद ही अपनी रक्षा करे, जिससे समाज में बदलाव आए और बुरे लोग उससे डरने लगें।
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यह कविता (भाई का पैगाम।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।
आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—
मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। भोला सिंह हाई स्कूल पुरुषोत्तम, कुरहानी में अभी एक शिक्षक के रूप में कार्यरत हूँ। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।
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संस्कार और विनम्रता का अटूट संबंध है, संस्कार ही विनम्रता की जननी है। संस्कार के बिना जीवन मरूस्थल की तरह है, जहाँ संस्कार नहीं वहाँ अहंकार ही उत्पन्न होता है। संस्कार के भूलते ही अहंकार की उत्पत्ति हो जाती है, नदी कभी सूख जाती है, कभी विकराल रूप धारण कर लेती है, गाँव के गाँव नदी में समा जाती है। नदी को अपने प्रचंड प्रवाह पर घमंड हो जाना स्वाभाविक है, नदी मर्यादा भूल जाती है, यह भी भूल जाती है कि कभी उसकी सुखी रेत पर बच्चे गेंद खेलते हैं। नदी को अपने ताकत का अहंकार हो गया, वह सोचने लगा मैं पहाड़, मकान, पेड़, पशु और मानव को बहा कर कहीं भी ले जा सकता हूँ। बर्बाद करने की ताकत है मुझमे, एक दिन समुद से उसकी बहस हो गई क्योंकि अहंकार के कारण विनम्रता जा चुकी थी। गर्वीले अंदाज में मुस्कराते हुए समुद से कहा, बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या-क्या लाऊँ, मैं सर्व शक्तिमान हूं, मैं मकान, पेड़, पशु. मानव – जो तुम्हारी इच्छा हो, उसे लाकर तुम्हें समर्पित कर दूंगी।


भारत विचारवान महापुरूषों की जन्म भूमि है। यहां समय-समय पर महापुरूषों की भूमिका निभाने वालों का जन्म धरती माँ की गोंद में होता रहा हैं जिससे धरती धन्य होती रही है। उन्हीं महापुरूषों में मदन मोहन मालवीय जी का नाम भी प्रमुख रूप में लिया जाता हैं उन्होंने हिन्दू संगठनों का शक्तिशाली आन्दोलन चलाया जबकि इसके लिए उन्हें सहधर्मियों की उलाहना सहन करना पड़ा उलाहना का परवाह किए बिना कलकत्ता, काशी, प्रयाग नासिक आदि प्रमुख जगहों पर उन्होंने भंगियों को उपदेश दिया और मन्त्र दीक्षा भी दिया।

हम अपनी बेटियों को फूल की तरह, तितली की तरह नाजुक बनाते जा रहे हैं। क्योंकि हम सब अपनी लाड-दुलारी से बेहद प्यार करते हैं और चाहते हैं कि उसे हमारे सामने रहते हुए एक भी कष्ट ना सहन करना पड़े। अच्छी बात है परंतु आज के समाज को देखते हुए सही नहीं है। कुछ समय पीछे चले जाए तो पहले की मां बेटी को तमाम काम सिखा देती थी। ऐसा नहीं कि बेटियां पढ़ती नहीं थी। पढ़ाई के साथ-साथ घर का काम करना भी उन्हें बचपन से सिखाया जाता था।






